Thursday, December 18, 2025

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।



यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम के इस गायक ने उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर ढोल को नीचा दिखाने का कार्य इस गीत के माध्यम से किया है। अर्थात यह व्यक्ति ढोली को अपने गीत के मार्फत कह रहा है कि ढोली के दाढ़ी में आग लग गई है, यानी आग लगने का तात्पर्य वे बता रहे है कि यह ढोली बहुत असामाजिक है, इसलिए इसकी दाढ़ी आग के हवाले हो गई। यह गायक नाम का व्यक्ति यह बिल्कुल भी नहीं बता पा रहा है कि जिस ढोली को गायक मनोज सागर गीत गाकर गाली दे रहा है उसका कसूर क्या है।

कुलमिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह गायक पूर्वाग्रह से ग्रसित है। क्योंकि देव यात्राओं से लेकर सांस्कृतिक समारोह में ढोली समुदाय की सम्पूर्ण उत्तराखंड में सम्मान की जगह होती है। बताया यह भी जा रहा है कि यह मनोज सागर भी अनुसूचित जाति का ही है, मगर यह ढोली समुदाय की जैसी जगह नहीं बना पा रहे है। हो सकता है मनोज सागर को इस बहाने गाली का सहारा लेना पड़ा। गीत के इन अभद्र शब्दो पर अम्बेडकर न्याय मंच ने घोर एतराज जताया है।

इधर जौनसार बावर के ढोली समुदाय ने इस गीत पर शख्त नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने यह बताया कि इस तरह की गाली उस पुरुष को इी जाती है जो महिला हिंसा में लिप्त पाया जाता है या उसको इस तरह की गाली दी जाती है, जिसका समाज हर स्तर पर बहिष्कार करता दिखाई देता हो। ढोली समुदाय ने कहा कि इस गीत ने जहां ढोली समुदाय को गाली दी है उससे अधिक यह गीत उत्तराखंड सांस्कृतिक धरोहर पर भी कलंक है। समुदाय ने इस गीत को हिंसा भड़काने, समाज में वैमनस्य फैलाने और मानवाधिकारों के हनन करने वास्ते करार दिया है।

उत्तराखंड समता अभियान ने मनोज सागर की इस हरकत को मानसिक बीमारी बताई है। इधर जो भी इस गीत को सुन रहे है वे ऐसे लोक गायक को समाज से दूर रहने हिदायत दे रहे है। अब सवाल खड़े हो रहे हैं कि मनोज सागर ने इस तरह का असामाजिक गीत क्यों गाया है। सवाल इसलिए भी खड़े के खड़े हैं कि यह गीत गायक की योग्यता को दर्शा रहा कि बेचारा मनोज सागर इससे अच्छा गीत नहीं गा सकते हैं। यह अवश्य हैं कि यह गीत मनोज सागर जैसे गायको को पहचान दिला ही सकता है। फिलवक्त मनोज सागर की पत्नी ने सोशल मीडिया के मंच पर अपनी राय रखी है। जिसकी स्क्रीन शॉट यहां पेष्ट की जा रही है। साथ साथ गीत की उस पंक्ति की लिंक भी यहां पेष्ट की गई है।

https://youtube.com/shorts/2gr4FDhBLOg?si=SXsPhTDsjZtXAUM9




Tuesday, December 16, 2025

गांव की दमदार पैरवी करती पुस्तक “तुझे लौटना होगा”। पढ़े यहां

तुझे लौटना होगा कितना भावनात्मक शब्द है। मनुष्य में कोई ऐसा नहीं होगा जो इस शब्द से दूर रहा हो। इसी शब्द के आस पास ही उत्कृष्ट शिक्षक, उद्घोषक, लेखक राघवेंद्र उनियाल ने एक कविता लिख डाली और नाम भी यही दिया कि “तुझे लौटना होगा”।

दरअसल यह कविता संकलन नहीं है बल्कि एक लंबी कविता है। जो बार बार गांव को याद करती है, गांव की सभी अच्छाइयां बताती है, गांव का वह सुकून जिसे ढूंढने हर शहरवासी गांव की तरफ आते है। लौट जाते है तो सिर्फ गांव को याद करते है। जैसे पलायन हो गया, या शहर से अच्छा तो गांव समाज है अथवा शहर तो मरा हुआ होता है आदि आदि। इन्हीं मनोभाव को राघवेंद्र उनियाल कृत यह कविता पुस्तक प्रस्तुत कर रही है।

पांच सौ पंक्तियों में लिखी गई यह लंबी कविता शायद उत्तराखंड के साहित्य में पहला प्रयास हो सकता है। हरिवंश राय बच्चन की “मधुशाल” इसी तरह की लंबी कविता है। पर राघवेंद्र उनियाल ने इतनी लंबी कविता नहीं लिखी सिर्फ पांच सौ पंक्तियों को लिख कर यह बताने की कोशिश की गई कि लोगों को अपनी जड़ों से जुड़े रहना होगा। प्रवास में रहकर रोने से भला यही है कि तुम लौटकर आओ। इसलिए वे इस कविता की पहली पंक्ति में लिखते हैं –

“जहां कंक्रीट का जंगल है, वह शहर है। जहां वृक्ष, लताओं, फल, फूलों का जंगल है वह गांव है”।

हमे अब यह तय करना ही होगा कि पलायन या शहर कोई समस्या नहीं है। समस्या यदि है तो हमारे सोचने और समझने की।

इस कविता पुस्तक में कई उतार चढ़ाव भी देखे गए। कई बार कविता एकदम आवेश में आ जाती है, कई बार कविता समझाने में महारथ हासिल कर लेती है। समझाने का तात्पर्य यहां कविता की उन पंक्तियों से है जहां कविता शहर को सिर्फ परिस्थितिजन्य मानती है, जबकि गांव निवास को जरूरी मानती है। इस तरह के संबधो पर कविता की एक पंक्ति बताती है –

“जहां रिश्तों एवं संबंधों का कोई मान न हो, वह शहर है। जहां रिश्तों एवं संबंधों पर अभिमान हो, वह गांव है”।

गांव की एक एक कतरन को जोड़ने वाली यह कविता पुस्तक इस राज्य में नया प्रयोग ही कहा जाएगा। यदि शहरवासी इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो उन्हें एक बारगी यह उनके विपक्ष में लिखी गई कविता हो सकती है। बहरहाल यह पुस्तक इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती कि शहरवासी इस पुस्तक को पढ़कर क्या कहेंगे। अर्थात पुस्तक की एक एक पंक्तियां इसी भावना से लिखी गई है। कवि, कविता की अगली पंक्ति में स्पष्ट कर देते हैं कि –

“जहां पर मम्मी, डैडी, अंकल, आंटी रिश्तों के बोल हों, वह शहर है। जहां मां, बाबा, चाचा, चाची रिश्तों के बोल हो, वह गांव है”।

कविहृदय ने अपनी इस लंबी कविता में यह बताने का खूब प्रयास किया है कि गांव में परस्परता है जिसे शहरवासी को स्वीकार करना ही होगा। सच में शहर से परस्परता की अपेक्षा करनी गुनाही ही है। अगली पंक्ति में कवि ने बताने की कोशिश की है कि –

“जहां फाटक में ताले और कुत्तों से सावधान लिखा हो, वह शहर है। जहां खुले खलियान और खुले दरवाजे हों, वह गांव है”।

इस कविता पुस्तक की बारीकियों पर गौर करेंगे तो कविता हमे एक बार गांव तक खींचकर ले ही आती है। मगर हर कार्य गांव में संपन्न हो जाए यह मुनासिब नहीं है। इसलिए गांव की बात सच्ची है, पर जीवन के संचालन में गांव तक सीमित रहना कितना कारगर है यह पुस्तक बताने में असमर्थता करती है। कटु सत्य यह है कि गांव में डर – भय की कोई गुंजाइश नहीं है और शहर में डर भय सर्वव्यापी है। शहर में लोक दिखावा आदि आदि जैसी व्यवस्था खूब परोसी जाती है। गांव में इन बातों के लिए कोई जगह ही नहीं है। परन्तु यह कविता यही कह रही है कि कहीं भी रहें, पर अपनी जड़ों को सींचते रहें। इस कविता को पढ़ने से लगता है कि अब शहर भी गांव बनने वाले है। शहर सिर्फ बाजार ही रह जाएंगे। सब बाजारवासी हर तीज त्यौहार के दौरान गांव में ही रहेंगे। इस तरह अपने आगे बढ़ती है, बताती है कि यदि यह संभव हो पाता है तो गांव के “लोक देवता” भी सम्मानित होंगे। वरना गंदी नालों के किनारे बने कीत्रिम मंदिर में नकली अबादा पहनकर नकली दुवा मांगेंगे।

कविता की खूबसूरती यही है कि नकली दुवाएं जहां है वहां नकली अस्पतालो की भरमार भी है। अतएव गांव में अस्पताल हों, मगर गांव के लोगों को अस्पताल की जरूरत ही कम होती है। अब कविहृदय राघवेंद्र उनियाल इससे भी आगे लिखते है कि –

“जहां वन्य जंतुओं के दीदार हेतु अजायब घर होते है, वह शहर है। जहां वन्य जंतुओं का दीदार स्वच्छंद घूमते होता है, वह गांव है।” कवि अब अपनी कविता की धार को और पैनी करते हुए लिखते हैं कि – “जहां थैलियों में पैक रसायन युक्त दूध दही मिलता हो, वह शहर है। जहां गाय की थनों से दुहा हुआ ताजा दूध मिलता हो वह गांव है”।

उल्लेखनीय यही है कि यह कविता पुस्तक गांव का हर बखान करने से नहीं चूकती है। प्रेम, द्वेष, ईर्ष्या और आपसी भाईचारे में गांव की खूबसूरती को कविता हूबहू प्रस्तुत कर रही है। कहना न होगा कि यह पहली पुस्तक है जो गांव और शहर का तुलनात्मक विश्लेषण करती है। यह भी कविता की पंक्तियां कह रही है कि शहर में हर त्यौहार बाजार का रूप ले लेता है। इधर कविता की एक लाइन यह भी कह रही है कि शहर में पाखंड, अंधविश्वास अधिक बढ़ रहा है। इस पंक्ति पर पाठक कवि से सवाल पूछ रहे हैं कि तंत्र, मंत्र और पाखंड यानी अंधविश्वास के लिए हमेशा गांव बदनाम रहे है। दूसरी तरफ यदि देखा जाए तो कवि ने इस पंक्ति को इसलिए उद्घृत किया होगा कि गांव की अपेक्षा शहर में धार्मिक उन्माद सर्वथा सुनाई देता हो। पर ऐसे कई सवाल यह कविता पुस्तक पाठकों के लिए छोड़ देती है।

