Sunday, September 17, 2017

ढोल से पहले ढोली का संरक्षण हो - प्रीतम भरतवाण




वर्तमान की आधुनिक सभ्यता ने लोक संस्कृति को नया आयाम दिया है जो अब सर्व-जन का कर्म बन गया है। यह उद्गार उत्तराखण्ड के जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण के है। उनके जन्म दिन की पूर्व संध्या पर श्री भरतवाण से हुई सूक्ष्म वार्ता के अंश -

लोक संस्कृति के बारे में बतायेंगें।

दरअसल कुछ अर्सें पहले यानि कि जब संचार के कोई साधन नहीं थे तत्काल उत्तराखण्ड पहाड़ के गांव में बसने वाले जो लोक बाध्यन्त्रों को संवारने व प्रस्तुत करने का कार्य करते थे वे सम्पूर्ण मिडिया का कार्य तो करते ही थे अपितु वे समाज में हमेशा अपने गीतों के माध्यम से परस्परता का कार्य भी करते थे। आज खुशी इस बात की है कि तब एक विशेष प्रकार के लोग ही संस्कृति के कर्ता-धर्ता थे। आज यह सार्वजनिक हो गया है। तब एक ही प्रकार के लोगों को लोक संस्कृति कर्मी मानते थे। लोक संस्कृति का सीधा अर्थ जीवन से और जीवन को जीने से है।

आप लोक संस्कृति के उत्थान व विकास के बारे में बतायंे ?

निर्भरता जीवन को समाप्त करती है। मेरा मानना है कि यदि अपने राज्य के संस्कृति कर्मी सरकार पर आस लगाये बैठे रहेंगें तो शायद इस ओर कोई कारगर प्रयास सार्थक हो। वर्तमान में आडियों-विडियों व मिडिया के माध्यम से लोक संस्कृति के प्रसार के लिये जो कार्य हो रहे हैं वे निसन्देह प्रशंसनीय हैं। उत्थान व विकास का सीधा अर्थ है कि बिना अध्ययन व मेहनत से यह सब अधूरा है।

जितने भी गायक है (उत्तराखण्ड में) सभी लोक गायक हैं ?

यह सत्य है कि गायन और प्रस्तुतीकरण क्षेत्र मंे लोक तब जुड़ता है जब समाज की प्रमाणिकता उस प्रस्तुति को प्राप्त हो। अर्थात यह भी कह सकते हैं लोक की अभिव्यक्ति का प्रस्तुतिकरण। जैसे कि श्री नरेन्द्र नेगी, श्री जीत सिंह नेगी, श्री रतन सिंह जौनसारी, मंगला रावत, चन्द्रसिंह राही, हीरा सिंह राणा आदि हमारे अग्रज यह लोक गायक हैं । इससे पहले की ओर देखें तो घनश्याम सैलानी व गोपाल बाबू गोस्वामी जैसी दिवंगत आत्माये असली लोक गायक थे।

समाज में जागर का महत्व ?

जागर विद्या आदि और अनन्त काल से है। यह सिद्ध है कि जब कोई सभ्यता एक हजार साल तक समाज मंे व्याप्त रहती हैं तब एक छोटी संस्कृति का जन्म होता है यहां हम कहसकते हैं कि हमारे पहाड़ में जागर और ढोल की पैदाइश इस प्रकार ही हुई है। जागर का सम्बन्ध जागृत करने से है। जो एक दम मृत प्रायः हो गया और उसका पुनर्जन्म करना ही जागर है।

आपने ढोल की भी बात कही ?

उत्तराखण्डी समाज में अनादीकाल से यह सभ्यता है कि मरने से लेकर मृत्यु तक ढोल की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता होती है। जीवन जीने में जब सोलह संस्कारों का पर्दापर्ण होता है। उसमें ढोल मुख्य है। जब सोलह संस्कारों में ढोल इतना महत्वपूर्ण है तो राज्य मंे इसे भी राष्ट्रीय धरोहर के रूप में मान्यता मिले ढोल के बिना कोई भी राष्ट्रीय पर्व सम्पन्न न हो। एक बार कुछ साथियों ने ढोल के बोल लिपी बद्ध किये है। यह अच्छा प्रयास है परन्तु यह कार्य तब तक अधूरा है जब तक हम उस विद्धान तक नहीं पहंुचे जिसने ढोल को जिया होगा।

ढोल के संरक्षण की बात हर स्तर पर वर्षों से उठ रही है। आप बतायेंगें कि ढोल का संरक्षण हो गया या हो रहा है ?

