Wednesday, January 30, 2019

हास्यस्पद: पुलिस घेराबन्दी में पुनर्वास की जनसुनवाई

हास्यस्पद: पुलिस घेराबन्दी में पुनर्वास की जनसुनवाई

- पहले यह जनसुनवाई 25 अक्टूबर 2018को आयोजित की गई थी किंतु चुनाव के चलते रद्द की गई और 28 नवंबर को पुनः हुई जो जनविरोध की भेंट चढी।- क्षेत्र के युवाओं ने कहा कि सतलुज जल विद्युत निगम ने वर्ष 2012-13 में उन्हें इलेक्ट्रीशियन का प्रशिक्षण तो दिया, लेकिन अभी तक रोजगार नहीं दिया।

प्रेम पंचोली

उत्तराखंड के सीमान्त जनपद उतरकाशी का मोरी ब्लाॅक, खड़े पहाड़ और जंगलो के मध्य 100 और इससे कुछ अधिक परिवारो वाले गांव, शान्त वातावरण, प्राकृतिक सुन्दरता ऐसी कि कोई भी यहां से कहीं और क्यों जाये। अचानक इस ब्लाॅक मुख्यालय में सायरन की ददनती आवाज, बैरकटिंग, पुलिस का पैरा बगैरह लोगो को एक बारगी चैंका गया। बात सिर्फ इतनी है कि यहां सुपिन नदी पर 44 मेगावाट की ‘‘जखोल सांकरी’’ नाम की जलविद्युत परियोजना बननी है। इसलिए जनसुनवाई होनी थी। सो दो बार पूरी नहीं हो पाई। इसलिए कि लोग मान रहे हैं कि जब परियोजना बनने से पूर्व ऐसा माहौल बनाया जा रहा है तो परियोजना बनने के बाद लोग खतरे में है।

बता दें कि पहले भी और अभी 28 नवम्बर 2018 को जनसुनवाई आयोजित हुई थी। स्थानीय प्रशासन ने ऐसा प्रचार किया कि इस बांध परियोजना में जिनकी जमीन जा रही है उनको ही इस जनसुनवाई में आना है। फिर भी उसमें जो चुनिंदा लोग भारी पुलिस नाकेबन्दी के बावजूद पंहुच पाये उनकी मांग है कि पाव, तल्ला, मल्ला, सुनकुंडी, धारा व जखोल जो इस योजना से पूर्ण प्रभावित हो रहे हैं उनका व्यवस्थित व पूर्ण पुनर्वास किया जाये। इसके अलावा ग्रामीणों को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंध योजना व सामाजिक समाघात आकलन रिपोर्ट हिंदी में उपलब्ध करवाई जाये। क्षेत्र के जानकार लोगो का कहना है  िकइस बांध परियोजना में भू अर्जन पुनर्वास और पुनः व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 का उल्लंघन किया जा रहा है। जबकि स्थानीय जागरूक लोगो ने और दिल्ली के विमल भाई आदि ने इससे सबंधित शिकायत इससे पूर्व में पर्यावरण मंत्रालय, जिलाधिकारी उत्तरकाशी व मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर शिकायत दर्ज की थी। फिर भी जनआकांक्षाओं को दरकिनार करके पुनर्वास संबंधी जनसुनवाई किसी तरह पूरी कर ली है।

जन सुनवाई के दौरान भी पाव तल्ला, मल्ला, सुनकुंडी, धारा व जखोल आदि के प्रभावितों ने पत्र प्रस्तुत करके अपनी मांग दर्ज करवाई। पिछले 12 जून को इसी परियोजना की जनसुनवाई में हजारो लोग एकत्रित हुए थे। सो प्रशासन को जनसुनवाई स्थगित करनी पड़ी। इस दौरान की जनसुनवाई में प्रशासन को कड़े तेवर दिखाने पड़े जिसमें सूचीबद्ध लोग सम्मलित हो पाये। लोगो का आरोप है कि यह कोई जनसुनवाई थी ही नहीं। क्योंकि यहां जन तो थे पर सिर्फ सूचीबद्ध ही उपस्थित थे। खैर इस दौरान चुनिंदा जनों के बीच स्थानीय प्रशासन ने जनसुनवाई के नाम पर कागजों की भरपाई तो कर ली। साथ ही यह जता दिया कि बांध का मतलब विकास है और जो लोग सरकारी योजनाओं में बाधा डालने वाले हैं वे विकास विरोधी है। अर्थात जो अपने अधिकारो की मांग कर रहे हैं वह इस विकासीय योजना में सम्मलित नहीं है।

