Wednesday, August 8, 2018

सिर्फ मुआवजा, हादसो को रोकने का कोई रास्ता नहीं

सिर्फ मुआवजा, हादसो को रोकने का कोई रास्ता नहीं

प्रेम पंचोली

पिछले 17 वर्षो में उत्तराखण्ड में मोटर दुर्घटनाओं ने हजारो की जाने ले ली है। पर इस तरह के हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे है। आंकड़े गवाह है कि साल 2015 व 2016 में 3114 छोटी बड़ी मोटर दुर्घटनाऐं हुई है। जिनमें 1875 लोग मौत के मुह में समा गये हैं। जबकि 3411 लोग बुरी तरह से घायल हुऐ है। इन घायलो में से अधिकांश लोग उस हादसे के कारण उबर नहीं पा रहे हैं। इसी तरह पिछले 17 वर्षो में सिर्फ व सिर्फ 843 बार बसें दुर्घटनाग्रस्त हुई है। आंकड़ो की फेहरिस्त लम्बी है। ये वे आंकड़े है जो पुलिस के पास दर्ज हुए है। पहाड़ो में ऐसी भी मोटर दुर्घटनाऐं हुई है जो दर्ज नही हो पाई है। वैसे भी इन आंकड़ो को पढकर पत्थर दिल भी पसीज जाये। मगर राज्य की व्यवस्था इतनी बिगड़ चुकी है कि वाहन दुर्घटनाओं का कारण तक नही ढूंढ पाई है। सत्ता में चकनाचूर जनता के नुमाईन्दे एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के सिवाय और कुछ करने की जहमत नहीं उठाते।

यहां आलम यह है कि सरकारी एवं गैर सरकारी मोटर वाहनो में कोई अन्तर नहीं है। और ना ही इस प्रदेश की सड़को की दुर्दशा पर कहना होगा। खैर अभी बात करते है मोटर वाहनो की। सार्वजनिक क्षेत्रों के लिए यातायात सुलभ करने वाली बसे अधिकांश डग्गामार स्तर की है। कई बार सड़क एवं परिवहन विभाग ने इन डग्गामार स्तर की बसों को संचालन करने के लिए प्रतिबन्धित भी किया है पर राज्य में इन बसों की यूनियने इतनी मजबूत है कि सत्ता में बैठे लोगो को इनके सामने घुटने टेकने पड़ते हैं। बस और अन्य मोटर वाहनो के यूनियनों की में कोई और मांग नहीं रहती फकत इसके कि उनकी मोटर वाहनो की उम्र बढाई जाये। इस तरह ये डग्गामारी बसे फिर लोगो की जान पर आ जाती है। इसके अलावा राज्य की कुछ सड़के ऐसी है जहां पर यातायात सुलीा करवाने के लिए स्थानीय बसों का एक छोटा सा बाड़ा सुविधा दे रहा है। अधिकंाश जगह ऐसी है जैसे जौनसार क्षेत्र और ऐसे ही अन्य दूरदराज के क्षेत्रो में यूटिलिटी जैसी सूक्ष्म माल वाहन गाड़ियां यातायात में जितनी सुविधा दे रही है उससे अधिक ये गड़ियां दुर्घटनाओं को न्यौता दे देती है। इन यूटिलिटीयों में कमसे कम 50 लोग सवार हो जाते है। इस तरह सरकार की मंशा पर सार्वजनिक यातायात से संबधित सवालिया निशान खड़ा होना लाजमी है। लोगो का गुस्सा इस बात पर रहता है कि अब तक की सरकारों ने प्रदेश में सुलभ यातायात की ओर कोई कदम नहीं उठाये।

