Sunday, June 29, 2014

 सरहद पार व्यापार कभी था गुलजार अब है विराना


किसी ने कहा है जहां हम खड़े हैं देश वहीं से शुरू होता है .परन्तु मैं जहां रहता हूँ  वहाँ देश खत्म होता है .और यह सिर्फ मुहावरे के तौर पर ही नहीं बल्कि सचमुच ही .जोशीमठ भारत के सीमा का आखिरी प्रखंड है .इसकी सीमा फिर तिब्बत या चीन से मिलती है .और जिस तरह यह भौगोलिक तौर पर हाशिए पर यानी सीमान्त पर है उसी तरह विकास के पैमाने पर भी हाशिए पर ही है .
कुछ दिन पहले हम थैंग गांव के लोगों के साथ जोशिमठ  के उपजिलाधिकारी से मिले .सवाल था कि पिछले पांच साल में थैंग मोटर मार्ग तीन किलोमीटर भी पूरा नहीं बन पाया है .जबकि इसे २०११ में १० किलोमीटर बन कर पूर्ण हो जाना था .इस सडक के लिए दी गयी राशि जबकि आधी से ज्यादा भुगतान की जा चुकी है .जो सडक बनी भी है उसका हाल ये कि पैदल चलना मुश्किल हो गया है . थैंग गांव जोश्मत से २२ किलोमीटर की दूरी पर बसा गांव है .सडक से लगभग १० किलोमीटर की दूरी है .वैसे जोशीमठ से चाहें तो थोडा नजरों पर जोर डालने पर दिखाई भी देता है .परन्तु आजादी के इतने साल बाद भे सड़क नहीं .जिस सड़क के पूरा होने की बात लोग जोह रहे हैं ,इस सडक के लिए सन २००५ में गांव के लोगों ने आंदोलन किया .आंदोलन के दौर में जब किसी तरह सुनवाई नहीं हुई तो लोगों ने सडक पर जाम लगा दिया .जिस पर तत्कालीन उपजिलाधिकारी के आदेश पर पुलिस ने ग्रामीणों पर लाठीचार्ज कर दिया .जिसमें कई महिलाएं व पुरुष घायल हुए .१७ ग्रामीणों पर मुकदमें हुए .आज भी लोग मुकदमों के फैसले के इन्तजार में हैं .लेकिन जिस के लिए ये सब झेला वो सड़क आज तक नहीं बनी .ऐसा ही गांव है .किमाना सडक से ८-९ किलोमीटर की पैदल खड़ी चढाई वाली दूरी पर .इसके बगल का गांव पल्ला .जखोला .ऐसे कई गांव हैं.
१९६२ से पहले जबकि भारत चीन युद्ध नहीं हुआ था ,जोशीमठ के रास्ते सीमापार ब्यापार होता था .यहाँ से भोटिया ब्यापारी उन और अन्य सामान लेकर जाते और वहाँ से नमक लेकर आते.जोशीमठ नीति माना के दर्रों को जाने व जोड़ने का संधिस्थल होने से ब्यापारिक मार्ग की वजह से व मुख्य पड़ाव तो था ही .मुख्य ब्यापारिक मंडी भी था .जिससे यहाँ के भोटया समुदाय व खेती पर निर्भर अन्य लोगों में समृधि थी .बदरीनाथ यात्रा का पड़ाव होने से इसका और भी महत्व रहा होगा .किन्तु भारत चीन युद्ध के उपरान्त इस स्थिति में बदलाव आया .भोटिया समुदाय जो पूरी तरह इस ब्यापार पर निर्भर था उसके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया .उसे मजबूरन खेती की तरफ रुख करना पडा .जोशीमठ के आस पास अधिकाँश जनजाति गांव आज भी इस झटके से नही उबरे .आज भी अधिकाँश भोटिया बहुल गांवों की स्थिती केसी आदिम जमाने के गांवों जैसी है .लाता से ऊपर के गांवों में जाइए तो आप बाकी दुनिया के हिस्से ही नहीं रह जाते .
१९९८ में भूकंप की त्रासदी के बाद बहुत से गांव जर्जर हो गए .उसके बाद की बरसातों की आपदा के चलते गांव बसावट  लिहाज से असुरक्षित हो गए .लोगों के विस्थापन की मांग करने पर .सरकार द्वारा सर्वे करवाया गया .सन २००७ में प्रशाशन द्वारा बनाई गयी सूची के  अनुसार जोशीमठ प्रखंड के ३० गांव विस्थापन की श्रेणी में रखे गए .१६ -१७ जून २०१३ की आपदा के बाद विस्थापित किये जाने वाले गांवों की संख्या बढ़कर ३६ हो गयी .जोशीमठ प्रखंड में कुल गांवों की संख्या ५२ ही है .जब ५२ में से ३६ गांव विस्थापन की श्रेणी में हों तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भौगोलिक ,भूगर्भिक तौर पर इस क्षेत्र की क्या स्थिति है .प्रशाशनिक व शाशन की हील हवाली का ये हाल है कि .जो गांव पिछले कई सालों से विस्थापन की मांग कर रहे हैं व बहुत दयनीय दशा में गांव में रह रहे हैं उनकी कोई सुनवाई नहीं है .इन्ही में एक गांव है गनाई ,यहां के लोग पिछले कई वर्षों से विस्थापन की मांग कर रहे हैं .पिछले छ माह से लगातार आंदोलन के बाव जूद कोई ठोस पहल इनके विस्थापन को लेकर नहीं हुई .गांव की हालत ये है कि ठोड़ी सी भी बरसात होने पर लोग जाग कर रात काटते हैं .