Sunday, August 19, 2018

बसंत पुनरुद्धार कार्यक्रम से जीवित होगी स्प्रिंग्स

बसंत पुनरुद्धार कार्यक्रम से जीवित होगी स्प्रिंग्स

प्रेम पंचोली

स्प्रिंग का महत्व और छोटे जलस्रोतो की उपेक्षा को लेकर राजधानी स्थित में चिराग, सिडार और अरध्यम् संस्थाओं के संयुक्त तत्वाधान में एक दिवसीय कार्यशाला का आयाजलन किया गया। जिसमे भविष्य में उत्पन्न होने वाले जल संकट और नदियों के घटते जल स्तर को लेकर विशेषज्ञ ने अपनी-अपनी राय प्रस्तुत की है। राय दी कि बिना जैवविविधता के पानी को बचाना आज के समय में कठिन है। साथ ही जल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और लोक ज्ञान की तरफ भी ध्यान देना होगा। तकि प्राकृतिक संसाधनो पर हो रहे गलत दोहन पर रोक लग सके। इस दौरान कार्यशाला में लोगो ने आगामी कार्यक्रम भी तैयार किये है। जिसमें वे विभिन्न संस्थाओं और लोगो के साथ मिलकर स्प्रिंग्स पुर्नजीवन के कार्य करेंगे।

पुणे से आये ऐकुडाम संस्था के डा॰ हिमांशु कुलकर्णी ने बताया कि जलीय जल, आधार प्रवाह, भूजल की गुणवत्ता, जल संघर्ष और जलविद्युत और नदी बेसिन के महत्व और राष्ट्रीय ढांचे और शासन में हो रहे परिवर्तनों पर विचार करने की आज की आवश्यकता है। कहा कि नदी के प्रवाह में स्प्रिंग्स का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जिस कारण नदियां सदानीरा रहती थी। जैसे-जैसे स्प्रिंग्स का क्षरण हुआ वैसे-वैसे नदियों के प्रवाह में भारी मात्रा में कमी आने लग गयी है। साथ ही मौसम में भी कई तरह के बदलाव खतरनाक रूप में सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि नीति आयोग विशेषकर जल संरक्षण को लेकर यानि जिसमें स्प्रिंग्स को बचाने के कार्य होंगे ‘‘बसन्त पुनरूद्धार’’ नाम से कार्यक्रम आरम्भ करने जा रहा है। इसके लिए बाकायदा नीति आयोग ने एक बजट भी स्वीकृत किया हुआ है। श्री कुलकर्णी ने बताया कि नीति आयोग इस कार्य के लिए देश के सात राज्यों में 6000़ करोड़ का व्यय करेगा। इस बजट में सिर्फ स्प्रिंग्स को पुर्नजीवित करने के कार्य होंगे। उनका सुढाव था कि पहाड़ों में भूजल को देखने की भी जरूरत है। नदियों को फिर से जीवन्त करना है, इसलिए नदी प्रवाह के घटक स्प्रिंग्स को सुरक्षित करना आवश्यक है।