68 पृष्ठों में अंकित यह कविता पुस्तक वर्तमान के वैश्वीकरण पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रही है। पांच सौ पंक्तियों की एक लंबी कविता के बाद इस पुस्तक पर तीन छोटी छोटी कविताएं – तुमसे प्रश्न, गांव की पुकार और शहर की पुकार शीर्षक से लिखी गई है। कवि ने जब पांच सौ पंक्ति वाली कविता से शहर पर सवाल खड़ा किया है तो शायद कवि को स्पष्टीकरण के लिए इन छोटी छोटी कविताओं की जरूरत पड़ी। शहर की पुकार शीर्षक वाली कविता में कवि लिखते हैं कि शहर इस वक्त एक प्रसव पीड़ा के दर्द से गुजर रहा है, शहर कराह रहा है कि उसकी छाती पर कंकड़ पत्थर कूठे जा रहे है। उसका हर भरा गात अतिक्रमण और दोहन का शिकार हो चला है। इसलिए वे लिखते हैं कि – “अमृत उगलने वाली धरती, कर रही विष का हुंकार,
सुनो जागो!
अब भी नहीं चेतोगे तो सिर्फ होगा हाहाकार”।
जबकि तुमसे प्रश्न वाली शीर्षक कविता से कवि पाठकों से खुद के लिए प्रश्न करवा रहे है।

छंदबद्ध यह कविता पुस्तक एक अनोखी कही जाएगी जो कभी भी अपने गांव से बाहर नहीं निकल पाती है और बेबाकी से शहर से अच्छी गांव की खूबसूरती बताती है। सवाल करती है, दुत्कारती है और बार बार उत्प्रेरित करती है कि गांव तुम्हारे दीदार करने के लिए तैयार है। अर्थात तुझे लौटना होगा।



पुस्तक – तुझे लौटना होगा
लेखक – राघवेंद्र उनियाल
प्रकाशक – विनर पब्लिशिंग कंपनी, घोसी गली देहरादून।
मूल्य – 90 रु०
आवरण – मुकुल बडोनी

Sunday, November 2, 2025

प्रेम, दिवानगी और समसामयिकी विषयों का संग्रह है ‘वो साल चौरासी’

 प्रेम, दिवानगी और समसामयिकी विषयों का संग्रह है ‘वो साल चौरासी’


प्रेम पंचोली 



दुनियांभर में ‘प्रेम’ पर आज तक जो भी लिखा गया है वह कम ही साबित हुआ है। प्रेम जिन्दा और संजिन्दा लोगों के लिए बहुसागर है जितना हम उसमें डूबेंगे उतनी ही गहराई मिलती रहेगी।


इसी तरह की एक पुस्तक ‘वो साल चौरासी’ वरिष्ठ पत्रकार, यायावर और संस्कृतिकर्मी मनोज इस्टवाल ने लिखी है। हालांकि वे अपनी इस पुस्तक को आत्म संस्मरण बताते है। मगर इस पुस्तक को जो भी पढेंगे वह समाज के हर पहलुओं को आसानी से समझ पायेंगे। समाज की संर्कीणाताऐं, पहचान, अमीर और गरीबी जैसी स्थितियांे पर यह पुस्तक बोलती है। पुस्तक की मूल आत्मा ‘प्रेम’ जरूर है, पर प्रेम के बहाने समाज संस्कृति की झलक पुस्तक के हर अध्याय में मौजूद है।


लेखक ने पुस्तक की भूमिका अर्थात ‘दो शब्द’ में स्पष्ट कर दिया है कि ‘प्रेम’ कोई काम वासना आदि आदि जैसे व्यवहार तक सीमित नहीं है, लिखते हैं कि प्रेम अनन्त है। इसलिए काम वासना ‘प्रेम’ को परिभाषित नहीं कर सकती। दरअसल यह पुस्तक उनके प्रेम से जुड़ी कहानी का हिस्सा जो है। इधर लेखक की प्रवृत्ति हमेशा सनातन धर्म के अनुयायी के रूप में दिखाई दी है। किन्तु जब उन्होने अपने ‘प्रेम’ को अहसास किया तो इसी पुस्तक के दो शब्द वाले कॉलम में ओशो का उदाहरण देते कोई गुरेज नहीं करते। ओशो को कोड करते हुए लिखते हैं कि प्रेम की असफलता जीवन को अर्थहीन बना देती है, लेकिन यह असफलता व्यक्ति को आत्मनिरिक्षण के लिए प्रेरित करती है। वे आगे लिखते हैं कि ‘अतृप्त प्रेम’ ही है जो दूसरे के प्रति संवेदनशील बनाता है। यही वजह है कि पुस्तक समग्रता से आगे बढ रही है।


‘वो साल चौरासी’ पुस्तक सच्ची घटना का एक पुष्पगुच्छ है, जिसमें पहाड़ो में खेले जाने वाला क्रिकेट, पास की खरगड नदी का आवेग, वन देवियों की कहानियां, लुप्त हो चुके गढवाली शब्दों को हिन्दी के साथ लिख देना और इतिहास संस्कृति से रू-ब-रू करवाना यह पुस्तक अपने आपको अन्य संस्मरणों, आत्मकथाओं से पृथक करती है। जब हम इस पुस्तक के पहले अध्याय को पढते हैं तो वह बाल्य अवस्था जो किशोर अवस्था की तरफ बढ रही होती है के दौरान की लेखक से जुड़ी कई कहानियां बताती है। यह वही दौर था जब लेखक की किसी सुन्दर युवती को देखकर आंखे चार हो गई। लेखक ने बस देखते ही कह दिया कि सच में यही कमलनयनी है। इसलिए लेखक ने अपने पहले ‘प्रेम’ को एक घटना बता दी। लिख दिया कि सन 1984 के दौरान दुनियां में क्या क्या घटना घटी है। जैसे इन्दिरा गांधी की हत्या, स्टीब जॉब्स ने संयुक्त राज्य अमेरिका में मैकिन्टोश पर्सनल कम्प्यूटर लॉन्च किया बगैरह बगैरह। इस तरह की ऐतिहासिक घटनाओ के साथ अपने कमलनयनी प्रेम की कहानी को जोड़ने में लेखक माहरथ हासिल कर गये। यही वजह रही कि सम्पूर्ण किशोर अवस्था में लेखक खरगड के सामने वाले गांव में जब भी क्रिकेट टूर्नामेंट हो तो कैसे छोड़ सकते है। क्योंकि वहां कमलनयनी का आना तो होता ही था। बस एक टक निहारने से लेखक तृप्त हो ही जाता था, भले बातचीत का कोई आधार ही नहीं था। प्रेम जाल में फंस चुके लेखक अपनी दिनचर्या व रहन सहन पर खुलकर लिखते है। शर्ट पर छाती के दो बटन हमेशा खुले रखना, सांवले बदन को बार बार सजाना और अपनी स्कूल में मोनेटर थे तो स्कूल में भी धमक बनाये रखना और क्रिकेट खेलते वक्त छक्का मारना लेखक की खूबी बन गई थी। ताकि यह सूचना कमलनयनी को आसानी से पंहुच सके। क्योंकि उन दिनों आज की जैसे कोई संचार व्यवस्था थी ही नहीं। इन गतिविधियों के मार्फत एक जगह से दूसरी जगह सूचना पंहुचाना जैसी कला हर किसी के पास नहीं थी। लेखक इस विद्या में पूर्व से ही माहीर थे। सूचना सही जगह पंहुचे इसके लिए लेखक ने अपने मामा के बेटे को खूब इस्तेमाल किया। अतः यह स्थिति बताती है कि आज के ‘प्रेम रोगियों’ के लिए कितनी सुविधा हो गई है।

    

‘वो साल चौरासी’ पुस्तक में कमलनयनी के बहाने लेखक समाज की अन्य घटनाओं का भी जिक्र करते हैं। उनके सहपाठी उन दिनों कैसे छुप छुपकर बीड़ी पीते थे। वे लिखते हैं कि 40 साल पहले लोगों के पास आर्थिक संसाधन नाम मात्र के ही होते थे। यदि उनके किशोर अवस्था वाले साथी बीड़ी पीना चाहते थे तो बीड़ी के शेष बचे ठुडे को ही ढूंढ ढूंढकर पीते थे। अर्थात पुस्तक को पढने से मालूम होता है कि पहले भी दूर दराज के गांव में जुआ खेलने वाले निठल्ले, शराबी जैसी बीमारी थी ही। 


कमलनयदी और अपने मिलन के बहाने लेखक ने सामाज के उन विद्रुप चेहरों का जिक्र करना नही भुलाया, यहीं से पुस्तक की महत्ता और बढ जाती है। पुस्तक बता रही है कि भले आज के जैसे उस वक्त संचार के साधन बिल्कुल ही नहीं थे मगर तब भी ‘प्रेम’ को कोई भी समय नहीं रोक पाया। बीच में गहरी खाई, आमने सामने की पहाड़ी पर बसे गांव, एक गांव से दूसरे गांव सूचना देने की सबसे बड़ी ताकत उन दिनों आईना ही हाता था। जिसे दो प्रेमी ही सर्वाधा प्रयोग करते थे। कमलनयनी भी इसी तरह अपने गांव से सामने वाले गांव की ओर आईना चमकाती थी इस आईने के चमकने से सामने वाले गांव में इन्तजार कर रहे लेखक यानि मनोज इस्टवाल ऊर्फ धर्मा जोगी के मन मे तब मिलने की उथल पुथल मच जाती थी।


