हास्यस्पद: पुलिस घेराबन्दी में पुनर्वास की जनसुनवाई
- पहले यह जनसुनवाई 25 अक्टूबर 2018को आयोजित की गई थी किंतु चुनाव के चलते रद्द की गई और 28 नवंबर को पुनः हुई जो जनविरोध की भेंट चढी।- क्षेत्र के युवाओं ने कहा कि सतलुज जल विद्युत निगम ने वर्ष 2012-13 में उन्हें इलेक्ट्रीशियन का प्रशिक्षण तो दिया, लेकिन अभी तक रोजगार नहीं दिया।
प्रेम पंचोली
उत्तराखंड के सीमान्त जनपद उतरकाशी का मोरी ब्लाॅक, खड़े पहाड़ और जंगलो के मध्य 100 और इससे कुछ अधिक परिवारो वाले गांव, शान्त वातावरण, प्राकृतिक सुन्दरता ऐसी कि कोई भी यहां से कहीं और क्यों जाये। अचानक इस ब्लाॅक मुख्यालय में सायरन की ददनती आवाज, बैरकटिंग, पुलिस का पैरा बगैरह लोगो को एक बारगी चैंका गया। बात सिर्फ इतनी है कि यहां सुपिन नदी पर 44 मेगावाट की ‘‘जखोल सांकरी’’ नाम की जलविद्युत परियोजना बननी है। इसलिए जनसुनवाई होनी थी। सो दो बार पूरी नहीं हो पाई। इसलिए कि लोग मान रहे हैं कि जब परियोजना बनने से पूर्व ऐसा माहौल बनाया जा रहा है तो परियोजना बनने के बाद लोग खतरे में है।बता दें कि पहले भी और अभी 28 नवम्बर 2018 को जनसुनवाई आयोजित हुई थी। स्थानीय प्रशासन ने ऐसा प्रचार किया कि इस बांध परियोजना में जिनकी जमीन जा रही है उनको ही इस जनसुनवाई में आना है। फिर भी उसमें जो चुनिंदा लोग भारी पुलिस नाकेबन्दी के बावजूद पंहुच पाये उनकी मांग है कि पाव, तल्ला, मल्ला, सुनकुंडी, धारा व जखोल जो इस योजना से पूर्ण प्रभावित हो रहे हैं उनका व्यवस्थित व पूर्ण पुनर्वास किया जाये। इसके अलावा ग्रामीणों को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंध योजना व सामाजिक समाघात आकलन रिपोर्ट हिंदी में उपलब्ध करवाई जाये। क्षेत्र के जानकार लोगो का कहना है िकइस बांध परियोजना में भू अर्जन पुनर्वास और पुनः व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 का उल्लंघन किया जा रहा है। जबकि स्थानीय जागरूक लोगो ने और दिल्ली के विमल भाई आदि ने इससे सबंधित शिकायत इससे पूर्व में पर्यावरण मंत्रालय, जिलाधिकारी उत्तरकाशी व मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर शिकायत दर्ज की थी। फिर भी जनआकांक्षाओं को दरकिनार करके पुनर्वास संबंधी जनसुनवाई किसी तरह पूरी कर ली है।
जन सुनवाई के दौरान भी पाव तल्ला, मल्ला, सुनकुंडी, धारा व जखोल आदि के प्रभावितों ने पत्र प्रस्तुत करके अपनी मांग दर्ज करवाई। पिछले 12 जून को इसी परियोजना की जनसुनवाई में हजारो लोग एकत्रित हुए थे। सो प्रशासन को जनसुनवाई स्थगित करनी पड़ी। इस दौरान की जनसुनवाई में प्रशासन को कड़े तेवर दिखाने पड़े जिसमें सूचीबद्ध लोग सम्मलित हो पाये। लोगो का आरोप है कि यह कोई जनसुनवाई थी ही नहीं। क्योंकि यहां जन तो थे पर सिर्फ सूचीबद्ध ही उपस्थित थे। खैर इस दौरान चुनिंदा जनों के बीच स्थानीय प्रशासन ने जनसुनवाई के नाम पर कागजों की भरपाई तो कर ली। साथ ही यह जता दिया कि बांध का मतलब विकास है और जो लोग सरकारी योजनाओं में बाधा डालने वाले हैं वे विकास विरोधी है। अर्थात जो अपने अधिकारो की मांग कर रहे हैं वह इस विकासीय योजना में सम्मलित नहीं है।
