Sunday, September 16, 2018

मानवजनित प्राकृतिक विदोहन से बढ़े मौसम परिवर्तन के खतरे

मानवजनित प्राकृतिक विदोहन से बढ़े मौसम परिवर्तन के खतरे 

प्रेम पंचोली 

मध्यांचल फोरम इन्दौर और माण्टेन फोरम हिमालय देहरादून के संयुक्त तत्वाधान में ‘मौसम परिवर्तन अनुकूलन एवं हिमालय समुदाय’’ विषय पर तीन दिवसीय सेमिनार देहरादून में संपन्न हुयी है.  तीन दिन तक राज्य के विभिन्न जगहो से आये प्रतिभागीयो ने हिमालय क्षेत्र में हो रहे प्राकृतिक परिवर्तन पर चिन्तन किया। सेमिनार का उद्घाटन करते हुए प्रमुख वन संरक्षक उतराखण्ड जयराज ने कहा कि पिछले 10 वर्षो के दौरान वन संरक्षण में लोगो की भागीदारी कम ही हो रही है। इसलिए फिर से समुदाय और जिम्मेदार विभाग को आपसी समन्वय से वन संरक्षण के कार्यो को आगे बढाना होगा.  उन्होने कहा कि मौसम परिवर्तन का कारण प्राकृतिक है, परन्तु प्राकृतिक संसाधनो के सरक्षण के लिए लोगो को संवेदनशील बनना होगा।

उल्लेखनीय है कि इस दौरान हिमालय क्षेत्रो में हो रहे मौसम परिवर्तन को लेकर मध्यांचल फोरम इन्दौर और माण्टेन फोरम हिमालय देहरादून के संयुक्त तत्वाधान में एक अध्ययन किया गया है। अध्ययन रिपोर्ट को प्रस्तुत करते हुए लोगो ने कहा कि रिपोर्ट में जो सवाल उठाये गये है वह लोगो की दिनचर्या बनती जा रही है। लोग अपने प्राकृतिक संसाधनो से विमुख होते जा रहे है। प्रतिभागियो ने सवाल खड़ा किया कि जब से प्राकृतिक संसाधनो पर सरकारी हस्तक्षेप बढे  है, तब से लोगो के दिलो में वन, जल, व जमीन के प्रति खौप जैसी समस्या पैदा हुयी  है। नतिजा यह हुआ कि प्राकृतिक संसाधनो पर व्यापारिक प्रभाव सर्वाधिक बढे  है। इसलिए मौसम परिवर्तन के खतरे आज मुहंबाये खड़े है।

इस दौरान प्रो. विरेन्द्र पैन्यूली ने कहा कि उत्तराखंड राज्य में वन विभाग जलवायु परिवर्तन की नोडल एजेन्सी है इसलिए विभाग को जनता का विश्वास जीतना होगा। जलवायु परिवर्तन के न्यूनिकरण एवं अनुकूलन के लिए आगामी रणनीति और कार्यक्रमोें पर भी चर्चा की जायेगी। कहा की वन विभाग जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर सघनता से काम कर रहा है। जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के निर्माण में वन विभाग की मुख्य भूमिका रही है।

इस दौरान माउन्टेन फोरम के सुरेश सतपथी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव आंकलन के लिए हिमांचल और उतराखण्ड में 36 गांवों का एक अध्ययन किया गया है। जिसमें 14913 लोगो का साक्षात्कार लिया गया है।
मध्यांचल फोरम के सन्तोष सामल ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनो का दोहन और संरक्षण लोक सहभागिता से होना चाहिए ताकि पर्यावरण का सन्तुलन बना रहे। उन्होंने कहा की प्राकृतिक आपदा का सर्वाधिक दंश निम्न वर्ग के लोगो को भोगना होता है।


पर्यावरण कार्यकर्ता द्वारिका प्रसाद सेमवाल ने बताया कि लोगो का रूझान नगदी फसल की तरफ तो बढा है परन्तु शुद्ध पेयजल की समस्या भी बड़ी तेजी से बढ़ी हैं। कहा की मनरेगा के तहत बनने वाली चालखाल को वनो और जगलो के बीच बनाने के प्रयास किये जाये। इसके लिए ग्राम पंचायतां को स्वतन्त्र अधिकार दिये जाये। सामाजिक कार्यकर्ता नागेन्द दत ने सुझाव दिया कि ग्राम स्तर पर जो महिलाओ के समूह है उन्हे वनाग्नी के कामो से जोड़ा जाये। ताकि वन संरक्षण के प्रति लोक सहभागिता बढ़ सके। 

