Wednesday, December 26, 2018

दून लिटरेचर फेस्टिवल में नवलेखक, शोधार्थीयों व साहित्यकारो का जामवाड़ा

दून लिटरेचर फेस्टिवल में नवलेखक, शोधार्थीयों व साहित्यकारो का जामवाड़ा


प्रेम पंचोली

साल के अन्त में अस्थाई राजधानी देहरादून के क्रियश्चन अध्ययन केन्द्र के परिसर में आयोजित दो दिवसीय दून लिटरेचर फेस्टवेल में पंहुचे देशभर के साहित्यकारो ने देश और आंचलिक व्यवस्थाओ को कहानी और कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है। अपने वक्तव्य पत्र में साहित्यकारों ने मौजूदा व्यवस्थाओं पर भी शब्दबाण छोड़े है। खोई हुई राजनीतिक चरित्र को भी काव्य व साहित्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया गया है। वहीं इस बहस के बीच शोधार्थीयों ने भी खूब चर्चा का माहौल बनाया है। कहा कि यह एक ऐसा राष्ट्रीय मंच है जिसमें सालभर में समाज अपने प्रतिबिम्ब को देख सकता है। उधर महोत्सव के उद्घाटन करने पंहुचे मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भी साहित्य को समाज का दर्पण बताया है। कहा कि साहित्य और राजनीति एक दूसरे के पूरक है। राजनीतिक भटकाव में साहित्य ही सेतु का काम करता है।

ज्ञात हो कि समय साक्ष्य प्रकाशन और अर्श संस्था के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित दो दिन में समकालीन हिन्दी कविता और महिलाऐं, उतराखण्ड हिमालय का गाथा साहित्य, भारत में लोकतंत्र: सफलता और चिन्ताऐं, मैं घुम्मकड़, भक्तिकाल में हिन्दी साहित्य की आधारशिला, कहानी पाठ, कलम के इतर, दलित साहित्य व लड़ाई के मोर्चे, रेडियों की कुछ बातें कुछ यादें, युवाओं हेतु रचनात्मक कार्यशाला नव लेखन मंच, रचनात्मक लेखन के विविध आयाम, संभावनाओं का संसार जैसे संवेदनशील विषयों पर अलग-अलग सत्र आयोजित हुए है। इसके अलावा रविन्द्रनाथ टैगोर रचित नाटक को गिरदा स्मृति मंच के निर्देशन में ‘पत्नी का पत्र’ व मोहन राकेश लिखित नाटक को अनुराग वर्मा के निर्देशन में कलिंग विजय की सफल प्रसतुति हुई है। जबकि संभव नाट्य परिवार ने महिलाओं की सुरक्षा पर एक नुककड़-नाटक प्रस्तुत कर फिर से समाज को सोचने के लिए बाध्य किया है।

साहित्यकारों के जीवन के किस्से सत्र में सूरज प्रकाश ने कई चर्चित लेखकों के जीवन के किस्सों का जिक्र किया। उन्होंने लेखकों के साथ घटी घटनाओं का जिक्र करते हुए लेखकों के अवसाद भरे जीवन का जिक्र किया। कहा कि लेखकों का शराब के करीब होना दुखदायी है। इससे साहित्य जगत को बड़ी हानि हुई है, जीवन में अवसादों के चलते लगभग 150 साहित्यकार मौत को गले लगा चुके हैं। जिनमें तीन नोबल पुरस्कार विजेता तक शामिल थे। कल्लोल चक्रवर्ती ने जनता के बीच अनुवादों और भाषा की महत्ता साझा की। कहा कि अंग्रेजी साहित्य दूसरे साहित्य के मुकाबले ज्यादा तथ्यपरक होते हैं। इस बीच डा. सुशील उपाध्याय की पुस्तक पत्रकारिता का लाकार्पण भी किया गया। चर्चा के दौरान साहित्यकारों ने कहा कि सोशल मीडिया साहित्य को बढ़ावा देने का एक बड़ा मंच बनता जा रहा है। आज तकनीकि सुविधाओं ने प्रचार आसान कर दिया है। दुनियां के किसी भी कोने में यदि किसी किताब का लाकार्पण होता है, तो मिनटों में दुनिया के दूसरे कोने तक उसकी चर्चा होने लगती है। कोई व्यक्ति किसी किताब को पढ़ कर उसकी समीक्षा सोशल मीडिया पर साझा करता है तो उससे प्रेरित होकर बाकी लोग भी किताब को खरीदने पहुंचते हैं। यहां तक कि कई बार तो किताबों का लाकार्पण ही सोशल मीडिया के ऑनलाइन मंचों पर भी होने लगा है।

