Tuesday, December 17, 2019

रसिया के चित्रकार उतार रहे पहाड़ का जनजीवन

रसिया के चित्रकार उतार रहे पहाड़ का जनजीवन

By Prem Pancholi

देहरादून जनपद के अन्र्तगत काया लर्निंग सेन्टर तिलवाड़ी-भाववाला में आजकल विदेशी चित्रकारो ने डेरा डाला हुआ है। यह लोग देहरादून के पछुवादून ग्रामीण क्षेत्रो की संस्कृति व प्रकृति को अपनी कलम से कैनवास पर ऊतार रहे है। खास यह है कि रसिया का यह 12 सदस्यीय दल भविष्य में इन चित्रो की प्रदर्शनी अपने देश में करेंगे। यही नहीं वे अपने चित्रों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के गुर बतायेंगे, तो वहीं सामाजिक समरसता की संस्कृति को रेखांकित करेंगे। वे उत्साहित हैं कि उनके इस अभियान के साथ ग्रामीण स्वस्र्फूत जुड़ रहे हैं। 

ज्ञात हो कि ईको आर्ट विषय को लेकर काया लर्निंग सेंटर इन दिनों गुलजार है। जहां पर ये विदेशी चित्रकार अपने विषय को लेकर देर रात्री तक मशगूल रहते है। जो उन्हे दिनभर में दिखता है, उसे वे अगले दिन तक कैनवास पर उतार देते है। विशेषकर वे देहरादून के पछुवादून ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश को रेखांकित कर है। रसिया के 12 सदस्यीय दल का नेतृत्व कर रहे सत्य ने बताया कि इस दौरान अलग अलग देशों से आये 120 चित्रकार भारत के ग्रामीण क्षेत्रो में ग्रामीण परिवेश को उकेरने का काम कर रहे है। यहाँ रसिया, कजकिस्ता, यूक्रेन, उजकिस्तान व कुछ भारत के भी चित्रकार इस अभियान में शामिल है। यहां देहरादून में इस कार्यक्रम को काया लर्निंग सेंटर तिलवाड़ी ने आयोजित किया है। इस दौरान दिल्ली की श्रीयांशी, दिपक कुमार जैसे चित्रकार भी इस अभियान के हिस्से बने हुए हैं।

उल्लेखनीय हो कि चित्रकारो का यह दल ग्रामीण जन-जीवन को समझ रहा है। इसके साथ-साथ जो उन्हे दिख रहा है या महसूस हो रहा है उसे वे चित्रों में ढाल रहे है। कह सकते हैं कि यह शुद्ध रूप से आर्टिस्ट रेजीडेंसी प्रोग्राम है, जिसे सृजनशीलता का कार्यक्रम भी कह सकते है। अर्थात काया लर्निंग सेंटर रसिया से आये इन आर्टिस्टो को ग्रामीण जन जीवन से रूबरू करवा रहा है। इधर इन चित्रकारों का कहना है कि वे यहाँ के परिवेश पर चित्र बनाएंगे और अपने-अपने देशों में प्रदर्शनी करेंगे। वे बहुत ही प्रभावित हैं कि देहरादून का ग्रामीण क्षेत्र बहुत ही सुंदर है, साथ ही यहाँ का अतिथ्या सत्कार भी उन्हें देहरादून रूकने के लिए बाध्य कर रहा है। बताया कि यहाँ पर महिलाओं का पहनावे या सजावट उन्हें बहुत ही प्रभावित कर रही है कि यह महिलाओं के सम्मान का तात्पर्य समझा रहा है। जबकि ऐसी मेहमाननवाजी जैसी संस्कृति उन्होंने कहीं भी नही देखी है। वे अपने अनुभव को बांटते हुए कह रहे थे कि गांव में लोगो ने उन्हें फोटो खींचने या अन्य कार्यो के लिए सहज ही मदद की है, यही वजह है कि उन्होंने कई प्रकार के चित्रों का सृजन किया है।

ख्यातिलब्ध चित्रकार जगमोह बगाणी ने कहा कि वे भविष्य में हर वर्ष काया लर्निंग सेंटर के साथ मिलकर आवासीय चित्रकारी शिक्षण कार्यक्रम आयोजित करेंगे। ताकि नए कलाकारों को चित्रकला के लिए एक मजबूत प्लेटफार्म मिल सके। काया लर्निंग सेंटर के संयोजक व सामाजिक कार्यकर्ता सन्तोष पासी ने बताया कि चित्रकला शिक्षण कार्यक्रम के तहत यह दल अगले सात दिनों तक पछुवादून के ग्रामीण परिवेश को समझेंगे और कैनवास पर उतारेंगे। जिसकी प्रदर्शनी 19 दिसंबर को काया लर्निंग सेंटर तिलवाड़ी-भाववाला में होगी। इस दौरान स्थानीय स्कूली बच्चे, कलाकार इन लोगो से मुखातिब भी होंगे।

चित्र ही विरासत है

दुनियाभर के 120 चित्रकार इन दिनों भारत के ग्रामीण परिवेश को समझ रहे है और यहां के सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश को कैनवास पर उतार रहे है। प्राकृतिक व सांस्कृतिक परिवेश को समझना आज की जरूरत है। साथ ही इसे संरक्षित करने की भी उतनी ही आवश्यकता है। चित्र इस हेतु सरल माध्यम है। जब ये चित्र रूप लेंगे तो भविष्य में हम अपनी माटी से जुड़े रहेंगे। यही नहीं सृजनशीलता और विरासत संजोने के लिए भी यह महत्वपूर्ण कार्यक्रम है।
-ः जगमोहन बंगाणी प्रसिद्ध चित्रकार