इस दौरान ‘मौसम परिवर्तन अनुकूलन एवं हिमालय समुदाय’’ नाम से एक अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट में बताया गया है कि पहाड़ी क्षेत्रो में पारंरिक खेती में कमी आई है, रासायनिक खादो का प्रचलन भारी मात्रा में बढ़ा है, नगदी फसलो का प्रचलन तो बढ़ा  मगर लोगो की निरर्भता बाजार पर हो गयी। जिस कारण पोषण की मात्रा में भारी कमी आई है। रिपोर्ट बता रही है कि इस असन्तुलन के कारण फसल चक्र, बरसात व ऊंचाई के क्षेत्रो में कम हिमपात का होना भी मौसम परिवर्तन का कारण बनता जा रहा है। रिपोर्ट को प्रस्तुत करते हुए किशोर नौटियाल ने कहा कि माउंटेन फोरम हिमालय के द्वारा उत्तराखंड और हिमाचल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिये ग्राम स्तर पर स्वैच्छिक संगठनो के साथ मिलकर अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन में उच्च हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों, कृषि, स्थानीय जन जीवन और मौसम में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले बदलावों और स्थानीय समाज द्वारा उसके न्यूनिकरण व अनुकूलन के उपायों पर समझ  बनाने का प्रयास भी किया गया है। इस अवसर पर उतरकाशी से नागेन्द्र दत, रूद्रप्रयाग से बैसाखी लाल, द्वारिका प्रसाद सेमवाल, वरिष्ठ पत्रकार महिपाल नेगी, सर्वोदय कार्यकर्ता साबसिंह सजवाण, पिथौराग-सजय से सुभाष जोशी, भगवान सिंह, विशन सिंह, कुसुम घिल्डियाल, इण्डिया वाटर पोर्टल के संपादक सिराज केशर, बबीता, मंजू देवी, सरिता देवी, विनिता देवी, खुशपाल सिंह आदि मौजूद रहे.

माउंटेन फोरम हिमायल एक परिचय 


माउंटेन फोरम हिमायल विगत् पन्द्रह वर्षो से पर्वतीय राज्य उत्तराखंड और हिमाचल में स्थानीय स्व-शासन में महिलाओं, वंचित वर्ग और आम जन की भागीदारी को मजबूत करने के प्रयासों को स्थानीय समुदाय, ग्राम स्तरीय संगठन, स्वयं सेवी संगठन और सरकार के साथ मिलकर रचनात्मक कार्य कर रहा है। चुनाव से पूर्व मतदाता जागरूकता अभियान जैसी गतिविधियों के जागरूकता कार्यक्रम चालता है. आपदा प्रबन्धन, स्थानीय स्वशासन और महिला सशक्तिकरण के मुद्दों पर कार्य भी कर रहा है।

Monday, September 3, 2018

पहली बार इल्यूसीन कोराकाना (मंडुवा) उतरा बाजार में

पहली बार इल्यूसीन कोराकाना (मंडुवा) उतरा बाजार में

प्रेम पंचोली 

जैसे-जैसे खाद्य पदार्थो में कीटनाशक पदार्थो का उपयोग बढता जा रहा है वैसे-वैसे बिमारियो ने भी लोगो के शरीर को बिमारी का घर बना दिया है। चिकित्सीय रिपोर्टो के अनुसार सर्वाधिक बिमारी खाने से ही हो रही है। इस खतरे से बचने के लिए लोगो ने वापस अपने पारम्परिक खाद्य सामग्री की ओर लौटना आरम्भ कर दिया है। उत्तराखण्ड में ऐसे उदाहरण दिखाई दे रहे हैं। लोग ने मण्डुवे के आटे से रोटी ही नहीं बल्कि इससे बर्फी व बिस्कुट बनाने आरम्भ कर दिये है। कह सकते हैं कि धीरे-धीरे उत्तराखण्ड पहाड़ में मण्डुवा जैसा मोटा अनाज अब बाजार की शक्ल ले रहा है और लोगो की आमदानी का भी जरिया बन रहा है।

ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड राज्य में मोटे अनाजो में 12 प्रकार की प्रजातियां है, जिसे आम बोल-चाल में बारानाजा भी कहते है। इनमें मण्डुवा एक ऐसी प्रजाति है जिसे लोग अपने बच्चों के लिए अन्नप्रास के रूप में उपयोग में लाते थे। गेंहू की रोटी का जब से प्रचलन हुआ तब से लोग इन पहाड़ों में मण्डुवा का उत्पादन करना भूल से गये है। भारी मात्रा में गेहूं का प्रभाव बढने लगा तो उसमें भी मिलावट की खबरे तेजी से आने लग गई। सो लोग यहां पर मण्डुवा को फिर से पैदा करने के लिए बाध्य हो गये है। धीरे से सही मगर यहां लोगो ने मण्डुवा पैदा करना आरम्भ कर ही दिया है। क्योंकि उनका मण्डुवा अब बाजार का भी रूप ले रहा हैं। एक वर्ष पहले टिहरी गढवाल के रानीचैरी में दो युवको ने मण्डुवा की बर्फी बनाने का प्रयोग किया तो उन्ही दिनो उन्हे एक ही जगह से चार कुन्तल बर्फी का आॅडर मिल गया। कुल मिलाकार मण्डुवा के उत्पादन जैसे बाजार में उतरते है वैसे ही बिक जाते है। पर जितनी मांग बाजार को है उतना उत्पादन यहां हो नहीं रहा है। इसका कारण भी स्पष्ट है कि बीज एक समस्या बनकर उभरी है। अर्थात लोगो ने मण्डुवा का बीज खो चुका था। फिर भी कई वर्षो बाद लोग मण्डुवे के उत्पादन की ओर कदम बढाने लग गये है।

कोदे के बिस्कुट का नाम होगा हिलांस

यदि सबकुछ ठीक-ठाक रहा तो उत्तराखंड का कोदा यानी मंडुआ लोगो को नगदी फसल के रूप में आर्थिक संसाधन उपलब्ध करवायेगा। अतएव अब कोदा एक बार फिर से उत्तराखंडीयों के खेतो में लहलहायेगा। इसकी शुरुआत केंद्र सरकार की तरफ से हो गई है। फिलहाल इस पहल से बागेश्वर जनपद के मोनार गांव सहित 20 गांवों के 952 परिवार जुड़ गए हैं। ये लोग मण्डुवा के आटे से बिस्कुट बनायेंगे। इस बिस्किट को हिलांस नाम से बेचा जाएगा। भारत सरकार के अनुसूचित जनजाति मंत्रालय भारत की टीम ने मोनार में कोदा से बनने वाले उत्पाद का परीक्षण भी कर लिया है। खबर है कि इसी महीने मंत्रालय का ‘‘मां चिल्टा आजीविका स्वायत्त सहकारिता लोहारखेत’’ के साथ अनुबन्ध होगा। आपको बता दें कि मन की बात में पीएम मोदी खुद कोदा की तारीफ कर चुके हैं। क्षेत्र के लोग इस पहल से खासे उत्साहित है और कहते हैं कि इस प्रकार यदि स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के साधन उपलब्ध होंगे तो स्वतः ही पलायन पर रोक लग जायेगी।

केन्द्र सरकार की नई पहल

इधर केंद्र सरकार अब देशभर में 56 आउटलेट्स तैयार कर रही है। ये महज एक शुरुआत होगी। इनमें मंडुए से बने उत्पादों को रखा जाएगा। बताया जा रहा है कि मंत्रालय बिस्किट के सैंपल भी ले गया है। फिलहाल इस मुहिम में प्रत्यक्ष रूप से 8 सदस्य काम कर रहे हैं। उन्हें चार हजार से 12 हजार रुपये तक वेतन मिल रहा है। इसके अलावा इस मुहिम में अप्रत्यक्ष रूप से 20 गांवों के 952 लोग इससे जुड़े हुए हैं। बताया जा रहा है कि सहकारिता के माध्यम से हर साल लगभग पांच लाख से ज्यादा की आय अर्जित होने की संभावना है। मंडुवे के साथ मक्का और चैलाई (मार्छा-रामदाना) के बिस्किट भी बनाए जा रहे हैं। खास बात ये है कि स्वास्थ्यवर्धक होने की वजह से लोग मंडुवे के उत्पादो को खूब पसंद कर रहे है। 250 ग्राम के एक बिस्किट के पैकेट की कीमत 25 रुपये तय की गई है।

ज्ञात हो कि उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के लोहारखेत में 10 हेक्टेयर में मंडुवे का उत्पादन होगा। जहां 10 हेक्टेयर में कलस्टर भी बनाए गए हैं और इनमें मंडुवे की खेती कराई जा रही है। लगभग डेढ़ कुंतल तक बीज लोगों में बांटा गया है। बताया जा रहा है कि इस 10 हेक्टेयर में लगभग 160 कुंतल मण्डुवे का उत्पादन होगा। इधर कपकोट ब्लॉक के 20 गांवों के ग्रामीण मण्डुवा और मार्छा का उत्पादन सदियों से कर रहे हैं। इसे अब दोगुना करने का लक्ष्य सरकार द्वारा तैयार किया गया है। लोहारखेत के आउटलेट्स में ढाई लाख लागत की नैनो पैकेजिंग यूनिट की स्थापना भी की जाएगी। केंद्र सरकार की मदद से इसे बढ़ाया जा रहा है। विशेषज्ञो का कहना है कि इससे पलायन तो रुकेगा ही, साथ ही स्थानीय स्तर पर लोगो को रोजगार भी मिलेगा।

