Tuesday, May 30, 2023

30 मई 1930 तिलाड़ी नरसंहार की 93वीं वर्षगांठ : जब राजा के दिवान ने निहत्थे लोगो पर बरसाई गोलियां

 30 मई 1930 तिलाड़ी नरसंहार की 93वीं वर्षगांठ : जब राजा के दिवान ने निहत्थे लोगो पर बरसाई गोलियां

PREM PANCHOLI || Dehradun


उत्तराखण्ड राज्य के इतिहास में तिलाड़ी का गोली काण्ड आज भी यमुना घाटी के लोगो के जेहन में आग उगल देता है। यही वह जगह है जहां तत्काल टिहरी नरेश के राज्यकाल में उनके प्रशासको ने लोगो को इसलिए गोली से भून डाला था कि रंवाई क्षेत्र यानि की यमुनाघाटी के लोग अपने हक-हकूको की बहाली के लिए लामबंद थे। कसूर सिर्फ इतनाभर था कि लोग बिना राज्याज्ञा के महापंचायते आयोजित कर रहे थे।

ज्ञात हो कि आजादी के आन्दोलन में भी 30 मई 1930 के बाद ही पहाड़ के लोगो ने शिरकत की है। वनाधिकारो की बहाली के लिए आन्दोलित यमुनाघाटी के लोगो को राजशाही के प्रसाशको ने तिलाड़ी स्थित में गोलियों से भून डाला था। तिलाड़ी का यह गोली काण्ड पंजाब के जलियावाला बाग हत्या काण्ड के जैसा था। तत्काल तिलाड़ी गोली काण्ड राजशाही के खिलाप एक सबसे बड़ी जंग बनकर सामने आयी, जिसका सबसे बड़ा प्रतिविम्ब श्रीदेव सुमन भी रहे है।

गौरतलब हो कि तत्कालीन टिहरी रियासत के महाराजा नरेन्द्र शाह ने अपनी रियासत की आय बढाने बावत आम लोगो पर घराट, चरान-चुंगान तथा भूमि व कृषि ऊपज आदि पर नये कर व करो पर वृद्धि हेतु नया भूमि बन्दोबस्त को करवाया। किन्तु इन करो पर आशानुकूल वृद्धि नहीं हुई तो राज शासन ने वनो का पुर्नप्रबन्धन और बन्दोबस्त करवाया। इसके निमीत टिहरी रियासत की राज व्यवस्था ने वन उपज को बेचकर अपनी आय में वृद्धि के द्वार खोले और रियासत के वनाधिकारी पदम दत्त रतूड़ी ने नये वन बन्दोबस्त की कमान सम्भाली। जिसका कार्य उन्होंने रंवाई-जौनपुर यानिकी यमुनाघाटी से आरम्भ किया था। इस नये वन प्रबन्धन में संरक्षित वनो की सीमा बढाई गयी और सामान्य ग्रामीणों के हक-हकूको जैसे चरान-चुंगान, घास, लकड़ी, कृर्षि औजारो में काम आने वाली लकड़ी पर प्रतिबन्ध लगवा दिया गया था। इसके अलावा चरागाहो पर भी ग्रामीणो के अधिकार समाप्त किये गये। यदि ग्रामीणजन वन ऊपज को उपयोग में लाते भी थे तो उन्हें इसके एवज में मोटी रकम चुकानी पड़ती थी जो एक आम नागरिक के बस से बाहर थी।

जनता की दिक्कते दिनों-दिन बढती गयी। लोगो ने अपने हक-हकूकों की बहाली के लिए राजा को कई दौर में ज्ञापन दिये परन्तु राजा ने कभी भी यमुनाघाटी की इन समस्याओं पर गौर नहीं किया। अन्ततः सम्पूर्ण यमुनाघाटी के लोगो में राजा के इस नयें वन बन्दोबस्त पर आक्रोश बढता ही गया। अतः सन् 1928 तक गांव-गांव में संघर्ष समितियों और आजाद पंचायतों का गठन हो गया। इनके मार्फत भी राजा को ज्ञापनो के माध्यम से अवगत कराया गया कि लोगो के हक-हकूको की बहाली की जाये। इस तरह की अहवेलना पर लोग आन्दोलित हो गये। आजाद पंचायत की बैठको का सिलसिला राजगढी, राजतर, तिलाड़ी व चकराता क्षेत्र की चांदा डोखरी में जारी रहा। सामन्तशाही को झकझोरने के लिए घेरा सिंह, दयाराम, बैजराम, रामप्रसाद आदि लोगो के पदाधिकारी रहने पर एक समानान्तर सरकार का गठन किया गया। इस समानान्तर सरकार ने तत्कालीन टिहरी रियासत के उच्च पदाधिकारी डिप्टी कलेक्टर सुरेन्द्रद दत्त नौटियाल, डीएफओ पदतद दत्त रतूड़ी को हिरासत में लेने का फैसला किया।

19-20 मई को एक तरफ समानान्तर सरकार की बैठक राजतर में हो रही थी तो दूसरी तरफ डीएफओ रतूड़ी ने ग्रामीणों को एक षडयन्त्र के तहत बड़कोट में बुलवा लिया और उन्हे गिरफ्तार करके टिहरी जेल ले जाने लगे। रास्ते में डिप्टी कलेक्ठर नौटियाल, डीएफओ रतूड़ी को गिरफ्तार हुए लोगो ने पकड़ लिया। इस छिना-झपटी में गोली चलने से ग्रामीण अजीत सिंह, झुण्या सिंह की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गयी। डिप्टी कलेक्टर के पैर में भी गोली लगी। घायल अवस्था में दोनो अधिकारी नरेन्द्र नगर पंहुचे। जब रियासत के दिवान चक्रधर जुयाल को पदमदŸा रतूड़ी ने बताया कि रवांई क्षेत्र अर्थात यमुनाघाटी में बगावत हो गयी है। इस पर तुरन्त ही चक्रधर जुयाल रंवाई की तरफ कूच कर गये।


अपनी कूटनीतिक चालो से राजा के दिवान चक्रधर जुयाल ने आन्दोलनकारियो को राजगढी में वार्ता के लिए बुलाया और कहा कि 30 मई 1930 को समस्त ग्रामीण तिलाड़ी में एकत्रित हो जाये क्योंकि समाधान के लिए कोई कदम उठाये जायेंगे। चक्रधर जुयाल ने एक तरफ लोगो को तिलाड़ी में एकत्रित किया और दूसरी तरफ शाही सेना को तिलाड़ी के आस-पास के जंगलो में छुपा दिया। जैसे ही पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार लोग तिलाड़ी में एकत्रित हुए वैसे ही शाही सैनिको ने चारो तरफ से गोलियां बरसानी आरम्भ कर दी। निहत्थे लोगो को अपनी जान बचाने की कोई सुध-बुध नहीं रही। शाही सैनिको के इन ताबड़तोड़ गालियों से 17 लोग सभा स्थल पर ही शहीद हो गये। जबकि कइयो ने अपनी सुरक्षा बावत यमुना नदी में छलांग लगायी जो नदी के बहाव में बह गये। घायलो को टिहरी जेल ले जाया गया। लगभग 15 लोग टिहरी जेल में शहीद हो गये। कुछ लोग यमुना नदी में समायें। इस तरह सैकड़ो लोग सामन्तशाही के इस घृणित गोली काण्ड में शहीद हुए है। तिलाड़ी स्थल पर ही नहीं बल्कि यमुना नदी के उस पार सुनाल्डी गांव के पुराने मकानो पर आज भी गोलियो के निशान मौजूद हैं जो उस घृणित गोली काण्ड के मूकसाक्षी हैं। 