Saturday, November 2, 2019

धारी गांव के सत्या की शहादत पर गमगीन हुआ गांव

सत्य भाई, ये तूने क्या किया। थोड़ा भी कुछ सोचने और समझने का मौका नही दिया। मैं तो सोच रहा था कि आप अब लंबी छुटी आएंगे तो बचपन की यादें साझा करेंगे। सत्य भाई हम सबके साथ ये अच्छा सलूक नही है। अब तो आंसुओ की बूंदे भी जबाब दे रही है। कह रही है कि सत्य है जिसने अपने सहयोगियों के साथ रहकर देश की सीमाओं पर पहरा दिया। SSB के तेरे साथी और बचपन के स्कूली साथी आज अपने को समझा नही पा रहे है कि कुदरत ने हमारे साथ ऐसा बेहूदा व्यवहार क्यो किया। है, ईश्वर हमने ऐसा कभी नही सोचा कि तू इतना बेईमान होगा और बिना बताए सत्य भाई को हमसे छीन लेगा। सलाम सत्य भाई, देश के लोग और शरहद आपकी यादे कैसे भूल सकती है। पर भगवान नाम के हे अदृश्य शक्ति ये तेरा छलावपन ठीक नही है, जो तूने हमसे सत्य को छीनकर खुद असत्य के पथ पर आ गया। अब लोग तुझ जैसे भगवान पर भरोसा नहीं करेंगे। क्योंकि तूने यह अच्छा नही किया। 
सत्य भाई मुझे अच्छी तरह याद है कि साल 1994-95 की बात है। हम नौगांव इंटर कालेज के छात्र थे, तू और बिंगसी का अर्जुन, छमरोटा का कुंदन (गुडू) एक ही दिन व एक ही साथ घर से भागकर निकले थे, यहाँ चर्चा का माहौल गरम था। खैर कुछ दिन बाद खबर आई कि सत्य तो SSB में निकल गया, अर्जुन घर आ गया और कुंदन ड्राइवर बन रहा है। बस साल, महीने, दिन गुजरते गए हम सभी सगे साथी अपने अपने कामो में मशगूल हो गए। तू छुटी आता था तो हम लोग कहीं न कहीं मिल ही लेते थे। अब हम इंतजारी ही करते रहेंगे। अचानक हमसे व परिवार से ऐसा बिछुड़ना निशब्द व बेआंसू कर रहा है। इतना गुमान है कि तेरा बलिदान देश के खातिर हुआ है। मगर दोस्ती का यह जख्म शायद कभी भर जाय।

Wednesday, October 30, 2019

Rawanlti poetry recitation on oordarshan



Rawanlti poetry recitation on oordarshan

https://youtu.be/sIE7yNCn394
In the thirteen folk languages ​​of Uttarakhand, Rwanlti language has amazing word structure.

After a long time, Mahabeer Rawanalta has given an identity to this lingua franca. Doordarshan Kendra of Prasar Bharati has also taken a step to preserve it for the second time through Kavi Sammelan on this folk language. 

Here is a poem recitation under the direction of the famous litterateur Mahabeer Rawanalta. During this time, poets of Rwanyee like Anoj Rawat, Bharti Anand, Dinesh Rawat and Rajuli Batra are present.


Friday, October 25, 2019

उत्तराखण्ड में दो लाख हेक्टेयर में होगी शुद्ध जैविक खेती

||उत्तराखण्ड में दो लाख हेक्टेयर में होगी शुद्ध जैविक खेती||
उत्तराखण्ड में इन दिनों कुछ काश्तकार तो सरकार के भरोसे जैविक खेती को आगे बढा रहे है कुछ किसान खुद के बलबूते पर जैविक खेती को विकसित कर रहे हैं। जो भी हो पर जैविक खेती से जुड़े लोग स्वरोजगार से जुड़ चुके हैं, साथ ही वे स्थानीय पर्यावरण की भी चिन्ता करते है। 
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https://navlekha.withgoogle.com/app/manage
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मिट्टी में अब बिना रसायनों के प्रयोग से खेती घाटे का सौदा है। जैविक खेती करने पर मिट्टी में सने रसायन एकाएक हटने वाले भी नहीं हैं। विज्ञानी मानते हैं कि लगातार तीन-चार साल तक जैविक खेती करने पर ही मिट्टी से रसायन हट सकते हैं। इस अवधि में तुलनात्मक रुप से उत्पादन में भी गिरावट आ सकती है। इस प्रकार खाद्यान्न की आपूर्ती कुछ समय तक असन्तुलित हो सकती है।

Wednesday, October 23, 2019

यहां विभिन्न आलेखों को पढें -

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कविता
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इस बार के पंचायत प्रतिनिधि
पर्यटन
06 https://dehradoondiscover.page/article/%E0%A4%8F%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%83-%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0/9nvlsk.html

Thursday, October 17, 2019

27 लेखपालो, 13 पुलिस थानाध्यक्षो पर जुर्माना

||27 लेखपालो, 13 पुलिस थानाध्यक्षो पर जुर्माना||

उत्तराखण्ड सेवा का अधिकार आयेग ने 40 लोक सेवा कार्मिको को काम न करने पर और मामलो को लम्बित रखने पर 500-500 रूपय का जुर्माना किया है। साथ ही जुर्माना का भुगतान न करने और लम्बित मामलो को फिर से लम्बित रखने पर उक्त कार्मिक को 250 रूपय प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना भुगतना पड़ेगा। जबतक अमुक नागरिक की कागजातो की सेवा को बहाल न की जाय। यह जुर्माना हरिद्वार जिले के 27 लेखपालो और 13 पुलिस थानाध्यक्षो पर किया गया है।