बढ रही है मंडुवे की मांग

काबिलेगौर हो कि उतराखण्ड के मण्डुवे की मांग सात समुन्द्र पार तक हो गई है। अब मण्डुवा लोगो की आजीविका का साधन बनने जा रहा है। मण्डुवे की रोटी आम बात है। चूंकी यदि किसी दूधमुहें बच्चे को जुकाम, खांसी इत्यादि की समस्या होती है तो एक बाउल में पानी ऊबाल कर उसमें मण्डुवे का आटा डालकर उसकी भाप सुंघाना ही रामबाण ईलाज है। कभी मण्डुवे के आटे से स्थानीय स्तर पर सीड़े, डिंडके जैसे पारम्परिक नामों से कई प्रकार की डीस तैयार होती थी जो ना तो तैलिया होती और ना ही स्पाईसी, बजाय लोग इसे अतिपौष्टिक कहते थे। जिन्हे सिर्फ व सिर्फ हल्की आंच के सहारे दो वर्तनो में रखकर पानी के भाप से पकाया जाता है। इसमें चीनी गुड़ और मण्डुवे के आटे के अलावा और कुछ प्रयोग नही होता था। जो पुनः बहाल होने की संभावना में है।
स्थानीय लोग और वैज्ञानिक संस्थाऐं मण्डुवे के आटे और मण्डुवे के दाने को लेकर विभिन्न प्रयोग कर रहे है। देहरादून स्थित कटियार एक मात्र बैकरी है जहां मण्डुवे के आटे से बनी डबल रोटी आपको मिल जायेगी। कटियार बैकरी का कहना है कि मण्डुवे के आटे से बनी डबल रोटी की मांग बहुतायात में बढ रही है, परन्तु वे इस बावत मण्डुवे के आटे की पूर्ती मांग के अनुरूप नहीं कर पा रहे है। इसके अलावा कृषि विज्ञान केन्द्र रानी चैंरी ने मण्डुवे के आटे से बर्फी बनाने का सफल प्रयोग किया है। केन्द्र से प्रशिक्षण लेकर शिक्षित बेरोजगार संदीप सकलानी और कुलदीप रावत ने मण्डुवे की बर्फी को पिछली दीपावली के दौरान बाजार में उतारा है। औषधीय गुणों से भरपूर इस जैविक बर्फी की कीमत 400 रुपये प्रति किलो है। लोग इस मण्डुवे की बर्फी को आॅनलाईन भी आॅडर कर रहे है।

मंडुवे का वैज्ञानिक नाम इल्यूसीन कोराकाना है। वैज्ञानिक और पकवान बनाने के शौकीन लोगो ने मण्डुवे के औषधीय गुण ढूंढ निकाले। अब मंडुवे की पौष्टिकता को देखते हुए कुछ वर्षो से रोटी के अलावा बिस्कुट और माल्ट यानि मण्डुवे की चाय के रूप में भी इसका उपयोग हो रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र, रानीचैरी की विशेषज्ञ एवं मुख्य प्रशिक्षक कीर्ति कुमारी ने बताया कि उनका ध्येय पारंपरिक अनाजों को बढ़ावा देकर किसानों की आर्थिकी को सुधारना है। इसीलिए मंडुवा, झंगोरा आदि मोटे अनाजो के कई उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। मंडुवा की बर्फी इसी का एक हिस्सा है।

ऐसे हुई बर्फी बनाने की शुरुआत

26 वर्षीय संदीप सकलानी ने बीटेक करने के बाद दो साल अकाउंट इंजीनियर के रूप में राजस्थान में नौकरी की। लेकिन, वहां मन न रमने के कारण वह घर लौट आया और कुछ हटकर करने का निर्णय लिया। इसी दौरान 25 वर्षीय कुलदीप रावत से उसकी दोस्ती हो गई, जो स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। दोनों के विचार मिले तो दो वर्ष पूर्व देवकौश नाम से एक कंपनी का गठन किया। इसके माध्यम से उन्होंने फलों व सब्जियों पर आधारित उत्पाद बनाने शुरू किए। इसी दौरान उन्हें पता चला कि केवीके रानीचैरी उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दे रहा है तो उन्होंने भी इसमें भाग लिया और वहां मंडुवा की बर्फी बनानी सीखी।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...