तत्कालीन टिहरी रियरसत ने 30 मई 1930 को रंवाई अर्थात यमुनाघाटी की निहत्थी जनता पर बिना पूर्व चेतावनी के गोली चलाकर एक घृणित गोली काण्ड के इतिहास की रचना की है। आज भी इस घृणित गोली काण्ड में शहीद हुए लोगो के नाम तिलाड़ी स्थल पर स्थापित ‘‘लाट’’ पर अंकित है।

तिलाड़ी काण्ड के बाद लोगो की शहदात रंग लाई और जनता सामन्तशाही के खिलाफ सड़को पर आ गयी। अन्ततः 1949 में सामन्तशाही शासन को उखाड़ने में जनता को कामयाबी हासिल हुई। यह जनाआन्दोलन पर्वतीय क्षेत्र का युगान्तकारी आन्दोलन था। स्वतन्त्रता प्राप्ती के पश्चात सन् 1952 से प्रतिवर्ष तिलाड़ी में शहीदो के नाम पर जनता तथा स्थानीय प्रशासन ‘‘शहीद मेंले’’ का आयोजन करती है। प्रो॰ आर.एस. असवाल और पत्रकार सुनिल थपलियाल के नेतृत्व में सन् 2006 से तिलाड़ी के नाम पर ‘‘तिलाड़ी स्मारक सम्मान समिति’’ का गठन किया गया है। जो प्रतिवर्ष क्षेत्र के उत्कृष्ठ, संघर्षशील, व्यक्तित्वों को ‘‘तिलाड़ी सम्मान’’ से सम्मानीत करती है। इस दौरान यमुनाघाटी के लोग यहां पर किसी जैनून मुद्दे पर एक प्रस्ताव भी पारित करतें हैं। पिछले वर्ष पृथक जनपद के लिए लोगो ने प्रस्ताव पारित किया था।


Sunday, May 28, 2023

जी-20 वालों का मुर्दा मरा माचो

 जी-20 के कारण क्यों बन्द करवाये स्थानीय ढाबे।

Prem Pancholi

देहरादून से टिहरी के चंबा और चंबा से वापस देहरादून का यह सफर अन्य दिनों से अलग था। इसलिए भी कि नरेंद्रनगर के ओणी गांव में जी-20 की बैठक होने रही थी। 24 मई को हम लोग देहरादून से चले और हमे उसी दिन चंबा ब्लॉक के चूरेड़धार गांव पहुंचना था। वहां दूरदर्शन उत्तराखंड के लिए ‘गांव दर्शन’ कार्यक्रम के तहत शूटिंग करनी थी।




मेरे साथी घर से नाश्ता करके आए हुए थे। मैं उनके साथ रिस्पना पुल से हो लिया। मैने कहा कि मुझे रास्ते में कहीं चाय पीनी है। साथियों ने मुझसे चुटकियां लेते हुए यह तय किया कि जौलीग्रांट के बाद एक रास्ता सीधा नरेंद्रनगर बायपास में मिलता है। हम वहीं से निकलते है, क्योंकि यह रास्ता चंबा, टिहरी आदि स्थानों के लिए नजदीक पड़ता है। सो गुजराड़ा या अन्य कहीं पर भी किसी ढाबे में चाय पी लेंगे। यही सोचकर सभी अपने अपने दिल में चाय की तड़फन भरते हुए आगे बढ़े। देहरादून के रिस्पना पुल के बाद सड़क के किनारे-किनारे आदि अन्य स्थानों पर होर्डिंग की भारी भरमार दिखाई दी है। साथी लोग सरकारी कर्मचारी थे, तो वे मेरी बातो को नजरंदाज कर रहे थे। मैं कह रहा था की देखो मोदी जी की सोच के अनुसार जी-20 की होर्डिंग सरेराह बिछ चुकी है। गजब की तैयारी है बगैरह बगैरह। देहरादून से जौलीग्रांट के बड़कोट तक स्थानीय लोगो की लंबी लंबी कतार लगी हुई थी। सभी के हाथो में फूल से सजी थाली थी। इनमे अधिकांश महिलाएं थी। सभी ने पीला और नारंगी कपड़ा पहना हुआ था। जौलीग्रांट हवाई अड्डे के बाहरी द्वार पर सांस्कृतिक विभाग की टोलियां अपने अपने पारंपरिक परिधान में खड़ी थी। इन संस्कृति कर्मियों के हाथो में भी तिलक चंदन से सजी थाली, किसी के हाथ में फूलमाला, किसी के हाथ में पहाड़ी टोपी आदि थी। यह सभी जी-20 की बैठक में पहुंचने वाले मेहमानो के स्वागत के लिए मुस्तैद थे।


हम लोग यही चर्चा कर रहे थे कि यह बहुत ही अच्छा रास्ता है। अब ऋषिकेश जाने का ही झंझट खत्म, 10 से 12 किमी कम भी है। हंसी मजाक करते हुए जौलीग्रांट से थोड़ा आगे पंहुचकर हमने उस सॉर्टकट रास्ते पर अपनी गाड़ी घुमा दी। यहां पर इतनी पुलिस लगी हुई थी कि वे इस रास्ते से किसी को भी आगे नहीं जाने दे रहे थे। सभी टिहरी, उत्तरकाशी, घनसाली आदि स्थानों को जाने वाले लोग उसी पुराने रास्ते ऋषिकेश होते हुए जा रहे थे। हमारी गाड़ी को इसलिए जाने दिया कि उस पर दूरदर्शन उत्तराखंड लिखा हुआ था। खैर हमारी एंबेसडर इस तरह से आगे बढ़ी। साथियों की चाय पीने की धड़कने तेज होने लगी। यहां से नरेंद्रनगर मात्र 15 किमी है। हर दो किमी पर पुलिस पहरा मौजूद दिखाई दिया। यह रास्ता थोड़ा जंगल, थोड़ा ग्रामीण क्षेत्र का है। हर दो किमी के फासले पर मोदी जी और धामी जी के चित्रों सहित बड़ी बड़ी होर्डिंग अंग्रेजी व हिंदी में चस्पा की हुई थी। 15 किमी के दायरे में लगभग एक दर्जन ढाबे थे। वे सभी बंद थे और उन्हें होर्डिंग से कबर कर दिया गया था। इस तरह हम सभी अपनी चाय पीने की धड़कने थाम कर आगे बढ़ते गये।

