Saturday, September 28, 2024

धन्य हो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जो आप भू कानून पर संवेदनशील हुए

धन्य हो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जो आप भू कानून पर संवेदनशील हुए



https://youtu.be/QpBN41rYWEs?si=TDpFEJnGPi7mm2iF


आप सोच रहे होगें कि आज भी यह यही कहने वाला है कि आज खास विषय पर बात करने जा रहा हूं। यदि यह खास विषय नहीं है तो कृपया इस वीडियों को देखकर जरूर कमेंट करना। यदि खास है तो भी आप कमेंट करेंगे। कमेंट इसलिए कि विषय खास है। विषय सिर्फ व सिर्फ उत्तराखण्ड राज्य की आत्मा से जुड़ा है। यानि भू कानून का विषय है। 24 साल बाद यदि किसी मुख्यमंत्री ने राज्य के भू कानून पर यह कहा कि वह राज्य में सशख्त भू कानून लाना चाहते है। तो इसमें क्या गलत है। प्रतिपक्ष के लोग जरूर कुछ मेनमेख निकालेंगे, पर वे भी लम्बे समय से भू कानून की पैरवी कर रहे है। यहां मैं बता दूं कि राज्य का कोई ऐसा नागरिक नहीं होगा जो सशख्त भू कानून नहीं चाहता होगा। पहले हम यहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान सुनते हैं जो उन्होंने अन्तरार्ष्टीय पयर्टन दिवस के अवसर पर सचिवालय स्थित पत्रकारो से कहा है।


जी हां! जब राज्य के मुख्यमंत्री जनता की मांग को प्रमुखता से ले रहे हैं तो कौन भला जो इनका विरोध करेगा। विरोध सिर्फ इस बात पर होगा कि जब भू कानून को प्रस्तावति या दस्तावेजीकरण करेंगे तो वह ड्राप्ट एक बार जनता के मध्य तथा उन सभी राजनीतिक सामाजिक संगठनो के पास अवश्य जाना चाहिए जो पिछले कई वर्षो से भू कानून की मांग कर रहे है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह भू कानून एक पार्टी का बनकर मात्र रह जायेगा। फिर उसका विरोध होगा। यहां पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक परिपक्वता का परिचय होगा जब भू कानून का दस्तावेज जनता की संस्तुति के साथ सरकार के पटल पर आयेगा।


अब आप कह रहे होगे कि यह तो हम भी सोच रहे है और यही कहने जा रहे है। यदि सभी ऐसा सोच रहे है और सभी ऐसा कहने जा रहे है तो कोई कौन भला जो सशख्त भू कानून नहीं चाहता होगा। भू कानून आज का सवाल नहीं है यह राज्य आन्दोलन के दौरान से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जो राज्यहित में जरूरी है।

 

राज्य का आन्दोलन का अपना इतिहास रहा है। यदि हम भू कानून की बात करेंगे तो हमे भी कुछ पीछे के इतिहास की ओर नजर दौड़ानी होगी। राज्य सभा द्वारा 10 अगस्त को पृथक उत्तराखण्ड राज्य के बिल को मंजूरी देने के पश्चात राष्ट्रपति ने 28 अगस्त, 2000 को राज्य के गठन की अधिसूचना जारी कर दी थी। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने 1 नवंबर, 2000 को उत्तराखंड की पहली सरकार का गठन करने का फैसला किया। लेकिन पता चला कि उक्त दिन ग्रह नक्षत्रों के हिसाब से शुभ नहीं है। शुभ की आशा में 9 नवंबर, 2000 को नए राज्य ने आकार ग्रहण किया। पृथक राज्य का यह संघर्ष सिर्फ भूगोल का संघर्ष नहीं था। इस संघर्ष को समझना हो तो इसके बीज के रूप में 2 दिसंबर, 1815 को हुई सिगौली की संधि से समझ सकते हैं। इसी का विस्तार पृथक राज्य आंदोलन के रूप में होता है। तब भी मामला सिर्फ भूगोल का नहीं था बल्कि संसाधनों के हक हकूक का था और राज्य आंदोलन में भी सवाल सिर्फ भूगोल का नहीं बल्कि पहचान और संसाधनों के हक हकूक का रहा है।

