Sunday, August 31, 2014

भाजपा कार्यसमिति की बैठक में पढाया महाभारत का पाठ

पिछले सप्ताहन्त में रूद्रपुर में हुई उत्तराखंड भाजपा की तीन दिनी कार्यसमिति की चिन्तन-मंथन बैठक में प्रदेश के नेताओं को आगे बढ़ने का मंत्र और सबक दे कर गई। पार्टी नेताओं को मोदी फार्मूले पर चलने का जज्बा पैदा करने और माइंड सेट बदलने की नसीहत मिली है। हालांकि इस दौरान प्रदेश भाजपा ने सरकार को घेरने का जो खाका बैठक में खींचा है उसमें बासीपन साफ झलका। जिन मुद्दों के साथ भाजपा आगे बढ़ने का प्लान तैयार कर रही है उसे लंबे समय से भाजपा नेता विधानसभा और अन्य मंचों से उठाते आए हैं। प्रदेश कार्यसमिति की अगली बैठक दिसंबर में प्रस्तावित है।
बैठक के अंतिम दिन भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल ने अपने एक घंटे के भाषण में भाजपा नेताओं को फटकारा भी और पुचकारा भी। उन्होंने नेताओं को मोदी का मैकेनिज्म समझाया। उन्होंने कहा कि हर भाजपाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह लक्ष्य तय कर काम करे। सकारात्मक सोच के साथ जीत का माइंड सेट लेकर आगे बढ़े। पार्टी में परिवारवाद को रोको और पार्टी को परिवार की तरह समझो। पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद रमेश चंद्र पोखरियाल निशंक ने कहा कि प्रदेश में सरकार के भीतर और बाहर अराजकता की स्थिति है जिससे सरकार आत्महत्या के करीब पहुंच गई है। रुद्रपुर में चली तीन दिवसीय भाजपा प्रदेश कार्य समिति की बैठक में पहुंचे राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) शिवप्रकाश सिंह ने अपने सम्बोधन में कहा कि दुर्योधन को पता था कि जो वह कर रहा है वह अधर्म है, लेकिन वह फिर भी करता रहा। उन्होंने नेताओं को चेताया कि जानबूझकर अधर्म की राह मत चलो, वर्ना महाभारत के दुर्योधन जैसा हश्र होगा। उन्होंने कहा कि हमारे कुछ नेता भी अधर्म के मार्ग पर हैं, गुटबाजी को हवा देकर पार्टी का नुकसान पहुंचा रहे हैं, वो समझ लें कि नतीजा उनके हक में नहीं आएगा। सह महामंत्री कि कहा कि नरेंद्र मोदी की तरह लक्ष्य तय कर आगे बढ़ो, अभी यह तय होना चाहिए कि 2017 में हमारा एजेंडा क्या होगा। उन्होंने संगठन को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने और लक्ष्य निर्धारित कर उसे भेदने की नसीहत दी। शिवप्रकाश ने कहा कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में सुशासन की झलक दिखने लगी है। प्रदेश भाजपा को भी इसकी जरूरत है। उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर केवल मीटिंग, सिटिंग और चीटिंग का खेल हो रहा है। विधानसभा उपचुनाव व पंचायतों में हमें कांग्रेस से नहीं बल्कि भाजपाइयों से ही शिकस्त मिली है।
अध्यक्षीय भाषण में प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने पार्टी में चली आ रही गुटबाजी को समाप्त करने के लिए तीखे तेवर अपनाए। उन्होंने कहा कि अभी तक जो कांग्रेस में होता था वैसा भाजपा में भी दिखने लगा है। यह ठीक नहीं है। समीक्षा हो रही है, कोई कितना भी बड़ा पदाधिकारी, सांसद, विधायक हो दोषी पाया गया तो कार्रवाई होगी। पूरे देश में भाजपा का परचम लहराने के बाद तुरंत उत्तराखंड में पंचायत और विधानसभा उपचुनाव की हार भाजपा को भुलाकर आगे बढ़ने के लिए एक साथ कार्यसमिति में बैठे भाजपा नेताओं ने उसे फिर से हरा कर दिया। किसी ने नसीहत दी तो किसी ने मरहम लगाने की कोशिश भी की। सांसद रमेश पोखरियाल निशंक ने डोईवाला सीट पर मिली हार पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि वहां कांग्रेस ने दो लोगों को मैनेज कर चुनाव जीत लिया। बावजूद भाजपा के वोटों में भारी बढ़ोत्तरी हुई। कहा कि आरोप तो वो भी लगा सकता है जो अपना बूथ जीतने की स्थिति में नहीं है। आखिर आपसी तकरार की जिम्मेदारी कौन लेगा। उन्होंने कहा कि हमे नरेंद्र मोदी के पदचिन्हों पर आगे बढ़ना होगा।