नरेंद्रनगर क्रॉस करने के बाद लगभग एक या डेढ़ किमी के फासले पर खाड़बगड़ स्थान पर यानी नरेंद्रनगर से टिहरी की तरफ जाने वाले रास्ते में एक ढाबा था, जिसका उस दिन कहीं नामोनिशान ही नही था। वहां पर एक प्राकृतिक जल स्रोत भी है, जिसे बहुत ही खूबसूरत चित्रकारी से सजाया हुआ था। सूर्य नमस्कार, डिटॉक्स उत्तराखंड, सुंदर उत्तराखंड आदि स्लोगन यहां पढ़ने को जरूर मिले। पर यहां जो वर्षाे से चाय, खाना का ढाबा था वह कहीं दिखाई नहीं दिय। मैने सोचा कि ऑलवेदर रोड़ के कारण उक्त ढाबे के साथ कुछ हुआ होगा। बशर्ते हम लोग चाय पीने की तड़फने संभालते हुए आगे बढ़ते चले। लगभग दो किमी चलने पर धारबगड़ में एक ढाबा दिखाई दिया। वहां पर क्रिश्चन मिश्नरी की एक डे बोल्डिंग स्कूल भी है। हमने अपनी गाड़ी किनारे पर रोकी और ढाबे में घुसते ही चाय का ऑर्डर दे दिया।

अब चाय मिल गई तो चाय पीते पीते मैं उस ढाबे वाले भाई को पहचान गया। मैने कहा वहां नीचे यानी खाड़बगड़ में आपने अपना ढाबा क्यों बंद किया? हम तो वहीं रुके थे। ढाबे वाले भाई ने गढ़वाली में मजाकिया गाली देते हुए कहा कि जी-20 वालो का मुर्दा मरा। उन्होंने मेरे ढाबे को बंद करवा दिया। यूं कहकर कि नरेंद्रनगर में जी-20 की बैठक हेतु जहां 20 देशों के डेलीगेट्स आने वाले है। दूसरे देशों के मेहमानो के सामने ऐसा गरीबी वाला ढाबा हम नही दिखा सकते है। मेरे सवाल पर ढाबे वाले भाई का यह भी जबाव आया कि ढाबे हटाने वाले कुछ पीडब्ल्यूडी और कुछ अन्य सरकारी कर्मचारी थे। हमने चाय पी और चंबा ब्लॉक के चूरेड़धार गांव पहुंचना था इसीलिए आगे बढ़ते चले गये। 

आगराखाल के बाद जी-20 के बैनर पोस्टर थोड़ा थोड़ा कम होते दिखाई दिये। थोड़ी देर के लिए खाड़ी बाजार में स्थित समौण फूड कनेक्ट में रूकना हुआ। यहां मेरे मित्र भाई अरण्य रंजन ने हम सभी को चाय पिलाई। हमारे युवा साथी श्री जोशी ने यहां समौण फूड कनेक्ट में मंडुवे के मोमो खाए। उन्हे मंडुवे के मोमो बहुत ही स्वादिष्ट लगे। रस्तेभर यही कहते गये कि मोमो खाने में बहुत मजा आया है। इस तरह हम आगे बढ़ते हुए चम्बा पंहुच गये। 

चंबा बाजार पूर्व से कई गुना अच्छा, साफ सुथरा दिखाई दिया और सड़क के किनारे-किनारे में चूना जरूर पड़ा हुआ था। चंबा से चूरेड़धार गांव लगभग 7 किमी के फासले पर था। दिन के 2 बजे तक हम चूरेड़धार गांव पहुंच गए। जहां हमारी इंतजारी रामलाल डबराल कर रहे थे। इस गांव के लोगो ने पानी, जंगल बचाने का वैज्ञानिक तरीका ढूंढ निकाला है। इसीलिए यह गांव आज आदर्श है। गांव की सफलता की कहानी को आप दूरदर्शन उत्तराखंड के ‘गांव दर्शन’ कार्यक्रम के तहत देख सकते है। यहां मेरा इस दौरान का सफरनामा आप पढ़ सकते है।


हमने गांव पंहुचते ही कुछ कुछ स्थानो पर शूट किया। अगले दिन भी यहीं आना था। आज रात्रि विश्राम के लिए हमने चंबा में स्थित वन विभाग के गेस्ट हाउस जाना था। यह व्यवस्था मेरे बहुत ही करीबी मित्र और उप प्रभागीय वनाधिकारी डा० उदय गौड़ ने की हुए थी। पर उस दिन यानी 24 मई को यहां एक ही कमरा खाली था। हम पांच लोग थे, इसलिए हमने नई टिहरी के पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस के लिए संपर्क किया। जिलाधिकारी नई टिहरी के नाजर श्री डंगवाल ने हमारे लिए यह गेस्ट हाउस आरक्षित कर दिया। हम रात्रि विश्राम के लिए अब नई टिहरी पंहुच गए। इस गेस्ट हाउस में एक कमरे का एक रात्रि का किराया 150 रुपए है। देर रात्रि नई टिहरी पहुंचे। बहुत ज्यादा बारिश हो रही थी। मुझे अपनी बहन के घर नई टिहरी जाना था, तेज बारिश के कारण नहीं जा पाया। नई टिहरी में ठंडक ने फिर से दस्तक दे दी। हम लोग अपने अपने कमरे में दुबक गए। अब कमरे में बिस्तर तो पकड़ लिए मगर ठंड ज्यादा थी तो बिस्तरों पर ध्यान नहीं गया। थोड़ा सुस्ताने के बाद जब हमारी नजरें बिस्तरों और कमरे की चार दिवारी पर गई तो हमे पीडब्ल्यूडी पर दया आ गई। इतना बड़ा लाव-लस्कर वाला विभाग के गेस्ट हाउस की इतनी बड़ी दुर्गति कैसे हो गई। बहुत ही गंदे बिस्तर, कमरे की चार दिवारी भी गंदी गंदी। शौचालय की साफ सफाई इतनी थी की दरवाजा खोलते ही दुर्गन्ध आने लगी। इस गेस्ट हाउस को देखकर दुख तब हुआ कि जब यह गेस्ट हाउस जिलाधिकारी के नाक के नीचे है। पर इसकी किसी को कोई खैर खबर नही है। सिर्फ व सिर्फ गीजर ठीक था। जैसे तैसे रात कटी। अब रात्रि का भोजन कहां मिलेगा। क्योंकि बारिश की धार टूट नही रही थी। गेस्ट हाउस के खलासी ने कहा कि यहीं कमरे पर भोजन मंगवा देता हूं। मैने कहा यदि नजदीक है तो हम वहीं चले जायेंगे। खलासी ने बताया कि सीढ़ी उतरकर दाईं तरफ एक छोटा सा होटल है। हमने अपने एक नौजवान साथी और गाड़ी चालक को वहां भोजन की डिमांड के लिए भेज दिया। क्योंकर कि पहाड़ में होटल जल्दी बंद हो जाते है। हम साढ़े नौ बजे रात्रि को उक्त होटल में भोजन करने गए। इस भोजनालय की हालात भी बहुत बुरी थी। भोजनालय के मालिक ने सभी को धमकाना आरंभ कर दिया। जो हम मांग रहे थे, उस पर भोजनालय मालिक का एक ही जबाव था कि जो मिल रहा है उसे खाओ, वरना यहां से जाओ। मुझे फिर कहना पड़ा कि मान्यवर इस तरह की भाषा का प्रयोग मत करो, हम कोई शराबी-कबाबी नही है। मीडिया प्रसन्न है। वैसे भी हम यहां पहले ही समय से डिमांड दे चुके है। उसके बाद मालूम हुआ कि इस भोजनालय में सांयकाल को सर्वाधिक शराबी भोजन करने आ जाते है। इसीलिए मालिक का यह कठोर व्यवहार हर ग्राहक के साथ रहता है। दूसरा यह कि जिसने यहां हमसे भोजन की डिमांड प्राप्त की थी वह व्यक्ति वहां मौजूद ही नहीं था और न मालिक को ऐसा बताया गया था। मेरी बातो से मालिक सामान्य तो हो गया, मगर भोजन बहुत बासी खलाया है। इस भोजन के कारण मेरी तबियत रातभर खराब रही। प्रातः 3 बजे जब मैंने उल्टी कर दी तब जाकर थोड़ा सा आराम हुआ। अल सुबह यानी 25 मई को हम तैयार होकर 9 बजे तक पुनः चूरेड़धार गांव पहुंच गए।

