Thursday, June 29, 2023

उत्तराखंड की नदी घाटी सभ्यता और इसके उपयोगकर्ता समुदाय की चुनौतिया

उत्तराखंड की नदी घाटी सभ्यता और इसके उपयोगकर्ता समुदाय की चुनौतिया

Prem Pancholi

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से उत्तराखंड की नदी घाटी सभ्यता और इसके उपयोगकर्ता समुदाय की चुनौतियाँ, विषय पर एक व्याख्यान आज सायं संस्थान के सभागार में दिया गया। यह व्याख्यान नदी जल संसाधन और स्थानीय समुदाय को लेकर काम करने वाले विद्या भूषण रावत द्वारा आज शाम को संस्थान के सभागार में दिया गया।


अपने व्याख्यान में, विद्या भूषण रावत ने उत्तराखंड हिमालय की नदी घाटियों के भौगोलिक स्थिति व परिवेश पर विस्तार से जानकारी दी। अपने शोध पड़ताल के विविध सन्र्दभों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह से इन घाटियों का उपयोग विभिन्न उपयोगकर्ता समूहों द्वारा समय-समय पर संसाधनों के रूप में किया गया है। वह इस बारे में यह भी बताया कि किस तरह प्रभुत्वशाली समूहों ने पहुंच का अधिकार रखते हुए यहां के प्राकृतिक जल संसाधनों का प्रचुरता से दोहन किया है। एक बेहद असंगत रुप से इनका उपयोग आज भी जारी है। वह बताते हैं कि कैसे विभिन्न उपयोगकर्ता समूहों को विभिन्न तरीकों से बाहर रखा जाता है। विद्या भूषण रावत द्वारा अपने व्याख्यान में विभिन्न धार्मिक-पौराणिक-सामाजिक आख्यानों में चित्रित प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर भी ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने यह भी बताया कि प्रमुख समूह इन भौगोलिक क्षेत्रों को सांस्कृतिक संसाधनों के रूप में किस तरह जब्त कर लिया जाता है। इस व्याख्यान में उन्होनें गंगा व अन्य नदियों के माध्यम से इसके सांस्कृतिक व पर्यावरणीय महत्व और इनके संरक्षण के वास्तविक अर्थ के बारे में भी बताया। उन्होंने नदी घाटों, तीर्थ स्थानों में बढ़ते प्रदूषण तथा महत्वपूर्ण व खूबसूरत नदी घाटियों का अस्तित्व बड़े बांधों से खत्म कर देने को मानव की ओर से बड़ी भूल बताया। उन्होंने अपना वक्तव्य को स्लाइड  शो के जरिये सुस्पष्ट तरीके से प्रस्तुत किया।  बाद में कुछ उपस्थित श्रोताओं ने उनसे जबाब-सवाल भी किये। कार्यक्रम से पहले दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के प्रोग्राम एसोसिएट चंद्रशेखर तिवारी ने लोगों का स्वागत किया।

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में कर्नल बहल, डॉ.अतुल शर्मा, बिजू नेगी,कर्नल दुग्गल, डॉ.योगेश धस्माना,सुरेंद्र सजवाण,सहित देहरादून के अनेक प्रबुद्वजन, पर्यावरण प्रेमी,साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और पुस्तकालय में अध्ययनरत अनेक युवा सदस्य भी उपस्थित रहे।

विद्या भूषण रावत एक परिचय

विद्या भूषण रावत एक लेखक, व मानवतावादी हैं। इनके पास मुशहर जैसी सबसे हाशिये पर जीवन यापन करनेे वाले समुदायों तथा अन्य मैला ढोने के काम में लगे समुदायों के साथ काम करने का 30 वर्षों का व्यापक अनुभव है। उन्होंने भारत और विदेशों में अग्रणी अंबेडकरवादियों के साथ गहन बातचीत के माध्यम से अंबेडकरवादी आंदोलन के मौखिक इतिहास का दस्तावेजीकरण का काम किया है। उन्होंने 25 वर्षों तक उत्तराखंड के तराल क्षेत्र में लैंड सेलिंग एक्ट के मुद्दे पर भी अकेले ही लड़ाई लड़ी

वर्तमान में वे विभिन्न जनहित याचिकाओं के माध्यम से वह उत्तराखंड के साथ-साथ शेष भारत में गंगा घाटी सभ्यता पर एक अध्ययन कर रहे हैं।

विद्या भूषण रावत को 2016 में अंबेडकर एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अंबेडकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें 2011 में ओस्लो नॉर्वे में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान अंतर्राष्ट्रीय मानवतावादी और नैतिक संघ, लंदन द्वारा मानवतावाद के लिए विशेष पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने भारत और विदेश दोनों में व्यापक रूप से यात्रा करने के साथ ही मानवाधिकार, भूमि अधिकार, खाद्य सुरक्षा, जातिगत भेदभाव सहित विभिन्न मुद्दों को उठाया है। उनका जन्म गढ़वाल के कोटद्वार व लैंसडाउन के मध्य बसे एक छोटे से ऐतिहासिक व व्यापारिक कस्बे दुगड्डा में हुआ ।

Tuesday, June 27, 2023

अनियोजित विकास के कारण बिगड़ा पर्यावरण का संतुलन

अनियोजित विकास के कारण बिगड़ा पर्यावरण का संतुलन

Prem Pancholi


दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से सुपरिचित पर्यावरणविद डॉ.रवि चोपड़ा द्वारा पारिस्थितिकी, संस्कृति और सतत विकास विषय पर स्लाइड- शो पर आधारित एक व्याख्यान आज सायं संस्थान के सभागार में दिया गया।

अपने सार गर्भित व्याख्यान में डॉ. चोपड़ा ने उत्तराखंड हिमालय की महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक और भौगोलिक विशेषताओं पर तथ्यपरक प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यहां के लोक समाज ने किस सहज रुप से अपनी स्थानीय प्रकृति और पर्यावरणके प्रति अपनी श्रद्धा की महान संस्कृति को आकार दिया है जो हाल के वर्तमान दिनों तक भी जीवित रही है। डॉ.रवि चोपडा ने आजादी से पहले उत्तराखण्ड के इस पर्वतीय क्षेत्र में आर्थिक विकास के इतिहास परिवेश को भी संक्षेप में रेखांकित करने का प्रयास किया। अपने व्याक्ष्यान में उन्होंने आजादी के बाद आर्थिक विकास का स्थानीय प्रकृति और लोगों पर इसके प्रभाव पर भी विस्तार से बताया। व्याख्यान के अंत में उन्होंने  उत्तराखण्ड राज्य में सतत विकास की संभावनाओं को लेकर भी तथ्यपूर्ण चर्चा कीे। उन्होंने त्वरित लाभ के विकास के बदले दीर्घकालिक सतत विकास पर बल दिया। 

व्याख्यान के बाद सभागार में उपस्थित लोगों द्वारा इस विषय के सन्दर्भ में डॉ.रवि चोपड़ा से अनेक सवाल-जबाब भी किये।

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में  अनूप नौटियाल, पानी उगाओ के संचालक व पर्यावरण के मासाब नाम से जाने जाने वाले मोहन चन्द्र कांडपाल, निकोलस हॉफ़लैंड ,चंद्रशेखर तिवारी, अजय शर्मा, गिरीश जोशी,प्रेम पंचोली, बिजू नेगी, इरा चौहान, सुंदर सिंह बिष्ट देहरादून के अनेक प्रबुद्वजन, प र्यावरण प्रेमी,साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और पुस्तकालय में अध्ययनरत अनेक युवा सदस्य भी उपस्थित रहे।

डाॅ.रवि चोपड़ा एक परिचय


आई.आई.मुम्बई के छात्र रहे डॉ. रवि चोपड़ा पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक हैं। यह एक गैर-लाभकारी सार्वजनिक हित अनुसंधान और विकास की संस्था है, जो जल संसाधन प्रबंधन, पर्यावरण गुणवत्ता निगरानी और आपदा पर अपने काम के लिए जानी जाती है।

एक शोधकर्ता के रूप में, डॉ. चोपड़ा ने प्रौद्योगिकी और समाज और पर्यावरण और विकास के बीच बातचीत पर ध्यान केंद्रित किया है। वह 1982 में भारत के पर्यावरण की स्थिति पर पहली नागरिक रिपोर्ट के सह-संपादक थे, जिसे समीक्षकों द्वारा दुनिया भर में एक अद्वितीय प्रयास के रूप में सराहा गया।