कार्यशाला में विशेषज्ञो ने कहा कि आजादी के बाद से अब तक भूजल का उपयोग लगभग 25 गुना बढ़ा है। इस कारण कह सकते हैं कि हम भूजल के सबसे बड़े उपयोगकर्ता हैं। जब हम जल संकट के बारे में बात करते हैं तो हमें स्प्रिंग्स का महत्व कहीं नजर ही नहीं आता है। कारण इसके मांग और आपूर्ति, भूजल की कमी आदि के बीच का अंतर सामने आ जाता है। जानकारो का प्रश्न था कि क्या पहाड़ों में भूजल है? यदि हां तो एक्वाइफर्स और स्प्रिंग्स का बेवजह दोहन क्यों हो रहा है। इधर बड़ी मात्रा में देखने में आ रहा है कि हाइड्रोजियोलॉजी का मौजूदा विज्ञान लोगों को एक पूल के रूप में उपयोग किया जा रहा है। अच्छा हो कि पानी के स्तर चूंकि स्प्रिंग्स के घटते स्रोतों को पुनर्जीवित करने के उपादान पूर्व में हो चुके होते। लोगो ने सवाल उठाया कि देश में कितने ट्यूबवेल्स है जिसका आंकड़ा सरकार के पास है मगर सरकार ऐसा बिल्कुल नहीं बता सकती कि हमारे पास आज कितनी स्प्रिंग्स बचे है। लेकिन हम देश में अपने स्प्रिंग्स की संख्या बनाने की स्थिति में नहीं हैं। नीति आयोग के जल संबर्द्धन के कार्यक्रम को देखते हुए हम राज्य मे लगभग 1000 स्प्रिंग्स के भंडारे के साथ आने में सक्षम हैं। जबकि सरकार की सूची एक अलग प्रकार की तस्वीर दिखा रही है। स्प्रिंगशेड एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे कईयों संस्थाओं ने विभिन्न गांवों में लागू करने की कोशिश की है। जिसे अब जाकर नीति अयोग में ले जाने में सक्षम हुए। इस तरह स्प्रिंगहेड प्रबंधन पर राष्ट्रीय कार्यक्रम के साथ जुड़ना आज की उपलब्धी कही जायेगी।
सुरेंद्र नेगी ने कहा कि उनकी संस्थान 200 स्प्रिंग्स पर काम रही हैं। बताया गया कि राज्य में दो प्रकार की स्प्रिंग्स है। एक नौला और दूसरा धारा के नाम से। ये दोनो स्प्रिंग्स मौजूदा समय में संकट से जूझ रही है। इनके सूख जाने के कारण पहाड़ो में पेयजल संकट के साथ-साथ भू-जल में कमी आई है। प्रोफेसर एसपी सिंह ने बताया कि दुर्भाग्य इस बात का है कि विज्ञान और अनुसंधान की अंतर्दृष्टि एवं क्षमता को खरीदा जा रहा है। यही वजह है कि प्रकृति प्रदत्त जैसे जल संसाधन समाप्त हो रहे हैं। अच्छा हो कि इस प्रक्रिया में वन, जल विज्ञान और भूविज्ञान पर एक साथ शोध किया जाना चाहिए। ताकि एक दूसरे के पूरक कहे जाने वाले जल, जंगल, जमीन का स्पष्ट स्वरूप सामने आ सके।

कार्यशाला में आये नीति आयोग भारत सरकार के उपाध्यक्ष डा॰ अखिलेश गुप्ता ने सुझाव दिया कि पानी के सवाल को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की जरूरत है। इस हेतु तकनीकी विज्ञान व सामाजिक आर्थिक मिश्रण की जटिलताओं पर शोध करने की आवश्यकता है। प्रौद्योगिकी का जो आक्रामक रूप है उसे सार्वजनिक नही किया जाता है इसलिए दोहन और संरक्षण में विरोधाभाष है। उन्होंने कहा कि हमे ऐसी योजना बनाने की कोशिश करनी चाहिए जिसमें पानी की जन्मदाता संस्था स्प्रिंग्स का विदोहन बिल्कुल ना हो। इसलिए ग्रीन बोनस की सार्थकता है। वैसे भी कैम्पा जैसी भारी भरकम फंड की योजना, मनरेगा आदि में यह निश्चित हो कि जल संसाधनो का दोहन से पहले संरक्षण करना होगा और इसी ओर फंड का इस्तेमाल भी करना होगा। इसके अलावा बड़े पैमाने पर पैराहाइड्रोजोलॉजिस्ट की ट्रेनिंग होनी चाहिए। स्प्रिंग हेल्थ कार्ड बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि नीति आयोग ने एक समन्वय एजेंसी की सिफारिश की है जो जल संसाधनो पर निगरानी और फंड के क्रियान्वयन पर निर्णय लेगी। राज्य इस विशिष्ट योजना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान निभायेगा। इसके अलावा जो संस्थाएं प्राकृतिक संसाधनो के प्रति संवेदनशील हैं वे इस काम में सहभागी हो सकती है।