चूरेड़धार गांव के 38 परिवार सदियों से पेयजल की किल्लत से त्रस्त थे। साल 2013 में ग्रामीणों ने खुद और टाटा ट्रस्ट के हिमोत्थान सोसायटी के सहयोग से पेयजल के लिए कार्य आरंभ किया। अब यहां पेयजल और सिंचाई की कोई असुविधा नहीं है। संपूर्ण पानी की आवश्यकता बरसती पानी से पूरी होती है। यह कार्य कैसे सफल हुआ, इसी के वास्ते दूरदर्शन उत्तराखंड की टीम गांव पहुंची थी। 25 मई को दिनभर हम शूटिंग में व्यस्त रहे। रात्रि विश्राम हेतु हमे चंबा स्थित वन विभाग के गेस्ट हाउस आना था। क्योंकि यहां पर रात्रि की व्यवस्था मेरे बहुत ही प्रिय मित्र व उप प्रभागीय वन अधिकारी डा० उदय गौड़ ने कर ही रखी थी। इस तरह हम सांय के 6 बजे तक वन विभाग के गेस्ट हाउस पहुंच गए। पहुंचते ही बहुत ही तीव्र बारिश हो गई। गेस्ट हाउस के परिचायक ने कमरे खोल दिए और हमारे लिए रात्रि भोजन की व्यवस्था में जुट गए। परिचायक राकेश बिजल्वान बहुत ही मिलनसार, संस्कारी युवा है। हर अतिथि का वह ऐसा स्वागत करते है कि अमुक अतिथि श्री बिजल्वाण को कैसे भूल सकते है। स्वादिष्ट भोजन बनाना, भोजन परोसना कोई श्री बिजल्वाण से सीखे। गेस्ट हाउस की साफ सफाई और चाक-चौबंद व्यवस्था का श्रेय भी श्री बिजल्वाण सहित विभागीय कर्मचारियों, अधिकारियों को जाता है। यह गेस्ट हाउस बहुत ही सुंदर और साफ सुथरा है। चारो तरफ से घनघोर बांझ के जंगल से घिरा हुआ है। कह सकते हैं कि 24 मई की अव्यवस्था और थकान यहीं पर आकर उतर गई।

26 मई को हम प्रातः 7 से 8 बजे तक तैयार हो गए। सात बजे श्री बिजल्वाण ने चाय भी पीला दी थी। साढ़े नौ बजे तक श्री बिजल्वाण ने हमसे नाश्ता करवा दिया। हम प्रातः के ठीक 10 बजे वन विभाग के गेस्ट हाउस चंबा से देहरादून के लिए रवाना हो गए। गाड़ी में बैठते ही चर्चा हो गई कि देहरादून जाने के लिए वही रास्ता नजदीक है जो नरेंद्रनगर से सीधा जौलीग्रांट पंहुचता है। मेरे एक साथी ने कहा कि वह रास्ता तो बंद होगा। क्योंकि नरेंद्रनगर में जी-20 की बैठक हो रही है। मैने कहा कि इतना तो आयोजको को ख्याल रखना ही चाहिए, हम मीडिया के लोग है शायद जाने देंगे। वहां पहुंचते ही देखा तो रास्ता एकदम क्लियर था। पुलिस तो लगी थी, पर लोगो को आने जाने दे रहे थे।

चंबा से चलने के बाद हम पांच मिनट के लिए साबली गांव रुके। हेंवल नदी के किनारे किनारे खाड़ी, जाजल, फकोट होते हुए आगराखाल पहुंचे। यहां मेरे साथियों ने पहाड़ी उत्पाद बुरांश का जूस आदि आदि झंगोरा, मंडुवा, राजमा आदि दालें खरीदी। आगे चलकर एक साथी ने कहा कि ये ऊंची चोटी पर क्या दिख रहा है। मैने जबाव दिया सिद्धपीठ मां कुंजापुरी का मंदिर है, यदि दर्शन करने चलना है तो चलिए। सभी ने हामी भरी और हम मां कुंजापुरी मंदिर दर्शन



करने पहुंच गए। कुंजापुरी मंदिर के बेस कैंप में कुछ चाय-पानी के ढाबे भी है। ये ढाबे वाले गाड़ी पार्क करवाने का जतन करते है। ताकि उनकी दुकान से मंदिर में चढने वाले प्रसाद को लोग खरीदें। मेरे पास पैसे खत्म हो गए थे, मात्र एक रुपया बचा था। मैने अपने वरिष्ठ साथी श्री रावत, श्री चौहान जी को कहा कि प्रसाद ले लो। श्री रावत ने प्रसाद खरीदा। जिसमे एक चुनरी, एक धूप बत्ती, एक नारियल और एक छोटा पैकेट पंचमेवा सहित लाइचीदाना था। यहीं से मंदिर जाने के लिए खड़ी सीढ़ियां चढ़नी है। मैने अपने एक जूनियर युवा साथी श्री जोशी को कहा कि वे इन सीढ़ियों को गिने कि मंदिर तक कितनी सीढ़ियां चढ़नी है। श्री चौहान भी सीढ़ियां गिनने साथ हो गए। श्री जोशी ने 310 सीढ़ियां और श्री चौहान ने लगभग 300 सीढ़ियां गिनी। खैर! मंदिर प्रांगण में प्रसाद बेचने वाले साथी को कुल सीढ़ियों के स्पष्टीकरण के लिए मैने पूछा, तो बताया गया कि कुल 312 सीढ़ियां है। इस तरह मंदिर में पूजा अर्चना करने के पश्चात हम बाहर मंदिर प्रांगण में टहलने लगे। एक दूसरे की फोटो खिंचने लगे।


