Monday, November 27, 2017

चोपड़ियाली गांव के कृषि-कर्मयोगी मंगलानन्द

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नमिता--------------
पहले सब्जी, फिर फूल और इसी क्रम में फलोत्पादन जैसे तमाम स्वावलम्बन के कामो के बलबूते सफलता की सीढीयां चढ रहे मंगलानन्द डबराल उत्तराखण्ड में किसी पहचान के मोहत्ताज नहीं हैं। उन्होंने विदेशी फल ‘‘किवी’’ का सफल उत्पादन किया, तो वहीं आड़ू में नये प्रयोग करके आड़ू के उत्पादन को बेमौसमी बना डाला। बिना सरकारी बजट के ऐसे नये प्रयोग उत्तराखण्ड के मसूरी-धनोल्टी-चंबा मोटर मार्ग पर स्थित चोपड़ियाली गांव में मंगलानन्द डबराल कर रहे हैं। उनका बागान वर्तमान में फल, फूल व फलो के विविध उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यही नहीं उनके बगीचे में राज्यभर के कृषि वैज्ञानिक शोध के लिए आते है।
कृषि में नीत-नये प्रयोग
मंगलानन्द की कहानी के कई मोड़ हैं पर स्वावलम्बन के लिए उन्होंने जो उदाहरण प्रस्तुत किया है वह कोई कर्मयोगी ही कर सकता है। उनकी यह कहानी यहीं नही थमती। पांचवीं पास श्री डबराल ने नौकरी के लिए बहुत संधर्ष किया। उनका यह संधर्ष उन्हें विदेश तक ले गया। जहां कुवैत में उन्होंने 1968 से 1975 तक एक कंपनी में बतौर वाहन चालक काम किया। लेकिन इसके बाद वे अपने गांव लौट आए। उन्होंने गांव में खेतीबाड़ी की शुरूआत करके उसी में रच-बस गये। वे बताते हैं कि उन दिनों गोभी जैसी आम सब्जी भी पहाड़ में शादी-विवाह या किसी खास मौके पर ही देखने को मिलती थी। उन्होंने ठान लिया कि वे अपने गांव में ही गोभी उत्पादन करके सब्जी उत्पादन की शुरूआत करेंगे। वे बताते हैं कि उन्होंने जब खेत में गोभी उगाई तो दूसरे किसानों को आश्चर्य हुआ। तत्काल उन्होंने जम्मू-कश्मीर से गोभी का बीज मंगवाकर पौध तैयार की थी। उस जमाने में वे एक रुपये में 120 पौधे बेचते थे। इस तरह से वे एक सीजन में 8 हजार तक की केवल पौध ही बेचा करते थे। इसके अलावा लोगों को घर-घर जाकर इसके लिए क्यारियां तैयार करवाना और पौध लगाने के साथ इसकी देखभाल के गुर बताना उन दिनों उनकी दिनचर्या बन चुकी थी। यही नहीं उन्होंने पिछले दिनों एग्जॉटिक वेजिटेबल (विदेशी सब्जियां) का भी बड़े पैमाने पर उत्पादन कर जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों चैंका दिया। संस्थान द्वारा इस काम के लिए उन्हें विशेष तौर पर सम्मानित भी किया गया।
उल्लेखनीय यह है कि मंगलानंद डबराल ने खेती-किसानी में नये प्रयोगों के जरिए मिसाल कायम की है। इसके अलावा उन्होंने अपने घर में ही आड़ू की एक ऐसी प्रजाति विकसित की, जो ऑफ सीजन में फल देती है। यह आड़ू आकार में बड़ा होने के साथ बेहद रसीला और मीठा है। आड़ू की प्रजाति को उन्होंने पंतनगर स्थित जीबी पंत कृषि एवं औद्यानिक विश्वविद्यालय के सम्मुख प्रस्तुत किया। लंबे शोध के बाद संस्थान के वैज्ञानिकों ने माना कि ये आड़ू की नई प्रजाति है। जिसे संस्थान के वैज्ञानिक ने ‘अर्ली एम रेड’ आड़ू का नाम दिया है। इसमें ‘एम’ अक्षर मंगलानंद के नाम को प्रदर्शित करता है।
किवी के उत्पादन में पाई सफलता
सब्जी उत्पादन की सफलता के पश्चात मंगलानंद डबराल ने ‘‘किवी बगान’’ के लिए दो पौधों से शुरूआत की थी। आज वे किवी के बड़े बागवान व काश्तकार बन चुके हैं। उन्होंने व्यावसायिक तौर पर इसके उत्पादन के साथ अपने प्रयोगों के जरिए फल के आकार में वृद्धि करने में भी सफलता पाई है। वैज्ञानिक विधि से इस फल की पौध तैयार कर आज वे दूसरे किसानों को भी किवी उत्पादन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। खास यह है कि मंगलानंद पांचवीं पास ऐसे काश्तकार हैं, जिनसे सीखने और सीखाने के लिए किसानों से लेकर कृषि वैज्ञानिक तक आए दिए उनके घर पहुंचते हैं। वे फसलों के लिए खुद तैयार की गई वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा गौमूत्र, राख, अखरोट, नीम इत्यादि से जैविक विधियों को अपनाकर कीटनाशक तैयार करते हैं और दूसरों को भी इसकी विधि बखूबी बताते हैं। आज क्षेत्र के पांच सौ से भी अधिक किसान उनकी राह पर चलकर जैविक खेती कर रहे हैं।
किवी एक विदेशी फल है, जो चीन के अलावा ब्राजील, न्यूजीलैंड, इटली ओर चिली जैसे देशों में उगाया जाता है। लेकिन मंगलानंद डबराल ने उत्तराखंड में किवी का सफल उत्पादन कर भविष्य की राह दिखाई है। वे मानते हैं कि आगराखाल से लेकर केदारनाथ तक किवी का उत्पादन किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि किवी की पौध जनवरी में लगाई जाती है। तीन साल बाद यह पौध फल देने लगती है। अप्रैल में फूल आते हैं और अक्तूबर-नवंबर में फसल तैयार हो जाती है। बंदर इस फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते तथा ओलावृष्टि में भी ये सुरक्षित रहती है। इसलिए उत्तराखंड के लिए यह फसल मुफिद है। किवी के अलावा मंगलानंद एग्जॉटिक वेजिटेबल के क्रम में लैटीयूज, ब्रोकली, आइस बर्ग, जॉरसले, चाइनिज गोभी आदि सब्जियां बहुआयात में उगा रहे हैं। वे सब्जियों का उत्पादन बाग-बगीचों के अलावा दो बड़े पॉलीहाउस में करते हैं। इसके अलावा 80 नाली और 30 नाली के दो बड़े बागों में उन्होंने लगभग 15 सौ से अधिक फलदार वृक्ष लगाए हैं।
प्रोसेसिंग के लिए खुद की यूनिट
मंगलानंद के तीन बेटे हैं, रमेश, रोशन और रामकृष्ण डबराल। उनके तीनों बेटों ने पिता की राह पर चलते हुए खेती-किसानी के काम को तबज्जो दी। तीनों बेटे और उनका परिवार सामूहिक रूप से खेती के काम में लगे हैं। वह मिलकर सब्जी उत्पादन के साथ बागवानी और खुद की प्रोसेसिंग यूनिट चलाते हैं। जिससे फलों के अधिक उत्पादन की दिशा में उन्हें प्रोसेस कर जूस, जैम, अचार और दूसरे उत्पादों में बदल दिया जाता है। इसकी मार्केटिंग भी वह खुद करते हैं। उनके उत्पाद गढ़वाल-कुमाऊं के अलावा दिल्ली-मुम्बई और दूसरे बड़े शहरों तक पहुंचते हैं। मंगलानंद के घर के आंगन में घुसते ही चारों तरफ सुंदर फूल और दूसरे पौधों से सजीं सुंदर क्यारियां आपका स्वागत करती हैं। मंगलानंद बताते हैं, उन्हें शुरू से फूलों से बेहद प्यार था। यही फूल उनके व्यावसाय का प्रमुख हिस्सा बना। गुलदावरी, लिलियम, गेंदा, ग्लेडियस, गुलाब, जरबेरा इत्यादि फूलों का उत्पादन कर वे अच्छी कमाई के साथ अन्य किसानों को भी खुशहाली का संदेश देते हैं।
मंगलानंद डबराल का मानना है कि आज लोग पैसे और प्रापर्टी के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन वह दिन दूर नहीं है, जब लोग अन्न और पानी के लिए लड़ेंगे। खेती खत्म हो रही है और अनाज की डिमांड लगातार बढ़ रही है। बकौल मंगलानंद, हमारे प्रदेश में पलायन-पलायन तो सब चिल्ला रहे हैं, लेकिन जमीन पर काम करने को कोई तैयार नहीं है। यहां की माटी में वह सब कुछ है, जो भरपूर रोजगार दे सकती है। बंजर पड़े खेतों में उग आई खरपतवार के कारण गांवों में जंगली जानवरों का प्रकोप बढ़ गया है। सरकार को चाहिए कि वे अपनी नीति में किसानों को प्राथमिकता में रखे। प्रदेश में चकबंदी लागू की जाए। इसके अलावा जो लोग अपनी खेती बंजर छोड़ गए हैं, उसकी खेती को पट्टे पर गांव में खेती कर रहे दूसरे किसानों को दिया जाए। ताकि खेत आबाद रहें और अनाज की पैदावार होती रही।
सफलता के मंत्र
बकौल मंगलानन्द डबराल- यदि स्वरोजगार का जरिया किवी फल को बनाया जायेगा तो कोई गलत नहीं। हालांकि स्वदेशी फल किसी किवी से कम नहीं है। हमने ऐसा प्रयोग भी करके दिखाया। पर किवी के लिए उपयुक्त जलवायु उत्तराखण्ड में भी है। इस राज्य में प्रकृति ने जैसे विविध रंग भरे हैं उसी तरह यहां नगदी फसल और फलोत्पादन के लिए उपयुक्त जलवायु है। मेरे पास ना तो कोई कृषि वैज्ञानिक जैसी डिग्री है और ना ही कृषि विषय में परास्नातक। परन्तु कृषि वैज्ञानिक मेरे बगीचे में सीखने व सीखाने के लिए जरूर आते हैं।
चोपड़ियाली गांव को मिली एक और पहचान
पहले मसूरी-धनोल्टी-चंबा मोटर मार्ग अपनी बेमिसाल प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन के लिए जाना जाता था अब नगदी फसलों और फलदार पट्टी के रूप में क्षेत्र ने नई पहचान बनाई है। इस पहचान बनाने में कोई सरकारी बजट और कोई योजना नहीं आई। यहां कर्मयोगी मंगलानन्द डबराल हैं जो खेती-किसानी में नित-नए प्रयोगों करके न कि सिर्फ आम लोगों, बल्कि कृषि वैज्ञानिकों का ध्यान भी इस ओर आकृषित कर रहे है। खेती में विभिन्न फसलों के सफल उत्पादन के बाद आज वे उत्तराखंड के पहले ऐसे किसान के रूप में पहचान बना चुके हैं, जो विदेशी फल ‘‘किवी’’ का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहे हैं।

- पंतनगर यूनिवर्सिटी ने आड़ू को दिया मंगलानंद का नाम। ‘अर्ली एम रेड आड़ू’ इसमें ‘एम’ अक्षर मंगलानंद के नाम को प्रदर्शित करता है।


Monday, October 16, 2017

अजैविक पदार्थो के सेवन से बढ रही है बिमारिया



प्रेम पंचोली

पिछले एक सप्ताह से देहरादून में माउण्ट वैली डेवलपमेंट ऐशोसियसन द्वारा आयोजित ग्रीन एक्शन सप्ताह के रूप में जनजागरूकता अभियान चलाया। सबके लिए जैविक खेती, जैविक आहार जैसे स्लोगन को लेकर अभियान ने गुरू राम राय पीजी काॅलेज, दयानन्द वूमेन ट्रेनिंग काॅलेज, राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय राजपुर में स्कूली बच्चों के साथ अभियान ने सतत् पोषण उपभोग जैसे विषय पर मौजूदा रासायनिक तरीके से तैयार हो रही खाद्य सामग्री पर वृहद चर्चा की है। इस दौरान अभियान ने प्रेस क्लब में एक दिवसीय विचार गोष्ठी का आयोजन किया है। माउण्ट वैली डेवलपमेंन्ट ऐशोसियसन के तहत आयोजित इस विचार गोष्ठी में पंहुचे कृषि मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि उनकी हर सम्भव कोशिश रहेगी कि वे राज्य की परम्परागत कृषि को राज्य के स्कूलो में पाठ्यक्रम का हिस्सा बनायेंगे।

कार्यक्रम के मुख्यअथिति कृषि मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि वे जल्दी ही राज्य में एकीकृत कृषि विकास कार्यक्रम के लिए एक विशेष योजना बना रहे हैं जिसका फायदा किसानो को मिलने वाला है। कहा कि वे अपने स्तर से यह प्रयास कर रहे हैं कि राज्य सरकार राज्य के किसानो को एक मुश्त बजट दे, ताकि पहाड़ में आपदाग्रस्त किसान राहत की सांस ले सके। इस दौरान विचार गोष्ठी को संबोधित करते हुए वैज्ञानिक वृजमोहन शर्मा ने कहा कि आज हम लोग वर्तमान के खाद्य सामग्री के कारण अजैविक हो गये है। इसलिए हमारा सर्वाधिक खर्च और समय चिकित्सीय परिक्षणों में जा रहा है। उन्होंने कहा कि क्या हम लोग फिर से अपने पंरम्परागत खान-पान में नहीं आ सकते। यदि आ सकते हैं तो हमें जैविक खेती की ओर लौटना होगा। राजस्थान से आये कट्स संस्था के अमरदीप सिंह ने कहा कि जिस तरह से देश में हरित क्रान्ती के बाद खाद्य पदार्थो में उत्पादन बढा है उसी गति से देशभर में इसके कुप्रभाव भी अस्वस्थता के रूप में सामने आ रहे है। इसका हस्र यह हुआ कि जब भी उपभोगक्ता उपभोग करने वाली चीजों को प्राप्त करता है तो उसे अजैविक ही प्राप्त होता है। इसलिए कहा जा सकता है कि जैविक सामग्री को अजैविक व रासायनिक पदार्थो ने तहस-नहस कर दिया है। उनका सुझाव था कि लम्बे समय तक स्वस्थ रहने के लिए जैविक पदार्थो को ही इस्तेमाल करना होगा।

बीज बचाओ आन्दोलन के विजय जड़धारी ने कहा कि अजैविक रूप से तैयार हो रहा बीज आज धरती का शोषण तीव्र गति से कर रहा है। यही वजह है कि मौजूदा समय में पानी पर्यावरण के खतरे हमारे सामने खड़े हो गये है। जहां तक जैविक खेती की बात है उसके लिए पशुपालन का होना आवश्यक है। उन्होने उतराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्य में जैविक खेती के लिए बैल का होना जरूरी बताया। क्योंकि इस पहाड़ी राज्य में मशीनो से भी खेती करनी अजैविक ही माना जाता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वे इस पहाड़ी राज्य के किसानो को बैल हेतु सब्सिडी प्रदान करें। ताकि मझौले किसान फिर से खेती से जुड़ सके। 

इस दौरान इस अभियान से जिन छात्र-छात्राओं ने चित्रकला, निबन्ध, नारा लेखन में हिस्सा लिया उन्हे माउण्ट वैली डेवलपमेंट ऐशोसियसन और कट्स इन्टरनेशनल संस्था द्वारा प्रसस्ती पत्र और स्मृति चिन्ह से लगभग 18 प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया। विचार गोष्ठी में सेवानिवृत प्रमुख सचिव विभापुरी दास, दयानन्द वूमेन ट्रेनिंग काॅलेज की आरती दिक्षित, हिमोत्थान सोसायटी की मल्लविका चैहान, माउण्ट वैली डेवलपमेंट ऐशोसियसन के निदेशक अवतार नेगी ने विचार गोष्ठी को संबाधित किया और कार्यक्रम का संचालन सर्वोदय विचारक व लेखक बीजू नेगी ने किया।


Sunday, September 17, 2017

ढोल से पहले ढोली का संरक्षण हो - प्रीतम भरतवाण




वर्तमान की आधुनिक सभ्यता ने लोक संस्कृति को नया आयाम दिया है जो अब सर्व-जन का कर्म बन गया है। यह उद्गार उत्तराखण्ड के जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण के है। उनके जन्म दिन की पूर्व संध्या पर श्री भरतवाण से हुई सूक्ष्म वार्ता के अंश -

लोक संस्कृति के बारे में बतायेंगें।

दरअसल कुछ अर्सें पहले यानि कि जब संचार के कोई साधन नहीं थे तत्काल उत्तराखण्ड पहाड़ के गांव में बसने वाले जो लोक बाध्यन्त्रों को संवारने व प्रस्तुत करने का कार्य करते थे वे सम्पूर्ण मिडिया का कार्य तो करते ही थे अपितु वे समाज में हमेशा अपने गीतों के माध्यम से परस्परता का कार्य भी करते थे। आज खुशी इस बात की है कि तब एक विशेष प्रकार के लोग ही संस्कृति के कर्ता-धर्ता थे। आज यह सार्वजनिक हो गया है। तब एक ही प्रकार के लोगों को लोक संस्कृति कर्मी मानते थे। लोक संस्कृति का सीधा अर्थ जीवन से और जीवन को जीने से है।

आप लोक संस्कृति के उत्थान व विकास के बारे में बतायंे ?