पूरी खबर के लिए लिंक खोलें सा लिंक पर क्लिक करे

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Monday, September 30, 2019

काली दाढ़ी-मूंछ चाले होंगे पंचायत प्रतिनिधि

||काली दाढ़ी-मूंछ चाले होंगे पंचायत प्रतिनिधि|| 

आज से पंचायत चुनाव के लिए नामांकन आरम्भ होने जा रहे है। लोग उत्सुक हैं कि आगामी पांच साल तक ग्राम स्तर से लेकर जिला स्तर तक की बागडोर उनके हाथो आयेगी। और उत्सुकुता लाजमी भी है। पिछले पांच साल से जो उन्होंने अभियान चला रखा था कि वे आगामी चुनाव में जोर अजमाईश करेंगे। किया तो कानून सामने आ गया। फिर भी मैं नहीं तो मेरा बेटा, बहू, बेटी, भतीजी, भतिजा, भाई या भाई की बहू अथवा नजिदीकी रिश्तेदार बगैरह बगैरह।

अलबत्ता मौजूदा चुनाव में नये कानून के आने से लोग सकते में थे। बिते कल उच्च न्यायालय नैनीताल ने एक यचिका पर निर्णय दिया कि ग्राम स्तर पर दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवार चुनाव लड़ सकते है। इस तरह अब ग्राम स्तर पर चुनाव की पूरी गणित बदल गई है। सालो से तैयारी कर चुके लोग दो से अधिक बच्चों के कानून से बाहर हो गये थे। सो उन्होंने अब फिर से ताल ठोक दी है।

बता दें कि इस बार पंचायत का चुनाव एक नये रूप में सामने आने वाला था। यदि न्यायालय की मेहरबान नहीं होती। वैसे भी पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक के जनप्रतिनिधियों के रूप रंग से लेकर काम के मामलो तक में परिवर्तन दिखाई देने वाला है। हालांकि क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत में यही होने जा रहा है। माना जा रहा है कि जो भी प्रतिनिधि जीतकर आ रहा है वह स्नातक या परास्नातक से कम नहीं होगा। इनके चुनकर आने के बाद विभिन्न विभागो के विभागाध्यक्ष अब अंग्रेजी की कानाफूसी करते पकड़े जायेंगे तो दूसरी तरफ कागजी गड़बडियों को भी ये शिक्षित नौजवान रंगे हाथो पकड़ेंगे। इसके उलट यदि बजट को ठिकाने लगाने की बारी आयेगी तो भी ये इन नौजवानो का स्वरूप किसी खतरे से कमतर नहीं होगा। सुविधा और खतरे साथ-साथ चलते रहेंगे। ऐसा कुछ लोगो का अनुमान है।

उल्लेखनीय हो कि उत्तराखण्ड में हो रहे इस बार के पंचायत चुनाव में और चुनाव के बाद की तस्वीर सुजली सुजली सी नजर आने के संकेत दिखाई दे रहे हैं। बता दें कि पंचायत चुनाव में नये कानून के आने के बाद कईयों लोगो ने यह सोचना बन्द कर दिया कि अब वे कभी चुनाव प्रक्रिया के हिस्सा बनेंगे या जनप्रतिनिधि के रूप में जनसेवा करेंगे। इस कानून ने बड़े बड़े धुरन्धर धाराशाही किये है। पर अब वे धुरन्धर चुप कहां रहने वाले है वे तो अपने वारिसों पर अजमाईश करेंगे। अर्थात इतना तय है कि काली दाढ़ी-मूंछवाले, सुडौल और चिकने चेहरो वाले नौजवान, स्वयं लिखने वाले, पढने वाले नौजवान ग्राम, क्षेत्र और जिला पंचायत के सदन के हिस्से होंगे।

फलस्वरूप इसके काम की संस्कृति पर भी प्रतिकूल असर दिखाई देगा। अधिकांश प्रतिनिधि मोबाईल के जमाने में ही पैदा हुए है उन्हे टाइपराइटर पद्धति के काम बोरियत करने वाले है। ऐसे प्रतिनिधियों का पाला टाइपराइटर जमाने के कर्मीयों से पड़ने वाला है। यह संतुलन कैसे बनेगा यह भी सवालो के घेरे में है। आशंका यह जताई जा रही है कि ऐसे कर्मी या तो स्वैच्छिक सेवानिवृति लेंगे या बार-बार स्थानान्तरण के शिकार होंगे। और कई सवाल हैं जिन्हे अगले अंक में प्रस्तुत किया जायेगा।

Tuesday, September 17, 2019

जीएसटी और लोगो में जंग

||जीएसटी और लोगो में जंग|| 

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देश में अर्थ व्यवस्था चरमरा गई है। मंदी का दौर यहां रोजगार छीन रहा है। लाखो लोग सड़क पर आ गये है। हमारे कर्णधार अभी भी कश्मीर राग अलाप रहे हैं। छोटे और मंझौले नौकरी-पेशा लोग बेरोजगारी की कगार पर है। उद्योगो का कारोबार कम होता जा है। विशेषकर वे उद्योग जिनसे आम लोगो का वास्ता होता है। इस मंदी के लिए जीएसटी को दोषी ठहराया जा रहा है। जीएसटी भुगतान करना कितना सही है कितना गलत है। यह तो मौजूदा चरमराई हुई देश की अर्थव्यवस्था ने बता दिया है।

