मुख्यमंत्री हरीश रावत किस विधानसाभा सीट से चुनाव लड़ेगें और किससे नहीं यह बात काफी हद तक स्पष्ट हो गयी है। चुनाव लड़ने को लेकर लगातार चर्चाएं होती रही हैं कि रावत धारचूला से लड़ेगे या फिर कपकोट से या अपने लिए कोई और महफूज सीट तलाश करेंगे। यह संकेत माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने डोईवाला में जनता की 12 वर्ष पुरानी मांगो को पूरा करते हुए तहसील तक का उद्घाटन कर दिया। जबकि 620.23 लाख रूपये की विभिन्न विकास की योजनाओ का भी शिलान्यास व लोकापर्ण ऐन वक्त यानि पंचायत चुनाव की आचार संहिता लगने से पहले डोईवाला विधानसभा में कर डाली। इन सबसे यही इशारा मिल गया है कि डोईवाला विधानसभा सीट जल्दी ही हाॅट सी बनने जा रही है। ज्ञात हो कि मुख्यमंत्री के तौर पर रावत ने बीती एक फरवरी 2014 को शपथ ली थी। शपथ लेने के बाद मुख्यमत्री विकास कार्यो के लिए योजनाओ को लोकापर्ण व शिलान्यास करने लगे रहे। इसके बाद लोकसभा चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होते ही रावत पूरी तरह चुनाव में जुट गये। इस दौरान उन्हे विघानसभा चुनाव लड़ने के लिए सुरक्षित सीट तलाश करने का समय ही नहींे मिला। इस बात की पुष्टी श्री रावत खुद कर चुकें हैं। उधर आपदा के कार्यो को क्रियान्वयन करवाना तो वहीं लोकसभा चुनाव की भी जरूरी जिम्मेदारी से जूझना पड़ा। हालात उनके इस तरह विपरित हो गये कि लोकसभा के परिणाम कांग्रेस के पक्ष में नहीं आ पाये।
इस परिस्थिति में कांग्रेस की कारारी हार के बाद विपक्षी भाजपा को भी सीएम पर निशाना साधने का मौका मिल गया। भाजपा की ओर से इस तरह के बायान भी आये कि रावत ऐसे पहले सीएम होंगे जो विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ पायेंगे। इसी दौरान मुख्यमंत्री ने धारचूला का दौरा कर और वहां कईयों विकास योजनाओं की घोषणा करके यहां चर्चाओं का माहौल गर्म कर दिया कि वे अब धारचूला या कपकोट से चुनाव लड़ सकते हैं। राजनीति के द्ग्गिज खिलाड़ी कहे जाने वाले श्री रावत ने भाजपा की ओर से डोईवाला से चुनाव लड़ने की चुनौती के बाद डोईवाला में जनता की 12 वर्ष पुरानी मांग को पूरा कर एक ऐसा तोहफा दे दिया जिसका उन्हे लम्बा इंतजार था। डोईवाला विधानसभा स्थित रानीपोखरी में भी मुख्यमंत्री श्री रावत ने रसोई गैस एजेंसी का लोकार्पण कर जनता को एक और बड़ी सौगात दे डाली। श्री रावत के इस कदम के सियासी हलकों में यह मायने निकाले जा रहे है कि डोईवाला में सीएम ने चुनाव लड़ने की बिसात बिछा दी हैं। यही नहीं डोईवाला क्षेत्र के विकास के लिए सांसद व केन्द्रीय मंत्री रहते हुए भी श्री रावत ने कभी कोई कंजूसी नहीं दिखाई। आने वाले चंद दिनों मंें इस बात की घोषणा भी होने की उम्मीद जताई जा रही है कि श्री रावत डोईवाला विधानसभा से चुनाव लड़े सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो यह सीट इस मायने मे हाॅट बनेगी की इस सीट पर भाजपा के दो दिग्गज पूर्व कैबिनेट मंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत और पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद रमेश पोखरियाल निशंक की छबि दांव पर लगी हुई है। इस सीट पर श्री निशंक अपनी बेटी कथक नृत्यांगना आरूषी को चुनाव मैदान में उतारना चाहते हैं तो वहीं पूर्व कैबिनेट मंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी फिर इस सीट के प्रबल दावेदार हैं।