गांव के एक हिस्से दाड्मी में कुछ लोग दो दृ बार घर बना चुके है .और दोनों बार उजाड गए .जब आंदोलन तेज हुआ तो स्थानीय विधायक राजेन्द्र भंडारी राहत के हेलीकाप्टर से गांव पहुँच गए .और १५ दिन में विस्थापन कर देने की घोषणा कर आंदोलन बंद करने को कह कर हवा हो गए .तबसे चार माह हो जाने पर लोग फिर सड़क पर हैं .यही हाल बाकी के विस्थापित होने वाले गांवों का है .१६-१७ जून को पूरी तरह तबाह हो गए गांव भ्युनदार के लोग भी लड़ हार कर थक गए .किन्तु उनके लिए विस्थापन हेतु भूमि का प्रबंध नहीं हुआ .आज वे उजाड गए गांव पुलना में ही किसी तरह गुजारा करने को मजबूर कर दिये गए हैं .
सन २००१ में जोशीमठ के लोग विष्णुप्रयाग परियोजना ,जिसे कि जयप्रकाश कंपनी बना रही थी का विरोध करने सडक पर उतरे .लोगों की मुख्या चिंता इस परियोजना की सुरंग बनाये जाने के लिए किये जा रहे विस्फोटन से क्षेत्र को पैदा हो रहे खतरे को लेकर थी .कुछ दिनों बाद नेर्तत्व कारियों का कम्पनी से समझौता हो गया और विस्फोट अबाध जारी रहे .पूरा क्षेत्र हिलता रहा.आन्दोलन इसकी बाद भी हुए.वादे आश्वाशन भी हुए पर .. ..परियोजना पूरी हो गयी .और कुछ समय बाद २००७ में इन विस्फोटों के परिणाम स्वरूप चाई गांव उजड गया .आज भी गाँव इन दरारों के खतरे में है .किन्तु इसके बाद सन २००४ में एक और परियोजना तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना का सर्वे यहाँ प्रारम्भ कर दिया गया .सर्वे की शुरुआत से ही जनता में इस परियोजना को लेकर आक्रोश था .जिस कारण इसका तभी से तीव्र विरोध होने लगा .जिसकी वजह जोशीमठ की भूगर्भीय स्थिति को लेकर लोगों में आशंका थी .जिसको लेकर १९७६ में बनी सतीश चन्द्र मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट ने आगाह किया था .इसके बावजूद जोशीमठ के नीचे से सुरंग बनाया जाना जनता को गवारा ना था .लिहाजा जबर्दस्त आंदोलन हुआ .इस आंदोलन की वजह से परियोजना का उद्घाटन ,जो कि जोशीमठ में होना था और मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी द्वरा किया जाना था .सारी तैय्यारियों के बावजूद निरस्त करना पडा .बाद में इस परियोजना का उद्घाटन परियोजना स्थल से ३०० किलोमीटर दूर देहरादून में किया गया .और ये सिलसिला यहीं नहीं रुका ,इसके बाद कई अन्य परियोजनाओं को स्वीकृति मिली .आज जोशीमठ प्रखंड में दर्जन भर परियोजनाएं या तो प्रस्तावित हैं अथवा कार्य कर रही हैं .जिन सभी पर स्थानीय लोगों की स्वीकृति बस नाम भर को कागजी खानापूर्ति के बतौर ही ली गयी .इनमें से लगभग सभी पर जनता की आपत्तियां हैं .आंदोलन हैं .
शिक्षा और स्वस्थ्य के सवाल पर भी हाशिए पर ही है जोशीमठ .सुदूर गांवों की शिक्षा की हालत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि अधिकाँश वहन कर पाने वाले लोग बच्चों को जोशीमठ नगर में लाकर पढाते हैं और नगर की शिक्षा प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं के हवाले है .५० -६० हजार की आबादी वाले जोशीमठ ब्लोक का एक मात्र प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र जोशीमठ में है .जिसमें चिकित्सकों का अभाव है .एक भी सर्जन नहीं है .महिलाओं के लिए बना अस्पताल वीरान बाजार पडा है .जबकि यात्रा काल में सडक दुर्घटनाओं के लिए अत्यंत संवेदनशील ये क्षेत्र इसी अस्पताल के भरोसे है जो सामान्य दिनों में ही रेफेरिंग सेंटर की तरह काम करता है .
देश की सेमा पर अत्यंत संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्र माना गया ये क्षेत्र तमाम तरह की उप्क्षाओं के चलते आज पलायन की तरफ अग्रसर है .गांवों से शहर की तरफ आने वाली आबादी में पिछले पांच सालों में तीव्र वृधि हुई है .सीमा के गांव अचानक तेजी से खाली होने शुरू हुए हैं .अपने बेहतर भविष्य की तलाश में ये संक्रमण तेजी से फैल रहा है .राज्य बन्ने के बाद एक एक कर टूटते सपनों के साथ व विकास की जन विरोधी नीतियों के चलते ये बढ़ेगा ही .फिर शायद हाशिए तो रहेंगे पर हाशिए पर रहने वाले ना रहें . -