ज्ञात हो कि कुछ अर्से पहले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का एक बेटा रोड़वेज की बस से दिल्ली से अल्मोड़ा की तरफ आ रहे थे वह भी अल्मोड़ा पंहुचने से पहले गरमपानी के आसपास हुई बस दुर्घटना में हादसे का शिकार हुआ। जौनसार क्षेत्र के खत बहलाड़ का एक दाम्पत्य अपनी मोटर साईकिल से अपने एक छोटे बच्चे के साथ विकासनगर से नागथात की ओर अपने घर को लौट रहे थे। रास्ते में तेज बारिस होने की वजह से उसने अपनी पत्नी व बच्चे को यूटिलिटी पर बैठा दिया। उसके देखते ही देखते जैसे यूटिलिटी एक किमी नागथात की ओर आगे बढी वैसे उसके ही सामने यूटिलिटी गहरी खाई में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। यह हादसा इतना खतरनाक था कि जब तक वह संभलता तब तक उसकी पत्नी व बच्चे सहित 11 लोगो की मौत हो चुकी थी। ऐसी कई दुर्घटनाऐं हैं जो दिल दहला देने वाली है। जौनसार क्षेत्र के बहुबिख्यात लोक गायक जगतराम वर्मा भी त्यूणी से विकासनगर जा रही डग्गामार बस में हादसे का शिकार हुआ जिसमें 27 लोगो की जाने गई।

इसी तरह उत्तराखंड के टनकपुर के बिचई क्षेत्र में तड़के बेकाबू ट्रक ने पूर्णागिरी दर्शन करने जा रहे श्रद्धालुओं के जत्थे को रौंद डाला। इस दर्दनाक हादसे में यूपी के 11 श्रद्धालुओं की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 20 श्रद्धालु घायल हो गए. इसमें सात लोगों की हालत बहुत ही गंभीर बताई गई। ताज्जुब इस बात का है कि उतरप्रदेश के नवाबगंज इलाके के बुखारपुर गांव के श्रद्धालु देवी मां की डोली को लेकर पैदल जा रहे थे, उसी वक्त प्रातः एक बेकाबम ट्रक ने उनको रौंद डाला। पुलिस के मुताबिक बुखारपुर से लोग मां पूर्णागिरी के दर्शन करने जा रहे थे। इस दौरान बुखारपुर सहित आसपास के अन्य गांवों के करीब ढाई सौ लोगों का जत्था बरेली से पूर्णागिरी के लिए रवाना हुआ। लेकिन रास्ते में इतना बड़ा हादसा हो गया कि बुखारपुर गांव में शायद ही कोई घर बचा हो जहां पर किसी के यहां कोई मौत न हुई हो। एक के बाद एक हादसे हर किसी को सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। पूर्व के हादसो के दुखड़े जैसे के तैसे है कि एक सप्ताह के के भीतर रोडवेज की बस उत्तरकाशी टिहरी के बीच सुल्याधार में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। जो 300 मीटर गहरी खाई में जा गिरी। राज्य सरकार ने हादसे की न्यायिक जांच के आदेश दिए। हादसे में 14 लोगों की मौत हो गई। 16 यात्री गम्भीर रूप से घायल हुए। बताया गया कि हादसा सुबह करीब आठ बजे चंबा-धरासू मोटर मार्ग पर सुल्याधार के पास हुआ। उत्तराखंड परिवहन निगम की बस संख्या यूके 07 पीए 1929 का चालक नियंत्रण खो बैठा और बस करीब 300 मीटर गहरी खाई में जा गिरी। बस में 30 यात्री सवार थे।

ताज्जुब हो कि एक तरफ राज्य की सड़को की हालात बहुत खराब है तो वहीं दूसरी तरफ सार्वजनिक हित में यातायात की सुविधाऐं अधिकांश ‘‘डग्गामार’’ है। ऐसे में यहां सफर करना जान को हथेली पर रखना जैसे है। अब सरकारी रोडवेज के बाड़े की बसों की बात करें तो वे बहुत तेज गति से चलते है। उनसे जानने से पता चला कि ऐसा क्यों? तो कह देते हैं कि उन्हे सही समय पर पंहुचना है। परन्तु लोग बताते हैं कि सर्वाधिक मोटर दुर्घटनाऐं तेज गति से चलने पर ही हुई है। सच यह है कि उत्तराखण्ड रोडवेज की बसे पहाड़ में 60 किमी से भी अधिक प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ती है। जबकि पहाड़ पर वाहनो की रफ्तार 30-35 के मानक पर बताई जाती है। बल्कि कई जगहो पर लिखा भी होता है कि अधिकतम रफ्तार 30-35 की ही होनी चाहिए। पर कोई इसे स्वीकार तो करे। यह भी दुर्घटनाओं का कारण बनता जा रहा है। यही नहीं उत्तराखण्ड रोडवेज की लगभग 500 से अधिक बसें अपनी रिटायरमेंट की समय सीमा पार कर चुकी है।

