जी-20 के कारण क्यों बन्द करवाये स्थानीय ढाबे।
Prem Pancholi
देहरादून से टिहरी के चंबा और चंबा से वापस देहरादून का यह सफर अन्य दिनों से अलग था। इसलिए भी कि नरेंद्रनगर के ओणी गांव में जी-20 की बैठक होने रही थी। 24 मई को हम लोग देहरादून से चले और हमे उसी दिन चंबा ब्लॉक के चूरेड़धार गांव पहुंचना था। वहां दूरदर्शन उत्तराखंड के लिए ‘गांव दर्शन’ कार्यक्रम के तहत शूटिंग करनी थी।
मेरे साथी घर से नाश्ता करके आए हुए थे। मैं उनके साथ रिस्पना पुल से हो लिया। मैने कहा कि मुझे रास्ते में कहीं चाय पीनी है। साथियों ने मुझसे चुटकियां लेते हुए यह तय किया कि जौलीग्रांट के बाद एक रास्ता सीधा नरेंद्रनगर बायपास में मिलता है। हम वहीं से निकलते है, क्योंकि यह रास्ता चंबा, टिहरी आदि स्थानों के लिए नजदीक पड़ता है। सो गुजराड़ा या अन्य कहीं पर भी किसी ढाबे में चाय पी लेंगे। यही सोचकर सभी अपने अपने दिल में चाय की तड़फन भरते हुए आगे बढ़े। देहरादून के रिस्पना पुल के बाद सड़क के किनारे-किनारे आदि अन्य स्थानों पर होर्डिंग की भारी भरमार दिखाई दी है। साथी लोग सरकारी कर्मचारी थे, तो वे मेरी बातो को नजरंदाज कर रहे थे। मैं कह रहा था की देखो मोदी जी की सोच के अनुसार जी-20 की होर्डिंग सरेराह बिछ चुकी है। गजब की तैयारी है बगैरह बगैरह। देहरादून से जौलीग्रांट के बड़कोट तक स्थानीय लोगो की लंबी लंबी कतार लगी हुई थी। सभी के हाथो में फूल से सजी थाली थी। इनमे अधिकांश महिलाएं थी। सभी ने पीला और नारंगी कपड़ा पहना हुआ था। जौलीग्रांट हवाई अड्डे के बाहरी द्वार पर सांस्कृतिक विभाग की टोलियां अपने अपने पारंपरिक परिधान में खड़ी थी। इन संस्कृति कर्मियों के हाथो में भी तिलक चंदन से सजी थाली, किसी के हाथ में फूलमाला, किसी के हाथ में पहाड़ी टोपी आदि थी। यह सभी जी-20 की बैठक में पहुंचने वाले मेहमानो के स्वागत के लिए मुस्तैद थे।
हम लोग यही चर्चा कर रहे थे कि यह बहुत ही अच्छा रास्ता है। अब ऋषिकेश जाने का ही झंझट खत्म, 10 से 12 किमी कम भी है। हंसी मजाक करते हुए जौलीग्रांट से थोड़ा आगे पंहुचकर हमने उस सॉर्टकट रास्ते पर अपनी गाड़ी घुमा दी। यहां पर इतनी पुलिस लगी हुई थी कि वे इस रास्ते से किसी को भी आगे नहीं जाने दे रहे थे। सभी टिहरी, उत्तरकाशी, घनसाली आदि स्थानों को जाने वाले लोग उसी पुराने रास्ते ऋषिकेश होते हुए जा रहे थे। हमारी गाड़ी को इसलिए जाने दिया कि उस पर दूरदर्शन उत्तराखंड लिखा हुआ था। खैर हमारी एंबेसडर इस तरह से आगे बढ़ी। साथियों की चाय पीने की धड़कने तेज होने लगी। यहां से नरेंद्रनगर मात्र 15 किमी है। हर दो किमी पर पुलिस पहरा मौजूद दिखाई दिया। यह रास्ता थोड़ा जंगल, थोड़ा ग्रामीण क्षेत्र का है। हर दो किमी के फासले पर मोदी जी और धामी जी के चित्रों सहित बड़ी बड़ी होर्डिंग अंग्रेजी व हिंदी में चस्पा की हुई थी। 15 किमी के दायरे में लगभग एक दर्जन ढाबे थे। वे सभी बंद थे और उन्हें होर्डिंग से कबर कर दिया गया था। इस तरह हम सभी अपनी चाय पीने की धड़कने थाम कर आगे बढ़ते गये।