हरीश चन्द्र - चन्दोला के साथ प्रेम पंचोली

Friday, June 27, 2014

2014 के पंचायत चुनाव में भी बरकार रहे 60 साल पुराने वादे


प्रेम पंचोली
राज्य में हुए पंचायत चुनाव में कुल 57 हजार प्रत्यशियों के लिए इस दौरान 33 लाख लोगो ने मतदान किया है। इनमें भी राज्य के 1006 ग्राम प्रधान र्निविरोध, 171 क्षेत्र पंचायत सदस्य व 03 जिला पंचायत सदस्य भी र्निविरोध चुने गये थे। निर्विरोध चुनाव की प्रक्रिया इस पहाड़ी राज्य में पारंपरिक है। इस राज्य में लोग पारस्परता के अनुसार अपने दैनिक कार्यो को संपन्न करते हैं। इसी परस्परता की मिशाल है कि इस दौरान 1006 पंचायत प्रतिनिधि निर्विरोध चुनकर आये हैं। ज्ञांत हो कि देहरादून, हरिद्वारा, उधमसिंहनगर व नैनीताल जैसे शहरो से सटे गांव में प्रधान, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत तो दूर वार्ड सदस्य तक के चुनाव में लोग ऐड़ी चोंटी तक का जोर लगाते है। पहाड़ी जनपदो के लगभग सभी गांवों में वार्ड सदस्यो का कोई चुनाव नही हुआ है। सभी निर्विरोध चुने गये हैं। यहां तक कि उपप्रधान का भी चुनाव सर्वसम्मति से किया जाता है।
उल्लेखनीय हो कि जिस तरह से शिक्षा का प्रसार बढता जा रहा है उसी तरह संसाधनो का फिजूल व बेजा इस्तेमाल चुनाव के दौरान ज्यादा दिखाई दे रहा है। इस संवाददाता ने उतरकाशी के लगभग 50 ग्राम पंचायतो का भ्रमण किया तो चुनाव के दौरान एक ग्राम प्रधान के चुनाव प्रचार के खर्च का बजट दो लाख से लेकर नौ लाख तक बताया जा रहा था। हालांकि यह कहीं भी प्रमाणित रूप से नजर नहीं आता परन्तु संभावित उम्मीदवार लगातार शराब, मांस व नगदी के रूप में अपने मतदाताओं के पास उपस्थित होता है। इसका लेखा-जोखा आपको कहीं भी दिखाई नहीं देगा। इस संबध में जब मतदाताओं को टटोला गया तो एक ही जबाव सुनने को मिला कि चुनाव जीतने के बाद ये प्रतिनिधि नजर तो दूर मूलभूत समस्याओं के प्रति इनका मोहभंग हो जाता है। ये प्रतिनिधि पांच वर्ष तक अधिकारी कर्मचारियों के इर्द-गिर्द ही नजर आते है। देहरादून की एक नामी-गिरामी प्रीटिंग प्रेस में पंचायत प्रतिनिधियों के पर्चे छप रहे थे। प्रेस के प्रबन्धक ने इस संवाददाता को प्रुफ रीडिंग के लिए कहा तो अमूमन सभी के पर्चे गांव में पेयजल, विजली, शिक्षा, स्वास्थ्य व सड़क जैसी सुविधा को जीतने के बाद गांव में पंहुचाना चाहते हैं। किसी के पर्चे में इस बात का जिक्र तक नहीं था कि वे गांव मे ही स्वरोजगार के साधन उपलब्ध करवायेंगे, विकास के कामो की जानकारी बार-बार ग्रामीणो को दी जायेगी, मनरेगा को गांव स्तर पर सौ प्रतिशत क्रियान्वित किया जायेगा। इन्ही पर्चो में से जिला पंचायत प्रतिनिधियो के जो पर्चे थे वे ऐसी घोषणा कर रहे थे कि उनके चुनाव जीतने के बाद गांव में रेल व हवाई सेवा आरम्भ हो सकती है। कुलमिलाकर पंचायत प्रतिनिधि बनने की जो होड़ लोगो में लगी थी वह कहीं न कहीं यह इंगित कर रहा था कि पांच वर्ष तक रोजगार तो मिल ही जायेगा। जनता की समस्या की चिन्ता व जनप्रतिनिधि की क्या जबावदेही है। इनसे सर्वाधिक चुनाव लड़ने वाले प्रत्यशियों का कोई लेना-देना नजर नहीं आया। एक बात स्पष्ट रूप से नजर आई कि हर किसी प्रत्याशी पर राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के कार्यकर्ताओ की पैनी नजर लगाई हुई थी।
ताज्जुब हो कि आज तक की सरकारों ने गावं में स्वास्थ्य व शिक्षा की सुविधा को पुख्ता इन्तजाम तक नहीं कर पायी है और ना ही गांवो को स्वावलम्बी बना पाये। मगर चुनाव में जिस तरह से सरकार में बैठे नुमाईंदे हर किसी पंचायत प्रतिनिधि को अपने पक्ष में करने की जोर अजमाईश करते दिखते है वह उन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। अब देखना यह है कि राज्य में इस दौरान चुनाव जीतकर सर्वाधिक पंचायत प्रतिनिधि उच्च शिक्षित हैं। क्या ये लोग गांव की मूलभूत समस्यायो का समाधान कर पायेगे। यह यक्ष प्रश्न है।
जनपदवार चुने गये निर्विरोध ग्राम प्रधान -
उत्तरकाशी - 99, देहरादून - 116, टिहरी - 183, पौड़ी - 101, रूद्रप्रयाग - 33, चमोली - 58, बागेश्वर - 43, नैनीताल - 50, अल्मोड़ा - 212, पिथौरागढ - 82, चम्पावत - 21, ऊधमसिंहनगर - 08।

