Sunday, February 17, 2013

सरकारी किस्सागोर्इ-छŸाीस वर्ष बाद भी नहीं मिला भू-अधिकार प्रेम पंचोली
राज्य को बने हुए अब बारह वर्ष पूरे हो ही गये हैं लेकिन अब तक राज्य के पास कोर्इ लोक विकास की उम्दा नीति नहीं है। यही वजह है कि राज्य में चौतरफा विभिन्न मांगो को लेकर लोग आन्दोलित है और सŸाासीन नुमार्इन्दे अब तक सŸाा की मलार्इ चाटने में मसगूल हैं। यहां हम बात कर रहे हैं कृषि भूमि की। अन्य ढांचागत कार्यो के लिए सरकारें चन्द समय में भूमि उपलब्ध करवा रही है। मगर भूमिहीनो के लिए सरकार के पास कोर्इ भू-नीति नहीं है। आलम यह है कि जो लोगो की बची-खुची कृषि भूमि वह भी भूमाफियाओं के कब्जे में जा रही है। पिछले दिनो अनुसूचित जाति एवं जनजाति संयुक्त संघर्ष मोर्चा के तत्वाधान में उधमसिंहनगर के खटीमा में हुए दलित, आदिवासी एवं बुक्सा, थारू जनजातियों के भूमिअधिकार को लेकर दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में आये ग्रामीण प्रतिभागीयों ने चौंकान वाले आंकड़े प्रस्तुत किये। बताया गया कि गदरपुर ब्लाक के गुलरभोज गांव के निवासीयों की कृषि भूमि सन 1976 में हरीपुरा जलाशय के लिए तत्काल उŒप्रŒसरकार ने अधिग्रहण की थी। सो अब तक लोगो को इस भूमि के बदले दी गयी भूमि का अधिकार नहीं दिया गया है। जो भूमि सरकार द्वारा दी भी गयी थी वह अब भूमाफियाओं की भेंट इस लिए चढार्इ जा रही है कि अमुक व्यकित भूस्वामी नहीं है। विडम्बना यही है कि लोग राज्य बनने के पश्चात भी भूमि के अधिकार के लिए दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हैं। इस दौरान गुलरभोज गांव के प्रेम सिंह ने बताया कि 1976 में हरीपुरा गांव में 500 परिवार बुक्सा जनजाति के निवास करतें थे। हरीपुरा जलाशय बनने के कारण इन परिवारों को गुलरभोज में बसाने का फरमान तत्काल उŒप्रŒ सरकार ने किया। लोगो को 50एकड़ कृषि भूमि के बदले मात्र छ: एकड़ भूमि तो दी गयी परन्तु 36 वर्ष के अन्तराल में लोग भूमिधर नहीं हो पाये। दूसरी ओर जमीन की अवैध खरीद-फरोख्त पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया। यहां सम्मेलन में आये बुक्सा जनजाति के लोगो ने आरोप लगाते हुए कहा कि चन्द धन्ना सेठ स्थानीय लोगो को अपने कर्ज के पैसो के आड़ में जमीन हड़पने का धंधा जोरो पर चला रहे है। क्योंकि बुक्सा जनजाति के लोग अधिकांशत: निरक्षर है, बेरोजगार हैं, आर्थिक तंगहाली की वजह से इस जनजाति की जमीन पर नाजायज हमला लगातार बढता ही जा रहा है। इस बात को सम्मेलन में पंहुचे अनुŒजाŒ एवंजनजाति के अध्यक्ष चनर राम ने भी स्वीकार किया कि उनके पास ऐसे कर्इ मामले आये है जिनमे जामीन का सौदा कर्ज चुकाने में तो हुआ है परन्तु जो दाखीला खारिज की फार्इल बनती है उसमें बड़ा गोलमाल सामने आया है। उन्होने कहा कि जनजातियों की जमीन खरीदने में लोग उनके निरक्षर होने का नाजायज फायदा उठा रहे हैं। कहा कि वे ऐसे मामलो को आयोग के माध्ययम से गम्भीरता से ले रहे है और समय आने पर उचित कार्यवाही करेंगे। वे एक बात से काफी व्यथित थे कि उनके सामने एक ऐसा मामला आया जो शिक्षित समाज को शर्मशार करने वाला था। कहा कि अल्मोडा़ सिथत महाविधालय में एक वर्ष तक सोनू टम्टा इसलिए सहायक प्रोŒ नहीं बन पायी थी कि वह अनुसूचित जाति से थी। हालांकि बाद में आयोग ने इस मामले को सुलझाया। सम्मेलन में उŸाराखण्ड वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के प्रमुख तरूण