प्रेम पंचोली
राज्य बनने के बाद यह भी आकांक्षा थी कि उपेक्षित लोक कलाकारो को एक मंच मिलेगा जिससे के माध्यम से वे लोक कलाकार अपनी लोक संस्कृति को न कि संरक्षित कर पायेंगे बल्कि देश दुनियां में इसके प्रदर्शन का लोहा मनवायेंगे। ऐसा तो कुछ दिखाई दिया नही पर राजनीतिक मंचो पर इन कलाकारो को खूब ठुमके लगाते हुए दिखाई दिये। ऐसा भी कई बार का दौरा आया कि अमुक संास्कृतिक दल मंच पर अपनी प्रस्तुति दे रहा हो और ऐसे में किसी राजनेता का आगमन हो जाये तो इन कलाकारो से मंच से ही तुरन्त कार्यक्रम रद्द करने को ही नहीं कहा जाता वरन् उनसे मंच के माईक व साजो-सामान छीन करके अमुक राजनेता के खिदमत में आयोजक प्रशंसा की झड़ियां लगा बैठते हैं।
उल्लेखनीय हो कि संरक्षण का तो सवाल ही नहीं उठता परन्तु यदि लोक संस्कृति का राजनीतिक मंचो पर उपयोग करना बन्द हो जाये या लोक संस्कृति को सम्मान की दृष्टी से अवसर दिया जाये तो लोक कलाकारो के लिए इससे बढकर कुछ नहीं होगा। ऐसा कहना है राज्य के विभिन्न सांस्कृतिक दलो के दल नेताओं का। उनका कहना है कि उपेक्षा की बानगी इतनीभर ही नहीं है इससे और आगे है। जौनसार-बावर लोक कलामंच चकराता के नन्दलाल भारती, हिमालय लोक कला केन्द्र अल्मोड़ा के गोकुल बिष्ट, हिमालयी संस्कृति संरक्षण एवं शिक्षा संस्थान उत्तरकाशी के दिनेश भारती, स्पर्श संस्था देहरादून के भगत राणा, धूमसू मंच की शान्ती वर्मा, संगम सांस्कृतिक मंच के हेमन्त बुटोला आदि कलाकारो का कहना है कि उत्तराखण्ड देश का अकेला राज्य है जहां लोक कलाकारो के मानदेय की बढोत्तरी नहीं हुई है। मात्र 400रू॰ के मानदेय पर ये कलाकार अपने तीन दिन लगाते है। जबकि अन्य राज्यों में लोक कलाकारो के मानदेय में दुगुनी बढोत्तरी हो चुकी है। कहते हैं कि ताज्जुब इस बात का है कि सरकारी कर्मचारी अब आठवें वेतनमान की बात कर रहे है, विधायक, सांसद आये दिन सदन में अपने मानदेय को बढाने के लिए प्रस्ताव ला रहे हैं मगर लोक कलाकारो को दैनिक मजदूरी भी पूरी नहीं मिल पा रही है। संस्कृति मंत्री दिनेश धनै तो इस बात से कोई इत्तेफाक नहीं रखते। कहते हैं कि वे लोक कलाकारो को विभिन्न मंचो पर आमंत्रित करते रहते हैं। उधर संस्कृति विभाग की निदेशक वीना भट्ट का कहना है कि लोक कलाकारो के मानदेय बढोत्तरी का प्रस्ताव शासन में लंबित है जैसे ही शासन से स्वीकृति मिल जायेगी वैसे ही लोक कलाकारो को बढा हुआ मानदेय दिया जायेगा।
एक छोटी सी उम्मीद की किरण
भले सोलह साल का समय लग गया हो परन्तु राज्य के रंगकर्मीयों के लिए एक छोटी सी आश तो जगी है कि अन्ततः फिल्म परिषद का गठन हो गया है। इस बात को लेकर राज्य के रंगकर्मीयों में उत्साह है। मगर परिषद के गठन के दौरान से ही कुछ राजनीतिक विवाद आरम्भ हो गया है। कुछ लोगो ने परिषद से इस्तेफे की सिफारिशें की तो कुछ लोगो ने सीनियर जूनियर का सवाल खड़ा किया है। फिल्म परिषद के सदस्य प्रदीप भण्डारी का कहना है कि राज्य में फिल्म से जुड़े लोगो को अब एक खासा प्लेटफाॅर्म उपलब्ध होगा। स्थानीय फिल्म कलाकारो को भी रोजगार प्राप्त होगा और कई कार्य ऐसे हैं जिनसे वे लोग वंचित रहते थे वे अब क्रियाशील होंगे। कहा कि यह भी राज्य की प्रमुख मांगो में से एक थी सो हो गयी पर भविष्य में