नरेंद्रनगर क्रॉस करने के बाद लगभग एक या डेढ़ किमी के फासले पर खाड़बगड़ स्थान पर यानी नरेंद्रनगर से टिहरी की तरफ जाने वाले रास्ते में एक ढाबा था, जिसका उस दिन कहीं नामोनिशान ही नही था। वहां पर एक प्राकृतिक जल स्रोत भी है, जिसे बहुत ही खूबसूरत चित्रकारी से सजाया हुआ था। सूर्य नमस्कार, डिटॉक्स उत्तराखंड, सुंदर उत्तराखंड आदि स्लोगन यहां पढ़ने को जरूर मिले। पर यहां जो वर्षाे से चाय, खाना का ढाबा था वह कहीं दिखाई नहीं दिय। मैने सोचा कि ऑलवेदर रोड़ के कारण उक्त ढाबे के साथ कुछ हुआ होगा। बशर्ते हम लोग चाय पीने की तड़फने संभालते हुए आगे बढ़ते चले। लगभग दो किमी चलने पर धारबगड़ में एक ढाबा दिखाई दिया। वहां पर क्रिश्चन मिश्नरी की एक डे बोल्डिंग स्कूल भी है। हमने अपनी गाड़ी किनारे पर रोकी और ढाबे में घुसते ही चाय का ऑर्डर दे दिया।
अब चाय मिल गई तो चाय पीते पीते मैं उस ढाबे वाले भाई को पहचान गया। मैने कहा वहां नीचे यानी खाड़बगड़ में आपने अपना ढाबा क्यों बंद किया? हम तो वहीं रुके थे। ढाबे वाले भाई ने गढ़वाली में मजाकिया गाली देते हुए कहा कि जी-20 वालो का मुर्दा मरा। उन्होंने मेरे ढाबे को बंद करवा दिया। यूं कहकर कि नरेंद्रनगर में जी-20 की बैठक हेतु जहां 20 देशों के डेलीगेट्स आने वाले है। दूसरे देशों के मेहमानो के सामने ऐसा गरीबी वाला ढाबा हम नही दिखा सकते है। मेरे सवाल पर ढाबे वाले भाई का यह भी जबाव आया कि ढाबे हटाने वाले कुछ पीडब्ल्यूडी और कुछ अन्य सरकारी कर्मचारी थे। हमने चाय पी और चंबा ब्लॉक के चूरेड़धार गांव पहुंचना था इसीलिए आगे बढ़ते चले गये।
आगराखाल के बाद जी-20 के बैनर पोस्टर थोड़ा थोड़ा कम होते दिखाई दिये। थोड़ी देर के लिए खाड़ी बाजार में स्थित समौण फूड कनेक्ट में रूकना हुआ। यहां मेरे मित्र भाई अरण्य रंजन ने हम सभी को चाय पिलाई। हमारे युवा साथी श्री जोशी ने यहां समौण फूड कनेक्ट में मंडुवे के मोमो खाए। उन्हे मंडुवे के मोमो बहुत ही स्वादिष्ट लगे। रस्तेभर यही कहते गये कि मोमो खाने में बहुत मजा आया है। इस तरह हम आगे बढ़ते हुए चम्बा पंहुच गये।
चंबा बाजार पूर्व से कई गुना अच्छा, साफ सुथरा दिखाई दिया और सड़क के किनारे-किनारे में चूना जरूर पड़ा हुआ था। चंबा से चूरेड़धार गांव लगभग 7 किमी के फासले पर था। दिन के 2 बजे तक हम चूरेड़धार गांव पहुंच गए। जहां हमारी इंतजारी रामलाल डबराल कर रहे थे। इस गांव के लोगो ने पानी, जंगल बचाने का वैज्ञानिक तरीका ढूंढ निकाला है। इसीलिए यह गांव आज आदर्श है। गांव की सफलता की कहानी को आप दूरदर्शन उत्तराखंड के ‘गांव दर्शन’ कार्यक्रम के तहत देख सकते है। यहां मेरा इस दौरान का सफरनामा आप पढ़ सकते है।