उनका वर्तमान शोध अध्ययन 21वीं सदी में भारत की जल आवश्यकताओं और हिमालयी जलसो्रतों और नदियों के सतत पुनर्जनन पर केंद्रित है। वह भारत और विदेशों में व्याख्यान सर्किट पर एक लोकप्रिय वक्ता हैं। रवि चोपड़ा ने विकास के क्षेत्र में पांच दशकों से अधिक समय तक काम किया है। कई अग्रणी संगठनों की स्थापना में मदद भी की है। लोकतांत्रिक और मानव अधिकारों की सुरक्षा, प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं से बचे लोगों का पुनर्वास तथा मानसिक रूप से विकलांग बच्चों व सामान्य बच्चों की रचनात्मक शिक्षा के मुद्दों पर उनका काम है।


डॉ. चोपड़ा कई सरकारी और गैर-सरकारी समितियों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। 2013-14 में डॉ. चोपड़ा ने उत्तराखंड में जलविद्युत बांधों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नियुक्त एक विशेषज्ञ निकाय की अध्यक्षता भी की। 2009 से 2013 तक वह तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के विशेषज्ञ सदस्य थे। कुछ अवधि पूर्व उन्हांेने उत्तराखंड में चार धाम परियोजना की समीक्षा के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था।

1947 में जन्मे डॉ. चोपड़ा ने अपना डॉक्टरेट शोध कार्य स्टीवंस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, न्यू जर्सी से किया है। उनका विवाह विकलांगता मुद्दों की वकालत करने वाली जो.मैकगोवन से हुआ है। उन्होंने तीन बच्चों की परवरिश की है। वर्तमान में वे देहरादून में रहते हैं। अपने इस घर में उन्होंनेें वर्षा जल संचयन टैंक और एक कचरे से बनने वाली एक खाद इकाई का भी निर्माण किया है।

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दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र,लैंसडाउन चौक, देहरादून, मोबा.9410919938

Monday, June 26, 2023

महाजन सर्म्पक अभियान तहत गिनाई विकास की योजनायें

 महाजन सर्म्पक अभियान तहत गिनाई विकास की योजनायें


भारतीय जनता पार्टी का महा जनसंपर्क अभियान आरम्भ हो गया है। उत्तकाशी जिले के बड़कोट मंडल के अन्तर्गत इस महा जनसंपर्क अभियान के तहत राजगढ़ी, डख्याट गाँव, धराली, क्वालगाँव आदि स्थानो पर भाजपा के पदाधिकारियों द्वारा बूथ-बूथ और घर-घर जाकर ग्रामीणों से सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देकर लोगों से संपर्क किया।

इस दौरान पूर्व जिलाध्यक्ष जयवीर सिंह जयाडा, जिला मंत्री विनोद राणा, भाजपा युवा नेता डॉ0 कपिल देव रावत, महामत्री अमित रावत, भाजपा नेता रविंद्र रावत, जिला कार्यकारिणी सदस्य श्रीमती कमला जुडियाल, बूथ अध्यक्ष डख्याट गाँव रजन सिंह जयाडा, मण्डल उपाध्यक्ष विशाल जयाडा, बूथ सचिव प्रकाश जयाडा आदि पार्टी के कई अन्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।


Tuesday, June 13, 2023

राणा ज्यूक याद, राणा ज्यूक बाद

 राणा ज्यूक याद, राणा ज्यूक बाद

(पुण्यतिथि 13 जून, 2020 पर विशेष)