 

किसी भी राज्य और नागरिक के लिए जमीन बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। इसके बिना किसी भी प्रकार के विकास की कल्पना करनी अधूरी ही कही जायेगी। इसलिए कह सकते हैं कि इस राज्य के लिए भी भूमि प्राथमिक संसाधन है। सभी प्राकृतिक संसाधनों का आधार भी भूमि ही है। इसलिए भूमि का सवाल औपनिवेशिक दौर से ही उठता आ रहा है। औपनिवेशिक ताकतों ने भी सबसे पहले उत्तराखंड की भूमि को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की है। 1815 में कुमाऊ पर ब्रिटिश का राज हो गया था। तत्काल रेम्जे ने दो तथा पी और गूज ने एक-एक भूमि बंदोबस्त कर दिया। ब्रिटिश काल का अंतिम बंदोबस्त 1928 में इबट्सन ने किया। आजाद भारत में सन् 1960-64 में बंदोबस्त किया गया। इसके बाद 2004 में बंदोवस्त होना था जो आज तक नहीं हुआ है। इस तरह से भी यदि देखा जाये तो इस राज्य को पहले बंदोबस्त या पैमाईश करनी अवश्यक है उसके बाद जो संस्तुतिया आयेगी उनके अनुरूप सशख्त भू कानून बनाया जाये। यह एक प्रकार की भूमिका कही जा सकती है।


मगर हमारी सरकारों के लिए जमीन दोहन का साधन रही है। खेती किसानी कभी भी उनकी नीतियों और नियमों के केंद्र में नहीं रही है। औपनिवेशिक काल में भूमि प्रबंध में कृषि को सर्वाधिक महत्व दिया गया था। उस समय कुल राजस्व भूमि का 55.94 प्रतिशत भाग भूमि के अंतर्गत था। बाकि 44.06 प्रतिशत भूमि बेकार थी। भूमि का बड़ा हिस्सा वनों से आच्छादित था। ब्रिटिश शासन ने वनों का राजकोषीय दृष्टि से उपयोग सन् 1860 से किया। सन् 1878 में वन भूमि का बड़ा भाग सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया और वनों के व्यापारिक दोहन की प्रक्रिया आरंभ कर दी। औपनिवेशिक सत्ता का यह कार्य उत्तराखंड में भूमि उपयोग के इतिहास में निर्णायक बिंदु है, जिसकी गूंज आज भी वनों के आस-पास बसने वाले समुदायों के आंदोलनों के रूप में सुनाई पड़ती है।

 

इसके बाद 1890 में नयावाद कानून पास करने के साथ ही ब्रिटिश शासन ने गोचर व पनघटों की जमीनें सरकारी नियंत्रण में कर ली। साथ ही नवावाद के अंतर्गत आने वाले गाँव को अपने द्वारा बसाये गाँव मानते हुए ऐसे गाँव की भूमि के स्वामित्व का अंतिम अधिकार स्थानीय समुदायों से छीनकर उन्हें दोयम दर्जे का स्वामी बना दिया। कमोबेश यही नीतियाँ आज भी किसी न किसी रूप में लागू हैं। यदि ऐसा है तो हमे सबसे पहले इन करतूतो से बाहर निकलना होगा ताकि हम एक खास भू कानून की तरफ बढ पाये।


पृथक राज्य आंदोलन के दौरान भी भू-कानून का सवाल उक्रांद और संघर्ष वाहिनी ने जोर-शोर से उठाया था। पिछले 10 सालों से उत्तराखण्ड में विभिन्न संगठन ही नहीं अपितु आम नगारिक भी भू कानून की मांग बड़ी जोर से कर रहे है। दरअसल भूमि का सवाल पहाड़ की पहचान और हिमालय के संसाधनों से जुड़ा सवाल जो है। अगर हिमालय की जैव विविधता को बचाना है तो उत्तराखंड की भूमि को संरक्षित करना पड़ेगा। परंतु उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक सरकारों की नीतियाँ और कानून भू-माफियों के पक्ष में ही रही हैं उसी का परिणाम है कि हमारी खेती की जमीन लगातार घट रही है।


केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड राज्य में रिकॉर्डेड वन का क्षेत्रफल 37999.600 वर्ग किमी है। यह राज्य के कुल क्षेत्रफल का 71.05 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में भविष्य के उत्तराखंड की जो तस्वीर होगी, उसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। अगर हम आज भी नहीं चेते तो उत्तराखंड का भविष्य भी भू- माफियाओं के हाथों में ही रहेगा। इस पंक्ति में अंकित जानकारी को राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री से लेकर पूर्व के मुख्यमंत्री तक सभी अच्छी तरह समझते है। मगर ऐसा क्या हो जात है कि अब तक के मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर फिसड्डी ही साबित हुए है।


अगर देखा जाये कि जमीन कोई संपत्ति नहीं बल्कि एक पहचान है। इस पहचान का संबंध उस जमीन और हिमालय से है जिसे आज संरक्षित करना सबसे जरूरी है। इस संरक्षण में व्यक्ति, समाज, संस्था और सरकार की क्या भूमिका हो सकती है। उसकी पड़ताल इस अंक में की गई है। जल, जंगल और जमीन का सवाल जीवन के साथ नाभिनालबद्ध है। इसलिए बार बार यह सवाल खड़ा हो रहा है कि भू-कानून को लेकर सरकारों की नीति और दृष्टि को समझना जरूरी है। पर जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बाकायदा पत्रकारवार्ता करके बताया कि वे सशख्त भू कानून चाहते है। यदि उनकी यह मंशा स्पष्ट है तो देर किस बात की। कोई भी उत्तराखण्डी सशख्त भू कानून चाहता है।


इस रिपोर्ट के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के डा॰ प्रकाश उप्रेती के इनपुट को शमिल किया गया है। हमारी यह रिपोर्ट आपको कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताये। अगले अंक में राज्य के किसी खास मुद्दे पर हाजीर होगे।

Tuesday, September 17, 2024

भाषा का बंधन तोड़ा गढ़वाली फिल्म "मीठी" ने।


जबसे उत्तराखंड सरकार ने फिल्मों को सब्सिडी देनी आरंभ की है तब से उत्तराखंडी सिनेमा के दिन वापस लौटते दिखाई दे रहे है। पिछले छः माह में लगभग एक दर्जन आंचलिक फिल्मे सिनेमा हॉल तक पहुंच चुकी है और इतनी ही फिल्मे अगले तीन माह में रिलीज होने के लिए तैयार है। फलस्वरूप इसके फिल्मकारों और उत्तराखंडी फिल्मों से जुड़े सभी का नजरिया भी बदल चुका है। अब वे एकदम मनोरंजक व व्यवसायिक फिल्मे बनाने लग गए है। यहां हाल ही में रिलीज हुई गढ़वाली फिल्म "मीठी - मां कू आशीर्वाद" का जिक्र किया जा रहा है।


हालांकि संस्कृति प्रेमियों को गढ़वाली फिल्म "मीठी - मां कू आशीर्वाद" की कहानी पसंद न आए, पर यह कह सकते हैं कि इस फिल्म ने अपने मुकाम पर व्यवसायिक रूप तो ले ही लिया है।

वैसे भी संस्कृतिप्रेमीयो को खुश होना ही चाहिए की, इस फिल्म में एक पहाड़ी पकवान को वैश्विक दर्जा दिया गया है। यानी फिल्म का कथानक उत्तराखंड पहाड़ी पकवानों के इर्द गिर्द घूमता है। कई बार मिलेट ईयर की चर्चा, कई अन्य होटलों का भोजन पहाड़ी पकवान कंडाली कू साग और झंगोरे की खीर के सामने फीके पड़ते नजर आए है। एक भाषा का न होना कुछ कुछ अंतराल में फिल्म की कहानी भटकती हुई नजर आई है। तात्पर्य है यह है कि इस गढ़वाली फिल्म में 30 फीसदी ही आंचलिक भाषा का उपयोग किया गया है। यह सफल निर्देशन ही कहा जायेगा कि तीन तीन भाषाओं के समीश्रण के बावजूद भी गढ़वाली भाषा को जो प्रमुखता दी गई यह किसी आंचलिक फिल्म में पहली बार हुआ है।