ज्ञात हो कि 90 साल पुरानी बिस्कुट की पारले-जी कम्पनी ने लगभग 10 हजार कर्मचारियों को सामान्य फरमान सुना दिया कि वे भविष्य में किसी अन्य जगह नौकरी ढूंढ सकते हैं। सूत्रो के मुताबिक पारले जी ने यह फैसला जीएसटी के कारण लिया है। ऐसा फैसला पारले-जी ने नहीं बल्कि अन्य कारोबारी संस्थाओं ने भी लिया है। मंदी का सर्वाधिक असर कारपोरेट सेक्टर पर पड़ा है। इस सेक्टर में में काम करने वाले लाखो लोग बेरोजगारी की कगार पर आ चुके है। मंदी की मार वर्तमान में मीडिया संस्थाओ पर भी साफ-साफ दिख रहा है। मीडिया संस्थाओ में काम करने वाले 50 फीसदी लोग सड़क पर आ गये है। देश के भीतर पनप रहा मंदी का घुन बढता ही जा रहा है। इस संकट पर किसी भी जिम्मेदार प्रतिनिधि का ध्यान नहीं जा रहा है। फकत गाल बजाने के सिवाय यानि आरोप-प्रत्यारोप के बहस में समय बर्बाद हो रहा है।

उदाहरण स्वरूप उतराखण्ड मे संस्कृति विभाग में अनुबन्धित कलाकरो को एक प्रस्तुति का प्रति कलाकार 400 रू॰ मानदेय मिलता है। जिसमे से जीएसटी का भुगतान भी अमुक कलाकार को करना होता है। देश के सभी महानगरो, नगर निगमो, पालिकाओं व अन्य छोटे तथा बड़े शहरो में खोमचे, ठेली चलाने वाले एकाएक अपने कारोबार को छोड़ रहे है। वे भी जीएसटी के भुगतान से परेशान हैं। कुलमिलाकर जीएसटी के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर मंदी की मार पड़ चुकी है। मगर हमारे कर्णधार देश को मंदी से उबारने पर कोई ध्यान नहीं दे रहे है। बल्कि उन्हे तो पूर्व के राजनितकि प्रतिद्वन्दो का हिसाब-किताब चुकदा करना है।

ताज्जुब हो कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालात लगातार सुधरने के बजाय बिगड़ती ही जा रही है। फलस्वरूप इसके कामगारो में कारोबारी संस्थान छंटनी का काम बढ़ा रहे है और भर्ती घट रही है। सर्वाधिक असर देश के बिस्किट, अंडरगार्मेंट्स, बाइक और शराब जैसे इन चार बड़े उद्योगों पर दिख रहा है। क्योंकि यहां खपत में गिरावट दिखने लग गयी है। साथ ही उत्पादन की मात्रा निरन्तर घट रही है। कारण इसके कंपनियां खर्चा निकालने के लिए कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा रहे है। जून तिमाही में इनरवियर सेल्स ग्रोथ में भारी गिरावट पाई गयी है। चार शीर्ष इनरवियर कंपनियों के तिमाही नतीजे पिछले 10 सालों में सबसे कमजोर रहे हैं। संकेत स्पष्ट नजर आते हैं कि पुरुषों के अंडरगारमेंट्स की बिक्री में आने वाली गिरावट देश की खराब अर्थव्यवस्था कही जाती है। जबकि इनरवियर की बिक्री बढ़ने पर अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ने लगती है। यह अर्थव्यवस्था का कड़वा सच है।

सालाना 10 हजार करोड़ रुपए की बिस्किट बेचने वाली कंपनी पारले-जी के कैटेगिरी हेड मयंक शाह का कहना है कि वे सरकार से जीएसटी कम करने की मांग कर रहे हैं। कहा कि 100 रुपए प्रति किलो की कीमत वाले बिस्किट पर सबसे ज्यादा जीएसटी लग रही है। जीएसटी की वजह से कंपनी की लागत भी नहीं निकल रही है। ऐसे में लोगों को निकालने के सिवा कोई और रास्ता नहीं दिख रहा है। उनका कहना है कि अगर सरकार जीेएसटी कम नहीं करती तो उन्हें अपनी फैक्टरियों में काम करने वाले 8,000-10,000 लोगों को निकालना पड़ेगा। यही हाल ब्रिटानिया बिस्कीअ कम्पनी का भी है।

पहली बार मंदी का असर शराब की बिक्री पर दिखा है। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में शराब, बीयर और वाइन की बिक्री एक-तिहाई रह गई है। सबसे बुरा हाल ऑटो सेक्टर का है। चार पहिया के साथ-साथ दो पहिया वाहनों की बिक्री में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। कई कंपनियों ने उत्पादन बंद कर दिया है।
इसके इतर देश के शेयर बाजारों में भी पिछले हप्ते भारी गिरावट दर्ज की गई। जो प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 587.44 अंकों की गिरावट के साथ 36,472.93 पर और निफ्टी 182.30 अंकों की गिरावट के साथ 10,736.40 पर बंद हुआ था। बंबई स्टाक एक्सचेंज (बीएसई) का 30 शेयरों पर आधारित पिछले सप्ताह का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स सुबह 27.21 अंकों की तेजी के साथ 37,087.58 पर खुला और 587.44 अंकों या 1.59 फीसदी गिरावट के साथ 36,472.93 पर बंद हुआ। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का 50 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक निफ्टी 13.4 अंकों की गिरावट के साथ 10,905.30 पर खुला और 182.30 अंकों या 1.67 फीसदी गिरावट के साथ 10,736.40 पर बंद हुआ। अर्थशास्त्री भी भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत पर चिंता जता चुके हैं। एक प्रसिद्ध भारतीय अर्थशास्त्री के अनुसार, मोदी सरकार की नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर मंदी और चार दशक की उच्च बेरोजगारी सामने देखी है। ऑक्सफोर्ड से शिक्षित अर्थशास्त्री पुलापरे बालकृष्णन ने हालिया शोधपत्र में कहा कि साल 2014 से ही मैक्रोइकॉनमिक नीतियां अर्थव्यवस्था को सिकुड़ाने वाली रही है।
हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ हाई लेवल मीटिंग भी की है। जिसमें देश की आर्थिक स्थिति का जायजा लिया गया, इसे सुधारने के लिए बड़े कदम उठाने को कहा गया। जनवरी-मार्च तिमाही में देश की जीडीपी घटकर 5.8 प्रतिशत रह गई है, मौजूदा समय में और घट गयी है। यहां तक कि देश में सबसे छोटे कारोबार सूत-कपास, जिससे आम लोगो की आर्थिक स्थिति सामजस्य में बनी रहती थी, सो बहुत ही खराब हो चुकी है।