निर्भरता जीवन को समाप्त करती है। मेरा मानना है कि यदि अपने राज्य के संस्कृति कर्मी सरकार पर आस लगाये बैठे रहेंगें तो शायद इस ओर कोई कारगर प्रयास सार्थक हो। वर्तमान में आडियों-विडियों व मिडिया के माध्यम से लोक संस्कृति के प्रसार के लिये जो कार्य हो रहे हैं वे निसन्देह प्रशंसनीय हैं। उत्थान व विकास का सीधा अर्थ है कि बिना अध्ययन व मेहनत से यह सब अधूरा है।

जितने भी गायक है (उत्तराखण्ड में) सभी लोक गायक हैं ?

यह सत्य है कि गायन और प्रस्तुतीकरण क्षेत्र मंे लोक तब जुड़ता है जब समाज की प्रमाणिकता उस प्रस्तुति को प्राप्त हो। अर्थात यह भी कह सकते हैं लोक की अभिव्यक्ति का प्रस्तुतिकरण। जैसे कि श्री नरेन्द्र नेगी, श्री जीत सिंह नेगी, श्री रतन सिंह जौनसारी, मंगला रावत, चन्द्रसिंह राही, हीरा सिंह राणा आदि हमारे अग्रज यह लोक गायक हैं । इससे पहले की ओर देखें तो घनश्याम सैलानी व गोपाल बाबू गोस्वामी जैसी दिवंगत आत्माये असली लोक गायक थे।

समाज में जागर का महत्व ?

जागर विद्या आदि और अनन्त काल से है। यह सिद्ध है कि जब कोई सभ्यता एक हजार साल तक समाज मंे व्याप्त रहती हैं तब एक छोटी संस्कृति का जन्म होता है यहां हम कहसकते हैं कि हमारे पहाड़ में जागर और ढोल की पैदाइश इस प्रकार ही हुई है। जागर का सम्बन्ध जागृत करने से है। जो एक दम मृत प्रायः हो गया और उसका पुनर्जन्म करना ही जागर है।

आपने ढोल की भी बात कही ?

उत्तराखण्डी समाज में अनादीकाल से यह सभ्यता है कि मरने से लेकर मृत्यु तक ढोल की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता होती है। जीवन जीने में जब सोलह संस्कारों का पर्दापर्ण होता है। उसमें ढोल मुख्य है। जब सोलह संस्कारों में ढोल इतना महत्वपूर्ण है तो राज्य मंे इसे भी राष्ट्रीय धरोहर के रूप में मान्यता मिले ढोल के बिना कोई भी राष्ट्रीय पर्व सम्पन्न न हो। एक बार कुछ साथियों ने ढोल के बोल लिपी बद्ध किये है। यह अच्छा प्रयास है परन्तु यह कार्य तब तक अधूरा है जब तक हम उस विद्धान तक नहीं पहंुचे जिसने ढोल को जिया होगा।

ढोल के संरक्षण की बात हर स्तर पर वर्षों से उठ रही है। आप बतायेंगें कि ढोल का संरक्षण हो गया या हो रहा है ?

ढोल का ना तो कोई संरक्षण होगा ना ही हो पायेगा। वनस्पत जब तक ढोली (बजाने व बनाने वाला) का संरक्षण व पुर्नवास नहीं हुआ तब तक यह बातें अधूरी हैं।

तो आप मानते है ढोल का संरक्षण होना चाहिए ?

उत्तराखण्ड में जब लोक संस्कृति की बात आती है तो ढोल सर्वोपरी है इसलिये हर स्तर पर ढोली और ढोल दोनो का पहले पुनर्वास हो उसके बाद संरक्षण करना आसान हो जायेगा। ढोल तो सर्वप्रथम शिव ने बनाया था जो ढोल सागर में बताया गया। आज इस ढोल सागर के साहित्य की भी नितान्त आवश्यकता है।

आप इस ओर कोई उल्लेखनीय कार्य करेगें ?

हां-हां बिल्कुल हमने लोक संस्कृति में लोक बाध्ययन्त्रों व संगीत के संरक्षण व प्रशिक्षण के लिये ’’हिम लोक कला केन्द्र’’ की स्थापना की है। जिसके माध्ययम से तमाम लोक विद्यायों पर समय-समय पर अध्ययन और कार्यशालायें आयोजित करते है ताकि भविष्य की पीड़ी इनसे वाकिफ हो व दक्ष बनें।

अन्त मंे कोई सन्देश

जवाब - मिडिया के बिना लोक संस्कृति को ऊँचाई तक पहुँचाना नामुमकिन है । यही कहना चाहूंगा कि जिस तरह समाज का रूझान लोक संस्कृति की ओर बढ़ रहा है वह निश्चित तौर पर सुखद है। सभी पाठक और श्रोताओं को मेरा प्रणाम।

Friday, September 8, 2017

रंवाई लोक महोत्सव में बीट्स आॅफ यमुना वैली की थाप पर नाच उठा पाण्डाल







प्रेम पंचोली

वैसे तो कई दफा रंवाई घाटी यानि नौगांव, बड़कोट, पुरोला व मोरी में रंवाई महोत्सव का आयोजन हुआ, पर इस बार जो नौगांव स्थित दौलत राम रंवाल्टा राजकीय इण्डरमीडिएट काॅलेज में हुआ उसकी रंगत ही कुछ और थी। यूं कह सकते हैं कि आयोजको ने खूब रिहर्सल की है या कह सकते हैं कि आयोजन से पूर्व सर्वसम्मति को स्वीकार किया होगा। कुछ भी कह सकते हैं। मगर जहां एक ओर रंगारंग कार्यक्रमो की धूम रही वहीं रंवाई क्षेत्र के वरिष्ठ साहित्यकार भी अपनी लोक भाषाओं को लेकर एक कवि सम्मेलन के मार्फत इस महोत्सव में चार-चांद लगाने पंहुच गये। उधर बीट्स आॅफ यमुना वैली की टीम महोत्सव में अपनी दस्तक देने पंहुच चुकी थी तो वही महोत्सव की खास पेशकश दौलतराम रंवाल्टा सम्मान, पतिदास सम्मान, राजेन्द्र सिंह रावत सम्मान, बर्फियालाल जुवांठा सम्मान पाने वालो की झलक देखने के लिए दर्शकदीर्घा समय से पहले ही भर चुकी थी। जबकि महोत्सव का उद्घाटन कथा वक्ता व राष्ट्रीय सन्त पं॰ सुरेश उनियाल ने इण्टरमीडिएट काॅलेज नौगांव के प्रांगण में रूद्राक्ष के वृक्ष को रोपित करके किया है।
उल्लेखनीय हो कि वरिष्ठ साहित्यकार महावीर रंवाल्टा, युवा कवि दिनेश रावत, प्रसिद्ध लोक कवि व गायक ओम बंधानी, साहित्यकार सुरेन्द्र सिंह पुण्डीर, साहित्यकार ध्यान सिंह रावत, युवा कवि व पत्रकार नीरज उत्तराखण्डी ने ‘‘रंवाई लोक महोत्सव’’ के उद्घाटन सत्र को रंवाल्टी, जौनपुरी, गढवाली कविता पाठ से मौजूद दर्शको को झकझोर कर रख दिया। आम तौर पर कविता पाठ में आम दर्शको को बांधे रखना बड़ा मुश्किल काम माना जाता था, परन्तु इस महोत्सव ने इस परम्परा को तोड़ा है। जबकि खचा-खच भरे पाण्डाल व साथ ही महोत्सव में मौजूद अतिथि पूर्व कैबिनेट मंत्री व टीएचडीसी के निदेशक मोहन सिंह रावत गांववासी, यमनोत्री के विधयक केदार सिंह रावत, पुरोला के विधायक राजकुमार, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सकलचन्द रावत, वयोवृद्ध समाजसेवी अमर सिंह कफोला, आटीबीपी सेवानिवृत डीआईजी एस. पी. चमोली सहित वरिष्ठ पत्रकार विजेन्द्र सिंह रावत ने इनकी कविताओं का ना कि रस्वादान लिया बल्कि वे अपने संबोधन में भी कवियों की कविता पर स्पष्टीकरण देते रहे। यही नहीं कविता के साथ-साथ अशिता डोभाल के नेतृत्व में रंवाल्टी रसोई का भी उद्घाटन हुआ और महोत्सव में पंहुचे अतिथियो को मंजियाली गांव की महिलाओं ने रंवाई के व्यंजन सीड़ा, डिंडिका, अस्का जैस एक दर्जन व्यंजन का स्वाद भी चखाया गया।
जब बीट्स आॅफ यमुना वैली की टीम 50 कलाकारो सहित अपने साज-बाज को लेकर एक साथ मंच पर उतरी तो पूरा पाण्डाल दर्शको की तालियों से गूंजायमान हो उठा। ऐसा पहला मौका था कि स्थानीय 20 बाध्यान्त्र और रंवाई घाटी के 30 कलाकारो के साथ एक सामूहिक प्रस्तुति जब मंच पर प्रस्तुत हुई तो एक बारगी सम्पूर्ण पाण्डाल झूमते हुए नजर आया। ‘‘बीट्स आॅफ यमुना वैली’’ नाम से हुई यह वृहद सांस्कृतिक समागम का अगाज शायद पहला अवसर था जिसे लोगो ने खूब सराहा। लोग यह भी संकेत कर रहे थे कि इस प्रकार की प्रस्तुति इस क्षेत्र में पहली बार हुई है, जहां साउण्ड वाले को भी साउण्ड प्रुफ के लिए 48 चैनल बनाने पड़े। बीट्स आॅफ यमुना वैली के बारे में जैसा बताया गया कि रंवाल्टी लोक संस्कृति को एक बड़े मंच पर लाने के लिए और लोक कलाकारो को मंच उपलब्ध करवाने व लोक कला को व्यवसाय के रूप में कैसे विकसित करें इस हेतु इस प्रस्तुति की विशेष तैयारी की गयी है। इसलिए पहले प्रयास में पहाड़ी वाद्य यंत्रों के साथ गीत-संगीत की अद्भुत जुगलबंदी के साथ-साथ शंक, भाणू (घंटी), दो रणसिंघे, दो ढोल, दो नगाड़े, की-बोर्ड, पैड, दो ढोलक, तबला, मुरली, हुड़का, हारमोनिय, मशकबीन, डौंर जैसे लोक बाध्यान्त्रो की संयमित व सधी हुई प्रस्तुतीयों को दर्शको ने खूब सराही। इस दौरान रंवाई क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक गायक महेन्द्र सिंह चैहान, अनिल बेसारी, विनोद चैहान, सुमन शाह, रेखा भारती, निधी राणा, सुरेश भारती, प्रवीन बाबा, धनेश बंगाणी, मनमोहन सिंह रावत, रणजीत रणू भाई, राज सावन सहित जौनसार के राॅकस्टार कहे जाने वाले सन्नी दयाल ने सामूहिक रूप से लोक गीतो को प्रस्तुत किया तो दर्शक दांतो तले ऊंगलियां दबा रहे थे। जबकि लोक संगीत पक्ष को सफल बनाने में सुनिल बेसारी के संयोजन में रामदास, ऐलम दास, मुकेश कुमार, कुलदीप, संदीप, प्रेम कुमार, मुकेश बेसारी, सतीश, प्रमीन, सुरेश, प्रमोद, विनोद, भगत दास जैसे सधे कलाकार लोक वाद्य के उम्दा तालो के साथ मुस्तैद रहे।
जबकि इससे पहले एक विशेष सम्मान समारोह हुआ। समाज सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले बड़कोट के डा॰ कपिलदेव रावत को दौलत राम रंवाल्टा सम्मान, उत्तराखण्ड माध्यमिक शिक्षा परिषद की परीक्षा में श्रेष्ठ श्रेणी में आने वाले छात्र रोहित उनियाल, कु॰ अनुसूया चैहान, अजय विक्रम बिष्ट व कु॰ साक्षी रावत को पतिदास मेधावी सम्मान, कृषि स्वावलम्बन के क्षेत्र में श्रीमति राजकुमारी को राजेन्द्र सिंह रावत सम्मान, साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर शिक्षक व लेखक चन्द्रभूषण बिजल्वाण को बर्फिया लाल जुवांठा सम्मान से नवाजा गया है। इस दौरान महोत्सव के मुख्य अतिथि पूर्व कैबिनेट मंत्री व टीएचडीसी के निदेशक मोहन सिंह रावत गांववासी ने कहा कि यह संस्कृति बनी रहनी चाहिए ताकि आने वाली पीढी इनका अनुसरण करे और विकास के कार्यो को सही रूप दे सके। साथ ही इनके संस्कारो को अपने जेहन में उतारे। जिन योद्धाओं के नाम से यह सम्मान पहली बार यहां दिया जा रहा है उनकी ही बदौलत आज रंवाई घाटी आबाद है। श्री गांववासी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि रंवाई घाटी तो ही है जहां की लोक संस्कृति से लेकर तमाम लोकोत्सव हर वर्ष दुनियां के पटल पर अपनी पहचान बनाती है। यह वे इसलिए कह रहे हैं कि रंवाई घाटी से लेस मात्र पलायन नहीं है। राज्य के अन्य हिस्से पलायन की बिमारी के चपेट में आ चुके हैं। इन्ही आदर्शो व संस्कारो को बनाए रखने के लिए इस ‘‘रंवाई लोक महोत्सव’’ की आवश्यकता थी। कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि यमनोत्री के विधायक केदार सिंह रावत ने कहा कि इस महोत्सव की यह पहचान बन गयी कि आने वाली पीढी को अब अपने आदर्शो को पहचानने में कोई समस्या नहीं आयेगी। कहा कि हमारी इस घाटी में इन चार महानविभूतियों ने जो इतिहास रचा उसका अनुसरण हमें करना होगा। इन्ही की दिव्य-दृष्टा के कारण यहां यातायात सुलभ हो पाया तो यहां के लोग कृषि-स्वावलम्बन के क्षेत्र में झण्डे गाड़ रहे हैं। उन्होने रंवाई लोक महोत्सव की थीम की खूब सराहना की है। श्री रावत ने कहा कि किसी भी बड़े काम को क्रियान्वयन करने में कुछ कमिया रह ही जाती है तो उसे बड़ी भूल नहीं माननी चाहिए। इसलिए कि जब आप काम करोगे तो गलतियां भी आपसे होगी, परन्तु गलतियों को सुधारने की भरसक कोशिश करनी चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पुरोला के विधायक राजकुमार ने महोत्सव में पंहुचे सभी आगन्तुको स्वागत किया। उन्होने कहा कि ‘‘रंवाई लोक महोत्सव’’ आने वाले दिनों में मील का पत्थर साबित होगा। भविष्य में इस महोत्सव को तीन दिवसीय आयोजित किया जायेगा। कहा कि इस तरह के आयोजन की यहां नितान्त आवश्यकता थी। सो भविष्य में इस महोत्सव को भव्य और विस्तारित करने के लिए सभी लोगो को आयोजन समिति का सहयोग करना होगा। यह एक ऐसा मंच विकसित होने जा रहा है जहां हम अपने प्रतिबिम्ब को देख सकते हैं।
ज्ञात हो कि रंवाई घाटी जो क्रमशः टिहरी जनपद के थत्यूड़, देहरादून जनपद के कालसी और चकराता, उतरकाशी जनपद के नौगांव, पुरोला व मोरी विकास खण्डो को जोड़कर एक बड़े कलस्टर का परिचय कराती है। इसी रंवाई घाटी के मध्यस्थल में नौगांव विकासखण्ड मुख्यालय में ‘‘रंवाई लोक महोत्सव’’ का आयोजन सामाजिक एवं पर्यावरणीय कल्याण समिति के तत्वाधान में शशीमोहन रंवाल्टा, पत्रकार विजयपाल रावत, अशिता डोभाल, श्वेता बधानी, अमिता नौटियाल, नौगांव की क्षेत्र पंचायत प्रमुख रचना बहुगुणा, जेष्ठ प्रमुख प्रकाश असवाल, टिहरी के नैनबाग क्षेत्र के जिला पंचायत सदस्य अमेन्द्र बिष्ट, हरिमोहन चैहान, नरेश नौटियाल, अमित सावन, अनिल बेसारी, सुमन शाह जैसे कार्यकर्ताओं के संयुक्त सहयोग से सम्पन्न हुआ है।
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व्यक्तित्व और उनकी वृत्ति का एक सूक्ष्म परिचय
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दौलतराम रवांल्टा सम्मान - स्व. रवांल्टा आजादी के बाद व पूर्व से ही क्षेत्र के विकास के लिए ताउम्र संघर्षरत रहे। उन्हीं की बदौलत यमुनाघाटी में दिल्ली से यमनोत्री मोटर मार्ग का निर्माण हुआ। ऐसे कई विकास के काम रवांल्टा जी के नेतृत्व में हुए जिनकी क्षेत्र में एक मिशाल कायम है। स्थानीय लोग उन्हें विकास का मसीहा मानते हैं। पहली बार उनके नाम से ऐसा आयोजन किया जा रहा है। क्षेत्रीय विकास और जनमुद्दों पर रचनात्मक कार्य करने वाले व्यक्तित्व को यह सम्मान ‘‘समाज सेवा’’ के क्षेत्र में दिया जाता है।
पति दास सम्मान - स्व. पतिदास आजादी से पूर्व प्रजामंडल की विधानसभा के सदस्य रहते हुए भी उन्होंने उन दिनों यमुनाघाटी और सम्पूर्ण पहाड़ में सभी के लिए शिक्षा जैसे अभियान कार्यक्रम का नेतृत्व किया। यही नहीं वे आजादी के बाद अंतरिम सरकार यानी उत्तर प्रदेश सरकार में भी विधानसभा सदस्य रहे। उन्होंने समतामूलक समाज की कल्पना को साकार करने के लिए सर्वोदय कार्यकर्ता के रूप में गांव-गांव कैंप फायर जैसे कार्यक्रम का नेतृत्व किया। शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ठ/मेधावी छात्र-छात्राओं को यह ‘मेधावी सम्मान’ दिया जाता है।
राजेन्द्र सिंह रावत सम्मान - स्व. रावत उत्तराखण्ड (तब उतर प्रदेश) के ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने खुद के गांव बीफ में लोक सहभागीता से चकबन्दी करवा करके चकबन्दी का आन्दोलन इस पर्वतीय राज्य में फैलाया। हालांकि राज्य बनने के बाद यह आन्दोलन सरकारी दफ्तरो की धूल फांकता रहा क्योंकि तब तक वे शारीरिक रूप से असमर्थ हो चुके थे। जबकि वे ब्लॉक प्रमुख, जिलापंचायत अध्यक्ष के पद पर रहते हुए भी वे लोगो के घर-घर विकास के कार्यों को क्रियान्वन के लिए पंहुचते थे। वे राजनीतिक कार्यकर्ता कम और एक सामाजिक कार्यकर्ता थे। वे गढवाल के पहले व्यक्ति थे जो ताउम्र लोक सेवा में रमे रहे। कृषि, स्वावलंबन की दिशा में कार्य करने वाले व्यक्तित्व को इस सम्मान से नवाजा जाता है।
बर्फियाला जुवांठा सम्मान - स्व. जुवांठा यमुनाघाटी में ही नहीं अपितु पूरे उत्तराखण्ड में विकास पुरुष के रूप में जाने जाते हैं। वे यमुनाघाटी में आशा की किरण से भी जाने जाते हैं। श्री जुवांठा ऐसे निम्न परिवार में जन्में जो कभी सपना भी नहीं देख सकते थे कि उनका यह बालक कभी इलाहबाद जैसे विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति से लेकर तत्काल उत्तर प्रदेश में विकास की एक नई इबारत लिखेगा। वे तत्काल उत्तर प्रदेश में पर्वतीय विकास मंत्री रहे हैं। उन्होंने राज्य आन्दोलन की अगुवाई में अभूतपूर्व सहयोग करके तत्काल सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी को उत्तराखण्ड राज्य के लिए अलविदा कह दिया। सौम्य स्वभाव और साहित्य रचना एवं विकास पर उनकी अच्छी पैठ थी। साहित्यकी, रचना, लोक संस्कृति व जनमुद्दों पर आधारित लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तित्व को इस सम्मान से सम्मानित किया जाता है।