स्थानीय लोगो का कहना है कि बांध जैसी योजना यहां जबरदस्ती, गैर जरूरी तरह से लोगों पर थोपी जा रही है। स्थानीय लोगो का आरोप है कि इस बांध के निर्माण में चुनिंदा लोगो का भारी मात्रा में आर्थिक लाभ होने वाला है और सर्वाधिक लोग इस परियोजना के कारण भूमिहीन व विस्थापन की कगार पर आने वाले हैं। प्रभावित व पर्यावरण इस बांध का विषय नहीं है क्योंकि इन सवालो का जबाव एवं समाधान योजनाकारो के पास नहीं है।
गौरतलब हो कि इस दौरान जखोल सांकरी जलविद्युत परियोजना पर जो जनसुनवाई हुई है उसमें अन्य गावों के लोग ना पंहुच पाये, इसलिए उत्तराखंड के मुख्य वन संरक्षक जयराज का क्षेत्र भ्रमण भी इन्ही दिनों रखा गया। फिर भी लोगो ने मुख्य वन संरक्षक जयराज से जानना चाहा कि वन विभाग ग्रामिणो को एक पेड़ काटने की इजाजत तक नहीं देता और जखोल सांकरी जलविद्युत परियोजना में गोविन्द वन्य जीव पशु विहार के हजारो पेड़ काटे जायेंगे। निरूत्तर मुख्य वन संरक्षक के सामने लोगो ने कहा कि बांध के लिए वन अनापत्ति धोखे से ली गई है इसलिए उसे निरस्त कर दिजिए। लोगो ने उन्हे बताया कि बंदूक और संगीनों से पहाड़ खोदकर बनाए जा रहे इस छोटे से बांध के लिए पूरी सरकार चुनिंदा लोगो के दबाव में है। बांध कंपनी को हर तरह का संरक्षण है। लोग संरक्षित गोविंद पशु वन्य जीव विहार में असुरक्षित बंदूकों के साए में कैद कर दिए गए।

इधर इस जनसुनवाई के दौरान प्रशासन ने प्रभावितों के हकहकूक यथावत रखने और परियोजना बनने पर उन्हें रोजगार देने की बात कही। प्रभावितों ने प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने, भूमि का उचित मुआवजा देने और पुनर्वास की मांग की। क्षेत्र के युवाओं ने कहा कि सतलुज जल विद्युत निगम ने वर्ष 2012-13 में उन्हें इलेक्ट्रीशियन का प्रशिक्षण तो दिया, लेकिन अभी तक रोजगार नहीं दिया। डीएम डा.आशीष चैहान ने कहा कि प्रभावितों के साथ नाइंसाफी नहीं होने दी जाएगी और उनकी शंकाओं का समाधान किया जाएगा। क्षेत्र के गुलाब रावत, रामवीर राणा, राजपाल रावत, रणदेव पंवार, केशर सिंह, कृपाल सिंह, प्रह्लाद सिंह आदि ग्रामीणों ने डीएम को ज्ञापन सौंपकर परियोजना की जनसुनवाई संबंधी दस्तावेज हिंदी भाषा में उपलब्ध कराने और प्रभावित गांवों में ही जनसुनवाई बैठक करने की मांग की।