...............बरसाती पानी का बुलबुला और उत्तराखण्ड राजधानी का मसला


प्रेम पंचोली
गैरसैण में तीन दिन तक चलने वाली विधानसभा ने एक बार फिर लोगो में राजधानी को लेकर उम्मीदें बढा दी है। यह वकाया उस पानी के बुल-बले की तरह है जो बरसात के दिनो में तुरन्त पैदा होता है और बरसात ना हो तो बुल-बुले का नामोनिशां ही नहीं होता है। अर्थात राज्य में इन दिनों एक के बाद एक चुनाव हो रहे हैं। पहले लोकसभा चुनाव तो उसके तुरन्त बाद पंचायत के चुनाव। लोकसभा चुनाव में भाजपा से भारी शिकस्त खाने के बाद कांग्रेस सोच रही है कि शायद गैरसैण के बहाने लोगो का रूझान कांग्रेस की तरफ बनेगा। उधर कांग्रेस को अपनो से ही डर का खतरा बना हुआ है कि यदि गैरसैण को पूर्ण राजधानी का दर्जा दिया भी जाये तो उनकी अपने ही कुछ कार्यकर्ताओ से क्षेत्रवाद का फासला बन सकता है। राजधानी के मुद्दे पर कांग्रेस ही नहीं भाजपा समेत अन्य राजनीतिक दलो की स्थिति कमोबेश एक जैसी ही नजर आ रही है।
गैरसैण में राजधानी के मायने राजनेताओ को बखूबी समझ में आते है। यही वजह है कि राजधानी उन्हें देहरादून के अलावा अन्य कोई उपयुक्त जगह नजर नहीं आ रही है। उन्हे हवाई जहाज से उड़ना है। रेल का सफर करना है। रात में कहीं तो दिन में कहीं उनका सफर कटता है। कुलमिलाकर राजनेताओं को इस राज्य के विकास के लिए कुछ करने की नहीं बजाय सफर करने की ज्यादा चिन्ता बनी रहती है। पिछले दिनो गैरसैण में हुए तीन दिन के विधानसभा सत्र से यही मालूम होता है कि राजधानी के मसले पर सदन में कोई गम्भीर चर्चा तक नहीं हुई है। उल्टे विपक्षी दल सड़को पर आकर अपना विरोध करने के अलावा कुछ नहीं कर रहे थे। आरोप-प्रत्यारोप का इतना विभत्स चेहरा नजर आया कि सभी माननीय चुप्पी और एक दूसरे पर आरेप लगाने में मशगूल थे। राजधानी के साथ-साथ पहाड़ के महत्वपूर्ण मुद्दे पलायन, रोजगार, यातायात व बिजली, पानी, सड़क एवं प्राकृतिक आपदाऐं विधान सभा सत्र के हिस्से नहीं बन पाये। इस दौरान भी दूरदराज के लोग खबरो पर टकटकी लगाये बैठे थे कि कब रोजगार पर सरकार पारदर्शी नीति ला रही है। पहाड़ के शिक्षित बेरोजगार सरकार द्वारा अनुबन्धित रोजगार देने वाली कम्पनीयों और ऐजेंसियो के शिकार हो रहे हैं। जो शिक्षित बेरोजगार घूस देगा वही सरकारी सेवा प्राप्त कर पायेगा वह भी कुछ समय के लिए। अब वह नियमित रोजगार की मांग भी नहीं कर सकता है। जिसका ताजा उदाहरण अस्थाई राजधानी देहरादून में धरने पर बैठे कुछ शिक्षित बेरोजगार हैं। इसी तरह पलायन को लेकर भी सदन में कोई गम्भीर चर्चा नहीं हुई। ऐसे अनसुलझे सवाल आज भी पहाड़ी गांव में बसे लोगो के जेहन में कौंधते नजर आ रहे हैं।
गौरतलब हो कि गैरसैण को आन्दोलकारियो ने 1992 में ही राजधानी घोषित कर दिया था। गैरसैण के पक्ष में यह जनभावना ही थी कि जिसकी वजह से देहरादून को भी स्थाई राजधानी का दर्जा नहीं मिल पाया। 13 वर्षो से राजधानी का वादा निभाते-निभाते देहरादून भी राजधानी का दावा पुख्ता कर चुकी है। राजधानी चयन आयोग भी इसी भंवर में फंस गया था। हालांकि आयोग ने दिल से गैरसैण और दिमाग से देहरादून को राजधानी का दर्जा देने की पैरवी तक कर डाली। हुक्मरानो को यह अब तो स्पष्ट करना पड़ेगा कि प्रदेश में दो राजधानियों की व्यवस्था होगी या जनभावनाओं के सम्मान के तर्क के आगे सरकार झुकेगी।
देश में अकेले जम्मू-कश्मीर में ही दो अधिसूचित राजधानियां हैं। उसकी वजह भी साफ है कि श्रीनगर वाली राजधानी में सर्दी के मौसम में कार्य करना मुश्किल हो जाता है। लिहाजा इस मौसम में राजधानी जम्मू में आ जाती है। जानकारो की माने तो यह प्रयोग उत्तराखण्ड में दोहराये जाने की कोई बड़ी वजह नहीं है। छोटे राज्य के लिए पूरे लाव-लश्कर को एक खास समय गैरसैण ले जाना फायदेमंद नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर यदि गैरसैण को राजधानी का दर्जा मिलता है तो नयी राजधानी बनाने में लगभग तीन हजार करोड़ रूपये का खर्चा जुटाना होगा। यह कदम भी शायद पहाड़ व मैदान के ‘‘विष’’ वृक्ष को जड़ से उखाड़ फेकें। गैरसैण के पक्ष में एक तर्क कुमाऊ और गढवाल से उसकी समान दूरी का भी है। अलबत्ता यह तो स्पष्ट है कि गैरसैण में खाली विधानभवन बनाकर और सत्र आयोजित करने से कोई खास फायदा होने वाला हो जो दूर-दूर तलक नजर नहीं आ रहा है। गैरसैण में तीन दिन तक विधानसभा सत्र से यह साफ हो गया है कि गैरसैण में सियासत का रूख वही है जो देहरादून में भी है। देहरादून में रिस्पना के किनारे बने विधानभवन में माननीय नूरा-कुश्ती में उलझे रहते हैं। यही हाल अगर गैड़ गांव के किनारे किनारे रहता है तो गैरसैण में विधानसभ के सत्र बेईमानी ही सबित होंगे।

दवाई मिल जाती है भैजी, वह डा॰ हो या स्वीपर, उन्हे क्या मालूम


प्रेम पंचोली
   
मरीज के साथ-साथ पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाएं भी दम तोड़ रही है। पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर रैफर शब्द मरीज को दम तोड़ने के लिये मजबूर कर देता हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए राज्य सरकार प्रत्येक जिले के एक-एक एैलोपैथिक चिकित्सालयों को पीपीपी मोड़ पर संचालित कर रही है। इन चिकित्सालयों की भी हालात इस कदर है कि वह भी लोगो तक स्वास्थ्य सेवाओं को सही समय पर नहीं पंहुचा रहे है। थोड़ी सी गम्भीर विमारी के लिए मरीज को रैफर कर दिया जाता है।

सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के मुख्यालय में स्वास्थ्य सेवाऐं दम घोंट रही हैं। यहां तैनात चिकित्सक अपनी नीजि प्रैक्टिस को ज्यादा तरजीह दे रहे है। उदाहरणस्वरूप पिछले दो वर्षो से यहां पैथोलाॅजी विभाग काम नहीं कर रहा है। मरीज को अमूमन बाहर ही खून व पेशाब की जांच करवानी पड़ती है। जिसका भार आम नागरिक को जबरन ढोना पड़ रहा है। जबकि यहां पर सभी प्रकार की तकनिकी सुविधा व कर्मचारी तैनात है। यही नहीं जिला मुख्यालय में एक मात्र चिकित्सालय होने के कारण कई बार प्रसव पीड़ीता को देहरादून रैफर किया गया है। कई बार मरीज को भर्ती कराया जाता और सायं होते-होते जिला मुख्यलाय के अस्पताल के डा. ने मरीज को दून के लिये रैफर करने का फरमान सुना दिया। इतना ही नहीं यहां जो जांच सरकारी अस्पताल में हो सकती उन्हें जबरन निजी स्वास्थ्य केन्द्रो में सरकारी चिकित्सक की सलाह पर किया जाता है। इस प्रकरण की पूर्व में कई बार जांच भी हुई। जांच पर कार्यवाही तो दूर जांच का हस्र यह हुआ कि उल्टे नीजि स्वास्थ्य केन्द्रो में बाढ सी आ गयी।

सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के छ विकास खण्ड मोरी, पुरोला, नौगांव, चिन्यालीसौड, डुण्डा, भटवाडी में छः सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं। इन केन्द्रो की हालात भी मुख्यालय के चिकित्सालय से और बदस्तूर है। मामूली प्रसव करवाने के लिये यहां के लोगों को 150 किमी से लेकर 250 किमी दूर देहरादून जाना पड़ता है। जबकि विकासखण्ड मुख्यालय नौगांव के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र को पीपीपी मोड़ पर दिया जा चुका है। फिर भी स्वास्थ्य सेवाओ का रोना क्षेत्र में यथावत बना हुआ है। गांव-गांव में बने स्वास्थ्य केन्द्र भी चिकित्सक के अभाव में खाली पड़े हैं। जिले का एक भी स्वास्थ्य केन्द्र ऐसा नही हैं जहां चिकित्सक की तैनात हो यदि किसी केन्द्र पर चिकित्सक की नियुक्ती भी होगी तो वह अपनी सेवाये शहरो में ही दे रहा है। लगभग सभी स्वास्थ्य केन्द्र वार्ड बाॅय और स्वीपर की देख-रेख में संचालित हो रहे हैं।

उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से लगभग 120 किमी दूर कफनौल गांव में ऐलोपैथिक चिकित्सालय है। जिसकी स्थापना 70 के दशक में हुई थी। चिकित्सालय में एक सर्जन, एक वरिष्ठ चिकित्सक, दो फार्मसिस्ट, दो नर्स, दो वार्ड बाॅय एक स्वीपर व चपरासी के पद सृजित हैं। पिछले 15 वर्षो के अन्तराल में यहां कभी वार्ड बाॅय तो कभी फार्मसिस्ट ही चिकित्सालय में दिखाई दिये हैं। अधिकांश इस केन्द्र को स्वीपर ही संचालित करता है। चिकित्सक को तो यहां पर लोगो ने कभी देखा ही नहीं है। इस ऐलोपैथिक चिकित्सालय की सेवा आस-पास के छः गांवो की 5000 की जनसंख्या को पंहुचना था। गांव की पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्या अम्बिका चैहान कहती है कि उन्होने कई बार क्षेत्र पंचायत की बैठक में इस मुद्दे पर प्रस्ताव रखा मगर कार्यवाही के नाम पर कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। पास की ठोलिंका गांव की मंगला देवी कहती है कि उन्हे तो किसी चिकित्सक के बारे में मालूम नहीं है। परन्तु जो चिकित्सक अस्पताल में मौजूद है वह दवायी दे ही देता है। वह तो इस संवाददाता से उल्टे सवाल करने लग गयी कि इस चिकित्सालय की इतनी बड़ी-बड़ी इमारते क्यो बनायी गयी होगी? जबकि यहां एक ही व्यक्ति मौजूद रहता है। लब्बोलुबाम यह है कि ग्रामीणो को यही मालूम है कि यहां एक ही व्यक्ति रहता है वही चिकित्सक है। ज्ञात हो कि कफनौल गांव में ऐलोपेथिक चिकित्सालय का भवन है, डिस्पेन्सरी है, सभी कर्मचारियों के लिए आवास हैं। अर्थात व्यवस्था तो पूरी है मगर सुविधा अधूरी ही है। स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर कफनौल गांव का उदाहरण राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ही काफी है।