चर्चा के दौरान लोगो ने कहा कि विकसित देशों में वर्षा के आंकड़े कम प्रतिरोध के तौर पर देखे जाते हैं। जबकि विकासशील देश, विशेष रूप से उत्तराखंड को एक उदाहरण के रूप में लेते हैं और यहां उच्च वर्षा भी होती है। फिर भी यहां भूजल और स्प्रिंग पर संकट गहराता जा रहा है। हिमालय और इसके अध्ययन में स्प्रिंग्स का महत्व कितना है, क्या यह केवल सतह का पानी या उद्घाटन और आउटलेट है, क्या हम इसे उप-सतह का पानी कहते हैं, जियोलॉजी को कैसे संबोधित किया जाना चाहिए और वानिकी कैसे मदद कर सकती है, क्या वाटरशेड प्रबंधन में ओक मदद कर सकता है? ज्ञान-विज्ञान समुदाय आधरित बन सकता है, हिमालय में प्रस्तावित और क्रियान्वित सड़क नेटवर्क जल मार्गों को कैसे प्रभावित कर रहा है? क्या संगठनों द्वारा बनाए गए एटलस डेटा को सरकारी समर्थन के बावजूद मान्य किया जा सकता है? यह सब कुछ ध्यान में रखकर नीति आयोग आगामी राष्ट्रीय कार्यक्रम में जोड़ सकता है, जैसे सवाल चर्चा के दौरान खड़े किये गये। इस पर नीति आयोग के उपाध्यक्ष अखिलेश गुप्ता ने कहा कि वे मानचित्रण, एटलस और अन्य सामग्री का उपयोग करेंगे और यह स्क्रैच से सब कुछ शुरू करने के बजाय एक सहयोगी प्रयास करेंगे। पूरे हिमालय में 3000 सीएसओ हैं, यह नीति ग्रामीण मुद्दों को कृषि अनुसंधान से जोड़ देगा यह बहुमुखी और एक एकीकृत दृष्टिकोण की योजना है। विशेषज्ञ विपुल शर्मा ने कहा कि नीति आयोग का वसंत पुनरुद्धार कार्यक्रम लोकाधारित पद्धति के साथ आ रहा है। इसलिए यह उपयोगी होगा।

डॉ॰ अबियन स्वान ने कहा कि अब तक विभिन्न वाटरशेड कार्यक्रमों के साथ काम का अलग-अलग अनुभव रहा है। पर कभी वसंत प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित नहीं किया गया। मेघालय में सबसे ज्यादा बारिश होती है, लेकिन इसका केवल 4-6 प्रतिशत ही उपयोग में आता है। बाकी रन-ऑफ हो जाता है। एक अध्ययन से पता चला है कि पानी हर विकास परियोजनाओं का मूल है। अतएव जल बेसिन कार्यक्रम ही बनने चाहिए। सुझाव आया कि समुदाय के साथ संवाद, मैपिंग स्वामित्व तथा हिमालयी लोगों के साथ उनके लोक ज्ञान को परिभाषित करना होगा। और वे आध्यात्मिकता से संबंधित हैं। इसलिए आध्यात्मिक वन अवधारणा को आध्यात्मिकता और भगवान के भय के साथ पेश किया जाना चाहिए। ये पवित्र वन विभिन्न स्प्रिंग्स का आधार हैं। हिमालयी समुदाय के पास पूर्व से ही स्प्रिंग्स की मैंिपंग हैं। क्योंकि वे जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन ही स्प्रिंगहेड प्रबंधन में पूर्व से ही संरक्षण का काम सामूहिक रूप से करते आये थे। होना अब यह चाहिए कि ‘‘बसन्त प्रबन्धन कार्यक्रम’’ में इन्ही महत्वपूर्ण क्षेत्रों का अध्ययन करना होगा। चर्चा के दौरान बताया गया कि पूर्व में चुनौती इस बात की रही है कि पानी के परीक्षण तंत्र व उपकरण बहुत महंगे हैं। यहां सरल तकनीकों की आवश्यकता है। वृद्ध हो चुके सेप्टिक टैंक पर भरोसा कर रहे हैं, सीवेज प्रबंधन प्रणाली नहीं है, हमारी नदियों के छोर कचरे का डंपिंगयार्ड बन रहे हैं।