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हालांकि वर्तमान में कांग्रेस के पास विधायको की संख्या 40 है परन्तु कुनबो में बंटी कांग्रेस की सत्ता कभी भी डोल सकती है। सरकार में सहयोगी विधायकों की संख्या 7 है इस तरह काग्रेस के पास शुद्ध कांग्रेसी विधायक 33 हैं बताया जा रहा है कि इनमें चार विधायक सतपाल महाराज के गुट से पहले से ही जुड़े है। इन चार विधायको की स्थिति ऐसी है कि वे अब ना तो कांग्रेस छोड़ सकते हैं और ना ही विरोध के स्वर तेज कर सकते हैं। यदि वे कांग्रेस छोड़कर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करते भी हैं तो ऐसे में उन्हे नये दल के रूप में सदन में एक तिहाई बहुमत प्रस्तुत करना पड़ेगा। ऐसा होना अभी संभव नहीं है। क्योंकि मु॰ श्री रावत ने जो मैनेज लोकसभा चुनाव के तुरन्त बाद किया वह अस्थाई माना जा रहा है। उधर सतपाल महाराज कांग्रेस छोड़कर भाजपा का तरणतार इसलिए बना हुआ है कि वे भविष्य में भाजपा कोटे से राज्य का मुख्यमंत्री बनेगे। वह पुरजोर कोशिश् कर रहा है कि सत्तारूढ कांग्रेस कब कमजोर हो और वे भाजपा की तरफ से सरकार बनाने का दावा पेश करें। परन्तु श्री महाराज के सरकार बनाने की गणित को मु॰ श्री रावत ने बिगाड़ दिया है। वैसे भी सतपाल महाराज के पाले में मात्र उनकी पत्नी की सीट को जोड़कर वर्तमान में चार ही विधायक हैं। इस हालात में पीडीएफ के विधायक कांग्रेस का समर्थन ही बनाये रखने में अपनी राजनीति चमका रहे हैं। विधानसभा में विधायकों की संख्या पर नजर डालें तो सत्तारूढ़ कांग्रेस के 33 विधायक है जबकि भाजपा के पास 30 विधायक थे जो अब निंशक के सांसद बनने की वजह से अब भाजपा के पास 29 ही विधायक हैं। जबकि एक विधायक एंग्लो इंडियन हैं जो कांगेसी ही है। ऐसे में मुख्यमंत्री श्री रावत यही चाहेगें कि वह अपने किसी विधायक की सीट खाली ना कराकर डोईवाला से ही चुनाव लड़ें ताकि सदन में उसका आकड़ा और ज्यादा मजबूत हो सके। डोईवाला के साथ ही सोमेश्वर सुरक्षित सीट पर भी विधानसभा का उपचुनाव होना है यहां से विधायक अजय टम्टा चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे हैं। मुख्यमंत्री की यही कोशिश होगी की उपचुनाव में दोनों सीटे कांग्रेस की झोली में आ जायें और उसके अपने विधायकांे की संख्या 35 हो जाये।
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मुख्यमंत्री लोकसभा चुनाव परिणामो से काफी घबराये हुये हैं और वे अपने लिए सुरक्षित सीट की तलाश में जुट गये हैं लेकिन वे कहीं से भी चुनाव मैदान में उतरें उन्हे भाजपा मौजूदा स्थिति में पटकनी देने की स्थिति में है।
-ः तीरथ सिंह रावत, प्रदेष अध्यक्ष भाजपा
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हम समर्थन की मर्यादाओं का मान करते हैं। अगर ऐसा होता तो मैं कब का कांग्रेस से समर्थन वापस ले लेता। मैं जिम्मेदारी को निभाने पर विश्वास करता हूं। यह जरूर है कि जिम्मेदारी वर्तमान में ज्यादा बढ गयी है। मुख्यमंत्री हरीश रावत राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। उनकी सरकार स्थिर है और रहेगी।
-ः दिनेष धनै कैबिनेट मंत्री, व पीडीएफ सदस्य
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कांग्रेस को पांचो लोकसभा सीट को हारने कारण मुख्यमंत्री हरीश रावत खुद जानते हैं। आगे सामने पर पंचायत चुनाव भी हैं और विधानसभा के उप चुनाव भी होंगे यह चुनाव बता देंगे कि कांग्रेस के पक्ष में मत प्रयोग करें कि हरीश रावत के पक्ष में। यदि इस दौरान भी कांग्रेस के लोग हार के शिकार होंगे तो इसकी जिम्मेदारी भी मुख्यमंत्री श्री रावत को लेनी होगी।
-ः अमृता रावत पूर्व कैबिनेट मंत्री