भाजपा नेता अब जान चुके हैं कि पंचायत चुनाव और उपचुनाव में मुख्यमंत्री हरीश रावत की रणनीति ने ही उन्हें चारो खाने चित किया है। सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने अपने सम्बोधन में स्पष्ट तौर पर कहा कि इस दौरान उन्होने तीरथ और निशंक दोनों को सुना, यह ध्यान रहना चाहिए कि राजनीति में जब दूसरों के हक हकूक पर डांका पड़ता है तभी अंतरकलह का दौर शुरू होता है। उन्होंने भाजपा नेताओं को चेताया कि प्रदेश का सीएम सरल आदमी नहीं है। वह महातिकड़मी है, सभी कलाओं में निपुण है। इसलिए एक होकर लड़ों तभी बात बनेगी, वर्न 2017 की जंग आसान नहीं होगी। उन्होंने कहा कि कोई मुझे गाली दे दें तो कोई बात नहीं, लेकिन उससे पार्टी को नुकसान नहीं होना चाहिए। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बची सिंह रावत ने बैठक में राजनीतिक प्रस्ताव रखा। जिसे विधायक मदन कौशिक ने समर्थन किया और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मनोहर कांत ध्यानी व पूरण चंद शर्मा ने उसका अनुमोदन किया।
बच्ची सिंह का राजनितीक प्रस्ताव
-ः झूठे वादों के साथ सत्ता में आई कांग्रेस सरकार असफल हो चुकी है।
-ः सिडकुल में हीरो मोटो कार्प को छूट देने के रूप में 266 करोड़ का घपला हरीश सरकार ने किया और डीएम कोर्ट ने स्टांप चोरी के मामले में कंपनी पर 111 करोड़ की पेनल्टी लगाई।
-ः भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए पूर्व की भाजपा सरकार लोकायुक्त बिल लाई थी लेकिन कांग्रेस सरकार ने आते ही खत्म कर दिया।
-ः अटल खाद्यान्न योजना को भी बंद कर दिया, जो फिर से शुरू होनी चाहिए।
-ः प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब है, बलात्कार व ट्रिपल मर्डर जैसे जघन्य अपराध हो रहे है।
-ःउद्योगों में श्रम कानूनों का उल्लंघन हो रहा है जिसके शिकार प्रदेश के युवा हो रहे है।
-ः 150 से ज्यादा दायित्वधारी बनाकर राजकोश पर सरकार ने हर माह करोड़ों रुपए का भार डाल दिया है।
-ः राज्य में सड़क, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव हो गया है।
राज्य में जिसकी सरकार होती है वही सिंकन्दर-रामलाल
भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल ने पार्टी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को अनुशासन व एकजुटता का पाठ पढ़ाया। साथ ही हिदायत दी कि कोई भी पदाधिकारी पार्टी से बड़ा नहीं है और यदि कोई पार्टी विरोधी गतिविधियों में पाया गया तो उसके खिलाफ गंभीरता से कार्रवाई की जाएगी। रामलाल ने प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासन काल में राज्य का बंटाधार हो चुका है, कानून व्यवस्था चैपट हो चुकी है, अपराधियों का बोलबाला है। लूट, हत्या, डकैती की वारदातों से लोग सहमे हुए हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत जब केंद्र में मंत्री थे तब उन्होंने कांग्रेस शासनकाल में केंद्र से राज्य के विकास के लिए कोई सहयोग नहीं मांगा और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राज्य के विकास के लिए सहयोग मांग रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में आई दैवीय आपदा के दौरान नरेंद्र मोदी राज्य में आए थे और केदारनाथ घाटी में आई आपदा को लेकर सरकार से र्चचा की थी। उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकार केंद्र सरकार को सहयोग दे तो केंद्र सरकार भी राज्य के विकास में सहयोग करेगी। भाजपा ने कठिन परिस्थितियों में राज्य के विकास के लिए कार्य किया था और 10 वर्ष के लिए विशेष पैकेज दिया था, लेकिन पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने इस पैकेज की अवधि नहीं बढ़ाई, जिस कारण राज्य का विकास अवरुद्ध हुआ है। उपचुनाव में भाजपा को मिली हार पर रामलाल ने कहा कि उपचुनाव में अमूमन राज्य में जिसकी सरकार होती है, उसी की जीत होती है क्योंकि सरकार चुनाव में कई संसाधनों का दुरुपयोग करती है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2017 से पहले ही होने वाले हैं।

