Saturday, July 15, 2023

झगड़े की अंह, नुकसान जनता का

झगड़े की अंह, नुकसान जनता का

By - Prem Pancholi 


यमुना घाटी के रवाई पत्रकार संगठन और अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी उत्तरकाशी के बीच पिछले 4 महीनों से तनातनी बढ़ी हुई है। रवांई घाटी पत्रकार संगठन ने अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी उत्तरकाशी के विरोध मोर्चा खोल दिया है। जबकि इधर अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी उत्तरकाशी पर अब तक किसी भी प्रकार के आरोप सामने नहीं आए है। स्वयं जिलाधिकारी उत्तरकाशी एक बात से अनविज्ञ हैं कि अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी उत्तरकाशी और रवाई पत्रकार संगठन के मध्य क्यों टकराहट बढ़ी है। उनके अनुसार अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी कार्य के प्रति समर्पित अधिकारी है।


दरअसल अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी पर रवाई घाटी पत्रकार संगठन ने जो आपत्ती या अनियमितताएं की खबर प्रस्तुत की है उसकी अब तक कोई भी प्रामाणिकता सामने नहीं आ पाई है। जबकि इस अहम के झगड़े की जानकारी महानिदेशक सूचना बंशीधर तिवारी से लेकर मुख्यमंत्री तक की टेबल तक है। इधर अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी उत्तरकाशी के समर्थन में उत्तरकाशी अनुसूचित जाति संगठन एवम् उत्तराखंड समता अभियान ने एक पत्र मुख्यमंत्री को प्रेषित किया है।

अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी उत्तरकाशी सुरेश कुमार ने इस संवादाता को दूरभाष पर बताया कि वे नियमित जिले के सभी पत्रकारों को सूचनाएं पहुंचाते हैं। जो उनकी विभागीय जिम्मेदारी भी है। इस मामले को लेकर जब जिले के मुख्यधारा के वरिष्ठ पत्रकारों से जानकारी मंगीं गई तो वे भी इस झगड़े से इत्तेफाक नहीं रखते। इस झगड़े में यहां इस बात का जिक्र किया जा रहा है कि रवाई घाटी पत्रकार संगठन से जुड़े कुछ पत्रकार और जिला अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी उत्तरकाशी के बीच की लड़ाई बेबुनियादी रूप से आगे बढ़ी है। बताया जा रहा है कि यह लड़ाई इसलिए भी आगे बढ़ी कि अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी कभी सूचना मुख्यालय उत्तरकाशी में एक सामान्य सहायक के पद पर तैनात थे, जब से उनकी पदोन्नति हुई तब से जिले के कुछ पत्रकारों और अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी के बीच टकराहटा बढ़ी है। मामला जो भी है इस टकराहट के कारण जिले में हो रहे विकास के कार्यों की सूचना आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रही है, जिसका खामियाजा उत्तरकाशी जिले के तमाम ग्रामीण भुगत रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि आभासी दुनिया के मंच पर जब यह खबर प्रसारित हुई तो अलग अलग प्रतिक्रिया सामने आई। यहां तक कि एक प्रतिक्रिया में बताया गया कि एक पत्रकार के निजी अखबार के अनियमित होने पर जिले से विज्ञापन छपने बन्द हो हुए, तो पत्रकार ने अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। यह बात कितनी सच है जो जांच का विषय है। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार बताया जा रहा है कि निजि स्वार्थों की पूर्ति के लिए पत्रकारों के संगठनो का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है।

कर्मचारियों के विभिन्न संगठनों का कहना है कि अतिरिक्त जिला सूचना अधिकारी सुरेश कुमार की जांच विभाग कर सकता है, वैसे भी अमुक अधिकारी के पास कोई वितीय पावर नही है। जबकि कतिपय पत्रकार जो पत्रकारिता की आड़ में कई अवैध व्यवसाय कर रहे है उनकी जांच कौन करेगा? यही अहम सवाल खड़ा हो गया है। इधर रंवाई घाटी पत्रकार संगठन का मानना है कि कौन ऐसा पत्रकार है जो अवैध व्यवसाय से जुड़ा है। उनका नाम भी उजागर होना चाहिए। दिलचस्प यही होगा कि इस झगड़े के करण सरकार ऐसे संगठनों व पत्रकारों की भी जांच अवश्य करवाए ताकि अधकचारी जानकारी से आम जनता को बचाया जा सके।

नाम न छपवाने बावत कुछ लोगो का कहना है कि पत्रकारिता के नाम पर अधिकारियों एवं विभागों से भत्ता वसूली की जाती है। कभी अहम का सवाल खड़ा किया जाता है। कभी अहवेलना का मसला सामने आता है। मगर इन झगड़े वाले पत्रकारों ने कभी ऐसी खबर प्रसारित नहीं कि की विकासीय योजनाएं आम लोगो तक किस रूप में पहुंचाई जा रही है। लोगो का यह भी कहना है कि चाहे वह खबर फाइल कापी में छप जाए तो भी गनीमत है। फिर भी इस तरह के अखबार मालिक सूचना अधिकारी से लेकर उच्च अधिकारीयो तक अखबार को नियमित करने का दबाव बनाते है। यदि ऐसा है तो यह भी सबसे बड़ा भष्ट्राचार होगा।











Friday, July 14, 2023

मिशन चंद्रयान-3 का आज सफल प्रक्षेपण

मिशन चंद्रयान-3 का आज सफल प्रक्षेपण 



श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण कर दिया गया है इसके साथ ही भारत इतिहास रचने को तैयार है। इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने चंद्रयान-3 के सफल प्रक्षेपण हेतु पूरी टीम को बधाई दी है। उन्होंने उम्मीद जताई है सब कुछ सही रहा तो आगामी 23 अगस्त को चंद्रयान 3 चंद्रमा पर उतरेगा।

लैंडर विक्रम को किया गया और मजबूत
चंद्रयान-3 को आज दोपहर 2:35 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया। चंद्रयान-3 में चंद्रयान-2 के मुकाबले काफी कुछ बदलाव किया गया है। लैंडर विक्रम के पैरों को ज्‍यादा मजबूत किया गया है। नए सेंसर लगाए गए हैं। सोलर पैनल से उसे लैस किया गया है। एक सबसे बड़ा बदलाव जो हुआ है वह है लैंडिंग एरिया का बढ़ाया जाना।वहीं एक दिन पहले इसरो ने बताया कि एमआरआर बोर्ड ने प्रक्षेपण को अधिकृत कर दिया है। इसरो ने प्रक्षेपित किए जाने वाले चंद्रयान-3 मिशन के लिए संपूर्ण प्रक्षेपण तैयारी और प्रक्रिया का 24 घंटे का प्रक्षेपण पूर्वाभ्यास किया। मिशन को प्रक्षेपण यान मार्क 3 (एलवीएम3) से प्रक्षेपित किया जाना है। इस पूरे मिशन का खर्च 615 करोड़ है।

भारत का अब तक का चंद्रयान सफर
चंद्रयान-1
भारत का पहला चंद्रयान मिशन 22 अक्टूबर 2008 को को लॉन्च किया गया था। इसमें एक ऑर्बिटर और एक इम्‍पैक्‍टर चांद की ओर भेजा गया था। 8 नवंबर 2008 को चांद की कक्षा में पहुंचा। यह मिशन दो साल के लिए था। चंद्रयान-1 ने चांद की सतह पर पानी के संकेत खोजे।

चंद्रयान-2
20 अगस्त 2019 को चंद्रयान-2 को चांद की कक्षा में पहुंचाया गया। 7 सितम्बर को विक्रम लैंडर को चांद पर फाइनल लैंडिंग होनी थी लेकिन चांद की सतह से कुछ दूरी पर ही इसका ISRO से संपर्क टूट गया। हालांकि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर अभी भी चांद की कक्षा में अपना काम कर रहा है।

चंद्रयान-3
चंद्रयान-3 मिशन चंद्रयान-2 का ही अगला चरण है, जो चंद्रमा की सतह पर उतरेगा और परीक्षण करेगा। 14 जुलाई को भारत अपना चंद्रयान-3 लॉन्च कर रहा है। यह मिशन इसरो के चंद्रयान-2 मिशन का फॉलोअप मिशन है। चंद्रयान-3 में इस बार ऑर्बिटर नहीं जा रहा है, केवल एक लैंडर और रोवर जा रहा है। 23 या 24 अगस्त को यह चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग की कोशिश करेगा। यह मिशन भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बना देगा।

Chandrayaan-3 

Tuesday, July 11, 2023

स्वयं के व्यवहार में लाना होगा कि हम पॉलिथीन का कदापि प्रयोग नहीं करेंगे, प्लास्टिक कचरे से दिन प्रतिदिन जलवायु परिवर्तन