दिलचस्प कहानी तब बनती है जब लेखक और कमलनयनी आमने सामने मिलते थे, मुस्कराते थे पर बात नहीं हो पाती थी। एक बार खरगड नदी में लेखक के गिरने से अंगुली कट जाने पर कमलनयनी अपनी साड़ी का पल्लु फाड़कर घाव पर बांध देती है। अपने अपने गांव जाकर सुबह की पहली किरण आने के साथ सामने वाले गांव की तरफ आईना चमकाते भी थे, इतने करने के बावजूद भी मिलने पर बात नहीं कर पाये। दरसल यही निश्च्छल प्रेम की परिभाषा बता रही है कि यह दोनो जोड़े अटूट प्रेम भी करना चाहते हैं और संस्कारो में बंधे रहना चाहते है। बातचीत न होने के गम में कई बार लेखक पड़ोसी भाई किशन दयाल के बेडरूम पर कान लगाये रखता था कि कब उनका टेपरिकाडर बजे और कब वे दर्दभरे गीत सुनाये दे। किशन दयाल के टेपरिकाडर के मार्फत वे बताना चाह रहे हैं कि गांव में तब बैट्री सेल जल्दी से मिलते नहीं थे। डाउन हो चुके सेल के साथ टेपरिकाडर की आवाज ऐसी आती थी जैसे रो-रोकर जब इंसान थक जाता है, इसी तरह कुछ बजने वाले गीत भी लम्बी लम्बी सांसे भरते है। इसी धुन पर लेखक अपने प्रेम को पाने बावत स्वर मिलाता था।


‘वो साल चौरासी’ के बहाने लेखक एक तरफ अपने ‘प्रेम’ को अक्षरशः बताने की कोशिश कर रहे है और दूसरी तरफ तत्काल की कठीन जिन्दगी को बताने में कोई गुरेज नहीं कर रहे है। गांव या अन्य जगहो पर लगने वाले मेले हो, कोई खेल आयोजन हो अथवा शादी विवाह हो, इन सभी के बहाने लेखक ने यथा स्थान पंहुचना ही था ताकि उसे कहीं कमलनयनी मिल जाये और उनकी बातचीत हो जाये। अधिकांश होता ऐसा ही था, पर इशारे, मुस्कराना, एक दूजे को एकटक देखना जैसे इनकी नियत ही बन गई थी। बता दें कि इस मिलने के अन्तराल में लेखक ने समाज को और अच्छी तरह से जिया है। 


मेलो मे जाना हो या एक गांव से दूसरे गांव जाना हो, लगभग पैदल ही जाना होता था। अधिकांश जगह सड़के नहीं थी, जहां सडके थी भी तो यातायात की व्यवस्था थी ही नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधनो का भी अभाव था। एक बस जो सुबह चलती थी उसमें बैठकर कहीं पंहुचा जा सकता था। दिनभर कोई यातायात के साधन नहीं थे। लेखक ने यह भी बताया कि तब गांव में पशुपालन अच्छा होता था। घी-दूध की गांव में कोई कमी नहीं थी। इसलिए अधिकांश युवा युवती छुट्टी के वक्त पशु चुंगाने जाते ही थे। बस यही इन ‘प्रेमियो’ के मिलने के अड्डे भी हुआ करते थे।


लेखक बता रहे हैं तत्काल युवा जोड़ो को मेलो में पंहुचना जरूरी था, जैसे वह खुद करते थे। मेले के एक प्रसंग को वे इस पुस्तक मे लिखना नहीं भूले। जब वे मेले से वापस आ रहे थे, उसके आगे आगे कमलनयनी अपनी सहेलियों के साथ चल रही थी। लेखक भी इन्ही के सहारे कन्धे पर एक बड़ा तरबूज लिए चल ही रहा था, इतने में पीछे से लेखक के किसी साथी ने कन्धे से तरबूज गिरा दिया, जो वहीं पर चकनाचूर हो गया। इस घटना से लेखक को बहुत शर्मिदगी महसूस हुई, क्योंकि कमलनयनी और उनकी सहेलियों ने जो देख लिया था। वे थोड़ा हंसी जरूर पर उनकी चिन्ता के भाव ने लेखक को सांत्वना दे डाली। यह प्रसंग बताता है कि 40 साल पहले सच में पहाड़ का जीवन कितना कठीन रहा होगा यह अंदाजा लगाया जा सकता है।


अब तो गांव गांव पाइप लाइन आ गई है तब गांव का एक ही जल धारा होता था जिसे स्थानीय लोग पन्यारा कहते थे। यह भी मिलन और सूचनाओं के संचार का एक प्रमुख केन्द्र हुआ करता था। दूर से साड़ी का पल्लु हिलाना, शर्ट को लहराना प्रेमियों के संकेत स्तम्भ हुआ करते थे, जैसे कि लेखक ने साल 84 में स्वयं जीया है। जबकि लेखक ने यहां एक गूढ रहस्य का जिक्र अवश्य किया है। वे लिखते हैं कि उन दिनों किशोरियां - युवतियां एक विशेष भाषा का प्रयोग बहुतायात करती थी। यानि किसी भी शब्द के आगे ब जोड़ दो। जैसे ‘बेटा को वे बबेटा’ कहते थे, मनोज को बमनोज कहते थे आदि आदि। यह ऐसी भाषा थी जिसे अन्य कोई नहीं समझ सकता था। मगर लेखक को यह भी भाषा समझ आती थी। इसी भाषा में कमलनयनी और उनकी सहेलियां मनोज इस्टवाल के बारे मे कुछ बात कर रही होती थी तो वे समझ जाते थे। इसलिए उन्हे अकाट्य विश्वास था कि कमलनयनी लेखक से ही प्रेम करती है। 


इसके अलावा लेखक यह जोर देकर लिखते हैं कि तत्काल रिश्ते बहुत मजबूत हुआ करते थे। वे खुद का उदाहरण देकर आगे लिखते हैं कि चाचा, ताऊ, पुफु, मामा के बच्चे आपस में इस तरह से रहते थे कि मानो सभी एक ही घर की पैदाईश हो। लेखक स्पष्ट करते हैं कि 40 बाद यानि मौजूदा समय में रिश्ते और संस्कार बहुत कमजोर हो गये है जिसे वे भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं मानते हैं।


पढाई लिखाई में अब्बल, स्कूल में मानेटर, खेल आदि में अब्बल तो निश्चत ही है कि लेखक उस क्षेत्र में चर्चाओ में रहे होंगे। मगर लेखक का ‘प्रेम’ तो सामने वाले गांव में पनप रहा था। जबकि स्कूल में भी उनके कोई कम चर्चे नहीं थे। यह मालूम उन्हे तब हुआ जब उनकी स्कूल में विदाई पार्टी हुई। विदाई के बाद उनकी सहपाठी मृगनयनी ने उन्हे 160 पृष्ट की एक कॉपी भेंट की। बाद में जिसे पढकर वे हैरान रह गये। मन ही मन खुद को कचौटता रहा कि काश पहले ऐसा मालूम होता तो वे खरगड नदी को क्यों पार करते। खैर उनका तो अनन्त प्रेम था जो बार बार उन्हे खरगढ नदी को पार करवाता था।


इण्टरमीडिएट की परिक्षा पास करने के पश्चात लेखक ने ठान ली कि वह अब दिल्ली जायेगा जहां वह पढाई के साथ साथ कुछ रोजगार कमायेगा। यदि अच्छी खासी नौकरी मिल गई तो खरगड नदी को रात में नही बल्कि दिन में पार करके अपने मां बाप के मार्फत यह सूचना पहुंचा देगा कि अब कमलनयनी उनकी ही रहेगी। वे सात जन्मो के बन्धन में बंधने जा रहे है। इस तरह के सपने के साथ लेखक अब दिल्ली रवाना हो गये, साथ में ले गये कमलनयनी और अपनी सहपाठी मृगनयनी के सपने।


लेखक की यह आत्मकथा 40 साल पहले और आज के परिवर्तन पर एक विशेष प्रकार की पुस्तक है। विकास से लेकर, रिश्ते-संबधो पर यह एक जरूरी पुस्तक कहलायेगी। पहली बार जब लेखक कोटद्वार से रेल पर सवार हुए तो तब उन्होने कुल्हड़ में भी पहली बार चाय पी है। जबकि अब सारे जहां में प्लास्टिक ही प्लास्टिक। उन दिनों प्लास्टिक कहीं दिखता तक नहीं था। 


इस तरह यह पुस्तक प्रेम के साथ साथ हमें इंगित कर रही है कि आज 40 साल बाद हम कहां है। कुल्हड़ की चाय, रेल का सफर, तांगे में बैठना फव्वारे में नहाना, किसी शुभ अवसर पर हिजड़ों के समूह को देखना जैसे अनुभव लेखक के सामने एकदम नये थे। पर इन सबके बीच लेखक को कमलनयनी का ही चित्र दिखाई देता था। दिल्ली में वह अपने चचेरे भाई के घर पंहुचा। कुछ समय बाद लेखक को अच्छी खासी नौकरी भी मिल गई। मुर्गी खाने से लेकर मल्टीनेशनल कम्पनी तक लेखक ने चार साल तक नौकरी की है। कुछ समय तक बेरोजगार भी हुआ तो इस समय लेखक ने दिल्ली को अहसास किया। तब दिल्ली में बातचीत के अधिकांश शब्द रूखे और गाली गलौच टाइप के हुआ करते थे। इधर इस अन्तराल में दिल्ली में उनकी एक मंदाकीनी नाम की बाला से आंखे चार हो गई थी। पर लेखक के आंखो में सिर्फ कमलनयनी की ही सूरत छप चुकी थी।


दिल्ली में जम चुके अब के लेखक और तब के युवा मनोज इस्टवाल ऊर्फ धर्मा जोगी अब घर आकर कमलनयनी के पास शादी का प्रस्ताव रखना चाहते है। दिल्ली से घर आते वक्त भी लेखक समसामयिकी विषयों से दूर नहीं हो पाये। कोटद्वार में बस अड्डे या रेलवे स्टेशन पर स्थित अधिकांश मिठाई के दुकानदार बासी और पुरानी हो चुकी मिठाई को पहाड़ीयों को बेचते थे। इस मिठाई को तत्काल या तो लेखक जैसे युवा या छुट्टी लेकर घर पंहुचने वाला फौजी ही खरीदते थे।