आमदनी बढ़ाने के लिए निकाय को खुद ही तैयार करना होगा लैंड बैंक-मुख्यमंत्री श्री रावत

देहरादून से प्रेम पंचोली
-ः देहरादून में हुआ अखिल भारतीय महापौर परिषद का46वां वार्षिक अधिवेशन।
-ः नगर निगमों की समस्याओं और कामयाबी पर चर्चा के मकसद से देशभर के मेयर जुटे।
-ः ऑल इंडिया मेयर सम्मेलन के दौरान पुस्तिका जारी करते मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि कूड़ा निस्तारण और पानी निकासी पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
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पिछले माह के अन्तिम सप्ताह में राजधानी देहरादून में दो दिन तक देषभर से आये नगर निगमों के मेयर जुटे और दो दिन तक हुए मेयरो की मंथन में यह मांग जोर से की गयी कि निकायों को सुदृढ बनाने के लिए संविधान में हुए 74वें संसोधन को अब तक लागू नहीं किया गया है। इस हेतु वे देषभर में लामबन्द होंगे। इस दौरान हुए मंथन में निकायों को वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार मिले, निकायों और पंचायतों के पास विधिक अधिकार हों, प्रदेश सरकारें मेयरों के प्रोटोकॉल पर गंभीर विचार करें, निकायों से सरकारों का दोयम दर्जे का बर्ताव बंद हों, दिल्ली, चंडीगढ़ में मेयर का एकवर्षीय कार्यकाल बढ़ाया जाए जैसे गम्भीर मसलो पर दो दिन तक चर्चा बनी रही।
प्रथम दिवस को देहरादून में आयोजित कांफ्रेंस में सभी मेयरों ने संविधान के 74वें संशोधन को सभी राज्यों के निकायों में जल्द लागू करने की मांग पुरजोर ढंग से उठाई। निकायों को स्वायत्तता के साथ और मजबूती प्रदान करने की भी वकालत की गई। इस दौरान विभिन्न निगमों में लागू योजनाओं और इनके क्रियान्वयन में पेश आई व्यावहारिक दिक्कतों पर भी मेयरों ने चर्चा की। पटेलनगर स्थित एक होटल में कांफ्रेंस का उद्घाटन प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत, शहरी विकास मंत्री प्रीतम पंवार, भारतीय महापौर परिषद के संगठन महामंत्री उमाशंकर गुप्ता, दून के मेयर विनोद चमोली ने किया।
इस दौरान परिषद के संगठन महामंत्री और मध्य प्रदेश के शिक्षा एवं तकनीकी मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि नगर निगम के पार्षद और मेयर जनता के चुने गए प्रतिनिधि होते हैं। इसके बावजूद उन्हें पर्याप्त अधिकार हासिल नहीं हैं। कहा कि उत्तराखंड और यूपी में मेयर, पार्षदों के वित्तीय अधिकार बेहद सीमित हैं। गुप्ता ने कहा कि स्थिति यह रहती है कि पार्षद किसी की मदद करने थाने जाए तो थानेदार उन्हें झिड़क देते हैं। जबकि पड़ोसी देश नेपाल में निकायों, पंचायतों को विधिक अधिकार दिए गए हैं। गुप्ता ने कहा कि मेयर के वोटरों की संख्या कई विधायकों के बराबर होती है, लेकिन उनके प्रोटोकॉल का कोई ख्याल नहीं रखा जाता। बताया कि एमपी में मेयर का प्रोटोकॉल विधायकों से ऊपर है। मेयर विनोद चमोली ने सम्मेलन में आये सभी मेयरो का स्वागत करते हुए कहा कि सरकारें यह मानकर चलती हैं कि निकाय दोयम दर्जे के हैं। यही वजह है कि मेयर को अधिकार नहीं दिए जाते। उन्होंने कहा कि यदि वह विधायक का चुनाव लड़ें तो उन्हें मेयर के मुकाबले कम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व मिलेगा, वोट भी मेयर के मुकाबले कम पाने होंगे। लेकिन, तब उन्हें मेयर से कहीं अधिक अधिकार मिल जाएंगे। कहा कि यह व्यवस्था सरकार की दोहरी सोच दर्शाती है। अगर इसमें बदलाव नहीं किया गया तो शहरों के विकास की अवधारणा साकार नहीं हो सकेगी।
कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मेयरों की अधिकार देने की मांग का समर्थन किया। कहा कि देश की करीब 38 प्रतिशत आबादी का नेतृत्व स्थानीय निकाय सरकार कर रही है। ऐसे में उन्हें अधिकार देने ही होंगे। इस दौरान मुख्यमंत्री रावत ने देशभर में निकायों की जमीनों पर हो रहे अवैध कब्जों पर भी चिंता जताई। कहा कि निकायों को ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए। देहरादून का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां निकाय के पास बेशकीमती जमीनें हैं, लेकिन कचरा निस्तारण प्लांट के लिए ही जमीन नहीं मिल पा रही। इससे शहर की बड़ी समस्या से निजात का रास्ता अटक गया है। सीएम ने निकायों को अपने पैरों पर खड़ा होने के विकल्प तलाशने की नसीहत भी दी।मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि स्थानीय निकायों को मजबूत बनाने के लिए 13 वें वित्त आयोग से संसाधन जुटाए जाएंगे। राज्य सरकार इसके लिए केंद्रीय वित्त आयोग से अनुरोध कर रही है। उन्होंने कहा कि बढ़ती आबादी को देखते हुए शहरों में कूड़ा निस्तारण और पानी की निकासी पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। निकायों की आमदनी बढ़ाने के लिए लैंड बैंक तैयार करने के साथ ही अभियान के रूप में सख्ती के साथ अवैध अतिक्रमण हटाना होगा। वे स्थानीय होटल में आयोजित अखिल भारतीय महापौर परिषद के 46वें वार्षिक अधिवेशन में रावत मुख्य अतिथि को रूप में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार नगर निकायों को विकास में भागीदार बनाने के लिए हरसम्भव मदद करने के लिए तैयार है। नगर पंचायत, नगर पालिका व नगर निगमों में चुने हुए प्रतिनिधियों व निकायों को मजबू्त बनाने के लिए राज्य सरकार केंद्रीय वित्त आयोग से अनुरोध कर रही है कि इनके लिए 13 वें वित्त आयोग में पर्याप्त आर्थिक संसाधन दिये जाएं। सीएम ने कहा कि इस सदी में देश की आर्थिक विकास की औसत दर आठ प्रतिशत के करीब रही है जो कि अधिकांश देशों के लिए सपने के समान है। हरीश रावत ने कहा कि तेज आर्थिक विकास का प्रभाव शहरीकरण के रूप में दिखता है, परंतु शहरों में जनसंख्या के बढ़ते दबाव से कई समस्याएं भी पैदा हो रही हैं जिनका समाधान समय रहते करना बहुत जरूरी है। देहरादून सहित अधिकांश शहरों में आवासीय भूमि की कमी होती जा रही है। विशेष रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए सम्मानजनक तरीके से रहने की व्यवस्था करना एक बड़ी चुनौती है।
अधिवेषन में उत्तराखंड के शहरी विकास मंत्री प्रीतम पंवार ने जानकारी दी कि प्रदेश सरकार निकायों को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। बताया कि प्रदेश में 74वें संविधान संशोधन के 18 में से 13 बिंदु लागू किए जा चुके हैं। कुछ बिंदुओं में अभी ढांचा तैयार किया जाना है। जल्द ही इन्हें भी लागू किया जाएगा।
अधिवेशन में अखिल भारतीय महापौर परिषद के अध्यक्ष और नागपुर के मेयर अनिल शोले, दून की पूर्व मेयर मनोरमा शर्मा डोबरियाल, संसदीय कार्य सचिव राजकुमार, विधायक उमेश शर्मा, पिछड़ा आयोग के अध्यक्ष अशोक वर्मा, शहरी विकास सचिव जीएस गर्ब्याल, मुख्य नगर अधिकारी हरक सिंह रावत, एएमएनए हर्षर्द्धन मिश्रा, वरिष्ठ नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. आरके सिंह और सभी पार्षद मौजूद रहे। हरिद्वार के मेयर मनोज गर्ग ने कार्यक्रम का संचालन किया।