मंदिर के चौबारा में एक व्यक्ति ढोल बजा रहा था। उनसे नाम जानने की कोशिश की तो उन्होंने अपना नाम देवेंद्र बताया। एक सवाल के जबाव में ढोल बजाने वाले देवेंद्र भाई ने कहा कि यहां पर मंदिर समिति है जो भंडारियो व कंडारियो की है। उनको वही पैसा मिलता है जो किसी श्रद्धालु ने उनके ढोल के ऊपर 5 से 10 रुपए रख दिया हो। कहा कि वैसे तो जो भी चढ़ावा जाता है वह मंदिर में ही जाता है। उस चढ़ावे से उनका कोई हिस्सा नहीं मिलता है। बस वह तो मां कुंजापुरी की सेवा बावत परंपरागत व सदियों से यहां ढोल बजाते आये है। देवेन्द्र मंदिर के प्रांगण में लोगो की सहायता बावत नारियल तोड़ने में मदद भी करते है। इसके एवज में लोग उन्हें कुछ मामूली दक्षिणा दे ही देते है। ढोल वादक देवेंद्र ने बताया कि वह पास के चमोल गांव निवासी है। यहां ढोल वादकों के 10 परिवार निवास करते है। उन्हीं में से यहां मंदिर में ढोल बजाने की बारी प्रत्येक परिवार की लगती है। वैसे समिति उनके भाई को मासिक मानदेय भी देती है। उनका भाई यहां मंदिर परिसर में साफ सफाई का कार्य देखते है। अर्थात उनके भाई की यहां मौजूदगी रहती ही है। मंदिर प्रांगण से ऊपर टिहरी, चंद्रबदनी और गजा, रानीचौरी तक नजर जाती है। नीचे की तरफ हरिद्वार, ऋषिकेश, जौलीग्रांट, डोईवाला तक नजर पहुंचती है। कुंजापुरी मंदिर के प्रांगण से पहाड़, नदी, तराई क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत ही सुंदर विहंगमयी दृश्य देखने को मिलता है।

जी हां! पता चला कि 24 मई को इसीलिए पुलिस प्रशासन सख्त था कि उक्त दिन 20 देशों के 36 लोग जी-20 की बैठक के लिए नरेंद्रनगर पहुंच रहे थे। पर वापसी वक्त रास्ते में हमें वही सन्नाटा दिखाई दिया। कोई भी ढाबा यहां आज खुला हुआ नहीं था। खुलता भी कैसे वह तो जी-20 के आयोजको ने तब तक के लिए बंद करवा रखा था। यही नहीं रास्ते में सभी ढाबों को जी-20 के बैनरों से पाटा हुआ था। यह यात्रा देहरादून से चंबा, चूरेड़धार गांव तक ही थी जो मात्र 90 किमी यानी आना जाना 180 किमी है। मगर हम एक दिन रात्रि विश्राम के लिए नई टिहरी गए तो यात्रा कुल 210 किमी की थी। यात्रा के दौरान मोटर मार्ग की हालात पूर्व से कई गुना अच्छी व सुधरी हुई मिली है।


Thursday, May 25, 2023

G - 20 नरेन्द्रनगर : एंटीक्रप्सन मीटिंग पर बोले केंद्रीय राज्य मंत्री अजय भट्ट

Prem Pancholi

 उत्तराखंड के नरेंद्र नगर टिहरी में गुरुवार को होटल वेस्टिन में जी-20 की दूसरी एंटी करप्शन वर्किंग ग्रुप मीटिंग के शुभारंभ के अवसर पर मीडिया से अनौपचारिक संवाद के दौरान केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री श्री अजय भट्ट ने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड में दूसरी एंटी करप्शन वर्किंग ग्रुप की बैठक का आयोजन होना सौभाग्य का विषय है। इस बैठक में वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार नियंत्रण के प्रयासों पर विचार विमर्श एवं मंथन किया जाएगा, जो विश्व को भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में मार्गदर्शन करेगा। 


वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं एकजुटता अत्यंत आवश्यक है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती। भ्रष्टाचार अंतरराष्ट्रीय समस्या है, इसलिए इसकी समाप्ति हेतु समन्वित प्रयासों की जरूरत है। भ्रष्टाचार के दुष्प्रभाव भी व्यापक हैं, इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में संस्थागत फ्रेमवर्क मजबूत करने की आवश्यकता है। सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए आईटी का उपयोग आवश्यक है। वर्ष  2018 में अर्जेंटीना में आयोजित जी-20 की बैठक में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के संबंध में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा नौ बिंदुओं पर चर्चा की गई थी। वर्तमान जी-20 तथा भविष्य में आयोजित होने वाले जी-20 में भी इन बिंदुओं पर चर्चा को आगे बढ़ाया जाएगा।

       उत्तराखंड के जनपद टिहरी के नरेंद्र नगर में आयोजित जी-20 की एंटी करप्शन वर्किंग ग्रुप इस तीन दिवसीय आयोजन के दौरान, 20 सदस्य देशों, 10 आमंत्रित देशों और 9 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के 90 से अधिक प्रतिनिधि एसीडब्ल्यूजी की पहली बैठक में चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।
      इस अवसर पर कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय, भारत सरकार से संयुक्त सचिव श्री रजत कुमार भी उपस्थित थे।

G-20 के मेहमानो का स्वागत करती "पहाड़ी पोटली"

 G-20 के मेहमानो का स्वागत करती "पहाड़ी पोटली"


Prem Pancholi




नरेंद्र नगर के ओनीं गांव में होने जा रही G-20 समिट में पहाड़ी E-Kart द्वारा तैयार "पोटली" आगंतुको को सप्रेम भेंट की जाएगी। इस आशय की जानकारी कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने इस संवादाता को बातचीत के दौरान दी है। श्री उनियाल ने बताया कि पोटली शब्द पहाड़ी है, और इस पोटली की डिजायन भी पहाड़ी है, पोटली बनाने वाली महिलाएं भी पहाड़ी है। इसलिए पहाड़ की तरफ से यहां पहुंच रहे मेहमानो को यादगार स्वरूप पोटली स्प्रेंम भेंट करेंगे। 

ज्ञात हो की पहाड़ी E-kart की प्रमुख मंजू टम्टा इन दिनों पोटली को डिजायन करने में व्यस्त है। श्रीमती टम्टा ने बताया कि वे बहुत खुश है कि उनके द्वारा तैयार उत्पाद दुनियांभर से आने वाले मेहमानो की नवाजी में कैबिनेट मंत्री भेंट करने जा रहे है। कहती है कि उन्होंने कभी ऐसा सोचा तक नहीं था कि कभी उनके उत्पाद भारत से बाहर के देशों में जायेंगे वह भी स्प्रेम भेंट सहित। 