Charu Tewari


लोककवि-गिदार हीरासिंह राणा ज्यू गीत-कविता हमेशा आम लोगनक क्वीण-कहाणि कहते रईं। गौं-गाडाक मैसनोंक जतुक ले कष्ट और संघर्ष उनूल देखीं वैं बै उनूल शब्द और कथ्य उठाईं। उनर रचनाओं में जीवनक भोगी यथार्थ छू। जीवनाक कष्ट खालि उनार आपण न्हैंत, बल्कि उ पुर जमानाक छन जनूंल उनूकों गीत-कविता लेखणांक लिजी जमीन दैछ। उनर रचनाओं विशेषता य छू कि उं समाजाक विषयों कैं भौत कसि बैर पकड़नी और लोगोंनक कष्टों और विडंबनाओं कैं उमैं शामिल करनी। उनर गीत-कविताओं में कथ्य तो छनै छिन, लेकिन आपंण उद्गार व्यक्त करणि गैर भाव लै छन। उनर रचना- संसार में शब्द छांटणैंकि कला छु तो लोगों तक पहुंचणैंकि संवेदना लै छू। आम लोगों सरोकार में रची-पगी उनरि रचनाओं क आकाश लै भौत ठुल छू। पहाड़ाक सैंणियौंक कष्ट, आम लोगोंक तकलीफ, प्रकृतिक सौंदर्य, श्रृंगारैक खूबसूरती, प्रेम-विछोहैकि कहांणि, लोक स्वरोंक सामूहिक अभिव्यक्ति, हिमालयाक संकट, व्यवस्था प्रति गुस्स, आपण हकों लिजी लड़नैक ताकत, सांचि बात दगाड़ ठाड़ हौंणैकि तरांण, हमार जीवनैकि जो लै दार्शनिकता छू उकैं इतिहास और संस्कृति बोधक साथ लोगनक बीच ल्यौंणैंकि क्षमता छू। जो लोग विपिन्न छन, मुख्यधारा बै पिछाड़ि छुट जानी उनैरि छटपटाहटों कैंलै उनर रचना आवाज दिनीं। लोकभाषाक सौंदर्य, कथ्य, शिल्प, बिम्ब, प्रतीक और शब्द चयनक साथ जब राणा ज्यू आपण मधुर कंठैल गीत गानी तो उमैं प्रकृतिक संगीत आपण आप शामिल है जां। उसी दैखि जाओ तो हीरासिंह राणा मूल रूपैल म्याल-ठ्यालांक गीतकार-गायक छन। यैं बटि उनूल आपक रचनाअेंक बिंब उठाईं। उनूल हमेशा आपूं कैं ‘गिदार’ बता। राणा ज्यू कभैं लै भौत लोकप्रिय गायक-गीतकार-कवि या कलाकार बनणंक फेर में नि पड़। यई कारण छु कि उनार कतुकै रचना भ्यार नि यै पाईं। ज्यादातर गीत रिकार्ड लै नि है पाई। जो लै रचै-गा उ सब लोक बै लिबैर लोकै कं समर्पित छू। एक फक्कड, सरल, उदार, संवेदनशील मनखी और ठोस रचनाकारक सबै गुण उनुकैं ‘गिदार’ हीरासिंह राणा बनूंनी।
हीरासिंह राणा ज्यू कैं हम कब बै जाणनूं य बतौंण भौत मुश्किल छू। उनार गीत सुण बेर हम सब ठुल हईं। यह 1976 की बात छू। हम लोग अल्माड़ जिल्लक बग्वालीपोखर इंटर कालेज में पढ़छि। हल्की सी याद छू कि राणा ज्यू आपणि किताब ‘मानिलै डानि’ लिबैर एैराछि। पैल बार उनूकैं वैं द्यखो। इस्कूल में उनूल कुछ गीत गाईं। ‘मेरि मानिलै डानी...’ और ‘लस्का कमर बांदा...’ याद छू। कुछ साल बाद 1988 में फिर राणा ज्यू आपण पुस्तक ‘मनखों पड्यौव में’ लिबैर बग्वालीपोखर आईं। फिर पढ़ाई दौरान और आंदोलनों में शामिल हौंणाक बाद उनुं दगै कतुकै कार्यक्रमों और आंदोलनों में मुलाकात होते रौंछि। उन दिनों समाजवादी नेता बिपिन त्रिपाठी और मैंके उनर एक गीत भौते भल लागछी। हम कतुक बार वीक फरमाइश करछी। उ गीत उनूल भौत कम गाछ। रिकार्ड लै नि है सक। यह गीत कैं हमार इलाकाक सुपरिचित कलाकार हरीश डोर्बी भौते मधुर स्वर और नई संगीतक साथ गांछी- ‘दिन ऊनैं और जानैं रया, हम बाटी कं चानैं रया/सांसों की धागीले आंसू का हम फूल गठ्यानै रया...।’ दिल्ली औंणाक बाद उनु दगै और ले नजदीकी बढ़ने गै
हीरासिंह राणा ज्यूक रचना-यात्रा में उनर इलाक सल्टक राजनीतिक और सामाजिक चेतना क भौत ठुल प्रभाव छू। उन्नीस सौ बयालीसक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ म सल्टैक भौत ठुल भूमिका रै। खुमाड़ गौंक चार आंदोलनकारियौंल आपणि शहादत दे। महात्मा गांधी ज्यूल सल्ट कैं ‘कुमाऊं क बारादौली’ नाम दे। अल्माड़ जनपदौक सीमान्त विकासखंड छू सल्ट। प्राकृतिक सौन्दर्य लै परिपूर्ण एक जागि छू मानीला। मानीला कै पास डढोली गौं में 16 सितंबर, 1942 में हीरासिह राणा ज्यूक जन्म हो। उनर बौज्यूक नाम मोहन सिंह और इजक नाम नारंगी देवी छी। परिवारैक माली हालत भौत भलि नी छि। यैक कारण उनैर औपचारिक शिक्षा आठवीं तकै है सकी। उनर ज्यादा टैम दिल्ली मजै बितौ। घर में सबुहै ठुल हौंणक वील परिवारैक जिम्मेदारी लै राणा ज्यू कै ख्वार में छी। आपण रचनात्मकता कैं उनूल रामलीला मंचों बै अगिल बढ़ौण शुरू करौं। उनूल आपण पैल प्रसिद्ध गीत ‘आ लिली बाकरी लिली छू...’ 1962 में देशाक पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीज्यूक उपस्थिति में गा। साल 1971 में मोहन उप्रेती ज्यूक निर्देशन में चलणीं सांस्कृतिक संस्था ‘पर्वतीय कला केन्द्र’ दगै जुड़ीं। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी लेनिन पंत ज्यूक सहायताल राणाज्यू ‘गीत एवं नाटक प्रभाग’ नैनीतालैक टोली में भर्ती हैईं। एक कलाकाराक रूप में प्रभाग में एक साल लै नि टिक सक। बाद में ब्रजेन्द्र लाल साह ज्यूक सुझाव पर ‘नव युवक केन्द्र ताड़ीखेत’ नामैल एक रंगटोली गठन करौ। य संस्था माध्यमैल उत्तराखंडाक अलग-अलग इलाकों में कार्यक्रम प्रस्तुत करीं।
उन दिनों देशैकि प्रतिष्ठित पत्रिका ‘दिनमान’ में फिल्म और साहित्य विषयों कैं पहाडकै नेत्र सिंह रावत ज्यू देखछी, उनूं दगै राणाज्यूक मुलाकात है। रावत ज्यूल राण ज्यू कैं लिखण और गीत गांणौंक ठुल मंच प्रदान करौ। दूरदर्शनैल 1976 में आपण पैल स्वतंत्र प्रसारण शुरु करौ। नेत्र सिंह रावत ज्यूल उनुकैं दूरदर्शनक पैल दिनक कार्यक्रम प्रस्तुत करणौंक मौक दे। बाद में आकाशवाणी, दूरदर्शन और देश-विदेशाक कई मंचों बै राणा ज्यूल आपण प्रस्तुति दैईं। उनार तीन कविता-गीत संग्रै ‘प्योली और बुरांस’ (1971), ‘मानिलै डानि’ (1976) और ‘मनखों पड्यौव में’ (1987) प्रकाशित हैईं। राणाज्यूक पैल कैसेट ‘रङिल बिन्दी’ (1986) बजार में यैछ। वीक बाद ‘सौ मनों की चेारा’ (1991), ‘रंगदार मुखड़ि’ (1994), ‘हाई कमाल’ (1996), ‘त्येरि आंखि’ (2000), ‘अहा रे जमाना’ (2002) और ‘हंसनि मुखिम’ (2007) जैसी कैसेटों और सीडी में संकलित गीत श्रोताऔंल भौत पसंद करीं।