स्थानीय लोगो का कहना है कि बांध जैसी योजना यहां जबरदस्ती, गैर जरूरी तरह से लोगों पर थोपी जा रही है। स्थानीय लोगो का आरोप है कि इस बांध के निर्माण में चुनिंदा लोगो का भारी मात्रा में आर्थिक लाभ होने वाला है और सर्वाधिक लोग इस परियोजना के कारण भूमिहीन व विस्थापन की कगार पर आने वाले हैं। प्रभावित व पर्यावरण इस बांध का विषय नहीं है क्योंकि इन सवालो का जबाव एवं समाधान योजनाकारो के पास नहीं है।
गौरतलब हो कि इस दौरान जखोल सांकरी जलविद्युत परियोजना पर जो जनसुनवाई हुई है उसमें अन्य गावों के लोग ना पंहुच पाये, इसलिए उत्तराखंड के मुख्य वन संरक्षक जयराज का क्षेत्र भ्रमण भी इन्ही दिनों रखा गया। फिर भी लोगो ने मुख्य वन संरक्षक जयराज से जानना चाहा कि वन विभाग ग्रामिणो को एक पेड़ काटने की इजाजत तक नहीं देता और जखोल सांकरी जलविद्युत परियोजना में गोविन्द वन्य जीव पशु विहार के हजारो पेड़ काटे जायेंगे। निरूत्तर मुख्य वन संरक्षक के सामने लोगो ने कहा कि बांध के लिए वन अनापत्ति धोखे से ली गई है इसलिए उसे निरस्त कर दिजिए। लोगो ने उन्हे बताया कि बंदूक और संगीनों से पहाड़ खोदकर बनाए जा रहे इस छोटे से बांध के लिए पूरी सरकार चुनिंदा लोगो के दबाव में है। बांध कंपनी को हर तरह का संरक्षण है। लोग संरक्षित गोविंद पशु वन्य जीव विहार में असुरक्षित बंदूकों के साए में कैद कर दिए गए।
इधर इस जनसुनवाई के दौरान प्रशासन ने प्रभावितों के हकहकूक यथावत रखने और परियोजना बनने पर उन्हें रोजगार देने की बात कही। प्रभावितों ने प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने, भूमि का उचित मुआवजा देने और पुनर्वास की मांग की। क्षेत्र के युवाओं ने कहा कि सतलुज जल विद्युत निगम ने वर्ष 2012-13 में उन्हें इलेक्ट्रीशियन का प्रशिक्षण तो दिया, लेकिन अभी तक रोजगार नहीं दिया। डीएम डा.आशीष चैहान ने कहा कि प्रभावितों के साथ नाइंसाफी नहीं होने दी जाएगी और उनकी शंकाओं का समाधान किया जाएगा। क्षेत्र के गुलाब रावत, रामवीर राणा, राजपाल रावत, रणदेव पंवार, केशर सिंह, कृपाल सिंह, प्रह्लाद सिंह आदि ग्रामीणों ने डीएम को ज्ञापन सौंपकर परियोजना की जनसुनवाई संबंधी दस्तावेज हिंदी भाषा में उपलब्ध कराने और प्रभावित गांवों में ही जनसुनवाई बैठक करने की मांग की।
कैसे हुई जनसुनवाई
