दून लिटरेचर फेस्टिवल में नवलेखक, शोधार्थीयों व साहित्यकारो का जामवाड़ा
प्रेम पंचोली
साल के अन्त में अस्थाई राजधानी देहरादून के क्रियश्चन अध्ययन केन्द्र के परिसर में आयोजित दो दिवसीय दून लिटरेचर फेस्टवेल में पंहुचे देशभर के साहित्यकारो ने देश और आंचलिक व्यवस्थाओ को कहानी और कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है। अपने वक्तव्य पत्र में साहित्यकारों ने मौजूदा व्यवस्थाओं पर भी शब्दबाण छोड़े है। खोई हुई राजनीतिक चरित्र को भी काव्य व साहित्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया गया है। वहीं इस बहस के बीच शोधार्थीयों ने भी खूब चर्चा का माहौल बनाया है। कहा कि यह एक ऐसा राष्ट्रीय मंच है जिसमें सालभर में समाज अपने प्रतिबिम्ब को देख सकता है। उधर महोत्सव के उद्घाटन करने पंहुचे मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भी साहित्य को समाज का दर्पण बताया है। कहा कि साहित्य और राजनीति एक दूसरे के पूरक है। राजनीतिक भटकाव में साहित्य ही सेतु का काम करता है।ज्ञात हो कि समय साक्ष्य प्रकाशन और अर्श संस्था के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित दो दिन में समकालीन हिन्दी कविता और महिलाऐं, उतराखण्ड हिमालय का गाथा साहित्य, भारत में लोकतंत्र: सफलता और चिन्ताऐं, मैं घुम्मकड़, भक्तिकाल में हिन्दी साहित्य की आधारशिला, कहानी पाठ, कलम के इतर, दलित साहित्य व लड़ाई के मोर्चे, रेडियों की कुछ बातें कुछ यादें, युवाओं हेतु रचनात्मक कार्यशाला नव लेखन मंच, रचनात्मक लेखन के विविध आयाम, संभावनाओं का संसार जैसे संवेदनशील विषयों पर अलग-अलग सत्र आयोजित हुए है। इसके अलावा रविन्द्रनाथ टैगोर रचित नाटक को गिरदा स्मृति मंच के निर्देशन में ‘पत्नी का पत्र’ व मोहन राकेश लिखित नाटक को अनुराग वर्मा के निर्देशन में कलिंग विजय की सफल प्रसतुति हुई है। जबकि संभव नाट्य परिवार ने महिलाओं की सुरक्षा पर एक नुककड़-नाटक प्रस्तुत कर फिर से समाज को सोचने के लिए बाध्य किया है।
साहित्यकारों के जीवन के किस्से सत्र में सूरज प्रकाश ने कई चर्चित लेखकों के जीवन के किस्सों का जिक्र किया। उन्होंने लेखकों के साथ घटी घटनाओं का जिक्र करते हुए लेखकों के अवसाद भरे जीवन का जिक्र किया। कहा कि लेखकों का शराब के करीब होना दुखदायी है। इससे साहित्य जगत को बड़ी हानि हुई है, जीवन में अवसादों के चलते लगभग 150 साहित्यकार मौत को गले लगा चुके हैं। जिनमें तीन नोबल पुरस्कार विजेता तक शामिल थे। कल्लोल चक्रवर्ती ने जनता के बीच अनुवादों और भाषा की महत्ता साझा की। कहा कि अंग्रेजी साहित्य दूसरे साहित्य के मुकाबले ज्यादा तथ्यपरक होते हैं। इस बीच डा. सुशील उपाध्याय की पुस्तक पत्रकारिता का लाकार्पण भी किया गया। चर्चा के दौरान साहित्यकारों ने कहा कि सोशल मीडिया साहित्य को बढ़ावा देने का एक बड़ा मंच बनता जा रहा है। आज तकनीकि सुविधाओं ने प्रचार आसान कर दिया है। दुनियां के किसी भी कोने में यदि किसी किताब का लाकार्पण होता है, तो मिनटों में दुनिया के दूसरे कोने तक उसकी चर्चा होने लगती है। कोई व्यक्ति किसी किताब को पढ़ कर उसकी समीक्षा सोशल मीडिया पर साझा करता है तो उससे प्रेरित होकर बाकी लोग भी किताब को खरीदने पहुंचते हैं। यहां तक कि कई बार तो किताबों का लाकार्पण ही सोशल मीडिया के ऑनलाइन मंचों पर भी होने लगा है।