लेखक ने अपने आत्म संसमरण ‘वो साल चौरासी’ को लेकर कई अनसुलझे सवालो पर कलम चलाई है। अपने निश्च्छल प्रेम ‘कमलनयनी’ के अलावा लेखक चाहे मृगनयनी, मंदाकिनी से अवश्य मिले होंगे पर वह कमलनयनी को ही पाना चाहते थे। इसी लिहाज से वह दो साल बाद जब घर पंहुचे तो सबसे पहले लेखक ने घर पर कमलनयनी से शादी करने का प्रस्ताव रखा ही था कि उधर से लेखक के पीता ने लेखक के हाथ में एक निमन्त्रण थमा दिया और कहा कि खरगड पार करते हुए फलां की बेटी की शादी है वहां जाना होगा न्यूता देने अर्थात शादी में सम्मिलित होने। दरअसल यह शादी कमलनयनी की ही थी। लेखक पर क्या क्या बिती होगी यह आपको पुस्तक पढने से मालूम हो जायेगा। इधर कमलनयनी को समझने के लिए इतना ही काफी है कि दो साल तक लेखक के इन्तजार में रही कमलनयनी रोज खरगड नदी में उसी गेठी के पेड़ के पास जाती थी जहां वे मिलते थे। गम के आंसुओं के साथ गेठी के पेड़ पर अपनी दरांती से घाव कर देती थी। दो साल के इस इन्तजार में कमलनयनी ने उस गेठी के पेड़ पर 730 घाव किये थे।


कुलमिलाकर लेखक ने अपने ‘प्रेम’ के बहाने आज के तार तार होते रिश्ते, 40 साल पूर्व की परस्परता, तब की रिश्तो की मजबूती और संस्कार सहित तीज त्यौहार के अलावा पहाड़ी जन जीवन को बहुत करीने से शब्दापित किया है। जबकि इस पुस्तक में गढवाली शब्दो का अच्छा खासा संग्रह पढने को मिलता है। कुछ ऐसे शब्द भी हैं जो अब प्रचलन में नहीं है। पहाड़ी संस्कृति की इस पुस्तक मे स्पष्ट झलक है। कई ऐसे उत्पादो, बर्तनो, संसाधनो का जिक्र है जिसे लेखक ने खुद भोगा है। परन्तु आज वे सभी इतिहास बनकर रह गये है। यह अवश्य है कि लेखक ने जिस तरह से कमलनयनी को समय दिया उस तरह से पुस्तक के संपादन में कतई भी समय नहीं दिया है। कह सकते हैं कि कमलनयनी और धर्मा जोगी के निश्च्छल प्रेम के बहाने 16 अध्याय और 108 पृष्टो वाली यह संस्मरणात्मक पुस्तक पहाड़ को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।  








समीक्षक - प्रेम पंचोली

लेखक - वरिष्ठ पत्रकार मनोज इस्टवाल

पुस्तक - वो साल चौरासी (आत्म संस्मरण)

प्रकाशक - हिमालयन डिस्कवर फाउण्डेशन, पो॰ धारकोट, जिला पौड़ी गढवाल

मूल्य - 299 रू॰ 

  



Sunday, August 17, 2025

अब कहां सुनाई देगी धराली गांव में बच्चो की किलकारियां। सब कुछ तबाह कर दिया खीर गंगा की बाढ़ नें।

अब कहां सुनाई देगी धराली गांव में बच्चो की किलकारियां। सब कुछ तबाह कर दिया खीर गंगा की बाढ़ नें।



।। प्रेम पंचोली ।।

 

गंगोत्री से ठीक 18 किमी पहले 05 अगस्त को धराली गांव के ऊपर आये एवलांच ने गांव को हमेशा हमेशा के लिए मिटा दिया। एवंलाच  इतना खतरनाक था कि देखते ही देखते 40 सकेण्ड में गांव मलवे की ढेर में तब्दील हो गया। 

मुखवा गांव निवासी अशोक सेमवाल इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे है। उन्होने हालांकि सामने से यानि भागीरथी की पल्ली पार मुखवा गांव से इस घटना को हूबहू देखा और अपने मोबाइल फोन से वीडियों भी बनाई, मगर आज भी वे कंपकपाते हुए ही उस दिन की घटना पर बात रख पाते है। वे बताते हैं कि उन्होने वीडियो भी बनाई और आवाज मारी, सीटीयां बजाई कि भागो भागो पर प्रकृति के इस विद्रुप रूप के सामने कौन टिक पाता। वे ईश्वर का शुक्र मानते हैं कि उस दिन गांव में हारदूधा मेला था। ठीक सवा एक बजे गांव के सर्वाधिक लोग पंचायती आंगन में सोमेश्वर देवता की पूजा में सम्मिलित थे। इसी वक्त धराली गांव देखते ही देखते मलवे में तब्दील हो गया। इसलिए धराली के ग्रामीण बड़ी जनहानी से बच निकले। परन्तु गांव में ऐसा कोई परिवार नहीं है जिसने इस आपदा में किसी न किसी रूप में अपने खोये है जो अब कभी वापस नहीं आने वाले है।      


उल्लेखनीय हो कि 2011 की जनगणना के अनुसार धराली गांव की जनसंख्या लगभग 600 से अधिक है। धराली गांव वैसे भी खीर गाड़ अथवा खीर गंगा के मुहायने पर बसा है। इस गांव ने पूर्व में भी कई बार खीर गंगा का डरावना रूप देख रखा था। मगर 05 अगस्त जैसे मनहूस दिन की ग्रामीणों ने कभी कल्पना नहीं की थी। जबकि गांव का पंचायती आंगन खीर गंगा की बांयी ओर पहाड़ की तलहटी पर है, यही गांव का मूल स्वरूप भी है। बढते संसाधनो और बढती जनसंख्या ने गांव को और विस्तार दिया। जिसने वर्तमान में एक शहर का रूप भीर ले लिया था। अर्थात धराली गंगोत्री जाने वाले यात्रियों के लिए अन्तिम पड़ाव था। यहां सुन्दर और विशाल होटल, रेस्तरां, होमस्टे, रिजोर्ट आदि बने थे। जो अधिकांश धराली गांव निवासियों के ही थे। इधर ग्रामीणो के सेब के बागान और अन्य कृषि उपज के लिए खेती बाड़ी होती थी। हर्षिल की राजमा जो दुनियां में बहुत ही विख्यात है का उत्पादन भी यहीं पर होता था। सामने पर मुखवा गांव और पांच किमी पहले प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर हर्षिल आने जाने वाले पर्यटको के लिए यह धराली कभी बहुत ही मुफिद जगह हुआ करती थी जो अब एवलांच के मलवे में ढेर हो चुकी है।

दरअसल धराली गांव तो नेस्तनाबूद हुआ ही, उसी वक्त हर्षिल में भी तिलना गाड़ की बाढ ने भी तबाही मचाई है। इस बाढ ने हर्षिल में आर्मी का हेलीपैड सहित नौ जवानो को लील लिया है। अब तक आर्मी के यह जवान लापता है। तिलना गाड़ की बाढ ने भागीरथी के प्रवाह को कुछ घण्टो तक रोके रखा, बाद में हर्षिल से धराली तक इस बाढ के पानी और खीर गंगा के मलवे ने एक झील का रूप ले लिया है, जिसे एनडीआरएफ और अन्य संस्थाओं ने 10 दिन बाद बड़ी मसक्कत से खोल पाया है। 05 अगस्त की अतिवृष्टी और खीर गंगा में आये एवलांच ने गंगोत्री से लेकर भटवाड़ी तक सड़क, पुल, पैदल रास्ते आदि सभी बहाकर ले गये। जबकि उत्तरकाशी शहर को भी रेड अलर्ट में रखा गया था।

बताया गया कि कुछ समय पहले खीर गंगा के कैचमेंट एरिया में एक पहाड़ी टूटकर खीर गंगा में आ गई, जिसने यहां टूटते ग्लेशियरों को एकत्र किया है। जब यह डिपोजिट ग्लेशियर 05 अगस्त को टूटा तो इसने धराली गांव को ही समाप्त कर दिया। इस आपदा में जिन्दा बचे हुए ग्रामीणों के पास सिर्फ बदन पर जो कपड़े पहने है सिवाय इनके पास अब कुछ भी नहीं है। खेत, बागान, मकान और अन्य रोजगार के साधन धराली के लोग अब खो चुके है जिसे वे आज भी मलवे के नीचे ढूंढने को बेताब है। 5 अगस्त 2025 को आए एवलांच ने कल्पकेदार के मंदिर सहित संपूर्ण धराली गांव का नमो निशान मिटा दिया है। लगभग 20 से 40 फिट मलवा के नीचे कईयों जिंदगियां दफन हो चुकी है। इधर गांव के 44 छात्र ऐसे है जो विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत है उनके सामने अब अपनी आगे की पढाई करने का संकट मण्डरा रहा है। क्योंकि धराली में उनके घर और रोजगार के सभी साधन आपदा की भेंट चढ चुके है। 

इस आपदा में कितने लोगों ने अपनी जान गंवाई इसका आंकलन करना बहुत कठीन है। धराली गांव और बाजार एक साथ हो चुका था। धराली बाजार में होटल रेस्तरां, रिजार्ट आदि थे तो गांव में हामस्टे भी बने थे। इन सभी व्यवसायिक प्रतिष्ठानो में सर्वाधिक नेपाली मूल के लोग काम करते थे। कुछ अन्य जगहो के लोग भी काम करते थे। बता दें कि गांव के सर्वाधिक लोग सोमेश्वर देवता की पूजा में सम्मिलित थे, मगर व्यवसायिक प्रतिष्ठाानो में काम करने वाले लोग अपने अपने प्रतिष्ठानो में ही मौजूद थे। हालांकि इनकी संख्या कम बताई जा रही है। क्योंकि बरसात के कारण यात्रियों का अना जाना कम था, सो प्रत्येक प्रतिष्ठान में दो या दो से अधिक लोग कार्यरत थे ही। इस तरह से भी देखा जाये तो इस पापी एवलांच ने सैकड़ो घरो का दिया बुझाा दिया है।

