Friday, February 22, 2019

रवांई जौनपुर, संस्कृति की एक शाम, शहीदों के नाम

रवांई जौनपुर, संस्कृति की एक शाम, शहीदों के नाम

रवांई-जौनपुर सांस्कृतिक जन कल्याण समिति की ओर से हर वर्ष होने वाला रवांई-जौनपुर सांस्कृतिक महोत्सव इस बार पुलवामा हमले में शहीद हुए जवानों को, जिनमें उत्तराखंड के उत्तरकाशी के बनकोट निवासी शहीद मोहनलाल रतूड़ी, खटीमा के वीरेंद्र सिंह, हमले के मास्टरमाइंड आतंकी राशिद गाजी को ठिकाने लगाने के दौरान शहीद हुए मेजर विभूति ढौंढियाल और आईईडी डिफ्यूज करते समय देश के लिए कुर्बानी देने वाले शहीद मेजर चित्रेश बिष्ट को समर्पित रहेगा। 

आगामी 24 फरवरी को सचिवालय के समीप लॉर्ड बैंकटेश्वर वेडिंग पॉइंट में रवांई-जौनपुर सांस्कृति की एक शाम शहीदों के नाम कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। जिसके मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत होंगे। साथ ही नगर निगम मेयर सुनील उनियाल गामा, यमुनोत्री विधायक केदार सिंह रावत, राजपुर विधायक खजान दास, धनोल्टी विधायक प्रीतम सिंह पंवार और पुरोला विधायक राजकुमार, जीएमवीएन के अध्यक्ष महावीर सिंह रांगड़ बतौर अतिथि कार्यक्रम में शामिल रहेंगे। कार्यक्रम की खासियत ये है कि इस कार्यक्रम से जो भी चैरिटी जमा होगी। वह शहीद जवानों के परिवारों के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराई जाएगी। 

एक शाम-शहीदों के नाम कार्यक्रम में रवांई के प्रसिद्ध लोक गायक महेंद्र सिंह चौहान, सीमा चौहान, रेशमा शाह, कुसुम नेगी, सुंदर प्रेमी समेत अन्य कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे। देश के शहीदों को लोक 
कलाकार अपने गीतों के जरिए शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे। पत्रकार वार्ता में अध्यक्ष भरत सिंह चौहान, दिनेश चौहान, सूरत सिंह चौहान, कोषाध्यक्ष नीतू चौहान, वरिष्ठ पत्रकार विजेंद्र रावत, आगम दत्त नौटियाल, मदन सिंह रावत, बचन सिंह जयाड़ा, सतेंद्र राणा, हरिमोहन प्रदीप रावत (रवांल्टा), प्रेम पंचोली, शूरवीर सिंह चौहान आदि मौजूद रहे।

Wednesday, February 13, 2019

नंगी धरती को सरसब्ज करने वाले मानववृक्ष नहीं रहे।


नंगी धरती को सरसब्ज करने वाले मानववृक्ष नहीं रहे।


प्रेम पंचोली

लगभग एक शतक की अवधी यानि, 97 की उम्र के पड़ाव तक वे पेड़ो को दुलारते रहे। वे उनसे बेहद प्यार करते रहे। उन्हे लोग वृक्षमानव भी कहते थे। एक ऐसा जीवट जीवन जीने वाले शख्स विश्वेश्वरदत सकलानी पिछले माह यानि साल के पहले माह में हमें यूं ही विदा कह गये। मगर उनके उल्लेखनीय कार्य सदा-सदा के लिए धरा पर विचरण करने वाले जीव र्निजीव के काम आयेंगे। टिहरी जिले के थत्युड़ विकासखण्ड के अन्र्तगत पुजार गांव में जन्मे विश्वेश्वर द्त्त सकलानी का जन्म 2 जून 1922 को हुआ था। वे पेड़ो की रक्षा करते करते जीवन के शतक को पूरा नहीं कर पाये और 22 जनवरी 2019 को उन्होने देह त्याग दिया। इस गमगीन माहौल में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने उन्हे श्रद्धाजंली दे कर कहा कि वे पर्यावरण संरक्षण के सजग प्रहरी थे। उनके देहवासन से राज्य की अपूरणीय क्षति हुई है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी, राज्यपाल डॉ. बेबी रानी मौर्य, पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणा ने भी विश्वेश्वर दत्त सकलानी के निधन पर गहरा दुख जताया है।  

उल्लेखनीय हो कि विश्वेश्वरदत सकलानी की कहानी भी विचित्र है। उन्होंने मात्र 8 साल की उम्र में पेड लगाने शुरु कर दिये थे। बताया जाता है कि अब तक 50 लाख से अधिक पेड वे लगा चुके है। एक विशाल जंगल तैयार करते करते उम्र के अन्तिम पड़ाव में उनकी आंखो की रोशनी तक चली गई। पर वे कहां मानते और लगातार वृक्षा रोपण करना, उनकी देखभाल करना, उनकी दिनचर्या जो थी ही। यही वजह रही कि उनकी लडखडाती हुई जबान भी यही कहती रही कि वृक्ष उनके माता पिता, वृक्ष उनकी संतान, वृक्ष उनके सगे साथी हैं। वृक्षो से उनका भावनात्मक लगाव रहा है। वे अपने दादा के साथ जंगलों में पेड लगाने जाते रहते थे। तो उनके दादा भी किसी माउन्टेंन मैन दशरथ मांझी से कमतर नहीं थे। जिन्होंने एक सडक के लिए पूरा पहाड खोद दिया था। विश्वेश्वर दत्त सकलानी की जिन्दगी में अहम बदलाव तब आया जब उनकी पत्नी शारदा देवी का देहांत हुआ। 1948 को हुई इस घटना के बाद उनका लगाव वृक्षों और जंगलों की सुरक्षा पर और बढता गया। अब उनके जीवन का एक ही उद्देश्य बन गया, केवल वृक्षारोपण और उनका संरक्षण।