नहीं पहुंचे नायडू
तय कार्यक्रम के अनुसार मेयर कांफ्रेंस में केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू को भी शिरकत करनी थी। आयोजकों ने बताया कि दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक के चलते वह दून नहीं पहुंच सके। बताया गया कि केंद्रीय मंत्री ने जल्द ही दिल्ली में सभी मेयरों से मुलाकात और उनकी समस्याओं पर चर्चा करने का आश्वासन दिया है।

चमोली चुने गए राष्ट्रीय अध्यक्ष
इस अधिवेषन में दून के मेयर विनोद चमोली को राष्ट्रीय महापौर परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया। कांफ्रेंस में शामिल मेयरों और पार्षदों ने चमोली को बधाई दी। चमोली ने कहा कि अब उन पर दोहरी जिम्मेदारी है। परिषद की नई जिम्मेदारी के तहत उन्होंने देश के सभी निकायों में 74वां संविधान संशोधन लागू कराने की लड़ाई लड़ने की बात कही।

संसद में लायेंगे बिल
आल इंडिया मेयर काउंसिल के संगठन महामंत्री एवं मध्यप्रदेश के तकनीकी शिक्षा मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि जिन राज्यों में संविधान का 74वां संशोधन अब तक लागू नहीं है उसके लिए परिषद केंद्र सरकार पर लगातार दबाव बनाए हुए है। क्योंकि यह सीधे-सीधे केंद्र का विषय न होकर राज्य का विषय है, इसलिए सरकार को सुझाव दिया गया है कि संसद में इस संबंध में बिल लाकर संशोधन को लागू कराने की दिशा में कदम उठाया जाए। 46वीं महापौर परिषद के अधिवेशन के दौरान पत्रकार को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि 46वीं महापौर परिषद में केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी बनाने की पहल समेत शहरों की समस्याओं पर भी वार्ता होगी। उन्होंने कहा कि महापौर परिषद का मतलब केवल यही नहीं कि यह महापौर का मंच है बल्कि यह समूचे शहर के नागरिकों का मंच है। उत्तराखंड समेत कुछ अन्य राज्यों में संविधान का 74वां संशोधन लागू न होने पर अफसोस जताते हुए उन्होंने कहा कि इसके लिए केंद्र व राज्य सरकारों से बातचीत की जाएगी। उन्होंने मध्यप्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मेयर को तमाम वित्तीय अधिकारों से लेकर अन्य अधिकार प्राप्त हैं जबकि कई राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है। इसलिए कोशिश होगी कि अन्य राज्यों में भी ऐसी व्यवस्था बनाने की दिशा में कदम उठाए जाएं।