चर्चा में लोगो ने कहा कि क्या नदियों जैसे स्प्रिंग्स के न्यूनतम ई-प्रवाह की आवश्यकता है? औद्योगिक, या वाणिज्यिक और निजी जैसे विभिन्न सेटअप के पैरामीटर, प्रत्येक निगरानी पहलू में अलग-अलग पैरामीटर होंगे। इस पर आईआईटी रूड़की से आये विशेषज्ञ डा॰ सुमित सेन कहा कि नीत आयोग का यह ‘‘बसन्त पुर्नरूद्धार प्रबन्धन कार्यक्रम’’ जो स्प्रिंग्स पुनरुद्धार के लिए है वह न केवल पहाड़ी समुदायों के लिए है यह डाउनस्ट्रीम समुदायों के लिए भी है, कहा कि उनके पास एक विशाल डेटा है, जिसे वे वैश्विक शोधकर्ताओं के साथ साझा कर रहे हैं। वे अपने डेटाबेस को डिजिटाइज कर रहे हैं, जिसके माध्यम से ज्ञान साझा करने में समुदाय को मदद मिल सकती है। यही नहीं आईआईटी रूड़की विभिन्न ऊर्जाओं के एकीकरण को चैनलाईज पर भी काम कर रही है। ताकि भविष्य में जल उत्पादकता पर ऐसे ज्ञान-विज्ञान को उपयोग में लाया जा सके। पीएसआई के निदेशक देवाशिष सेन ने कहा कि नदी के कायाकल्प, मिट्टी की नमी, जंगलों और वनस्पति में मदद करने वाले विभिन्न स्प्रिंग्स की पारिस्थितिक तंत्र को विकसित करने की आवश्यकता है।

कार्यशाला में लोगो ने विभिन्न स्तर पर सुझाव दिये हैं। उनके सुझाव वैज्ञानिको व विशेषज्ञो ने सहज ही स्वीकार किये है। विशेषज्ञो ने कहा कि लोक आधारित ज्ञान ही स्प्रिंग्स पुनरूद्धार कार्यक्रम में कारगर साबित हो सकते है। इस दौरान चर्चा में सामने आया कि स्प्रिंग्स सूखते क्यों हैं, क्या यह केवल जलवायु परिवर्तन है, क्या कोई मानववंशीय दबाव काम कर रहा है? भूगर्भीय प्रणाली में मृदा और जल संरक्षण की आवश्यकता है कि नहीं, विभिन्न वन प्रजातियों की भूमिका, पाइन और ओक वन का प्रभाव और उनकी भूमिकाओं के क्या पैरामीटर व मानकीकरण होंगे। सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को देखना होगा कि ऐसा हस्तक्षेप सामाजिक रूप से स्वीकार्य और टिकाऊ है या नहीं। स्प्रिंग्स के घटते स्तर को फिर से जीवंत करने के लिए स्प्रिंग्स और उसके स्थान और इसकी सेवाओं पर ध्यान देना होगा। अर्थात वन विभाग की जिम्मेदारी भी नीहित होनी चाहिए। इसके लिए पीसीसीएफ के तहत कर्मचारियों और रेंजरों के संगठनात्मक स्तर के प्रशिक्षण और शैक्षणिक जागरूकता के कार्यक्रम अनिवार्य होनी चाहिए। कार्य योजना में वाटरशेड प्रबंधन और संरक्षण से संबंधित दो स्तर पर काम करने की आवश्यकता है। पहला निर्वहन आधारित और दूसरा समुदाय आधारित। कैंपा जैसी परियोजना के धन को स्प्रिंग्स पुनरूद्धार कार्यक्रम में 80 प्रतिशत उपयोग करने की जरूरत है।
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स्प्रिंग का महत्व और छोटे जलस्रोतो की उपेक्षा को लेकर राजधानी स्थित में चिराग, सिडार और अरध्यम् संस्थाओं के संयुक्त तत्वाधान में एक दिवसीय कार्यशाला को आरम्भ करने से पूर्व सभी प्रतिभागियों ने पूर्व प्रधानमंन्त्री अटल बिहारी वाजपेय के देहवासन पर दो मिनट का मौन रखा और उन्हे अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली अर्पित की है। कहा कि ऐसे दुर्लभ व्यक्तित्व व कृतित्व की कमी देशे ताउम्र सालती रहेगी।
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Wednesday, August 8, 2018