 


ऐसा भयावह मंजर।

वैसे भी धराली गांव ग्लेशियर के मलवे के ऊपर ही बसा था। जिसे भूगर्भ वैज्ञानिक कई बार बता चुके है। बताते चलें कि 1864 में भी धराली गांव नेस्तनाबूद हो चुका था। इस दौरान गांव में स्थित कल्पेश्वर मंदिर भी मलवे में दब गया था जिसे बाद में कई वर्षो बाद खोला गया। जबकि 2013 की आपदा में भी यह गांव खतरे के निशान पर आ गया था।

भूगर्भ वैज्ञानिको के अनुसार यह अतिसंवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र है। धराली गांव भी खीर गंगा (खीर गाड़) के मुहायने पर बसा था। 05 अगस्त को दोपहर में आये एवलांच ने मात्र 40 सेकेंड में सबकुछ तबाह कर दिया। जिसमें आर्मी का हेलीपैड, मैदान भी झील में तब्दील हो गया है। जबकि आर्मी के 09 जवान अब तक लापता है। 65 होटल, 30 रिजॉर्ट, होमस्टे सहित सम्पूर्ण धराली गांव जमीदोज गया है।

उल्लेखनीय हो कि 1978 में भी 5 अगस्त को ही कनोडिया गाड़ में भयंकर बाढ़ आई थी। जिसने गंगा को डबरानी के पास 18 घंटे तक रोककर रखा। उन दिनों उत्तरकाशी में भारी तबाही हुई थी। ठीक इसी दिन 5 अगस्त 2025 को फिर खीर गंगा में आये एवलांच ने 40 सेकेंड में धराली गांव को नेस्तनाबूद कर दिया। वैसे भी उत्तरकाशी को कई बार आपदाओं ने गहरे गहरे जख्म दिए है। 1978 की बाढ़, 1991 का भूकंप, 2010 और 2013 की बाढ़ तथा अब धराली की आपदा ने एक बार फिर उत्तरकाशी के आपदा के जख्म को प्रकृति ने ताजा कर दिया है। दअरसल इस डरावने और खतरनाक स्थिति से उत्तरकाशी के लोग बार बार सामना करते है।



क्या धराली की आपदा प्राकृतिक और मानवजनित है?

उत्तराखंड के लोक जीवन में एक बहुत पुरानी कहावत हे, नदी का वास, कुल का वास। यह पंक्ति कई बार चरितार्थ हुई है। साल 2013 की केदारनाथ जल प्रलय के बाद सरकार ने निर्णय लिया था कि इन स्थानों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम और डफ़लर रडार लगाकर प्राकृतिक आपदाओं के न्यूनीकरण में मदद ली जाएगी। सरकार ने भी स्वीकार किया था कि केदारनाथ में 10 हजार से अधिक लोग आपदा के शिकार हुए थे। आज दिन तक भी वहा नर कंकालों का मिलना आपदा के उन ज़ख्मों की याद दिला देता है। इस घटना के 12 साल बीत जाने के बाद सरकार का अर्ली वार्निंग सिस्टम और आपदा न्यूनीकरण की नीति ओर योजना जमीन पर नहीं उतार सकी। धराली आपदा अनियोजित विकास की मानव जनित आपदा है। ब्रिटिश शासन में भी कस्बों और नगरों में निर्माण कार्य के लिए स्पष्ट गाइड लाइन थी कि नदी नालों के निकट 200 मीटर के रेडियस में कोई निर्माण कार्य नहीं होगे। नियम अब भी है, पर कथित विकास और भ्रष्टाचार के चलते नियम कानून फ़ाइलों में बंद पड़े है।

हम दो वर्ष पूर्व की जोशीमठ आपदा के घावों को नहीं भर पाये थे कि उत्तरकाशी धराली की आपदा ने एक बार हमें चेताया है कि प्रकृति से अनियोजित छेड़छाड़ के गंभीर परिणाम भुगतने होगे। वरिष्ठ भू वैज्ञानिक के एस बल्दिया ने फरवरी 1974 के एक जर्नल साइंस टुडे में लिखा था कि पिथौरागढ़, चमोली और केदारनाथ क्षेत्र के नीचे गुजरती थ्रस्ट लाइन उत्तरकाशी के गंगोत्री से गुजरते हुए हिमाचल के सिरमौर तक जाती है। इसे गंभीर अति संवेदनशील मानते हुए उन्होंने इस क्षेत्र में भारी भवनों के निर्माण को विनाशकारी बताया था। 

वैज्ञानिकों के अनुसार धराली गांव 1836 के बर्फ़ के एवलांच पर बसा है। भू वैज्ञानिक डी॰ सी॰ नैनवाल का मानना हे कि पुराने एवलांचो के ऊपर बसे इन नगरों अथवा गांवों की आबादी हमेशा खतरे की जद में हैं। रिवर फ्रंट जैसी योजनाओं से नदियों की स्वाभाविक चौड़ाई को कम करके पर्यटन के नाम पर छेड़छाड़ से पहाड़ के भूगोल को बदलने के गंभीर परिणाम सामने आने लगे हैं।



क्या कहते हैं विशेषज्ञ। 

भूगर्भ विज्ञानी प्रो॰ एस॰ पी॰ सती बताते हैं कि 1836 में इसी खीर गाड़ में खतरनाक बाढ़ आई थी। उस दौरान भी सम्पूर्ण धराली क़स्बे को पाट दिया था। उनका दावा है कि अभी जो भी बसावट है, वह उस समय नदी के साथ आई गाद पर ही स्थित है। पिछले कुछ सालों में खीर गंगा (खीर गाड़) में पानी के तेज़ बहाव की कई घटनाएं सामने आई है। कई घर इस बाढ़ में बहे भी हैं, लेकिन कोई जनहानि नहीं हुई थी।

इतिहासकार पद्मश्री डा॰ शेखर पाठक, पर्यावरण के विशेषज्ञ पद्मश्री अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणपिद् सुरेश भाई भी मानते हैं कि यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील है और भूस्खलन और एवलांच जैसे हादसों की संभावना यहां हर वक्त बनी रहती है। वे आगे बताते हैं कि पहले ऊँचाई वाले इन क्षेत्रों में बर्फ़ गिरती थी, ग्लेशियर बनते थे, बारिश बहुत कम होती थी। लेकिन अब बर्फ़ कम गिरती है और बारिश ख़ूब होती है। जिस कारण इस तरह की खतरनाक प्राकृतिक आपदाओं को बढना है। अर्थात यही जलवायु परिवर्तन असर है।

पद्मश्री डा॰ शेखर पाठक बताते हैं कि हिमालय की चौखंभा वेस्टर्न रेंज का यह क्षेत्र है। साल 1700 में जब गढ़वाल में परमार राजवंश का शासन था। तब भी यहां बड़ा भूस्खलन हुआ। जिससे झाला में 14 किलोमीटर लंबी झील बन गई थी और इसका प्रमाण आज भी देखा जा सकता है। क्योंकि यहां भागीरथी ठहरी हुई दिखती है।



पुराने जख्मो को कुरेद डाला खीरगंगा की बाढ़ ने।

गंगोत्री, धराली और हर्षिल में प्राकृतिक आपदाओं का इतिहास रहा है। यहां 05 अगस्त 2025 में आई आपदा सबसे हालिया है। 2010 और 2012 में भी धराली में बाढ़ आई थी। 1978 में आई भयंकर बाढ ने धराली से नीचे उत्तरकाशी की तरफ़ 35 किलोमीटर दूर डबराणी में 18 घण्टे तक भागीरथी का प्रवाह रोके रखा। इस दौरान भी काफी नुकसान हुआ है। इसके अलावा साल 1700 में इसी भागीरथी क्षेत्र में एक बड़ा भूस्खलन हुआ था जिससे झाला नामक स्थान में भागीरथी नदी पर 14 किलोमीटर लंबी झील बन गई थी। 1836 में एवलांच ने धराली में तबाही मचाई थी।


धराली गांव की सूक्ष्म जानकारी।

धराली गांव उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में समुद्र तल से लगभग 8 हजार फीट की ऊंचाई पर भागीरथी नदी के किनारे हर्षिल घाटी के पास बसा हुआ है। जो गंगोत्री पहुंचने से पहले का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सेब के बागानों और राजमा की खेती के लिए भी यह प्रसिद्ध स्थान था।

धराली गांव में वैसे तो कई प्रसिद्ध मंदिर हैं लेकिन इसमें कल्प केदार मंदिर का सबसे ज्यादा महत्व है। जो इस आपदा में फिर से जमीदोज हो गया है। इस मंदिर का वास्तु शिल्प केदारनाथ धाम से मिलता है। जिसे कारण इस मंदिर का नाम कल्प केदार पड़ा। 1864 में यह मंदिर आपदा की वजह से जमीन में दबा गया था। 1945 में खीर गंगा के इस नाले का बहाव कुछ कम हुआ तो लोगों को इस मंदिर का शिखर दिखाई दिया। तत्काल लोगों ने जब इस जगह से 20 फिट मलवा हटाया तो पूरा शिव मंदिर सामने आया जिसकी बनावट केदारनाथ से मिलती है। यथा कल्पकेदार मंदिर। 



दुपट्टा फाड़कर सीएम को बांधी राखी।

आपदा प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण कर रहे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने ऐसा दृश्य आया, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर दिया। अहमदाबाद के ईशनपुर की रहने वाली धनगौरी बरौलिया अपने परिवार के साथ गंगोत्री दर्शन के लिए आई थीं। 05 अगस्त को धराली में आई भीषण आपदा ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। अचानक आए मलबे और तेज बहाव से मार्ग पूरी तरह बंद हो गया और वे अपने परिवार सहित गंगोत्री में ही फंस गईं। चारों ओर तबाही का मंजर, भय और अनिश्चितता का माहौल था। घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर, किसी को नहीं पता था कि अब आगे क्या होगा। जब मुख्यमंत्री धामी तीन दिन से लगातार ग्राउंड जीरो पर आपदा प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण कर रहे थे, तो धनगौरी अपनी कृतज्ञता रोक नहीं सकीं। उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन उन आंसुओं में डर नहीं, भरोसा था। वे आगे बढ़ीं, अपनी साड़ी का किनारा फाड़ा और उसका एक टुकड़ा राखी के रूप में मुख्यमंत्री की कलाई पर बांध दिया। राखी बांधते हुए उन्होंने भावुक होकर कहा “मेरे लिए मुख्यमंत्री धामी भगवान श्रीकृष्ण जैसे हैं, जिन्होंने न केवल मेरी, बल्कि यहां मौजूद सभी माताओं-बहनों की एक भाई की तरह रक्षा की है। 