Tuesday, August 26, 2014

गीर्दा जी कह गये - मेरी कोसी हरी गे कोसी

प्रेम पंचोली

जब गीर्दा जी की याद आती है तो मुझे वे दिन याद याते हैं जब हम पहली बार गीर्दा जी के साथ पीएसआई के गेस्ट हाऊस में रहने का मौका मिला। मेरे साथ मेरे स्कूल के दौरान के सहपाठी अमित सावन भी था। गीर्दा जी ने कहा कि बबा तुम तो बाजार घूमने चले जाओ मेरा रात्री का कार्यक्रम आरम्भ होता है। खैर! यह बात 2003 की है जब पहली बार राज्य के लोग जलनीति के संबन्ध में लामबन्द हो रहे थे। हमने अतुल षर्माा के साथ मिलकर श्री सुरेषभाई के सहयोग से एक नाटक ‘‘क्या नदी बिकी’’ नाम से बनाया था। इसका सफल मंचन गीर्दाजी के गीतो के साथ राज्यभर में किया गया। इस कारण राज्य में पानी के सवाल को लेकर तो कही जल विद्युत परियोजनाओ को लेकर सवाल खड़े होने लगे। तो कभी पानी के निजीकरण को लेकर और राज्य की जल नीति को लेकर सवाल खड़े होने लग गये। इस आन्दोलन में गीर्दा का हमे संरक्षण ही नही बल्कि निर्देषन भी मिलता रहा। 2005 आते-आते राज्य के पर्यावरण कार्यकर्ताओं, सहित सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व रंगकर्मी तथा अन्य चिन्तनषील लोगो ने राज्य की नदी घाटियों की पैदल यात्रा की। सभी नदी घाटियों के ‘‘जल’’ को साल 2007 में राम नगर में एकत्रित किया गया। वहां मौजूद हजारो की भीड़ में गीर्दा ने एक गीत से ऐसा ऐलान कर दिया कि राज्य सरकार को एक बार पानी के मसले पर सोचने के लिए विवष होना पड़ा। और साल 2008 को राज्य के नागरिको ने नदी बचाओ वर्श भी घोषित किया। उन्ही दिनों गीर्दा का -कोसी पर रचित गीत-
जोड़ आम बूबू सुणू छी

गदगदानी उं छी
रामनगर पुंजूं छी
पीनाथ बहियू च
रामनगर पौंच्यूछ ......
मेरी कोसी हरी गे कोसी।

एवं-

चलो नदी तट वार चलो,
चलो नदी तट पार चलो रे करो यात्रा नदियों की।

इसके अलावा उन्होन एक गीत ऐसा प्रसारित किया की जो आज भी प्राकृतिक संसाधनो के संरक्षण के लिए आन्दोलित कार्यकर्ताओ के साथ खड़ा है-
एक तरफ बर्बाद बस्तिया - एक तरफ हो तुम
एक तरफ डूबती कषितयां - एक तरफ हो तुम
एक तरफ सूखी नदियां - एक तरफ हो तुम
एक तरफ है प्यासी दुनियां - एक तरफ हो तुम

अजी वाह! क्या बात तुम्हारी-

सारा पानी चूस रहे हो
नदी समन्दर लूट रहे हो
गंगा यमुना की छाती पर
कंकड़ पत्थर कूट रहे हो

गीर्दा जी तुम्हे सत् सत् प्रणाम! अगर हम आपकी विरासत को आगे बढा पायें यही सच्ची श्रद्धांजली होगी। माफ करना चार साल बाद मै लिखने की हिममत कर पा रहा हूं। लोग चार साल से लगातार लिखत कहते और याद करते रहे। नैनीताल समाचार सहित अन्य अखबारो, टीबी चैनलो में भी श्रृखलाबद्ध रूप से लिखा व प्रसारण किया गया। लिखा जा रहा है। परन्तु मै इतना असंवेदनषील हो गया कि चार साल बाद मेरी हिम्मत लिखने की हुई। हम आपके विचारो को आगे बढाने के कार्यो में उन लोगो के साथ हैं जो इस कार्य पर लगे है। पुनः आपको नमन्! यह षिकायत आप तक कैसे पंहुचे कि यहां की राज्य सरकार ऐसे लोगो के नाम पद्मश्री के लिए भेजती है जो सिर्फ नचाड़ व गीतांग है। वे नचाड़ व गीतांग की भी सम्पूर्ण परिभाशा तक नही जानते वे तो मात्र ऐसा काम कर रहे हैं कि-सुणी पाई बल अर् बेची खाई। दरअसल रचनात्मक साथियों को तो गीर्दा को तो पढना ही चाहिए।


Thursday, August 21, 2014

क्यों ढूंढेगी पुलिस दर्षन लाल के बैग को ?



