30 मई 1930 तिलाड़ी नरसंहार की 93वीं वर्षगांठ : जब राजा के दिवान ने निहत्थे लोगो पर बरसाई गोलियां
PREM PANCHOLI || Dehradun
उत्तराखण्ड राज्य के इतिहास में तिलाड़ी का गोली काण्ड आज भी यमुना घाटी के लोगो के जेहन में आग उगल देता है। यही वह जगह है जहां तत्काल टिहरी नरेश के राज्यकाल में उनके प्रशासको ने लोगो को इसलिए गोली से भून डाला था कि रंवाई क्षेत्र यानि की यमुनाघाटी के लोग अपने हक-हकूको की बहाली के लिए लामबंद थे। कसूर सिर्फ इतनाभर था कि लोग बिना राज्याज्ञा के महापंचायते आयोजित कर रहे थे।
ज्ञात हो कि आजादी के आन्दोलन में भी 30 मई 1930 के बाद ही पहाड़ के लोगो ने शिरकत की है। वनाधिकारो की बहाली के लिए आन्दोलित यमुनाघाटी के लोगो को राजशाही के प्रसाशको ने तिलाड़ी स्थित में गोलियों से भून डाला था। तिलाड़ी का यह गोली काण्ड पंजाब के जलियावाला बाग हत्या काण्ड के जैसा था। तत्काल तिलाड़ी गोली काण्ड राजशाही के खिलाप एक सबसे बड़ी जंग बनकर सामने आयी, जिसका सबसे बड़ा प्रतिविम्ब श्रीदेव सुमन भी रहे है।
गौरतलब हो कि तत्कालीन टिहरी रियासत के महाराजा नरेन्द्र शाह ने अपनी रियासत की आय बढाने बावत आम लोगो पर घराट, चरान-चुंगान तथा भूमि व कृषि ऊपज आदि पर नये कर व करो पर वृद्धि हेतु नया भूमि बन्दोबस्त को करवाया। किन्तु इन करो पर आशानुकूल वृद्धि नहीं हुई तो राज शासन ने वनो का पुर्नप्रबन्धन और बन्दोबस्त करवाया। इसके निमीत टिहरी रियासत की राज व्यवस्था ने वन उपज को बेचकर अपनी आय में वृद्धि के द्वार खोले और रियासत के वनाधिकारी पदम दत्त रतूड़ी ने नये वन बन्दोबस्त की कमान सम्भाली। जिसका कार्य उन्होंने रंवाई-जौनपुर यानिकी यमुनाघाटी से आरम्भ किया था। इस नये वन प्रबन्धन में संरक्षित वनो की सीमा बढाई गयी और सामान्य ग्रामीणों के हक-हकूको जैसे चरान-चुंगान, घास, लकड़ी, कृर्षि औजारो में काम आने वाली लकड़ी पर प्रतिबन्ध लगवा दिया गया था। इसके अलावा चरागाहो पर भी ग्रामीणो के अधिकार समाप्त किये गये। यदि ग्रामीणजन वन ऊपज को उपयोग में लाते भी थे तो उन्हें इसके एवज में मोटी रकम चुकानी पड़ती थी जो एक आम नागरिक के बस से बाहर थी।
जनता की दिक्कते दिनों-दिन बढती गयी। लोगो ने अपने हक-हकूकों की बहाली के लिए राजा को कई दौर में ज्ञापन दिये परन्तु राजा ने कभी भी यमुनाघाटी की इन समस्याओं पर गौर नहीं किया। अन्ततः सम्पूर्ण यमुनाघाटी के लोगो में राजा के इस नयें वन बन्दोबस्त पर आक्रोश बढता ही गया। अतः सन् 1928 तक गांव-गांव में संघर्ष समितियों और आजाद पंचायतों का गठन हो गया। इनके मार्फत भी राजा को ज्ञापनो के माध्यम से अवगत कराया गया कि लोगो के हक-हकूको की बहाली की जाये। इस तरह की अहवेलना पर लोग आन्दोलित हो गये। आजाद पंचायत की बैठको का सिलसिला राजगढी, राजतर, तिलाड़ी व चकराता क्षेत्र की चांदा डोखरी में जारी रहा। सामन्तशाही को झकझोरने के लिए घेरा सिंह, दयाराम, बैजराम, रामप्रसाद आदि लोगो के पदाधिकारी रहने पर एक समानान्तर सरकार का गठन किया गया। इस समानान्तर सरकार ने तत्कालीन टिहरी रियासत के उच्च पदाधिकारी डिप्टी कलेक्टर सुरेन्द्रद दत्त नौटियाल, डीएफओ पदतद दत्त रतूड़ी को हिरासत में लेने का फैसला किया।