आपदा राहत मे सरकार मुस्तैद।

5 अगस्त 2025 को धराली-उत्तरकाशी और हर्षिल में आई आपदा के दौरान सरकार और स्थानिय प्रशासन आरम्भ से ही मुस्तैद दिखाई दिया। मुख्यमंत्री ने भी तत्काल अधिकारियों को प्रभावितों के लिए भोजन, पेयजल और आश्रय की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। बचाव कार्यों और पीड़ितों को हवाई मार्ग से निकालने के लिए वायु सेना के एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की सहायता ली जा रही है। शासन ने गढ़वाल आयुक्त विनय शंकर पांडे को आपदा का नोडल अधिकारी नियुक्त किया। उत्तरकाशी में जिलाधिकारियों रहे डॉ. मेहरबान सिंह बिष्ट, अभिषेक रोहिल्ला और गौरव कुमार को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गईं। अपर सचिव विनीत कुमार को उत्तरकाशी में डेरा डालने के निर्देश दिए गए। देहरादून से दो पुलिस महानिरीक्षक, तीन पुलिस अधीक्षक, एक कमांडेंट और 11 पुलिस उपाधीक्षकों के साथ 300 पुलिस कर्मियों को उत्तरकाशी भेजा गया। 40वीं बटालियन पीएसी और आईआरबी द्वितीय बटालियन देहरादून की विशेष आपदा इकाई के 140 जवानों को भी तैनात किया गया। देहरादून, हरिद्वार, पौड़ी और टिहरी से कांस्टेबल से लेकर निरीक्षक तक 160 पुलिस कर्मियों को भेजा गया। सरकार ने राहत और बचाव कार्यों के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष से 20 करोड़ की धनराशी जारी की है। इधर 6 अगस्त 2025 की सुबह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री धामी से फोन पर बात की और पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।

इस तरह धराली आपदा क्षेत्र में चंडीगढ़, सरसावा और आगरा से दो चिनूक और दो एमआई-17 हेलीकॉप्टर तैनात किए। सड़क संपर्क बहाल करने के लिए चिनूक हेलीकॉप्टरों की सहायता ली जा रही है। स्वास्थ्य विभाग ने दून मेडिकल कॉलेज, कोरोनेशन जिला अस्पताल और एम्स ऋषिकेश में बिस्तर आरक्षित करवाये और विशेषज्ञ डॉक्टरों को उत्तरकाशी भेजा।

ज़िला प्रशासन ने इंटर कॉलेज हर्षिल, जीएमवीएन और झाला में राहत शिविर शुरू किए है। एनआईएम और एसडीआरएफ ने लिमचागाड़ में एक अस्थायी पुल का निर्माण भी किया है। इस पुल के बहने के कारण धराली से बाहरी लोगों का सर्म्पक कट गया था। 



बादल नहीं फटा, खतरनाक एवलांच आया।

धराली आपदा के बाद एसडीआरएफ की संयुक्त टीम ने खीर गंगा उद्गम स्थल तक उच्च स्तरीय रैकी एवं भौतिक निरीक्षण किया है। पता चला कि 5 अगस्त 2025 को खीर गंगा में आई भीषण जलप्रलय एवलांच ही था। 14-15 अगस्त 2025 को मुख्य आरक्षी राजेन्द्र नाथ के नेतृत्व में मुख्य आरक्षी प्रदीप पंवार, कांस्टेबल सोहन सिंह, एनआइएम उत्तरकाशी के प्रशिक्षक शिवराज पंवार एवं अनुप पंवार तथा पोटर तारा व हरि की संयुक्त टीम द्वारा श्रीकंठ पर्वत बेस एवं खीर गंगा उद्गम स्थल का भौतिक निरीक्षण किया गया।

टीम ने लगभग 4812 मीटर ऊँचाई तक पहुंचकर अत्यंत विषम परिस्थितियों, घना कोहरा (Whiteout) तेज हवाएं एवं वर्षा के बीच भी ड्रोन (Phantom&4, oa DJI Mini&2) के माध्यम से ग्लेशियर बेस और उद्गम स्थल की विस्तृत वीडियोग्राफी/फोटोग्राफी की है। विषम परिस्थितियों में की गई इस उच्च स्तरीय रैकी एवं भौतिक निरीक्षण द्वारा आपदा की वास्तविक परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण तब सम्भव हुआ जब टीम द्वारा संकलित सभी फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी उच्चाधिकारियों एवं वैज्ञानिक संस्थानों को प्रेषित की गयी।

इस तरह से मालूम हो रहा है कि खीर गंगा में पानी के साथ मलवा काफी ऊंचाई से आया है जो लगभग 4800 मी की ऊंचाई से बताया जा रहा है। दरअसल यही श्रीकंठ पर्वत का बेस क्षेत्र है और यह पुराना ग्लेशियर क्षेत्र है। यहां ग्लेशियर डिपॉजिट मोरेन हैं। उक्त दिन तीन स्थानों से यह खिसककर नीचे की तरफ आया और तेजी से बहता हुआ धराली को बहा ले गया। 


Sunday, December 29, 2024

आंचलिक फिल्म से जुड़े इनके कारनामे की पटकथा

वह हीरो जब फेसबुक में अपने महिला दोस्तों के साथ की फोटो पोस्ट नहीं करता, तो उसके दोस्तों को मालूम हो गया कि यह तो अपनी पत्नी के सामने बड़ा पवित्र बनता है।



दरअसल एक आंचलिक फिल्मों का हीरो नई नई महिलाओं, युवतियों को सब्जबाग दिखाता है कि वह उन्हें बड़ा हीरो या हीरोईन बना देगा। विश्वास इसलिए होता था कि उस हीरो का एक गीत बहुत ही प्रसिद्ध हुआ है। इसी बात पर लोग उस पर विश्वास भी करते हैं।


इस बात पर उसकी एक बचपन की महिला मित्र उसका भरपूर सहयोग करती है। क्योंकि उस हीरो की महिला मित्र और उस हीरो को घर से बाहर निकलने के लिए कोई माध्यम तो चाहिए ही। यह क्रम वे पिछले 30 सालों से कर रहे है। आगे भी अनवरत करेंगे, ऐसा उनके व्यवहार में झलकता है। उस हीरो को उन महिला मित्रो से बस यही अपेक्षा रहती है कि उनके बहाने उसकी वह 30 साल पुरानी महिला मित्र बाहर निकल सकती है। ऐसा ही होता आया है। जब जब लोगो को पता चला, तब तब इनसे लोग कटते रहे। मगर इन्होंने फिर नए नए युवाओं, युवतियों को जोड़ने का अपना षडयंत्र जारी रखा। इनके कारनामों से कई जोड़ों का आपस में मनमुटाव भी बढ़ा। हालांकि इनसे दूरी बनाने पर बात समझ भी आई और जो इस हीरो से दूर हुए वे वापस अपनी जिंदगी में लौटे भी।

इसी क्रम में एक और जोड़ा इनके फंदे में फंस गया। वह जोड़ा बहुत ही खुला दिमाग का था और यह जोड़ा उस हीरो को बहुत पसंद भी करता था, विश्वास भी करता था। एक बार इसी जोड़े को अलग करने का षडयंत्र हीरो की परमानेंट महिला मित्र या यू कहें कि 30 साल पुरानी महिला मित्र ने रचा। हुआ यूं कि इस महिला ने धीरे धीरे उस युवती को ऐसा घूंट पिलाया कि वह युवती अपने पति को भूल गई और उस हीरो की 30 साल पुरानी महिला मित्र को सबकुछ समझने लग गई। क्योंकि उस महिला को तो कोई माध्यम चाहिए ही, कि वह बाहर निकले। एक दिन उन्होंने उस युवती को इतना पागल बनाया कि उस युवती ने अपना जन्मदिन ऐसे होटल में उस हीरो और उस हीरो की 30 साल पुरानी महिला मित्र के साथ मनाया और अपने पति को साथ में नहीं ले गई। उन्होंने उस युवती, जो "गंगा जल" जैसे पवित्र है को भी सीखा दिया कि वह अपनी फेसबुक में उस हीरो की फोटो मत डालें। वह युवती भी इतनी सीधी साधी है कि उसने भी वही किया। जब युवती ने लंबे समय तक देखा कि वह हीरो और उस हीरो की 30 वर्ष पुरानी महिला मित्र उस युवती को माध्यम बनाकर कई बार मिलते गए। 

एक दिन उस युवती ने उन दोनों को पूछा कि वे लोग इतना साथ रहते है, साथ पार्टी मनाते है, पर आप लोग एक दूसरे की फोटो फेसबुक में क्यों नहीं पोस्ट करते? इस सवाल का जवाब न तो उस हीरो के पास था, ना ही उस हीरो की 30 साल पुरानी महिला मित्र के पास था। तब जाकर उस युवती को समझ में आया कि यह तो उसे इस्तेमाल कर रहे है। क्योंकि उस हीरो की कई बार अपनी पत्नी से झगड़ा हुआ है जिसका पत्ता आंचलिक फिल्मों से जुड़े लोगों और कुछ नमी गायकों को भी है, झगड़ा उस महिला के बहाने था जो 30 साल पुरानी उस हीरो की महिला मित्र है और आगे भी रहेगी। इसलिए वे कभी नाटक, कभी फिल्म और कभी ऐसे भोले भाले युवाओं को फंसाकर अपने मिलने के बहाने ढूंढते रहे है। उस हीरो की वह महिला मित्र इतनी धूर्त है, अपने को बड़ा ही कुछ समझती है। अब यही कहा जा रहा है कि यदि वह हीरो सच्चा है, या उसकी वह महिला मित्र सच्ची है तो चुपके चुपके पार्टी क्यों करते है। यदि पार्टी कर भी लेते है तो पार्टी की फोटो अपनी अपनी फेसबुक में सार्वजनिक करें। दूसरों के परिवारों को न बिगाड़े। क्योंकि हीरो नहीं चाहता कि वह अपनी पत्नी की नजर में फिर से गिर जाए। यह भी अच्छी बात है। तो अपनी महिला मित्र से भी मिलना बंद कर दे। ऐसा लोग उनके बारे में सोचते है और कहते भी है। पर, फेसबुक में अपनी महिला मित्र की फोटो पोस्ट नहीं करेंगे? इसी लाइन को ऐसा भी बोल सकते है कि वह महिला अपने पुरुष मित्र की अपने साथ की फोटो फेसबुक में पोस्ट नहीं करेगी? पर, दूसरे के परिवार को बेवकूब जरूर बनाएगी। इनके बारे में लोगो ने जो मुझे बताया कुछ कुछ मैने खुद भी देखा है, इसलिए यहां लिख रहा हूँ। यदि मेरे सामने कुछ नहीं आता तो मैं लिखता भी नहीं। सावधान!