बारह अगस्त को लिखी गयी तहरीर भी कहीं गोल हो गयी और तो और पुलिस को इतना भी नहीं सूझा कि जिस व्यक्ति की यह तहरीर है उसका भविश्य सदा-सदा के लिए समाप्त हो जायेगा। वह लगातार दर-दर की ठोंकरें खा रहा है। पिछले 12 अगस्त से वह आस बांधे हैं कि षायद उसके षैक्षिक प्रमाण पत्र मिल जायेंगे। उसने कोरनेषन चिकित्सालय के सभी कर्मचारियों से लेकर पास की पुलिस चैकी डालनवाला में तैनात पुलिसकर्मियों तक अपना यह दुखड़ा सुनाया मगर किसी को भी दर्षनलाल की समस्या पर जरा भी दया नहीं आयी।
हुआ यूं कि जौनसार-बावर क्षेत्र के दूरस्थ गांव लावड़ी निवासी दर्षन लाल जब कोरनेषन चिकित्सालय में अपने बिमार पिताजी के साथ तिमारदार था तो उसने कक्ष के बाहर अपने बैग को एक टेबल पर इस आषय से छोड़ा था कि वह अपने बिमार पिताजी को चिकित्सक से दिखवा करके वापस उन्हे उनके कक्ष तक छोड़ देगा। इस अन्तराल में दर्षन लाल के भरे कागजातो के बैग पर किसी ने हाथ साफ कर लिए। दर्षन लाल ने अपना यह दुखड़ा इस संवाददाता को बताया कि उसके बैग में हाईस्कूल, इण्टरमीडिएट व स्नातक तथा जातिप्रमाण पत्र सहित स्थाई निवास प्रमाण पत्र की मूल प्रतियां रखी थी। वह अपने खोये हुए बैग को सम्पूर्ण कोरनेषन चिकित्साल में दिनभर ढूंढता रहा और बैग से संबधित सूचना से दर्षनलाल को मायूस हाथ ही लौटना पड़ा। दर्षनलाल ने अपने इस बैग की चोरी होने की सूचना नजदीक पुलिस थाना डालनवाला में लिखवाई। पुलिस ने भी उस वक्त आष्वास्त किया कि वे इस बैग को ढूंढकर ही सांस लेंगे। 12 अगस्त से दर्षनलाल चिकित्सालय से लेकर पुलिस तक के चक्कर काट-काटकर थक-हार चुका है और बार-बार अपनी किस्मत को कोस रहा है कि उसने स्कूल का रास्ता क्यों पकड़ा। इस अन्तराल में तो वह अपने आजीविका के साधन जोड़ चुका होता। यही नहीं उसे ना तो कागजो के चोरी होने का भय होता ना उसे रोजगार की अब तलाष करनी पड़ती। वे तो अपनी किस्मत को इस तरह कोस रहा है कि उसका जन्म यदि किसी नामी घराने से होता तो कागजातो से भरे उस बैग को पुलिस कब के ढूंढ निकालती जबकि इससे पहले कोरनेषन चिकित्सालय के ही कर्मचारी बैग ढूंढने मे ही उसकी पूरी मदद करते। मगर वह तो एक गरीब व निम्न परिवार में ज्न्मा है जिसकी मदद आजकल में कोई भी व्यवस्था नाम की चीज नहीं करती है। वह कहता है कि उसने बड़ी मुष्किल से अपनी पढाई की है। अब समय आ गया था कि वह रोजगार के लिए कहीं आवेदन करता। इतने संघर्श के बावजूद भी ईष्वर ने उसके रास्ते को रोक दिया है। वह तो हाथ जोड़कर यही आरजू कर रहा है कि जिस भी किसी के पास यह बैग हो वह वापस लौटा देगा तो उसकी जिन्दगी संवर सकती है।
ताज्जुब हो कि राजधानी जैसे इस आधुनिक चिकित्सालय में एक अदद सीसीटीवी कैमरा तक नहीं है। चूंकि पुलिस भी यही कहती फिर रही है कि यदि कोरनेषन चिकित्सालय में सीसीटीवी कैमरा होता तो षायद दर्षनलाल का यह बैग मिल सकता था। वैसे भी कोरनेषन हो या दून यहां बैग चोरी और जेब-जेवराज चोरी की घटना आम हो गयी है। राजधानी में इतने बड़े चिकित्सालयों में लोग जितने डरे सहमें चोरो से रहते हैं उससे अधिक अपने मरीजों को ठीक करवाने में भी रहते है। क्या मजाल की कोई तीमारदार अपने मरीज के लिए आवष्यक सुझाव चिकित्सको से मांग सके। यही वजह है कि इन सरकारी चिकित्सालयों में आये दिन लोग चोरो के घेरे से नहीं बच पा रहे है और पुलिस भी हाथ पर हाथ धरकर बैठी हैं।

