सरकारी किस्सागोर्इ-छŸाीस वर्ष बाद भी नहीं मिला भू-अधिकार
प्रेम पंचोली
राज्य को बने हुए अब बारह वर्ष पूरे हो ही गये हैं लेकिन अब तक राज्य के पास कोर्इ लोक विकास की उम्दा नीति नहीं है। यही वजह है कि राज्य में चौतरफा विभिन्न मांगो को लेकर लोग आन्दोलित है और सŸाासीन नुमार्इन्दे अब तक सŸाा की मलार्इ चाटने में मसगूल हैं। यहां हम बात कर रहे हैं कृषि भूमि की। अन्य ढांचागत कार्यो के लिए सरकारें चन्द समय में भूमि उपलब्ध करवा रही है। मगर भूमिहीनो के लिए सरकार के पास कोर्इ भू-नीति नहीं है। आलम यह है कि जो लोगो की बची-खुची कृषि भूमि वह भी भूमाफियाओं के कब्जे में जा रही है। पिछले दिनो अनुसूचित जाति एवं जनजाति संयुक्त संघर्ष मोर्चा के तत्वाधान में उधमसिंहनगर के खटीमा में हुए दलित, आदिवासी एवं बुक्सा, थारू जनजातियों के भूमिअधिकार को लेकर दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में आये ग्रामीण प्रतिभागीयों ने चौंकान वाले आंकड़े प्रस्तुत किये। बताया गया कि गदरपुर ब्लाक के गुलरभोज गांव के निवासीयों की कृषि भूमि सन 1976 में हरीपुरा जलाशय के लिए तत्काल उŒप्रŒसरकार ने अधिग्रहण की थी। सो अब तक लोगो को इस भूमि के बदले दी गयी भूमि का अधिकार नहीं दिया गया है। जो भूमि सरकार द्वारा दी भी गयी थी वह अब भूमाफियाओं की भेंट इस लिए चढार्इ जा रही है कि अमुक व्यकित भूस्वामी नहीं है। विडम्बना यही है कि लोग राज्य बनने के पश्चात भी भूमि के अधिकार के लिए दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हैं। इस दौरान गुलरभोज गांव के प्रेम सिंह ने बताया कि 1976 में हरीपुरा गांव में 500 परिवार बुक्सा जनजाति के निवास करतें थे। हरीपुरा जलाशय बनने के कारण इन परिवारों को गुलरभोज में बसाने का फरमान तत्काल उŒप्रŒ सरकार ने किया। लोगो को 50एकड़ कृषि भूमि के बदले मात्र छ: एकड़ भूमि तो दी गयी परन्तु 36 वर्ष के अन्तराल में लोग भूमिधर नहीं हो पाये। दूसरी ओर जमीन की अवैध खरीद-फरोख्त पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया। यहां सम्मेलन में आये बुक्सा जनजाति के लोगो ने आरोप लगाते हुए कहा कि चन्द धन्ना सेठ स्थानीय लोगो को अपने कर्ज के पैसो के आड़ में जमीन हड़पने का धंधा जोरो पर चला रहे है। क्योंकि बुक्सा जनजाति के लोग अधिकांशत: निरक्षर है, बेरोजगार हैं, आर्थिक तंगहाली की वजह से इस जनजाति की जमीन पर नाजायज हमला लगातार बढता ही जा रहा है। इस बात को सम्मेलन में पंहुचे अनुŒजाŒ एवंजनजाति के अध्यक्ष चनर राम ने भी स्वीकार किया कि उनके पास ऐसे कर्इ मामले आये है जिनमे जामीन का सौदा कर्ज चुकाने में तो हुआ है परन्तु जो दाखीला खारिज की फार्इल बनती है उसमें बड़ा गोलमाल सामने आया है। उन्होने कहा कि जनजातियों की जमीन खरीदने में लोग उनके निरक्षर होने का नाजायज फायदा उठा रहे हैं। कहा कि वे ऐसे मामलो को आयोग के माध्ययम से गम्भीरता से ले रहे है और समय आने पर उचित कार्यवाही करेंगे। वे एक बात से काफी व्यथित थे कि उनके सामने एक ऐसा मामला आया जो शिक्षित समाज को शर्मशार करने वाला था। कहा कि अल्मोडा़ सिथत महाविधालय में एक वर्ष तक सोनू टम्टा इसलिए सहायक प्रोŒ नहीं बन पायी थी कि वह अनुसूचित जाति से थी। हालांकि बाद में आयोग ने इस मामले को सुलझाया। सम्मेलन में उŸाराखण्ड वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के प्रमुख तरूण जोशी, उŸाराखण्ड