सिर्फ मुआवजा, हादसो को रोकने का कोई रास्ता नहीं

सिर्फ मुआवजा, हादसो को रोकने का कोई रास्ता नहीं

प्रेम पंचोली

पिछले 17 वर्षो में उत्तराखण्ड में मोटर दुर्घटनाओं ने हजारो की जाने ले ली है। पर इस तरह के हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे है। आंकड़े गवाह है कि साल 2015 व 2016 में 3114 छोटी बड़ी मोटर दुर्घटनाऐं हुई है। जिनमें 1875 लोग मौत के मुह में समा गये हैं। जबकि 3411 लोग बुरी तरह से घायल हुऐ है। इन घायलो में से अधिकांश लोग उस हादसे के कारण उबर नहीं पा रहे हैं। इसी तरह पिछले 17 वर्षो में सिर्फ व सिर्फ 843 बार बसें दुर्घटनाग्रस्त हुई है। आंकड़ो की फेहरिस्त लम्बी है। ये वे आंकड़े है जो पुलिस के पास दर्ज हुए है। पहाड़ो में ऐसी भी मोटर दुर्घटनाऐं हुई है जो दर्ज नही हो पाई है। वैसे भी इन आंकड़ो को पढकर पत्थर दिल भी पसीज जाये। मगर राज्य की व्यवस्था इतनी बिगड़ चुकी है कि वाहन दुर्घटनाओं का कारण तक नही ढूंढ पाई है। सत्ता में चकनाचूर जनता के नुमाईन्दे एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के सिवाय और कुछ करने की जहमत नहीं उठाते।

यहां आलम यह है कि सरकारी एवं गैर सरकारी मोटर वाहनो में कोई अन्तर नहीं है। और ना ही इस प्रदेश की सड़को की दुर्दशा पर कहना होगा। खैर अभी बात करते है मोटर वाहनो की। सार्वजनिक क्षेत्रों के लिए यातायात सुलभ करने वाली बसे अधिकांश डग्गामार स्तर की है। कई बार सड़क एवं परिवहन विभाग ने इन डग्गामार स्तर की बसों को संचालन करने के लिए प्रतिबन्धित भी किया है पर राज्य में इन बसों की यूनियने इतनी मजबूत है कि सत्ता में बैठे लोगो को इनके सामने घुटने टेकने पड़ते हैं। बस और अन्य मोटर वाहनो के यूनियनों की में कोई और मांग नहीं रहती फकत इसके कि उनकी मोटर वाहनो की उम्र बढाई जाये। इस तरह ये डग्गामारी बसे फिर लोगो की जान पर आ जाती है। इसके अलावा राज्य की कुछ सड़के ऐसी है जहां पर यातायात सुलीा करवाने के लिए स्थानीय बसों का एक छोटा सा बाड़ा सुविधा दे रहा है। अधिकंाश जगह ऐसी है जैसे जौनसार क्षेत्र और ऐसे ही अन्य दूरदराज के क्षेत्रो में यूटिलिटी जैसी सूक्ष्म माल वाहन गाड़ियां यातायात में जितनी सुविधा दे रही है उससे अधिक ये गड़ियां दुर्घटनाओं को न्यौता दे देती है। इन यूटिलिटीयों में कमसे कम 50 लोग सवार हो जाते है। इस तरह सरकार की मंशा पर सार्वजनिक यातायात से संबधित सवालिया निशान खड़ा होना लाजमी है। लोगो का गुस्सा इस बात पर रहता है कि अब तक की सरकारों ने प्रदेश में सुलभ यातायात की ओर कोई कदम नहीं उठाये।