कविता-गीत संग्रै अलावा हीरासिंह राणा ज्यूल सैकड़ों गीत-कविता लिखीं, जो प्रकाशित नि है सक। कतुकै लोकप्रिय गीत छन जो उनूल मंचों बे गाईं, लेकिन रिकार्ड नि है सक। उनूल हिन्दी में लै कुछ कविता ल्येखीं। गीत ल्येखीं। अपाणैं कुछ कविताओंक हिन्दी अनुवाद लै करौ। चार नाटक लै लैखीं। उनर एक नाटक ‘स्वाधीनता आंदोलन में उत्तराखंड का योगदान’ देशाक भौत हिस्सों में 13 बार मंचित करी गौ। भारतीय मानचित्राक द्वि सौ साल पुर हौंण पर 2003 में सुप्रसिद्ध मानचित्रकार लैम्बटनै कि याद में भारत सरकारैल एक परियोजनाक तहत ‘लैम्बटन का कारंवा’ नामैल जो नाटक मंचित करौ उमैं राणा ज्यू लै भाग ल्है।
आपण पुर जीवन में संघर्षो और मूल्योंक दगाड़ चलणि राणा ज्यू दिल्ली सरकारैल जब 2019 में ‘गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी भाषा अकादमी’ घोषणा करी तो राणाज्यू कैं वीक पैल उपाध्यक्ष मनोनीत करौ। कुमाउनी लोक साहित्य कैं आपण भौत ठुल योगदान दिणीं जनकवि राणा ज्यूक 13 जून, 2020 हैं निधन है पडा़ै।
हीरासिंह राणा ज्यूक गीत-कविता सिर्फ मनोरंजन नि करन, बल्कि उनुमैं पाठकों कैं भितैर तक झकझोर द्यणैंक क्षमता छू। आंदोलित कर सकणैंकि चेतना छू। उनर पैल किवता संग्रै ‘प्योली और बुरांस’ प्रकाशित हौ। उभत राणाज्यूक उमर केवल तीस साल है बेर कम छी। संग्रै में संग्रहित रचनाओंकि परिपक्वताल उनर कविताओंक गहरी तक पैठ कैं देख बै समझी जै सकौं। यूं कविताओंल कतई नि लागन कि यौ कविक पैल कविता संग्रै छू। इमैं ज्यादातर कविता देशप्रेम और आपण जन्मभूमि पर रची छन। उनार कविताओंक बिंब और प्रतीक बतौनी कि उनूल कतुक गूढ़ताक दगै आपण रचना-यात्रा शुरू करी। यकैं जन्मभूमि पर लिखी एक गीतैल समझी जै सकौं-
अजुठी उज्याइ, रतब्यौंणै की रुपसा उदंकार,
किरण सुनका झलकै बे कैं त्यर स्यौनि सिंगार
धौं चरण त्यर सागर मणि मौत्यों लै हरदम।
य गीत में ‘अजुठी उज्याइ तरब्यौंणे की रुपसा उदंकार’ जास उपमान और शब्द चयन अद्भुत छन। राणा ज्यूल देशकि आजादीक उपमा यसि रत्ते दगै करी, जैक उज्याव आई जुठ नि हैरोय। यसि क्वै रत्तियैक कल्पना अचंभित करणीं छू। भारतैक बहुरंगी चित्र कैं बतौंणक लिजी उनूल बता कि रत्तीयक उगणी सूरज आपण पैल किरणैल भारत माताक मांग भरों। सागर त्यर खुटा कैं मातियौंल धूंछ। हीरासिंह राणा ज्यूक एक सुप्रसिद्ध गीत छु- ‘लस्का कमर बांदा, हिम्मता का साथा/ फिर भोला उज्याली हौली, कां लै रलीं राता।’ य गीत में विचार, संघर्ष, उम्मीद और जीतक लिजि जो आग्रह छु वू बतौं कि हीरासिंह राणाज्यूक रचनाओं में आम लोगनक हकों लिजी लड़ने प्रेरणा दिणीं चेतना भौत शुरू बै छी-
हण चैं मनम हौंस छु क्या चीज घबराणौं
धरि घुटि अगीला फिरी के पछिला आंणों
छौ आपण हातौं मजा तकदीर बनाणौं
जब क्वै मानो बाता, खुट-हात फौलादा
शीर पांणिकी वां फुटैली, मारुल जां राता।
राणा ज्यूक य गीत एक टैम पर उत्तराखंडक आंदोेलनोंक शीर्षक गीत बन गौछि। उनर एक गीत छु ‘हम पीड़ लुकानै रया।’ य गीत में बिंब, प्रतीक, शिल्प, अलंकार और शब्द चयन अद्भुत छन- ‘दिन आनै-जानै रया/हम बाटी कैं चानै रया/सांसों की धागिले आंसों का/हम फूल गठ्यानै रया।’ य गीत में सांसों क धागैल आंसूक फूल गठ्यौण अकल्पनीय प्रतीक छू। जीवनाक विडंबनाओं और संघर्षों बे निकली आवाजों में इतुक गैर पीड़ कैं हीरासिंह राणा ज्यू समझ सकनी-
खुशी बाधइ जब निझूली, गङरथौं कुपई निफुली,
हियै की बांजी धर्ती कणीं, आंसौं लै भिजानैं रया।
जब खुशीक बादौव नि बरस, मन में जो स्वींण पाली छि वीक कली नि खिल, तो हमूल निराश हैबेर आपण आंसूल बांजि धरती कैं भिजै दे।
हीरासिंह राणा ज्यूक एक प्रतिनिधि कविता छू- ‘हिरदी पीड़।’ समाजाक आखिरी लैन में ठाड़ हैई लोगनैक पीड़ कैं भौते गहराई में उतर बैर रची य गीताक दार्शनिक पक्ष देखण लैक छू-
चढ़न सूरज कणि अरग चढ़ानी,
बड़नी डाई कैंणि पांणि प्यवानी।
निगह्र्याई रात कैले नि देखी
चायो सबुलैं राती उज्यांणी।
य गीत में ‘निह्र्याई’ शब्द राणा ज्यूक शब्द चयन और कथ्य पर उनर मजबूत पकड़ कैं बतौं। असल में य खालि एक काई रात न्हैंत। यैसि गहरी कष्टों ल भरि रात छू जैकैं आसानील नि देखि जै सकन। वीक लिजी उतुकै पीड़ म उतरण पणौं। लोगन में कष्टभरी रातक बाद एक यस रत्तियक उम्मीद छू जो उनर जीवन में उज्याव ल्हिबेर आल। राणाज्यू हर कष्टभरी रात कैं आपण जीवन में एैसिक शामिल कर लिन्ही कि उ हर नई रत्तिब्याणैंक आस जगौं। उनैरि य आस में भौत अघिल तक हिट सकणीं चेतना छू। य चेतना कैं समझणांक लिजी एक दृष्टि लै चैंछ। हम कै सकनूं कि राणा ज्यू शब्दों और भावों दगडै दृष्टिक साथ चलणीं कवि लै छन। जीवनाक संघर्षों दगै लड़नी, अपाण स्वैंणाक कुचलते देखणीं समाज कैं भौत बार दिन मजिक उज्याव लै अन्यार जस लागूं। कतुक लोगों लिजी तो यौ उज्याव मृगमरीचिका जस लै है जांछ-
घाम छनै अन्यार द्यखौ हमूलै,
पाउ-पौशू हम गरदिशुलै।
हैंसैं हैं मन कौं हैंसूं कसिका,
बिपति लै पाडौ रूणैंकि बांणी।
आम लोगनैक तकलीफों कैं इतुक पीड़ैकि साथ धरणैंक कला राणा ज्यू कैं औरों है अलग करीं। य पीड़ कैं राणा ज्यू ‘गरीबै चैली ख्वट डबला’ कविता में व्यक्त करनी। पहाड़ाक गौंनूक गरीबी-लाचारी बैटिक पैद हई निराशा मजैं आम आदिम भौते स्वैंण बुंणबेर आपण एक ठुल संसार बणै द्यौं। आम लोगनैक परिस्थितियों चलते कसिक वीक उम्मीद बिखरनी-टुटनी उकैं पकड़नैकि संवेदना हमेशा हीरासिंह राणा ज्यूक कविताओं में छू। टाल हालि कपड़ों में गरीबैक चेलिक पास एक डबलौक सिक्क छू। उ इकैं लिबैर भौते रौंती रै। हावम उणनैं। वीक खुट जमीन में न्हैंत। आपण हातम उ सिक्क कैं कसबेर पकड़ बेर उ दुकान में जैंछ। गांणिमाणि लगैं कि य डबलैल उ पुर दुनि कैं खरीद सकैं। आपण इजाक लिजी चरेऊ, बौज्यूक जिली साफा, छ्वाट भैक लिजी खिलौंण, ठुल दादीक लिजी मुरुलि, भौजीक लिजी नौ पल्ले जंजीर खरीद सकीं। आपण गौरुक छोटी बाछिक गाव में बादणांक लिजी एक घंटी लै खरीदण चांछ। वील य डबलक सिक्क में आपण भौत ठुल दुनी बसै है। उ समझीं कि दुनी में जो लै सबुहैं भलि चीज छू उकैं खरीद ल्हैलि। उ आजि य सब सोच बेर बुदबुदै रैछि। आपण स्वैंणोंक एक नई दुनी बसौंण रै छि। दुकानदारैल वीक भावों कैं समझबेर वीक झगुली में मूंगफली-चणांक कुछ दांण धरते हुए बता कि त्यर सिक्क ख्वट छू। फाटि झगुलि बे सब मूंगफली और चांण जमीन में बिखर गईं-