सूत्रों के अनुसार इंडस्ट्रीज के लिए सरकार एक प्रोत्साहन पैकेज पर काम कर रही है, जिसमें कर कटौती, सब्सिडी और अन्य प्रोत्साहन समेत कई वित्तीय कदम उठाए जा सकते हैं। इस पैकेज का लक्ष्य उद्योगों की लागत घटाने के साथ-साथ ऐसे उपाय भी करना है, जिससे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा मिले। माना जा रहा है कि सरकार ऑटो के रजिस्ट्रेशन फीस और रोड टैक्स में भी कमी कर सकती है। रियल एस्टेट सेक्टर के लिए भी सरकार प्रोत्साहन पैकेज का ऐलान कर सकती है।

अर्थशास्त्री बालकृष्णन के मुताबिक सरकार ने अपनी दोनों ही भुजाओं एक मौद्रिक नीति और दूसरी राजकोषीय नीति का प्रयोग अर्थव्यवस्था में मांग को घटाने के लिए किया है। जबकि मोदी सरकार अपनी मैक्रोइकॉनमिक नीतियों के असर का अंदाजा नहीं लगा पाई। सरकार ने अवसंरचना और नौकरियां दोनों को बढ़ाने का वादा किया था, लेकिन व्यवस्थित रूप से यह प्रयास सफल नहीं हो पा रहा है।

अर्थात 2014 से ही देश में पैसों की तंगी हो गई थी। मोदी सरकार के विवादास्पद नोटबंदी के कदम के बारे में अर्थशास्त्री बालाकृष्णन ने कहा कि नोटबंदी के बाद निजी निवेश में गिरावट नहीं दिख रही थी, लेकिन इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि इसके कारण निवेश की दर में जितनी तेजी आ सकती थी, उतनी नहीं आई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था पर चिंता जाहिर की है। साल 2018 में अर्थव्यवस्था सुस्त रहने की वजह से विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक भारत अब सातवें पायदान पर पहुंच गया है। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक साल 2018 में भारत की अर्थव्यवस्था महज 3.01 फीसदी बढ़ी है। वहीं साल 2018 में ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था 6.81 फीसदी बढ़ी। जबकि साल 2018 में फ्रांस की अर्थव्यवस्था 7.33 फीसदी बढ़ी है। पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बनने पर मोदी सरकार ने इसका खूब प्रचार किया था और अगले पांच सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था को 50 खरब तक पहुंचाने की बात कही था। ऐसे में विश्व बैंक का ये ताजा आंकड़ा सरकार को परेशान कर सकता है।

Thursday, June 20, 2019

वन संपदा को बचाने के लिए नया फार्मुला

वन संपदा को बचाने के लिए नया फार्मुला

प्रेम पंचोली

उतराखण्ड हिमालय राज्य के लोग पूर्व से ही वनो को बचाने के लिए संवेदनशील रहे है। लोग प्राकृतिक संसाधनो को बचाने के तौर तरीके अपने अनुसार अख्तियार करते है। जिसका कोई प्रचार-प्रसार होता नहीं है, मगर असर दूरतलक होता है। यहां हम सरकारी स्तर पर हो रहे वन बचाने के प्रयासो का जिक्र करने जा रहे हैं। मौजूदा समय में राज्य सरकार अहतियात के तौर पर वन संरक्षण के आधुनिक संयत्रो का उपयोग करना चाहती है। जिसके लिए सरकार ने विधिवत कार्ययोजना भी पिछले ही वर्ष बना डाली थी। बताया गया कि ड्रोन कैमरे वन संरक्षण के लिए मुस्तैद रहेंगे। इधर राज्य में 11 नये फायर स्टेशन बनाने की कवायद अन्तिम वर्ष पूरी कर दी थी।

ज्ञात हो कि उतराखण्ड में हर वर्ष आग के कारण हजारो हेक्टेयर जंगल राख हो जाते है। इस वर्ष गर्मीयों में वनों को आग से नुकसान ना हो, इसके लिए इण्डियन इंस्टीट्यूट आॅफ रिमोंट सेंसिंग ने वन विभाग के लिए एक मोबाईल एप ‘‘फायर एप’’ नाम से तैयार किया था। पर इसका असर कितना हुआ जिसकी कोई जानकारी सर्वजनिक नहीं हो पाई है। आइआईएमएस के निदेशक डा॰ प्रकाश चैहान ने बताया कि यह मोबाईल एप जंगलो की रखवाली करने वाले वन विभाग के गार्ड को दिया जायेगा। आग लगने पर वह फोटो को एप में अपलोड करेगा। इस तरह से वनो की आग को ट्रेस किया जायेगा। कह सकते हैं कि जंगल के चप्पे-चप्पे की निगहबानी तकनीकी तौर पर होगी। ‘‘फायर एप’’ के बाद उत्तराखंड में देश की पहली फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स का गठन भी हुआ है। ड्रोन फोर्स से वन, वन्य जीवों की सुरक्षा, खनन की निगरानी आदि के लिए मदद ली जाएगी। इस तरह की पूर्व तैयारी वन विभाग और प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इतनी तकनीकी के बावजूद भी इस वर्ष वनाग्नी काबू नहीं किया गया। हालात यह हुए कि हजारो हेक्टेयर वन संपदा स्वा हो गई और तकनीकी संयन्त्र यू ही सो पीस बनकर पाये गये।