ज्ञात हो कि कुछ अर्से पहले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का एक बेटा रोड़वेज की बस से दिल्ली से अल्मोड़ा की तरफ आ रहे थे वह भी अल्मोड़ा पंहुचने से पहले गरमपानी के आसपास हुई बस दुर्घटना में हादसे का शिकार हुआ। जौनसार क्षेत्र के खत बहलाड़ का एक दाम्पत्य अपनी मोटर साईकिल से अपने एक छोटे बच्चे के साथ विकासनगर से नागथात की ओर अपने घर को लौट रहे थे। रास्ते में तेज बारिस होने की वजह से उसने अपनी पत्नी व बच्चे को यूटिलिटी पर बैठा दिया। उसके देखते ही देखते जैसे यूटिलिटी एक किमी नागथात की ओर आगे बढी वैसे उसके ही सामने यूटिलिटी गहरी खाई में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। यह हादसा इतना खतरनाक था कि जब तक वह संभलता तब तक उसकी पत्नी व बच्चे सहित 11 लोगो की मौत हो चुकी थी। ऐसी कई दुर्घटनाऐं हैं जो दिल दहला देने वाली है। जौनसार क्षेत्र के बहुबिख्यात लोक गायक जगतराम वर्मा भी त्यूणी से विकासनगर जा रही डग्गामार बस में हादसे का शिकार हुआ जिसमें 27 लोगो की जाने गई।

इसी तरह उत्तराखंड के टनकपुर के बिचई क्षेत्र में तड़के बेकाबू ट्रक ने पूर्णागिरी दर्शन करने जा रहे श्रद्धालुओं के जत्थे को रौंद डाला। इस दर्दनाक हादसे में यूपी के 11 श्रद्धालुओं की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 20 श्रद्धालु घायल हो गए. इसमें सात लोगों की हालत बहुत ही गंभीर बताई गई। ताज्जुब इस बात का है कि उतरप्रदेश के नवाबगंज इलाके के बुखारपुर गांव के श्रद्धालु देवी मां की डोली को लेकर पैदल जा रहे थे, उसी वक्त प्रातः एक बेकाबम ट्रक ने उनको रौंद डाला। पुलिस के मुताबिक बुखारपुर से लोग मां पूर्णागिरी के दर्शन करने जा रहे थे। इस दौरान बुखारपुर सहित आसपास के अन्य गांवों के करीब ढाई सौ लोगों का जत्था बरेली से पूर्णागिरी के लिए रवाना हुआ। लेकिन रास्ते में इतना बड़ा हादसा हो गया कि बुखारपुर गांव में शायद ही कोई घर बचा हो जहां पर किसी के यहां कोई मौत न हुई हो। एक के बाद एक हादसे हर किसी को सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। पूर्व के हादसो के दुखड़े जैसे के तैसे है कि एक सप्ताह के के भीतर रोडवेज की बस उत्तरकाशी टिहरी के बीच सुल्याधार में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। जो 300 मीटर गहरी खाई में जा गिरी। राज्य सरकार ने हादसे की न्यायिक जांच के आदेश दिए। हादसे में 14 लोगों की मौत हो गई। 16 यात्री गम्भीर रूप से घायल हुए। बताया गया कि हादसा सुबह करीब आठ बजे चंबा-धरासू मोटर मार्ग पर सुल्याधार के पास हुआ। उत्तराखंड परिवहन निगम की बस संख्या यूके 07 पीए 1929 का चालक नियंत्रण खो बैठा और बस करीब 300 मीटर गहरी खाई में जा गिरी। बस में 30 यात्री सवार थे।

ताज्जुब हो कि एक तरफ राज्य की सड़को की हालात बहुत खराब है तो वहीं दूसरी तरफ सार्वजनिक हित में यातायात की सुविधाऐं अधिकांश ‘‘डग्गामार’’ है। ऐसे में यहां सफर करना जान को हथेली पर रखना जैसे है। अब सरकारी रोडवेज के बाड़े की बसों की बात करें तो वे बहुत तेज गति से चलते है। उनसे जानने से पता चला कि ऐसा क्यों? तो कह देते हैं कि उन्हे सही समय पर पंहुचना है। परन्तु लोग बताते हैं कि सर्वाधिक मोटर दुर्घटनाऐं तेज गति से चलने पर ही हुई है। सच यह है कि उत्तराखण्ड रोडवेज की बसे पहाड़ में 60 किमी से भी अधिक प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ती है। जबकि पहाड़ पर वाहनो की रफ्तार 30-35 के मानक पर बताई जाती है। बल्कि कई जगहो पर लिखा भी होता है कि अधिकतम रफ्तार 30-35 की ही होनी चाहिए। पर कोई इसे स्वीकार तो करे। यह भी दुर्घटनाओं का कारण बनता जा रहा है। यही नहीं उत्तराखण्ड रोडवेज की लगभग 500 से अधिक बसें अपनी रिटायरमेंट की समय सीमा पार कर चुकी है।