इजैं हैं चर्यो, बौज्यू हैं टांकौं,
नान भुलि मरिय छुण मुण्यांकौं।
एक मुरुली दाज्यू हैं दिह्यो,
भौजि हैं जंजीर जो हौ नौ पला।
बांकि रैहै गेछ गोठै कि बाछि,
घानि दि दिना त बड़ै दया छी।
राणा ज्यू जीवन भर अभावों बीच संघर्ष करते रईं। उनूल कभैं आपण संघर्षों कैं मुसीबतक रूप में नि द्येख, बल्कि उनुकैं सब लोगोंक आवाज बणै दे जो परिस्थितियों दगै लड़ते रौनी। ‘घाम गयौ धारमा’ यस्सै एक गीत छू-
गय नना इस्कूलमा, जस पौथिला घोलमा,
क्वै नानी उमर बै रौया, रात-दिना बौलमा।
ल्येखि ननौं ले पाटी, आपण-आपण बाटी,
कैक भागम कलमा चली, कैल खनी छौ माटी।
‘कौतिकौ थौ’ हीरासिंह राणा ज्यूक श्रेष्ठ रचनाओं में एक छू। समाजक मनोविज्ञान कैं ध्यान में धरि बेर य कविता कैं जसि बुण राखों उ देखंण लैक छू-
पुरण ‘घौ’ फिरी गय उच्येड़ी,
हैंसि खितकर आंसौं रौ में।
जुग बिता आजी लैं बितिला,
हनैं रैंल म्यर घौ हिकौ में।
तुम गया पर मैं कथां जौं,
हौय तो आंखर कौतिकौ थौ में।
कौतिक में आपण जांणी-पहचांणी भौते लोंगनक जमघट। साल म एक बार यह जमीन पर लागंणि कौतिक में एक अलगै उन्मुक्तता छू। दूर गौं-गाड़ बे मिलहूं औंणि सबूंक मिली-जुली सुख-दुख छन। कौतिक रौंत में नाचणिं-गाणीं लोगोंन कैं कौतिक थौ सालों बे देखणौं। उकैं लागूं कि जब लै य कौतिक हों सब म्यर घौनूं कैं सेकनी। एक-द्वि दिन बाद जब य मायावी भीड़ छंट जैंछ तो कौतक्यार आपण-आपण घरौं हैं ल्है जानी। कौतक्यारौंल आबाद कौतिकौ थौ फिर वीरान है जां। कौतिको थौ यस प्रतीक छू जो समाजक बीच में लै आदिमक अकेलापन कैं व्यक्त करूं।
राणा ज्यूक एक प्रसिद्ध गीत छू- ‘आ लिली बाकरी लिली छ्यू...।’ साठक दशक में आकाशवाणी लखनऊ बटि ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध लोक गायिका बीना तिवारी ज्यूक आवाज में य गीत कैं श्रोताऔंल भौत पसंद करौ। राणा ज्यू बतौंछि कि य उनर पैल गीत छी। भारतरत्न गोविन्दबल्लभ पंतज्यूक जयन्ती पर 1962 में दिल्ली में एक कार्यक्रम में पैल बार उनूल य गीत गा। यैक लिजी भौते मेहनत करी। लाल किल्ल बटि चार बकार किराय पर ल्याईं और चीड़ाक ठिठ और हरी पत्तौंल स्टेज सजाछ। कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री लै मौजूद छी। शास्त्री ज्यू गीत तो उतुक नि समझ पाय, लेकिन भाव समझ बेर गीतैक भौत तारीफ करी। गोविन्दबल्लभ पंतज्यूक घरवाईक आंखों में आंसु ये पड़ीं। बाकर और वीक गुसैंक माध्यमैल प्रकृति और समाजाक अन्तर्सबंधों कैं देखणैंक य अद्भुत दृष्टि छू। राणा ज्यूक गीतों में मनुष्य और मनुष्येक वेदना अलावा बकार-बैल जास पालतू जानवर लै छन। बाकर और ग्वावक सुख-दुख, हंसी-खुशी साझा छन। बकारौक लिजी ग्वावैकि जिम्मेदारी और बाकर दगै वीक आत्मीयता य गीत में देखि जांछ। बाकर ग्वावक लिजी एक पालतू पशु न्हैंत, बल्कि वीक दगड़ि छू-
जब निखया मैंल बुधुआ, मेरि बाकरिल गोव,
ग्वेलदेरांणी द्विय डबला भेंट चढौंला भौव।
हम ग्वलों की त्वी छै देवी और कहैं कू...कू,
आ लिली बाकरी लिली छ्यू...छ्यू...।
हीरासिंह राणा ज्यूक एक भौते प्रसिद्ध गीत छू- ‘हाय...हाय रे मिजाता।’ कथ्य, शिल्प, बिंब, प्रतीक और कोमल भावों साथ प्रकृतिक यस चित्रण राणा ज्यू कर सकनीं। उनर गीतों में प्रकृतिक सौंदर्य प्रकृति प्रदत्त छू। य स्वाभाविक रूपैल उनर रचनाओं में ऐ जांछ। मानिलै डानि बे हिमालयौक उ छटा विस्तार छू जां उ आपण रूप-यौवन कैं बदलते रौं। बुरांसक फूलों दगड़, बांज-चीड़ौंक बणों बे निकलणीं संगीत बटिक, गाड़-गध्यार, छीड़ोंक कल-कल करणीं आवाजैल, उच्च हिवांल-कांठीक बुग्यालों बे ल्हिबेर हरी-भरी डान-कान सब प्रकृतिक बसाई छू। प्रकृतिक तमाम बिंब राणा ज्यूल य गीत में शामिल करी छन। सही मायनों म राणाज्यू सौन्दर्यक कवि छन। प्रकृति और नारीक सौदर्यक नई उपमान कसी गढ़ी जानी य गीत वीक उदाहरण छू-
रङिल बिंदी घाघरि काई, धोती लाल किनार वाई,
आय हाय रे मिजाता, आई होइ रे मिजाता।
एक हाति दातुलि छौ एक हात ऐना,
नौ पाटै घाघरि परा रेशमियां चैना।
य गीत कैं भले ही नारी सौंदर्य दगै जोड़ बे देखि जां, लेकिन यो प्रकृतिक सम्मोहन छू, प्रकृति दगै अनुराग छू। पूर्णिमाक जून हिमालयैक ख्वर पर बिंदी छू। हिवांल-कांठीक काव घ्यर घाघरोक प्रतीक छू। सुकिल हिमालयौक तली बे पड़नी लालिमा साड़िक किनारौक प्रतीक छू। हिमालयी नारीक सौंदर्य और श्रम कैं निरूपित करणीं एक यस बिंब छू जमैं प्रेम, श्रम, संघर्ष, सौंदर्य, संवेदना, सदभाव और समभाव शामिल छू।
हीरासिंह राणा ज्यूक दूसर कविता संग्रै छु ‘मानिलै डानि।’ य संग्रै में उनर एक सुप्रसिद्ध गीत छू- ‘म्यर मानिलै डानि...।’ य गीत भले ही मां मानिला देवी स्तुति छू, लेकिन य गीतक भाव राणा ज्यूक कविता यात्राक दिशा कैं बतौं। प्रार्थना में उनूल मां मानिला हैं महाविद्यालय बनौंण लिजी बिनती करी छू। यैल समझी जै सकौं कि उनार गीतों में सामाजिक सरोकारों लिजी कतु जागि छू-
इंटरा करौछ त्वीलै ‘काठौ’ कौ इस्कूल
डिगरी कौलेज देवी ख्यलौं हरौ झूल
सब नान चैरई नानी, हम त्येरि बलाई ल्युंल।
हीरासिंह राणा ज्यूल आखिरी पद में आपण परिचय दिबैर साबित करौ कि उं आपुकैं ‘गिदार’ किलै माननी-
मैं छू ‘हिरू’ डढोई कौ पीडै की गढोई,
त्य खुटां तब ल्यै रौं यो पीडै कैं बटोई
मेरि बिनती जये मानी, हम त्येरि बलाई ल्युंल।
क्वै आपण पीडैकि इतुक ठुल गढोई बने सकौं, य एक अकल्पनीय बिंब छू। आपण पीडैकि उपमा एक घासैक गढोई दगै करण, जमैं कतुकैं पुल होंनी। एक घासक पुल में भौते तिनाण छन। हजारों तिनड़ा कैं मिलै बेर एक गढोई बनीं। राणा ज्यूक य दुखैकि गढोई उनैरि न्हैत, पुर समाजाक संकट उनरा छन। यैक लिजी उनूल कौ कि मि समाजाक सारे कष्टोंक गढोई माताक चरणों में ल्है रयौ। उनूल आमजन दगै य जुड़ाव कैं अपनी रचना-यात्रा में हमेशा कस बेर पकड़ो।