श्रीमती टम्टा ने कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल का आभार व्यक्त किया, और कहा की यहां आ रहे दुनियाभर के डेलीगेट्स के पास पहाड़ी E-kart द्वारा पोटली मौजूद रहेगी जो उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व भी करेगी। श्रीमती टम्टा ने हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स उत्तराखंड (CCF - HOFP) अनूप मालिक का भी धन्यवाद किया कि उनकी सक्रियता से यह पहाड़ी "पोटली" तैयार हो पाई है। 

बता दें कि इस पोटली के साथ गंगा जल भी भेंट किया जाएगा। पोटली को गाड़ी-मोटरयान सहित व्यक्तिगत रूप से भी पर्स की तरह इस्तेमाल की जा सकती है।

Sunday, May 21, 2023

वक्ताओं ने कहा कि अनियोजित और अवैज्ञानिक योजनाओं के विरोधी रहे पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा।

 वक्ताओं ने कहा कि अनियोजित और अवैज्ञानिक योजनाओं के विरोधी रहे पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा।


Prem Pancholi

सुंदरलाल बहुगुणा की द्वितीय पुण्य स्मृति के अवसर पर "हिमालय प्रहरी सम्मान" समारोह में श्री बहुगुणा की विरासत एवम् भविष्य की रूप रेखा पर पर्यावरण वैज्ञानिक डा० रवि चोपड़ा, नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर, पूर्व निदेशक यूकास्ट डा० राजेंद्र डोभाल, पद्मश्री कल्याण सिंह रावत, बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी, पद्मविभूषित सुंदरलाल बहुगुणा की धर्मपत्नी श्रीमती विमला बहुगुणा ने वर्तमान की पर्यावरण समस्या पर वक्तव्य व्यक्त किया है। इस दौरान श्री बहुगुणा की पुण्य स्मृति के अवसर पर विजय जड़धारी को "हिमालय प्रहरी" सम्मान प्रदान किया गया है।


ज्ञात हो की सेव हिमालय मोमेंट, पर्वतीय नवजीवन मंडल, सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरण एवं शोध प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वाधान में नगर निगम देहरादून के प्रेक्षागृह में सुंदरलाल बहुगुणा की द्वितीय पुण्य स्मृति के अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि अनियोजित विकास लोगो से आजीविका के साधन छीन रहा है। जिसकी जिम्मेदारी सरकार कभी नही लेती है। वक्ताओं ने यह भी कहा कि श्री बहुगुणा ने प्राकृतिक संसाधनों के सरंक्षण और उपयोग बाबत एक रोडमैप दिया है। मगर आज सत्ता के चाबुक में फंसी नीतियां इसके विपरित कार्य कर रही है। यही वजह है कि दुनिया में प्राकृतिक आपदाओं का क्रूर रूप सामने आ रहा है।

प्रख्यात पर्यावरणविद व पद्मविभूषित सुंदरलाल बहुगुणा की स्मृति में "हिमालय प्रहरी" नाम से सम्मान समारोह भी आयोजित हुआ। इस दौरान समारोह की मुख्यअतिथि व जानीमानी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि देशभर में प्राकृतिक संसाधनों पर भारी लूट होने लगी है। संविधान की अवहेलना करते हुए विकास की ऐसी योजनाएं बनाई जा रही है जो मनावधिकारो को कुचल रही है। आज देश में कई नए कानून बनाए जा रहे है जो लोगो के पेट पर डाका डाल रही है। उन्होंने श्री बहुगुणा को याद करते हुए कहा कि बहुगुणा जी ने कहा था कि मिट्टी पानी और बयार यही है जीवन के आधार। उन्होंने सत्ता को ललकारते हुए कहा कि कभी तो संविधान और मानवाधिकारों का ख्याल रखो। आज नियोजन और विकास में बहुत बड़ी दरार दिखाई दे रही है। कहा की नर्मदा बांध सहित देश के अन्य बांध खास लोगो के लिए जरूर है मगर आम लोगो के लिए तो यह खतरा ही बन चुके है।

पर्यावरण वैज्ञानिक डा० रवि चोपड़ा ने कहा कि आज की विकास की अवधारणा अवैज्ञानिक हो चुकी है। न्यायालय के निर्देश भी सत्ता के सामने बौने दिखते है। प्राकृतिक संसाधन उपभोग की वस्तु बन गई है। ऐसे में इन खतरो से लड़ना होगा। कहा कि चूंकि यह सभी समस्याएं हमारे जनप्रतिनिधि भी समझते है, मगर वे चुपी साध लेते है। पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने कहा की आज मैती आंदोलन का जो फलक दुनिया में है, उसके पीछे सुंदरलाल बहुगुणा की ही सोच रही है। उन्होंने कहा कि प्रकृति व संस्कृति का समावेश जरूरी है, जो आज की विकास की नीतियों से दूर दिखती है। यही सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। हिमालय प्रहरी सम्मान से सम्मानित बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी ने कहा कि यह भी चिपको आंदोलन का ही एक कार्यक्रम है कि लोग अपने पारंपरिक बीजों की ओर लौटें। इसलिए उन्होंने चिपको आंदोलन की सफलता के बाद बीज बचाओ आंदोलन आरंभ किया है। यूकास्ट के पूर्व निदेशक डा० राजेंद्र डोभाल ने सुंदरलाल बहुगुणा और खुद के बीच के अंतरंग संबधो पर चर्चा की है। कहा कि वह एक वैज्ञानिक संत थे। उनकी सोच के पीछे हमेशा लोग, जीव, जंतु, जंगल, जमीन और पानी रहता था। इन्हे एक दूसरे की आवश्यकता होती है। इसलिए श्री बहुगुणा लोकाधारित विकास योजनाओं की बात करते रहे है।

इस दौरान हिमालय बचाओ आंदोलन पर डा० अरविंद दरमोड़ा ने चर्चा आगे बढ़ाई। उन्होंने हिमालय बचाओ आंदोलन की गतिविधियों पर कहा कि हिमालय बचाओ आंदोलन लोकहित में प्रतिशोध का एक सशक्त माध्यम है। आंदोलन सदैव लोकहित में संघर्षरत रहता है। वह मलेथा का आंदोलन हो या टिहरी बांध का आंदोलन। उत्तराखंड के जल, जंगल, जमीन के सरंक्षण के लिए हिमालय बचाओ आंदोलन लगातार पैरवी करता आया है। कार्यक्रम के समन्यक समीर रतूड़ी ने बताया कि पद्मविभूषीत सुंदरलाल बहुगुणा की पुण्य स्मृति में हिमालय प्रहरी नाम से हर वर्ष का सम्मान ऐसे सख्शियत को दिया जाता है जिन्होंने अपने जीवन की जमा पूंजी में से सर्वाधिक कार्य समाज और पर्यावरण के लिए किया हो। उन्होंने कहा कि इस वर्ष का विषय बहुगुणा जी की विरासत और भविष्य की रूपरेखा थी। कार्यक्रम में रक्षासूत्र आंदोलन के प्रणेता सुरेश भाई, धाद के संस्थापक लोकेश नवानी, पूर्व शिक्षा निदेशक डा० कमला पंत, वरिष्ठ पत्रकार विजेंद्र सिंह रावत, जिला पंचायत सदस्य अमेंद्र बिष्ट, जनकवि डा० अतुल शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता जगतम्बा प्रसाद रतूड़ी, भूवैज्ञानिक डा० अतुल सती, बीज बम व गढ़भोज के प्रमुख कार्यकर्ता द्वारिका प्रसाद सेमवाल, प्रेम गिर्दा, रंजन, सर्वोदय कार्यकर्ता बीजू नेगी आदि महत्वपूर्ण लोग सम्मिलित हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मविभूषित सुंदरलाल बहुगुणा की धर्मपत्नी श्रीमती विमला बहुगुणा ने है। जबकि कार्यक्रम की मुख्यातिथि जानीमानी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर थी। कार्यक्रम का संचालक राजीव नयन बहुगुणा, समीर रतूड़ी ने संयुक्त रूप से किया है।