Sunday, August 10, 2014

रक्षाबंधन पर विशेष - पेड़ो पर रक्षासूत्र एक भावनात्मक आन्दोलन



जहां एक ओर 1994 में राज्य आन्दोलन के लिए लोग सड़को पर उतर आये वहीं उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रो में वनमाफिया इतने सक्रीय हो चुके थे कि वे एक तरफ ग्रामीण स्तर के छोटे-छोटे आन्दोलनकारी समूहो को दान-चन्दा देकर आन्दोलन को तेज करने की वकालात करते और दूसरी तरफ वनो की अन्धाधुन्ध दोहन करने में हाथ साफ कर रहे थे। इसी दौरान वनमाफियाओ को सबक सीखाने के लिए राज्य की प्राकृतिक संपदा के संरक्षण बावत महिलाओं ने पेड़ो पर राखी बांधकर रक्षासूत्र आन्दोलन का सूत्रपात किया। अर्थात 1994 में वनों की व्यावसायिक कटाई के खिलाफ यह आन्दोलन प्रारम्भ हुआ और अब तो पर्वतीय गांवों के लोग रक्षाबन्धन के अवसर पर पेड़ो पर राखी बांधते है और वन संरक्षण की शपथ लेते है।
1994-95 में भिलंगना, बालगंगा, धर्मगंगा, जलकुर, अलकनंदा तथा भागीरथी नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में 10-10 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित टिहरी-उत्तरकाशी के रयाला (बूढाकेदार), चैरंगीखाल, हर्षिल, हरून्ता, अडाला, मुखेम आदि स्थानों पर वनों की व्यावसायिक कटाई प्रारम्भ हुई थी। रक्षासूत्र आन्दोलन की पर्यावरण टीम ने वनों में जाकर कटान का अध्ययन किया था। तत्काल के अध्ययन के दौरान पाया कि वन विभाग ने वन निगम के साथ मिलकर हजारों हरे पेड़ों पर छपान कर रखी है। जंगल कटान का कार्य रातों-रात जोरो पर है। आन्दोलन द्वारा इसकी सूचना आस-पास के ग्रामीणों को दी गयी थी। यह सूचना मिलने पर गांव के लोग सजग हुये। इसके द्वारा यह जानने का प्रयास भी किया गया था कि वन निगम आखिर किसकी स्वीकृति से हरे पेड़ काट रहा है। इसकी तह निहारने से पता चला कि क्षेत्र के कुछ ग्राम प्रधानों से ही वन विभाग ने यह मुहर लगवा दी थी कि उनके आस-पास के जंगलों में काफी पेड़ सूख गये हैं और इसके कारण गांव की महिलायें जंगल में आना-जाना नहीं कर पा रही है। इसमें दुर्भाग्य की बात यह थी कि जनप्रतिनिधि भी जंगलों को काटने का ठेका लिये हुये थे, जिसके कारण ग्रामीण लोगों को पहले अपने ही जनप्रतिनिधियों से ही संघर्ष करना पड़ा था। वन कटान को रोकने के संबंध में टिहरी-उत्तरकाशी के गांव थाती, खवाड़ा, भेटी, डालगांव, चैंडियाट गांव, दिखोली, सौड़, भेटियारा, कमद, ल्वार्खा, मुखेम, हर्षिल, मुखवा, उत्तरकाशी आदि कई स्थानों पर लोगों ने बैठकों में निर्णय लेकर पेड़ों पर ‘‘रक्षासूत्र’’ बांधे, जिसे रक्षासूत्र आन्दोलन के रूप में जाना जाता है। रक्षासूत्र आन्दोलन की मांग थी कि जंगलों से सर्वप्रथम लोगों के हक-हकूकों की आपूर्ति होनी चाहिये तथा वन कटान का सर्वाधिक दोषी वन निगम में अमूलचूल परिवर्तन करने की मांग उठायी गयी। इसके अलावा यह भी मांग थी कि यदि गांव वालों की आवश्यकता की पूर्ति के बाद जंगल में इससे अधिक वन उत्पाद प्राप्त हो सकते हैं, तो निश्चित ही राज्य हित में इसका इस्तेमाल होना चाहिये। इसके अलावा ऊँचाई की दुर्लभ प्रजाति कैल, मुरेंडा, खर्सू, मौरू, बांझ, बुरांस, दालचीनी, देवदार आदि की लाखों वन प्रजातियों को बचाने का काम रक्षासूत्र आन्दोलन ने किया है। इन ऊँचाई की प्रजाति के पेड़ों के कारण वर्षा नियंत्रित रहती है और नीचे घाटियों की ओर पानी के स्रोत निकलकर आते हैं।
रक्षासूत्र आन्दोलन के कारण महिलाओं का पेड़ों से भाईयों का जैसा रिश्ता बना है और जिस तरह चिपको आन्दोलन की महिला नेत्री गौरा देवी ने जंगलों को अपना मायका कहा है, उसको रक्षासूत्र आन्दोलन ने मूर्त रूप दिया है और प्रभावी रूप से वनों पर जनता के पारम्परिक अधिकारों की रक्षा का बीड़ा उठाया है। रक्षासूत्र आन्दोलन के कारण उपरोक्त वन क्षेत्रों में वन निगम द्वारा किये जा रहे हरे पेड़ों की कटाई को सफलतापूर्वक रोक दिया गया है। यहां तक कि टिहरी और उत्तरकाशी में तत्काल लगभग 121 वन कर्मियों को इसके लिये दोषी ठहराया गया था, किन्तु रक्षासूत्र की मुख्य मांग यह थी कि वन निगम में अमूल-चूल परिवर्तन होना चाहिये और वनों पर वनों के नजदीक रहने वाले लोगों के द्वारा ही संरक्षण, विदोहन तथा नियोजन का कार्य किया जाना चाहिये और वन विभाग को इसके लिए गांववासियों का मार्गदर्शन करना चाहिये, जिसके लिये कई बार सभा-शिविर, सम्मेलन, प्रैसवार्तायें, वन अध्ययन आदि को माध्यम बनाया गया था। जबकि इन्ही दिनों हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान ने रक्षासूत्र आन्दोलन की भावना को रचनात्मक रूप देने के लिए टिहरी व उत्तरकाशी के लगभग 100 गांवों में ‘‘ग्राम वन’’ की स्थापना की है। आज के दिन ‘‘ग्राम वन’’ में गांव की महिलायें हर वर्ष पेड़ो पर राखी बांधती है। दो दशक पूर्व आरम्भ हुई वन बचाने की यह भावनात्मक परम्परा अब तो लाक परम्परा बन चुकी है। यहां तक की स्कूल, काॅलेज, महिला समूह/महिला मंगलदल व युवक मंगलदल इस अभियान के हिस्से स्वस्फूर्त बन रहे है।