राणा ज्यूक तीसर कविता संग्रै ‘मनखों पड्यौव में’ 1987 में प्रकाशित हो। य संग्रै में एक गीतकार और गायक है भ्यार निकल बेर उनूल कवि रूप में आपण नई परिचय करा। ‘मनखों पड़ाव में’ आपण निजी कष्टों जागि कैं सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं कैं ज्यादा जागि मिली। राणा ज्यूक कविताओं में प्रकृतिक सौंदर्य और भावोंक कोमलता छू। ‘फूल टिपो-टिपो हैरे’ कविता में उनूल प्रकृति कैं कथ्य बनै बेर योस शिल्प गढ़ो कि राणा ज्यू प्रकृतिक सच्च उपासक और अनुरागी लागनी। उनुकैं उन फूलों कैं तोड़न में लै कसक लागीं जनुकैं तोड़ बेर गौंपन फुलदेईक त्यौहार मनाई जांछ। राणा ज्यूकैं लागौं कि फुलवारी बे फूल तोड़नी पुज्यारि फूलों दगै मनमानी करणौं। पुज्यारिक फूल तोड़न कैं लिबेर उनार भाव यास किस्माक छन कि फूलोंक राजा-रानी सहमी हुई छन। जो खिलती कली छन उनर रंग उड़ गो। डाई-बोट सब कंपकपानी। प्रकृतिक प्रति उनैरि उदारता कविता में फूट पड़ी-
ह्यौ अैगो पुज्यारि द्यखौ थैं, कैकैं टिपूं ज्यांणी,
चुप्प छना रजा फूलों का, चुप्प फूलों की राणी।
हर कुपईक रङ उढैगो, कैकैं मलासों मैं,
नौल-कुपव लग-लगै रैं।
हीरा सिंह राणा ज्यूक रचनाओंक सबूहैं मजबूत पक्ष छू पहाड़ैक सैंणियोंक कष्टपूर्ण जीवन कैं उकैरण। उनर रचना संसारोक एक ठुल हिस्स पहाड़ाक सैंणियों पर केन्द्रित छू। उनूल पहाड़ाक सैंणियोंक वेदना कैं जो दृष्टिल देखौ वील उनर सृजनता कैं नई आयाम दे। सबै रचनाओं मैं पहाड़ाक सैंडियोंक सौंदर्य, संकट, साहस, श्रम, संघर्ष, जिजीविषा, कोमलता और ममतामयी रूप भौत गैर समझक साथ अभिव्यक्त छन। ‘दुल्हैंणि’ कविताक एक चित्र देखो-
चंचल बाली उमर उछांण लागि घाम जसी,
शर्मेकि क्वेखिम लुकिग्ये क्वे बदनाम जसी।
बखतैल मारि सिक्वोड़िल खैंचि लग्याम जसी,
मैतैकि मुलिकि रै हैगै बस्स एक फाम जसी।
राणा ज्यूक एक कविता ‘महेड़ी’ में पहाडैक सैंणियोंक वास्तविक चित्र उभरों। पहाडाक सैंणियोंक कष्ट समाजवादी छन। गरीब और अमीर सैंणियोंक संकट एक जस्सै छन। न भल खांण, न पहनण, न ओढन, न बिछोंण। कलम-दवात कभैं पकड़ि ना। त्यागैकि एैसि प्रतिमूर्ति कि घर-बण सबै जिम्मेदारी निभाते हुए परदेश में जाई मैंस और बच्चोंक जिम्मेदारी लै वीकै ख्वार में छू-
भ्योव पखाडौं का गीद गहानैं,
खेतों का बीचम बिणै बजानैं।
नङडि खुट्यां मा बुड़िया कानी,
च्यापिंछ पीडै़ कैंक्ये नि चितानी।
पहाड़ा सैंणियोंक तप और त्याग,
आफि बणाय जैल आपैंण भाग।
राणा ज्यूक एक प्रसिद्ध गीत छू ‘अजकाल हैरे ज्वाना।’ य गीत में राणा ज्यूल प्रेम कैं उपासनाक चीज बता। हालांकि उनूल य गीत देशक आजादीक यौवन पर लिखौ। सल्ट में खुमाड़ाक शहीदोंक लिजी बनी स्मारक कैं प्रतीक बनै बेर उनूल नारीक सौंदर्य कैं आजादीक उन्मुक्तता दगै जोड़ बेर अद्भुत बिंब बना-
यौ रूप क्यछ यौ जोभन, भरमत्त हैरैं सब्ब,
म्यर गौं-गाड़का नान-तिन, त्यर भक्त हैरैं सब्ब।
हिट थापि दयुं त्यौरौ थाना म्येरि नौली पराणा।।
‘गीत कस ल्येखूं’ कविता में हीरासिंह राणा ज्यूक पुर रचना-संसारोक विस्तार मिलूं। उनर पास अलग-अलग किस्माक गीत छन। महलोंक, टुटी छानाक, सुन-चांदीक, टुटि भान-कुनांक। भौते गीत छन जनुमैं हम समाजैक पीड़ देख सकनूं। बताओ तो कस गीत ल्येखूं? द्वि डबल में बिचाणीं ज्वानीक गीत जै ल्येखूं या द्याप्त पुजणां लिजी मंदिरों बेची गैई घंटीक गीत ल्येखूं! राणा ज्यू पुछनि कि अभावोंक बीच में घरोक एक कुंण में भुखैल जो मरि गो उ गरीबोक बिना कफनैक लाशक गीत ल्येखूं! जोभन में भरी बानैक गीत ल्येखूं, जो गाव में हंसुलि, नाख में नथुलि, ख्वार में मांग टीका, गलोबंद और हाथों में पौंजी पैरी ब्योलिक गीत ल्येखूं या उ बेबस सैंणिक गीत ल्येखूं जैक ख्वारम बे बिन्दी झड़ गै-
छैं बाणी-बाणिका गीदा,
ठुलीका-नानिका गीदा।
छैं तिपुर महलों का गीदा
छैं टुटिया छानिका गीदा
सुनाका-चांदी का गीदा
छैं फुटिया भानि का गीदा।
हीरासिंह राणा ज्यूक गीत-कविताओं में समसामयिक सवाल लै भौत प्रमुखता उठी छन। उत्तराखंड में चली कई आंदोलनों में एक संस्कृतिकर्मी रूप में उं लगातार सक्रिय रईं। कतुकै आंदोलनों में न केवल उनूल गीत गाई, बल्कि उनुमैं शामिल लै हयीं। जिन सवालोंक जबावक जिली राज्य बनौ, उं स्वैंण पुर नि होणैंक पीड़ हमेशा उनर मन में छी। आपण चिंता उनूल एक गीतक माध्यमैल व्यक्त करी-
त्यर पहाड़, म्यर पहाड़
रौय दुःखों कौ ड्यर पहाड़
बुजर्गौंले ज्वौड़ पहाड़
राजनीतिलै ट्वौड़ पहाड़
ठ्यकदारौं लै फ्वौड़ पहाड़
नानतिना लै छ्वौड़ पहाड़।
उत्तराखंड राज्य आंदोलनक दौरान मुजफ्फरनगर कांड बे दुखी हैबेर उनूल एक भौत चेतनायुक्त गीत ल्यखौ-
उत्तराखंडक रैणी हम
सीमाओं पर ठड़ी हम
जबलै देशम लडैं़ लागि
पैल गोई खणीं हम
हम छौं देशैकि ठाड़ि मुनइ
तबजै हम उदंगार हौईं।
सामाजिक और राजनीतिक सवालों पर लै उनूल भौत गीत-कविता ल्यैखीं-
अहा रे जमाना, ओहो रे जमाना
त्विल आपण रङम रङा, कै बुड़ा क्यै ज्वाना
सब्बों हैबेर ठुल्ल हैगो दुनि मजी पैंस
पैंसों की जागर लैरै छौ, नाचणई मैंस
नै कैकौ ईमान रौय, न कैकी जुबाना।
हीरासिंह राणा ज्यूल प्रेम-सौंदर्य पर लै भौत गीत-कविता रचीं-आईं। उनर एक गीत म बिंब और प्रतीक देखण लैक छन-
बुरांसे कि फुली डइ जसी, क्य रंगदार छै तू
कार्तिकी मौ जसि, क्य रसदार छै तू
कैदार पुन्यौंकि, उदंकार जून
कसम से हजारों में एक छाजिंछै ऐ।
श्रंृगाराक गीतों में प्रेम निवेदन कैं लै जो शालीनताल उनूल प्रस्तुत करौ, उ प्रेमक प्रति उनर समर्पण को बतौं-
जरा भीं चहाथैं अगासम क्य छा ए
मुए बलबलानै इतुक नै उढ़ा ए
कभणि बै मैं चेरौं यों त्यर बाट-घटा कैं
कतुक छुटि गईं आजि यौ फिरि नौ जनम छौ।
राणा ज्यूल पर्यावरण, साक्षरता, नशामुक्ति, सामाजिक चेतना जास भौत विषयों पर आपण गीत-कविता लेखीं। कुमाउनी त्योहारों में प्रकृति, लोक परंपराओं में विज्ञान पर लै उनूल भौत कविता लैखीं। गीत-कविताओं अलावा राणा ज्यूल ‘ग्वैल लीला’, ‘कुमाऊं की बारादौली सल्ट’, ‘स्वाधीनता आंदोलन में उत्तराखंड का योगदान’ और उत्तराखंडःएक संघर्ष यात्रा’ नामैल चार नाटक लै ल्येखीं।