Saturday, September 28, 2024

धन्य हो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जो आप भू कानून पर संवेदनशील हुए

धन्य हो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जो आप भू कानून पर संवेदनशील हुए



https://youtu.be/QpBN41rYWEs?si=TDpFEJnGPi7mm2iF


आप सोच रहे होगें कि आज भी यह यही कहने वाला है कि आज खास विषय पर बात करने जा रहा हूं। यदि यह खास विषय नहीं है तो कृपया इस वीडियों को देखकर जरूर कमेंट करना। यदि खास है तो भी आप कमेंट करेंगे। कमेंट इसलिए कि विषय खास है। विषय सिर्फ व सिर्फ उत्तराखण्ड राज्य की आत्मा से जुड़ा है। यानि भू कानून का विषय है। 24 साल बाद यदि किसी मुख्यमंत्री ने राज्य के भू कानून पर यह कहा कि वह राज्य में सशख्त भू कानून लाना चाहते है। तो इसमें क्या गलत है। प्रतिपक्ष के लोग जरूर कुछ मेनमेख निकालेंगे, पर वे भी लम्बे समय से भू कानून की पैरवी कर रहे है। यहां मैं बता दूं कि राज्य का कोई ऐसा नागरिक नहीं होगा जो सशख्त भू कानून नहीं चाहता होगा। पहले हम यहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान सुनते हैं जो उन्होंने अन्तरार्ष्टीय पयर्टन दिवस के अवसर पर सचिवालय स्थित पत्रकारो से कहा है।


जी हां! जब राज्य के मुख्यमंत्री जनता की मांग को प्रमुखता से ले रहे हैं तो कौन भला जो इनका विरोध करेगा। विरोध सिर्फ इस बात पर होगा कि जब भू कानून को प्रस्तावति या दस्तावेजीकरण करेंगे तो वह ड्राप्ट एक बार जनता के मध्य तथा उन सभी राजनीतिक सामाजिक संगठनो के पास अवश्य जाना चाहिए जो पिछले कई वर्षो से भू कानून की मांग कर रहे है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह भू कानून एक पार्टी का बनकर मात्र रह जायेगा। फिर उसका विरोध होगा। यहां पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक परिपक्वता का परिचय होगा जब भू कानून का दस्तावेज जनता की संस्तुति के साथ सरकार के पटल पर आयेगा।


अब आप कह रहे होगे कि यह तो हम भी सोच रहे है और यही कहने जा रहे है। यदि सभी ऐसा सोच रहे है और सभी ऐसा कहने जा रहे है तो कोई कौन भला जो सशख्त भू कानून नहीं चाहता होगा। भू कानून आज का सवाल नहीं है यह राज्य आन्दोलन के दौरान से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जो राज्यहित में जरूरी है।

 

राज्य का आन्दोलन का अपना इतिहास रहा है। यदि हम भू कानून की बात करेंगे तो हमे भी कुछ पीछे के इतिहास की ओर नजर दौड़ानी होगी। राज्य सभा द्वारा 10 अगस्त को पृथक उत्तराखण्ड राज्य के बिल को मंजूरी देने के पश्चात राष्ट्रपति ने 28 अगस्त, 2000 को राज्य के गठन की अधिसूचना जारी कर दी थी। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने 1 नवंबर, 2000 को उत्तराखंड की पहली सरकार का गठन करने का फैसला किया। लेकिन पता चला कि उक्त दिन ग्रह नक्षत्रों के हिसाब से शुभ नहीं है। शुभ की आशा में 9 नवंबर, 2000 को नए राज्य ने आकार ग्रहण किया। पृथक राज्य का यह संघर्ष सिर्फ भूगोल का संघर्ष नहीं था। इस संघर्ष को समझना हो तो इसके बीज के रूप में 2 दिसंबर, 1815 को हुई सिगौली की संधि से समझ सकते हैं। इसी का विस्तार पृथक राज्य आंदोलन के रूप में होता है। तब भी मामला सिर्फ भूगोल का नहीं था बल्कि संसाधनों के हक हकूक का था और राज्य आंदोलन में भी सवाल सिर्फ भूगोल का नहीं बल्कि पहचान और संसाधनों के हक हकूक का रहा है।

 

किसी भी राज्य और नागरिक के लिए जमीन बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। इसके बिना किसी भी प्रकार के विकास की कल्पना करनी अधूरी ही कही जायेगी। इसलिए कह सकते हैं कि इस राज्य के लिए भी भूमि प्राथमिक संसाधन है। सभी प्राकृतिक संसाधनों का आधार भी भूमि ही है। इसलिए भूमि का सवाल औपनिवेशिक दौर से ही उठता आ रहा है। औपनिवेशिक ताकतों ने भी सबसे पहले उत्तराखंड की भूमि को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की है। 1815 में कुमाऊ पर ब्रिटिश का राज हो गया था। तत्काल रेम्जे ने दो तथा पी और गूज ने एक-एक भूमि बंदोबस्त कर दिया। ब्रिटिश काल का अंतिम बंदोबस्त 1928 में इबट्सन ने किया। आजाद भारत में सन् 1960-64 में बंदोबस्त किया गया। इसके बाद 2004 में बंदोवस्त होना था जो आज तक नहीं हुआ है। इस तरह से भी यदि देखा जाये तो इस राज्य को पहले बंदोबस्त या पैमाईश करनी अवश्यक है उसके बाद जो संस्तुतिया आयेगी उनके अनुरूप सशख्त भू कानून बनाया जाये। यह एक प्रकार की भूमिका कही जा सकती है।


मगर हमारी सरकारों के लिए जमीन दोहन का साधन रही है। खेती किसानी कभी भी उनकी नीतियों और नियमों के केंद्र में नहीं रही है। औपनिवेशिक काल में भूमि प्रबंध में कृषि को सर्वाधिक महत्व दिया गया था। उस समय कुल राजस्व भूमि का 55.94 प्रतिशत भाग भूमि के अंतर्गत था। बाकि 44.06 प्रतिशत भूमि बेकार थी। भूमि का बड़ा हिस्सा वनों से आच्छादित था। ब्रिटिश शासन ने वनों का राजकोषीय दृष्टि से उपयोग सन् 1860 से किया। सन् 1878 में वन भूमि का बड़ा भाग सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया और वनों के व्यापारिक दोहन की प्रक्रिया आरंभ कर दी। औपनिवेशिक सत्ता का यह कार्य उत्तराखंड में भूमि उपयोग के इतिहास में निर्णायक बिंदु है, जिसकी गूंज आज भी वनों के आस-पास बसने वाले समुदायों के आंदोलनों के रूप में सुनाई पड़ती है।

 

इसके बाद 1890 में नयावाद कानून पास करने के साथ ही ब्रिटिश शासन ने गोचर व पनघटों की जमीनें सरकारी नियंत्रण में कर ली। साथ ही नवावाद के अंतर्गत आने वाले गाँव को अपने द्वारा बसाये गाँव मानते हुए ऐसे गाँव की भूमि के स्वामित्व का अंतिम अधिकार स्थानीय समुदायों से छीनकर उन्हें दोयम दर्जे का स्वामी बना दिया। कमोबेश यही नीतियाँ आज भी किसी न किसी रूप में लागू हैं। यदि ऐसा है तो हमे सबसे पहले इन करतूतो से बाहर निकलना होगा ताकि हम एक खास भू कानून की तरफ बढ पाये।


पृथक राज्य आंदोलन के दौरान भी भू-कानून का सवाल उक्रांद और संघर्ष वाहिनी ने जोर-शोर से उठाया था। पिछले 10 सालों से उत्तराखण्ड में विभिन्न संगठन ही नहीं अपितु आम नगारिक भी भू कानून की मांग बड़ी जोर से कर रहे है। दरअसल भूमि का सवाल पहाड़ की पहचान और हिमालय के संसाधनों से जुड़ा सवाल जो है। अगर हिमालय की जैव विविधता को बचाना है तो उत्तराखंड की भूमि को संरक्षित करना पड़ेगा। परंतु उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक सरकारों की नीतियाँ और कानून भू-माफियों के पक्ष में ही रही हैं उसी का परिणाम है कि हमारी खेती की जमीन लगातार घट रही है।


केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड राज्य में रिकॉर्डेड वन का क्षेत्रफल 37999.600 वर्ग किमी है। यह राज्य के कुल क्षेत्रफल का 71.05 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में भविष्य के उत्तराखंड की जो तस्वीर होगी, उसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। अगर हम आज भी नहीं चेते तो उत्तराखंड का भविष्य भी भू- माफियाओं के हाथों में ही रहेगा। इस पंक्ति में अंकित जानकारी को राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री से लेकर पूर्व के मुख्यमंत्री तक सभी अच्छी तरह समझते है। मगर ऐसा क्या हो जात है कि अब तक के मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर फिसड्डी ही साबित हुए है।