परिवर्तन पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी, उधमसिंहनगर से महिला समाख्या की जिला समन्वयक चन्द्रा जोशी, भूमिअधिकार मंच की समन्वयक हीराजंगपांगी, उŸाराखण्ड किसान महासभा के पुरषोŸाम शर्मा, क्षेत्रपंचायत सदस्य पूनम राणा, अर्पण संस्था की डाŒ रेनू ठाकुर आदि ने भूमि के सवालो विचार व्यक्त किये हैं। बाक्स में (01) खटिमा के विधायक पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि दलित आदिवासियों को भूमि अधिकार हेतु 2006 में लाया गया वनाधिकार कानून को लागू करवाने के लिए वे उधमसिंहनगर के जिलाधिकारी के साथ शीघ्र बैठक करेंगे कि अब तक वनाधिकार कानून 2006 के क्रियान्वयन को लेकर विलम्ब क्यों हो रहा है। कहा कि वे अपनी विधानसभा में इस कानून को लागू करवाने के लिए भरसक प्रयास करेंगे। नानकमŸाा के विधायक डाŒ प्रेम सिंह राणा ने कहा कि भूमि को लेकर उŸाराखण्ड में दलित आदिवासियों की उपेक्षा हो रही है। कहा कि वे भूमि अधिकार के सवालो को आगामी विधानसभा के सत्र में बखूबी से उठायेंगे। खटिमा के पूर्व विधायक गोपाल राणा ने कहा कि दलित आदिवासीयों के जल, जंगल, जमीन के अधिकार सरकार को सुनिशिचत करना चाहिए। अहम सवाल (02) 1964 में जो भूमि बन्दोबस्त किया गया था वह जनआंकाक्षाओ पर खरा नहीं उतर पाया। जबकि उन्ही दिनो मंगलदेव विशारद कमेटी की रिर्पोट भूमि के संबन्ध में लोकहित में थी। दुर्भाग्यवश यह रिर्पोट लागू नहीं हो पार्इ। उŸाराखण्ड में साढे आठ लाख हेक्टेअर कृषि भूमि मात्र 12 प्रतिशत लोगो के कब्जे में है। बाकि 88 प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रो की कृषि भूमि सरकारी ढांचागत विकास एवं राष्ट्रीय पार्को, अभ्यारणो, जैवविविधिता वगैरह के नामो में तब्दील की जा रही है। नदी घाटी क्षेत्रो की कृषि भूमि भी ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर कब्जा की जा रही है। तरार्इ की कृषि भूमि हाथी कारीडोर, आरŒ जोन आदि के नाम से घोषित की जा रही है। और तो और जमीन कब्जाने के लिए पूंजी व धर्म का गठबन्धन अब सामने आ रहा है। नये राज्य में आज भी भूमि को लेकर 236 प्रकार के कानून वजूद में हैं। जबकि उप्र की मायावती सरकार ने भूमि के अलग-अलग 236 कानूनो को एकीकृत किया। हालाकि यह कानून राजनीति की भेंट चढ गया हो लेकिन केन्द्र सरकार ने इस भू-कानून की खूब सराहना की है। (03) तरार्इ के जनजातिय क्षेत्रो में लोगो की आजीविका व आर्थिकी का साधन मात्र मछली पालन था। लेकिन सरकार ने इस कार्य को अब ठेके पर दे दिया। जिससे आम जन की आजीविका काफी प्रभावित हुर्इ है। (04) अनुसूचित जाति व जनजाति संयुक्त संघर्ष मोर्चा के प्रदेश समन्वयक राजू मेहर ने कहा कि वनाधिकार कानून 2006 को क्रियान्वयन में सरकारो की उदासीनता नजर आ रही है। दूसरी ओर जिस समाज कल्याण विभाग को इस कानून के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है वह कभी भी इस कानून से इŸोफाक नहीं रखता है और ना ही लोगो से सरकारें दवा प्रस्ताव भरवा रही है। जो दावे भू-अधिकार को लेकर भरे भी गये हैं वह समाज कल्याण विभाग व तहसिलो में धूल फांक रहे हैं। कहा कि वनाधिकार 2006 में यह प्राविधान है कि जो दलित, अदिवासी व अन्य वनवासी जहां कहीं भी 75 वर्षो से कृषि करते आये हैं वे उस भूमि के लिए दावे प्रस्तुत करके भू-अधिकार पा सकते हैं। लेकिन संबधित विभाग ऐसा नहीं कर रहा है। प्रेम पंचोली, मोŒ-9411734789