Tuesday, May 30, 2017

जी हां! घर वापसी के लिए ‘‘ग्रामोत्सव’’

प्रेम पंचोली

अपनी माटी की सौंधी को लेकर दूर-देश में रोजगार कमा रहे उत्तराखण्डी अब घर वापसी के लिए ‘‘प्रवासी पंचायत’’ करने लग गये हैं। यही नहीं राज्य में 100 से अधिक गावों में घर छोड़ चुके लोगो ने अपने पुश्तैनी घरों को सरसब्ज कर दिया। यह तब हुआ जब उत्तरांचल उत्थान परिषद ने रमेश सेमवाल के संयोजन में ‘‘प्रवासी पंचायत’’ का गठन किया है। पंचायत का शुद्ध कार्यक्रम है कि दूर-देश में रोजगार के लिए जा चुके लोग कम से वर्ष में एक सप्ताह के लिए अपने घरो की ओर लौटें और अपने-अपने गांव में ‘‘ग्रामोत्सव’’ का आयोजन करें। ऐसा जून माह में पिछले चार वर्षो से देखने को मिल रहा है।

ज्ञात हो कि प्रवासी पंचायत के संयोजक रमेश सेमवाल ने ‘‘ग्रामोत्सव’’ को अपने ही गांव से आरम्भ किया। उनके गांव में 70 परिवार निवास करते थे, जहां मात्र आधा दर्जन परिवार ही गांव में रह गये थे। टिहरी जनपद के अन्र्तगत घनसाली विकासखण्ड में स्थित ऋषिधार गांव कभी खाली, सूना, बिखरा हुआ सा नजर आता था, वह अब ‘‘ग्रामोत्सव’’ के कारण हरा-भरा और लोगों की आवाजाही से मुस्कराता हुआ नजर आ रहा है। श्री सेमवाल ने प्रवासी पंचायत के संयोजक बनने के बाद पहला काम अपने गांव ऋषिधार को सरसब्ज करने का किया। उन्होने घर छोड़ चुके लोगो से सम्पर्क साधा, हाॅट्सएप ग्रुप बनाया, गांव में ही ग्रामीणो के साथ बैठकर ‘‘जय भवानी जन कल्याण समिति’’ का गठन किया और 2014 में अपने ही गांव में ‘‘ग्रामोत्सव’’ का आयोजन कर डाला। इसके बाद तो ऋषिधार गांव के लोग जो बाहर स्थाई रूप से प्रवास कर रहे थे वे वापसी का मन बनाने लग गये, और गांव की समिति की सदस्यता ग्रहण करने लग गये। मौजूदा समय में ऋषिधार गांव के सभी प्रवासी परिवार समिति के भी सदस्य है और समय-समय पर समिति के कोष में दान-चन्दा जमा करते हैं। इस तरह से समिति के कोष में हर वक्त पाच से छः लाख रूपय जमा रहते हैं। श्री सेमवाल ने बताया कि जब भी किसी ग्रामीण को धन की आवश्यकता पड़ती है तो वे बेफिक्र समिति से आर्थिक संसाधन उपलब्ध करता है और नियत समय पर बिना ब्याज जमा भी करवा देता है। यही नहीं गांव में मौजूदा समय में ग्राम विकास के लिए स्वीकृत धनराशी का शत्-प्रतिशत् उपयोग हो रहा है। ग्राम विकास में जहां कही भी आर्थिक संसाधनो की समस्या आड़े आती है तो वहां पर समिति मुस्तैद रहती है। अब तो ऋषिधार गांव की रौनक लौट पड़ी है। गांव में सफाई एवं रास्तों से लेकर पेयजल की जहां अच्छी सुविधा है, वहीं लोग जल, जंगल, जमीन के संरक्षण के लिए संगठनात्मक कार्रवाई करते हैं। गत वर्षो की भांति इस वर्ष भी गांव के लोग इसलिए उत्सुक हैं, कि जून माह के प्रथम सप्ताह में ‘‘ग्रामोत्सव’’ जो होने जा रहा है।

अब प्रवासी पंचायत से जुड़े 2500 सदस्य अपने-अपने गांवों में हर वर्ष ‘‘ग्रामोत्सव’’ का आयोजन करते हैं। जबकि पंचायत से 5000 लोग सदस्यता ले चुके हैं। बता दें कि भिलंगना ब्लाॅक में ऋषिधार गांव के आस-पास के गांव गंवाणा, महर गांव, छिटग्वाल गांव, कण्डार गांव, बजिंगा, चन्दला इत्यादि 10 गांवों के लोग भी अपने-अपने गांव में प्रवासी और गांववासी मिलकर ‘‘ग्रामोत्सव’’ का आयोजन करते हैं। यही नहीं इन गावों में खण्डहर पड़े घर अब आबाद हो गये हैं। लोग रोजगार की तलाश में कहीं भी प्रवास में रहे, मगर उनकी जड़े अब गांव में ही जम चुकी है।

काबिलेगौर यह है कि ऋषिधार गांव में सालो से बंजर पड़ी 50 एकड़ जमीन को ‘‘जय भवानी जन कल्याण समिति’’ ने सरसब्ज करने का बीड़ा उठाया है। समिति के माध्यम से इस जमीन पर ग्रामीण ‘‘चाय का बाग’’ विकसित करना चाहते हैं। हालांकि समिति ने सरकार को इस 50 एकड़ जमीन पर चाय का बागान विकसित करने का प्रस्ताव भेजा है। परन्तु प्रवासी पंचायत के संयोजक रमेश सेमवाल का मानना है कि ग्रामीणों के साथ मिलकर ‘‘चाय बागान’’ को विकसित करने का वे हर सम्भव मदद करेंगे। ताकि गांव में ही स्वरोजगार के कुछ संसाधन उपलब्ध हो सके। इसके अलाव वे गांव में हर वर्ष स्कूलों के साथ मिलकर शैक्षणिक प्रतियोगिता करवाते हैं और मेधावी छात्रो को प्रोत्साहन करते है। इस तरह जहां गांव फिर से आबाद हो उठा वहीं गांवों के स्कूलो में छात्र संख्या में भी इजाफा होने लग गया हैं।

इधर पौड़ी जनपद अन्र्तगत बडौल गांव के लोग पलायन कर चुके थे। हाल ही में प्रवासी पंचायत की हरिद्वार, दिल्ली, मुम्बई व चण्डीगढ की बैठको में बडोल गांव के 22 युवाओं ने हिस्सा लिया। वे 22 नौजवान नोयडा स्थित में प्रतिष्ठित मल्टीनेशन कम्पनी की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर अपने गांव बडौल पंहुच गये। जहां उन्होने डेयरी, गाय पालन, सब्जी उत्पादन, मशरूम जैसे स्वरोजगार के काम आरम्भ कर दिये। इस तरह टिहरी के सेमल्थ गांव, पौड़ी का चाई गांव भी लोगो से खाली हो चुके थे। पर इन गावों की रौनक अब देखते ही बनती है।

राज्य में बने प्रवासी मन्त्रालय


प्रवासी पंचायत के संयोजक रमेश सेमवाल ने बताया कि बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री के दर्शन और जागेश्वर धाम, पाताल भुवनेश्वरी, मसूरी, नैनीताल व गोपेश्वर, पंचबदरी, पंचकेदार के दर्शन के लिए आवश्यक सुविधाओं का बुरा हाल है। प्रवासी पंचायत का मानना है कि सरकार को चाहिए कि देशभर में रह रहे लोगो के लिए सरकार ‘‘ग्रामोत्सव’’ का आयोजन करे। इस तरह यदि प्रतिवर्ष 10 लाख लोग अपने मूल गांव में एक सप्ताह के लिए आते हैं तो स्थानीय स्तर पर आर्थिक आमदानी का ग्राफ थोड़ा बढ जायेगा। जबकि प्रवासी पंचायत ऐसे कार्यक्रम बना चुकी है। जिस कारण अब तक 100 गांवो में प्रति वर्ष ग्रामोत्सव का आयोजन होता आ रहा है। पंचायत की मांग है कि उत्तराखंड की विधानसभा में प्रवासी मंत्रालय का गठन किया जाए। जो देश-विदेशों में बसे प्रवासियों को गांव के विकास से जोडने हेतु विशेष प्रयास करे, और मंत्रालय विदेशों में रह रहे प्रवासियों की सुरक्षा सहित उन्हें यहाँ आर्थिक निवेश हेतु प्रेरित करे।