ढोल का ना तो कोई संरक्षण होगा ना ही हो पायेगा। वनस्पत जब तक ढोली (बजाने व बनाने वाला) का संरक्षण व पुर्नवास नहीं हुआ तब तक यह बातें अधूरी हैं।

तो आप मानते है ढोल का संरक्षण होना चाहिए ?

उत्तराखण्ड में जब लोक संस्कृति की बात आती है तो ढोल सर्वोपरी है इसलिये हर स्तर पर ढोली और ढोल दोनो का पहले पुनर्वास हो उसके बाद संरक्षण करना आसान हो जायेगा। ढोल तो सर्वप्रथम शिव ने बनाया था जो ढोल सागर में बताया गया। आज इस ढोल सागर के साहित्य की भी नितान्त आवश्यकता है।

आप इस ओर कोई उल्लेखनीय कार्य करेगें ?

हां-हां बिल्कुल हमने लोक संस्कृति में लोक बाध्ययन्त्रों व संगीत के संरक्षण व प्रशिक्षण के लिये ’’हिम लोक कला केन्द्र’’ की स्थापना की है। जिसके माध्ययम से तमाम लोक विद्यायों पर समय-समय पर अध्ययन और कार्यशालायें आयोजित करते है ताकि भविष्य की पीड़ी इनसे वाकिफ हो व दक्ष बनें।

अन्त मंे कोई सन्देश

जवाब - मिडिया के बिना लोक संस्कृति को ऊँचाई तक पहुँचाना नामुमकिन है । यही कहना चाहूंगा कि जिस तरह समाज का रूझान लोक संस्कृति की ओर बढ़ रहा है वह निश्चित तौर पर सुखद है। सभी पाठक और श्रोताओं को मेरा प्रणाम।