राजपुर स्थित क्रिश्चियन रिट्रीट एंड स्टडी सेंटर में आयोजित दो दिवसीय फेस्टिवल में लगभग 650 साहित्यकारों ने अलग-अलग सत्रों में विचार रखे। इसमें सबसे पहले भक्तिकाल हिंदी साहित्य की आधारशिला पर ब्रजेंद्र, सविता मोहन और दिनेश प्रताप सिंह ने विचार रखते हुए कहा कि भक्ति का प्रमुख स्रोत प्रेम है। प्रेम से ही लोगों के विश्वास को जीता जा सकता है। एसआर हनोट, गम्भीर सिंह पालनी, हरिसुमन बिष्ट, कुसुम भट्ट और रुचि शर्मा ने कहानी पाठ किया। कमल के इतर, साहित्यकार के किस्से, दलित साहित्य, कुछ बातें कुछ यादें, पर साहित्यकारों ने खुलकर चर्चा की। इस मौके पर बाल कलाकारों ने नव लेखन मंच में अपनी प्रतिभा दिखाई। बाल कलाकारों ने समाज से जुडे विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे। साथ ही अपने लेख से स्वच्छता और देश प्रेम का संदेश दिया। अलग-अलग सत्रो को क्रमशः डा॰ शुशील उपाध्याय, डा॰ राखी उपाध्याय, कमला पन्त, पत्रकार योगेश भट्ट, पत्रकार संजीव कण्डवाल, साहित्यकार रामविनय सिंह, साहित्यकार बीना बेंजवाल, शिक्षक इन्द्रजीत सिंह, डा॰ राजू मेहर, रूची शर्मा व इस खबर के लेखक ने संचालित किया है।