उल्लेखनीय हो कि उत्तराखंड में आए दिन सड़क हादसे हो रहे हैं। अप्रैल 2016 में भी उत्तराखंड-हिमाचल बार्डर पर एक बस के गहरी खाई में गिरने से 44 लोगों की मौत हो गई थी। फिर ये हादसे क्यों नहीं रुकते? उत्तराखंड सरकार पहाड़ में आए दिन होने वाले सड़क हादसों से सबक क्यों नहीं लेती? सबक लेती है तो फिर जांच आयोग से आगे बढ़कर कार्रवाई क्यों नहीं करती? ये कुछ बड़े सवाल हर किसे के जेहन में कौंध रहे हैं। यहां लोगो की जुबान पर यही सवाल है कि आखिर उत्तराखंड में सडक हादसों पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा सकती है। जिस विभाग के पास सडक हादसों को राकने की जिम्मेदारी है, वह खुद ही चैन की नींद सोया हुआ है। जगजाहीर यह है कि उत्तराखंड में सडक हादसो की प्रमुख वजह ओवर लोडिंग, अनफिट वाहनों पर परिवहन विभाग की कार्रवाई न होने के साथ ही बिना हैवी ड्राविंग लाइसेंस के हजारों चालकों के द्धारा वाहन चलाना बताया जाता है। इधर लोगो का सुझाव है कि अगर परिवहन विभाग अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझे और ओवर लोडिंग, अनफिट वाहनों के चलने पर रोक लगाने के साथ ही बिना हैवी ड्राइविंग लाइसेंस के चालकों को वाहन न चलने दे तो निश्चित तौर से उत्तराखंड में सडक हादसों पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। स्थानीय लोगो की माने तो जिस तरह से प्राइवेट अनफिट वाहन प्रदेश की सडकों पर दौड रहे हैं, उसे प्रदेश में सड़क हादसों में इजाफा देखने को मिल रहा है। यही वजह है कि पिछले 17 वर्षो के सड़क हादसे चैकाने वाले हैं। सड़क हादसों के आंकड़े आपके जेहन को कभी कंपकपा देने वाले हैं। उत्तराखंड में लगातार बढ़ रहे सड़क हादसों के बाद जहां परिवहन विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ हैं, वहीं रोडवेज कर्मचारी परिवह निगम के इस लापरवाही के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी कर रही हैं।

आंकड़ो की बनगी देखेंगे तो उत्तराखंड में हर महीने में चार बस सड़क हादसे हो रहे है। यानी कि बीते 17 साल में 843 बस हादसे हो चुके हैं। वहीं, अन्य वाहनों से हुए हादसों को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो इनमें लगभग तीन हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और पांच हजार से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। पुलिस की मानें तो अधिकांश बसें ओवरलोडिंग या फिटनेस न होने की वजह से दुर्घटना का शिकार हुई हैं। पौड़ी के धूमाकोट में हुए बस हादसे में 48 लोगों की मौत से राज्य की सरकारी मशीनरी और परिवहन सुविधाओं पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। अप्रैल 2016 में देहरादून के त्यूणी में हुए बस हादसे में 44 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। मगर न तो सरकार ने इससे सबक लिया और न ही हादसों के मूल कारणों की पड़ताल कर इसे रोकने के लिए कोई ठोस पहल की गई। नतीजा धूमाकोट हादसे के रूप में सामने हैं। यह स्थिति तब है जब राज्य में एक माह में औसतन चार बस किसी न किसी रूप में हादसे का शिकार होती हैं और लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं। हादसों के आंकड़े भी चैंकाने वाले हैं। त्यूणी बस हादसे के बाद उत्तराखंड पुलिस ने विगत 17 वर्षो में अलग-अलग वाहनों से हुए हादसों की फाइलें पलटीं तो सामने आया कि इस दौरान बसों से 843, ट्रकों से 1139, जीप से 849, मोटरसाइकिलों से 1548, टैक्सी से 969 और कार से 2129 सड़क हादसे हो चुके हैं। इनमें 2497 की मौत हो चुकी है और 4978 लोग घायल हुए।