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लोकसभा चुनाव में शानदार जीत से उत्साहित भाजपा अब मुख्यमंत्री हरीश रावत को ललकार रही है कि अगर उनमें दम है तो वे डोईवाला चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़कर दिखाएं। डोईवाला चुनाव क्षेत्र भाजपा को गढ़ माना जाता हैै। तीन चुनाव भाजपा यहां कांग्रेस को हराती आ रही हैंै। पूर्व सीएम डाॅ. रमेश पौखरियाल निशंक के लोस चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद ये सीट खाली हो गई है। इस खाली सीट पर मुख्यमंत्री हरीश रावत के उपचुनाव लड़ने की अटकलें हैं। सूत्रो की माने तो बाहर से बेशक भाजपा सीएम को डोईवाला से चुनाव लड़ने की चुनौती दे रही है, लेकिन अंदरखाने वह डरी हुई है। माना जा रहा है कि भाजपा चुनौती देकर ऐसा माहौल बना देना चाहती है कि श्री रावत डोईवाला से चुनाव लड़ने को ख्याल ही छोड़ दें। सच्चाई यह है कि भाजपा डोईवाला सीट पर ऐसा प्रतिद्वंदी चाहती है कि जिसे वो आसानी हरा सके। इस सीट को बचाना भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती हैं अगर उसके हाथों से ये सीट निकल गई तो सूबे में उनका संख्या बल कमजोर पड़ जायेगा। सूबे की सियासत में जादुई नंबर पर जो खींचतान चल रही है, उसमें भाजपा को संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। लेकिन ये संभावनाएं तब तक सार्थक नहीं हो पाऐगी जब तक की उसका संख्या बल मजूबत नहीं होगा। यही वजह है कि वो डोईवाला सीट पर हरीश रावत को चुनानव लड़ने के लिए ललकार रही है ताकि मजबूत आत्मविश्वास दिखाकर ऐसे हालात बना दिए जाएं कि श्री रावत सुरक्षित सीट की तलाश में जुट जाऐं। यहां श्री रावत का सौभाग्य ही कहा जायेगा कि उन्हे खंडूड़ी या बहुगुणा की तरह कहीं सेंध नही लगानी पड़ी। उन्हें ठीक मौके पर खाली सीट मिली है। हालांकि उनके सिपहसालारों ने अपनी सीट की पेशकश करके उनके लिए कई विकल्प खोले है, लेकिन ये सियासी रणनीति के हिसाब से ऐसा करना घाटे का सौदा होगा। ऐसे हालातों में भाजपा का विशेष प्लान क्या पूरा हो पाएंेगा।¬¬¬
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मुख्यमंत्री हरीश रावत ने धारचूला व डोईवाला दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों में वे कमोबेश बराबर तैयारियां कर रहे हैं। पंचायत चुनाव आचार संहिता लागू हाने से करीब 15 मिनट पहले दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों में योजनाओं के शिलान्यास व उद्घाटन कार्यक्रम से श्री रावत ने यह संकेत दिए। मुख्यमंत्री को जुलाई के अन्त तक विधानसभा का सदस्य बनना हैं। अभी तक मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अधिकारिक तौर पर इसका फैसला नहीं किया कि वे किस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि धारचूला विधानसभा क्षेत्र को मुख्यमंत्री अपने लिए डोईवाला से ज्यादा मुफिद मान रहे हैं। धारचूला सीट से कांग्रेस की बढ़त रही है इसलिए सूत्र उनके धारचूला से चुनाव की ज्यादा संभावनाएं बता रहे हैं। हालांकि धारचूला और डोईवाला मंे से उनकी प्राथमिकता पूछने पर मुख्यमंत्री ने बात हंसते हुए टाल दी। कुछ देर के रूकने के बाद मुख्यमंत्री बोले, उद्घाटन और शिलान्यास तो मैं चमोली और पिथौरागढ़ में भी कर रहा हूं।