सरकार के नाम प्रवासी पंचायत के सुझाव

तीर्थाटन और पर्यटन को आर्थिकी का आधार बनायें। पुराने यात्रा मार्गों को पुनर्जीवित करके सामान्य नागरिक सुविधाएं जुटाई जाये। उत्तराखंड के धार, बुग्याल, ताल, खाल, प्रयाग, सैण तथा अज्ञात रमणीय पर्यटन स्थलो को विकसित किया जाय। 45 वर्ग किमी तक फैली टिहरी झील को साहसिक पर्यटन के रूप में विकसित किया जाये। पर्यटन मित्र के रूप में स्थानीय युवकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाये। चकबंदी बावत भमि बन्दोबस्त किया जाये। हिमांचल की तर्ज पर भू-उपयोग कानून बने। ‘‘मेरा गांव मेरा तीर्थ’’ की तर्ज पर राज्य के सभी धार्मिक स्थलो को पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित किया जाये। जहां पर डमकपबंस जवनतपेउए भ्मतपजंहम जवनतपेउए ळवस िजवनतपेउए ।कअमदजनतम जवनतपेउए ॅपदजमत हंउम जनतपेउए म्ब्व् जवनतपेउए ॅपसक स्पमि जवनतपेउण् के लिए छोटे-छोटे स्पाॅट विकसित करके स्थानीय युवाओं को स्वरोजगार उपलब्ध करवाया जाये।

पलायन की एक पीड़ा ऐसी

राज्य ने अपने 16 साल के सफर में पलायन को रोकने की कोई कारगर नीति नहीं बना पाई। हालात इस कदर है कि राज्य से लगभग 17 फिसदी लोग रोजगार की तलाश में हर वर्ष हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल तथा उधमसिंहनगर जैसे जिलों में आकर बस रहे है। जबकि जितनी राज्य की जनसंख्या है उतने ही लोग देशभर में रोजगार के लिए पूर्व से ही पलायन कर चुके हैं। इधर सीमांत गांव खाली होते सुरक्षा की दृष्टी से संवेदनशील बनते जा रहे हैं। यदि कारगिल की घुसपैठ को वहां के चरवाहे पता लगाकर उचित समय पर सेना को अवगत नहीं कराते तो शायद सुरक्षा की जंजीर टूट चुकी होती। मगर उत्तराखण्ड के सीमान्त गांव अब खाली होते जा रहे हैं। वहां पर ना तो कोई चरवाहे हैं और ना ही कोई स्थानीय सूचना के स्रोत हैं।



Thursday, April 27, 2017


जी हां! इस जलस्रोत पर होती है ‘‘भूत’’ की स्तुति


प्रेम पंचोली


सीमान्त जनपद उत्तरकाशी में बहने वाली यमुना नदी में सैकड़ो छोटी-छोटी जल धारायें संगम बनाती है। इनमें से एक जलधारा यमुना नदी की दायीं ओर कुड़ गांव से निकलती है। जहां से यह जलधारा निकलती है वहां इस जलधारे को ‘‘भूत राजा का पन्यारा’’ कहते हैं। अर्थात राज्य के अन्य जलधारों के जैसे इस जलस्रोत का नाम देवताओं से नही बल्कि भूत के नाम से प्रचलित किया गया है। जो पहली बार इस जलस्रोत का नाम सुनेगा, वह एक बारगी जल आचमन करने से पहले चिन्ता में पड़ जायेगा। हालांकि इस जलस्रोत से कुड़ गांव के अनुसूचित जाति के लोगो की जीवन रेखा चलती है। वे इस पानी का भरपूर उपयोग करते हैं। बस उन्हे गम है तो इस जलस्रोत के नामाकरण से। कहते हैं कि उनके आस-पास सभी जलस्रोतो का नाम देवी-देवताओं से जुड़ा है परन्तु उनके जलस्रोत का नाम ‘‘भूतराजा का पन्यारा’’ क्यों हो गया? जो भी हो इस बहाने लोग जल संरक्षण के काम से जुड़े तो हैं।

गौरतलब हो कि उत्तराखण्ड राज्य में जितने भी जलस्रोत हैं उनका नामाकरण, संरक्षण व दोहन किसी न किसी देवी-देवता के नाम लिए बिना नहीं हो सकता। अब उत्तरकाशी के ‘‘कुड़ गांव’’ में एक ऐसा जलस्रोत है जिसे ‘‘भूत के नाम’’ से जाना जाता है। कह सकते हैं कि जल संरक्षण की यह प्रवृति भूत के बिना भी अधूरी रही होगी। इसलिए इस गांव की जलधारा भूत से संबोधित होती है। भूत के नाम से वैसे भी आस्तिक लोग डर जाते है। आम तौर पर हिन्दू शास्त्रों में भूत का मतलब ही डरावना होता है। जनाबा! क्या मजाल कि लोग इस जलस्रोत का गलत दोहन कर सकें। यही वजह है कि आज भी गांव में इस जलस्रोत से निकलने वाली धारा से लोगो की जलापूर्ती पूरी होती है। कभी भी यह जलधारा सूखी नहीं है। ग्रामीण कहते हैं कि कई दौर ऐसे आये कि गर्मीयों के मौसम में यमुना का पानी भी कम हो जाता है मगर ‘‘भूतराजा’’ की जलधारा सदाबहार रही।

बता दें कि कुड़ का सीधा अर्थ कुण्ड से है यह गांव कुण्ड जैसे आकार के स्थान पर बसा है। गांव की सरहद पर यह जलधारा आगन्तुको का स्वागत यूं करती है कि पथ-प्रदर्शक गांव में पंहुचते ही इस पानी को ‘‘अंजूली’’ में लेकर अपनी थकान उतारते हैं। पर गांव में पंहुचते ही इस जलधारे का नाम सुनकर एक बार चैंक जाते हैं। खैर, कुड़ गांव के ‘‘भूतराजा’’ नाम के जलस्रोत से निकलने वाली जल धारायें आगे जाकर सैकडों नाली कृषि भूमी को सिंचित करती है। यही नहीं इस पानी से सिंचित खेतो में उपज की मात्रा भी अधिक होती है। इस गांव के सिंचित खेतो में एक अलग प्रकार की स्वादिष्ट धाना की प्रजाति का उत्पादन होता है। जिसका रंग सफेद नहीं मैरूम/लाल होता है। स्थानीय लोग इस धान की प्रजाति को ‘‘लाल चावल’’ कहते है। कुड़ गांव में अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं। कुछ लोगो का मानना है कि जाति भेद को लेकर इस जलस्रोत का नाम भूत रखा होगा। आश्चर्य इस बात का है कि राज्य में अन्य जलस्रोतो का नाम देवताओं से जोडा गया, अपितु कुड़ गांव में यह अकेला जलस्रोत है जिसे ‘‘भूत के नाम’’ से प्रचारित किया गया।

लोक मतानुसार कालातीत में इस स्थान पर भूतों का वास था, बताते हैं कि बसासत से पहले भी यह जलस्रोत विद्यमान था। मौजूदा समय में इस जलस्रोत के पास एक पत्थर की आकृति है। जिस आकृति पर एक हाथ में डमरू, एक में त्रिशूल, एक में चक्र व एक में शंख रेखांकित किया हुआ है। भले यह मूर्ति छोटी जरूर है परन्तु इसकी बनावट ही अति-आकर्षक है। देखने में यह पत्थर की नक्कासीदार आकृति ‘‘शिवा’’ की लगती है। फिर भी मूर्ती के विपरित इस जलस्रोत का नाम रखा गया है। जबकि यह आकृति भी पाण्डव कालीन बतायी जा रही है। हालांकि वर्तमान में ‘‘कुड़ गांव के भूतराजा के पन्यारे’’ का भी सौदंर्यकरण हो चुका है। लोगो की आस्था आज भी इस जलस्रोत पर पूर्व के जैसी ही बनी हुई है। ग्रामीण इस जलस्रोत की पूजा करते हैं तो इसके पानी को पवित्र भी मानते है। बस उन्हे गम है तो इस जलस्रोत के नाम से।

Monday, April 17, 2017

शराब को हिंसा या कहें राजस्व का स्रोत?

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प्रेम पंचोली
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अर्थशास्त्रीयों का कहना है कि यदि 100 में से 100 का घाटा होता है तो फिर उसी काम को आगे बढाया जा सकता है। पर 100 के स्थान पर घाटे का सूचकांक ऊपर चढ जाता है तो उस काम को छोड़ देना चाहिए। उसकी विवेचना करनी चाहिए इत्यादि। इस पंक्ति का तात्पर्य है कि राज्य में इन दिनों चारों तरफ शराब का विरोध हो रहा है। यह विरोध कोई नया नहीं है अपितु पहाड़ पर शराब का विरोध सदियों पुराना है। इस पर सरकारों को एक बार सोचना चाहिए, इसकी विवेचना करनी चाहिए कि आखिर शराब पर जनविरोध क्यों उभरकर आता है? लेकिन आज तक ऐसा हुआ नहीं। अर्थात उत्तराखण्ड में शराब के नफा-नुकसान के बारे में आगे बताया जा रहा है।
ज्ञात हो कि आजादी से पूर्व टिंचरी माई ने इस पहाड़ी क्षेत्र में शराब का घोर विरोध किया है। इसी पहाड़ी क्षेत्र में 70 के दशक में पेड़ो को बचाने के लिए ‘‘चिपको आन्दोलन’’ हुआ और बाद में ‘‘नशा नहीं रोजगार दो’’ आन्दोलन चला। इन आन्दोलनो का स्पष्ट संदेश था कि वनमाफिया और शराब माफियायों का मजबूत गठजोड़ है। एक तरफ शराब से इस क्षेत्र में असामाजिक वारदाते बढ रही है तो वहीं दूसरी तरफ इस क्षेत्र में वन विदोहन के कामो में भारी इजाफा हो रहा है। अब कौन भला जो इस पर जनहित की कार्रवाई को आगे बढाये। इधर शराब को राजस्व का स्रोत बताया जा रहा है तो दूसरी तरफ मनोरंजन का साधन इत्यादि। यह स्पष्ट है कि शराब का प्रचलन जैसे-जैसे बढता गया वैसे-वैसे लोगो में हिंसा का ग्राफ भी बढता गया। वैसे भी जबसे अंग्रेजी शराब पहाड़ चढी तब से हिंसा और महिला हिंसा की वारदाते अत्यधिक बढी है। इसका जीता-जागता उदाहरण राजस्व पुलिस और रेगुलर पुलिस के पास मौजूद विभिन्न प्रकार की प्रथम सूचना रिपोर्टे हैं। पुलिस विभाग इस बात की पुष्टी कर रहा है कि लड़ाई-झगड़े की सर्वाधिक रिपोर्टें उनके पास शराब पीने की आती है। मगर दूसरी तरफ देखें तो हमारे जननायक शराब को राजस्व का ‘‘खास स्रोत’’ बताते है। जबकि ऐसा नही है। हकीकत की तस्वीर को पलटकर देखेंगे तो शराब के पीछे का स्याह चेहरा सामने आ जायेगा। बताया जाता है अंग्रेजी शराब का 50 प्रतिशत हिस्सा विभिन्न दुकानों से विभिन्न राजनेताओं को जाता है। मात्र 20 प्रतिशत हिस्सा सरकारी खजाने में जाता है जिसे सरकार और सत्ता में बैठे जनता के नुमाईंदे राजस्व कहते है।
एक आंकलन के मुताबिक शराब की एक बोतल पर जो सरकारी राजस्व मिलता है उसके एवज में 20 गुना हिंसा समाज में उसी जगह पर घट जाती है, जहां इस शराब का कारोबार चल रहा होता है। इसे यदि कुल शराब की दुकानों के साथ जोड़ दिया जाय तो राजस्व पुलिस व रेगुलर पुलिस के पास जो आंकड़े अपमान, महिला हिंसा, जातिय हिंसा, पति द्वारा पत्नि के साथ की हिंसा, आस-पड़ोस के झगड़े बगैरह, के आंकड़ें पुष्ट हो जायेंगे की शराब का जितना भी राजस्व आ रहा है उसके 20 गुना हिंसा प्रतिवर्ष समाज में बढ रही है। यहां एक प्रमाणिक उदाहरण दिया जाना लाजमी है। मेरा एक दोस्त हाल ही में शराब व्यवसाय से जुड़ा है। वह बताता हैं कि शराब की एक बोतल की मूल कीमत मात्र 30 रूपय है जो बाजार में 100 रूपय में बिकती है। नाम ना छपवाने बावत वह आगे बताता है कि शराब से मिलने वाला राजस्व कैसे बंटता है। की जो 70 रूपय मुनाफा होता है उससे 20 रूपय तो शुद्ध रूप से सरकारी खजाने में जाता है, बाकि 50 रूपय विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं व सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरानों तक को जाता है। जिसका कोई लेखा-जोखा ही नहीं होता है। फोकट में मिलने वाला यह राजस्व हमारे नीति-नियन्ताओं की आंखो में पट्टी बांध देता है। इसलिए जनप्रतिनिधि कभी भी शराब व्यवसाय का विरोध नहीं करते। क्योंकि उसे तो 50 रूपय फोकट में मिल रहा है। अर्थात आमजन का तो शराब के व्यवसाय से नुकसान ही है। जो आये दिन अखबारो की सुर्खीया बन जाती है।
गौरतलब हो कि सत्ता की लोलुपता में चकनाचूर लोगो को शराब का ही राजस्व दिखाई देता है। अन्य राजस्व के स्रोत उनके लिए गौण हो जाते है। शराब के अलावा राज्य में राजस्व के नये स्रोत भी तो विकसित किये जा सकते है। जिससे स्वरोजगार व रोजगार को बढावा दिया जा सकता है। बता दें कि राजस्व के अन्य स्रोत राज्य में मौजूद हैं जिसकी सूचना हमारे जनप्रतिनिधि कभी सार्वजनिक नहीं करते। यानि प्रतिदिन प्रति व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला क्रय-विक्रय, कृषि उपज, सिंचाई व अन्य जल दोहन, वन दोहन/वन विकास निगम, सरकारी व गैर सरकारी कर्मीयों से मिलने वाला व वाणिज्यिक जैसे टैक्स जो नियमित राजस्व के स्रोत हैं और बढ भी रहे हैं। इस तरह के राजस्व के स्रोत जनता के नुमाईंदो को दिखाई नहीं दे रहे हैं। जबकि यह राजस्व शराब के व्यवसाय से कई गुना अधिक है व शुद्ध है। शराब के अलावा मिलने वाला राजस्व कभी भी फोकट में बंटने रह जाता हो। इस तरह के राजस्व से जो भी विकासीय कार्य क्रियान्वित होंगे वह मूल रूप  से जन साधारण के काम आते है।
उधर सरकारों की दलील है कि शराब से सालाना लगभग 900 करोड़ का राजस्व मिलता है। परन्तु सरकारें राजस्व के अन्य स्रोतो पर बात ही नहीं करना चाहती। संदेह इस बात का है कि अन्य स्रोतो से मिलने वाले राजस्व का आंकड़ा यदि आम जन के पास आ जाये तो उसका पूरा हिसाब-किताब चुकाना पड़ेगा। अर्थात जो भी खबरें भ्रष्टाचार की आ रही है वह आमजन से वसूला गया राजस्व को ठिकाने लगाने की ही होगी। क्योंकि शराब के राजस्व का हमारे जननायक खूब गीत गाते हैं, मगर अन्य स्रोतों से मिलने वाले राजस्व को अब तक किसी भी सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया। राजस्व के नाम पर इस तरह का दोगला चरित्र आमजन में अंसन्तोष पैदा कर रहा है। अगर सरकार एक तरफ शराब से लगभग 900 करोड़ का घाटा बता रही है तो वहीं दूसरी तरफ इतने ही करोड़ रूपये से अधिक के झगड़े फसाद राज्य में होते है। एक मात्र महिला हिंसा के आंकड़े निकाले जाये तो 99 फीसदी शराब परोसने से बताये जाते हैं। यही नहीं ऐसा भी एक आंकड़ा है कि 100 शादियों में से 45 शादिया शराबी पति मिलने से बिखर जाती है। शराब के कारण महिला हिंसा के अलावा बेरोजगारी, डकैती, अभद्रता, असंवेदनशीलता, आक्रामकता, इत्यादि जैसी नासूर बिमारी समाज में फैल रही है।
बिडम्बना देखिये कि शैक्षणिक माहौल राज्य में नहीं बनाया जा रहा है पर शराब का माहौल बनाने में हमारे जननायक आगे दिखते है। बताया जाता है कि सरकार को मिलने वाले कुल राजस्व में से 7 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना चाहिए था सो मात्र 2 प्रतिशत भी नहीं हो रहा है। संवैधानिक वर्जनाओं को तोड़ते हुए अब कल्याणकारी राज्य की कल्पना शराब के प्रचलन से अधूरी होते दिख रही है। क्योंकि सरकारो का ध्यान शराब पर ही है। शराब का विरोध उत्तराखण्ड राज्य में ही नहीं होता आया है। अन्य राज्य भी इसके गवाह हैं। परन्तु अन्य राज्यों में जनभावनाओं को देखते हुए शराब पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। जैसे विहार राज्य में शराब पर पूर्णरूप से प्रतिबन्ध है। यहीं महाराष्ट्र जैसा राज्य प्रतिवर्ष शराब के लिए मतदान करवाते है। यानि जहां शराब का विरोध हो रहा हो उस स्थान पर बाकायदा मतदान करवाया जाता है। महाराष्ट्र की शराब नीति में यह विशेष व्यवस्था है कि ‘‘बोतल के दो चित्र’’ होंगे। एक बोतल का चित्र खड़ा और दूसरी बोतल का चित्र पड़ा होगा। माना पड़ी बोतल पर सर्वाधिक मतदान हुआ तो उस क्षेत्र में शराब की दुकान नहीं खुल सकती और यदि खड़ी बोतल पर सर्वाधिक मतदान हुआ तो शराब की दुकान त्वरित गति से खुल जायेगी। मगर उत्तराखण्ड राज्य में जनता के नुमाईन्दे जनभावनाओं का अनादर करते स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। 16 वर्षो में जनहित के लिए शराब की कोई नीति नहीं बन पाई। उल्टे राज्य में जितने बार शराब का विरोध हुआ उतनी ही और शराब की दुकाने खोलने के प्रयास सामने आये। यहां तक कि जब महिलाओं के विरोध के आगे शराब व्यापारियों की फजीहत होने लगी तो बकायदा शराब के कारोबारी ने अपनी पत्नी के नाम से शराब की दुकान खोल दी और अमुक की पत्नी को इस संबध मे कोई मालूम ही नहीं है। शराब विरोधी आन्दोलन में कई दौर ऐसे आये कि जिस महिला के नाम से शराब की दुकान चल रही थी वह तो शराब विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व कर रही थी। कुलमिलाकर शराब के विरोध का तात्पर्य सरकारो को समझने की जरूरत है।