उल्लेखनीय हो कि उत्तराखंड में आए दिन सड़क हादसे हो रहे हैं। अप्रैल 2016 में भी उत्तराखंड-हिमाचल बार्डर पर एक बस के गहरी खाई में गिरने से 44 लोगों की मौत हो गई थी। फिर ये हादसे क्यों नहीं रुकते? उत्तराखंड सरकार पहाड़ में आए दिन होने वाले सड़क हादसों से सबक क्यों नहीं लेती? सबक लेती है तो फिर जांच आयोग से आगे बढ़कर कार्रवाई क्यों नहीं करती? ये कुछ बड़े सवाल हर किसे के जेहन में कौंध रहे हैं। यहां लोगो की जुबान पर यही सवाल है कि आखिर उत्तराखंड में सडक हादसों पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा सकती है। जिस विभाग के पास सडक हादसों को राकने की जिम्मेदारी है, वह खुद ही चैन की नींद सोया हुआ है। जगजाहीर यह है कि उत्तराखंड में सडक हादसो की प्रमुख वजह ओवर लोडिंग, अनफिट वाहनों पर परिवहन विभाग की कार्रवाई न होने के साथ ही बिना हैवी ड्राविंग लाइसेंस के हजारों चालकों के द्धारा वाहन चलाना बताया जाता है। इधर लोगो का सुझाव है कि अगर परिवहन विभाग अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझे और ओवर लोडिंग, अनफिट वाहनों के चलने पर रोक लगाने के साथ ही बिना हैवी ड्राइविंग लाइसेंस के चालकों को वाहन न चलने दे तो निश्चित तौर से उत्तराखंड में सडक हादसों पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। स्थानीय लोगो की माने तो जिस तरह से प्राइवेट अनफिट वाहन प्रदेश की सडकों पर दौड रहे हैं, उसे प्रदेश में सड़क हादसों में इजाफा देखने को मिल रहा है। यही वजह है कि पिछले 17 वर्षो के सड़क हादसे चैकाने वाले हैं। सड़क हादसों के आंकड़े आपके जेहन को कभी कंपकपा देने वाले हैं। उत्तराखंड में लगातार बढ़ रहे सड़क हादसों के बाद जहां परिवहन विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ हैं, वहीं रोडवेज कर्मचारी परिवह निगम के इस लापरवाही के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी कर रही हैं।

आंकड़ो की बनगी देखेंगे तो उत्तराखंड में हर महीने में चार बस सड़क हादसे हो रहे है। यानी कि बीते 17 साल में 843 बस हादसे हो चुके हैं। वहीं, अन्य वाहनों से हुए हादसों को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो इनमें लगभग तीन हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और पांच हजार से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। पुलिस की मानें तो अधिकांश बसें ओवरलोडिंग या फिटनेस न होने की वजह से दुर्घटना का शिकार हुई हैं। पौड़ी के धूमाकोट में हुए बस हादसे में 48 लोगों की मौत से राज्य की सरकारी मशीनरी और परिवहन सुविधाओं पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। अप्रैल 2016 में देहरादून के त्यूणी में हुए बस हादसे में 44 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। मगर न तो सरकार ने इससे सबक लिया और न ही हादसों के मूल कारणों की पड़ताल कर इसे रोकने के लिए कोई ठोस पहल की गई। नतीजा धूमाकोट हादसे के रूप में सामने हैं। यह स्थिति तब है जब राज्य में एक माह में औसतन चार बस किसी न किसी रूप में हादसे का शिकार होती हैं और लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं। हादसों के आंकड़े भी चैंकाने वाले हैं। त्यूणी बस हादसे के बाद उत्तराखंड पुलिस ने विगत 17 वर्षो में अलग-अलग वाहनों से हुए हादसों की फाइलें पलटीं तो सामने आया कि इस दौरान बसों से 843, ट्रकों से 1139, जीप से 849, मोटरसाइकिलों से 1548, टैक्सी से 969 और कार से 2129 सड़क हादसे हो चुके हैं। इनमें 2497 की मौत हो चुकी है और 4978 लोग घायल हुए।