मनिला डांडे की देवी मां आज बहुत उदास है

'मनिला डांडे की देवी मां आज बहुत उदास है'

Dr. Arun kuksal



देवी मां उदास है परन्तु परलोक गया पुत्र आज भी यादों में आकर उसको हिम्मत दिला रहा है। मनिला डांडे की देवी को ही नहीं हमारे पूरे समाज को कि -
'लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा,
फिर भोला उज्याला होली, कां रोली राता।
लोक के चितेरे जनकवि हीरा सिंह राणाजी की आज तीसरी पुण्यतिथि है। उनसे हुई अंतिम मुलाकात को याद कर रहा हूं। 12 नवम्बर, 2019 की रात वैकुंठ चतुर्दशी मेला, श्रीनगर (गढ़वाल) में गढ़-कुमाऊंनी कवि सम्मेलन के मंच पर नरेन्द्र सिंह नेगीजी एवं अन्य कवियों के मध्य जनकवि हीरा सिंह राणाजी भी शोभायमान थे। प्रिय मित्र चारू तिवारीजी एवं विभोर बहुगुणाजी के साथ कवियों की कविताओं का आंनद लेते हुए नज़र हीरा सिंह राणाजी पर जाती रही। और अस्सी के दशक में सड़कों पर तमाम जलूसों और जन-यात्राओं में गाया उनका गीत ‘लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा, फिर भोला उज्याला होली, कां रोली राता।’ याद आता रहा।
अस्सी के दशक में नैनीताल और अल्मोड़ा की सड़कों पर जलूस में हीरा सिंह राणा जी के साथ जन गीतों को गाते हुए लगता था कि कमर बांधने का यही सही वक्त है। जीवन के प्रति सकारात्मक जज्बें को उनके गीत आज भी भर देते है।
हीरा सिंह राणाजी का अस्वस्थ शरीर, चलने में दिक्कत, 77 साल की आयु है, तो क्या हुआ ? मन तो ‘लोक’ का हुआ, जो कभी पुराना और परेशानियों से परास्त नहीं होता। राणाजी की बुलंद आव़ाज में वही ख़नक, जोश और ताज़गी बऱकरार थी।
‘रंगीली बिंदी, घाघर काई, धोती लाल किनर वाई, हाय हाय हाय रे मिजाता, हो हो होई रे मिजाता’ जैसे गीत राणाजी को हमेशा युवा मन का बनाये रखा था।
कुमाऊंनी लोकगीत-संगीत के पुरोधा हीरासिंह राणाजी दिल्ली सरकार के कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग के अंतर्गत गठित ‘कुमाऊंनी-गढ़वाली एवं जौनसारी लोकभाषा अकादमी’ के उपाध्यक्ष थे। आज यह नव-नवेली अकादमी हमारी लोकसंस्कृति की विशालता और वैभव को देश-दुनिया में स्वीकारने का प्रतीक है। साथ ही उत्तराखंड में आयी-गई सरकारों पर तीख़ा प्रहार भी है।
किशोरावस्था से लोक संस्कृति के दीवाने हीरा सिंह राणाजी ने लोकगीत-संगीत को ही अपने जीवन का ओढ़ना-बिछौना बनाया। जीवन में घनघोर मुश्किलें भी आई पर उनको ‘परे हट’ कहने की ‘लोक ताकत’ उनके मन-मस्तिष्क में हर समय विराजमान रही। जीवन की विकटता और आपा-धापी पर ‘मन का लोक प्रेम’ उनमें हर समय जीवंत रहा।
16 सितंबर, 1942 को डंढ़ोली गांव (मनिला), अल्मोड़ा में जन्मे लोककवि हीरा सिंह राणा का प्रारंभिक जीवन-संघर्ष दिल्ली और कोलकता में रहा। प्रवास से मन हटा तो वापस पहाड़ आकर लोककलाकार बन गए। धीरे-धीरे आकाशवाणी और दूरदर्शन के बाद देश-विदेश में अपनी पहचान बनाई। विगत 60 वर्ष से कुमाऊंनी लोक गीत-संगीत के नायक हीरा सिंह राणा के मधुर गीत ‘मेरी मानिल डानी’, ‘आ ली ली बकिरी’, ‘नोली पराणा’, ‘धना धना’, ‘रंगीली बिंदी’ सदाबहार गीत हैं।

'लस्का कमर बांधा तो उनकी कालजयी रचना है।
लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा।
फिरनी भोला उज्याला होली, कां रोली राता।
ऊं निछ आदिम कि, जो हिम्मत कै हारौ।
हाय मेरी तकदीर कनै, खोर आपण मारौ।
मेहनतै कि जोतलै जौ, आलसो अन्यारौ।
के निबणीनि बाता, धरिबे हातम हाता।
जे के मनम ठानि दिया, हैछ क्या ठुली बाता।
हण चैं मनम हौंस छु क्या, चीज घबराणौं।
धरि खुटी आगीला, फिर के पछिली आंणौं।
छौं आपण हातौ माजा, तकदीर बनाणौ।
जब क्वे नि मानो बाता, खुट-हाथ फौलादा।
शीर पाणिकी वां फुटैली, जा मारूल लाता।
यौ निहुनों उनिहुनों, झुलि मरौ किलै की।
माछि मनम डर निरैनी, चैमासी हिलै की।
टिके रौ हौ संसार आपण, आस मा दिलै की।
करबे करामाता, जैल रौ कि यादा।
के बणी के बणै बेरा, जाण चहीं बर्साता।
दुःख-सुख लागियै रौल, जबलै रूंल ज्यौना।
रूड़ि गोय चौमास आंछ, चौमास बे ह्यूना।
जब झड़नी पाता, डाइ हैंछ उभ्याता।
एक ऋतु बसंत एैंछ, पतझड़ का बादा।
‘हिम्मत के साथ अपनी कमर को कसकर बांधो,
कल फिर उजाला होगा, और रात कोने में बैठ जायेगी,
वो आदमी नहीं है, जो हिम्मत को हार जाता है,
और हाय ! मेरी तकदीर कह कर अपने सिर को ही पीटता है,
मेहनत से ही आलस भरा अंधेरा दूर हो सकता है,
हाथ पर हाथ रखकर कोई भी बात नहीं बनती है,
अगर मन मैं ठान दिया तो कोई भी बात बड़ी नहीं है,
अगर मन में जोश है तो, किस चीज से घबराना,
एक पैर आगे रखो, फिर पिछला पैर स्वयं ही आगे आयेगा,
अपने हाथ से तकदीर बनाने का मजा ही कुछ और है,
जब कहीं से बात न बने तो अपने हाथ-पैर ही फौलाद हैं,
पानी की धार वहीं फूटेगी जहां हम लात मारेंगे,
.....दुःख- सुख लगे रहते हैं, जब तक जिदंगी है,
गर्मी के बाद चौमास आता है, चौमास के बाद जाड़ा,
जब पत्ते झड़ जाते हैं, तो पेड़ ऊंचा लगने लगता है,
और उसी पतझड़ के बाद खुशहाली की ऋतु बंसत आती है।’
"ये मेरी मानीले डानी....
हम तेरी बलाई ल्यूँ ला
तू भगवती छै भवानी....
हम तेरी बलाई ल्यूँ ला...."
मित्र चन्द्रशेखर तिवारी के साथ वर्ष 2016 में एक शोध अध्ययन के सिलसिले में मनिला - सल्ट के गांव - पहाड़ी धार -गधेरों और लोगों में हीरा सिंह राणा जी की ये श्वास्वत आवाज हमने हर क्षण महसूस की थी।
आज 'मनिला डांडे की देवी' बहुत उदास होगी। उनका हीरा पुत्र जो इस लोक से अनंत यात्रा पर चला गया था।

अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, ब्लाक- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

Sunday, June 11, 2023

गफलत की नीति : अब नए नाम की डिग्री ले लो || आर्ट्स पढ़ें या साइंस, सभी में मिलेगी बीएस और एमएस डिग्री!

अब नए नाम की डिग्री ले लो || आर्ट्स पढ़ें या साइंस, सभी में मिलेगी बीएस और एमएस डिग्री!

Dr. Sushil Upadhyay

यूजीसी ने जुलाई, 2014 में डिग्रियों के नए नोमेनक्लेचर जारी करते हुए कुल 129 तरह के उपाधि नामों को स्वीकृति दी थी। इस सूची से इतर सभी उपाधि नामों (नोमेनक्लेचर) को अमान्य घोषित कर दिया था। अब नए सिरे से नामों के निर्धारण की कवायद शुरू हुई है। उपाधि नामों में सुधार और संशोधन के पीछे राष्ट्रीय शिक्षा नीति को आधार बताया गया है। इसके लिए यूजीसी ने एक कमेटी गठित की थी, जिसने अपनी सिफारिशें सौंप दी हैं। इन सिफारिशों में विरोधाभासों और निर्बंध उपाधि नामों की संभावनाओं का अंबार लगा हुआ है। उम्मीद की जा रही है कि यूजीसी नए नामों को जल्द ही अधिसूचित कर देगी।


विशेषज्ञ समिति ने जिन उपाधि नामों की अनुशंसा की है, उन्हें देखकर लग रहा है कि आने वाले दिनों में उपाधि नामों की संख्या बढ़ने जा रही है। सबसे उल्लेखनीय बदलाव यह है कि चार वर्ष की स्नातक उपाधि का नाम बीएस यानी बैचलर ऑफ  साइंस हो जाएगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि बीएस उपाधि नाम के साथ सभी विषयों की डिग्री दी जाएंगी। जो छात्र आर्ट्स, कॉमर्स, साइंस, इंजीनियरिंग, सोशल साइंस आदि के साथ 160 क्रेडिट की डिग्री पूरी करेंगे, उन सभी को बीएस उपाधि मिलेगी। इससे साफ है कि यह उपाधि केवल साइंस तक सीमित नहीं रहेगी। यह मानक एक साल और दो साल की मास्टर डिग्री पर भी लागू होगा। मास्टर लेवल पर सभी विषयों/संकायों में एमएस उपाधि दी सकेगी। (हालांकि, मेडिकल साइंस वाला एमएस पहले से ही मौजूद है। ऐसे में मेडिकल से इतर विषयों में स्नातकोत्तर उपाधि के लिए एमएस उपाधि नाम प्रस्तावित किया जाना औचित्यपूर्ण नहीं लगता।)