 Sakshi Pancholi


पॉलिथीन यानी प्लास्टिक से बना एक जार यह एक ऐसा पदार्थ है जिसके कारण जल मृदा और वायु तीनों प्रकार के प्रदूषण फैलते हैं।साथ ही यह मानव जीवन के लिए भी हानिकारक है। अगर प्लास्टिक का उपयोग इसी तरह बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब प्लास्टिक की वजह से मानव सभ्यता का नामो निशान ही मिट जाएगा।


हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने प्लास्टिक उन्मूलन कार्यक्रम की शुरुआत की है। प्लास्टिक हटाओ, पर्यावरण बचाओ अभियान 2019 का आगाज ऐतिहासिक रिज मैदान से किया गया था। राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने 12 सौ प्रतिभागियों को शिमला के रिज मैदान से 14 अलग-अलग जगहों के लिए हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को प्लास्टिक का प्रयोग न करने की शपथ दिलाई, पर्यावरण के प्रति जागरूकता में वृद्धि के साथ यह स्पष्ट किया है कि हम एक स्थाई समाज बनाने के लिए और अधिक कुछ कर सकते हैं। अगर हम में से हर एक छोटे छोटे कदम उठाएं और कुछ अलग विकल्पों की सहायता लें तो निश्चित रूप से दुनिया की मूल सुंदरता और संसाधन को बहाल करने का रास्ता निकल आएगा।


दरअसल प्रकृति और मानव ईश्वर की अनमोल एवं अनुपम कृति है। प्रकृति अनादिकाल से मानव की सहकारी रही है। लेकिन मानव ने अपने भौतिक सुखों वह इच्छाओं की पूर्ति के लिए इसके साथ निरंतर खिलवाड़ किया है और वर्तमान समय में यह अपनी सारी सीमाओं को पार कर चुका है। स्वार्थी एवं उपभोक्तावादी मानव ने प्रकृति यानी पर्यावरण को पॉलिथीन के अधाधुंध प्रयोग से जिस तरह प्रदूषित किया है वह करता ही जा रहा है। इस कारण संपूर्ण वातावरण पूरी तरह आहत हो चुका है।

आज के भौतिक युग में पॉलिथीन के दूरगामी दुष्परिणाम एवं विषैले प्रदूषण से लेकर हमारा समाज इसके उपयोग में इस कदर आगे बढ़ गया है मानो इसके बिना उनकी जिंदगी अधूरी है।


हालांकि प्लास्टिक निर्मित वस्तुएं गरीब एवं मध्यवर्गीय लोगों का जीवन स्तर सुधारने में सहायक है, लेकिन वहीं उसके लगातार उपयोग से वह अपनी मौत के बुलावे से भी अनभिज्ञ हैं। यह एक ऐसी वस्तु बन चुकी है जो घर में पूजा स्थल से लेकर रसोईघर, कमरे तक के उपयोग में आने लगी है।

यही नहीं अगर हम बाजार से कोई भी वस्तु जैसे राशन, फल, सब्जी, कपड़े आदि यहां तक कि तरल पदार्थ जैसे दूध, दही, तेल इत्यादि भी लाना हो तो उसको लाने में प्लास्टिक का ही प्रयोग होता है। आज मनुष्य पॉलिथीन का इतना आदि हो चुका है कि वह कपड़े या जूट के बने थैलों का प्रयोग करना ही भूल गया है। आज के युग में दुकानदार भी हर प्रकार के पॉलिथीन बैग रखने लग गए हैं। क्योंकि ग्राहक ने उसे पॉलिथीन रखने को बाध्य कर दिया है।

मानव समाज को पॉलिथीन से होने वाले प्रदूषण के बचाव के लिए बढ़-चढ़कर आगे आना होगा और अपने अपने स्तर पर इससे निपटने के लिए सहभागी होना होगा। चाहे बच्चे हो या बूढे, स्त्री हो या पुरुष सभी को इससे निजात पाने के लिए सहृदय कार्य करना होगा।

परिवार के बड़े सदस्य स्वयं पॉलिथीन का प्रयोग ना करें, साथ ही दूसरे सदस्यों को भी इसका प्रयोग करने से रोक, आसपास के लोगों को भी इसका प्रयोग करने से रोकें और इसके विषय में इसके दुष्परिणाम की जानकारी दें तो यह सबसे बड़ा कदम होगा। यदि बाजार खरीदारी करने जाएं तो अपने साथ जूट या कपड़े से निर्मित थैले को ही लेकर जाएं। यदि दुकानदार पॉलिथीन में सामान दे तो उसको भी इसका प्रयोग करने से रोकें। पॉलिथीन का बहिष्कार करें। यदि उपभोक्ता ही इसका भोग करना बंद कर दें तो इसकी जरूरत दिन प्रतिदिन कम होती चली जाएगी और एक समय ऐसा भी आएगा जब पॉलिथीन का पूरे वातावरण से सफाया हो जाएगा।


"आओ मिलकर बच्चन ले
पॉलिथीन को मरना है
वातावरण को स्वच्छ बनाना है"

प्लास्टिक इस समय का प्रमुख प्रदूषक है, एक गैर विघटित पदार्थ होने तथा जहरीले रसायन से बना होने के कारण यह पृथ्वी, हवा और पानी को प्रदूषित करता है। पॉलिथीन अपने उत्पादन और निपटान डिस्पोजल के कारण पर्यावरण की गंभीर क्षति का कारण बनता जा रहा है। पॉलिथीन के खतरों को कम करने का तरीका तो केवल प्लास्टिक के उपयोग को कम करने और इसके उत्पादन में कटौती करने से ही संभव है। पॉलिथीन, पॉलिविनाइल, क्लोराइड पॉलिस्टर बड़े पैमाने पर प्लास्टिक के निर्माण में प्रयोग किया जाता है। सिंथेटिक ऑलईयर आसानी से जटिल आकार में ढल जाते हैं। जो उच्च रासायनिक प्रतिरोधक हैं और अधिक या कम लोचदार होते हैं। कुछ को फाइबर या पतली पारदर्शी फिल्मों में भी बदला जा सकता है। इन्हीं गुणों के कारण उन्हें कई लोकप्रिय टिकाऊ या डिस्पोजेबल वस्तुओं और पैकेजिंग सामग्री बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। इन सामग्रियों का आणविक भार यानी एक थैली पर कई हजारों से लेकर 150000 तक होता है। अत्यधिक आणविक आकार होने के कारण इन रसायनों की प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है और यह लंबे समय के लिए मिट्टी के वातावरण में अपने आप को बनाए रखते हैं। प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट बना हुआ है। हर परिवार हर साल करीब 3 से 4 किलो प्लास्टिक थैलों का इस्तेमाल करता है। बाद में यही प्लास्टिक के थैले कूड़े के रूप में पर्यावरण के लिए मुसीबत बनते हैं।

पिछले साल देश में 2900000 टन प्लास्टिक कचरा था जिसमें से करीब 1500000 टन कचरा सिर्फ प्लास्टिक का ही था। एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे संसार में प्रतिवर्ष 100 मिलीयन टन से भी ज्यादा प्लास्टिक का उत्पादन होता है। देश में हर साल 30 से 40 लाख टन प्लास्टिक का उत्पादन किया जाता है। इसमें से करीब आधा यानी 20 लाख लाख टन प्लास्टिक रीसाइकलिंग के लिए पाया जाता है। हालांकि हर साल करीब साढे सात लाख टन कूड़े की रीसाइक्लिंग की जाती है। जबकि रीसाइक्लिंग को उद्योग का दर्जा हासिल है और सालाना करीब 25 अरब रुपए का कारोबार है। देश में प्लास्टिक का कार्य करने व साइकिलिंग करने वाली छोटी बड़ी 20000 इकाइयां हैं।

जहां भी मानव ने अपने कदम रखे वही पॉलिथीन प्रदूषण को फैलाया है। यही हिमालय की घाटियों को भी प्रदूषित कर रहा है। यह इस स्तर तक बढ़ गया है कि सरकार भी इसके रोकथाम के लिए प्रचार कर रही है। पिकनिक सैर सपाटे सभी स्थान भी इस से पीड़ित है। हिमालय पर लगभग 11,000 ग्लेशियर है जिनके कारण वे दुनिया की सबसे बड़ी पानी की मीनार कहलाई जाती है। इनमें से ज्यादा तर ग्लेशियर पिघल रहे हैं। अनुमान है कि हिंदुओं का प्रमुख गोमुख ग्लेशियर 2035 तक समाप्त हो जाएगा। बाकी अन्य ग्लेशियर जो हर साल पीछे खिसकनें की कगार पर आ चुके है। कारण इसके हर साल 10 से 12 मीटर तक भूमिगत पानी का स्तर घटता ही जा रहा है। पॉलिथीन प्रदूषण इतनी मात्रा में बढ़ चुका है कि सरकार भी इसके निवारण के लिए अभियान पर अभियान चला रही है।