जोशी, उŸाराखण्ड परिवर्तन पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी, उधमसिंहनगर से महिला समाख्या की जिला समन्वयक चन्द्रा जोशी, भूमिअधिकार मंच की समन्वयक हीराजंगपांगी, उŸाराखण्ड किसान महासभा के पुरषोŸाम शर्मा, क्षेत्रपंचायत सदस्य पूनम राणा, अर्पण संस्था की डाŒ रेनू ठाकुर आदि ने भूमि के सवालो विचार व्यक्त किये हैं। बाक्स में (01) खटिमा के विधायक पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि दलित आदिवासियों को भूमि अधिकार हेतु 2006 में लाया गया वनाधिकार कानून को लागू करवाने के लिए वे उधमसिंहनगर के जिलाधिकारी के साथ शीघ्र बैठक करेंगे कि अब तक वनाधिकार कानून 2006 के क्रियान्वयन को लेकर विलम्ब क्यों हो रहा है। कहा कि वे अपनी विधानसभा में इस कानून को लागू करवाने के लिए भरसक प्रयास करेंगे। नानकमŸाा के विधायक डाŒ प्रेम सिंह राणा ने कहा कि भूमि को लेकर उŸाराखण्ड में दलित आदिवासियों की उपेक्षा हो रही है। कहा कि वे भूमि अधिकार के सवालो को आगामी विधानसभा के सत्र में बखूबी से उठायेंगे। खटिमा के पूर्व विधायक गोपाल राणा ने कहा कि दलित आदिवासीयों के जल, जंगल, जमीन के अधिकार सरकार को सुनिशिचत करना चाहिए। अहम सवाल (02) 1964 में जो भूमि बन्दोबस्त किया गया था वह जनआंकाक्षाओ पर खरा नहीं उतर पाया। जबकि उन्ही दिनो मंगलदेव विशारद कमेटी की रिर्पोट भूमि के संबन्ध में लोकहित में थी। दुर्भाग्यवश यह रिर्पोट लागू नहीं हो पार्इ। उŸाराखण्ड में साढे आठ लाख हेक्टेअर कृषि भूमि मात्र 12 प्रतिशत लोगो के कब्जे में है। बाकि 88 प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रो की कृषि भूमि सरकारी ढांचागत विकास एवं राष्ट्रीय पार्को, अभ्यारणो, जैवविविधिता वगैरह के नामो में तब्दील की जा रही है। नदी घाटी क्षेत्रो की कृषि भूमि भी ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर कब्जा की जा रही है। तरार्इ की कृषि भूमि हाथी कारीडोर, आरŒ जोन आदि के नाम से घोषित की जा रही है। और तो और जमीन कब्जाने के लिए पूंजी व धर्म का गठबन्धन अब सामने आ रहा है। नये राज्य में आज भी भूमि को लेकर 236 प्रकार के कानून वजूद में हैं। जबकि उप्र की मायावती सरकार ने भूमि के अलग-अलग 236 कानूनो को एकीकृत किया। हालाकि यह कानून राजनीति की भेंट चढ गया हो लेकिन केन्द्र सरकार ने इस भू-कानून की खूब सराहना की है। (03) तरार्इ के जनजातिय क्षेत्रो में लोगो की आजीविका व आर्थिकी का साधन मात्र मछली पालन था। लेकिन सरकार ने इस कार्य को अब ठेके पर दे दिया। जिससे आम जन की आजीविका काफी प्रभावित हुर्इ है। (04) अनुसूचित जाति व जनजाति संयुक्त संघर्ष मोर्चा के प्रदेश समन्वयक राजू मेहर ने कहा कि वनाधिकार कानून 2006 को क्रियान्वयन में सरकारो की उदासीनता नजर आ रही है। दूसरी ओर जिस समाज कल्याण विभाग को इस कानून के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है वह कभी भी इस कानून से इŸोफाक नहीं रखता है और ना ही लोगो से सरकारें दवा प्रस्ताव भरवा रही है। जो दावे भू-अधिकार को लेकर भरे भी गये हैं वह समाज कल्याण विभाग व तहसिलो में धूल फांक रहे हैं। कहा कि वनाधिकार 2006 में यह प्राविधान है कि जो दलित, अदिवासी व अन्य वनवासी जहां कहीं भी 75 वर्षो से कृषि करते आये हैं वे उस भूमि के लिए दावे प्रस्तुत करके भू-अधिकार पा सकते हैं। लेकिन संबधित विभाग ऐसा नहीं कर रहा है। प्रेम पंचोली, मोŒ-9411734789