Friday, September 8, 2017

रंवाई लोक महोत्सव में बीट्स आॅफ यमुना वैली की थाप पर नाच उठा पाण्डाल







प्रेम पंचोली

वैसे तो कई दफा रंवाई घाटी यानि नौगांव, बड़कोट, पुरोला व मोरी में रंवाई महोत्सव का आयोजन हुआ, पर इस बार जो नौगांव स्थित दौलत राम रंवाल्टा राजकीय इण्डरमीडिएट काॅलेज में हुआ उसकी रंगत ही कुछ और थी। यूं कह सकते हैं कि आयोजको ने खूब रिहर्सल की है या कह सकते हैं कि आयोजन से पूर्व सर्वसम्मति को स्वीकार किया होगा। कुछ भी कह सकते हैं। मगर जहां एक ओर रंगारंग कार्यक्रमो की धूम रही वहीं रंवाई क्षेत्र के वरिष्ठ साहित्यकार भी अपनी लोक भाषाओं को लेकर एक कवि सम्मेलन के मार्फत इस महोत्सव में चार-चांद लगाने पंहुच गये। उधर बीट्स आॅफ यमुना वैली की टीम महोत्सव में अपनी दस्तक देने पंहुच चुकी थी तो वही महोत्सव की खास पेशकश दौलतराम रंवाल्टा सम्मान, पतिदास सम्मान, राजेन्द्र सिंह रावत सम्मान, बर्फियालाल जुवांठा सम्मान पाने वालो की झलक देखने के लिए दर्शकदीर्घा समय से पहले ही भर चुकी थी। जबकि महोत्सव का उद्घाटन कथा वक्ता व राष्ट्रीय सन्त पं॰ सुरेश उनियाल ने इण्टरमीडिएट काॅलेज नौगांव के प्रांगण में रूद्राक्ष के वृक्ष को रोपित करके किया है।
उल्लेखनीय हो कि वरिष्ठ साहित्यकार महावीर रंवाल्टा, युवा कवि दिनेश रावत, प्रसिद्ध लोक कवि व गायक ओम बंधानी, साहित्यकार सुरेन्द्र सिंह पुण्डीर, साहित्यकार ध्यान सिंह रावत, युवा कवि व पत्रकार नीरज उत्तराखण्डी ने ‘‘रंवाई लोक महोत्सव’’ के उद्घाटन सत्र को रंवाल्टी, जौनपुरी, गढवाली कविता पाठ से मौजूद दर्शको को झकझोर कर रख दिया। आम तौर पर कविता पाठ में आम दर्शको को बांधे रखना बड़ा मुश्किल काम माना जाता था, परन्तु इस महोत्सव ने इस परम्परा को तोड़ा है। जबकि खचा-खच भरे पाण्डाल व साथ ही महोत्सव में मौजूद अतिथि पूर्व कैबिनेट मंत्री व टीएचडीसी के निदेशक मोहन सिंह रावत गांववासी, यमनोत्री के विधयक केदार सिंह रावत, पुरोला के विधायक राजकुमार, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सकलचन्द रावत, वयोवृद्ध समाजसेवी अमर सिंह कफोला, आटीबीपी सेवानिवृत डीआईजी एस. पी. चमोली सहित वरिष्ठ पत्रकार विजेन्द्र सिंह रावत ने इनकी कविताओं का ना कि रस्वादान लिया बल्कि वे अपने संबोधन में भी कवियों की कविता पर स्पष्टीकरण देते रहे। यही नहीं कविता के साथ-साथ अशिता डोभाल के नेतृत्व में रंवाल्टी रसोई का भी उद्घाटन हुआ और महोत्सव में पंहुचे अतिथियो को मंजियाली गांव की महिलाओं ने रंवाई के व्यंजन सीड़ा, डिंडिका, अस्का जैस एक दर्जन व्यंजन का स्वाद भी चखाया गया।
जब बीट्स आॅफ यमुना वैली की टीम 50 कलाकारो सहित अपने साज-बाज को लेकर एक साथ मंच पर उतरी तो पूरा पाण्डाल दर्शको की तालियों से गूंजायमान हो उठा। ऐसा पहला मौका था कि स्थानीय 20 बाध्यान्त्र और रंवाई घाटी के 30 कलाकारो के साथ एक सामूहिक प्रस्तुति जब मंच पर प्रस्तुत हुई तो एक बारगी सम्पूर्ण पाण्डाल झूमते हुए नजर आया। ‘‘बीट्स आॅफ यमुना वैली’’ नाम से हुई यह वृहद सांस्कृतिक समागम का अगाज शायद पहला अवसर था जिसे लोगो ने खूब सराहा। लोग यह भी संकेत कर रहे थे कि इस प्रकार की प्रस्तुति इस क्षेत्र में पहली बार हुई है, जहां साउण्ड वाले को भी साउण्ड प्रुफ के लिए 48 चैनल बनाने पड़े। बीट्स आॅफ यमुना वैली के बारे में जैसा बताया गया कि रंवाल्टी लोक संस्कृति को एक बड़े मंच पर लाने के लिए और लोक कलाकारो को मंच उपलब्ध करवाने व लोक कला को व्यवसाय के रूप में कैसे विकसित करें इस हेतु इस प्रस्तुति की विशेष तैयारी की गयी है। इसलिए पहले प्रयास में पहाड़ी वाद्य यंत्रों के साथ गीत-संगीत की अद्भुत जुगलबंदी के साथ-साथ शंक, भाणू (घंटी), दो रणसिंघे, दो ढोल, दो नगाड़े, की-बोर्ड, पैड, दो ढोलक, तबला, मुरली, हुड़का, हारमोनिय, मशकबीन, डौंर जैसे लोक बाध्यान्त्रो की संयमित व सधी हुई प्रस्तुतीयों