सैर सपाटे वाली सभी स्थान पॉलिथीन से ग्रस्त हैं। भारत में लगभग 10 से 15000 इकाइयां पॉलिथीन का निर्माण कर रही है सन 1990 के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में इसकी खपत 20000 टन थी जो अब बढ़कर 3 से 4 लाख टन तक पहुंचने की सूचना है। जो कि भविष्य के लिए खतरे का सूचक है। हम सरकारी तंत्र से भी यही आग्रह करना चाहेंगे कि पॉलिथीन का कम से कम प्रयोग करें और पॉलिथीन बनाने वाली इकाइयों को कम करें। इस प्रकार प्रकृति की गरिमा बनी रहेगी और जीव, जंतु तथा पेड़ पौधे स्वस्थ एवं प्रदूषण मुक्त रहेंगे।

जलवायु परिवर्तन के खतरो को करने बावत जिलाधिकारी को एक एकीकृत प्रस्ताव

 जलवायु परिवर्तन के खतरो को करने बावत जिलाधिकारी को एक एकीकृत प्रस्ताव


Prem Pancholi


डालियों का दगड़िया सामाजिक संस्थान ने टिहरी जनपद के जिला अधिकारी से मिलकर प्रताप नगर एवम् जाखणीधार ब्लॉक के 15 गांव में जलवायु परिवर्तन को लेकर ग्राम सभा से प्राप्त प्रस्ताव को प्रस्तुत किया है।

संस्था से जुड़े कार्यकर्ताओं ने जिलाधिकारी टिहरी मयूर दीक्षित को बताया कि प्रतापनगर और जाखणीधार ब्लॉक यानी उनके कार्य क्षेत्र के 15 गांव में कृषि, भूमि संरक्षण, उद्यान, अन्य कृषि विकास के कार्य, सिंचाई, खेलकूद, युवा कल्याण विकास आदि की मांग गांव के लोगों की प्रमुख है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीणों के प्रस्ताव में अंकित है कि वह स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार की दिशा में काम करना चाहते हैं। डालियों का दगड्या संस्था के कार्यकर्ताओं ने जिला अधिकारी को अलग-अलग गांव से मिले प्रस्ताव का एक संपूर्ण विकास योजना का दस्तावेज प्रस्तुत किया है। इस प्रस्ताव में बताया गया कि कुछ गांव के लोग उद्यानीकरण करना चाहते हैं। ताकि एक तरफ वहां जंगल सुरक्षा का काम हो और दूसरी तरफ लोगों को फल उत्पादन से स्वरोजगार प्राप्त हो सके। कुछ ग्रामीणों ने वृक्षारोपण की बात की है और अधिकांश ग्रामीणों ने सिंचाई, घेर-बाढ़, युवा कल्याण विकास कार्य जैसे खेलकूद आदि सामग्री और साथ-साथ रास्ते और महिला उद्यमिता के लिए विभिन्न प्रकार के स्वरोजगार संबंधी प्रस्ताव जिला अधिकारी को प्रस्तुत किया है। 

जिलाधिकारी ने बताया कि वह शीघ्र ही तमाम गांव का भ्रमण करेंगे और इन प्रस्ताव का अध्ययन कर जल्दी ही तमाम गांव में इन कार्यक्रमों को क्रियान्वयन करवाने का प्रयास करेंगे। संस्था से जुड़े कार्यकर्ताओं ने जिलाधिकारी का आभार व्यक्त किया और उन्हें कार्यक्षेत्र में आने का आमंत्रण दिया है।
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डालियों का दगड्या संस्था के प्रबंध निदेशक डा० मोहन पंवार ने बताया कि संस्था जाखणीधार ब्लॉक के 13 और प्रतापनगर ब्लॉक के 02 गांव उनके परियोजना क्षेत्र के हैं। इस कार्यक्रम के लिए संस्था को TDH/BMZ जर्मनी की एक संस्था सहयोग कर रही है। उन्होंने कहा कि वे इन गांवों में सरकारी और गैर सरकारी विकासीय योजनाओं के साथ समन्वय बनाना चाहते है। ताकि आम लोगो तक विकास के कार्य पहुंच पाए। उन्होंने यह भी बताया कि वे गांव स्तर पर जलवायु परिवर्तन के खतरो को कम करने के लिए युवाओं, बच्चो और महिलाओ के समूहों के साथ पानी, पेड़ व भूमि के सरंक्षण के साथ साथ पर्यवारणीय स्वरोजगार के रचनात्मक कार्य कर रहे है। ताकि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के खतरो को कम किया जा सके। इसके लिए भी सरकारी योजनाओं के साथ समन्वय की आवश्यकता है।

Thursday, June 29, 2023

उत्तराखंड की नदी घाटी सभ्यता और इसके उपयोगकर्ता समुदाय की चुनौतिया

उत्तराखंड की नदी घाटी सभ्यता और इसके उपयोगकर्ता समुदाय की चुनौतिया

Prem Pancholi

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से उत्तराखंड की नदी घाटी सभ्यता और इसके उपयोगकर्ता समुदाय की चुनौतियाँ, विषय पर एक व्याख्यान आज सायं संस्थान के सभागार में दिया गया। यह व्याख्यान नदी जल संसाधन और स्थानीय समुदाय को लेकर काम करने वाले विद्या भूषण रावत द्वारा आज शाम को संस्थान के सभागार में दिया गया।


अपने व्याख्यान में, विद्या भूषण रावत ने उत्तराखंड हिमालय की नदी घाटियों के भौगोलिक स्थिति व परिवेश पर विस्तार से जानकारी दी। अपने शोध पड़ताल के विविध सन्र्दभों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह से इन घाटियों का उपयोग विभिन्न उपयोगकर्ता समूहों द्वारा समय-समय पर संसाधनों के रूप में किया गया है। वह इस बारे में यह भी बताया कि किस तरह प्रभुत्वशाली समूहों ने पहुंच का अधिकार रखते हुए यहां के प्राकृतिक जल संसाधनों का प्रचुरता से दोहन किया है। एक बेहद असंगत रुप से इनका उपयोग आज भी जारी है। वह बताते हैं कि कैसे विभिन्न उपयोगकर्ता समूहों को विभिन्न तरीकों से बाहर रखा जाता है। विद्या भूषण रावत द्वारा अपने व्याख्यान में विभिन्न धार्मिक-पौराणिक-सामाजिक आख्यानों में चित्रित प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर भी ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने यह भी बताया कि प्रमुख समूह इन भौगोलिक क्षेत्रों को सांस्कृतिक संसाधनों के रूप में किस तरह जब्त कर लिया जाता है। इस व्याख्यान में उन्होनें गंगा व अन्य नदियों के माध्यम से इसके सांस्कृतिक व पर्यावरणीय महत्व और इनके संरक्षण के वास्तविक अर्थ के बारे में भी बताया। उन्होंने नदी घाटों, तीर्थ स्थानों में बढ़ते प्रदूषण तथा महत्वपूर्ण व खूबसूरत नदी घाटियों का अस्तित्व बड़े बांधों से खत्म कर देने को मानव की ओर से बड़ी भूल बताया। उन्होंने अपना वक्तव्य को स्लाइड  शो के जरिये सुस्पष्ट तरीके से प्रस्तुत किया।  बाद में कुछ उपस्थित श्रोताओं ने उनसे जबाब-सवाल भी किये। कार्यक्रम से पहले दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के प्रोग्राम एसोसिएट चंद्रशेखर तिवारी ने लोगों का स्वागत किया।

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में कर्नल बहल, डॉ.अतुल शर्मा, बिजू नेगी,कर्नल दुग्गल, डॉ.योगेश धस्माना,सुरेंद्र सजवाण,सहित देहरादून के अनेक प्रबुद्वजन, पर्यावरण प्रेमी,साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और पुस्तकालय में अध्ययनरत अनेक युवा सदस्य भी उपस्थित रहे।

विद्या भूषण रावत एक परिचय

विद्या भूषण रावत एक लेखक, व मानवतावादी हैं। इनके पास मुशहर जैसी सबसे हाशिये पर जीवन यापन करनेे वाले समुदायों तथा अन्य मैला ढोने के काम में लगे समुदायों के साथ काम करने का 30 वर्षों का व्यापक अनुभव है। उन्होंने भारत और विदेशों में अग्रणी अंबेडकरवादियों के साथ गहन बातचीत के माध्यम से अंबेडकरवादी आंदोलन के मौखिक इतिहास का दस्तावेजीकरण का काम किया है। उन्होंने 25 वर्षों तक उत्तराखंड के तराल क्षेत्र में लैंड सेलिंग एक्ट के मुद्दे पर भी अकेले ही लड़ाई लड़ी

वर्तमान में वे विभिन्न जनहित याचिकाओं के माध्यम से वह उत्तराखंड के साथ-साथ शेष भारत में गंगा घाटी सभ्यता पर एक अध्ययन कर रहे हैं।

