Sunday, August 9, 2015

भरत राणा ने बुरांश के फूल बनाये रोजगार का जरिया

राज्य की यमुना घाटी का हरेक किसान अपनी खेती-किसानी के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। इस घाटी में लोग खेती-किसानी को ही महत्व देते है। उन्हे सरकार इसके लिए प्रोत्साहन करे या ना करें। उन्हे इसका कोई मलाल नही है। यही वजह है कि आज राज्य की एक मात्र यमुनाघाटी है जहां से पलायन का दूर-दूर तलक कोई वास्ता नही है।
यहां हम ऐसे ही एक शख्स से परिचय कराना चाहते हैं जिन्होने बिना सरकारी सहायता के नगदी फसल क रवह चमत्कार करके दिखाया जिसके लिए सरकारे व कम्पनिया बड़ी-बड़ी डीपीआर (डिटियेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) बनाती है। हो-हल्ला होता है। विज्ञापन ईजाद किये जाते हैं। सपने दिखाये जाते है। रोजगार का डंका पीटा जाता है। इसके अलावा प्रचार-प्रसार के सभी हथकण्डे ये सरकारी-गैर सरकारी लोग अपनाते है। मगर इसके इतर जो उत्तरकाशी जनपद के दूरस्थ गांव हिमरोल में भरत सिंह राणा ने करके दिखाया वह काबिले तारिफ इसलिए है कि जहां यातायात के नाम मात्र के साधन हो। विधुत व दूरसंचार की सुविधा सरकारी विभाग के रहमोकरम पर हो। पानी की आपूर्ती भी सीमित हो। सरकारी रहनुमा क्षेत्र में रहने के लिए खानापूर्ती करता हो। इन हालातो में भरत सिंह राणा ने स्थानीय फलोत्पादन और प्राकृतिक संसाधनो को बाजार और नगदी फसल के रूप में प्रस्तुत किया हो यह इस क्षेत्र के लिए मिशाल कायम हुई है।
बता दें कि जब भी कोई पहाड़ी महिला जंगल में घास-पाती के लिए जाती है तो क्या वह कभी सोचती थी कि वापस घर जाकर उसके हाथ में पैसे मिलने वाले है। यही अजूबा है और वजीब भी है। हिमरोल गांव के आस-पास के दो दर्जन से भी अधिक गांव की महिलाये जब मार्च अप्रैल में जंगल को चारा-पत्ती, जलाऊन लकड़ी के लिए जाती है तो वह उसी समय अपने लिए बुरांश के फूल कुछ किलो तोड़कर लाती है। जिसे वे भरत सिंह राणा को 20रू॰ किलो के हिसाब से बेचती है। अर्थात एक तरफ घर व पशु के लिए व्यवस्था तो दूसरी तरफ बुरांश का फूल उनके लिए आथर््िकी का जरिया बन चुका है। ऐसा इस क्षेत्र में पहली बार हुआ है। इस क्षेत्र में बुरांश प्रजाति के पेड़ो का भारी जंगल है। जिसे स्थानीय लोग यदा-कदा यूं कहकर कहते थे कि इतना सुन्दर फूल किसी काम का नहीं। इसको रोजगार से जोड़ने काम भरत सिंह राणा ने करके दिखाया। यही नहीं इस क्षेत्र में अन्य फल जैसे चूलू, सेब, माल्टा, आड़ू खुबानी फलो का भी भरत सिंह राणा जूस, चटनी, जैम बनाकर बाजार में उतार रहा है। बुरांश के फूल का जूस तो वे भारी मात्रा में बनवा रहा है। वह कता है कि इस यूनिट को विकसित करने में उसे लगभग 10 वर्ष का समय लग गया। क्योंकि उन्हे फलो द्वारा तैयार इस सामग्री के लिए बाजार ही उपलब्ध नही हुआ था। बताता है कि वे .सेन्टर फाॅर टेक्नोलाॅजी एण्ड डेवपलपमेंट सहसंपुर का आभारी है जिन्होने उन्हे एक रास्ता दिखाया। भले आज उनके पास स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य स्तर तक का प्रशासन उनके काम की वाह-वाही क्यो न करे। मगर प्रारम्भ में इस काम को विकसित करने में बहुत ही कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। अब तो भरत सिंह राणा अपनी ही जमीन पर क्षेत्र के तमात फलो व फूलों का पल्प भारी मात्रा में निकाल रहे है और बाजार में उतार रहा है। उनके पास इस लघु उद्योग के लिए पर्याप्त जमीन नहीं है फिर भी वह अपने अड़ोस-पड़ोस की जमीन को भी इस काम के लिए इस्तेमाल कर रहा है। जिसके एबज में अमुक काश्तकार को भी नगदी लाभ हो जाता है।
इतना ही नहीं वह तो फलोत्पादन के लिए अब नर्सरी भी तैयार कर रहे है। जो उनकी नर्सरी में नया पौधा तैयार होता है उसे वह डेमोस्टेशन के लिए अपने गांव के लोगो को मुफ्त में उपलब्ध करवाते है। ताकि इस नगदी फसल से सभी को लाभ हो सके और लोग स्वावलम्बी बने रहै। ऐसा भरत सिंह राणा बात-बात में कह देते हैं। लगभग दो हजार फीअ की ऊंचााई पर स्थित हिमरोल गांव जहां प्राकृतिक सौन्दर्य समेटे है वहीं आज बागवानी के क्षेत्र में अग्रणी हो रहा है। इसका श्रेय लोग भरत सिंह राणा को देते हैं। राणा का ही कमाल है कि कभी हाई अल्टरट्यूट के सेब के पेड़ यहां लोगो ने विकसित किये है। जो पांच वर्ष बाद ही फल देते थे। लेकिन श्री राणा ने इसी जगह पर लो-हाईट के सेब की नर्सरी ‘‘स्पर’’ जैसी नस्ल विकसित की है जिसका लाभ लोग पिछले पांच वर्षो में खूब ले रहे है। यह स्पर नस्ल की सेब की प्रजाती तीन वर्ष में ही फल उत्पादन कर देती है। भरत सिंह राणा की सोच इतने तक सीमित नहीं है वह जिस पानी को अपनी नर्सरी, जूस के पल्प बनाने के लिए करता है उस पानी को भी श्री राणा ने बहुपयोगी बनाया है। अब तो उनके पानी के तालाब में मछली पालन भी हो रहा है। यूं कहे कि प्राकृतिक संसाधनो का उपयोग यदि सीख्सना है तो भरत सिंह राणा के पास जाना ही पड़ेगा।
श्री राणा को स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य स्तर तक उनके इस उम्दा काम को कई बार सम्मान मिल चुका है। लेकिन बात तब और आगे बढती है जब बाहर के प्रदेश श्री राणा को सम्मान करते है। उनकी काम की गूंज नरेन्द्र मोदी के कान तक गयी तो उन्होन अपने गुजरात के मुख्यमंत्रीत्वकाल में श्री राणा को विशेष किसान से सम्मान किया है। वर्तमान में श्री राणा की नर्सरी, फल बागान, जूस विकसित केन्द्र, मछली पालन का तालाब सरकार और गैर सरकारी स्तर पर शोध का केन्द्र बना हुआ है। आस-पास के नव-युवक श्री राणा के कामो का अनुश्रवण करते दिखाई दे रहे है।

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यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...