को दर्शको ने खूब सराही। इस दौरान रंवाई क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक गायक महेन्द्र सिंह चैहान, अनिल बेसारी, विनोद चैहान, सुमन शाह, रेखा भारती, निधी राणा, सुरेश भारती, प्रवीन बाबा, धनेश बंगाणी, मनमोहन सिंह रावत, रणजीत रणू भाई, राज सावन सहित जौनसार के राॅकस्टार कहे जाने वाले सन्नी दयाल ने सामूहिक रूप से लोक गीतो को प्रस्तुत किया तो दर्शक दांतो तले ऊंगलियां दबा रहे थे। जबकि लोक संगीत पक्ष को सफल बनाने में सुनिल बेसारी के संयोजन में रामदास, ऐलम दास, मुकेश कुमार, कुलदीप, संदीप, प्रेम कुमार, मुकेश बेसारी, सतीश, प्रमीन, सुरेश, प्रमोद, विनोद, भगत दास जैसे सधे कलाकार लोक वाद्य के उम्दा तालो के साथ मुस्तैद रहे।
जबकि इससे पहले एक विशेष सम्मान समारोह हुआ। समाज सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले बड़कोट के डा॰ कपिलदेव रावत को दौलत राम रंवाल्टा सम्मान, उत्तराखण्ड माध्यमिक शिक्षा परिषद की परीक्षा में श्रेष्ठ श्रेणी में आने वाले छात्र रोहित उनियाल, कु॰ अनुसूया चैहान, अजय विक्रम बिष्ट व कु॰ साक्षी रावत को पतिदास मेधावी सम्मान, कृषि स्वावलम्बन के क्षेत्र में श्रीमति राजकुमारी को राजेन्द्र सिंह रावत सम्मान, साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर शिक्षक व लेखक चन्द्रभूषण बिजल्वाण को बर्फिया लाल जुवांठा सम्मान से नवाजा गया है। इस दौरान महोत्सव के मुख्य अतिथि पूर्व कैबिनेट मंत्री व टीएचडीसी के निदेशक मोहन सिंह रावत गांववासी ने कहा कि यह संस्कृति बनी रहनी चाहिए ताकि आने वाली पीढी इनका अनुसरण करे और विकास के कार्यो को सही रूप दे सके। साथ ही इनके संस्कारो को अपने जेहन में उतारे। जिन योद्धाओं के नाम से यह सम्मान पहली बार यहां दिया जा रहा है उनकी ही बदौलत आज रंवाई घाटी आबाद है। श्री गांववासी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि रंवाई घाटी तो ही है जहां की लोक संस्कृति से लेकर तमाम लोकोत्सव हर वर्ष दुनियां के पटल पर अपनी पहचान बनाती है। यह वे इसलिए कह रहे हैं कि रंवाई घाटी से लेस मात्र पलायन नहीं है। राज्य के अन्य हिस्से पलायन की बिमारी के चपेट में आ चुके हैं। इन्ही आदर्शो व संस्कारो को बनाए रखने के लिए इस ‘‘रंवाई लोक महोत्सव’’ की आवश्यकता थी। कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि यमनोत्री के विधायक केदार सिंह रावत ने कहा कि इस महोत्सव की यह पहचान बन गयी कि आने वाली पीढी को अब अपने आदर्शो को पहचानने में कोई समस्या नहीं आयेगी। कहा कि हमारी इस घाटी में इन चार महानविभूतियों ने जो इतिहास रचा उसका अनुसरण हमें करना होगा। इन्ही की दिव्य-दृष्टा के कारण यहां यातायात सुलभ हो पाया तो यहां के लोग कृषि-स्वावलम्बन के क्षेत्र में झण्डे गाड़ रहे हैं। उन्होने रंवाई लोक महोत्सव की थीम की खूब सराहना की है। श्री रावत ने कहा कि किसी भी बड़े काम को क्रियान्वयन करने में कुछ कमिया रह ही जाती है तो उसे बड़ी भूल नहीं माननी चाहिए। इसलिए कि जब आप काम करोगे तो गलतियां भी आपसे होगी, परन्तु गलतियों को सुधारने की भरसक कोशिश करनी चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पुरोला के विधायक राजकुमार ने महोत्सव में पंहुचे सभी आगन्तुको स्वागत किया। उन्होने कहा कि ‘‘रंवाई लोक महोत्सव’’ आने वाले दिनों में मील का पत्थर साबित होगा। भविष्य में इस महोत्सव को तीन दिवसीय आयोजित किया जायेगा। कहा कि इस तरह के आयोजन की यहां नितान्त आवश्यकता थी। सो भविष्य में इस महोत्सव को भव्य और विस्तारित करने के लिए सभी लोगो को आयोजन समिति का सहयोग करना होगा। यह एक ऐसा मंच विकसित होने जा रहा है जहां हम अपने प्रतिबिम्ब को देख सकते हैं।