विद्या भूषण रावत को 2016 में अंबेडकर एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अंबेडकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें 2011 में ओस्लो नॉर्वे में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान अंतर्राष्ट्रीय मानवतावादी और नैतिक संघ, लंदन द्वारा मानवतावाद के लिए विशेष पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने भारत और विदेश दोनों में व्यापक रूप से यात्रा करने के साथ ही मानवाधिकार, भूमि अधिकार, खाद्य सुरक्षा, जातिगत भेदभाव सहित विभिन्न मुद्दों को उठाया है। उनका जन्म गढ़वाल के कोटद्वार व लैंसडाउन के मध्य बसे एक छोटे से ऐतिहासिक व व्यापारिक कस्बे दुगड्डा में हुआ ।

Tuesday, June 27, 2023

अनियोजित विकास के कारण बिगड़ा पर्यावरण का संतुलन

अनियोजित विकास के कारण बिगड़ा पर्यावरण का संतुलन

Prem Pancholi


दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से सुपरिचित पर्यावरणविद डॉ.रवि चोपड़ा द्वारा पारिस्थितिकी, संस्कृति और सतत विकास विषय पर स्लाइड- शो पर आधारित एक व्याख्यान आज सायं संस्थान के सभागार में दिया गया।

अपने सार गर्भित व्याख्यान में डॉ. चोपड़ा ने उत्तराखंड हिमालय की महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक और भौगोलिक विशेषताओं पर तथ्यपरक प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यहां के लोक समाज ने किस सहज रुप से अपनी स्थानीय प्रकृति और पर्यावरणके प्रति अपनी श्रद्धा की महान संस्कृति को आकार दिया है जो हाल के वर्तमान दिनों तक भी जीवित रही है। डॉ.रवि चोपडा ने आजादी से पहले उत्तराखण्ड के इस पर्वतीय क्षेत्र में आर्थिक विकास के इतिहास परिवेश को भी संक्षेप में रेखांकित करने का प्रयास किया। अपने व्याक्ष्यान में उन्होंने आजादी के बाद आर्थिक विकास का स्थानीय प्रकृति और लोगों पर इसके प्रभाव पर भी विस्तार से बताया। व्याख्यान के अंत में उन्होंने  उत्तराखण्ड राज्य में सतत विकास की संभावनाओं को लेकर भी तथ्यपूर्ण चर्चा कीे। उन्होंने त्वरित लाभ के विकास के बदले दीर्घकालिक सतत विकास पर बल दिया। 

व्याख्यान के बाद सभागार में उपस्थित लोगों द्वारा इस विषय के सन्दर्भ में डॉ.रवि चोपड़ा से अनेक सवाल-जबाब भी किये।

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में  अनूप नौटियाल, पानी उगाओ के संचालक व पर्यावरण के मासाब नाम से जाने जाने वाले मोहन चन्द्र कांडपाल, निकोलस हॉफ़लैंड ,चंद्रशेखर तिवारी, अजय शर्मा, गिरीश जोशी,प्रेम पंचोली, बिजू नेगी, इरा चौहान, सुंदर सिंह बिष्ट देहरादून के अनेक प्रबुद्वजन, प र्यावरण प्रेमी,साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और पुस्तकालय में अध्ययनरत अनेक युवा सदस्य भी उपस्थित रहे।

डाॅ.रवि चोपड़ा एक परिचय


आई.आई.मुम्बई के छात्र रहे डॉ. रवि चोपड़ा पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक हैं। यह एक गैर-लाभकारी सार्वजनिक हित अनुसंधान और विकास की संस्था है, जो जल संसाधन प्रबंधन, पर्यावरण गुणवत्ता निगरानी और आपदा पर अपने काम के लिए जानी जाती है।

एक शोधकर्ता के रूप में, डॉ. चोपड़ा ने प्रौद्योगिकी और समाज और पर्यावरण और विकास के बीच बातचीत पर ध्यान केंद्रित किया है। वह 1982 में भारत के पर्यावरण की स्थिति पर पहली नागरिक रिपोर्ट के सह-संपादक थे, जिसे समीक्षकों द्वारा दुनिया भर में एक अद्वितीय प्रयास के रूप में सराहा गया।

उनका वर्तमान शोध अध्ययन 21वीं सदी में भारत की जल आवश्यकताओं और हिमालयी जलसो्रतों और नदियों के सतत पुनर्जनन पर केंद्रित है। वह भारत और विदेशों में व्याख्यान सर्किट पर एक लोकप्रिय वक्ता हैं। रवि चोपड़ा ने विकास के क्षेत्र में पांच दशकों से अधिक समय तक काम किया है। कई अग्रणी संगठनों की स्थापना में मदद भी की है। लोकतांत्रिक और मानव अधिकारों की सुरक्षा, प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं से बचे लोगों का पुनर्वास तथा मानसिक रूप से विकलांग बच्चों व सामान्य बच्चों की रचनात्मक शिक्षा के मुद्दों पर उनका काम है।


डॉ. चोपड़ा कई सरकारी और गैर-सरकारी समितियों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। 2013-14 में डॉ. चोपड़ा ने उत्तराखंड में जलविद्युत बांधों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नियुक्त एक विशेषज्ञ निकाय की अध्यक्षता भी की। 2009 से 2013 तक वह तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के विशेषज्ञ सदस्य थे। कुछ अवधि पूर्व उन्हांेने उत्तराखंड में चार धाम परियोजना की समीक्षा के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था।

1947 में जन्मे डॉ. चोपड़ा ने अपना डॉक्टरेट शोध कार्य स्टीवंस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, न्यू जर्सी से किया है। उनका विवाह विकलांगता मुद्दों की वकालत करने वाली जो.मैकगोवन से हुआ है। उन्होंने तीन बच्चों की परवरिश की है। वर्तमान में वे देहरादून में रहते हैं। अपने इस घर में उन्होंनेें वर्षा जल संचयन टैंक और एक कचरे से बनने वाली एक खाद इकाई का भी निर्माण किया है।

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दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र,लैंसडाउन चौक, देहरादून, मोबा.9410919938

Monday, June 26, 2023

महाजन सर्म्पक अभियान तहत गिनाई विकास की योजनायें

 महाजन सर्म्पक अभियान तहत गिनाई विकास की योजनायें


भारतीय जनता पार्टी का महा जनसंपर्क अभियान आरम्भ हो गया है। उत्तकाशी जिले के बड़कोट मंडल के अन्तर्गत इस महा जनसंपर्क अभियान के तहत राजगढ़ी, डख्याट गाँव, धराली, क्वालगाँव आदि स्थानो पर भाजपा के पदाधिकारियों द्वारा बूथ-बूथ और घर-घर जाकर ग्रामीणों से सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देकर लोगों से संपर्क किया।

इस दौरान पूर्व जिलाध्यक्ष जयवीर सिंह जयाडा, जिला मंत्री विनोद राणा, भाजपा युवा नेता डॉ0 कपिल देव रावत, महामत्री अमित रावत, भाजपा नेता रविंद्र रावत, जिला कार्यकारिणी सदस्य श्रीमती कमला जुडियाल, बूथ अध्यक्ष डख्याट गाँव रजन सिंह जयाडा, मण्डल उपाध्यक्ष विशाल जयाडा, बूथ सचिव प्रकाश जयाडा आदि पार्टी के कई अन्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।


Tuesday, June 13, 2023

राणा ज्यूक याद, राणा ज्यूक बाद

 राणा ज्यूक याद, राणा ज्यूक बाद

(पुण्यतिथि 13 जून, 2020 पर विशेष)