40 फीसद बाहरी राज्यों के वाहन हुए दुर्घटनाग्रस्त 

पर्यटन और चारधाम यात्रा को लेकर उत्तराखंड में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में अन्य राज्यों से लोग यहां आते हैं। इनमें से अधिकांश को न तो पर्वतीय मार्गो के तीव्र मोड़ की जानकारी होती है और न ही दुर्घटना बाहुल्य क्षेत्रों के बारे में अंदाजा होता है। पुलिस सूत्रों की मानें तो हादसे का शिकार होने वालों में चालीस फीसद वाहन बाहरी राज्यों के होते हैं।

ओ॰ ओ॰ ओ॰ जानिए क्या है ये

सड़क हादसों का मुख्य कारण ओ यानि ओवरस्पीड, ओवरटेक और ओवरलोडिंग को ध्यान में रखा जाए तो सड़क हादसों में कमी आ सकती है। ओ यानी ओवरस्पीड, ओवरलोडिंग और ओवरटेक के दौरान नियमों की अनदेखी 60 फीसद सड़क हादसों का मूल कारण होती है। इसे लेकर पुलिस कार्रवाई भी करती है, फिर भी हालात जस के तस हैं। पौड़ी के धुमाकोट में हुए बस हादसे में 48 लोगों की जान चली गई। हादसे की असल वजह क्या रही, तंत्र इसकी पड़ताल में जुट तो गया, लेकिन, एक बात तो साफ हो चुकी है कि 28 सीटर बस में क्षमता से दोगुने यानी 61 यात्री सवार थे। ऐसे में स्पष्ट है कि सरकार की सार्वजनिक यातायात सुविधा लोगो की जानलेवा बन रही है।

अस्थाई राजधानी भी अछूती नहीं

देहरादून की बात करें तो यहां सड़क हादसों में प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ सौ से अधिक लोग जान गवा देते है, वहीं इससे दो गुना घायल होकर जिंदगीभर दुर्घटना का दंश झेलते हैं। पुलिस विभाग के अनुसार सड़क हादसों का सबसे अहम कारण अप्रशिक्षित चालक, लापरवाही, ओवरलो¨डग और यातायात नियमों का पालन नहीं होना है। यही नहीं सड़कों पर पार्किंग, अधूरे सड़क निर्माण, यातायात संकेतकों की कमी, ओवरलोड वाहन व तेज रफ्तार सहित ऐसे बहुत से कारण हैं, जिन पर कार्रवाई न होने के कारण स्थिति चिंताजनक होती जा रही है।

आरोप प्रत्यारोप


सुल्याधार में हुई बस दुर्घटना की वजह को बीआरओ की लापरवाही बताई जा रही है। जहां दुर्घटना हुई वहां काजवे बन रहा है। बीआरओ डेढ़ वर्ष में इसे नहीं बना पाया है। आपको बता दें कि पिछले दिनों उत्तराखंड के ही पौड़ी गढ़वाल जिले में भी एक भीषण बस हादसा हुआ था, जिसमें 48 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। इस हादसे को भी सड़क पर बने एक बड़े गड्ढे को बताया जा रहा है। यह आरोप-प्रत्यारोप संबधित विभाग के मंत्री और उच्चस्तरीय कर्मचारी लगा रहे है। कुलमिलाकर सड़क हादसों की वजह दोनो हो सकती है जैसे लोग बताते है। लोगो का कहना है कि सड़के भी खराब है, ओवरलोडिंग, ओवर स्पीड और डगगामारी बसे तथा यातायात की व्यवस्थित सुविधा ना होना ही सड़क हादसे लोगो की जाने लील रहा है।

सिर्फ मुआवजा

पिछले 17 वर्षो में जितने भी संड़क हादसे हुए हैं और इन हादसो में जिन लोगो ने जाने गंवांई है उनके परिजनों को सभी मुख्यमंत्रियों ने एक लाख से दो लाख रूपय तक का मुआवजा दिया है। मगर हादसों को राकने के कोई कदम नहीं उठाये हैं। सिर्फ हरिश रावत ने अपने मुख्यमंत्रीत्वकाल में रात्री में चलने वाली रोड़वेज की बसों में अतिरिक्त चालक की व्यवस्था की है।

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