चिन्ता-ए-आबकारी विभाग

 आबकारी विभाग बता रहा है कि शराब का व्यवसाय इस वर्ष बन्द होता है तो सरकार को 930 करोड़ का नुकसान का अनुमान है। राज्य में 2016-17 में शराब की 526 दुकाने थी। सो भविष्य के लिए 311 शराब की दुकानों का पैसा आबकारी विभाग में जमा हो चुका है। सहायक आयुक्त आबकारी डी. एस. चैहान कहते हैं कि राज्य में कुल शराब की दुकानो में से अमूमन 10-12 प्रतिशत शराब की दुकाने महिलाओं के नाम से आंबटित होती है। परन्तु जिन महिलाओं के नाम से दुकाने आबटित होती है उन्हे मालूम ही नहीं कि शराब की दुकान कैसे चलती है। नाम महिला का और कारोबार पुरूष चलाता है। उन्होने बताया कि राज्य की एक मात्र महिला अनिता शर्मा जो हरिद्वार जिले में स्थित धनपुरा में थी वे खुद के बलबूते शराब की दुकान का संचालन करती थी। उधर अपर आयुक्त आबकारी डी.वी. सिंह के मोबाईल न॰ 9927328578 पर बात करके यह जानकारी मांगनी चाही कि राज्य में पिछले वर्ष कितनी महिलाओं के नाम से शराब की दुकाने आबंटित हुई है, वे इस बात पर आग बबूल हो गये। कहा कि उनके पास इस तरह की जानकारी नहीं है। वे इतने गुस्से में आये कि अपने पद की जिम्मेदारी छोड़कर यह बताने लगे कि वे ऐसी-वैसी जानकारी नहीं रखते। इसके बाद उन्होने फोन काट दिया।

मामला वैधानिक व अवैधानिक शराब का

राज्य में जब-जब शराब का विरोध होता है तब एक सवाल कौतुहल का विषय बन जाता है कि परंपरागत शराब को बाजार उपलब्ध क्यों नहीं होता? क्या यह परंरागत शराब राजस्व का स्रोत बन सकती है? ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड हिमालय क्षेत्र की जनजातियां स्थानीय उत्पादों और जड़ी-बूटियों से शराब को परंपरागत रूप से बनाते है स्वयं के उपयोग के लिए, जिसे वे दवा-दारू कहलाते हैं। इस दवा-दारू का स्थानीय नाम पैलफुल की, घेंघटी, घणीसूर, छंग, कीमा के पाथ की दारू इत्यादि है। इस शराब के परोसने के ढंग भी अंग्रेजी शराब से जुदा है। स्थानीय लोग इस परंपरागत शराब को खुद ही बनाते है। इस परंपरागत शराब को पीने के शैकीन इसे कटारो में पीते हैं। पीने के बाद खूब गीत-नृत्य होता है। गले लगते है। प्यार, मोहब्बत की बाते होती है। अतएव अब तक इस शराब के असमाजिक कारण सामने नहीं आ पाये। परन्तु यह परंपरागत शराब संवैधानिक रूप से अवैध मानी जाती है। इस शराब को बनाते वक्त यदि कोई आम नागरिक पकड़ा गया तो वह कानूनन अपराध की श्रेणी में आ जाता है और सजा, दण्ड आदि का भागी बन जाता है। ऐसे दर्जनो घटनाऐं सामने आई है। अपितु जब अंग्रेजी शराब या दूसरी वैधानिक शराब के कारण असामाजिक घटनाऐं सामने आती है, उस पर लोगो को कानून का पाठ पढाया जाता है।

एक अन्यायपूर्ण निर्णय की दास्तां

आन्दोलनकारी संगठनो का आरोप है कि हमारे जनप्रतिनिधि शराब के नशे में इतने मदमस्त हो गये कि जिस नारी को वे पूजनीय, सृष्टी की जननी व देवी कहते हैं उस नारी की एक भी समस्या आज इनके नजरो से शराब के उस जहरीले पानी से धुल गयी है। उत्तराखण्ड महिला मंच सहित तमाम जिलो के आन्दोलनकारी संगठनो का आरोप है कि जिस सड़क के लिए ग्रामीण मर-मिट गये कि उनके गांव की सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग के अन्र्तगत आये वह मार्ग आज एक जहरीले शराब नामी पदार्थ के बहाने जिला मार्ग बनाया गया। उनका आरोप है कि क्या यह निर्णय सरकार का न्याय संगत है? यदि न्याय संगत होता तो सरकार को न्यायालय के निर्णय को सर्वोपरी मानना चाहिए था।

Monday, April 10, 2017

प्रकृति-पर्यावरण शिक्षा ही स्वावलम्बन का मूल आधार


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प्रेम पंचोली
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क्या रोजगार नीति युवाओं को लिए मौजूदा समय में मुफिद है? हमारी शिक्षा हमें सिर्फ सरकारी रोजगार के लिए प्रेरित करती है? स्वावलम्बन का पाठ हमारी विषय वस्तु नहीं बन पायी? अंग्रेजी और हिन्दी में खतरनाक द्वन्द चल रहा है? अंग्रेजी माध्यम से अध्ययनरत युवाओं को सरकारी और गैर सरकारी रोजगार मिल रहा है, पर हिन्दी माध्यम से पास आऊट युवा रोजगार की तलाश ही करते रहते हैं? सिर्फ अंग्रेजी बोलना ही लोगो का स्टेटस बनता जा रहा है? यह दो तरह के समाज का निमार्ण कर रहा है? उत्तराखण्ड राज्य में 16 वर्षो बाद भी कोई रोजगार की कारगर नीति सामने नहीं आई है? यह सवाल विश्व युवा केन्द्र दिल्ली के सहयोग से आयोजित टिहरी के बूढाकेदारनाथ में लोक जीवन विकास भारती व पर्वतीय शोध केन्द्र हेमवन्ती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढवाल के सुयक्त तत्वाधान में ‘‘युवा स्वावलम्बी जीवन विकास प्रशिक्षण’’ विषय पर हुई दो दिवसीय कार्यशाला में राज्यभर से आये शिक्षित युवा बेरोजगारो ने खड़े किये हैं।
इस कार्यशाला में मुख्य संसाधन व्यक्ति पर्वतीय शोध केन्द्र गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर के निदेशक डा0 अरविन्द दरमोड़ा व पर्यावरणविद् सुरेश भाई ने शिक्षित बेरोजगारो की शंकाये तो बातचीत से दूर की है, मगर नीति और योजनाओं पर उनके सवाल आज भी बरकरार है। उन्होने कार्यशाला में उठाये गये सवालो के समाधान और कार्यक्रम बताने की भरसक कोशिश की है। पर्वतीय शोध केन्द्र के निदेशक डा0 अरविन्द दरमोड़ा ने बताया कि उत्तराखण्ड वन बाहुल्य राज्य है, इसलिये अनिवार्य ‘‘हिमालय नीति’’ की नितान्त आवश्यकता है। इस नीति के अन्दर रोजगार नीति, लघु उद्योग नीति जैसे बिन्दु को प्रमुखता से सम्मलित करना होगा, ताकि राज्य के युवा स्वावलम्बन की ओर आगे बढ सके। सलाह दी कि जो लोग गांव में स्वतः कृषि कार्य से जुड़े है उन्हे प्रमुख रूप से मनरेगा का फायदा मिलना चाहिये। गांव में चारा-ईधन की सुलभ व्यवस्था होनी चाहिये और आपदा प्रबन्धन की सुलभ नीति बननी चाहिये। उन्होने यह भी बताया कि इस राज्य में कृृषि और फलोत्पादन का कोई समर्थन मूल्य नही है। इसलिये स्वावलम्बन की दिशा में अवरोध पैदा हो रहे है। यही नहीं उन्होने नैतिक शिक्षा और उद्यमिता शिक्षा को अनिवार्य रूप से शैक्षणिक विषयों में सम्मलित करने की वकालत की है।
पर्यावरणविद् सुरेश भाई ने बताया कि भले उत्तराखण्ड में कृषि योग्य भूमि कम हो इस कारण राज्य का युवा रोजगार की तलाश में गांव छोड़ कर चला जाता है मगर राज्य में कृषि को जीविका से जोड़ने के वास्ते चकबन्दी करनी जरूरी है। परन्तु, उन्होने सवाल खड़ा किया कि चकबन्दी से पहले राज्य के भूमिहीनों के बारे में सरकार को एक सफल नीति बनानी होगी ताकि चकबन्दी जैसा कार्यक्रम समता का रूप ले पाये। उन्होने कार्यशाला में युवाओं से जानना चाहा कि क्या पानी का किराया बढ़ना चाहिए ? यह सवाल कौतुहल का विषय इसलिये है कि वर्तमान सरकार ने जलकर जिस तरह से बढाया है वह निश्चित रूप से उत्तराखण्डवासियों के लिये सकंट पैदा करने वाला है क्योंकि पानी से ही जीवन और जीविका जुड़ी है। अर्थात इस तरह के अनैतिक निर्णय युवाओें को भारी मात्रा में प्रभावित करता है।
कार्यशाला में कृषि विश्वविद्यालय चिरबटिया के अधीष्ठाता डा0 भगवती प्रसाद नौटियाल ने युवाओं का ध्यान कृषि स्वावलम्बन की ओर खींचा। उन्होने कहा है कि उत्तराखण्ड में बहुविविधता के प्राकृतिक संसाधन है जो आजीविका के साधन बन सकते है, परन्तु एक मात्र कृषि को जीविका से जोड़ना थोड़ा सा कठिन है क्योकि राज्य में कृषि की जमीन मात्र 13 प्रतिशत है जिसमे सींचित जमीन नाम मात्र की है इसलिये राज्य में स्वावलम्बन विकास के लिये जैव-विविधता को रोजगार से जोड़ना होगा। वे उदाहरण दे रहे थे कि उन्होने मात्र 25 नाली जमीन पर कलमी अखरोट की खेती आरम्भ की, जिससे सालभर में रू0 दो लाख की आमदानी हुई है। बताया कि अखरोट का एक पेड़ 200 रू0 का मुनाफा काश्तकार को देता है। इसके अलावा उत्तराखण्ड में 12 हजार प्रकार के शिल्प हैं जिसे शिल्प उद्योग का दर्जा दिया जा सकता है जबकि 40 प्रकार के ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं जो युवाओं को स्वावलम्बन की ओर जोड़ सकता है। बशर्ते राज्य में एकीकृत विकास नीति की दरकार है। यह भी बताया कि अकेले उत्तराखण्ड के जंगल पूरी दूनियां को लगभग 36 हजार करोड़ रूपय की सेवा दे रहे है।
कार्यशाला में हेमवन्ती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो0 मोहन पंवार ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद तीन तरह के त्वरित परिवर्तन हुये है जिनमे जलवायु, राजनैतिक व जनांकीकी। इस परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित उत्तराखण्ड राज्य का युवा हुआ है। उन्होने सलाह दी की उत्तराखण्ड मे समावेशी विकास के लिये ‘‘ग्रामोत्सव’’ जैसे कार्यक्रम बनने चाहिये। इस हेतु छोटे-छोटे जलागम क्षेत्रों में शोध कार्य, संगठनात्मक निर्माण, जन पैरवी, व बौद्विक सम्पदा को संयुक्त रूप से एक कार्यक्रम के तहत आगे बढाना होगा। उन्होने दूरस्थ क्षेत्र प्रतापनगर का एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुये कहा कि पटूड़ी गांव की 90 महिलाये ‘‘औरगेनो’’ जैसे पिज्जा मसाला की खेती करती है और वे एक साल में प्रति महिला 1.50 लाख रू0 की आमदानी करती है। इसलिये ऐसे स्वावलम्बन की दिशा में युवाओं को जोड़ने की नितान्त आवश्यकता है। इस दौरान लोक जीवन विकास भारती के संस्थापक व शिक्षाविद् बिहारी लाल जी ने कार्यशाला में मौजूद प्रतिभागियों का अभिवादन किया तो वहीं तरूण पर्यावरण विज्ञान संस्था के प्रमुख नागेन्द्र दत्त ने इस दौरान का सफल संचालन किया है। 
चर्चा के सूत्रधार
कार्यशाला में लोक जीवन विकास भारती के मंत्री जयशंकर नगवान, भिलंगना विकासखण्ड के उप शिक्षा अधिकारी भुवनेश्वर प्रसाद जदली, उद्यान विभाग के चतरसिंह, विश्व युवा केन्द्र दिल्ली के प्रवीन कुमार शर्मा, सत्य प्रसाद जोशी, पर्यावरण कार्यकर्ता साहबसिंह सजवाण, जन विकास संस्थान के अध्यक्ष व ग्रामीण अभियान्त्रिकी बैशाखी लाल, धीरेन्द्र प्रसाद नौटियाल, किशोरी लाल नगवान, नागेन्द्र दत्त, शिक्षक जगदीश बंगरवाल, बीरेन्द्र सिंह नेगी, हर्षमणि उनियाल, अनिता शर्मा, लक्ष्मी विष्ट, कीर्तिनगर से अदन संस्था के रणजीत सिंह जाखी, महेन्द्र प्रसाद नाथ, सीताकोट गांव की ग्राम प्रधान अतरा देवी, रक्षिया गांव के ग्राम प्रधान महेश चन्द्र रमोला, थाती गांव की ग्राम प्रधान कैलाशी देवी, क्षेत्र पंचायत सदस्य थाती हिम्मत सिंह रौतेला, क्षेत्र पंचायत सदस्य भिगुन मनोज लाल, रा0 इ0 का0 के प्रधानाचार्य कमलदास निराला, चेतना आन्दोलन के विनोद बडोनी, पूर्व प्रधान बावन सिंह विष्ट, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य सत्य प्रसाद जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता विष्णु प्रसाद नौटियाल, पूर्व प्रधान कुण्डी उत्तमलाल, जाड़ी संस्था उत्तरकाशी की राधा पंवार, अब्बल लाल सहित राज्य भर के सैकड़ो युवा और युवतियों ने इस कार्यशाला में युआवों का भविष्य कैसे हो और वे स्वरोजगार से कैसे जुड़ सकते हैं।