गौरतलब हो कि पोस्टिंग, प्रमोशन, व पनीशमेंट जैसा फार्मूला कभी लखनऊ से संचालित होता था सो अब पहाड़ में चढाया जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं को पीपीपी मोड़ पर राज्य सरकार ने राज्य के 15 चिकित्सालयो को प्रयोग के तौर पर दे दिया है। पीपीपी मोड़ पर दिये गये अस्पतालो ने छः माह में अपनी कोई खास उपलब्धी नहीं दिखा पायी। लोग आज भी पूर्व की समस्याओं में फंसे नजर आते है। राज्य गठन के 13 साल बाद भी भाजपा-कांग्रेस की सरकार ने पहाड़ में डाॅ. तो नहीं चढा़ सकी परन्तु पहाड़ के चिकित्सालयों को ठेके पर जरूर दे दिया है। पीपीपी मोड़ पर दिये गये सामुदायक स्वस्थ्य केन्द्रो को राज्य सरकार एक प्रयोग तौर पर देख रही है। उस के कुछ समय बाद राज्य की सम्पूर्ण स्वास्थ्य सेवाऐं पीपीपी मोड पर दिये जाने का षडयन्त्र राज्य सरकार बुन रही है। बताया जा रहा है कि सरकार शिक्षा को भी पीपीपी मोड़ देनी की योजना बना रही है। कई और विभाग भी पीपीपी मोड़ में आ सकते हैं। अब सवाल उठता है कि जब सारी सेवाऐ पीपीपी मोड से ली जायेगी तो सरकार का काम क्या होगा? यह कौतुहल का विषय है।


-ः राज्य के 15 चिकित्सालय पीपीपी मोड़ में
-ः जिला मुख्यालय के स्वास्थ्य केन्द्र भी करते हैं मामूली से मरीज को रैफर
-ः पहाड़ के स्वास्थ्य केन्द्र चिकित्सक विहीन
-ः पहाड़ में वार्डबाॅय और फार्मसिस्ट के भरोसे है सर्वाधिक स्वास्थ्य केन्द्र




न यात्रा ना पुनर्निर्माण और ना ही जुबान सिर्फ विज्ञापन



देहरादून/प्रेम पंचोली

उत्तराखण्ड में पिछले वर्ष की आपदा के घाव आज भी जस के तस हैं कि सरकार ने चारधाम यात्रा को सुचारू रूप से आरम्भ करने का बिगुल फूंक दिया है। मई की 15 तारिख तक केदारनाथ और इसके आस-पास के क्षेत्रो में चार से 10 फिट बर्फ की चादर बिछी हुई थी। इस दौरान मौसम की बेरूखी का जायजा लगाना भी मौसम विभाग के विपरित ही जा रहा है। थोड़े से मौसम खराब होने पर इन चारो तीर्थ स्थलो पर बर्फ गिरनी शुरू हो जाती है। यही नहीं यात्रा आरम्भ हो चुकी है परन्तु रास्तो और मूलभूत सुविधाओ की समस्या बढती ही जा रही है। फिलवक्त सरकार की जीद पर इस वर्ष की यात्रा आरम्भ हो गयी है।
ऋिषिकेश से यात्रा आरम्भ करने वाले यात्री यानि केदारनाथ व बद्रीनाथ की तरफ जाने के लिए श्रीनगर व यमनोत्री जाने वाले यात्री बड़कोट, गंगोत्री जाने वाले यात्री धरासू बैण्ड तक का सफर कुछ सकून से तय कर सकते है। मगर इसके बाद तो रास्ते में कोई यात्री फंसने पर सूकूनभरी रात नहीं गुजार सकता है। गौरीकुण्ड से केदारनाथ तक के पैदल सफर में मात्र तीन पड़ाव ही बनाये गये है परन्तु इन पर भी विश्राम हेतु कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार का ध्यान भी चार धामो में से केदारनाथधाम पर ही सिमटा हुआ है। केदारनाथ धाम तक जाने के लिए श्रीनगर, रूद्रप्रयाग, अगस्तमुनी, गुप्तकाशी, फाटा व सितापुर अहम पड़ाव हैं। इसके बाद गौरीकुण्ड और सोनप्रयाग आते है। सरकार का पूरा ध्यान अभी सोनप्रयाग और उससे ऊपर के क्षेत्रों पर केन्द्रीत हैं। जबकि इस पूरे मार्ग पर व्यवस्था दुरस्त करने की आवश्यकता है। गुप्तकाशी और इससे आगे के होटलो पर ताले लटके हुए है। लोग पिछली आपदा के डर के कारण पलायन कर चुके हैं। उधर केदारनाथ का पैदल रास्ता खतरे से खाली नहीं है। यह मार्ग केदारनाथ जाने के लिए बायपास बनाया गया है। हालांकि नेहरू पर्वता रोहण संस्थान ने इस पैदल मार्ग पर निर्माण कार्य लगभग संपन्न कर दिया है। इस पैदल मार्ग का सबसे कठिन डगर लिंचैली से भैरवं गदेरे तक की 400मीटर की खड़ी चढाई है। जिसे पार करने में तीर्थ यात्रियो को भारी कठिनाईयो का सामना करना पड़ रहा है।
यही हालात बद्रीनाथ की तरफ जाने वाले मोटर मार्ग की बनी हुई है। चमोली से लेकर बद्रीनाथ तक यह मोटरमार्ग खस्ता हालात में है। टंगणी, पागलनाला, जोशीमठ, गोविन्दघाट व पाण्डुकेशर आदि जोन थोड़ी सी बरसात होने पर अवरूद्ध हो जाते है। जबकि इस वर्ष जोशीमठ से बद्रीनाथ के लिए गेट सिस्टम को पुनः आरम्भ कर दिया गया है। यमनोत्री और गंगोत्री के हालात तो इन्ही तीर्थो के भरोसे कहे जा सकते है। गंगोत्री जाने के लिए धरासू बैण्ड से लेकर गंगोत्री तक के 120 किमी के सफर में जान हथेली पर रखनी पड़ रही है। यही हालात यमनोत्री जाने वाले रास्ते के हैं। बड़कोट से जानकी चट्टी तक लगभग 52 किमी के मोटर मार्ग पर हर तीन किमी पर खतरा मण्डराता रहता है। यहां सड़क का चैड़ीकरण का कार्य पिछले तीन वर्षो से चल रहा है। सड़क कितनी चैड़ी हुई यह तो सरकार में बैठे नुमाईन्दे अच्छी तरह बता सकते हैं परन्तु इस चैड़ीकरण से लोगो को कितनी कठिनाई से गुजरना पड़ता है यह यात्रा कर रहे लोगो व स्थानीय लोगो के बयान ही काफी है। छटांगा के रविन्द्र सिंह का कहना है कि चैड़ीकरण के दौरान हुई छेड़-छाड़ से पिछले वर्ष की आपदा ने सड़को की सूरत ही बदल डाली है। अब ना तो यह पता चल रहा है कि यह मोटर मार्ग चैड़ा हो रहा है और ना ही यह मालूम हो पा रहा है कि इस मार्ग को फिलहाल यात्राकाल के लिए बहाल किया जा रहा है। कहा कि पिछली आपदा ने इस मार्ग को सौ से अधिक स्थानो पर नेस्तनाबूद किया है। दिल्ली यमनोत्रीमार्ग पर बनास गांव के अजबीन पंवार का आरोप है कि सरकार अपने किये वायदे को पूरा नही कर पा रही है। आपदा को एक साल होने जा रहा है और सरकार के पुर्ननिर्माण के हालात बदस्तूर बने हुए है। कहा कि जब सरकार ने चारधाम यात्रा के मोटर मार्ग ही व्यवस्थित नहीं कर पाये तो और पुनर्वास जैसी स्थिति पर कहना गलत होगा। कर्णप्रयाग के जितेन्द्र कुमार का आरोप है कि सरकार ने लोगो को कहा था कि वे आपदा प्रभावितो को आवश्यक रोजगार और उनका पुनर्वास एक साल के भीतर कर देंगे। मगर आज जिन लोगो ने अपना आशियाना आपदा में गंवाया है वे तहसिलो और पटवारियों के चक्कर काटने में थक हार गये है। कहा कि इसके अलावा यात्रा पड़ाव पर आज मूलभूत सुविधाओं का टोटा बना हुआ है। राशन, चिकित्सा असैर पेयजल की समस्या से तीर्थ-यात्री दो-चार हो रहे है। मोटर मार्ग पर आपदा की भेंट चढे पुल तथा पैदल पुल
भी अब तक तैयार नहीं हो पाये है।
गौरतलब हो कि कांग्रेस के दोनो मुख्यमंत्रियो का ध्यान चारधम यात्रा को पुनः व्यवस्थित रूप से आरम्भ कराने पर है। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से अधिक मुख्यमंत्री हरीश रावत आपदा से नुकसान हुए पुर्ननिर्माण के कार्यो का जायजा कई बार ले चुके हैं परन्तु कार्य की चाल गति नहीं पकड़ रही है। ज्ञात हो कि चारधाम को जाने वाली सड़को का जिम्मा सीमा सड़क संगठन का है। हुआ यूं कि श्री बहुगुणा ने अपने मुख्यमंत्रीत्वकाल में इन सड़को का जिम्मा लोक निर्मा विभाग को सौंप दिया था। बड़ी जद्दोजहद के बाद इन सड़को की जिम्ेदारी पुनः सीमा सड़क संगठन को वापस मिल गयी। इस गड़-मढ झाले के बीच इन सड़को की स्थिती सुधरने के बजाय और ही बिगड़ गयी है। अब ये सड़के कब अपनी हालात पर वापस आती है यह तो समय ही बतायेगा। परन्तु सरकार के एक वर्ष में पुर्ननिर्माण के कार्य पूरे होने पर तो प्रश्नचिन्ह लग ही गया है। यह कहना कठिन होगा कि क्या यात्रा और स्थानीय लोग पिछले वर्ष की आपदा से उबर पायेगे? और यदि सरकार की यही हालात रहेगी तो इस वर्ष की यात्रा विफल होने में समय नहीं लागायेगी। सरकार के पुर्ननिर्माण के दावे को यह व्यवस्था लुंज-पुंज साबित कर रही है। यात्रा पड़ाव पर ना तो यात्रियो के लिए फस्टएड की उचित व्यवस्था है और और ना ही यात्रा मार्गो को दुरस्त किया गया है।