कैसे हुई जनसुनवाई

इधर प्रशासन व सतलुज जल विद्युत निगम कंपनी जब पर्यावरणीय जनसुनवाई कराने में सफल नहीं हुई तो उन्होंने सामाजिक समाधान हेतु आकलन रिपोर्ट पर होने वाली जनसुनवाई का मोरी ब्लॉक में एक केंद्रित आयोजन किया ताकि वे यह दिखा सके की बांध का काम चालू है। जबकि सामाजिक समाघात आकलन प्रक्रिया में आवश्यक है कि ग्रामीण स्तर की समितियां बने। बताया जा रहा है कि यहां यह प्रक्रिया कागजो चस्पा है। बताया जा रहा है कि गांव की अशिक्षित महिला प्रधानों को बिना रिपोर्ट पढ़ाये व बिना कोई प्रक्रिया समझाए, कागजों पर हस्ताक्षर लेकर निर्माण कम्पनी ने अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल कर लिए।

यहां हालात को देखें कि परियोजना स्तर की जो विशेषज्ञ समिति बनाई गई उसमें टिहरी बांध परियोजना के बड़े अधिकारियों को शामिल किया गया। इन अफसरानो की कार्यकुशलता है कि उन्होंने अब तक टिहरी बांध परियोजना से प्रभावित 415 परिवारो का पुनर्वास तक नहीं कर पाया। इसके अलावा मौजूदा समय में जखोल सांकरी जलविद्युत परियोजना बावत पुनर्वास के लिए बनाई गई ग्रामीणो की समिति ने आज तक इस योजना की सामाजिक समाघात आकलन रिपोर्ट नहीं पढी। दिलचस्प यह है कि जनसुनवाई प्रभावित गांवों से 40 किलोमीटर दूर मोरी ब्लॉक में रखी गई। यही नहीं जनसुनवाई स्थल के एक किलोमीटर आगे पीछे पुलिस पैरा बैठा दिया गया। प्रभावितो की सरकारी स्तर पर एक सूची के अनुसार लोगो को इस जनसुनवाई में अन्दर जाने के पहचान पत्र बनाये गये। इसके अलावा यदि कोई आवश्यक रूप से जीप या कार सड़क से गुजर रही थी तो उसमें एक पुलिस कर्मी को बिठाया गया। ताकि अन्य कोई इस जलसुनवाई में ना जा पाये।

जखोल-सांकरी जलविद्युत परियोजना

मोरी ब्लाॅक में स्वीकृत जल विद्युत निगम की 44 मेगावाट की जखोल-सांकरी जल विद्युत परियोजना की जनसुनवाई एक बार फिर जनविरोध की भेंट चढ़ गई। प्रशासन के बुलावे पर परियोजना प्रभावित बैठक में शामिल होने तो पहुंचे, लेकिन उन्होंने प्रभावित गांवों में ही जनसुनवाई कराने की मांग कहते हुए इस जनसुनवाई को नकार दिया।

सुपिन नदी पर घुयांघाटी में 44 मेगावाट की जखोल-सांकरी जल विद्युत परियोजना का निर्माण किया जाना है। इस परियोजना में सुनकुंडी, पांव तल्ला, पांव मल्ला एवं धारा गांव के ग्रामीणों की भूमि अधिग्रहित की जानी है। सतलुज जल विद्युत निगम द्वारा इस परियोजना का निर्माण कराया जाना है। इसमें सुनकुंडी, पांव तल्ला, पांव मल्ला एवं धारा गांव के ग्रामीणों की 12.32 हेक्टेयर जमीन प्रभावित हो रही है। परियोजना के तहत धारा सुनकुंडी में 10 मीटर ऊंचा और 33 मीटर लंबा बैराज बनाया जाना है, जबकि धारा से पांव मल्ला तक 6.6 किमी लंबी हेड रेस टनल (सुरंग) और पांव मल्ला के पास पावर हाउस का निर्माण कराया जाना है। परियोजना निर्माण ग्रामीणों की सहमति पर टिका है और ग्रामीण अपने हकहकूक, रोजगार, समुचित मुआवजा और क्षेत्र पर पड़ने वाले पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभावों से संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं।