19-20 मई को एक तरफ समानान्तर सरकार की बैठक राजतर में हो रही थी तो दूसरी तरफ डीएफओ रतूड़ी ने ग्रामीणों को एक षडयन्त्र के तहत बड़कोट में बुलवा लिया और उन्हे गिरफ्तार करके टिहरी जेल ले जाने लगे। रास्ते में डिप्टी कलेक्ठर नौटियाल, डीएफओ रतूड़ी को गिरफ्तार हुए लोगो ने पकड़ लिया। इस छिना-झपटी में गोली चलने से ग्रामीण अजीत सिंह, झुण्या सिंह की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गयी। डिप्टी कलेक्टर के पैर में भी गोली लगी। घायल अवस्था में दोनो अधिकारी नरेन्द्र नगर पंहुचे। जब रियासत के दिवान चक्रधर जुयाल को पदमदŸा रतूड़ी ने बताया कि रवांई क्षेत्र अर्थात यमुनाघाटी में बगावत हो गयी है। इस पर तुरन्त ही चक्रधर जुयाल रंवाई की तरफ कूच कर गये।
अपनी कूटनीतिक चालो से राजा के दिवान चक्रधर जुयाल ने आन्दोलनकारियो को राजगढी में वार्ता के लिए बुलाया और कहा कि 30 मई 1930 को समस्त ग्रामीण तिलाड़ी में एकत्रित हो जाये क्योंकि समाधान के लिए कोई कदम उठाये जायेंगे। चक्रधर जुयाल ने एक तरफ लोगो को तिलाड़ी में एकत्रित किया और दूसरी तरफ शाही सेना को तिलाड़ी के आस-पास के जंगलो में छुपा दिया। जैसे ही पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार लोग तिलाड़ी में एकत्रित हुए वैसे ही शाही सैनिको ने चारो तरफ से गोलियां बरसानी आरम्भ कर दी। निहत्थे लोगो को अपनी जान बचाने की कोई सुध-बुध नहीं रही। शाही सैनिको के इन ताबड़तोड़ गालियों से 17 लोग सभा स्थल पर ही शहीद हो गये। जबकि कइयो ने अपनी सुरक्षा बावत यमुना नदी में छलांग लगायी जो नदी के बहाव में बह गये। घायलो को टिहरी जेल ले जाया गया। लगभग 15 लोग टिहरी जेल में शहीद हो गये। कुछ लोग यमुना नदी में समायें। इस तरह सैकड़ो लोग सामन्तशाही के इस घृणित गोली काण्ड में शहीद हुए है। तिलाड़ी स्थल पर ही नहीं बल्कि यमुना नदी के उस पार सुनाल्डी गांव के पुराने मकानो पर आज भी गोलियो के निशान मौजूद हैं जो उस घृणित गोली काण्ड के मूकसाक्षी हैं।
तत्कालीन टिहरी रियरसत ने 30 मई 1930 को रंवाई अर्थात यमुनाघाटी की निहत्थी जनता पर बिना पूर्व चेतावनी के गोली चलाकर एक घृणित गोली काण्ड के इतिहास की रचना की है। आज भी इस घृणित गोली काण्ड में शहीद हुए लोगो के नाम तिलाड़ी स्थल पर स्थापित ‘‘लाट’’ पर अंकित है।
तिलाड़ी काण्ड के बाद लोगो की शहदात रंग लाई और जनता सामन्तशाही के खिलाफ सड़को पर आ गयी। अन्ततः 1949 में सामन्तशाही शासन को उखाड़ने में जनता को कामयाबी हासिल हुई। यह जनाआन्दोलन पर्वतीय क्षेत्र का युगान्तकारी आन्दोलन था। स्वतन्त्रता प्राप्ती के पश्चात सन् 1952 से प्रतिवर्ष तिलाड़ी में शहीदो के नाम पर जनता तथा स्थानीय प्रशासन ‘‘शहीद मेंले’’ का आयोजन करती है। प्रो॰ आर.एस. असवाल और पत्रकार सुनिल थपलियाल के नेतृत्व में सन् 2006 से तिलाड़ी के नाम पर ‘‘तिलाड़ी स्मारक सम्मान समिति’’ का गठन किया गया है। जो प्रतिवर्ष क्षेत्र के उत्कृष्ठ, संघर्षशील, व्यक्तित्वों को ‘‘तिलाड़ी सम्मान’’ से सम्मानीत करती है। इस दौरान यमुनाघाटी के लोग यहां पर किसी जैनून मुद्दे पर एक प्रस्ताव भी पारित करतें हैं। पिछले वर्ष पृथक जनपद के लिए लोगो ने प्रस्ताव पारित किया था।


No comments:
Post a Comment