बीएस और एमएस उपाधि नामों को देखकर ऐसा लग सकता है कि यह कोई उल्लेखनीय बात होने जा रही है। लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया के अनेक देशों में पहले से ही बीएस और एमएस उपाधि प्रदान की जा रही हैं। विशेषज्ञ समिति की मौजूदा रिपोर्ट में सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण बात यह है कि ज्यादातर मौजूदा नाॅमिनक्लेचर को ज्यों का त्यों रखते हुए उनके लिए नए नाॅमिनक्लेचर प्रस्तावित कर दिए गए हैं। इससे यूजीसी का वर्ष 2014 का वो प्रयास सिर के बल खड़ा हो गया है, जिसमें उपाधि नामों की संख्या को नियंत्रित किया गया था। उदाहरण के लिए समिति की अनुशंसाओं में कहा गया है कि तीन वर्षीय बीए, बीकाॅम, बीएसएसी नामों को जारी रखते हुए इन विषयों की चार वर्षीय डिग्री को बीएस भी कहा जाएगा। इसी तरह इनका नाम बीए/बीकॉम/बीएससी ( ऑनर्स  विद  रिसर्च) भी हो सकता है। इसके साथ वर्तमान में संचालित बीए/बीकॉम/बीएससी (ऑनर्स) भी जारी रहेगा।

इस क्रम में यह बात भी ध्यान देने वाली है कि यदि किसी विश्वविद्यालय को ऐसा लगता है कि उसकी उपाधि का नाम उपर्युक्त से भिन्न होना चाहिए तो वह यूजीसी को आवेदन कर सकता है। उपर्युक्त अनुशंसाओं में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि संबंधित विश्वविद्यालय उपाधि नाम के आगे ब्रैकेट में विषय का उल्लेख भी कर सकते हैं। जैसे बैचलर ऑफ आर्ट्स इन म्यूजिक या बैचलर ऑफ साइंस इन जिओलाॅजी। इन्हें संक्षेप में बीए (म्यूजिक) या बीएससी (जिओलॉजी) भी कहा जा सकेगा। इस समिति ने विश्वविद्यालय स्तर की डिग्रियों को 11 स्तरों में बांटा है। एक वर्ष की पढ़ाई पर यूजी सर्टिफिकेट, दो वर्ष की पढ़ाई पर यूजी डिप्लोमा, तीन वर्ष की पढ़ाई पर स्नातक, चार वर्ष की पढ़ाई पर स्नातक ( ऑनर्स विद रिसर्च), पांच वर्ष की पढ़ाई पर स्नातकोत्तर डिग्री मिलेगी। इनके बीच में एक मामला पीजी डिप्लोमा का भी है। इसे चार वर्षीय डिग्री के समान लेवल पर रखा गया है।

गैरतकनीकी विषयों में तीन वर्ष की स्नातक के बाद स्नातकोत्तर डिग्री दो वर्ष की होगी, जबकि चार वर्ष की डिग्री के बाद स्नातकोत्तर डिग्री एक वर्ष की होगी। (आप चाहें तो वर्ष आगे-पीछे किए जाने को पर बड़ा बदलाव मान सकते हैं!) इंजीनियरिंग विषयों में चार वर्ष की बीटेक/बीई (जिन्हें बीएस भी कहा जाएगा) के बाद दो वर्ष की मास्टर डिग्री होगी। संभवतः इसी आधार पर एमए, एमकाॅम, एमएमसी की तुलना में एमटेक/एमई का क्रेडिट लेवल ज्यादा रखा गया है। एमए, एमकाॅम, एमएमसी का केडिट लेवल साढ़े छह है, जबकि एमटेक/एमई का क्रेडिट लेवल सात है। इससे तय हो गया कि सांइस से जुड़े विषयों की स्नातकोत्तर उपाधि इंजीनियरिंग उपाधि से कमतर मानी जाएगी। उपाधि नामों की नई सूची में से एमफिल को हटा दिया गया है। सबसे ऊंचे स्तर पर पीएचडी होगी। संभवतः इस डिग्री को पूर्व की तरह ही डीफिल भी कहा जाता रहेगा।

इस समिति ने डी.लिट और डी.एससी का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इसी प्रकार संस्कृत साउंडिंग नोमेनक्लेचर का भी कोई उल्लेख नहीं किया गया है। अरबी-फारसी की परंपरागत डिग्रियों के नामों के बारे में भी कोई अनुशंसा नहीं की गई है। समिति की अनुशंसाओं में एक विरोधाभासी बिंदु यह है कि डिग्री हेतु निर्धारित क्रेडिट स्कोर प्राप्त होने के बाद संबंधित डिग्री अवार्ड करने के लिए न्यूनतम समय सीमा को नहीं देखा जाएगा। जबकि समिति की रिपोर्ट में  नोमेनक्लेचर  की लिस्ट में हरेक उपाधि के साथ न्यूनतम समय अवधि का उल्लेख किया गया है। न्यूनतम समयावधि की बजाय निर्धारित क्रेडिट स्कोर को प्राथमिकता देने की सिफारिश बेहद आकर्षक तो है, लेकिन भविष्य में इससे कई प्रकार की तकनीकी समस्याएं खड़ी होंगी। उदाहरण के लिए यदि कोई छात्र तीन वर्ष की स्नातक उपाधि के लिए निर्धारित 120 क्रेडिट स्कोर को दो वर्ष में प्राप्त कर लेता है तो उसे दो वर्ष की स्नातक उपाधि दी जाएगी या तीन वर्ष की ? यदि दो वर्ष की स्नातक उपाधि दी जाएगी तो इसे मान्य किए जाने की प्रक्रिया कब निर्धारित होगी ? और दो वर्ष में उपाधि पूरी करने के बाद यदि संबंधित छात्र स्नातकोत्तर में प्रवेश लेना चाहे तो क्या उसे प्रवेश दिया जाएगा, इस पर भी समिति की ओर से कुछ नहीं कहा गया है।

एक खास बात यह कि पीएचडी में प्रवेश के लिए न्यूनतम अर्हता क्रेडिट लेवल 6 यानी चार वर्षीय स्नातक ( ऑनर्स  विद रिसर्च) उपाधि को को अर्हता बताया गया है, लेकिन क्रेडिट लेवल 6.5 यानी एमए, एमएससी, एमकाॅम अैर क्रेडिट लेवल 7 यानी एमटेक/एमई को छोड़ दिया गया है। समिति ने अपनी मंथन प्रक्रिया में तीन वर्ष डिप्लोमा को अनदेखा कर दिया है। जबकि, ऑल इंडिया हायर एजुकेशन सर्वे के लिए भारत सरकार ने 10वीं के बाद के तीन वर्षीय डिप्लोमा को उच्च शिक्षा में सम्मिलित माना है। इसका एक अन्य पहलू यह है कि अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा तकनीकी और इंजीनियरिंग क्षेत्र में तीन वर्षीय डिप्लोमा का संचालन किया जा रहा है। इस रिपोर्ट की अंतिम अनुशंसा यह है कि नोमेनक्लेचर निर्धारण संबंधी रिपोर्ट को यूजीसी की स्टैंडिंग कमेटी को सौंप दिया जाए। इसका अर्थ यह है कि इनमें जो भी संशोधन या बदलाव होंगे, उन्हें स्टैंडिंग कमेटी देखेगी और उसके अगले क्रम में यूजीसी इन्हें अधिसूचित करेगी। तब तक और शायद उसके बाद भी मौजूदा नोमेनक्लेचर जारी रहेंगे।

स्थिति ये है कि यूजीसी की अधिसूचना के बाद नाॅमिनक्लेचर की संख्या बढ़ जाएगी। इस बढ़ी संख्या के साथ गुणवत्ता में कोई सुधार आएगा या नहीं, इसके लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। सच बात यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जारी होने के बाद जितने प्रकार की सूचनाएं, नियम-निर्देश और नोटिफिकेशन यूजीसी द्वारा जारी किए गए हैं, उन्ह सभी को एक साथ रखकर पढ़ लिया जाए तो विरोधाभासों का पिटारा खुल जाता है। आप चाहें तो इस विषय को और बेहतर ढंग से समझने के लिए नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क तथा कैरिकुलम एंड क्रेडिट फ्रेमवर्क फाॅर यूजी प्रोगाम वाले दस्तावेज को पढ़ सकते हैं।

cont. - डाॅ. सुशील उपाध्याय
9997998050

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