Sunday, January 27, 2019

वन संपदा को बचाने के लिए नया फार्मुला


वन संपदा को बचाने के लिए नया फार्मुला
प्रेम पंचोली

उतराखण्ड हिमालय राज्य के लोग पूर्व से ही वनो को बचाने के लिए संवेदनशील रहे है। लोग प्राकृतिक संसाधनो को बचाने के तौर तरीके अपने अनुसार अख्तियार करते है। जिसका कोई प्रचार-प्रसार होता नहीं है, मगर असर दूरतलक होता है। यहां हम सरकारी स्तर पर हो रहे वन बचाने के प्रयासो का जिक्र करने जा रहे हैं। मौजूदा समय में राज्य सरकार अहतियात के तौर पर वन संरक्षण के आधुनिक संयत्रो का उपयोग करना चाहती है। जिसके लिए सरकार ने विधिवत कार्ययोजना बना डाली। ड्रोन कैमरे वन संरक्षण के लिए मुस्तैद रहेंगे तो वहीं राज्य में 11 नये फायर स्टेशन बनाने की कवायद सरकार ने पूरी कर दी है।

ज्ञात हो कि उतराखण्ड में हर वर्ष आग के कारण हजारो हेक्टेयर जंगल राख हो जाते है। इस वर्ष गर्मीयों में वनों को आग से नुकसान ना हो, इसके लिए इण्डियन इंस्टीट्यूट आॅफ रिमोंट सेंसिंग ने वन विभाग के लिए एक मोबाईल एप ‘‘फायर एप’’ नाम से तैयार किया है। आइआईएमएस के निदेशक डा॰ प्रकाश चैहान ने बताया कि यह मोबाईल एप जंगलो की रखवाली करने वाले वन विभाग के गार्ड को दिया जायेगा। आग लगने पर वह फोटो को एप में अपलोड करेगा। इस तरह से वनो की आग को ट्रेस किया जायेगा। कह सकते हैं कि अब जंगल के  चप्पे-चप्पे की निगहबानी तकनीकी तौर पर भी होगी। ‘‘फायर एप’’ के बाद उत्तराखंड में देश की पहली फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स का गठन भी हुआ है। ड्रोन फोर्स से वन, वन्य जीवों की सुरक्षा, खनन की निगरानी आदि के लिए मदद ली जाएगी। इस तरह की पूर्व तैयारी वन विभाग और प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।


फारेस्ट ड्रोन फोर्स का गठन
उल्लेखनीय हो कि उतराखण्ड में 71 फीसदी भू-भाग पर वन भूमि है। यहां जंगलों की सुरक्षा का जिम्मा वन बीट अधिकारी, आरक्षी, वन दरोगा, निरीक्षक, डिप्टी रेंजर, रेंजर के कंधों पर होता है। दुर्गम और काफी बड़ा क्षेत्र होने से वनकर्मी का उपलब्ध होना संभव नहीं होता है। ऐसे में जंगलों में अवैध कटान, वन्य जीवों के शिकार, अवैध खनन की आशंका बढ़ जाती है। यही वजह है कि वन विभाग ने फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स के गठन की अग्रीम कार्रवाई कर डाली। और प्रमुख वन संरक्षक के निर्देशन में ड्रोन फोर्स का गठन भी किया गया है। अब वन, वन्यजीवों की सुरक्षा से लेकर अवैध खनन, अवैध वनों का दोहन, वनाग्नी आदि पर निगरानी का काम ड्रोन से होगा। ड्रोन फोर्स के वनकर्मियों को ड्रोन संचालन के लिए तकनीकी तौर पर प्रशिक्षित किया जा रहा है। वर्तमान में वन विभाग के पास 11 ड्रोन कैमरे है।

2013 में पहली बार गौला नदी में खनन की निगरानी ड्रोन कैमरे से हुई थी। सकारात्मक परिणाम आने के बाद जंगलों में वन्य जीवों की निगरानी में भी इसका उपयोग किया गया। बता दें कि फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स के मुखिया प्रमुख वन संरक्षक जयराज को बनाया गया है। फोर्स में सेंटर फॉर ड्रोन एप्लीकेशन एंड रिसर्च के अमित सिन्हा, मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) सुरेंद्र मेहरा, वन संरक्षक पश्चिमी वृत्त डॉ. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक यमुना वृत्त प्रसन्न पात्रो, डीएफओ तराई पूर्वी नीतीश मणि त्रिपाठी शामिल हैं। ड्रोन कैमरे से पहले सिर्फ जिम कार्बेट नेशनल पार्क, मालसी चिड़ियाघर, राजाजी नेशनल पार्क, पश्चिमी वन वृत्त (तराई केंद्रीय, तराई पूर्वी, तराई पश्चिमी, हल्द्वानी और रामनगर वन प्रभाग)