गढ़वाली फिल्म "मीठी - मां कू आशीर्वाद" फिल्म बनाने में फिल्मकारों ने 
तकनीकी का भरपूर उपयोग किया है। चूंकि इस निर्माण में बम्बईया तामझाम बहुत अधिक इस्तेमाल नहीं किया गया, पर कोशिश भरपूर की गई है।

कंडाली कू साग और झंगोरे की खीर जैसे पकवान के इर्द गिर्द बुनी गई फिल्म की कहानी में यह दिखाने की भरसक कोशिश की गई कि पहाड़ में उगने वाली बिच्छू घास भी औषधीय गुणों से भरपूर है और इसकी सब्जी लाजवाब है। फिल्म की कहानी में "स्वाद भारत प्रतियोगिता" के मार्फत बिच्छू घास यानी कंडाली का साग और पहाड़ी मोटा अनाज झंगोरा की खीर ने जब इनके औषधीय गुण बताने आरंभ किए तो निर्णायक भी दांतो तले उंगली चबाने लग गए। अर्थात पहाड़ी मोटे अनाजों और पहाड़ में पैदा होने वाले औषधीय उत्पादों को इस फिल्म में बहुत ही सलीके से प्रस्तुत किया गया है। जबकि कुछ लोग इस फिल्म से इत्तेफाक न रखते हुए यही कहेंगे कि कहानी में और पकवानों को भी दर्शाया जा सकता था, पर यह पहली उत्तराखंडी फिल्म है जिसकी कहानी उत्तराखंडी पकवानों के इर्द गिर्द घूमती है। हां यह भी पहली फिल्म है जिसमें भाषाओं का कोई बंधन नहीं है। गढ़वाली, हिंदी और अंग्रेजी बोली भाषा के मिश्रण का बहुत ही सलीके से पटकथा व संवादों में पिरोने का सफल प्रयास किया गया है।


कैमरा या अन्य तकनीकी संसाधनों की इस फिल्म मेकिंग में कोई कोर कसर नहीं थी, पर जब अभिनय, संवाद गढ़वाली से हिंदी और अंग्रेजी में परोसे जा रहे थे तो ठेठ उत्तराखंडी दर्शक इस दौरान कहानी को एक सूत्र में नहीं पा रहे थे। मगर फिल्म का क्लाइमैक्स वैश्विक स्तर और मनोरंजन के बाजार में अपने को जरूर पा रहा था।


उल्लेखनीय तो यही है कि रोमांस और मारधाड़ के एकदम विपरीत बनाई गई यह गढ़वाली फिल्म निर्देशन की विशेष चतुराई का कमाल माना जायेगा की, जो भावनात्मक और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर संवाद दर्शकों को बांधने में सफल रही है। यही नहीं अधिकांश वक्त कई दर्शकों के आंखों में आंसू भी छलक आए है।
फिल्म का अधिकांश हिस्सा उत्तराखंड के कश्मीर कहे जाने वाले खूबसूरत स्थान जखोल गांव में ही फिल्माया गया है।

इस फिल्म में कुछ व्यवसायिक कलाकारों का न होना ही कभी कभी अभिनय की कमजोरी दर्शकों को बांधने में असफल रही है, पर पूरे ढाई घंटे तक पहाड़ी उत्पादों की महत्ता बताते बताते और पलायन की एक महीन मजबूरी कि पहाड़ में शिक्षा और व्यवसायिक शिक्षा का अभाव दर्शको को बार बार भाव विभोर कर रहा था।

दरअसल यह पहली गढ़वाली फिल्म है जिसमें भाषा का कोई बंधन नहीं रखा गया है। गढ़वाली के अलावा हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण बखूबी है। हो सकता है कि फिल्मकार ने पहाड़ी मोटे अनाज को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पहुंचाने के लिए इस गढ़वाली फिल्म की कहानी का ताना बाना हिंदी और अंग्रेजी के साथ बुना होगा।