जल गये जंगल, बुझ गई आग

इस वर्ष भी उत्तराखंड में जंगलो की आग पर बहुत देरी में काबू पाया गया। इस साल जंगल में आग लगने की 1400 से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं। लगभग 2000 हेक्टेयर जंगल स्वाहा हो गए हैं। पिछले कई सालों से लगातार गर्मियों में उत्तराखंड के जंगलों में भयानक आग लग रही है और इसके लिए एक संगठित आपदा प्रबंधन तंत्र या प्रशासनिक योजना की कमी स्पष्ट रूप से दिख रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2011 से 2017 के बीच जंगलों में आग की घटनाओं में 2.5 गुना की बढ़त हुई और 2017 में जंगल में आग की 13,898 घटनायें की गई थी। जबकि बताया जा रहा है कि राज्य में इस वर्ष लगभग 35,888 घटनायें वनाग्नी की दर्ज की गई है। यही नहीं आग की दहशत से लोग कई बार घरों से बाहर निकल आए। जबकि आग की लपटें हाइटेंशन लाइनों तक को छूने लगी।

ज्ञात हो कि गढ़वाल मंडल में जंगलों में भड़की आग बेकाबू हो गई थी। वह तो इन्द्र देवता मेहरवान हो गये और जून के मध्य सप्ताह में बारिस कर दी। वैो अब तक गढवाल मंडल में आग की चपेट में आने से 1196.53 हेक्टेयर क्षेत्रफल में वन संपदा जलकर राख हो गई है। इसमें 54.55 हेक्टेयर प्लांटेशन वाला वन क्षेत्र भी शामिल है। इस प्रकार अब तक जंगलों में आग लगने की 680 घटनाएं हो चुकी है। वन विभाग ने भी स्वीकार किया कि गढ़वाल वृत्त के जंगलों में सबसे ज्यादा आग भड़की है। इसके अलावा भागीरथी वृत्त में 261.95 हेक्टेयर, यमुना वृत्त में 126.45 हेक्टेयर, शिवालिक वृत्त में 193.18 हेक्टेयर वन आग की चपेट में आए हैं। इससे विभाग को 14.27 लाख का नुकसान हुआ है।

फारेस्ट ड्रोन फोर्स का भी गठन हुआ था

उल्लेखनीय हो कि उतराखण्ड में 71 फीसदी भू-भाग पर वन भूमि है। यहां जंगलों की सुरक्षा का जिम्मा वन बीट अधिकारी, आरक्षी, वन दरोगा, निरीक्षक, डिप्टी रेंजर, रेंजर के कंधों पर होता है। दुर्गम और काफी बड़ा क्षेत्र होने से वनकर्मी का उपलब्ध होना संभव नहीं होता है। ऐसे में जंगलों में अवैध कटान, वन्य जीवों के शिकार, अवैध खनन की आशंका बढ़ जाती है। यही वजह है कि वन विभाग ने फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स के गठन की अग्रीम कार्रवाई कर डाली। और प्रमुख वन संरक्षक के निर्देशन में ड्रोन फोर्स का गठन भी किया गया है। अब वन, वन्यजीवों की सुरक्षा से लेकर अवैध खनन, अवैध वनों का दोहन, वनाग्नी आदि पर निगरानी का काम ड्रोन से होगा। ड्रोन फोर्स के वनकर्मियों को ड्रोन संचालन के लिए तकनीकी तौर पर प्रशिक्षित किया गया था। वर्तमान में वन विभाग के पास 11 ड्रोन कैमरे है।

2013 में पहली बार गौला नदी में खनन की निगरानी ड्रोन कैमरे से हुई थी। सकारात्मक परिणाम आने के बाद जंगलों में वन्य जीवों की निगरानी में भी इसका उपयोग किया गया। बता दें कि फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स के मुखिया प्रमुख वन संरक्षक जयराज को बनाया गया है। फोर्स में सेंटर फॉर ड्रोन एप्लीकेशन एंड रिसर्च के अमित सिन्हा, मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) सुरेंद्र मेहरा, वन संरक्षक पश्चिमी वृत्त डॉ. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक यमुना वृत्त प्रसन्न पात्रो, डीएफओ तराई पूर्वी नीतीश मणि त्रिपाठी शामिल हैं। ड्रोन कैमरे के लिए सिर्फ जिम कार्बेट नेशनल पार्क, मालसी चिड़ियाघर, राजाजी नेशनल पार्क, पश्चिमी वन वृत्त (तराई केंद्रीय, तराई पूर्वी, तराई पश्चिमी, हल्द्वानी और रामनगर वन प्रभाग) को परीक्षण के तौर पर लिया गया है।