Friday, January 4, 2013

लेखन की नयी परम्परा कायम की है आचार्य डबराल ने



इस देश में राजनेताओं की मृत्यु के पश्चात राजससत्ता में बैठे नुमाईन्दे उनके जन्म दिन आदि पर कई तरह के राग अलापने में चूक नहीं करते है। लेकिन राजनीति से दूर रहकर समाज को आईना दिखाने वाले रचनात्मक लोगो की इस व्यवस्था मे कम ही उपस्थिति सत्ता  के प्रतिष्ठानो में नजर आती है। यहां ऐसे ही शख्स की बात की जा रही है जिन्होने न सिर्फ लेखन का कार्य किया है बल्कि अपनी साहित्य साधना के माध्यम से नये साहित्य का भी सृजन किया है। हालांकि उत्तराखण्ड सरकार के नजर से ऐसी शख्सीयत बेशक ओ-हजयल हो जाये अपितु समाज के चिन्तको ने इस ओर सदैव पैनी नजर रखी है। यही वजह है कि पिछले माह के अन्तिम सप्ताह में ‘‘पहाड’’ द्वारा आचार्य शिव प्रसाद डबराल की सहस्रताब्दी जन्मशती नैनीताल में आयोजित की है। आचार्य डबराल इस राज्य के लिए उदाहरण हैं, दुर्लभ व्यक्तित्व हैं। प्रेरणा स्रोत है। आज तक की सरकारो ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। ऐसी कालजयी रचनाओं के लिए संग्राहलय बनना चाहिए। इस हेतु सरकारी प्रयास होने चाहिए। आचार्य के साहित्य का मुल्यांकन करना आज भी बाकी है। साहित्य राज्य के शैक्षणिक विकास में मददगार साबित होगा। आदि उद्गार हर कोई आचार्य डबराल के साहित्य संसार के सुनने व प