अनसुलझे सवालों का एक रोडमैप 



कार्यशाला में चकबन्दी से पहले भूमिहीनों को भूमि दिलवाने की बात प्रमुखता से सामने आयी तो वहीं गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का अभाव ही युवाओं में भटकाव पैदा करने वाली समस्या भी उजागर हुई। रोजगार नीति में प्रबंधन का अभाव है, जैसे भावनात्मक सवाल कार्यशाला में खुलकर सामने आये। यह उदाहरण आया कि पड़ोसी राज्य हिमांचल में सड़े हुये फलों का भी समर्थन मूल्य काश्तकारों को मिलता जबकि उत्तराखण्ड में इस तरह की कोई नीति नहीं है। वन बाहुल्य राज्य में हिमालय नीति की नितान्त आवश्यकता है। लघु उद्योग नीति का अभाव तो गांव में चारा-ईधन की सुलभ व्यवस्था नहीं है। कृषि को जीविका से जोड़ने के वास्ते चकबन्दी करनी जरूरी है। परन्तु, चकबन्दी से पहले राज्य के भूमिहीनों के बारे में सरकार को एक सफल नीति बनानी होगी। उत्तराखण्ड में 12 हजार प्रकार के शिल्प हैं जिसे शिल्प उद्योग का दर्जा दिया जा सकता है, जबकि 40 प्रकार के ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं जो युवाओं को स्वावलम्बन की ओर जोड़ सकता है। इधर राज्य बनने के बाद तीन तरह के त्वरित परिवर्तन हुये है जिनमे जलवायु, राजनैतिक व जनांकीकी। इस परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित उत्तराखण्ड राज्य का युवा हुआ है। प्रतापनगर के पटूड़ी गांव की 90 महिलायें ‘‘औरगेनो’’ जैसे पिज्जा मसाला की खेती करती है और वे प्रति महिला 1.50 लाख रू0 की आमदानी सालभर में करती है।

मैट्रो सीटी में ही क्यों? अब नौगांव में भी मिलेगी वही शिक्षा




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प्रेम पंचोली
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यमुना घाटी राज्य का एक ऐसा क्षेत्र हैं जहां पलायन नाम की कोई चीज नहीं है। इसलिए इस घाटी की राज्य में अलग ही पहचान है। अब एक और प्रयोग कर डाला शशीमोहन रावत ने। की जो स्कूलिंग मैट्रो सीटी में मिलती है, क्या? यह यमुना घाटी के सूदूर नौगांव में नही मिल सकती? जी! हो सकती है। यह झलकियां तब सामने आई जब पिछले दिनों ‘‘यमुना वैली पब्लिक स्कूल’’ का वार्षिक उत्सव सम्पन्न हुआ। इस दौरान वरिष्ठ साहित्कार डा॰ हेमचन्द सकलानी, राज्य के चर्चित रंगकर्मी नन्दलाल भारती, वरिष्ठ राजनीतिक व चिन्तक सकलचन्द रावत, व्यापारी नेता जगदीश असवाल, लेखक इन्द्र सिंह नेगी, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक अतर सिंह पंवार, रिवर्स पलायन का चर्चित चेहरा रमेश सेमवाल तो वही मौजूदा जिला पंचायत उत्तरकाशी की अध्यक्षा जशोदा राणा, पूर्व जिला पंचायत सदस्य सोबेन्द्र सिंह रावत, छात्र नेता नीतिन रमोला स्कूल परिवार अभिभावक संघ के अध्यक्ष शिक्षक भजन सिंह पंवार व क्षेत्र पंचायत सदस्य केदार सिंह चैहान, यशवन्त रावत, राष्ट्रीय स्वयं सेवक के वरिष्ट प्रचारक श्री बिजल्वाण, श्री सेमवाल एक साथ इस स्कूल की प्रंशसा करने में पीछे नहीं दिखे।
ज्ञात हो कि यमुना वैली पब्लिक स्कूल जहां अपने शिक्षण कार्य से अन्य विद्यालयों के जैसे अध्यापन का कार्य कर रही है उससे हटकर इस विद्यालय के प्रयोग ‘‘नई शिक्षा पद्धति’’ के अनुकूल सामने दिखी। बच्चो में इस दौरान उत्साह ही नहीं था वे विश्वास से इतने लबरेज थे कि उनकी प्रस्तुति ही स्कूल का भविष्य दिखा रहा था। विद्यालय की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए विद्यालय के प्रबन्धक शशीमोहन रावत ने जो अपने वक्तव्य में बताया कि वे बच्चों के साथ सिर्फ सीखाने का कार्य नहीं करते, अपितु वे तो सीखने व सीखाने का दोनो कार्य करते हैं। इस कारण बच्चों की दक्षता को अच्छी तरह से समझने का मौका मिलता है। वे परिसर में कम्प्यूटर शिक्षा, गणित हिन्दी, अंग्रेजी, विज्ञान के साथ-साथ परिवेशीय शिक्षा के लिए भी विशेष सत्र चलाते है। उनका मानना है कि इस विद्यालय के बच्चे जहां भाषाई ज्ञान से शिक्षित हों वहीं वे आज की आधुनिक शिक्षा से भी जुड़ सके। इसलिए उन्होने विद्यालय के सभी दस्तावेज आॅनलाईन करने के प्रयास कर दिये हैं। की अमुक का बच्चा स्कूल कब आया, कब गया, और स्कूल में अमुक बच्चे की प्रस्तुति व प्रगति कैसी है, इसकी सूचना सीधी अभिभावक के मोबाईल में एक मैसेज के मार्फत प्रतिदिन मिल जायेगी। यही नहीं उन्होने बताया कि वे स्कूल में अध्यापको से लेकर बच्चों के साथ किताबों से बाहर के अनुभव के शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य समय-समय पर करते रहते हैं। कहा कि अब समय आ गया कि रटने से नहीं बल्कि ‘‘करके सीखने’’ से बच्चो के विकास में नये प्रयोग होंगे।
दिलचस्प यह है कि आम तौर पर स्कूलो के वार्षिक उत्सवों में रंगारंग कार्यक्रम और स्कूल की प्रगति के अलावा कुछ विशेष प्रस्तुति दिखने को नहीं मिलती। परन्तु यमुना वैली पब्लिक स्कूल के बच्चो ने अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में समाज के लिए एक संन्देश देने का काम किया। ‘‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’’ की नृत्य नाटिका में बच्चो की मार्मिक प्रस्तुति ने एक बारगी के लिए मौजूद लोगो को सोचने के लिए विवश कर दिया। यही नहीं समाज के लिए एक सवाल खड़ा किया कि क्या बिना महिला के नये समाज की रचना की जा सकती है? इस प्रस्तुति को देखते ही देखते दर्शको की आंखे भर आई। कुलमिलाकर यमुना पब्लिक स्कूल ने यह सन्देश दे दिया कि जिस तरह से यमुना घाटी में पलायन नहीं है उसी तरह आने वाले दिनों में लोग शिक्षा के लिए कमसे कम यमुना घाटी से पलायन नहीं करेंगे। जबकि इस दौरान सभी वक्ताओं ने स्कूल की प्रधानाचार्य सीमा रावत, तकनीकी शिक्षिका गीता गुसाई और सभी शिक्षको की प्रसंशा इस मायने में की कि संसाधनो के अभाव में भी ऐसे शिक्षको ने शिक्षण कार्य बाध्य नहीं होने दिया। स्कूल की प्रगति और स्कूल परिवार के दृढ संकल्प को देखते हुए जिला पंचायत अध्यक्षा जशोदा राणा ने स्कूल प्रांगण की चार दिवारी के लिए दो लाख भी स्वीकृत किये।

Wednesday, March 8, 2017


उनके दुत्कार से संघर्ष की इबारत लिख डाली

प्रेम पंचोली

उसे क्या मालूम था कि उसकी कर्मभूमि अपने देश और पड़ोसी देश नेपाल की सीमा पर होगी। वह तो पहाड़ी थी। उसके माता-पिता सरकारी सेवा में पहाड़ से उतरकर देहरादून के रैवासी हुए तो उसकी परवरिश भी देहरादून में ही हुई। पढाई के दौरान से ही उसके मन में समाज सेवा की ललक कूट-कूट के भरी थी, सो वह पढाई पूरी करके देहरादून में शिक्षण कार्य से जुड़ गयी। मगर कुछ ही अर्से में उसे देहरादून से लखीमपुरखीरी के पास भीरा नामक गांव में अध्यापन के लिए जाना पड़ा। संघर्ष की यह लम्बी गाथा देहरादून के बहुगुणा परिवार में जन्मी और तिवारी परिवार में ब्याही गयी ‘‘रचना बहुगुणा’’ की है। लखीमपुरखीरी में तो लोग ‘‘रचना बहुगुणा तिवारी को रचना भीरा’’ नाम से जानते हैं। रचना के संघर्ष की एक लम्बी फेहरिस्त है। वह मौजूदा समय में महिलाओं के लिए एक नजीर भी है।
बता दें कि साल 1986-87 के दौरान रचना परिणय सूत्र में बंधी और सोचा था कि वह अपने पहाड़ में ही शिक्षा के निमित जनसेवा में जुटेगी। ब्याह के बाद रचना और रचना के पति को घर से बाहर रहना पड़ा यानि कि किराये के घर में। जहां उन्होने अपनी आजीविका के लिए बड़े संघर्ष किये। यहां तक कि मसाला पीसकर आजीविका के साधन जुटाये। रचना और रचना के पति का काम रचना के ससुराल पक्ष को हजम नहीं हुआ। इस तरह उनके सामने खुद की दक्षता को संवारने और आजीविका को जोड़ने का एक बड़ा सवल था। वे रोजगार के लिए कई दौर के विभिन्न साक्षात्कार दे चुके थे। वे उच्चशिक्षित थे तो उन्हे मालूम था कि उत्तराखण्ड (तत्काल उत्तर प्रदेश) में कोई न कोई  काम मिल ही जायेगा। लेकिन उनकी किस्मत को ऐसा नागवार गुजरा। एक दिन रचना ने किसी पब्लिक स्कूल के लिए साक्षात्कार दिया तो उनका चयन लखीमपुरखीरी के लिए कर दिया गया।
नब्बे के दशक दौर था। राज्य में बेरोजगारी, राज्य की तमाम व्यवस्थाऐं पटरी से उतर चुकी थी अधिकांश शिक्षित बेरोजगार या तो हारकर घर बैठ गये थे या दूर शहर में पलायन कर रहे थे। उत्तरप्रदेश का यह हिस्सा उन दिनो अलग राज्य के आन्दोलन की तैयार कर रहा था। राज्य में अव्यवस्थाओं का अंबार पसरा था। रचना के सामने एक तरफ अव्यवस्थाओं से पसरा संकट और दूसरी तरफ ससुराल पक्ष से असहयोग की समस्या थी जो उनके हुनर के सामने संकट खड़ा कर रहे थे। हालांकि रचना ने कुछ समय देहरादून स्थित चिल्ड्रेन एकेडमी में भी अध्यापन का काम किया। परन्तु यह काम ससुराल पक्ष की अपेक्षा के विपरित था। सो उनके साथ उनके पति का समर्थन था तो वे लखीमपुरखीरी के लिए चल दिये और कुछ दिन रचना ने लखीमपुरखीरी में ही दूसरी स्कूलो में अध्यापन का कार्य किया।
रचना ने देखा कि लखीमपुरखीरी अति बिहड़ क्षेत्र, नेपाल की सीमा से लगा हुआ क्षेत्र, सरकारी स्कूलो की इतने खस्ताहाल कि सिर्फ व सिर्फ कागजीखानापूर्ती के लिए स्कूलो को चलाया जा रहा था। रचना के मन में तो वही समाज सेवा का जूनून उबल रहा था। उससे रहा नहीं गया और अपने रोजगार का जो अध्यापन का काम था उसे छोड़कर दूरस्थ गांव ‘‘भीरा’’ को अपनी कर्मस्थली बना डाली। साल 1995-96 में ‘‘महारज अग्रसेन एकेडमी’’ नाम से एक प्राईमरी स्कूल का श्रीगणेश कर दिया। शिक्षण कार्य के दौरान रचना ने जो कुछ धनराशी बचा रखी थी उसे इस स्कूल पर खर्च कर दी। अति दुर्गम गांव, गांव में राजनेता नही उनके प्रतिनिधि ही सिर्फ वोट मांगने आते हैं, बरसात के दिनों लोग अपने ही घर में सुरक्षित महसूस नहीं करते, मालूम नहीं कब पानी में उनका आशियाना डूब जाये। विकास के नाम की अराजकता इतनी कि कोई यदि पैरवी करे तो उसका भविष्य अन्धकार में। ऐसी परिस्थिति में रचना ने एक नई शुरूआत भीरी गांव में कर डाली। पहले-पहल रचना को कई तरह की जैसे राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मगर धीरे-धीरी रचना की रचनाधर्मिता लोगो के सामने आई। आज रचना उत्तरप्रदेश के लखीमपुरीखीरी क्षेत्र में एक जानी पहचानी चेहरा उभरकर आई है। यही नहीं समाजवादी सरकार जब-जब उत्तर प्रदेश में रही तो सरकार के लोग शिक्षण कार्य के लिए रचना का उदाहरण देते रहे है। मौजूदा समय में तो रचना के काम की प्रसंशा करने में भाजपा के लोग भी पीछे नहीं रहते।
रचना कहती है कि इस काम में उनके पति का अहम योगदान रहा है। उनकी संस्तुति नहीं होती तो वे आज इस मुकाम पर नहीं होती। वर्तमान में रचना द्वारा संचालित उच्च प्राथमिक स्कूल में 700 बच्चे अध्ययनरत है। वे बहुत खुश है। उसकी छोटी बहन रूद्रपुर में एडीएम पद पर है। एक भाई है जो अपने काम में तल्लीन है और बहुत खुश है। रचना के चार बच्चों में से बड़ी बेटी मेडिकल सांईस पासआऊट हैं तो बड़ा बेटा भी एमटेक करके भीरा गांव से 15 किमी दूर पर एक प्राईमरी स्कूल संचालित कर रहा है। जबकि दो बच्चे अपनी आगे की पढाई में मशगूल है। पारिवारिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभाना और अन्य सामाजिक कार्यो में बढ-चढकर हिस्सा लेना कोई रचना से सीखें। ऐसा उनके बारे में चर्चाओं का माहौल गर्म रहता है। माता-पिता रचना के काम की सरहना सुनते ही फूले नहीं समाते। कहते हैं कि रचना का संघर्ष आज भी उनके रौंगटे खड़े कर देता है। रचना कहती है कि कर्मयोगी बनो और सफलता की सीढीया खुद व खुद पार हो जायेगी।