इस आन्दोलन की ताकत यह बन गयी कि लोग अब अपने-अपने ‘‘ग्राम वन’’ में परम्परागत तरीके से वन संरक्षण का यत्न करते हैं कि जैसे पेड़ पर रक्षासूत्र बांधना गांव आधारित वन चैकीदारी व्यवस्था को पुर्नजीवित किया गया है। वन चैकीदार का जीवन निर्वाह गांव वालों पर ही निर्भर रहता है। इसके कारण गांव वालों की चारापत्ती, खेती, फसल सुरक्षा, जंगली जानवरों से सुरक्षा तथा पड़ोसी गांव से भी जंगल की सुरक्षा की जाती है। जिससे कि महिलाओं के कष्टमय जीवन को राहत मिलती है। इसके अलावा वन संरक्षण व संवर्द्धन के साथ-साथ जल संरक्षण के काम को भी अनिवार्य रूप से वर्षभर किया जाता है। जिसमें वे महिलाये चाल-खाल (रेन वाटर हार्वेसटिंग पौण्ड) का निर्माण परस्परता से करती है। यही नहीं रक्षासूत्र आन्दोलन से जुड़ी महिलायें अग्नि सुरक्षा के लिए वन विभाग की मोहत्ताज नहीं हैं। कह सकते हैं कि आज भी रक्षासूत्र आन्दोलन की थाती कहे जाने वाले टिहरी-उत्तरकाशी के वे 100 गांव की महिलायें वन संरक्षण की असली प्रहरी है।
रक्षासूत्र आन्दोलन के प्रणेता सुरेश भाई के साथ मिलकर इस भावनात्मक आन्दोलन को श्रीमती मन्दोदरी देवी, श्रीमती जेठी देवी, श्रीमती सुशीला पैन्यूली, श्रीमती सुमती नौटियाल, श्रीमती बंसती देवी, श्रीमती मीना नौटियाल, श्रीमती कुंवरी कलूडा, श्रीमती गंगा देवी चैहान, हिमला उनियाल, श्रीमती उमा देवी, और क्षेत्र की तमाम वे महिलाये जो मुख्य रूप से दिखोली, चैदियाट गांव, खवाडा, भेटी, बूढाकेदार, हर्षिल, मुखेम आदि कई गांवों की सैकड़ांे महिलायें आन्दोलन के शुरूआत से ही नेतृत्व सम्भाल रही है। रक्षा सूत्र आन्दोलन की सफलता ने वनों के प्रति एक नई दृष्टि को जन्म दिया। इसके बाद उत्तराखण्ड में विभिन्न इलाको में विभिन्न मुद्दों को लेकर वनान्दोलन चलने लगे। किन्तु रक्षासूत्र आन्दोलन हर वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर बन बचाओं हेतु वन सम्मेलन करवाते है, जिसमें प्रत्येक क्षेत्र से कार्यकर्ताओं द्वारा वन सम्बन्धी जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है। आन्दोलन की खास बात यह है कि रक्षासूत्र आन्दोलन से जुडे कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष सघन वृक्षारोपण के साथ-साथ वनों को बचानें के लिये पेडों पर रक्षा बन्धन करवाते है, ताकि लागों की इन पेडांे से आत्मीयता बंधे और वनांे का व्यावसायिक दोहन न हो सके। उत्तराखण्ड में वन निगम की सम्पूर्ण गतिविधियों के कारण ही लोगों ने चिपको के बाद पेडों पर रक्षा सूत्र (राखी) बांधे और वन विकास निगम में आमूल चूल परिवर्तन की मांग करते आ रहे हैं। जबकि 1994 में केन्द्रीय वन एंव पर्यावरण मन्त्रालय ने तत्काल उत्तरप्रदेश सरकार को उतराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में वनो के अवैध कटान के संबंध में जांच कर आवश्यक कार्यवाही के निर्देश भी दिये थे।
रक्षासूत्र आन्दोलन द्वारा गठित ‘‘उत्तराखण्ड वन अध्ययन जन समिति’’ ने अपने एक रिपोर्ट में कहा कि अविभाजित उत्तरप्रदेश वन निगम को प्रतिवर्ष जो करोडो रूपयों का लाभ मिला था उसमें 80 प्रतिशत लाभ उत्तराखण्ड के वनों के कटान से प्राप्त होता था लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार ने उतराखण्ड राज्य की नब्ज को समझते हुए यह करोड़ो की राशी अब तक नहीं लौटायी। आन्दोलन का मानना है कि यहां विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की बात अधिक हो रही है और संरक्षण की योजना का पूर्ण आभाव सा लगता है। चिपको के बाद रक्षासूत्र आन्दोलन केवल पेड़ बचाने तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि जल, जंगल, जमीन की एकीकृत समझ बढ़ाने के प्रति लोगों को जागरूक करता आ रहा है, फलस्वरूप इसके उत्तराखण्ड नदी बचाओ अभियान भी प्रारम्भ हुआ है। रक्षाबंधन के अवसर पर पर्वतीय क्षेत्र की महिलाओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पेड़ों पर राखी बांधकर एक भावनात्मक रिश्ता पेड़ों से जोड़ा है। ‘‘ऊँचाई पर पेड़ रहेंगे, नदी ग्लेशियर टिके रहेंगे’’ के नारों के साथ पेड़ों को भाई के रूप में राखी बांधी जाती है। यह कहना है रक्षासूत्र आन्दोलन के प्रणेता सुरेश भाई का।
(प्रेम पंचोली, देहरादून, मो॰-9411734789)

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