हमने गांव पंहुचते ही कुछ कुछ स्थानो पर शूट किया। अगले दिन भी यहीं आना था। आज रात्रि विश्राम के लिए हमने चंबा में स्थित वन विभाग के गेस्ट हाउस जाना था। यह व्यवस्था मेरे बहुत ही करीबी मित्र और उप प्रभागीय वनाधिकारी डा० उदय गौड़ ने की हुए थी। पर उस दिन यानी 24 मई को यहां एक ही कमरा खाली था। हम पांच लोग थे, इसलिए हमने नई टिहरी के पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस के लिए संपर्क किया। जिलाधिकारी नई टिहरी के नाजर श्री डंगवाल ने हमारे लिए यह गेस्ट हाउस आरक्षित कर दिया। हम रात्रि विश्राम के लिए अब नई टिहरी पंहुच गए। इस गेस्ट हाउस में एक कमरे का एक रात्रि का किराया 150 रुपए है। देर रात्रि नई टिहरी पहुंचे। बहुत ज्यादा बारिश हो रही थी। मुझे अपनी बहन के घर नई टिहरी जाना था, तेज बारिश के कारण नहीं जा पाया। नई टिहरी में ठंडक ने फिर से दस्तक दे दी। हम लोग अपने अपने कमरे में दुबक गए। अब कमरे में बिस्तर तो पकड़ लिए मगर ठंड ज्यादा थी तो बिस्तरों पर ध्यान नहीं गया। थोड़ा सुस्ताने के बाद जब हमारी नजरें बिस्तरों और कमरे की चार दिवारी पर गई तो हमे पीडब्ल्यूडी पर दया आ गई। इतना बड़ा लाव-लस्कर वाला विभाग के गेस्ट हाउस की इतनी बड़ी दुर्गति कैसे हो गई। बहुत ही गंदे बिस्तर, कमरे की चार दिवारी भी गंदी गंदी। शौचालय की साफ सफाई इतनी थी की दरवाजा खोलते ही दुर्गन्ध आने लगी। इस गेस्ट हाउस को देखकर दुख तब हुआ कि जब यह गेस्ट हाउस जिलाधिकारी के नाक के नीचे है। पर इसकी किसी को कोई खैर खबर नही है। सिर्फ व सिर्फ गीजर ठीक था। जैसे तैसे रात कटी। अब रात्रि का भोजन कहां मिलेगा। क्योंकि बारिश की धार टूट नही रही थी। गेस्ट हाउस के खलासी ने कहा कि यहीं कमरे पर भोजन मंगवा देता हूं। मैने कहा यदि नजदीक है तो हम वहीं चले जायेंगे। खलासी ने बताया कि सीढ़ी उतरकर दाईं तरफ एक छोटा सा होटल है। हमने अपने एक नौजवान साथी और गाड़ी चालक को वहां भोजन की डिमांड के लिए भेज दिया। क्योंकर कि पहाड़ में होटल जल्दी बंद हो जाते है। हम साढ़े नौ बजे रात्रि को उक्त होटल में भोजन करने गए। इस भोजनालय की हालात भी बहुत बुरी थी। भोजनालय के मालिक ने सभी को धमकाना आरंभ कर दिया। जो हम मांग रहे थे, उस पर भोजनालय मालिक का एक ही जबाव था कि जो मिल रहा है उसे खाओ, वरना यहां से जाओ। मुझे फिर कहना पड़ा कि मान्यवर इस तरह की भाषा का प्रयोग मत करो, हम कोई शराबी-कबाबी नही है। मीडिया प्रसन्न है। वैसे भी हम यहां पहले ही समय से डिमांड दे चुके है। उसके बाद मालूम हुआ कि इस भोजनालय में सांयकाल को सर्वाधिक शराबी भोजन करने आ जाते है। इसीलिए मालिक का यह कठोर व्यवहार हर ग्राहक के साथ रहता है। दूसरा यह कि जिसने यहां हमसे भोजन की डिमांड प्राप्त की थी वह व्यक्ति वहां मौजूद ही नहीं था और न मालिक को ऐसा बताया गया था। मेरी बातो से मालिक सामान्य तो हो गया, मगर भोजन बहुत बासी खलाया है। इस भोजन के कारण मेरी तबियत रातभर खराब रही। प्रातः 3 बजे जब मैंने उल्टी कर दी तब जाकर थोड़ा सा आराम हुआ। अल सुबह यानी 25 मई को हम तैयार होकर 9 बजे तक पुनः चूरेड़धार गांव पहुंच गए।