Charu Tewari


लोककवि-गिदार हीरासिंह राणा ज्यू गीत-कविता हमेशा आम लोगनक क्वीण-कहाणि कहते रईं। गौं-गाडाक मैसनोंक जतुक ले कष्ट और संघर्ष उनूल देखीं वैं बै उनूल शब्द और कथ्य उठाईं। उनर रचनाओं में जीवनक भोगी यथार्थ छू। जीवनाक कष्ट खालि उनार आपण न्हैंत, बल्कि उ पुर जमानाक छन जनूंल उनूकों गीत-कविता लेखणांक लिजी जमीन दैछ। उनर रचनाओं विशेषता य छू कि उं समाजाक विषयों कैं भौत कसि बैर पकड़नी और लोगोंनक कष्टों और विडंबनाओं कैं उमैं शामिल करनी। उनर गीत-कविताओं में कथ्य तो छनै छिन, लेकिन आपंण उद्गार व्यक्त करणि गैर भाव लै छन। उनर रचना- संसार में शब्द छांटणैंकि कला छु तो लोगों तक पहुंचणैंकि संवेदना लै छू। आम लोगों सरोकार में रची-पगी उनरि रचनाओं क आकाश लै भौत ठुल छू। पहाड़ाक सैंणियौंक कष्ट, आम लोगोंक तकलीफ, प्रकृतिक सौंदर्य, श्रृंगारैक खूबसूरती, प्रेम-विछोहैकि कहांणि, लोक स्वरोंक सामूहिक अभिव्यक्ति, हिमालयाक संकट, व्यवस्था प्रति गुस्स, आपण हकों लिजी लड़नैक ताकत, सांचि बात दगाड़ ठाड़ हौंणैकि तरांण, हमार जीवनैकि जो लै दार्शनिकता छू उकैं इतिहास और संस्कृति बोधक साथ लोगनक बीच ल्यौंणैंकि क्षमता छू। जो लोग विपिन्न छन, मुख्यधारा बै पिछाड़ि छुट जानी उनैरि छटपटाहटों कैंलै उनर रचना आवाज दिनीं। लोकभाषाक सौंदर्य, कथ्य, शिल्प, बिम्ब, प्रतीक और शब्द चयनक साथ जब राणा ज्यू आपण मधुर कंठैल गीत गानी तो उमैं प्रकृतिक संगीत आपण आप शामिल है जां। उसी दैखि जाओ तो हीरासिंह राणा मूल रूपैल म्याल-ठ्यालांक गीतकार-गायक छन। यैं बटि उनूल आपक रचनाअेंक बिंब उठाईं। उनूल हमेशा आपूं कैं ‘गिदार’ बता। राणा ज्यू कभैं लै भौत लोकप्रिय गायक-गीतकार-कवि या कलाकार बनणंक फेर में नि पड़। यई कारण छु कि उनार कतुकै रचना भ्यार नि यै पाईं। ज्यादातर गीत रिकार्ड लै नि है पाई। जो लै रचै-गा उ सब लोक बै लिबैर लोकै कं समर्पित छू। एक फक्कड, सरल, उदार, संवेदनशील मनखी और ठोस रचनाकारक सबै गुण उनुकैं ‘गिदार’ हीरासिंह राणा बनूंनी।
हीरासिंह राणा ज्यू कैं हम कब बै जाणनूं य बतौंण भौत मुश्किल छू। उनार गीत सुण बेर हम सब ठुल हईं। यह 1976 की बात छू। हम लोग अल्माड़ जिल्लक बग्वालीपोखर इंटर कालेज में पढ़छि। हल्की सी याद छू कि राणा ज्यू आपणि किताब ‘मानिलै डानि’ लिबैर एैराछि। पैल बार उनूकैं वैं द्यखो। इस्कूल में उनूल कुछ गीत गाईं। ‘मेरि मानिलै डानी...’ और ‘लस्का कमर बांदा...’ याद छू। कुछ साल बाद 1988 में फिर राणा ज्यू आपण पुस्तक ‘मनखों पड्यौव में’ लिबैर बग्वालीपोखर आईं। फिर पढ़ाई दौरान और आंदोलनों में शामिल हौंणाक बाद उनुं दगै कतुकै कार्यक्रमों और आंदोलनों में मुलाकात होते रौंछि। उन दिनों समाजवादी नेता बिपिन त्रिपाठी और मैंके उनर एक गीत भौते भल लागछी। हम कतुक बार वीक फरमाइश करछी। उ गीत उनूल भौत कम गाछ। रिकार्ड लै नि है सक। यह गीत कैं हमार इलाकाक सुपरिचित कलाकार हरीश डोर्बी भौते मधुर स्वर और नई संगीतक साथ गांछी- ‘दिन ऊनैं और जानैं रया, हम बाटी कं चानैं रया/सांसों की धागीले आंसू का हम फूल गठ्यानै रया...।’ दिल्ली औंणाक बाद उनु दगै और ले नजदीकी बढ़ने गै
हीरासिंह राणा ज्यूक रचना-यात्रा में उनर इलाक सल्टक राजनीतिक और सामाजिक चेतना क भौत ठुल प्रभाव छू। उन्नीस सौ बयालीसक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ म सल्टैक भौत ठुल भूमिका रै। खुमाड़ गौंक चार आंदोलनकारियौंल आपणि शहादत दे। महात्मा गांधी ज्यूल सल्ट कैं ‘कुमाऊं क बारादौली’ नाम दे। अल्माड़ जनपदौक सीमान्त विकासखंड छू सल्ट। प्राकृतिक सौन्दर्य लै परिपूर्ण एक जागि छू मानीला। मानीला कै पास डढोली गौं में 16 सितंबर, 1942 में हीरासिह राणा ज्यूक जन्म हो। उनर बौज्यूक नाम मोहन सिंह और इजक नाम नारंगी देवी छी। परिवारैक माली हालत भौत भलि नी छि। यैक कारण उनैर औपचारिक शिक्षा आठवीं तकै है सकी। उनर ज्यादा टैम दिल्ली मजै बितौ। घर में सबुहै ठुल हौंणक वील परिवारैक जिम्मेदारी लै राणा ज्यू कै ख्वार में छी। आपण रचनात्मकता कैं उनूल रामलीला मंचों बै अगिल बढ़ौण शुरू करौं। उनूल आपण पैल प्रसिद्ध गीत ‘आ लिली बाकरी लिली छू...’ 1962 में देशाक पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीज्यूक उपस्थिति में गा। साल 1971 में मोहन उप्रेती ज्यूक निर्देशन में चलणीं सांस्कृतिक संस्था ‘पर्वतीय कला केन्द्र’ दगै जुड़ीं। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी लेनिन पंत ज्यूक सहायताल राणाज्यू ‘गीत एवं नाटक प्रभाग’ नैनीतालैक टोली में भर्ती हैईं। एक कलाकाराक रूप में प्रभाग में एक साल लै नि टिक सक। बाद में ब्रजेन्द्र लाल साह ज्यूक सुझाव पर ‘नव युवक केन्द्र ताड़ीखेत’ नामैल एक रंगटोली गठन करौ। य संस्था माध्यमैल उत्तराखंडाक अलग-अलग इलाकों में कार्यक्रम प्रस्तुत करीं।
उन दिनों देशैकि प्रतिष्ठित पत्रिका ‘दिनमान’ में फिल्म और साहित्य विषयों कैं पहाडकै नेत्र सिंह रावत ज्यू देखछी, उनूं दगै राणाज्यूक मुलाकात है। रावत ज्यूल राण ज्यू कैं लिखण और गीत गांणौंक ठुल मंच प्रदान करौ। दूरदर्शनैल 1976 में आपण पैल स्वतंत्र प्रसारण शुरु करौ। नेत्र सिंह रावत ज्यूल उनुकैं दूरदर्शनक पैल दिनक कार्यक्रम प्रस्तुत करणौंक मौक दे। बाद में आकाशवाणी, दूरदर्शन और देश-विदेशाक कई मंचों बै राणा ज्यूल आपण प्रस्तुति दैईं। उनार तीन कविता-गीत संग्रै ‘प्योली और बुरांस’ (1971), ‘मानिलै डानि’ (1976) और ‘मनखों पड्यौव में’ (1987) प्रकाशित हैईं। राणाज्यूक पैल कैसेट ‘रङिल बिन्दी’ (1986) बजार में यैछ। वीक बाद ‘सौ मनों की चेारा’ (1991), ‘रंगदार मुखड़ि’ (1994), ‘हाई कमाल’ (1996), ‘त्येरि आंखि’ (2000), ‘अहा रे जमाना’ (2002) और ‘हंसनि मुखिम’ (2007) जैसी कैसेटों और सीडी में संकलित गीत श्रोताऔंल भौत पसंद करीं।