जड़धारी एक नजर में

इन्दिरागांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित श्री विजय जड़धारी का जन्म 26 गते मंगसीर यानि आठ अक्टूबर 1953 को टिहरी जनपद के जड़धार गांव के एक सामान्य परिवार में हुआ है। वे पिछले 40 वर्षो से उत्तराखण्ड हिमालय के बीजों के संरक्षण में लीन है। उनके पास इस हिमालय राज्य के ऐसे बीजो का संग्रह है जिनका आज लोग नाम तक भूल गये है। उन्होने हिमालय राज्य उत्तराखण्ड के बारहनाजा जैसे मोटे अनाजो के बीज को संग्रहित कर यह बताने का सफल प्रयास किया है कि यही सुपाच्य है और स्वस्थ रखने में कारगर है।

कोरोनाकाल के बाद लोगो को श्री जड़धारी की एक एक बात याद आने लगी। इनके अभियान की सफलता है कि आज दुनियाभर में मोटे अनाजो को लोग अपने भोजन का हिस्सा बना रहे है। विश्वविख्यात चिपको आन्दोलन से लेकर टिहरी बांध आंदोलन, शराबबंदी आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन जैसे अभियानों में श्री जड़धारी की अग्रणी भूमिका रही है। बावजूद इसके श्री जड़धारी ने प्रकृति और पर्यावरण के सन्तुलन के लिए बीज बचाओं आन्दोलन की देशभर में एक लम्बी रेखा खींची है।

श्री जड़धारी के पास हजारो प्रजाति के बीजो का संकलन है तो उन्होने बीजो और अन्य खाद्य उत्पादो की श्रृंखला में एक दर्जन पुस्तके भी लिखी है। एक तरफ श्री जड़धारी गांव गांव जाकर लोगों को बीज संरक्षण के लिए प्रेरित करते हैं और दूसरी तरफ वे इनके संग्रह के कार्य के साथ साथ दस्तावेजीकरण भी करते है। आज हजारों गांव ऐसे हैं जिन्हे बीज के लिए भटकना नहीं पड़ता है।

श्री जड़धारी के उल्लेखनीय कार्यो को देखते हुए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर उन्हे कई बार सरकारी एवं गैर संस्थाऐ सम्मानित कर चुकी है। इस वर्ष के ‘हिमालय प्रहरी सम्मान 2023’ श्री जड़धारी को प्रदान किया गया है।

Friday, May 12, 2023

एक साहित्य सन्यासी - महाबीर रंवाल्टा

 || एक साहित्य सन्यासी - महाबीर रंवाल्टा ||

@By - Prem Pancholi

एक साहित्य साधु महाबीर रवांल्टा का आज जन्मदिन है। बहुत विलम्ब से लिख रहा हूं। सभी ने सुबह अपनी अपनी लेखनी को चमका दी थी। मैं भी लिखने का यत्न कर रहा हूं। लोक के चितेरे और वैश्विक स्तर का साहित्य कोई गढ रहा है। वह है सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के महर गांव निवासी महाबीर रवांल्टा। अब तक 38 पुस्तको को वे पाठको को सौंप चुके हैं।