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व्यवसायियों पर भी आपदा का असर

चारधाम यात्रा का पहला पड़ाव ऋिषिकेश है। यहां की आधी आबादी की आजीविका प्रत्येक्ष एवं अप्रत्येक्ष रूप से यात्रा सीजन पर निर्भर है। ऋिषिकेश में टीजीएमओ और जीएमओ जैसी बड़ी बसो की यातायात कम्पनी हैं तो वहीं ट्रेवल ऐजेसियो की संख्या भी हजरो में है। इस लिहाज से यहां मोटर मैकनिकलो की यात्राकाल में अच्छी खासी कमाई है। इस वर्ष की यात्रा आरम्भ होने पर इन कामगारो के चेहरो पर मायूसी है। उनका करोबार इस दौरान मंदी के कगार पर चल रहा है। बस टैक्सियो  के सीट व कबर के कार्य करने वाले मनोज कुमार का कहना है कि पिछले वर्ष तक उनके साथ अन्य चार लोग काम करते थे इस वर्ष तो अपना खर्चा उठाना ही मुश्किल हो गया है। मोटर की बाॅडी मेकर का कार्य करने वाले राजेश शर्मा का तर्क है कि वह दो दशक में पहली बार खाली बैठा हुआ है जबकि उनके साथ पिछले वर्ष तक चार लोग अतिरिक्त कार्य करते थे। डेंट पेन्ट का कार्य करने वाले कमलेश का कहना है कि उन्होने पिछले दस वर्षो में ऐसे दिन कभी नही देखे कि उन्हे यात्राकाल में खाली ही बैठना पड़ेगा। यही हालात टायर ट्यूब के कारोबार करने वाले धनसिंह थलवाल की है। इनका कहना यह भी है कि सरकार में बैठे लोग अपनी जिम्मेदारियो को निभाने में असफल हो रहे रहे है। यही वजह है कि इस वर्ष की यात्रा का शुभारम्भ सुचारू रूप से नहीं हो पाया।