कविता-गीत संग्रै अलावा हीरासिंह राणा ज्यूल सैकड़ों गीत-कविता लिखीं, जो प्रकाशित नि है सक। कतुकै लोकप्रिय गीत छन जो उनूल मंचों बे गाईं, लेकिन रिकार्ड नि है सक। उनूल हिन्दी में लै कुछ कविता ल्येखीं। गीत ल्येखीं। अपाणैं कुछ कविताओंक हिन्दी अनुवाद लै करौ। चार नाटक लै लैखीं। उनर एक नाटक ‘स्वाधीनता आंदोलन में उत्तराखंड का योगदान’ देशाक भौत हिस्सों में 13 बार मंचित करी गौ। भारतीय मानचित्राक द्वि सौ साल पुर हौंण पर 2003 में सुप्रसिद्ध मानचित्रकार लैम्बटनै कि याद में भारत सरकारैल एक परियोजनाक तहत ‘लैम्बटन का कारंवा’ नामैल जो नाटक मंचित करौ उमैं राणा ज्यू लै भाग ल्है।
आपण पुर जीवन में संघर्षो और मूल्योंक दगाड़ चलणि राणा ज्यू दिल्ली सरकारैल जब 2019 में ‘गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी भाषा अकादमी’ घोषणा करी तो राणाज्यू कैं वीक पैल उपाध्यक्ष मनोनीत करौ। कुमाउनी लोक साहित्य कैं आपण भौत ठुल योगदान दिणीं जनकवि राणा ज्यूक 13 जून, 2020 हैं निधन है पडा़ै।
हीरासिंह राणा ज्यूक गीत-कविता सिर्फ मनोरंजन नि करन, बल्कि उनुमैं पाठकों कैं भितैर तक झकझोर द्यणैंक क्षमता छू। आंदोलित कर सकणैंकि चेतना छू। उनर पैल किवता संग्रै ‘प्योली और बुरांस’ प्रकाशित हौ। उभत राणाज्यूक उमर केवल तीस साल है बेर कम छी। संग्रै में संग्रहित रचनाओंकि परिपक्वताल उनर कविताओंक गहरी तक पैठ कैं देख बै समझी जै सकौं। यूं कविताओंल कतई नि लागन कि यौ कविक पैल कविता संग्रै छू। इमैं ज्यादातर कविता देशप्रेम और आपण जन्मभूमि पर रची छन। उनार कविताओंक बिंब और प्रतीक बतौनी कि उनूल कतुक गूढ़ताक दगै आपण रचना-यात्रा शुरू करी। यकैं जन्मभूमि पर लिखी एक गीतैल समझी जै सकौं-
अजुठी उज्याइ, रतब्यौंणै की रुपसा उदंकार,
किरण सुनका झलकै बे कैं त्यर स्यौनि सिंगार
धौं चरण त्यर सागर मणि मौत्यों लै हरदम।
य गीत में ‘अजुठी उज्याइ तरब्यौंणे की रुपसा उदंकार’ जास उपमान और शब्द चयन अद्भुत छन। राणा ज्यूल देशकि आजादीक उपमा यसि रत्ते दगै करी, जैक उज्याव आई जुठ नि हैरोय। यसि क्वै रत्तियैक कल्पना अचंभित करणीं छू। भारतैक बहुरंगी चित्र कैं बतौंणक लिजी उनूल बता कि रत्तीयक उगणी सूरज आपण पैल किरणैल भारत माताक मांग भरों। सागर त्यर खुटा कैं मातियौंल धूंछ। हीरासिंह राणा ज्यूक एक सुप्रसिद्ध गीत छु- ‘लस्का कमर बांदा, हिम्मता का साथा/ फिर भोला उज्याली हौली, कां लै रलीं राता।’ य गीत में विचार, संघर्ष, उम्मीद और जीतक लिजि जो आग्रह छु वू बतौं कि हीरासिंह राणाज्यूक रचनाओं में आम लोगनक हकों लिजी लड़ने प्रेरणा दिणीं चेतना भौत शुरू बै छी-
हण चैं मनम हौंस छु क्या चीज घबराणौं
धरि घुटि अगीला फिरी के पछिला आंणों
छौ आपण हातौं मजा तकदीर बनाणौं
जब क्वै मानो बाता, खुट-हात फौलादा
शीर पांणिकी वां फुटैली, मारुल जां राता।
राणा ज्यूक य गीत एक टैम पर उत्तराखंडक आंदोेलनोंक शीर्षक गीत बन गौछि। उनर एक गीत छु ‘हम पीड़ लुकानै रया।’ य गीत में बिंब, प्रतीक, शिल्प, अलंकार और शब्द चयन अद्भुत छन- ‘दिन आनै-जानै रया/हम बाटी कैं चानै रया/सांसों की धागिले आंसों का/हम फूल गठ्यानै रया।’ य गीत में सांसों क धागैल आंसूक फूल गठ्यौण अकल्पनीय प्रतीक छू। जीवनाक विडंबनाओं और संघर्षों बे निकली आवाजों में इतुक गैर पीड़ कैं हीरासिंह राणा ज्यू समझ सकनी-
खुशी बाधइ जब निझूली, गङरथौं कुपई निफुली,
हियै की बांजी धर्ती कणीं, आंसौं लै भिजानैं रया।
जब खुशीक बादौव नि बरस, मन में जो स्वींण पाली छि वीक कली नि खिल, तो हमूल निराश हैबेर आपण आंसूल बांजि धरती कैं भिजै दे।
हीरासिंह राणा ज्यूक एक प्रतिनिधि कविता छू- ‘हिरदी पीड़।’ समाजाक आखिरी लैन में ठाड़ हैई लोगनैक पीड़ कैं भौते गहराई में उतर बैर रची य गीताक दार्शनिक पक्ष देखण लैक छू-
चढ़न सूरज कणि अरग चढ़ानी,
बड़नी डाई कैंणि पांणि प्यवानी।
निगह्र्याई रात कैले नि देखी
चायो सबुलैं राती उज्यांणी।
य गीत में ‘निह्र्याई’ शब्द राणा ज्यूक शब्द चयन और कथ्य पर उनर मजबूत पकड़ कैं बतौं। असल में य खालि एक काई रात न्हैंत। यैसि गहरी कष्टों ल भरि रात छू जैकैं आसानील नि देखि जै सकन। वीक लिजी उतुकै पीड़ म उतरण पणौं। लोगन में कष्टभरी रातक बाद एक यस रत्तियक उम्मीद छू जो उनर जीवन में उज्याव ल्हिबेर आल। राणाज्यू हर कष्टभरी रात कैं आपण जीवन में एैसिक शामिल कर लिन्ही कि उ हर नई रत्तिब्याणैंक आस जगौं। उनैरि य आस में भौत अघिल तक हिट सकणीं चेतना छू। य चेतना कैं समझणांक लिजी एक दृष्टि लै चैंछ। हम कै सकनूं कि राणा ज्यू शब्दों और भावों दगडै दृष्टिक साथ चलणीं कवि लै छन। जीवनाक संघर्षों दगै लड़नी, अपाण स्वैंणाक कुचलते देखणीं समाज कैं भौत बार दिन मजिक उज्याव लै अन्यार जस लागूं। कतुक लोगों लिजी तो यौ उज्याव मृगमरीचिका जस लै है जांछ-
घाम छनै अन्यार द्यखौ हमूलै,
पाउ-पौशू हम गरदिशुलै।
हैंसैं हैं मन कौं हैंसूं कसिका,
बिपति लै पाडौ रूणैंकि बांणी।
आम लोगनैक तकलीफों कैं इतुक पीड़ैकि साथ धरणैंक कला राणा ज्यू कैं औरों है अलग करीं। य पीड़ कैं राणा ज्यू ‘गरीबै चैली ख्वट डबला’ कविता में व्यक्त करनी। पहाड़ाक गौंनूक गरीबी-लाचारी बैटिक पैद हई निराशा मजैं आम आदिम भौते स्वैंण बुंणबेर आपण एक ठुल संसार बणै द्यौं। आम लोगनैक परिस्थितियों चलते कसिक वीक उम्मीद बिखरनी-टुटनी उकैं पकड़नैकि संवेदना हमेशा हीरासिंह राणा ज्यूक कविताओं में छू। टाल हालि कपड़ों में गरीबैक चेलिक पास एक डबलौक सिक्क छू। उ इकैं लिबैर भौते रौंती रै। हावम उणनैं। वीक खुट जमीन में न्हैंत। आपण हातम उ सिक्क कैं कसबेर पकड़ बेर उ दुकान में जैंछ। गांणिमाणि लगैं कि य डबलैल उ पुर दुनि कैं खरीद सकैं। आपण इजाक लिजी चरेऊ, बौज्यूक जिली साफा, छ्वाट भैक लिजी खिलौंण, ठुल दादीक लिजी मुरुलि, भौजीक लिजी नौ पल्ले जंजीर खरीद सकीं। आपण गौरुक छोटी बाछिक गाव में बादणांक लिजी एक घंटी लै खरीदण चांछ। वील य डबलक सिक्क में आपण भौत ठुल दुनी बसै है। उ समझीं कि दुनी में जो लै सबुहैं भलि चीज छू उकैं खरीद ल्हैलि। उ आजि य सब सोच बेर बुदबुदै रैछि। आपण स्वैंणोंक एक नई दुनी बसौंण रै छि। दुकानदारैल वीक भावों कैं समझबेर वीक झगुली में मूंगफली-चणांक कुछ दांण धरते हुए बता कि त्यर सिक्क ख्वट छू। फाटि झगुलि बे सब मूंगफली और चांण जमीन में बिखर गईं-