यदि परिषद को लेकर राजनीति हावी होगी तो यह फिल्म परिषद नहीं रहेगा यह एक राजनीतिक पार्टी हो जायेगी। विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यक व फिल्म से जुड़े बुद्धिजीवियो का कहना है कि परिषद से तिग्मांशु धूलिया जैसे व्यक्तित्व के नाम पर जिस तरह से ओछी राजनीति मौजूदा समय में सामने आई है वह इस परिषद के लिए भविष्य में खतरा है। अगर इस तरह की राजनीति रही तो यह परिषद आने वाले दिनो में राजनीतिक अखाड़ा बन जायेगा।
इधर उत्तराखण्ड फिल्म विकास परिषद की पहली बैठक की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि फिल्म निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिये समेकित प्रयासो पर बल दिया है। उन्होंने प्रदेश में फिल्मकारों को तकनीकि मानव संसाधन उपलब्ध कराने के लिये इंजिनियरिंग काॅलेज व पाॅलिटेक्निक को चिन्हित करने के साथ ही फिल्म प्रशिक्षण के लिये दिल्ली की भांति अल्मोड़ा में स्थापित होने वाले आवासीय विश्वविद्यालय में एक विभाग संचालित करने पर बल दिया और कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में बंद सिनेमा हाॅलो के पुनर्निर्माण आदि के लिये टैक्स में छूट प्रदान की जायेगी। उन्होन यह भी सुझाया कि परिषद के माध्यम से आंचालिक फिल्मों के निर्माण व प्रदर्शन आदि को बढ़ावा देने से संबंधी नीति तैयार की जाय। कहा कि फिल्म निर्माण व क्रियेटिव आर्ट के क्षेत्र में कार्य करने वालो को एमएसएमई नीति के तहत इस क्षेत्र के लिये भी सब्सिडी के लिये नीति तैयार की जायेगी। इसके लिये वित्त, पर्यटन व सूचना सचिव की तीन सदस्यीय समिति गठित करने के भी निर्देश दिये। उन्होंने कहा कि फिल्म निर्माण से जुड़े लोग आर्थिक अभाव में इससे विमुख न हों, इसके लिये अनुदान आधारित धनराशि उपलब्ध कराने पर भी विचार किया जायेगा। इसके साथ-साथ प्रदेश के फिल्म कलाकारो को भी लोक कलाकारों, पत्रकारों की भांति अंशदायी सामूहिक बीमा
योजना का लाभ दिया जायेगा।
फिल्म विकास परिषद के उपाध्यक्ष हेमंत पाण्डे ने कहा कि सिनेमा दिल से जुड़ा विषय है। परिषद के सदस्यों को उनके अनुभवों के आधार पर परिषद की समितियों में भी नामित किया जायेगा ताकि परिषद अपना कार्य और अधिक व्यापकता के साथ कर सके। उन्होंने परिषद की तकनीकि संबर्धन से संबंधित वर्कशाॅप आयोजित करने व सभी जनपदों में फिल्म फेस्टिवल के आयोजन पर बल दिया। बैठक में सचिव एवं महानिदेशक सूचना विनोद शर्मा ने फिल्म विकास परिषद से संबंधित कार्ययोजना व प्रदेश की फिल्म नीति के महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि विभिन्न प्रदेशों की फिल्म नीतियों का अध्ययन कर प्रदेश की फिल्म नीति तैयार की गई है। इसमें यदि ओर कोई महत्वपूर्ण सुझाव होगा, तो उसका भी समावेश किया जायेगा। बैठक में मधवानंद भट्ट, हीरा सिंह राणा, मीना राणा, सतीश शर्मा, जयप्रकाश पंवार, शिव पैन्यूली, एसपीएस नेगी, सुदर्शन शाह, विक्की योगी, फिल्म विकास परिषद मुल्यांकन समिति के अध्यक्ष सुदर्शन जुयाल, चन्द्रवीर, गायत्री और कैबिनेट मंत्री नवप्रभात, विधायक मदन बिष्ट, मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह, सचिव अमित नेगी, शैलेश बगोली, आर मीनाक्षी सुन्दरम, अपर सचिव आर राजेश कुमार, अपर निदेशक सूचना डाॅ. अनिल चन्दोला सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।