ज्ञात हो कि रंवाई घाटी जो क्रमशः टिहरी जनपद के थत्यूड़, देहरादून जनपद के कालसी और चकराता, उतरकाशी जनपद के नौगांव, पुरोला व मोरी विकास खण्डो को जोड़कर एक बड़े कलस्टर का परिचय कराती है। इसी रंवाई घाटी के मध्यस्थल में नौगांव विकासखण्ड मुख्यालय में ‘‘रंवाई लोक महोत्सव’’ का आयोजन सामाजिक एवं पर्यावरणीय कल्याण समिति के तत्वाधान में शशीमोहन रंवाल्टा, पत्रकार विजयपाल रावत, अशिता डोभाल, श्वेता बधानी, अमिता नौटियाल, नौगांव की क्षेत्र पंचायत प्रमुख रचना बहुगुणा, जेष्ठ प्रमुख प्रकाश असवाल, टिहरी के नैनबाग क्षेत्र के जिला पंचायत सदस्य अमेन्द्र बिष्ट, हरिमोहन चैहान, नरेश नौटियाल, अमित सावन, अनिल बेसारी, सुमन शाह जैसे कार्यकर्ताओं के संयुक्त सहयोग से सम्पन्न हुआ है।
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व्यक्तित्व और उनकी वृत्ति का एक सूक्ष्म परिचय
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दौलतराम रवांल्टा सम्मान - स्व. रवांल्टा आजादी के बाद व पूर्व से ही क्षेत्र के विकास के लिए ताउम्र संघर्षरत रहे। उन्हीं की बदौलत यमुनाघाटी में दिल्ली से यमनोत्री मोटर मार्ग का निर्माण हुआ। ऐसे कई विकास के काम रवांल्टा जी के नेतृत्व में हुए जिनकी क्षेत्र में एक मिशाल कायम है। स्थानीय लोग उन्हें विकास का मसीहा मानते हैं। पहली बार उनके नाम से ऐसा आयोजन किया जा रहा है। क्षेत्रीय विकास और जनमुद्दों पर रचनात्मक कार्य करने वाले व्यक्तित्व को यह सम्मान ‘‘समाज सेवा’’ के क्षेत्र में दिया जाता है।
पति दास सम्मान - स्व. पतिदास आजादी से पूर्व प्रजामंडल की विधानसभा के सदस्य रहते हुए भी उन्होंने उन दिनों यमुनाघाटी और सम्पूर्ण पहाड़ में सभी के लिए शिक्षा जैसे अभियान कार्यक्रम का नेतृत्व किया। यही नहीं वे आजादी के बाद अंतरिम सरकार यानी उत्तर प्रदेश सरकार में भी विधानसभा सदस्य रहे। उन्होंने समतामूलक समाज की कल्पना को साकार करने के लिए सर्वोदय कार्यकर्ता के रूप में गांव-गांव कैंप फायर जैसे कार्यक्रम का नेतृत्व किया। शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ठ/मेधावी छात्र-छात्राओं को यह ‘मेधावी सम्मान’ दिया जाता है।
राजेन्द्र सिंह रावत सम्मान - स्व. रावत उत्तराखण्ड (तब उतर प्रदेश) के ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने खुद के गांव बीफ में लोक सहभागीता से चकबन्दी करवा करके चकबन्दी का आन्दोलन इस पर्वतीय राज्य में फैलाया। हालांकि राज्य बनने के बाद यह आन्दोलन सरकारी दफ्तरो की धूल फांकता रहा क्योंकि तब तक वे शारीरिक रूप से असमर्थ हो चुके थे। जबकि वे ब्लॉक प्रमुख, जिलापंचायत अध्यक्ष के पद पर रहते हुए भी वे लोगो के घर-घर विकास के कार्यों को क्रियान्वन के लिए पंहुचते थे। वे राजनीतिक कार्यकर्ता कम और एक सामाजिक कार्यकर्ता थे। वे गढवाल के पहले व्यक्ति थे जो ताउम्र लोक सेवा में रमे रहे। कृषि, स्वावलंबन की दिशा में कार्य करने वाले व्यक्तित्व को इस सम्मान से नवाजा जाता है।
बर्फियाला जुवांठा सम्मान - स्व. जुवांठा यमुनाघाटी में ही नहीं अपितु पूरे उत्तराखण्ड में विकास पुरुष के रूप में जाने जाते हैं। वे यमुनाघाटी में आशा की किरण से भी जाने जाते हैं। श्री जुवांठा ऐसे निम्न परिवार में जन्में जो कभी सपना भी नहीं देख सकते थे कि उनका यह बालक कभी इलाहबाद जैसे विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति से लेकर तत्काल उत्तर प्रदेश में विकास की एक नई इबारत लिखेगा। वे तत्काल उत्तर प्रदेश में पर्वतीय विकास मंत्री रहे हैं। उन्होंने राज्य आन्दोलन की अगुवाई में अभूतपूर्व सहयोग करके तत्काल सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी को उत्तराखण्ड राज्य के लिए अलविदा कह दिया। सौम्य स्वभाव और साहित्य रचना एवं विकास पर उनकी अच्छी पैठ थी। साहित्यकी, रचना, लोक संस्कृति व जनमुद्दों पर आधारित लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तित्व को इस सम्मान से सम्मानित किया जाता है।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...