जबकि अलग-अलग सत्रो को व्यवसायी डा॰ एस फारूख, वयोवृद्ध साहित्यकार अचलानन्द जखमोला, एस सूद, सैयद इरफान, अशोक कुमार, ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, दिनेश प्रताप सिंह, सविता मोहन, हरिसुमन विष्ट, कुसुम भट्ट, सूरज प्रकाश, यासमीन सुल्ताना नकबी, कल्लोल चक्रवर्ती, राजेश पाल, डा॰ एन सिंह, वेद विलास उनियाल, नवनीत गैरोला, कमला भसीन, रश्मी भारद्वाज, पंखुड़ी सिंन्हा, प्रयाग जोशी, नरेन्द्र सिंह नेगी, देवसिंह पोखरिया, गणेश खुगशाल गणी जैसे वरिष्ठ साहित्यकारो ने अलग-अलग सत्रो को संबोधित किया है। इस दौरान साहित्यकार महावीर रंवाल्टा, सुरेन्द्र पुण्डिर, गीता गैरोला, उदय गैरोला, अनिल कार्की, भारती जोशी, कुसुम पन्त, अभिषेक मैन्दोला, आकाशदीप, प्रियंका सकलानी, जयदीप सकलानी, डॉ. राखी बलूनी, रजनीश त्रिवेदी, मुकेश नौटियाल, कृष्णा खुराना, रतन सिंह असवाल, दिनेश कण्डवाल, गौरी सिंह आदि लोगो ने इन साहित्यक सत्रों की चर्चाओं में हिस्सेदारी लेकर माहौल को रूचीपूर्ण बनाने में सहभागीता निभाई है।
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भारती जोशी की एकल नाटक प्रस्तुति को दर्शकों ने पसंद किया। उन्होंने रविंद्र नाथ टैगोर की कहानी पत्नी का पत्र के माध्यम से पुरुष प्रधान समाज में महिला की व्यथा उठाई।
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दून लिटरेचर फेस्टिवल की प्रमुख संयोजिका श्रमती रानू बिष्ट ने बताया कि वे प्रयास कर रहे हैं कि यह एक ऐसा मंच बने जहां साहित्यक विद्या के ज्ञान का आदान-प्रदान हो। फेस्टिवल के समन्वयक प्रवीन भट्ट का कहना है कि स्थापित साहित्य के सृजको और नव लेखको, शोधार्थीयों के लिए यह एक प्रकार का अध्यनात्मक मंच है। उनकी कोशिश रहती है कि ऐसे आयोजन से एक अच्छे साहित्य सृजन का माहौल कायम हो सके।
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युवाओं व छात्र-छात्राओं को लिए इन्टरनेट, सोशल मीडिया, पत्र-पत्रिकाओं व साहित्य के डिजिटिलाईजेशन के इस युग में भी किताबों का अपना महत्व व विश्वसनीयता है। नई पीढ़ी को अखबार, पत्रिकाएं व किताबें पढ़ने की आदत को बनाए रखना चाहिए। साहित्य अतीत व भविष्य को जोड़ता है तथा वर्तमान का मार्गदर्शन करता है। किसी भी लेख या विषयवस्तु का महत्व, विश्वसनीयता व ग्राहयता बढ़ जाती है यदि वह पुस्तक के रूप में है। बच्चों में किताबें पढ़ने की रूचि विकसित करना डिजिटल युग की चुनौती है। युवा पीढ़ी को इन्टरनेट व सोशल मीडिया पर मात्र अपनी रूचि, जरूरत व प्राथमिकता वाली सिलेक्टिव खबरों पर ही फोकस न करे बल्कि समाचार पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों, साहित्य के अध्ययन में भी रूचि ले ताकि उनमें व्यापक दृष्टीकोण विकसित हो। दून लिटरेचर फेस्टिवल जैसे आयोजन के माध्यम से हम परम्पराओं को नहीं ढो रहे बल्कि हम परम्पराओं को आगे बढ़ाने का काम कर रहे है।
- त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखंड
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Sunday, December 9, 2018

संविधान सम्मान यात्रियों के सामने छलक आया उतराखण्ड का दर्द




संविधान सम्मान यात्रियों के सामने छलक आया उतराखण्ड का दर्द


प्रेम पंचोली


गुजरात के गांधीनगर अहमदाबाद से आरम्भ हुई संविधान सम्मान यात्रा इन दिनों उतराखण्ड में है। देहरादून और मसूरी मे विभिन्न स्थानो पर हुई संविधान सम्मान यात्रा की बैठको में स्थानीय कार्यकर्ताओं ने राज्य के विकास में भेदभाव जैसे अवसाद का बढता हुआ खतरा बताया। वक्ताओं ने कहा कि यह देश जातिवाद और क्षेत्रवाद की नासूर बिमार के कब्जे में हो गया है। कहा कि संविधान की मूलधारण की ओर जनता के नुमाईन्दो को लौटना होगा। इस दौरान वक्ताओं ने यात्रा दल के पास विकास से पिछड़ता और भ्रष्टाचार के आगोश में दिखता उतराखण्ड राज्य की दशा का हाल बंया किया है।

ज्ञात हो कि मसूरी की सर्द सुबह संविधान सम्मान यात्रा के नारों से गर्म हुई। यात्रा दल ने सर्वप्रथम बाबा साहब अंबेडकर की स्मृति स्थल पर उनको श्रद्धांजलि दी। इसके बाद उत्तराखंड संघर्ष शहीद स्मृति स्थल मसूरी में श्रद्धांजलि और छोटी सभा आयोजित हुई है। यात्रा दल के प्रमुख समन्वयक भूपेंद्र रावत ने कहा कि यात्रा सुदूर केरल से लेकर राजस्थान के तप्त इलाकों से होते हुए अब हिमांचल और उत्तराखंड के ठंडे इलाकों में चल रही है। कहा कि यात्रा के दौरान देशभर में एक ही समस्या नजर आई है कि देश में ‘‘वाद’’ नाम की बिमारी सबसे पहले राजनीतिक पार्टीयो के हृदय में बैठ चुकी है। जिसका निवारण होने की अब प्रबल संभावना बनती दिख रही है।