अगर देखा जाये कि जमीन कोई संपत्ति नहीं बल्कि एक पहचान है। इस पहचान का संबंध उस जमीन और हिमालय से है जिसे आज संरक्षित करना सबसे जरूरी है। इस संरक्षण में व्यक्ति, समाज, संस्था और सरकार की क्या भूमिका हो सकती है। उसकी पड़ताल इस अंक में की गई है। जल, जंगल और जमीन का सवाल जीवन के साथ नाभिनालबद्ध है। इसलिए बार बार यह सवाल खड़ा हो रहा है कि भू-कानून को लेकर सरकारों की नीति और दृष्टि को समझना जरूरी है। पर जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बाकायदा पत्रकारवार्ता करके बताया कि वे सशख्त भू कानून चाहते है। यदि उनकी यह मंशा स्पष्ट है तो देर किस बात की। कोई भी उत्तराखण्डी सशख्त भू कानून चाहता है।


इस रिपोर्ट के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के डा॰ प्रकाश उप्रेती के इनपुट को शमिल किया गया है। हमारी यह रिपोर्ट आपको कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताये। अगले अंक में राज्य के किसी खास मुद्दे पर हाजीर होगे।

Tuesday, September 17, 2024

भाषा का बंधन तोड़ा गढ़वाली फिल्म "मीठी" ने।


जबसे उत्तराखंड सरकार ने फिल्मों को सब्सिडी देनी आरंभ की है तब से उत्तराखंडी सिनेमा के दिन वापस लौटते दिखाई दे रहे है। पिछले छः माह में लगभग एक दर्जन आंचलिक फिल्मे सिनेमा हॉल तक पहुंच चुकी है और इतनी ही फिल्मे अगले तीन माह में रिलीज होने के लिए तैयार है। फलस्वरूप इसके फिल्मकारों और उत्तराखंडी फिल्मों से जुड़े सभी का नजरिया भी बदल चुका है। अब वे एकदम मनोरंजक व व्यवसायिक फिल्मे बनाने लग गए है। यहां हाल ही में रिलीज हुई गढ़वाली फिल्म "मीठी - मां कू आशीर्वाद" का जिक्र किया जा रहा है।


हालांकि संस्कृति प्रेमियों को गढ़वाली फिल्म "मीठी - मां कू आशीर्वाद" की कहानी पसंद न आए, पर यह कह सकते हैं कि इस फिल्म ने अपने मुकाम पर व्यवसायिक रूप तो ले ही लिया है।

वैसे भी संस्कृतिप्रेमीयो को खुश होना ही चाहिए की, इस फिल्म में एक पहाड़ी पकवान को वैश्विक दर्जा दिया गया है। यानी फिल्म का कथानक उत्तराखंड पहाड़ी पकवानों के इर्द गिर्द घूमता है। कई बार मिलेट ईयर की चर्चा, कई अन्य होटलों का भोजन पहाड़ी पकवान कंडाली कू साग और झंगोरे की खीर के सामने फीके पड़ते नजर आए है। एक भाषा का न होना कुछ कुछ अंतराल में फिल्म की कहानी भटकती हुई नजर आई है। तात्पर्य है यह है कि इस गढ़वाली फिल्म में 30 फीसदी ही आंचलिक भाषा का उपयोग किया गया है। यह सफल निर्देशन ही कहा जायेगा कि तीन तीन भाषाओं के समीश्रण के बावजूद भी गढ़वाली भाषा को जो प्रमुखता दी गई यह किसी आंचलिक फिल्म में पहली बार हुआ है।


गढ़वाली फिल्म "मीठी - मां कू आशीर्वाद" फिल्म बनाने में फिल्मकारों ने 
तकनीकी का भरपूर उपयोग किया है। चूंकि इस निर्माण में बम्बईया तामझाम बहुत अधिक इस्तेमाल नहीं किया गया, पर कोशिश भरपूर की गई है।

कंडाली कू साग और झंगोरे की खीर जैसे पकवान के इर्द गिर्द बुनी गई फिल्म की कहानी में यह दिखाने की भरसक कोशिश की गई कि पहाड़ में उगने वाली बिच्छू घास भी औषधीय गुणों से भरपूर है और इसकी सब्जी लाजवाब है। फिल्म की कहानी में "स्वाद भारत प्रतियोगिता" के मार्फत बिच्छू घास यानी कंडाली का साग और पहाड़ी मोटा अनाज झंगोरा की खीर ने जब इनके औषधीय गुण बताने आरंभ किए तो निर्णायक भी दांतो तले उंगली चबाने लग गए। अर्थात पहाड़ी मोटे अनाजों और पहाड़ में पैदा होने वाले औषधीय उत्पादों को इस फिल्म में बहुत ही सलीके से प्रस्तुत किया गया है। जबकि कुछ लोग इस फिल्म से इत्तेफाक न रखते हुए यही कहेंगे कि कहानी में और पकवानों को भी दर्शाया जा सकता था, पर यह पहली उत्तराखंडी फिल्म है जिसकी कहानी उत्तराखंडी पकवानों के इर्द गिर्द घूमती है। हां यह भी पहली फिल्म है जिसमें भाषाओं का कोई बंधन नहीं है। गढ़वाली, हिंदी और अंग्रेजी बोली भाषा के मिश्रण का बहुत ही सलीके से पटकथा व संवादों में पिरोने का सफल प्रयास किया गया है।


कैमरा या अन्य तकनीकी संसाधनों की इस फिल्म मेकिंग में कोई कोर कसर नहीं थी, पर जब अभिनय, संवाद गढ़वाली से हिंदी और अंग्रेजी में परोसे जा रहे थे तो ठेठ उत्तराखंडी दर्शक इस दौरान कहानी को एक सूत्र में नहीं पा रहे थे। मगर फिल्म का क्लाइमैक्स वैश्विक स्तर और मनोरंजन के बाजार में अपने को जरूर पा रहा था।


उल्लेखनीय तो यही है कि रोमांस और मारधाड़ के एकदम विपरीत बनाई गई यह गढ़वाली फिल्म निर्देशन की विशेष चतुराई का कमाल माना जायेगा की, जो भावनात्मक और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर संवाद दर्शकों को बांधने में सफल रही है। यही नहीं अधिकांश वक्त कई दर्शकों के आंखों में आंसू भी छलक आए है।
फिल्म का अधिकांश हिस्सा उत्तराखंड के कश्मीर कहे जाने वाले खूबसूरत स्थान जखोल गांव में ही फिल्माया गया है।

इस फिल्म में कुछ व्यवसायिक कलाकारों का न होना ही कभी कभी अभिनय की कमजोरी दर्शकों को बांधने में असफल रही है, पर पूरे ढाई घंटे तक पहाड़ी उत्पादों की महत्ता बताते बताते और पलायन की एक महीन मजबूरी कि पहाड़ में शिक्षा और व्यवसायिक शिक्षा का अभाव दर्शको को बार बार भाव विभोर कर रहा था।

दरअसल यह पहली गढ़वाली फिल्म है जिसमें भाषा का कोई बंधन नहीं रखा गया है। गढ़वाली के अलावा हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण बखूबी है। हो सकता है कि फिल्मकार ने पहाड़ी मोटे अनाज को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पहुंचाने के लिए इस गढ़वाली फिल्म की कहानी का ताना बाना हिंदी और अंग्रेजी के साथ बुना होगा।


फिल्म की कहानी को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कई बार दर्शकों की आंखे नम हुई। निर्देशक के लिए यह बहुत कठीन हो जाता है कि यदि फिल्म में मारधाड़ और रोमांस जैसे मसाला फिल्म में न हो तो वह मनोरंजन करने में विफल हो सकती है। पर "मीठी - मां कू आशीर्वाद" फिल्म में कुशल निर्देशन का कमाल कहा जायेगा कि एक भी क्षण अभिनय, संवाद और भावभंगिमा दर्शकों को विचलित नहीं होने देते।


अर्थात कहनी एक ऐसी विपदाभरी पहाड़ी युवती की है जिसके ऊपर से मां बाप का साया उठ जाता है। वह खुद और उसकी छोटी बहन किशोर अवस्था में होती है। सम्पूर्ण जिम्मेदारियां नायिका मीठी (मेघा खुगसाल) को ही निभाना होता है।

मीठी जैसी विपदाभरी युवती  के चरित्र के साथ पूरी फिल्म सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
फिल्म यह बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती कि उत्तराखंड में पर्यटन, पहाड़ी उत्पाद स्वरोजगार के बेहतरीन संसाधन है। मगर यह बताने में भी फिल्म नहीं चूकती कि पहाड़ के गांव सड़क, यातायात और विद्युत की  समस्या से लगातार जूझते रहते है ।कुलमिलाकर भाषा का बंधन तोड़कर यह गढ़वाली फिल्म ग्लोबल मंच पर उत्तराखंडी पहचान की दमदार प्रस्तुति दे सकती है।

"स्वाद भारत" का जैसे नारों के बीच जब कंडाली (बिच्छू घास) की सब्जी, झंगोर की खीर परोसी ही नही जाती बल्कि संवादों और भाव भंगिमा से यह बताने में कोई कंजूसी नहीं होती कि पहाड़ के यह उत्पाद सुपाच्य के साथ साथ शुद्ध जैविक भी है। जिसमे कोरोना काल का उदाहरण बताया गया है।

यह फिल्म मनोरंजन से लेकर, राज्य के मुद्दे और विषय वस्तु तक दर्शकों को अपनी कहानी से रु- ब - रु करवाने में सफल रही है। इस फिल्म में 50 फीसदी कल्पनाओं का सहारा लिया गया तो 50 फीसदी से जरूरी और सच्ची घटनाओं को कहानी का हिस्सा बनाया गया है। यह भी कह सकते हैं कि "मीठी - मां कू आशीर्वाद" गढ़वाली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर
व्यवसाय कमाने में भी सबसे आगे रही है। 

फिल्म का निर्देशन उत्तराखंडी सिनेमा के जानेमाने निर्देशक कांता प्रसाद ने किया है जबकि अभिनेत्री मेघा खुगसाल ने अपने बेहद खूबसूरत अभिनय ने फिल्म में जान डाली है। फिल्म निर्माण में देहरादून निवासी वैभव गोयल ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...