जौनसार के टुंगरा गांव में हंगामा
राज्य के जनजातिय क्षेत्र जौनसार-बावर में माहसू देवता के नाम से हर वर्ष माह सितम्बर में ‘‘जागड़ा’’ नाम से गांव-गांव में एक विशाल सांस्कृतिक समारोह का आयोजन होता है। टंुगरा गांव में भी इस वर्ष के समारोह में जहां राज्य की स्वर कोकिला मीना राणा प्रस्तुति देने पंहुची तो वहीं स्थानीय कलाकारो सहित जौनसार क्षेत्र के जौनसारी राॅकस्टार सन्नी दयाल भी मंच पर उतरा। रात्री में जब यह सांस्कृतिक समारोह सबाब पर था तो पाण्डाल में कुछ नौजवान हंगामा काट रहे थे। यहां तक कि मंच का संयोजन करने वाले शख्स ने भी हंगामा काटने वालो का ही साथ दिया। गांव के कुछ समझदार बुजुर्गो के हस्तक्षेप के कारण बड़ी मुश्किल से इस हंगामें पर काबू पाया गया। जबकि प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। हुआ यूं कि मंच पर कुछ कलाकारो की सामग्री छूट गयी थी जिसे प्राप्त करने के लिए गांव के ही सत्यम भारती ने अपनी गाड़ी मंच की तरफ बढाई। बस इस पर गांव के ही कुछ दबंग युवओ ने यूं कहकर हंगामा खड़ा किया कि सत्यम भारती अनुसूचित जाति का है और उनके बिना इजाजत गाड़ी मंच के तरफ कैसे बढाई। इस पर गांव में ही दो जातियों के लोग आमने सामने हो गये।
उल्लेखनीय हो कि जिस जौनसार क्षेत्र को राज्य के लोग सांस्कृतिक सम्पन्न कहते है वहां पर जातिवाद की बू आने लगे तो यह राज्यवासियों के लिए शर्मनाक बात होगी। जौनसार जहां संस्कृति है, गीत हैं, रंगमंच है, परस्परता है परन्तु निछले 10 वर्षो से इस क्षेत्र से जिस तरह की खबरे जातिवाद को लेकर सामने आ रही है वह दुखद है। जौनसार क्षेत्र के वयोवृद्ध पत्रकार एन॰डी॰ जोशी कहते हैं कि जौनसार क्षेत्र की परस्परता टूट रही है, भेदभाव पनप रहा है। सरकारी, गैरसरकारी व परंपरागत आयोजनो में जिस तरह से आज के युवा जातिवाद को पनाह दे रहे है उससे मालूम पड़ता है कि जौनसार आगे नही पीछे की ओर जा रहा है। लेखक व सामाजिक चिन्तक इन्द्रसिंह नेगी कहता है कि किसी भी विवाद को राजनीति से नही जोड़ना चाहिए। यही वजह है कि विवाद का ग्राफ जौनसार में बढ रहा है। पत्रकार भारत सिंह चैहान कहता है कि जौनसार-बावर एक वृहद सांस्कृतिक क्षेत्र है। यहां हर माह किसी न किसी रूप में परपंरागत सास्कृतिक समारोह होते रहते हैं थोड़ी बहुत यदि लोगो में नोंक-झोंक हो जाये तो उसे जातिसूचक जैसे विवादित नहीं बनना होगा। कहते हैं कि अगर ऐसा हो रहा है तो क्षेत्र का दुर्भाग्य है। जौनसार-बावर महासभा के अध्यक्ष मुन्ना राणा कहते हैं कि उन्होने पिछले दिनों समस्त क्षेत्र की आम सभा बुलाई और इस आम सभा में यह निर्णय हुआ कि जौनसार-बावर क्षेत्र के सभी धार्मिक व सांस्कृतिक मंदिर/स्थल सभी धर्मो और जाति के लोगो के लिए खुले कर दिये जाये जो इसका उलंघन करेगा उस पर आवश्यक कानूनी कार्यवाही की जाये। ताज्जुब इस बात की है ऐसे कार्यक्रमों में क्षेत्र के दो बड़े नेता मौजूदा कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह चैहान और भाजपा के प्रवक्ता मुन्ना सिंह चैहान भी सम्मलित होते है परन्तु टुंगरा गांव में हुए घटनाक्रम से वे इत्तेफाक नहीं रखते।