आपदा राहत के नियम कड़े हैं, पिछली आपदा के जख्म आज भी हरें हैं


प्रेम पंचोली
बरसात का मौसम सिर पर है और सरकारी मशीनरी कहीं सोई हुई है। यह वाकाया कहीं और का नहीं वरन् आपदा ग्रसित उत्तराखण्ड राज्य का है। पिछली बरसात ने तो हजारो लोगो की जान लील ली थी। इस वर्ष बरसात के मौसम का आगमन पुल और रास्ते बहने से हुई है। सरकार उत्तराखण्ड पुर्ननिर्माण की बात तो कर रही है मगर आपदा के दौरान लोगो के लिए रास्तो व खाद्य सामग्री के बन्दोबस्त की पहली प्राथमिकता होती है जो अब तक नजर नहीं आ रही है।
पिछले माह के अन्तिम सप्ताह के शुरूआत में हुई मूसलाधार बारिश के कारण सीमान्त जनपद पिथौरागढ के कई गांवों का सम्पर्क जनपद मुख्यालय से टूट गया है। जनपद के तीजम-वतन के बीच सुमदुंग नदी में बने पक्के व कच्चे पुल बह जाने के कारण तीजम, कर्तो, उमचिया, गम, सुमदुंग गांव के 190 परिवारो का देश-ुनियां से सम्पर्क कट गया है। सुमदुंग नदी पर एक पुल ग्रामीणो ने बनाया था दूसरा आपदा के बजट से बनाया गया पक्का सीसी का पुल भी पहली बरसात ने बहा के ले गया है। अब क्षेत्र में खाद्य सामग्री पंहुचाने की बड़ी समस्या खड़ी हो गयी है।
उधर रूद्रप्रयाग में मंदाकिनी नदी पर आपदा राहत के दौरान बनाया गया अस्थाई पुल भी साल की पहली बरसात ने बहा के ले गया है। यह पुल केदारनाथ राष्टीय राजमार्ग पर स्थित चन्द्रापुरी में बनाया गया था। पुल के बहने से उस छोर पर बसे गांव नैलीकुण्ड, डालसिंगी, क्यार्क, सगूण, अरखुण्ड, कौशलपुर, नैणी, पौण्डार, बसुकेदार, हाट, पाली, रयांसू, और वीरों सहित लगभग एक दर्जन से भी अधिक गावों के लोग अब जिला मुख्यालय रूद्रप्रयाग नहीं आ सकते हैं। बताते चलें कि पिछले माह जून में आई आपदा के नौ माह के बाद लोनिवि ने 11 लाख रूपये की लागत से इस अस्थाई पुल का निर्माण किया था। नैली गांव के विश्वमित्र भट्ट का कहना है कि पुल के बहने से सर्वाधिक परेशानी इस तरफ बसे गावों के ग्रामीणो को तो होगी ही अलबत्ता यहां के दर्जनो गावं से स्कूल जाने वाले विधार्थी अब गांव में ही फंस गये हैं। उन्होने कहा कि उनके गावों का शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर बाजार की जरूरत भी चन्द्रापुरी व विजयनगर में जाकर ही पूरी होती है। अब पुल बहने से जहां स्कूली बच्चे गावं में कैद हो गये वहीं दैनिक वस्तुओ जैसी खाद्य सामग्री की आपूर्ती बाधित हो गयी है। कहा कि पिछले वर्ष आई आपदा के कारण स्कूली बच्चे अपने विद्याालय चन्द्रापुरी व विजयनगर नहीं जा पाये और अधिकांश विधार्थी इस वर्ष फेल हो गये हैं। हालांकि रूद्रप्रयाग में तैनात लोनिवि के मुख्य अभियन्ता प्रवीन कुमार का कहना है कि वे अब चन्द्रापुरी में मोटर से चलने वाली ट्राली जल्दी लगवा रहे हैं। ताकि लोगो की आवा-जाही बाधित ना हों। इस हेतु उन्होने सहायक अभियन्ता को निर्देश दे दिये हैं।
इसी तरह उत्तरकाशी जनपद मुख्यालय के हालात भी खतरे से खाली नहीं हैं। जिला अधिकारी कार्यालय से महज 500 मीटर की दूरी पर स्थित बसे तिलोथ गांव पर फिर खतरा मंडराने लग गया है। पिछले वर्ष की बरसात ने तो गावं का अमन चैन छीन लिया था। खानापूर्ती के अन्दाज में हुए बाढ सुरक्षा के कार्यो की पोल साल की पहली बरसात ने खोल दी है। तिलोथ गांव के लोग रात को चैन की नींद भी नहीं सो पा रहे हैं। दिन होे या रात उनकी निगाहें भागीरथी की जलधारा पर टीकी है। भागीरथी की जलधारा यदि पिछले वर्ष की तरह ऊफान पर आ जाये तो गांव कभी भी भगीरथी में समा सकता है। जनपद के खरादी नामक स्थान पर यमुना नदी पर वर्षो पुराना झूला पुल पिछली बरसात की भेंट चढ गया था। इस कारण धारमण्डल क्षेत्र के स्यालब, सुकण, गौल, फूलधार, कुर्सिल, थान गांव अलग-थलग पड़े हैं। हालांकि जिला प्रशासन ने इन गावों की सुविधा के लिए ट्राॅली लगवा रखी है। परन्तु इस ट्राॅली पर आवाजाही करना खतरे से खाली नही हैं। ग्रामीण रामप्रसाद विजल्वाण, रणवीर सिंह का आरोप है कि आपदा के एक साल बितने के बावजूद भी प्रशासन ने यहां पुनः झूलापुल लगवाने की पहल तक नहीं की है।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...