चूरेड़धार गांव के 38 परिवार सदियों से पेयजल की किल्लत से त्रस्त थे। साल 2013 में ग्रामीणों ने खुद और टाटा ट्रस्ट के हिमोत्थान सोसायटी के सहयोग से पेयजल के लिए कार्य आरंभ किया। अब यहां पेयजल और सिंचाई की कोई असुविधा नहीं है। संपूर्ण पानी की आवश्यकता बरसती पानी से पूरी होती है। यह कार्य कैसे सफल हुआ, इसी के वास्ते दूरदर्शन उत्तराखंड की टीम गांव पहुंची थी। 25 मई को दिनभर हम शूटिंग में व्यस्त रहे। रात्रि विश्राम हेतु हमे चंबा स्थित वन विभाग के गेस्ट हाउस आना था। क्योंकि यहां पर रात्रि की व्यवस्था मेरे बहुत ही प्रिय मित्र व उप प्रभागीय वन अधिकारी डा० उदय गौड़ ने कर ही रखी थी। इस तरह हम सांय के 6 बजे तक वन विभाग के गेस्ट हाउस पहुंच गए। पहुंचते ही बहुत ही तीव्र बारिश हो गई। गेस्ट हाउस के परिचायक ने कमरे खोल दिए और हमारे लिए रात्रि भोजन की व्यवस्था में जुट गए। परिचायक राकेश बिजल्वान बहुत ही मिलनसार, संस्कारी युवा है। हर अतिथि का वह ऐसा स्वागत करते है कि अमुक अतिथि श्री बिजल्वाण को कैसे भूल सकते है। स्वादिष्ट भोजन बनाना, भोजन परोसना कोई श्री बिजल्वाण से सीखे। गेस्ट हाउस की साफ सफाई और चाक-चौबंद व्यवस्था का श्रेय भी श्री बिजल्वाण सहित विभागीय कर्मचारियों, अधिकारियों को जाता है। यह गेस्ट हाउस बहुत ही सुंदर और साफ सुथरा है। चारो तरफ से घनघोर बांझ के जंगल से घिरा हुआ है। कह सकते हैं कि 24 मई की अव्यवस्था और थकान यहीं पर आकर उतर गई।
26 मई को हम प्रातः 7 से 8 बजे तक तैयार हो गए। सात बजे श्री बिजल्वाण ने चाय भी पीला दी थी। साढ़े नौ बजे तक श्री बिजल्वाण ने हमसे नाश्ता करवा दिया। हम प्रातः के ठीक 10 बजे वन विभाग के गेस्ट हाउस चंबा से देहरादून के लिए रवाना हो गए। गाड़ी में बैठते ही चर्चा हो गई कि देहरादून जाने के लिए वही रास्ता नजदीक है जो नरेंद्रनगर से सीधा जौलीग्रांट पंहुचता है। मेरे एक साथी ने कहा कि वह रास्ता तो बंद होगा। क्योंकि नरेंद्रनगर में जी-20 की बैठक हो रही है। मैने कहा कि इतना तो आयोजको को ख्याल रखना ही चाहिए, हम मीडिया के लोग है शायद जाने देंगे। वहां पहुंचते ही देखा तो रास्ता एकदम क्लियर था। पुलिस तो लगी थी, पर लोगो को आने जाने दे रहे थे।
चंबा से चलने के बाद हम पांच मिनट के लिए साबली गांव रुके। हेंवल नदी के किनारे किनारे खाड़ी, जाजल, फकोट होते हुए आगराखाल पहुंचे। यहां मेरे साथियों ने पहाड़ी उत्पाद बुरांश का जूस आदि आदि झंगोरा, मंडुवा, राजमा आदि दालें खरीदी। आगे चलकर एक साथी ने कहा कि ये ऊंची चोटी पर क्या दिख रहा है। मैने जबाव दिया सिद्धपीठ मां कुंजापुरी का मंदिर है, यदि दर्शन करने चलना है तो चलिए। सभी ने हामी भरी और हम मां कुंजापुरी मंदिर दर्शन