आचार्य डबराल द्वारा बीस हजार पृष्ठो का रचित साहित्य आज प्रसांगिक इसलिए है  की  इस साहित्य संसार में कहीं भी कल्पना की कोई गंुजाईश ही नहीं दिखती। उन्होने लोक से जुड़े हुए संबधो का वैज्ञानिक अध्ययन करके कलम की धार दी है। उनके लेखन में हमेशा समाज ही रहा है। चाहे उन्होने भूगोल पर लिखा हो या इतिहास एवं संस्कृति पर। वे ताउम्र समाज से जुड़ी चीजों को अध्ययनात्मक रूप देते थे। उनकी आंकड़ो की बानगी ही उनके साहित्य का सच है। लेकिन वे हमेशा सम्मान जैसे कार्यक्रमो का विरोध करते थे। कारण इसके वे 1986 में हुई ‘‘इतिहास कांग्रेस’’ में सम्मलित नहीं हुए। सो 1999 में दुगड्डा स्थित में आयोजित ‘‘मिलन समारोह’’ में इसलिए सम्मलित हुए कि यहां कोई सम्मान समारोह जैसा नहीं था। इसे बिडम्बना ही कहिए कि सरकार पृथक राज्य में ऐसे मनीषि के नाम पर विश्वविद्यालयो में पीठ तक स्थापित नहीं कर पायी और तो और उनके साहित्य का पुर्नप्रकाशन, इस महत्वपूर्ण साहित्य को आॅनलाईन जैसी आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने के आसार दूर तक नहीं दिखाई दे रहे हैं।

गौरतलब हो कि आचार्य डबराल द्वारा रचित इतिहास के केन्द्र में हमेशा समाज संस्कृति से जुड़े लोगा ही रहे हैं। जबकि पूर्ववती इतिहास के अधिकांश लेखकों ने  सत्ता व व्यवस्था को ही प्रमुखता दी है। वे भूगोल को लिखने से पहले दुनियां के घूमन्तू पशुचारको को प-सजय चुके थे। अपनी ‘‘पशुचारक ग्रन्थ’’ में उन्होने हिमालय के पशुचारकों को मुख्य पात्र के रूप में लेखन का माध्यम बनाया है। यही वजह है कि आज भी आचार्य द्वारा रचित उत्तराखण्ड के पशुचाराक पुस्तक उत्तराखण्ड के भूगोल को सही रूप में बयां करती है। आज के हिमांचल व उत्तराखण्ड को तत्काल दरप्रदेश कहते थे। उन्होने लिखा कि तब इस प्रदेश में 140 हजार बैल व 40 हजार गायें थी जो बाद में चीन की तरफ चली गयी। इससे मालूम होता है कि यह तत्काल का दरप्रदेश पशुधन से कितना समृद्ध रहा होगा। माल, पहाड़ और गोठ जैसे नाम आज भी यहां के पहाड़ी समाज में विख्यात है। इन्हीं नामो से यहां की भौगोलिक संरचनाओ का पता चलता है। उनका लेखन सदैव नेतृत्व पारखी रहा। पशुचाराको के अध्ययन करने वे जब मलारी गये तो वहां उन्होने पुरातत्व की भी खोज की है। इस कारण आज मलारी पुरातत्विक रूप से विख्यात भी है। उन्होने मुद्राओ व ताम्रपत्रो का जो संग्रहण व अध्ययन किया है उस विलक्षण सृजन का लाभ आज लोगो तक नहीं पंहुच पा रहा है। अर्थात वे एक पुरातत्वविद् भी थे। आचार्य द्वारा लिखित टिहरी के इतिहास से मालूम होता है कि गोरखा साम्राज्य सिक्कीम से लेकर कांगड़ा तक फैला हुआ था। उन्होने 1815 से लेकर 1949 तक के इतिहास में जो प्रस्तुत किया वह आज भी अध्ययन का विषय है। यहां उन्होने सामान्य जन जीवन को साहित्य के रूप में इस्तेमाल किया और सत्यता को बखूबी उजागर किया है। यही नहीं आचार्य की कविताओं में भी समाज ही -हजयलकता है। वे ऐसे जीनीयस थे कि उन्होने साहित्य के लिए अपने अध्यापन का मानदेय भी समर्पित कर दिया था। इस कारण उनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा।

साठ के दशक से पूर्व उनके नौ ऐतिहासिक नाटक ग्रन्थ व दो कविता संग्रह आ चुके थे। इसके बाद तो उनकी साहित्य यात्रा में ‘‘उत्तराखण्ड यात्रा दर्शन से लेकर सत्यनारायण रतूड़ीःउठा ग
प्रेम पंचोली &a 09411734789

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...