इधर प्रशासन व सतलुज जल विद्युत निगम कंपनी जब पर्यावरणीय जनसुनवाई कराने में सफल नहीं हुई तो उन्होंने सामाजिक समाधान हेतु आकलन रिपोर्ट पर होने वाली जनसुनवाई का मोरी ब्लॉक में एक केंद्रित आयोजन किया ताकि वे यह दिखा सके की बांध का काम चालू है। जबकि सामाजिक समाघात आकलन प्रक्रिया में आवश्यक है कि ग्रामीण स्तर की समितियां बने। बताया जा रहा है कि यहां यह प्रक्रिया कागजो चस्पा है। बताया जा रहा है कि गांव की अशिक्षित महिला प्रधानों को बिना रिपोर्ट पढ़ाये व बिना कोई प्रक्रिया समझाए, कागजों पर हस्ताक्षर लेकर निर्माण कम्पनी ने अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल कर लिए।यहां हालात को देखें कि परियोजना स्तर की जो विशेषज्ञ समिति बनाई गई उसमें टिहरी बांध परियोजना के बड़े अधिकारियों को शामिल किया गया। इन अफसरानो की कार्यकुशलता है कि उन्होंने अब तक टिहरी बांध परियोजना से प्रभावित 415 परिवारो का पुनर्वास तक नहीं कर पाया। इसके अलावा मौजूदा समय में जखोल सांकरी जलविद्युत परियोजना बावत पुनर्वास के लिए बनाई गई ग्रामीणो की समिति ने आज तक इस योजना की सामाजिक समाघात आकलन रिपोर्ट नहीं पढी। दिलचस्प यह है कि जनसुनवाई प्रभावित गांवों से 40 किलोमीटर दूर मोरी ब्लॉक में रखी गई। यही नहीं जनसुनवाई स्थल के एक किलोमीटर आगे पीछे पुलिस पैरा बैठा दिया गया। प्रभावितो की सरकारी स्तर पर एक सूची के अनुसार लोगो को इस जनसुनवाई में अन्दर जाने के पहचान पत्र बनाये गये। इसके अलावा यदि कोई आवश्यक रूप से जीप या कार सड़क से गुजर रही थी तो उसमें एक पुलिस कर्मी को बिठाया गया। ताकि अन्य कोई इस जलसुनवाई में ना जा पाये।
जखोल-सांकरी जलविद्युत परियोजना
मोरी ब्लाॅक में स्वीकृत जल विद्युत निगम की 44 मेगावाट की जखोल-सांकरी जल विद्युत परियोजना की जनसुनवाई एक बार फिर जनविरोध की भेंट चढ़ गई। प्रशासन के बुलावे पर परियोजना प्रभावित बैठक में शामिल होने तो पहुंचे, लेकिन उन्होंने प्रभावित गांवों में ही जनसुनवाई कराने की मांग कहते हुए इस जनसुनवाई को नकार दिया।सुपिन नदी पर घुयांघाटी में 44 मेगावाट की जखोल-सांकरी जल विद्युत परियोजना का निर्माण किया जाना है। इस परियोजना में सुनकुंडी, पांव तल्ला, पांव मल्ला एवं धारा गांव के ग्रामीणों की भूमि अधिग्रहित की जानी है। सतलुज जल विद्युत निगम द्वारा इस परियोजना का निर्माण कराया जाना है। इसमें सुनकुंडी, पांव तल्ला, पांव मल्ला एवं धारा गांव के ग्रामीणों की 12.32 हेक्टेयर जमीन प्रभावित हो रही है। परियोजना के तहत धारा सुनकुंडी में 10 मीटर ऊंचा और 33 मीटर लंबा बैराज बनाया जाना है, जबकि धारा से पांव मल्ला तक 6.6 किमी लंबी हेड रेस टनल (सुरंग) और पांव मल्ला के पास पावर हाउस का निर्माण कराया जाना है। परियोजना निर्माण ग्रामीणों की सहमति पर टिका है और ग्रामीण अपने हकहकूक, रोजगार, समुचित मुआवजा और क्षेत्र पर पड़ने वाले पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभावों से संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं।