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प्रदेश भाजपा के रणनीतिकारों का अगला मिशन मुख्यमत्री हरीश रावत को घेरने को लेकर है। रणनीतिकारों का यह भी मानना है कि जिस तरीके से मुख्यमंत्री दायित्व बांटकर अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं ऐसे में कांग्रेस की सरकार को अस्थिर करना सहज काम नही होगा, मगर यदि मुख्यमंत्री हरीश रावत को उपचुनाव में असफलता हाथ लगती है तो प्रदेश की सियासत में नया मोड़ आ सकता है और इससे भाजपा को फायदा मिलने की संभावना है। वैसे मुख्यमंत्री के लिए धारचूला के विधायक हरीश धामी एवं जागेश्वर के विधायक व स्पीकर गोविंद सिंह कंुजवाल अपनी सीटें खाली करने को तैयार है, मगर मुख्यमंत्री अब तक इस पर निर्णय नहीं कर पाए हैं। इधर रमेश पोखरियाल निंशक के सांसद बनने से डोईवाला सीट और अजय टम्टा के सांसद बनने से सोमेश्वर की सीटें रिक्त हुई। इन सीटों पर भाजपा का कब्जा था। भाजपा के रणनीतिकार अब पहले कांग्रेस की ओर से यह देखना चाह रहे हैं कि डोईवाला विधानसभा सीट के प्रति मुख्यमंत्री हरीश रावत की क्या रूचि है। भाजपा के वरिष्ठ नेता अभी इस पर नजर टिकाये हुए है। सूत्रो के मुताबिक चंद रोज पहले भाजपा के रणनीतिकार डोईवाला व सोमेश्वर की सीटों को लेकर चिंतन कर रहे थे, मगर अब वे हरीश रावत की ओर नजर टिकायें हुये है। भाजपा यह मान कर चल रहे हैं कि यदि वे विधानसभा के उपचुनाव मे हरीश रावत को पटकनी देने में सफल हो गये तो भविष्य की सियासत के लिए उनकी राह काफी सहज हो जायेगी। भाजपा के रणनीतिकार डोईवाला और सोमेश्वर के अलावा धारचूला और जागेश्वर की सोटों से फीड बैक संग्रह करने मंे जुटे हुये।
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लोकसभा चुनाव के प्रचाार मंे जब नरेेन्द्र मोदी उत्तराखण्ड आए तो उन्होने देवभूमि के लोगों से भावनात्क अपील की थी कि वे उनकी झोली में पांचों कमल को डाल दें। फिर देखिएगा कि वे क्या करते हैं प्रदेश की जनता ने भाजपा के पांचों उम्मीदावारों को प्रचंड बहुमत देकर मोदी की अपील का सम्मान किया। सवा करोड़ उत्तराखंडियों की टकटकी लगी थी कि मोदी की कैबिनेट में देवभूमि को जगह मिलेगी। मगर मोदी के संभावित मंत्रिमंडल की जो खबरें पिछले एक-दो दिन से तैर रही थी, अंततः वे सही साबित हुई। मोदी की कैबिनेट में उत्तराखंड को ठेंगा दिखा दिया गया। राजनीतिक हलको में यह बाते चर्चाओ को माहौल बना रही है कि दिल्ली स्थित में राज्य के पांचो सांसद केन्द्र की कैबिनेट में जगह बनाने बावत आपस में ही इतने उलझ गये थे कि प्रधानमंत्री श्री मोदी को यह व्यवहार नागवार गुजरा। वैसे भी वे राज्य में मुख्यमंत्री बनने के लिए पूर्व में कई बार झगड़ चुके है जो राज्यवासियो ने कई बार साक्षात देखा है। दरअसल सूबे में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद भाजपा ने न सिर्फ पांचो सीटें जीती बल्कि प्रचंड बहुमत हासिल किया। सूबे की जनता ने पांच में से तीन ऐसे चेहरे भेजे जिन्हें सूबे की सरकार चलाने का अनुभव रहा है। वे पूर्व मुख्यमंत्री भी रहें। उनमें से खंडूडी तो केन्द्रीय मंत्री तक रहे लेकिन जब मोदी की कैबिनेट के वजीरों ने बारी-बारी से शपथ ली तो सूबे के लोगों की उत्साह धीरे-धीरे निराशा में बदलता चला गया। स्वाभाविक है कि इसका असर पार्टी के मनोबल पर पड़ेगा। भाजपा को अभी पंचायत चुनाव और दो-दो उपचुनाव में जाना है। वो मोदी लहर को जकड़े रखना चाहती है ताकि इस पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार की जा सके, लेकिन मोदी की पहली प्राथमिकता में उत्तराखंड के नेताओं की गैरमौजूदगी ने हार से पस्त पड़ी कांग्रेस को आॅक्सीजन दे दी है। कुलमिलाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कैबिनेट में पहाड़ी राज्य उत्तराखंड और हिमाचल दोनों ही गायब हैं। इसे केन्द्रीय मंत्रिमंडल में छोटे राज्यों की उपेक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा हैं राज्य के नेताओं को इस पर जरूर संतोष है कि भाजपा के प्रदेश प्रभारियों को मोदी की कैबिनेट मंे मंत्री पद से नवाजा गया है।