40 फीसद बाहरी राज्यों के वाहन हुए दुर्घटनाग्रस्त 

पर्यटन और चारधाम यात्रा को लेकर उत्तराखंड में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में अन्य राज्यों से लोग यहां आते हैं। इनमें से अधिकांश को न तो पर्वतीय मार्गो के तीव्र मोड़ की जानकारी होती है और न ही दुर्घटना बाहुल्य क्षेत्रों के बारे में अंदाजा होता है। पुलिस सूत्रों की मानें तो हादसे का शिकार होने वालों में चालीस फीसद वाहन बाहरी राज्यों के होते हैं।

ओ॰ ओ॰ ओ॰ जानिए क्या है ये

सड़क हादसों का मुख्य कारण ओ यानि ओवरस्पीड, ओवरटेक और ओवरलोडिंग को ध्यान में रखा जाए तो सड़क हादसों में कमी आ सकती है। ओ यानी ओवरस्पीड, ओवरलोडिंग और ओवरटेक के दौरान नियमों की अनदेखी 60 फीसद सड़क हादसों का मूल कारण होती है। इसे लेकर पुलिस कार्रवाई भी करती है, फिर भी हालात जस के तस हैं। पौड़ी के धुमाकोट में हुए बस हादसे में 48 लोगों की जान चली गई। हादसे की असल वजह क्या रही, तंत्र इसकी पड़ताल में जुट तो गया, लेकिन, एक बात तो साफ हो चुकी है कि 28 सीटर बस में क्षमता से दोगुने यानी 61 यात्री सवार थे। ऐसे में स्पष्ट है कि सरकार की सार्वजनिक यातायात सुविधा लोगो की जानलेवा बन रही है।

अस्थाई राजधानी भी अछूती नहीं

देहरादून की बात करें तो यहां सड़क हादसों में प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ सौ से अधिक लोग जान गवा देते है, वहीं इससे दो गुना घायल होकर जिंदगीभर दुर्घटना का दंश झेलते हैं। पुलिस विभाग के अनुसार सड़क हादसों का सबसे अहम कारण अप्रशिक्षित चालक, लापरवाही, ओवरलो¨डग और यातायात नियमों का पालन नहीं होना है। यही नहीं सड़कों पर पार्किंग, अधूरे सड़क निर्माण, यातायात संकेतकों की कमी, ओवरलोड वाहन व तेज रफ्तार सहित ऐसे बहुत से कारण हैं, जिन पर कार्रवाई न होने के कारण स्थिति चिंताजनक होती जा रही है।

आरोप प्रत्यारोप


सुल्याधार में हुई बस दुर्घटना की वजह को बीआरओ की लापरवाही बताई जा रही है। जहां दुर्घटना हुई वहां काजवे बन रहा है। बीआरओ डेढ़ वर्ष में इसे नहीं बना पाया है। आपको बता दें कि पिछले दिनों उत्तराखंड के ही पौड़ी गढ़वाल जिले में भी एक भीषण बस हादसा हुआ था, जिसमें 48 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। इस हादसे को भी सड़क पर बने एक बड़े गड्ढे को बताया जा रहा है। यह आरोप-प्रत्यारोप संबधित विभाग के मंत्री और उच्चस्तरीय कर्मचारी लगा रहे है। कुलमिलाकर सड़क हादसों की वजह दोनो हो सकती है जैसे लोग बताते है। लोगो का कहना है कि सड़के भी खराब है, ओवरलोडिंग, ओवर स्पीड और डगगामारी बसे तथा यातायात की व्यवस्थित सुविधा ना होना ही सड़क हादसे लोगो की जाने लील रहा है।

सिर्फ मुआवजा

पिछले 17 वर्षो में जितने भी संड़क हादसे हुए हैं और इन हादसो में जिन लोगो ने जाने गंवांई है उनके परिजनों को सभी मुख्यमंत्रियों ने एक लाख से दो लाख रूपय तक का मुआवजा दिया है। मगर हादसों को राकने के कोई कदम नहीं उठाये हैं। सिर्फ हरिश रावत ने अपने मुख्यमंत्रीत्वकाल में रात्री में चलने वाली रोड़वेज की बसों में अतिरिक्त चालक की व्यवस्था की है।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...