इस अवसर पर मेघ सिंह कण्डारी ने कहा संविधान को बचाने की बात बड़ी है, किन्तु हमारे लिए यह नई चेतना है। बीलू बाल्मीकि ने नेताओं पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें मालूम ही नहीं की संघर्ष होता क्या है। ऐसे नेताओं से मुक्ति पाकर बाबा साहब के रास्ते पर आगे बढ़ना होगा। वे आगे कहते हैं कि आज भी दलित समुदाय के लोग पीड़ित एवं उत्पीड़ित होते रहते हैं। जिसे कि राजनीतिक प्रेरित भी कहा जाय तो अतिश्येक्ति नही होगी।

दूसरी ओर संविधान सम्मान यात्रा के यात्रियों का जोरदार स्वागत देहरादून के कचहरी स्थित शहीद स्मारक स्थल पर हुआ। जनगीत मंच के साथियों ने गीत गाए और सभी ने शहीदों की चिताओं पर पुष्प अर्पित किए। उत्तराखंड आंदोलन के अनेक साथी भी इस दौरान मौजूद रहे। सभा स्थल पर जब आन्दोलनकारी ताकतो ने सम्वेत स्वर में गाया कि शहीदो हम शर्मिंदा हैं आपके कातिल जिंदा हैं तो एक बारगी उतराखण्ड आन्दोलन की पीड़ा उभर कर सामने आई। इस अवसर पर मीरा संघमित्रा ने इस यात्रा के पूरे अनुभवों साझा कये।

उत्तराखंड किसान सभा के गंगाधर नौटियाल ने कहा कहा कि आरएसएस का आजादी के 
आंदोलन में कोई योगदान नहीं था। उनसे जुड़े एक कार्यकर्ता ने गांधीजी को भी मार दिया। वे आगे बता रहे थे कि संविधान के मूल्य ही नहीं संविधान के महत्वपूर्ण संस्थानों को मौजूदा सरकारें समाप्त कर रही है। उदाहरण स्पष्ट है कि आज बार काउंसिल और मेडिकल काउंसिल का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है।

महिला मंच की कमला पंत ने कहा उत्तराखंड के महिलाओं की हमेशा दबंग छवि रही है, जिसका प्रतीक चिपको आंदोलन उतराखण्ड राज्य प्राप्ती का आन्दोलन है। लेकिन राज्य बनने के बाद दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि पानी भी दूर चला गया और जंगल भी चले गये। पहाड़ों की महिलाएं शहर में आकर बर्तन मांज रही है। यह सब हमारी राजनीति का अंजाम है। उन्होने कहा कि टिहरी बांध से उत्तराखंड को कोई फायदा नहीं हुआ, लेकिन आज फिर पंचेश्वर बांध बनाया जा रहा है, लोगों के खिलाफ नीतियां बनाई जा रही है। महिलाएं जानती हैं कि क्या नीतियां बननी चाहिए। उन्होने आगे कहा कि नीतियां ग्राम सभा को ही बनाना चाहिए, ना कि राज्य या केंद्र सरकार को।