राजपुर स्थित क्रिश्चियन रिट्रीट एंड स्टडी सेंटर में आयोजित दो दिवसीय फेस्टिवल में लगभग 650 साहित्यकारों ने अलग-अलग सत्रों में विचार रखे। इसमें सबसे पहले भक्तिकाल हिंदी साहित्य की आधारशिला पर ब्रजेंद्र, सविता मोहन और दिनेश प्रताप सिंह ने विचार रखते हुए कहा कि भक्ति का प्रमुख स्रोत प्रेम है। प्रेम से ही लोगों के विश्वास को जीता जा सकता है। एसआर हनोट, गम्भीर सिंह पालनी, हरिसुमन बिष्ट, कुसुम भट्ट और रुचि शर्मा ने कहानी पाठ किया। कमल के इतर, साहित्यकार के किस्से, दलित साहित्य, कुछ बातें कुछ यादें, पर साहित्यकारों ने खुलकर चर्चा की। इस मौके पर बाल कलाकारों ने नव लेखन मंच में अपनी प्रतिभा दिखाई। बाल कलाकारों ने समाज से जुडे विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे। साथ ही अपने लेख से स्वच्छता और देश प्रेम का संदेश दिया। अलग-अलग सत्रो को क्रमशः डा॰ शुशील उपाध्याय, डा॰ राखी उपाध्याय, कमला पन्त, पत्रकार योगेश भट्ट, पत्रकार संजीव कण्डवाल, साहित्यकार रामविनय सिंह, साहित्यकार बीना बेंजवाल, शिक्षक इन्द्रजीत सिंह, डा॰ राजू मेहर, रूची शर्मा व इस खबर के लेखक ने संचालित किया है।
जबकि अलग-अलग सत्रो को व्यवसायी डा॰ एस फारूख, वयोवृद्ध साहित्यकार अचलानन्द जखमोला, एस सूद, सैयद इरफान, अशोक कुमार, ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, दिनेश प्रताप सिंह, सविता मोहन, हरिसुमन विष्ट, कुसुम भट्ट, सूरज प्रकाश, यासमीन सुल्ताना नकबी, कल्लोल चक्रवर्ती, राजेश पाल, डा॰ एन सिंह, वेद विलास उनियाल, नवनीत गैरोला, कमला भसीन, रश्मी भारद्वाज, पंखुड़ी सिंन्हा, प्रयाग जोशी, नरेन्द्र सिंह नेगी, देवसिंह पोखरिया, गणेश खुगशाल गणी जैसे वरिष्ठ साहित्यकारो ने अलग-अलग सत्रो को संबोधित किया है। इस दौरान साहित्यकार महावीर रंवाल्टा, सुरेन्द्र पुण्डिर, गीता गैरोला, उदय गैरोला, अनिल कार्की, भारती जोशी, कुसुम पन्त, अभिषेक मैन्दोला, आकाशदीप, प्रियंका सकलानी, जयदीप सकलानी, डॉ. राखी बलूनी, रजनीश त्रिवेदी, मुकेश नौटियाल, कृष्णा खुराना, रतन सिंह असवाल, दिनेश कण्डवाल, गौरी सिंह आदि लोगो ने इन साहित्यक सत्रों की चर्चाओं में हिस्सेदारी लेकर माहौल को रूचीपूर्ण बनाने में सहभागीता निभाई है।
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
भारती जोशी की एकल नाटक प्रस्तुति को दर्शकों ने पसंद किया। उन्होंने रविंद्र नाथ टैगोर की कहानी पत्नी का पत्र के माध्यम से पुरुष प्रधान समाज में महिला की व्यथा उठाई।
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
दून लिटरेचर फेस्टिवल की प्रमुख संयोजिका श्रमती रानू बिष्ट ने बताया कि वे प्रयास कर रहे हैं कि यह एक ऐसा मंच बने जहां साहित्यक विद्या के ज्ञान का आदान-प्रदान हो। फेस्टिवल के समन्वयक प्रवीन भट्ट का कहना है कि स्थापित साहित्य के सृजको और नव लेखको, शोधार्थीयों के लिए यह एक प्रकार का अध्यनात्मक मंच है। उनकी कोशिश रहती है कि ऐसे आयोजन से एक अच्छे साहित्य सृजन का माहौल कायम हो सके।
-------------------------------------------------------------------------------------
- त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखंड
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------