करने पहुंच गए। कुंजापुरी मंदिर के बेस कैंप में कुछ चाय-पानी के ढाबे भी है। ये ढाबे वाले गाड़ी पार्क करवाने का जतन करते है। ताकि उनकी दुकान से मंदिर में चढने वाले प्रसाद को लोग खरीदें। मेरे पास पैसे खत्म हो गए थे, मात्र एक रुपया बचा था। मैने अपने वरिष्ठ साथी श्री रावत, श्री चौहान जी को कहा कि प्रसाद ले लो। श्री रावत ने प्रसाद खरीदा। जिसमे एक चुनरी, एक धूप बत्ती, एक नारियल और एक छोटा पैकेट पंचमेवा सहित लाइचीदाना था। यहीं से मंदिर जाने के लिए खड़ी सीढ़ियां चढ़नी है। मैने अपने एक जूनियर युवा साथी श्री जोशी को कहा कि वे इन सीढ़ियों को गिने कि मंदिर तक कितनी सीढ़ियां चढ़नी है। श्री चौहान भी सीढ़ियां गिनने साथ हो गए। श्री जोशी ने 310 सीढ़ियां और श्री चौहान ने लगभग 300 सीढ़ियां गिनी। खैर! मंदिर प्रांगण में प्रसाद बेचने वाले साथी को कुल सीढ़ियों के स्पष्टीकरण के लिए मैने पूछा, तो बताया गया कि कुल 312 सीढ़ियां है। इस तरह मंदिर में पूजा अर्चना करने के पश्चात हम बाहर मंदिर प्रांगण में टहलने लगे। एक दूसरे की फोटो खिंचने लगे।
मंदिर के चौबारा में एक व्यक्ति ढोल बजा रहा था। उनसे नाम जानने की कोशिश की तो उन्होंने अपना नाम देवेंद्र बताया। एक सवाल के जबाव में ढोल बजाने वाले देवेंद्र भाई ने कहा कि यहां पर मंदिर समिति है जो भंडारियो व कंडारियो की है। उनको वही पैसा मिलता है जो किसी श्रद्धालु ने उनके ढोल के ऊपर 5 से 10 रुपए रख दिया हो। कहा कि वैसे तो जो भी चढ़ावा जाता है वह मंदिर में ही जाता है। उस चढ़ावे से उनका कोई हिस्सा नहीं मिलता है। बस वह तो मां कुंजापुरी की सेवा बावत परंपरागत व सदियों से यहां ढोल बजाते आये है। देवेन्द्र मंदिर के प्रांगण में लोगो की सहायता बावत नारियल तोड़ने में मदद भी करते है। इसके एवज में लोग उन्हें कुछ मामूली दक्षिणा दे ही देते है। ढोल वादक देवेंद्र ने बताया कि वह पास के चमोल गांव निवासी है। यहां ढोल वादकों के 10 परिवार निवास करते है। उन्हीं में से यहां मंदिर में ढोल बजाने की बारी प्रत्येक परिवार की लगती है। वैसे समिति उनके भाई को मासिक मानदेय भी देती है। उनका भाई यहां मंदिर परिसर में साफ सफाई का कार्य देखते है। अर्थात उनके भाई की यहां मौजूदगी रहती ही है। मंदिर प्रांगण से ऊपर टिहरी, चंद्रबदनी और गजा, रानीचौरी तक नजर जाती है। नीचे की तरफ हरिद्वार, ऋषिकेश, जौलीग्रांट, डोईवाला तक नजर पहुंचती है। कुंजापुरी मंदिर के प्रांगण से पहाड़, नदी, तराई क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत ही सुंदर विहंगमयी दृश्य देखने को मिलता है।
जी हां! पता चला कि 24 मई को इसीलिए पुलिस प्रशासन सख्त था कि उक्त दिन 20 देशों के 36 लोग जी-20 की बैठक के लिए नरेंद्रनगर पहुंच रहे थे। पर वापसी वक्त रास्ते में हमें वही सन्नाटा दिखाई दिया। कोई भी ढाबा यहां आज खुला हुआ नहीं था। खुलता भी कैसे वह तो जी-20 के आयोजको ने तब तक के लिए बंद करवा रखा था। यही नहीं रास्ते में सभी ढाबों को जी-20 के बैनरों से पाटा हुआ था। यह यात्रा देहरादून से चंबा, चूरेड़धार गांव तक ही थी जो मात्र 90 किमी यानी आना जाना 180 किमी है। मगर हम एक दिन रात्रि विश्राम के लिए नई टिहरी गए तो यात्रा कुल 210 किमी की थी। यात्रा के दौरान मोटर मार्ग की हालात पूर्व से कई गुना अच्छी व सुधरी हुई मिली है।



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