हिमधारा से जुड़ी मानसी ने कहा कि वन पंचायत का मजबूतीकरण होना चाहिए जो इस राज्य में हो नही रहा। वक्ताओं ने कहा कि 1,50,000 डालर की जल विद्युत परियोजनऐं हिमाचल, उत्तराखंड और अरूणाचल प्रदेशो में योजनाबद्ध है। सरकारे कोई नदी नाला नहीं छोड रही है। अर्थात प्रकृति प्रदत्त सुविधाओ का सरकारे लगातार विदोहन कर रही है। जिसके दुष्परिणा राज्य में कई बार आपदा के रूप में सामने आये है। हालात देखें तो बांध बढ़ रहे हैं लेकिन राजस्व कम होता जा रहा है। वक्ताओं का सवाल है कि यहां किसका विकास हो रहा है? ठेकेदारों का, सीमेंट कंपनियों का, स्टील कंपनी, जेसीबी कंपनी का? या आम नागरिको का, जो बिना स्वार्थ के प्राकृतिक संसाधनो का संरक्षण कर रहे है। दूसरी तरफ ये पूंजीवाद व्यवस्था हमें नौकरियां नहीं दे पा रही है, फकत हमे जाति और धर्म के नाम पर तोड़ा जा रहा है। ये बाते वक्ताओं ने इस दौरान खुलकर सामने रखी है।

दिल्ली के एक युवा साथी विमल भाई ने कहा कि आजतक जितने भी बांध बने हैं उनमें से कितनों में पुनर्वास हुआ है? सरकार के सामने चुनौती इस बात की है कि वे अब तक टिहरी बांध को छोड़कर अन्य बांधो में पुनर्वास की व्यवस्था ही नहीं कर पाई है। उन्होंने आगे कहा कि ग्राम सभा की बात करते समय हमे एससी एसटी कमीशन के पहले अध्यक्ष बी0 डी0 शर्मा को याद करना होगा। जो आदिवासी ना होकर के भी देश के आदिवासियों के नेता माने जाते हैं। वे आजीवन आदिवासी किसानों के लिए संघर्षरत रहे।

उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी ने कहा कि उत्तराखंड संघर्ष से बना राज्य है। 44 शहादतें हुई। 2 अक्टूबर को मुजफ्फरनगर कांड हुआ, अभी तक न्याय क्यों नहीं? बाहर के लोग भी अब यहां ज्यादा जमीन खरीद सकते है। जबकि 79 प्रतिशत लोग इस राज्य में भूमिहीन हैं। और सरकार बड़े बड़े ठेके माफियाओं के साथ करके नैनिसार गांव की जमीन तत्काल मुख्यमंत्री ने जिंदल को गैर कानूनी रूप से कब्जा में दिलवा दी। संघर्ष करने वाले लोगों पर झूठे मुकदमे लगाये गये और गुंडों से पिटवाया भी गया। उन्होंने कहा कि यही सरकार के रंग में रंगे लोग कल ये साबित कर देंगे कि शराब भी गंगाजल के ही तरह है।

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने सम्मेलन में भागीदारी करते हुए कहा कि 72 प्रतिशत जंगल है उत्तराखंड में। जिस पर वन विभाग का कब्जा है। लोग राज्य में जंगल के अधिकार को लेकर आन्दोलनरत है। लोक विज्ञान संस्थान के डा० रवि चोपड़ा ने कहा कि राम और कृष्ण को जब आम लोगो ने छोड़ा तो उन्होंने उन पर भी कब्जा कर लिया। कहा कि यह हत्यारी सरकार है। स्वामी सानंद की हत्या करके अब गंगा पर आगामी सत्र में गंगा पर बिल ला रही है। उन्होने कहा कि जल मार्ग और सबरीमाला के लिए पैसा कहां से रहा है, जिसे सरकार बताने में डर रही है। जबकि यह सब मंडी का का पैसा है। अब तो गरीब को लूटकर बड़ी कंपनीयों और अमीरों को देने का काम सरकारे ही कर रही है। मैग्सेसे अवार्ड विजेता प्रफुल्ला सामंत्र ने कहा कि देशभर में कॉरपोरेट लूट में तेजी आई है। हमारे संघर्षों के सामने नई चुनौतियां खड़ी है। और यह सरकार गाय, गोबर में लपेट कर देश को हिंदू, मुसलमान में बांट रही है। उन्होंने कहा कि आज का आवाहन एकता का है, संघर्ष का है, जीत हमारी ही होगी। इस दौरान कामरेड बची राम कौंसवाल, जनवादी महिला समिति की इंदु नौडियाल आदि ने विचार व्यक्त किये हैं।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...