लोक की विधा हो या हिन्दी साहित्य का शिल्प वह उनके रग रग में बहता है। महाबीर रवांल्टा दूर सरनौल से चलकर महर गांव और उससे आगे सर बडियार से बेहद दीदार। तीन साल तक देश की सीमा पर सेवारत तथा इन सबसे इतर विगत 40 वर्षो से साहित्य के हर शिल्प को बुनकर सृजनशील है। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी सहित हर विधा को आत्मसात किया है उन्होंने। वे कभी भी अपनी माटी की पवित्रता को नहीं भूले है। यही वजह है कि उनके साहित्य में लोक है, देशज समाज है। साथ ही उनके साहित्य में कोई बात है कि जो सन्देश एक दूसरे को पहुंचा रही है। जी यहां बात हो रही है। प्रख्यात साहित्यकार महाबीर रवाल्टा की। सरनौल गांव में 10 मई 1966 को रूपदेई और टीका सिंह राणा के घर जन्में इस ओजस्वी बालक ने अपने साहित्य के मार्फत अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर पहचान बनाई है। दरअसल ऐतिहासिक तिलांडी आंदोलन भी इसी माह के अन्त में हुआ था। सो उनके माता पिता ने अपने इस बालक का नाम महाबीर रखा है। उन्हें मालूम था कि भविष्य मे यह महाबीर लोक में उनका नाम रोशन करेगा।
महाबीर रवांल्टा ने प्राथमिक से लेकर माध्यमिक की शिक्षा महर गांव और सरनैल से प्राप्त की है। तत्पश्चात 10 वीं और 12वीं की शिक्षा उत्तरकाशी जिला मुख्यालय के कीर्ति इंटर कॉलेज से प्राप्त की है। 12वीं के बाद इनका चयन राजकीय पॉलीटेक्नीक उत्तरकाशी में फार्मेसी में डिप्लोमा पाठ्यक्रम के लिए हो गया। पर स्नातक व परास्नातक (हिंदी) की डिग्री गढ़वाल विश्वविद्यालय से प्राप्त की है। इसके बाद वे भारतीय अर्धसैनिक बल में ढाई बरसों तक सेवा देते रहे। वहां भी वे कहां चुप रहने वाले थे। यहां पर उन्होने एक त्रैमासिक पत्रिका का संपादन किया। इसके उपरान्त श्री रवांल्टा का चयन स्वास्थ्य विभाग में फार्मासिस्ट पद के लिए हुआ।
इन्होने उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के प्राथमिक स्वास्थ्य केद्र धरपा और बेरा फिरोजपुर में 18 वर्षो तक अपनी सेवाएँ दी है। वर्तमान में वे उत्तरकाशी जनपद के अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आराकोट में सेवारत हैं। रवांई घाटी उत्तरकाशी जनपद की पश्चिमोेत्तर दिशा में स्थित कृषि बागवानी के लिए विख्यात भूभाग है। जिसे यमुनाघाटी भी कहते है। किन्तु ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक पहचान रवांई नाम से ही है। अर्थात नौगांव, पुरोला एवं मोरी विकासखण्डों के संयुक्त भू-भाग को रवांई कहते है। यही वजह है कि अपनी जन्मभूमि से अगाध लगाव होने के नाते वे रवांल्टा लिखते है। नाम से ही मालूम हो जाता है कि लोक के चितेरे महाबीर रवांल्टा है। जिन्होने रवांल्टी बोली-भाषा की पहली कविता लिखी, पहली कहानी लिखी। पहली बार रवांल्टी बोली-भाषा पर शोध पत्र प्रस्तुत किया है। कह सकते हैं कि उत्तराखण्ड की इस क्षेत्रीय भाषा के शब्दो को यदि कागज पर पहली बार किसी ने उतारा है तो वह महाबीर रवांल्टा ही है। रवांई बोली-भाषा, लोकोक्तियाँ, लोकगीत, पहेलियां, लोकसंस्कृति से जुड़े कई अनछुये तथ्यों को संकलित कर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं से लेकर समाचार पत्रों में प्रकाशित किया है। 1995 में रवाल्टी भाषा की पहली कविता जन लहर में दरवालु नमक शीर्षक से प्रकाशित हुई। 2002 में डांडा कांडा स्वर, कारगिल लड़ाईन, और डर नामक कविताये प्रकाशित हुई। 2005 में उड़ घुघूती उड़ काब्य संग्रह प्रकाशित हुआ। 2011 में कलश के रुद्रप्रयाग में आयोजित कवि सम्मलेन में नरेंद्र सिंह नेगी की अध्यक्षता में पहली बार किसी कवि सम्मलेन में रवाल्टी कविताओं का पाठ किया गया। फिर आकाशवाणी पौड़ी से 30 सितम्बर 2011 को रवाल्टी कविताओं का पाठ किया गया। इसके अलावा रवांई की रंवाल्टी भाषा पर देश के विभिन प्रान्तों में हुए सेमिनारों में ब्याख्यान प्रस्तुत किये। फलस्वरूप इसके रंवाल्टी भाषा को उत्तराखंड की 13 क्षेत्रीय भाषाओँ में शामिल किया गया है। 27 अक्टूबर 2016 को रंवाल्टी भाषा के लिए एक ऐतिहासिक दिन साबित हुआ जब आकाशवाणी नजीमाबाद से ग्राम जगत कार्यक्रम में गढ़वाली काब्य पाठ के दौरान रंवाल्टी कविताओं का प्रसारण हुआ है। जबकि ख्यात चित्रकार बी मोहन नेगी ने श्री रवांल्टा की रवांल्टी कविताओं पर पोष्टर बनाऐ गये है। मई 2016 में कुमाऊ विश्वविद्यालय और पहाड़ के संयुक्त तत्वाधान में नैनीताल में उत्तराखंड की भाषाओँ पर आयोजित कार्यशाला में भी रवाल्टी कविताओं का पाठ किया गया है। गुजरात के बड़ोदरा में आयोजित विश्व भाषा सम्मलेन में श्री रवांल्टा के प्रयासों से रवाल्टी भाषा विश्व के एक हजार भाषाओँ का हिस्सा बनी। जिसमे 50 देशों के प्रतिनिधि सम्मलित हुये थे।
रवांल्टी भाषा के संरक्षण, संवर्धन, प्रचार प्रसार को लेकर श्री रवांल्टा की भाषा जात्रा आज भी बदस्तूर जारी है। गैणी जण आमार सुईन, छपराल दो काव्य संकलन रवांल्टी भाषा में प्रकाशित हो चुके है। 2009 में महाबीर रवाल्टा एवं उनका कथा साहित्य नाम से लघु शोध प्रबंध, 2022 में सोबन सिंह जीना कुमाऊ विश्व विद्यालय द्वारा एक प्रेम कथा का अन्त नाटक का सामिक्षात्मक विवेचन भारती आनन्द ने लघु शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया है। डॉ अंजू सेमवाल उत्तरकाशी महाविद्यालय द्वारा महाबीर रवाल्टा के कथा साहित्य का तात्विक विवेचन नाम से शोध प्रबंध प्रस्तुत किया। इसके अलावा चौधरी चरण सिंह विश्वविध्यालय मेरठ में इनके उपन्यासों पर भी एक शोधार्थी द्वारा लघु शोध प्रस्तुत किया है। अक्टूबर 2016 में उत्तराखंड सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा लोकभाषा और बोली संवर्धन परिषद् का गठन किया गया, जिसमे इन्हें बतौर सदस्य नामित किया गया है। पुरस्कारो की एक लम्बी फेहरिस्त है।
दोस्त बडोनी, सच के आर पार, अवरोहण, तुम कहाँ हो (कहानी), सफेद घोड़े का सवार, खुले आकाश का सपना (नाटक), ननकू नहीं रहा (बाल एकांकी संग्रह) के लिए अखिल भारतीय स्तर पर पुरुस्कार और अनेक संस्थाओं द्वारा उन्हे पुरुस्कृत एवं सम्मानित भी किया जा चुका है। पगडंडियों के सहारे, एक और लड़ाई लड़, आप घर या बाप घर, अपना अपना आकाश (उपन्यास), समय नहीं ठहरता, उसके न होने का दर्द, टुकड़ा टुकड़ा यथार्त, तेग सिंह लड़ता रहा, जहर का संघात, भंडारी उदास क्यों थे, प्रेम संबंधों की कहानियां (कहानी संग्रह), त्रिशंकु (लघु कथा संग्रह), आकाश तुम्हारा होगा, सपनो के साथ चेहरे, तुम कहाँ को चल पड़े, घर छोड़ भागती लड़कियां( कविता संग्रह), विनय का वादा (बाल कहानी संग्रह), उत्तराखंड की लोक कथाएं ( भाग एक और भाग दो), दैत्य और पांच बहिने, ढेला और पता (रंवाई क्षेत्र की लोक कथायें), पोखू का घमंड (उत्तराखंड की बाल कथाओं पर आधारित बाल नाटक) प्रकाशित हो चुकी हैं। रंगमच को लेकर अभिनय और निर्देशन इनका प्रिय विषय है। श्री रवांल्टा रंगकर्म को गांव गांव तक पहुँचाना चाहते है जिसके लिए वे निरन्तर प्रयासरत है।
महावीर रंवाल्टा एक लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार, कथाकार, नाटककार, कवि, बाल कहानीकार, बाल कविताऐं और संस्कृतिकर्मी जैसी साहित्य की विविध विधाओं के ज्ञाता है। अब तक उनके साहित्य और उन पर सात (07) लोगो ने शोध किया है। पांच लोगो ने अपने-अपने शोध ग्रन्थ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को प्रस्तुत भी कर दिया है।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...