इजैं हैं चर्यो, बौज्यू हैं टांकौं,
नान भुलि मरिय छुण मुण्यांकौं।
एक मुरुली दाज्यू हैं दिह्यो,
भौजि हैं जंजीर जो हौ नौ पला।
बांकि रैहै गेछ गोठै कि बाछि,
घानि दि दिना त बड़ै दया छी।
राणा ज्यू जीवन भर अभावों बीच संघर्ष करते रईं। उनूल कभैं आपण संघर्षों कैं मुसीबतक रूप में नि द्येख, बल्कि उनुकैं सब लोगोंक आवाज बणै दे जो परिस्थितियों दगै लड़ते रौनी। ‘घाम गयौ धारमा’ यस्सै एक गीत छू-
गय नना इस्कूलमा, जस पौथिला घोलमा,
क्वै नानी उमर बै रौया, रात-दिना बौलमा।
ल्येखि ननौं ले पाटी, आपण-आपण बाटी,
कैक भागम कलमा चली, कैल खनी छौ माटी।
‘कौतिकौ थौ’ हीरासिंह राणा ज्यूक श्रेष्ठ रचनाओं में एक छू। समाजक मनोविज्ञान कैं ध्यान में धरि बेर य कविता कैं जसि बुण राखों उ देखंण लैक छू-
पुरण ‘घौ’ फिरी गय उच्येड़ी,
हैंसि खितकर आंसौं रौ में।
जुग बिता आजी लैं बितिला,
हनैं रैंल म्यर घौ हिकौ में।
तुम गया पर मैं कथां जौं,
हौय तो आंखर कौतिकौ थौ में।
कौतिक में आपण जांणी-पहचांणी भौते लोंगनक जमघट। साल म एक बार यह जमीन पर लागंणि कौतिक में एक अलगै उन्मुक्तता छू। दूर गौं-गाड़ बे मिलहूं औंणि सबूंक मिली-जुली सुख-दुख छन। कौतिक रौंत में नाचणिं-गाणीं लोगोंन कैं कौतिक थौ सालों बे देखणौं। उकैं लागूं कि जब लै य कौतिक हों सब म्यर घौनूं कैं सेकनी। एक-द्वि दिन बाद जब य मायावी भीड़ छंट जैंछ तो कौतक्यार आपण-आपण घरौं हैं ल्है जानी। कौतक्यारौंल आबाद कौतिकौ थौ फिर वीरान है जां। कौतिको थौ यस प्रतीक छू जो समाजक बीच में लै आदिमक अकेलापन कैं व्यक्त करूं।
राणा ज्यूक एक प्रसिद्ध गीत छू- ‘आ लिली बाकरी लिली छ्यू...।’ साठक दशक में आकाशवाणी लखनऊ बटि ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध लोक गायिका बीना तिवारी ज्यूक आवाज में य गीत कैं श्रोताऔंल भौत पसंद करौ। राणा ज्यू बतौंछि कि य उनर पैल गीत छी। भारतरत्न गोविन्दबल्लभ पंतज्यूक जयन्ती पर 1962 में दिल्ली में एक कार्यक्रम में पैल बार उनूल य गीत गा। यैक लिजी भौते मेहनत करी। लाल किल्ल बटि चार बकार किराय पर ल्याईं और चीड़ाक ठिठ और हरी पत्तौंल स्टेज सजाछ। कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री लै मौजूद छी। शास्त्री ज्यू गीत तो उतुक नि समझ पाय, लेकिन भाव समझ बेर गीतैक भौत तारीफ करी। गोविन्दबल्लभ पंतज्यूक घरवाईक आंखों में आंसु ये पड़ीं। बाकर और वीक गुसैंक माध्यमैल प्रकृति और समाजाक अन्तर्सबंधों कैं देखणैंक य अद्भुत दृष्टि छू। राणा ज्यूक गीतों में मनुष्य और मनुष्येक वेदना अलावा बकार-बैल जास पालतू जानवर लै छन। बाकर और ग्वावक सुख-दुख, हंसी-खुशी साझा छन। बकारौक लिजी ग्वावैकि जिम्मेदारी और बाकर दगै वीक आत्मीयता य गीत में देखि जांछ। बाकर ग्वावक लिजी एक पालतू पशु न्हैंत, बल्कि वीक दगड़ि छू-
जब निखया मैंल बुधुआ, मेरि बाकरिल गोव,
ग्वेलदेरांणी द्विय डबला भेंट चढौंला भौव।
हम ग्वलों की त्वी छै देवी और कहैं कू...कू,
आ लिली बाकरी लिली छ्यू...छ्यू...।
हीरासिंह राणा ज्यूक एक भौते प्रसिद्ध गीत छू- ‘हाय...हाय रे मिजाता।’ कथ्य, शिल्प, बिंब, प्रतीक और कोमल भावों साथ प्रकृतिक यस चित्रण राणा ज्यू कर सकनीं। उनर गीतों में प्रकृतिक सौंदर्य प्रकृति प्रदत्त छू। य स्वाभाविक रूपैल उनर रचनाओं में ऐ जांछ। मानिलै डानि बे हिमालयौक उ छटा विस्तार छू जां उ आपण रूप-यौवन कैं बदलते रौं। बुरांसक फूलों दगड़, बांज-चीड़ौंक बणों बे निकलणीं संगीत बटिक, गाड़-गध्यार, छीड़ोंक कल-कल करणीं आवाजैल, उच्च हिवांल-कांठीक बुग्यालों बे ल्हिबेर हरी-भरी डान-कान सब प्रकृतिक बसाई छू। प्रकृतिक तमाम बिंब राणा ज्यूल य गीत में शामिल करी छन। सही मायनों म राणाज्यू सौन्दर्यक कवि छन। प्रकृति और नारीक सौदर्यक नई उपमान कसी गढ़ी जानी य गीत वीक उदाहरण छू-
रङिल बिंदी घाघरि काई, धोती लाल किनार वाई,
आय हाय रे मिजाता, आई होइ रे मिजाता।
एक हाति दातुलि छौ एक हात ऐना,
नौ पाटै घाघरि परा रेशमियां चैना।
य गीत कैं भले ही नारी सौंदर्य दगै जोड़ बे देखि जां, लेकिन यो प्रकृतिक सम्मोहन छू, प्रकृति दगै अनुराग छू। पूर्णिमाक जून हिमालयैक ख्वर पर बिंदी छू। हिवांल-कांठीक काव घ्यर घाघरोक प्रतीक छू। सुकिल हिमालयौक तली बे पड़नी लालिमा साड़िक किनारौक प्रतीक छू। हिमालयी नारीक सौंदर्य और श्रम कैं निरूपित करणीं एक यस बिंब छू जमैं प्रेम, श्रम, संघर्ष, सौंदर्य, संवेदना, सदभाव और समभाव शामिल छू।
हीरासिंह राणा ज्यूक दूसर कविता संग्रै छु ‘मानिलै डानि।’ य संग्रै में उनर एक सुप्रसिद्ध गीत छू- ‘म्यर मानिलै डानि...।’ य गीत भले ही मां मानिला देवी स्तुति छू, लेकिन य गीतक भाव राणा ज्यूक कविता यात्राक दिशा कैं बतौं। प्रार्थना में उनूल मां मानिला हैं महाविद्यालय बनौंण लिजी बिनती करी छू। यैल समझी जै सकौं कि उनार गीतों में सामाजिक सरोकारों लिजी कतु जागि छू-
इंटरा करौछ त्वीलै ‘काठौ’ कौ इस्कूल
डिगरी कौलेज देवी ख्यलौं हरौ झूल
सब नान चैरई नानी, हम त्येरि बलाई ल्युंल।
हीरासिंह राणा ज्यूल आखिरी पद में आपण परिचय दिबैर साबित करौ कि उं आपुकैं ‘गिदार’ किलै माननी-
मैं छू ‘हिरू’ डढोई कौ पीडै की गढोई,
त्य खुटां तब ल्यै रौं यो पीडै कैं बटोई
मेरि बिनती जये मानी, हम त्येरि बलाई ल्युंल।
क्वै आपण पीडैकि इतुक ठुल गढोई बने सकौं, य एक अकल्पनीय बिंब छू। आपण पीडैकि उपमा एक घासैक गढोई दगै करण, जमैं कतुकैं पुल होंनी। एक घासक पुल में भौते तिनाण छन। हजारों तिनड़ा कैं मिलै बेर एक गढोई बनीं। राणा ज्यूक य दुखैकि गढोई उनैरि न्हैत, पुर समाजाक संकट उनरा छन। यैक लिजी उनूल कौ कि मि समाजाक सारे कष्टोंक गढोई माताक चरणों में ल्है रयौ। उनूल आमजन दगै य जुड़ाव कैं अपनी रचना-यात्रा में हमेशा कस बेर पकड़ो।