गौरतलब हो कि प्रयोग के तौर पर यूसैक ने राज्य में साल 2018 में कार्यशालाऐं आरम्भ की है। ताकि तकनीकी का बेजा इस्तेमाल हो सके। यह पहली कार्यशाला सीमान्त जनपद उतरकाशी में पिछले साल उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) की ओर से जल संसाधन प्रबंधन में रिमोट सेसिंग व जीआईएस के अनुप्रयोग विषय पर आयोजित की गई थी, जिसमें वन विभाग सहित अन्य विभागों के कार्यालयअध्यक्षो ने हिस्सा लिया था। यहां विशेषज्ञों ने उपग्रह तकनीक का प्रयोग पर्यावरण संरक्षण के लिए करने पर जोर दिया। यूसैक के निदेशक एमपीएस बिष्ट ने बताया कि मानव विकास व पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उपग्रह तकनीक से मिली जानकारियां बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसके तहत यूसैक भी इस तकनीक के प्रयोग से प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, विकास कार्यों व पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी, टेली मेडिसिन आदि कार्य कर रहा है।
चूंकि इसके अतिरिक्त विभाग ने 31 हजार स्कूलों का डाटाबेस, सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए स्पीड कंट्रोलर, मोबाइल एप, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए टूरिज्म मैप आदि भी तैयार किए हैं। इस पर पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट ने खुशी जाहीर की कि हिमालय एक युवा पर्वत श्रृृंखला है, जिसकी लगातार निगरानी करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ने कई गहन जानकारियों के साथ देशभर के जिलाधिकारियों को नक्शे मुहैया कराए थे। उन्होंने समस्या से निपटने के लिए पर्वतीय राज्यों को ग्रीन बोनस आदि माध्यम से अतिरिक्त बजट देने पर भी जोर दिया। बता दें कि 18 सालो में वन विभाग ने मात्र 11ड्रोन कैमरे ही खरीद पाये। जबकि राज्य को सर्वाधिक राजस्व यहीं के वनो से प्राप्त होता है। इधर लोगो को मानना है कि ड्रोन कैमरे के साथ-साथ गलत दोहन वाली जगह पर पंहुचने के लिए अत्याधुनिक यातायात सुविधा भी चाहिए। ताकि समय रहते गलत विदोहन से प्राकृतिक संसाधनो की रक्षा हो सके।
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हिमालय के विकास एवं पर्यावरण सन्तुलन के लिए अंतरिक्ष आधारित सूचना तकनीकी का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके लिए राज्य में कार्य कर रहे सभी राष्ट्रीय और राजकीय संस्थानो को आपस में अधिक साझे प्रयास करने होंगे।
(- त्रिवेन्द्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड)
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उत्तराखंड में देश की पहली फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स बनाई गई है। ड्रोन के उड़ान के लिए डीजीसी ने नियम बनाए हैं उन नियमों को पूरा करने संबंधित सभी औपचारिकताओं को पूरा किया जा रहा है। ड्रोन फोर्स के गठन से शिकार, अवैध खनन समेत अन्य गैर कानूनी गतिविधियों को रोकने में मदद मिलेगी।
(-डॉ. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक, कोआर्डिनेटर फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स)
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Saturday, June 8, 2019

स्वस्थ परम्परा: धूम्रपान और धूम्रपान करने वालों से रहें दूर रहें


स्वस्थ परम्परा: धूम्रपान और धूम्रपान करने वालों से रहें दूर रहें


प्रेम पंचोली 

इस साल विश्व तंबाकू निषेध दिवस (डब्ल्यूएनटीडी) का विषेष कार्यक्रम तंबाकू और फेफड़ों के स्वास्थ्य पर है। हर साल, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएच) और वैश्विक भागीदार 31 मई को डब्ल्यूएनटीडी का निरीक्षण करते हैं और लोगों को तंबाकू के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करते हैं। इस दौरान लोगों को किसी भी तरह के तम्बाकू का उपयोग करने से हतोत्साहित किया जाता है।

बताया गया कि डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इस वर्ष यह अभियान तंबाकू से फेफड़े पर कैंसर से लेकर श्वसन संबंधी बीमारियों (सीओपीडी) के प्रभाव पर केंद्रित होगा। लोगों को फेफड़ों के कैंसर के बारे में जानकारी दी जायेगी कि इसके मुख्य कारण भी तंबाकू और धूम्रपान ही है। जानकारो ने बताया कि विष्वभर में तम्बाकू और धूम्रपान के कारण कैंसर के रोगिया की संख्या बढ रही है जिससे हर साल दो-तिहाई मौतें हो रही हैं। यहां तक कि दूसरो द्वारा धूम्रपान करने से पैदा हुए धुएं के संपर्क में आने से भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। सुझाया जा रहा है कि धूम्रपान छोड़ने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा कम हो सकता है, तथा धूम्रपान छोड़ने के 10 वर्षों के बाद, धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के फेफड़ों के कैंसर का खतरा लगभग आधा हो जाता है।
चिकित्सको का कहना है कि फेफड़ों के कैंसर के अलावा, तम्बाकू धूम्रपान भी क्रोनिक प्रतिरोधी फुफ्फुसीय रोग (सीओपीडी) का कारण बनता है। इस बीमारी में फेफड़ों में मवाद से भरे बलगम बनाता है जिससे दर्दनाक खांसी होती है और सांस लेने में काफी कठिनाई होती है। इसी तरह, छोटे बच्चे जो घर पर एसएचएस के संपर्क में आते हैं, उन्हें अस्थमा, निमोनिया और ब्रोंकाइटिस, कान में संक्रमण, खांसी और जुकाम के बार-बार होने वाले संक्रमण और लगातार श्वसन प्रक्रिया में निम्न स्तर का संक्रमण जैसी श्वसन संबंधी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुरसार विश्व स्तर पर, अनुमानित 1.65 लाख बच्चे 5 वर्ष की आयु से पहले दूसरों द्वारा धूम्रपान से पैदा हुए धुएं के कारण श्वसन संक्रमण के कारण मर जाते हैं। ऐसे बच्चे जो वयस्क हो जाते हैं, वे हमेशा इस तरह की समस्याओं से पीड़ित ही रहते हैं और इनमें सीओपीडी विकसित होने का खतरा बना रहता है।