समाज सेवा ही उनका जूनून


प्रेम पंचोली
राज्य की महिलाऐं उन्हें गीता गैरोला से नही जानती वे तो उन्हे गीता ‘‘दीदी’’ कहकर पुकारती है। दीदी का मायने उनके लिए संरक्षिका जैसा होता है। सच में गीता दीदी के संज्ञान में जब भी महिला उत्पीड़न की खबर आई होगी वे दौड़ी-दौड़ी वहीं पंहुच जाती है। वह चाहे कफनौल गांव की मीना को बेचने का मामला हो या प्रतापनगर में कमलेश्वरी के बलात्कार का मामला हो या दूसरी तरह महिलाओं से संबधित पारिवारिक समस्या हो। सभी समस्याओं को वे सकारात्मक रूप से सुलझाने का प्रयास करती है। यही वजह है कि उनके द्वारा की गयी पारिवारिक कैन्सलिंग से सौ फीसदी परिवार टूटने से बचे है। इसके अलावा वे समाज में मौजूद जातीवाद को एक गहरा कंलक मानती है। इसलिए वे लगातर लोगो के साथ ऐसा संवाद कायम कर रही है कि ‘‘वाद’’ जैसे विवाद से लोगो को बाहर आना चाहिए। जी! हां इसलिए तो वे आज सभी की गीता दीदी हैं।
बता दें कि उच्च शिक्षित परिवार में जन्मी गीता गैरोला ने कभी सरकारी सेवा की तरफ नही देखा। घर से बाहर तक सामाजिक समता के लिए राज्य में एक मिशाल कायम करने का उनका मिशन आज भी जारी है। साहित्य में गहरी रूचि, मुद्दों पर पैनी नजर, समतामूलक समाज को स्थापित करने के लिए संघर्ष जारी। वर्तमान में केन्द्र पोषित योजना महिला सामाख्या की जिम्मेदारी के साथ-साथ साहित्य सृजन जारी। वे राज्य की वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवियत्री हैं।
जिला पौड़ी गढवाल के भट्टी गांव में जन्मी गीता गैरोला किशोरावस्था से ही पत्र-पत्रिकाओं से जुड़ी रही और लगातार उनकी कविता, लेख तथा कहानियां प्रकाशित होती रही। यही नहीं उत्तराखण्ड के शराबबंदी आन्दोलन, जल, जंगल, जमीन के हक के लिए आन्दोलन तथा उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में वे सक्रीय रही हैं। वे रूची के अनुसार 1989 से महिला समाख्या कार्यक्रम से जुड़ी और निष्ठापूर्वक पर्वतीय क्षेत्र की महिलाओं के साथ उनके हक, अधिकारों के लिए लगातार कार्य करती रही।
वे नैनीताल से प्रकाशित महिला पत्रिका ‘‘उत्तरा’’ की भी संपादक समूह की वरिष्ठ सदस्य है। महिला सामाख्या कार्यक्रम के अन्र्तगत विभिन्न लेखिकाओं की आत्म कथाओं के अंशो का संकलन ‘‘ना मैं बिरवा ना मैं चिरिया’’ नाम से प्रकाशित। इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्र की महिलाओं की आत्मकथाओं को संकलित करके ‘‘बोल कि लव आजाद हैं तेरे’’ नाम से प्रकाशित। अपने सामाजिक सरोकारो के अनुभव यानि कि अपने कार्यक्रम के दौरान के संस्मरणो को एकत्रित करके ‘‘माल्यों की डार’’ नाम से पुस्तक प्रकाशित। जबकि ‘‘नूपीलान की मायरा पायबी’’ जैसी कालजय काव्य संकलन प्रकाशित। वर्तमान में श्रीमति गैरोला महिला सामाख्या उत्तराखण्ड की राज्य परियोजना निदेशक के पद पर कार्यरत है।
 

Thursday, January 12, 2017

प्राकृतिक संसाधनो के दोहन और संरक्षण को जन घोषणा पत्र


प्रेम पंचोली


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विभिन्न आध्यात्मिक संस्थाओं, आन्दोलनकारी समूहों, पंचायत प्रतिनिधियों, स्वयंसेवी संगठनों, बुद्धिजीवियों, के साथ आयोजित वार्ताओं व जनसंवाद के दौरान यह दस्तावेज तैयार किया गया है। इस दस्तावेज को आगामी विधानसभा चुनाव-2017 से पहले सभी प्रमुख राजनैतिक दलों के अध्यक्षों को इस आशा के साथ सौंपा जा रहा है कि जनता के इस घोषणा पत्र पर सभी दल विचार करेंगे और अपने-अपने संबधित दलों के घोषणा पत्र में इसे स्थान देंगे।
(सुरेश भाई-जन घोषण पत्र के मुख्य संपादक और पर्यावरण मामलो जानकार)
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उत्तराखण्ड राज्य में भी 15 फरवरी 2017 को विधानसभा चुनाव होने हैं। जहां सभी राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के नये तौर-तरीके अपना रहे हैं वही पिछले दिनों सीमान्त जनपद उत्तरकाशी में सर्वदलीय व विभिन्न मोर्चो से जुड़े कार्यर्ताओं ने मिल बैठकर चुनाव को मध्यनजर रखते हुए एक ‘‘जन घोषणा पत्र’’ तैयार कर डाला और विभिन्न राजनीतिक दलो को प्रेषित किया गया। इस पत्र में बताया गया कि समाज में बाल मजदूरी, महिला कष्टमुक्ति, प्राकृतिक संसाधनों से चलने वाली आजीविका यहाँ तक कि रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे गंभीर विषयों पर मौलिक सोच का जनप्रतिनिधियों में बड़ा अभाव दिखाई देता है, या उसे नजरअंदाज करके भूला दिया जाता है। जन घोषणा पत्र में जहां विकास के संतुलन की बात कही गयी है वहीं पर्यावरण के सवाल भी प्रमुखता से उठाये गये। यह पत्र बताता है कि राज्य बनने के बाद से इस राज्य की राजनीतिक पार्टीयां यह भूल गयी की राज्य के प्राकृतिक संसाधन उपभोग की वस्तु नही है वरन् प्राकृतिक संसाधन जीवन जीने के साधन है जिनका दोहन व संरक्षण एक रूप में करने की नितान्त आवश्यकता है।
 
इस पत्र में बताया गया कि उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति के पीछे लोगों की प्रबल इच्छा थी कि उनका पलायन रुकेगा, जल, जंगल, जमीन पर उन्हें अधिकार मिलेगा, पर्यटन से आम आदमी का रोजगार चलेगा। पहाड़ी राज्य की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुये योजनायें चलाई जायेगी। ये सब बातें अब तक राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों के हिस्से ही नहीं बन पायें हैं। घोषणा पत्रों के माध्यम से वे ऐसा आश्वासन दे रहे है, जिससे आम आदमी भ्ूामिहीन, वनहीन, जलहीन, आवासहीन होने के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य का निजीकरण करके उसे भूखमरी और बेरोजगारी की स्थिति में खड़ा कर रहे हैं। प्रहसन यह है कि पर्वतीय क्षेत्रों में छोटे किसानों की आपदा में जिस तरह से जमीन, आवास, जंगल, रास्ते, नदियां, पहाड़ बर्बाद होते जा रहे हैं, उसको बचाने के दलीय राजनीतिक प्रयास भी कम्पनियों के माध्यम से हो रहे हैं। यह ताजा उदाहरण है कि टिहरी-उत्तरकाशी में सन 2010. 2011. 2012. 2013 में आयी आपदा के पुर्ननिर्माण का कोई भी रोड़ मैप प्रभावित समाज के साथ नहीं बनाया गया है। दलित, अल्पसंख्यक, विधवा महिलायें, बालमजदूरी से पीड़ित परिवारों को आपदा के दौरान मिली मुआवजा राशि से भी अलग-थलग रखा गया है। 
उत्तराखण्ड में बाढ़, भूकम्प, भूस्खलन की बार-बार घटनायें होने के बाद भी सड़कों का निर्माण, बांधों का निर्माण, मलवों के ढेरों का निस्तारण जान बूझकर ऐसे स्थानों पर हो रहा है जो भूगर्भशास्त्रियों ने फाल्ट लाइन के रुप में चिन्हित किया है। इस हिमालय राज्य के पर्वतों की संरचना के अनुसार विकास के दावे खोखले नजर  आ रहे हैं। कभी वे हिमालय प्राधिकरण और कभी हिमालय नीति में सुर मिलाकर हिमालय क्षेत्र के प्रति अपनी असंवेदनशीलता को दर्शाते रहते हैं। 

ज्ञात हो कि ग्रामीण विकास के नाम पर पर्यावरण संरक्षण के राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र एक जैसे हैं। उन्होंने कभी भी पर्यावरण और विकास के बीच सृजनात्मक संबंध बनाने की बात नहीं की है। ‘‘जन घोषण पत्र’’ में विभिन्न राजनीतिक संगठनो से अपील की गयी कि वे पर्वतीय जनता की आवश्यकतानुसार जल, जंगल, जमीन के चीरस्थाई विकास के मानक इस पत्र के अनुसार तैयार करे और इसे अपने घोषणा पत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बनायें। इस जन घोषणा पत्र में प्रमुख रूप से प्रत्येक ग्रामीण जीवन को स्वच्छ पानी निःशुल्क प्राप्त करने की बात कही गयी है। जल पर स्थानीय जनता का स्वामित्व रहे, उसे इसके संरक्षण, संवर्द्धन में स्थानीय परम्परा, संस्कृति व ज्ञान के आधार पर विकास की योजना बनाने की स्वायŸाता हो। किसी गांव अथवा नगर के पास पानी का उपयोग बाहरी क्षेत्रों के लिए करने से पहले सम्बन्धित पंचायतों/निकायों की आपसी स्वीकृति अनिवार्य हो। पानी से सम्बन्धित विभाग गांव, क्षेत्र व जिला पंचायतों की विकेन्द्रित व्यवस्था के साथ विलीन हो जायें। जल संरक्षण के लिए यह आवश्यक होगा कि स्थानीय जल संस्कृति व ज्ञान के आधार पर संवर्धन हो, चाल-खाल, मेड़बंदी, टेªक निर्माण, वर्षा जल संग्रहण, चैड़ी पŸाी के वृक्षों का रोपण आदि राज्य विकास में अनिवार्य माना जाये। और प्राकृतिक जलस्रोत संरक्षण में सीमेण्ट की दीवारों के निर्माण पर प्रतिबन्ध हो। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए न्यूनŸाम 100 लीटर प्रति व्यक्ति/मवेशी और शहरी क्षेत्रों को 100 लीटर प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन पेयजल और घरेलू उपयोग के पानी का अधिकार दिया जाये।

यह ‘‘जन घोषणा पत्र’’ कहता है कि प्रत्येक गांव में पंचायती वनों का गठन किया जाये, जिसका क्षेत्रफल गांव की आबादी के अनुसार तय किया जाये। वन पंचायतों का गठन आरक्षित वनों से किया जाये। इसके लिए प्रथम श्रेणी के उन वनों को प्राथमिकता दी जाये जिन्हें 1964 में आरक्षित वनों में मिला दिया गया था। वन पंचायतें पूर्णतः स्वायŸा इकाइयां हो जिनमें वन विभाग की भूमिका मात्र तकनीकी सलाहकार की होगी। इस तरह प्रत्येक गांव का अपना वन हो। इसके अलावा आरक्षित एवं संरक्षित क्षेत्रों में जनता के परम्परागत अधिकारों की पुर्नबहाली की जाये, तथा नये संरक्षित क्षेत्रों का गठन केवल मानव हस्तक्षेप विहीन क्षेत्रों में ही किया जाये। जंगलों में लघु वन उपज को निकालने एवं विपणन का अधिकार ग्राम सभाओं के पास हो। संरक्षित क्षेत्र (वन) 10 वर्षों से अधिक नहीं होना चाहिए। इस पत्र में यह भी अपील की गयी कि अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकार की मान्यता) अधिनियम 2006 को राज्य में प्रभावी ढंग से लागू किया जाये, व अन्य परम्परागत वन निवासी शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हुए समूचे पर्वतीय क्षेत्र को इसमें शामिल किया जाये। ताकि आपदा प्रभावितों को भी वनभूमि पर आवास बनाने एवं कृषि करने की स्वीकृति दी जा सके। ग्रीन बोनस का इस्तेमाल करने के लिए राज्य स्तर पर एक रोड मैप तैयार होना चाहिऐ। इसके लिए ग्रीनिंग बढाने वाले समाज व सामाजिक कार्यकर्ताओं को निर्णायक भूमिका में शामिल करना चाहिये। विशेषकर रसोई गैस को पर्वतीय गांवो के प्रत्येक परिवार को 50 प्रतिशत की छूट पर मिलना ही चाहिए।

इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली सूअर, बंदर, लंगूर, भालू सहित समस्त जानवरों एवं पक्षियों द्वारा की जा रही क्षति को मुआवजे के दायरे में लाया जाय। सूअरों द्वारा किये जा रहे नुकसान पर दी जा रही मुआवजा राशि को बढ़ाया जाय। इन जानवरों से फसल सुरक्षा हेतु कृषि भूमि के चारो ओर तकनीकि पद्धति से घेराबंदी की जाय। यह पत्र मांग करता है कि राज्य में कृषि को रोजगार बनाने बावत समान भू-नीति लागू की जाये। बेनाप भूमि को वन भूमि के दायरे से बाहर कर उसे ग्राम पंचायत को सौंपा जाय। उŸाराखण्ड में पैमाइश करवायी जाय। महिलाओं को किसान का दर्जा दिया मिले। ग्राम पंचायत के समस्त भू-अभिलेखों को ग्राम पंचायत/नगर पंचायत के पास रखने का नियम बनाया जाये। सीलिंग एक्ट को प्रभावी ढंग से लागू किया जाय। सीलिंग से प्राप्त भूमि को भूमिहीनों में बांटने के लिए भूमि बैंक का गठन किया जाये। प्रत्येक स्वतंत्र परिवार को न्यूनŸाम 63 नाली भूमि आवंटित की जाये। कृषि भूमि या बागवानी योग्य भूमि का गैर कृषि व्यवसायिक उपयोग हेतु पूर्ण रूप से प्रतिबंधित हो। भूमि बन्दोबस्त व स्वैच्छिक चकबन्दी का कार्य अविलम्ब शुरू किया जाये। कृषि जोत का रकबा बढ़ाने के लिए वृक्षहीन भूमि का रकबा वन विभाग के कब्जे से मुक्त कर राजस्व विभाग के नाम पर दी जाय। थारू, बोक्सा व वन राजि, वन गूजर, वन टोंगिया जैसी जनजातियों का जो हिस्सा लगातार पुस्तैनी जमीन से वंचित हो रहा है उनकी भूमि तथा भूमि सुधार पर ध्यान दिया जाये। पंचायती राज संस्थाओं को अपनी सीमा में बेनाप भूमि के पट्टे व लीज देने का अधिकार हो। सिंचाई साधनों जैसे नहरों गूलों को केवल सिंचाई हेतु ही नहीं बल्कि घराट व सूक्ष्म जल विद्युत हेतु भी निर्मित किया जाये।  

जन घोषणा पत्र में उठाये गये अन्य सवाल

उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के बाद किसी भी राजनीतिक दल ने आम आदमी के साथ मिलकर ऐसा प्रयास नहीं किया है कि वे कैसा उत्तराखण्ड चाहते हैं। किस तरह से आम आदमी के जीवन एवं जीविका सुरक्षित रह सकती है। कैसे राज्य के नौकरशाह, नेता मिलकर आम आदमी के द्वार पर जाकर उनकी समस्याओं को सुने और समाधान करे। इस पर कोई राजनीतिक संस्कृति नहीं बनाई गयी है। यह जरुर है कि चुनाव जीतने के बाद कुछ बड़े नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री हो जाते हैं और छुटभैया नेता अपने ही दलों के कार्यालयों में जाकर लालबती के लिये धरना प्रदर्शन करते हैं। सांसद और विधायक निधि भ्रष्टाचार की निधि है। इस निधि से जन प्रतिनिधि अपने चहेतों की प्यास बुझाते हैं बाकी आम आदमी के हिस्से का आम चूसकर चैराह पर छोड़ देते हैं। इसके कारण शेष विभागों में भ्रष्टाचार की असीमित गुजांइशें देखी जा सकती है और यही खेल पांच वर्ष तक होता रहता है।

बी0पी0एल0 सर्वे के लिए पर्वतीय क्षेत्रों की विषम परिस्थितियों के अनुकूल मानक तय करे जिससे कि वास्तविक लाभार्थी बी0पी0एल0 श्रेणी में आ सके। पंचायती राज एक्ट में गांव सम्बन्धी सारी योजना एवं निर्णय ग्राम सभा स्तर पर लिए जाएं। क्षेत्र एवं जिला स्तरीय निर्णय क्रमशः क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत स्तरों पर लिये जायें। इन योजनाओं के लिए धन उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की हो। पंचायतों में महिला बजटिंग का प्रावधान होना चाहिए। ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, न्यायपंचायत, जिला पंचायत उम्मीदवारों व प्रतिनिधियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था दो माह तक होनी चाहिए। पटवारी, पंचायत मंत्री, पतरौल और पर्यटन गांव की व्यवस्था में सौंपे जाने चाहिए। 

इस जन घोषण पत्र में जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनो के संरक्षण व दोहन के लिए रोड मैप बताया गया उसी तरह शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे समाज कल्याण के कार्यो को निजी हाथों में सौंपने पर प्रतिबन्ध की बात कही गयी। सभी को निःशुल्क एवं अनिवार्य रूप से समान एवं गुणवŸाा पूर्ण शिक्षा सुनिश्चित कराना राज्य का दायित्व हो, तथा कुल बजट का कम से कम 30 प्रतिशत अनिवार्य रूप से शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए, व बच्चे का तात्पर्य 0 से 18 वर्ष तक की उम्र से माना जाये। प्रारम्भ से माध्यमिक तक की शिक्षा को सरकार तत्काल अनिवार्य रूप से अपने हाथों में लें। न्याय पंचायत स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाये, चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की पर्याप्त व्यवस्था की जाये। इसके अलावा बाल अधिकार/बाल संरक्षण, महिला नीति, विधायक/सांसद निधि, चुनाव सुधार, रोजगार, नागरिकता के अधिकार, जल विद्युत परियोजनाएं, निर्माण कार्य, उद्योग, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य, वानिकी, आपदा प्रबंधन, हिमालय नीति, गंगा की निर्मलता एवं अविरला, भ्रष्टाचार/जन लोकपाल जैसे संवेदनशील मुद्दो पर सभी राजनीतिक दलो को एक कार्ययोजना अपने घोषणा पत्र में रूपष्ट रूप से बतानी होगी जैसा कि इस जन घोषणा पत्र में बताया गया है। और सत्ता पाने के बाद इन पर अनिवार्य रूप से क्रियान्वयन करना होगा। 


जल संरक्षण के लिए एक अभियान, हेंवल जागर





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प्रेम पंचोली

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साल 2016 के अन्तिम माह के उत्तरार्द्ध में गांधी चिन्तक, साहित्यकार और ‘‘आज भी खरे हैं तालाब’’ जैसी कालजय रचना के लेखक अनुपम मिश्र का इस दुनियां से विदा होना इस सदी की सबसे बड़ी दुर्घटाओं में एक है। लोग उन्हे स्मरण करते हुए जल संरक्षण के नाम पर एक अभियान के रूप में आगे बढा रहे हैं। इसलिए टिहरी जनपद के हेंवल घाटी में जल संरक्षण के लिए ‘‘हेंवल जागर-स्मृतियों में अनुपम भाई’’ नाम से स्कूलो, समूहो, संगठनो के मध्य जाकर ‘‘जल संरक्षण अभियान’’ के नाम से जन जागृति संस्था खाड़ी, हिमालय सेवा संघ दिल्ली, हिमकाॅन संस्था साबली संयुक्त रूप से लोगो को प्रेरित कर रहें हैं कि जलस्रोतों का संरक्षण होगा तो नदियों का अस्तित्व भी बचा रहेगा। विशेषकर ये संगठन स्कूली बच्चों के साथ मिलकर इस अनुभव को साझा कर रहे हैं। 

इस अभियान में सम्मलित वरिष्ठ सर्वोदयी नेता व बीज बचाओ आन्दोलन के सूत्रधार धूम सिहं नेगी ने युवाओं को आह्नान करते हुये कहा कि शिक्षा के साथ-साथ जल, जंगल जमीन की महत्ता का ज्ञान भी बच्चो का पंसदीदा विषय बनना चाहिए। शिक्षक और कवि सोमवारी लाल सकलानी ‘‘निशान्त’’ ने ‘‘हेंवल जागर’’ साथ चलो कविता के माध्यम से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। कविता में हेंवल जागर, चम्पारण यात्रा एवं अनुपम मिश्र के कार्यों को सरल भाषा में बताते हुये हेंवल जागर को समय की मांग बतायी। सर्वाेदयी कार्यकर्ता व पत्रकार साहब सिहं सजवाण ने जनगीत के माध्यम से अपने विचारों को रखते हुये जलस्रोत संरक्षण और खेती से युवाओं के जुड़ने की बात कही। वरिष्ठ पत्रकार महिपाल नेगी ने चम्पारण की परिस्थितियों को वर्तमान सन्दर्भों से जोड़ते हुये युवाओं को अपने स्तर पर मामूली परिवर्तन के माध्यम से गांधी और स्वराज के विचारों से जुड़ने के लिये प्रेरित किया। ठक्कर बापा छात्रावास के कुंवर सिहं सजवाण ने चिपको कवि घनश्याम शैलानी की कविता के माध्यम से अभियान से जुड़ने के लिये युवाओं को आगे आने की अपील की। हिमालय सेवा संघ के मनोज पांडे ने अनुपम मिश्र के कृत्यों को ‘‘जल संरक्षण’’ के लिए महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि श्री मिश्र की कालजय रचना ही पानी की जरूरत और दोहन की सही प्रक्रिया बताती है। राइका जाजल के लक्ष्मण सिहं रावत ने विद्यालय और शिक्षक संघ के द्वारा अभियान को सहयोग करने का संकल्प दिया।

‘‘हेंवल जागर-स्मृतियों में अनुपम भाई’’ अभियान के साथ टिहरी जनपद की हेंवल घाटी के सभी इण्टर काॅलेज, हाईस्कूल, जूनियर व प्राथमिक विद्यालयों को जोड़ा जा रहा है। इस हेतु विद्यालयों में छात्र व शिक्षकों के साथ मिलकर ‘‘हेंवल क्लब’’ का गठन भी किया जा रहा है। ये क्लब भविष्य में अपने-अपने विद्यालयों के परिसर में जल संरक्षण के कार्यों को आगे बढायेंगे ऐसा संकल्प इस अभियान के दौरान लिया जा रहा है। ज्ञात हो कि दूसरी तरफ विद्यालयों के अलावा हेंवल जागर के मार्फत यह अभियान सुरकण्डा से शिवपुरी तक यानि 30 किमी के दायरे में मौजूद गांवों की महिलाओं, युवाओं और किसानों के साथ मिलकर जलस्रोतों के संरक्षण के लिए जागरूकता कार्यक्रम भी चला रहे हैं। यही नहीं हेंवल क्लब से जुड़े छात्र आने वाले दिनों में हेंवल नदी की वर्तमान स्थिति पर अध्ययन रिपोर्ट भी सामने लायेंगे। 

10 जनवरी 2017 से आरम्भ हुआ ‘‘हेंवल जागर-स्मृतियों में अनुपम भाई’’ अभियान के प्रथम चरण का समापन 28 फरवरी को एक सम्मेलन के माध्यम से खाड़ी में किया जायेगा। इस दौरान अभियान में सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम सिहं पवांर, दुलारी देवी, शीशपाल भण्डारी, गुलाब सिहं नेगी, समीरा, सुनीता, आरती, भारती, सविता, विकास, बड़देई देवी, शौर्य रावत सहित 60 से अधिक लोग सम्मलित हैं। अभियान का नेतृत्व हिमालय सेवा संघ के मनोज पाण्डे, जन जागृति संस्था के अरण्य रंजन, हिमकाॅन संस्था के राकेश बहुगुणा संयुक्त रूप से कर रहे हैं।


गांधी जी की चम्पारण यात्रा के 100 वर्ष 


गाँधी जी की चम्पारण यात्रा को वर्तमान सन्दर्भों में समझने के लिए पिछले दिनों जागृति भवन खाडी टिहरी गढवाल में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर हेंवल नदी के संरक्षण के लिए चलाये जा रहे अभियान “हेंवल जागर-स्मृतियों में अनुपम भाई” पर चर्चा करते हुए प्रसिद्ध गांधीवादी एवं “आज भी खरे हैं तालाब” के लेखक अनुपम मिश्र को समर्पित किया गया। सनद रहे कि चम्पारण यात्रा किसानो को अंग्रेजों के शोषण से मुक्त करके खेती किसानी के हक दिलाने के लिए की गयी थी। श्री मिश्र ने भी जीवन के 68 बसन्त पानी के संरक्षण के लिए दिये। इस बावत गांधी और श्री मिश्र के रचनात्मक काम हेंवल और अन्य सभी छोटी बड़ी नदियों पर प्रासंगिक होती है। वर्तमान में पानी, खेती और जमीन हाथों से निकलती जा रही है और युवा अपने संसाधनों से विमुख हो रहे हैं। इन विषयों को केन्द्रीत करके अभियान की शुरूआत की गयी है।

हेंवल जागर-स्मृतियों में अनुपम भाई को समर्पित सोमवारी लाल सकलानी ‘‘निशान्त’’ की एक कविता

हेंवल-सौंग लघु सरिताओं से, 
जागृति गीत उमड़ते हैं. 
नयनाभिराम दृष्य सदा हो, 
घाटी प्राण में बसते हैं।। 
हेंवल-सौंग लघु सरिताएं, 
गंगा-यमुना जैसी पावन हैं 
प्राण प्रोषिता ये सरिताएं, 
जीवन रस नित भरती हैं।। 
उद्गम स्रोत हेंवल-सौंग का, 
दिव्य सुरकूट पर्वत है,
चतुर्दिशाओं में इस पर्वत के, 
नदियाँ निर्मल बहती है।। 
जल स्रोतों के संरक्षण को, 
नई क्रांति अब आयी है, 
हेंवल गढ़ जागर के द्वारा, 
जन जागृति भर आई है।।
नागिन जैसी शुभ सरिताएं, 
नाद नया नित भरती हैं,
चंचल चित हेंवल सरिता, 
घाटी की प्यास बुझाती है।।
गढ़ जागर जागृति के द्वारा, 
जन जागरूकता आई है, 
जल स्रोतों की पहल यह, 
संरक्षण पा भायी है।।
खारा पानी सिन्धु भरा है, 
सागर का पानी खारा है, 
छन कर जो पर्वत से आया, 
वह जलस्रोत व् धारा है।। 
स्वच्छ पवन-जल जंगल माटी, 
देवों को भी दुर्लभ है, 
हेंवल सम नदियों का पानी, 
पीने लायक निर्मल है।। 
जागृति गीतों के माध्यम से, 
जन जागृति जग आई है, 
नयी पहल हेंवल जागर की, 
जल जीवन आस जगाई है।। 
गांधी का स्वप्न आज फिर, 
देव भूमि साकार हुआ, 
चम्पारण घटनाक्रम भी, 
सौ साल इतिहास बना।।
चलो नदी की ओर मनुज तुम, 
जल जंगल जीव पहचान करो,
गांधी के सपनों का भारत, 
नव जागृति भर पूर्ण करो.
नदियाँ तुम्हें पुकार रही हैं, 
आँचल में आ प्यार भरो।। 
शीतल मीठे स्वच्छ नीर पी, 
बिन औषधि के स्वस्थ बनो, 
जल जीवन जागृति जागर है, 
जन जागृति की नयी पहल, 
जल स्रोतों के संरक्षण से, 
सुंदर सुगठित देह महल।। 
नयी पहल है नया जागरण, 
नव स्फूर्ति भर, कर्म करो 
जल संचय संरक्षण के बल, 
गढ़ हेंवल जागर गान करो, 
अनुपम मिश्र, गांधी चम्पारण।।
सौ साल पूर्व यह काम किये, 
हेंवल जागर नयी पहल है, 
जन जागृति यह नाम दिए, 
हे देव भूमि के हिमपुत्रों तुम, 
नया जोश अरमान भरो. 
कवि “निशांत” पुकार रहा है, हेंवल जागर साथ चलो।।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...