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मोदी की कैबिनेट में उत्तराखंड को प्रतिनिधित्व न मिलने को कांग्रेस ने मुद्दा बना लिया। कांग्रेस ने कहा कि भाजपा ने उत्तराखंड की उपेक्षा ही नहीं बल्कि अपमान किया है। यहां राज्य के वरिष्ठ सांसद और केन्द्र में मंत्री रह चुके भुवन चन्द्र खडूड़ी को कैबिनेट में जगह नहीं मिली और न ही राज्य में सबसे बड़ी जीत दर्ज करने वाले भगत सिंह कोश्यारी को। हरिद्वार मे मुख्यमंत्री हरीश रावत की पत्नी को पटखनी देने वाले डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक को भी उनकी शानदार जीत का इनाम नहीं मिला। जबकि पूर्व में पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, एचडी देवगौडा, अटल बिहारी वाजपेयी समेत कुछ अन्य सरकारों में राज्य को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मिला था। बताते चलें कि राज्य से कई सांसद रहे केन्द्र में मंत्रीः पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर यूपीए टू की मनमोहन सरकार में राज्य से कई सांसदों को केन्द्र में मंत्री बनने का मौका मिला। राज्य के सांसदो को केन्द्र मंे रक्षा, वित्त, विदेश, पेट्रोलियम, भूतल परिवहन, शिक्षा, गृह विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय मिले। इनमें भक्त दर्शन, हेमवती नन्दन बहुगुणा, केसी पंत, नारायण दत्त तिवारी, ब्रहमदत्त, सतपाल महाराज, भुवन चन्द्र खंडूड़ी, बची सिंह रावत, हरीश रावत थे। पंडित गोविंद बल्लभ पंत भी मूल रूप से उत्तराखंड के ही थे। उन्हेें भी केन्द्र में महत्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली।
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पर्वतीय जनमानस की भावना से जुड़े गैरसैण को लेकर एक बार सियासत गरमा उठी है। विपक्ष इसे फिजूल खर्ची करार दे रहा है सरकार विपक्ष को मनाने की कोशिशों में जुटी है। इन सब राजनैतिक नाटकबाजी के बीच आम जनमानस हैरान है और परेशान भी। उसे समझ नहीं आ रहा कि गैरसैंण के नाम पर सिर्फ सियासत क्यों हो रही है गढ़वाल और कुमाऊ के इस केन्द्र बिन्दु को स्थायी राजधानी घोषित करने में अड़चन क्या है?
सरकार ने साल के 365 दिन में मात्र तीन या पंाच दिन का विधानसभा सत्र आयोजित करने के लिए गैरसैण में करोड़ों रूपय खर्च करने की तैयारी की है। शिलान्यास और अब पहले विधानसभा सत्र आयोजन को सरकार पर्वतीय क्षेत्रो के विकास की शुरूआत के रूप में प्रचलित कर रही है। लेकिन, सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गैरसैण मंे सालभर में मात्र दो-चार दिन का सियासी ड्रामा करके पर्वतीय क्षेत्रो का विकास किया जा सकता है। सरकार के सामने तीन विकल्प मौजूद हैं। वो जनभावनाओं को आदर करे, उन्हे सिरे से खारिज कर दे या फिर दीक्षित आयोग की रिपोर्ट पर अग्रिम कर्यावाही करे। लेकिन, इन तीन ठोस विकल्पों के बजाय सरकार ने जो रास्ता चुना है। उसमें गैरसैण में विधानसभा भवन के निर्माण पर कारोड़ो रूपय फंूकने के सिवाय कोई गंभीरता नजर नही आ रही। गैरसैण में कुछ दिनों का विधानसभा सत्र आयोजित करना भी फिजूलखर्ची के क्रम को आगे बढ़ाने मात्र साबित होगा।
पे्रम पंचोली, मो॰-09411734789