डब्ल्यूएनटीडी के मौके पर वायॅस आॅफ टोबेको विक्टिमस (वीओटीवी) के स्टेट पैट्रेन डा. टी.पी.शाहू ने कहा कि गर्भवती महिला द्वारा धूम्रपान या एसएचएस के संपर्क में आने से भू्रण में फेफड़ों की वृद्धि कम हो सकती है और इसका असर भू्रण की गतिविधियों पर हो सकता है। गर्भपात हो सकता है, समय से पहले बच्चे का जन्म हो सकता है। यहां तक कि अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम भी पैदा हो सकता है। तम्बाकू, किसी भी रूप में धूम्रपान या धुआं रहित, बहुत खतरनाक है। उन्होंने ताया कि मृत्यु या विकलांगता के अलावा इसका कोई उपयोग नहीं है।
ज्ञात हो कि अगर यह समाज में धूम्रपान तम्बाकू की लत यूं ही बढती रहेगी तो आने वाले वर्ष 2025 तक देश में यह आम बीमारी हो जायेगी। ग्लोबल टीबी रिपोर्ट- 2017 के अनुसार, भारत में टीबी की अनुमानित मामले दुनिया के टीबी मामलों के लगभग एक चैथाई लगभग 28 लाख दर्ज की गई थी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी फेफड़े को नुकसान पहुंचाता है और फेफड़ों की कार्यक्षमता को कम करता है और ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति धूम्रपान करता है तो यह आगे चलकर उसकी स्थिति को और खराब करेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि तंबाकू का धुआं इनडोर प्रदूषण का बहुत खतरनाक रूप है, क्योंकि इसमें 7000 से अधिक रसायन होते हैं, जिनमें से 69 कैंसर का कारण बनते हैं। तंबाकू का धुआं पांच घंटे तक हवा में रहता है, जो फेफड़ों के कैंसर, सीओपीडी और फेफड़ों के संक्रमण को कम करता है। संबंध हेल्थ फाउंडेशन (एसएचएफ) के ट्रस्टी अरविंद माथुर का कहना है कि ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे 2017 के अनुसार, भारत में सभी वयस्कों में 10.7 प्रतिषत (99.5 मिलियन) वर्तमान में धूम्रपान करते हैं। इनमें  19 प्रतिषत पुरुष और 2 प्रतिषत महिला शामिल हैं। भारत में 38.7 प्रतिषत वयस्क घर पर सेकेंड हैंड स्मोक (एसएचएस) और 30.2 प्रतिषत वयस्क कार्यस्थल पर एसएचएस के संपर्क में आते हैं। सरकारी भवनों, कार्यालयों में 5.3 प्रतिषत स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में 5.6 प्रतिषत रेस्तरों में 7.4 प्रतिषत और सार्वजनिक परिवहन में 13.3 प्रतिषत लोग सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क में आते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक तम्बाकू में फेफड़ों के कैंसर का कारण बनने वाले रयायनों में आर्सेनिक (चूहे के जहर में पाया जाता है), बेंजीन (कच्चे तेल का एक घटक जो अक्सर अन्य रसायनों को बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है), क्रोमियम, निकल, विनाइल क्लोराइड (प्लास्टिक और सिगरेट फिल्टर में पाया जाता है), पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन, एन-नाइट्रोसेमाइंस, सुगंधित एमाइन, फॉर्मलाडेहाइड (इमल्मिंग द्रव में पाया जाता है), एसिटालडिहाइड और पोलोनियम-210 (एक रेडियोधर्मी भारी धातु) शामिल हैं। ऐसे कई कारक हैं जो तम्बाकू की कार्सिनोजेनेसिस को बढ़ा या घटा सकते हैं। अलबत्ता विभिन्न प्रकार के तंबाकू के पत्ते, फिल्टर और रासायनिक मिश्रण की उपस्थिति या अनुपस्थिति कैंसर होने के कारक हो सकते हैं। इस तरह के कारक तंबाकू के विशिष्ट रसायन नहीं हो सकते, बल्कि सिगरेट में मौजूद रासायनिक मिश्रण है।

ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (जीएटीएस) 2017 के अनुसार भारत में 28.6 प्रतिषत (266.8 मिलियन) लोग जो 15 वर्ष से अधिक आयु के वयस्क है धूम्रपान से ग्रसित है। इन वयस्कों में 24.9 प्रतिषत (232.4 मिलियन) दैनिक तंबाकू उपयोगकर्ता हैं, और 3.7 प्रतिषत (34.4 मिलियन) कभी कभार के उपयोगकर्ता हैं। यानि देषभर में हर दसवां वयस्क (10.7 प्रतिषत यानि 99.5 मिलियन) वर्तमान में तंबाकू का सेवन करते है। ताज्जुब हो कि धूम्रपान की व्यापकता ग्रामीण क्षेत्रों में 11.9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 8.3 प्रतिशत पायी गई है। इस तरह कहा जाता है कि 20-34 आयु वर्ग के 12.2 प्रतिषत वयस्क धूम्रपान करते पाये जाते है।

उतराखंड एक नजर

उतराखंड राज्य में वर्तमान में 18.1 प्रतिषत लोग धूम्रपान के रुप में तंबाकू का सेवन करते है, जिसमें 29.8 प्रतिषत पुरुष, 6.3 प्रतिषत महिलांए शामिल है। यंहा पर 12.4 प्रतिषत लेाग चबाने वाले तंबाकू उत्पादों का प्रयोग करते है, जिसमें 21.2 प्रतिषत पुरुष 3.4 प्रतिषत महिलाए है। ऐसी भी जानकारी है कि उतराखंड में 62.2 प्रतिषत लोग घरों में सेकेंड हैंड स्मोक के षिकार हेाते है, जिसमें 59 प्रतिषत पुरुष, 65.4 प्रतिषत महिलांए हैं। इसी प्रकार कार्यस्थल पर 24.5 प्रतिषत लोग, जिसमें 26.5 प्रतिषत पुरुष, 9.9 प्रतिषत महिलाएं शामिल है।

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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें
असिमा सरिन 91-8860786604


समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...