राणा ज्यूक तीसर कविता संग्रै ‘मनखों पड्यौव में’ 1987 में प्रकाशित हो। य संग्रै में एक गीतकार और गायक है भ्यार निकल बेर उनूल कवि रूप में आपण नई परिचय करा। ‘मनखों पड़ाव में’ आपण निजी कष्टों जागि कैं सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं कैं ज्यादा जागि मिली। राणा ज्यूक कविताओं में प्रकृतिक सौंदर्य और भावोंक कोमलता छू। ‘फूल टिपो-टिपो हैरे’ कविता में उनूल प्रकृति कैं कथ्य बनै बेर योस शिल्प गढ़ो कि राणा ज्यू प्रकृतिक सच्च उपासक और अनुरागी लागनी। उनुकैं उन फूलों कैं तोड़न में लै कसक लागीं जनुकैं तोड़ बेर गौंपन फुलदेईक त्यौहार मनाई जांछ। राणा ज्यूकैं लागौं कि फुलवारी बे फूल तोड़नी पुज्यारि फूलों दगै मनमानी करणौं। पुज्यारिक फूल तोड़न कैं लिबेर उनार भाव यास किस्माक छन कि फूलोंक राजा-रानी सहमी हुई छन। जो खिलती कली छन उनर रंग उड़ गो। डाई-बोट सब कंपकपानी। प्रकृतिक प्रति उनैरि उदारता कविता में फूट पड़ी-
ह्यौ अैगो पुज्यारि द्यखौ थैं, कैकैं टिपूं ज्यांणी,
चुप्प छना रजा फूलों का, चुप्प फूलों की राणी।
हर कुपईक रङ उढैगो, कैकैं मलासों मैं,
नौल-कुपव लग-लगै रैं।
हीरा सिंह राणा ज्यूक रचनाओंक सबूहैं मजबूत पक्ष छू पहाड़ैक सैंणियोंक कष्टपूर्ण जीवन कैं उकैरण। उनर रचना संसारोक एक ठुल हिस्स पहाड़ाक सैंणियों पर केन्द्रित छू। उनूल पहाड़ाक सैंणियोंक वेदना कैं जो दृष्टिल देखौ वील उनर सृजनता कैं नई आयाम दे। सबै रचनाओं मैं पहाड़ाक सैंडियोंक सौंदर्य, संकट, साहस, श्रम, संघर्ष, जिजीविषा, कोमलता और ममतामयी रूप भौत गैर समझक साथ अभिव्यक्त छन। ‘दुल्हैंणि’ कविताक एक चित्र देखो-
चंचल बाली उमर उछांण लागि घाम जसी,
शर्मेकि क्वेखिम लुकिग्ये क्वे बदनाम जसी।
बखतैल मारि सिक्वोड़िल खैंचि लग्याम जसी,
मैतैकि मुलिकि रै हैगै बस्स एक फाम जसी।
राणा ज्यूक एक कविता ‘महेड़ी’ में पहाडैक सैंणियोंक वास्तविक चित्र उभरों। पहाडाक सैंणियोंक कष्ट समाजवादी छन। गरीब और अमीर सैंणियोंक संकट एक जस्सै छन। न भल खांण, न पहनण, न ओढन, न बिछोंण। कलम-दवात कभैं पकड़ि ना। त्यागैकि एैसि प्रतिमूर्ति कि घर-बण सबै जिम्मेदारी निभाते हुए परदेश में जाई मैंस और बच्चोंक जिम्मेदारी लै वीकै ख्वार में छू-
भ्योव पखाडौं का गीद गहानैं,
खेतों का बीचम बिणै बजानैं।
नङडि खुट्यां मा बुड़िया कानी,
च्यापिंछ पीडै़ कैंक्ये नि चितानी।
पहाड़ा सैंणियोंक तप और त्याग,
आफि बणाय जैल आपैंण भाग।
राणा ज्यूक एक प्रसिद्ध गीत छू ‘अजकाल हैरे ज्वाना।’ य गीत में राणा ज्यूल प्रेम कैं उपासनाक चीज बता। हालांकि उनूल य गीत देशक आजादीक यौवन पर लिखौ। सल्ट में खुमाड़ाक शहीदोंक लिजी बनी स्मारक कैं प्रतीक बनै बेर उनूल नारीक सौंदर्य कैं आजादीक उन्मुक्तता दगै जोड़ बेर अद्भुत बिंब बना-
यौ रूप क्यछ यौ जोभन, भरमत्त हैरैं सब्ब,
म्यर गौं-गाड़का नान-तिन, त्यर भक्त हैरैं सब्ब।
हिट थापि दयुं त्यौरौ थाना म्येरि नौली पराणा।।
‘गीत कस ल्येखूं’ कविता में हीरासिंह राणा ज्यूक पुर रचना-संसारोक विस्तार मिलूं। उनर पास अलग-अलग किस्माक गीत छन। महलोंक, टुटी छानाक, सुन-चांदीक, टुटि भान-कुनांक। भौते गीत छन जनुमैं हम समाजैक पीड़ देख सकनूं। बताओ तो कस गीत ल्येखूं? द्वि डबल में बिचाणीं ज्वानीक गीत जै ल्येखूं या द्याप्त पुजणां लिजी मंदिरों बेची गैई घंटीक गीत ल्येखूं! राणा ज्यू पुछनि कि अभावोंक बीच में घरोक एक कुंण में भुखैल जो मरि गो उ गरीबोक बिना कफनैक लाशक गीत ल्येखूं! जोभन में भरी बानैक गीत ल्येखूं, जो गाव में हंसुलि, नाख में नथुलि, ख्वार में मांग टीका, गलोबंद और हाथों में पौंजी पैरी ब्योलिक गीत ल्येखूं या उ बेबस सैंणिक गीत ल्येखूं जैक ख्वारम बे बिन्दी झड़ गै-
छैं बाणी-बाणिका गीदा,
ठुलीका-नानिका गीदा।
छैं तिपुर महलों का गीदा
छैं टुटिया छानिका गीदा
सुनाका-चांदी का गीदा
छैं फुटिया भानि का गीदा।
हीरासिंह राणा ज्यूक गीत-कविताओं में समसामयिक सवाल लै भौत प्रमुखता उठी छन। उत्तराखंड में चली कई आंदोलनों में एक संस्कृतिकर्मी रूप में उं लगातार सक्रिय रईं। कतुकै आंदोलनों में न केवल उनूल गीत गाई, बल्कि उनुमैं शामिल लै हयीं। जिन सवालोंक जबावक जिली राज्य बनौ, उं स्वैंण पुर नि होणैंक पीड़ हमेशा उनर मन में छी। आपण चिंता उनूल एक गीतक माध्यमैल व्यक्त करी-
त्यर पहाड़, म्यर पहाड़
रौय दुःखों कौ ड्यर पहाड़
बुजर्गौंले ज्वौड़ पहाड़
राजनीतिलै ट्वौड़ पहाड़
ठ्यकदारौं लै फ्वौड़ पहाड़
नानतिना लै छ्वौड़ पहाड़।
उत्तराखंड राज्य आंदोलनक दौरान मुजफ्फरनगर कांड बे दुखी हैबेर उनूल एक भौत चेतनायुक्त गीत ल्यखौ-
उत्तराखंडक रैणी हम
सीमाओं पर ठड़ी हम
जबलै देशम लडैं़ लागि
पैल गोई खणीं हम
हम छौं देशैकि ठाड़ि मुनइ
तबजै हम उदंगार हौईं।
सामाजिक और राजनीतिक सवालों पर लै उनूल भौत गीत-कविता ल्यैखीं-
अहा रे जमाना, ओहो रे जमाना
त्विल आपण रङम रङा, कै बुड़ा क्यै ज्वाना
सब्बों हैबेर ठुल्ल हैगो दुनि मजी पैंस
पैंसों की जागर लैरै छौ, नाचणई मैंस
नै कैकौ ईमान रौय, न कैकी जुबाना।
हीरासिंह राणा ज्यूल प्रेम-सौंदर्य पर लै भौत गीत-कविता रचीं-आईं। उनर एक गीत म बिंब और प्रतीक देखण लैक छन-
बुरांसे कि फुली डइ जसी, क्य रंगदार छै तू
कार्तिकी मौ जसि, क्य रसदार छै तू
कैदार पुन्यौंकि, उदंकार जून
कसम से हजारों में एक छाजिंछै ऐ।
श्रंृगाराक गीतों में प्रेम निवेदन कैं लै जो शालीनताल उनूल प्रस्तुत करौ, उ प्रेमक प्रति उनर समर्पण को बतौं-
जरा भीं चहाथैं अगासम क्य छा ए
मुए बलबलानै इतुक नै उढ़ा ए
कभणि बै मैं चेरौं यों त्यर बाट-घटा कैं
कतुक छुटि गईं आजि यौ फिरि नौ जनम छौ।
राणा ज्यूल पर्यावरण, साक्षरता, नशामुक्ति, सामाजिक चेतना जास भौत विषयों पर आपण गीत-कविता लेखीं। कुमाउनी त्योहारों में प्रकृति, लोक परंपराओं में विज्ञान पर लै उनूल भौत कविता लैखीं। गीत-कविताओं अलावा राणा ज्यूल ‘ग्वैल लीला’, ‘कुमाऊं की बारादौली सल्ट’, ‘स्वाधीनता आंदोलन में उत्तराखंड का योगदान’ और उत्तराखंडःएक संघर्ष यात्रा’ नामैल चार नाटक लै ल्येखीं।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...