तकनीक के उपयोग बावत कार्यशाला
इधर प्रयोग के तौर पर यूसैक ने राज्य में कार्यशालाऐं आरम्भ कर दी, ताकि तकनीकी का बेजा इस्तेमाल हो सके। यह साल की पहली कार्यशाला सीमान्त जनपद उतरकाशी में पिछले दिनों उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) की ओर से जल संसाधन प्रबंधन में रिमोट सेसिंग जीआईएस के अनुप्रयोग विषय पर आयोजित की गई, जिसमें वन विभाग सहित अन्य विभागों के कार्यालयअध्यक्षो ने हिस्सा लिया। यहां विशेषज्ञों ने उपग्रह तकनीक का प्रयोग पर्यावरण संरक्षण के लिए करने पर जोर दिया। आयोजित कार्यशाला में यूसैक के निदेशक एमपीएस बिष्ट ने स्कूली बच्चों को उपग्रह तकनीक के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मानव विकास पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उपग्रह तकनीक से मिली जानकारियां बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसके तहत यूसैक भी इस तकनीक के प्रयोग से प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, विकास कार्यों पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी, टेली मेडिसिन आदि कार्य कर रहा है।

चूंकि इसके अतिरिक्त विभाग ने 31 हजार स्कूलों का डाटाबेस, सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए स्पीड कंट्रोलर, मोबाइल एप, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए टूरिज्म मैप आदि भी तैयार किए हैं। कार्यशाला में पंहुचे पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि हिमालय एक युवा पर्वत श्रृखला है, जिसकी लगातार निगरानी करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ने कई गहन जानकारियों के साथ देशभर के जिलाधिकारियों को नक्शे मुहैया कराए थे। उन्होंने समस्या से निपटने के लिए पर्वतीय राज्यों को ग्रीन बोनस आदि माध्यम से अतिरिक्त बजट देने पर जोर दिया।

वन संपदा बची रहे, सरकार की पूर्व तैयारी
उतराखण्ड के कुल में से 71 प्रतिशत भूभाग में फैले जंगलो की निगरानी के लिए 18 सालो में वन विभाग ने मात्र 11ड्रोन कैमरे ही खरीद पाये। जबकि राज्य को सर्वाधिक राजस्व यहीं के वनो से प्राप्त होता है। इधर लोगो को मानना है कि ड्रोन कैमरे के साथ-साथ गलत दोहन वाली जगह पर पंहुचने के लिए अत्याधुनिक यातायात सुविधा भी चाहिए। ताकि समय रहते गलत विदोहन से प्राकृतिक संसाधनो की रक्षा हो सके। सरकार आने वाले समय में वनो का नुकसान कम हो इसके लिए पूरी तरह से कमर कसने लग गई है। अभी राज्य सरकार ने 11 नये फायर स्टेशन स्वीकृत कर दिये है। जो कुछ ही दिनों में कार्य प्रारम्भ कर देंगे।

हिमालय के विकास एवं प्र्यावरण सन्तुलन के लिए अंतरिक्ष आधारित सूचना तकनीकी का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके लिए राज्य में कार्य कर रहे सभी राष्ट्रीय और राजकीय संस्थानो को आपस में अधिक साढे प्रयास करने होंगे।
---(- त्रिवेन्द्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड)

उत्तराखंड में देश की पहली फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स बनाई गई है। ड्रोन के उड़ान के लिए डीजीसी ने नियम बनाए हैं उन नियमों को पूरा करने संबंधित सभी औपचारिकताओं को पूरा किया जा रहा है। ड्रोन फोर्स के गठन से शिकार, अवैध खनन समेत अन्य गैर कानूनी गतिविधियों को रोकने में मदद मिलेगी।
--(-डॉ. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक, कोआर्डिनेटर फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स)


समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...