इस बात का अन्दाज इसी से लगाया जाता है कि आंखो की रोशनी जाने के बावजूद भी वे अपने मिशन से पिछे नहीं हटे। बढते उम्र के पड़ाव पर वे लगातार शाररिक रूप से बिमार होते चले गये, तो भी उनका जंगलों में पेड लगाने का जूनून कम नही हुआ। दरअसल लगभग 60-70 वर्ष पहले यह पूरा सकलाना का क्षेत्र अधिकतर पेड़ विहीन ही था। वृक्षमानव श्री सकलानी ने इस क्षेत्र की नंगी पहाड़ियो पर बांज, बुरांश, सेमल, भीमल और देवदार के पौधे का रोपण शुरु किया। शुरूआती दौर में ग्रामीणों ने उनका काफी विरोध किया यहां तक कि उन्हे कई बार ग्रामीणो की मारा-कुठाई का सामना करना पड़ा। लेकिन वे अपने मिशन पर अडिग रहे। और आज लगभग 1200 हेक्टियर से भी अधिक क्षेत्रफल में उनके इस प्रयास से एक पूरा जंगल खडा हो चुका है।
उनके मित्र पुजार गांव के बुजुर्ग बताते है कि जब उनकी बेटी का विवाह था और कन्यादान होने जा रहा था तो उस समय भी वह जंगल में वृक्षारोपण करने गए थे। विश्ववेश्वर दत्त सकलानी का जीवन उन पर्यावरणविदों के लिए आईना है जो अपने जुगाड के कारण बडे बडे अवार्ड हथिया लेते है लेकिन जमीन में दिखाने के लिए कुछ नही है। बता दें कि उत्तराखंड के वन-ऋषि विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने हाथों में कुदाल और गैंती लेकर हजारो एकड़ में पूरा जंगल खड़ा कर दिया। पर वन विभाग को यह नागवार गुजरा और उन पर मुकदमा कर दिया। जाने-माने साहित्यकार विद्यासागर नौटियाल स्वयं सकलानी के मुकदमे की पैरवी करने खड़े हुए। यही वजह है कि विश्व में सबसे ज्यादा पौधरोपण करने वाले शख्सियत के नाम से भी श्री सकलानी जाने जाते है। वे कहते थे कि जब पेड़ लगाओगे, तब जीवन सुरक्षित पाओगे। उनकी इसी कहावत को संजिन्दा करने के लिए पुजार गांव के निवासियों ने शपथ ली है और गांव स्थित वृक्ष वंशावली वन में उनकी याद में पेड़ लगाने की योजना बना डाली।

ज्ञात हो कि इसी वृक्ष वंशावली वन में अभी तक सकलानी वंश के पुरखों की स्मृति में विश्वेश्वर सकलानी ने पेड़ लगाकर प्रकृति प्रेम की नई परंपरा की शुरूआत की थी। पत्नी शारदा और बड़े भाई नागेन्द्र दत्त सकलानी की मौत के बाद विश्वेश्वर दत्त ने अपना पूरा जीवन प्रकृति को समर्पित कर दिया। भाई की स्मृति में विश्वेश्वर दत्त ने सकलाना पट्टी में ही नागेन्द्र स्मृति वन भी तैयार किया। आज सकलाना पट्टी के पुजार गाँव का डांडा और आस-पास के लगभग 1200 हेक्टेयर क्षेत्र में बाँज, बुरांश, भीमल, सेमल देवदार का हरा-भरा जंगल लहलहा रहा है। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में जीवन समर्पित करने वाले वृक्ष मानव विश्वेश्वर दत्त सकलानी को 19 नवम्बर 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने इन्दिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया। जबकि जन्म, विवाह और मृत्यु के मौके पर लोगों को एक पेड़ लगाने की नसीहत देने वाले इस वन ऋषि ने खुद भी हमेशा इसका पालन किया। फलस्वरूप इसके विशेश्वर दत्त ने अपने पुरखों की याद में पुजार गांव में पेड़ लगाकर वृक्ष वंशावली तैयार की है। इस वृक्ष वंशावली वन में सकलानी वंश के पूर्वज आज भी पेड़ के रूप में जिंदा हैं। इस वृक्ष वंशावली वन में जाते ही ग्रामीणों को अपने पुरखों की याद ताजा हो जाती है।

इतना ही नहीं जब उनकी बेटी मंजू का विवाह हो रहा था तो कन्या दान के समय वह जंगल में पेड़ लगा रहे थे। गांव के लोगों ने काफी खोजबीन कर उन्हे विवाह के कन्यादान की याद दिलायी। इससे साफ जाहिर होता है कि उनके रग-रग में पर्यावरण संरक्षण का कितना जुनून था। उन्होंने हमेशा गांव में मांगलिक कार्यों में शिरकत करते समय लोगों को पेड़ बांटे। श्री सकलानी ने कभी भी अपने शरीर की परवाह नहीं की। सर्दी हो या गर्मी उनका हमेशा एक ही लक्ष्य, पेड़ लगाना। ऐसे में अधिकांश समय जंगलों में धूल भरी मिट्टी के कारण उन्हें आई हैमरेज हो गया था। कारण इसके उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। फिर भी पेड़ लगाने के प्रति उनकी लगन में कोई कमी नहीं आई। वह जिंदगी की आखिरी सांस तक वृक्षों को ही सबसे बड़ा शक्तिमान और पूरी मानवता का अटल प्रहरी मानते रहे।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...