फिल्म की कहानी को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कई बार दर्शकों की आंखे नम हुई। निर्देशक के लिए यह बहुत कठीन हो जाता है कि यदि फिल्म में मारधाड़ और रोमांस जैसे मसाला फिल्म में न हो तो वह मनोरंजन करने में विफल हो सकती है। पर "मीठी - मां कू आशीर्वाद" फिल्म में कुशल निर्देशन का कमाल कहा जायेगा कि एक भी क्षण अभिनय, संवाद और भावभंगिमा दर्शकों को विचलित नहीं होने देते।


अर्थात कहनी एक ऐसी विपदाभरी पहाड़ी युवती की है जिसके ऊपर से मां बाप का साया उठ जाता है। वह खुद और उसकी छोटी बहन किशोर अवस्था में होती है। सम्पूर्ण जिम्मेदारियां नायिका मीठी (मेघा खुगसाल) को ही निभाना होता है।

मीठी जैसी विपदाभरी युवती  के चरित्र के साथ पूरी फिल्म सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
फिल्म यह बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती कि उत्तराखंड में पर्यटन, पहाड़ी उत्पाद स्वरोजगार के बेहतरीन संसाधन है। मगर यह बताने में भी फिल्म नहीं चूकती कि पहाड़ के गांव सड़क, यातायात और विद्युत की  समस्या से लगातार जूझते रहते है ।कुलमिलाकर भाषा का बंधन तोड़कर यह गढ़वाली फिल्म ग्लोबल मंच पर उत्तराखंडी पहचान की दमदार प्रस्तुति दे सकती है।

"स्वाद भारत" का जैसे नारों के बीच जब कंडाली (बिच्छू घास) की सब्जी, झंगोर की खीर परोसी ही नही जाती बल्कि संवादों और भाव भंगिमा से यह बताने में कोई कंजूसी नहीं होती कि पहाड़ के यह उत्पाद सुपाच्य के साथ साथ शुद्ध जैविक भी है। जिसमे कोरोना काल का उदाहरण बताया गया है।

यह फिल्म मनोरंजन से लेकर, राज्य के मुद्दे और विषय वस्तु तक दर्शकों को अपनी कहानी से रु- ब - रु करवाने में सफल रही है। इस फिल्म में 50 फीसदी कल्पनाओं का सहारा लिया गया तो 50 फीसदी से जरूरी और सच्ची घटनाओं को कहानी का हिस्सा बनाया गया है। यह भी कह सकते हैं कि "मीठी - मां कू आशीर्वाद" गढ़वाली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर
व्यवसाय कमाने में भी सबसे आगे रही है। 

फिल्म का निर्देशन उत्तराखंडी सिनेमा के जानेमाने निर्देशक कांता प्रसाद ने किया है जबकि अभिनेत्री मेघा खुगसाल ने अपने बेहद खूबसूरत अभिनय ने फिल्म में जान डाली है। फिल्म निर्माण में देहरादून निवासी वैभव गोयल ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

Monday, September 9, 2024

21 वर्ष बाद जब फिर से वरूणावत पर्वत धंसने लगा तो लोगों की रूहें कांपने लग गई।

21 वर्ष बाद जब फिर से वरूणावत पर्वत धंसने लगा तो लोगों की रूहें कांपने लग गई

@PREM PANCHOLI



साल 2003 में जब वरूणावत पर्वत लगातार धंसता ही जा रहा था तो एक बार ऐसा लग रहा था कि अब उत्तरकाशी शहर का अस्तित्व मिटने वाला है। रात को लोग सोते नहीं थे और दिन में दूर जाकर या घरो की छत पर चढकर दिनभर वरूणावत पर्वत को देखते रहते थे। लोगों ने अपने नजर से जिस शहर को बनते देखा उसी को अपने ही नजरों के सामने दफन होते भी देखा। इस आपदा में कई बहुमंजिला होटल सहित 81 सरकारी और गैरसरकारी भवन ध्वस्त हो गए थे। हालांकि, उस समय यह घटना दिन में हुई थीं जिससे जानमाल का नुकसान नहीं हुआ। लेकिन एक माह तक वरुणावत पर्वत से लगातार बोल्डर गिरते रहे। इन्द्रकालोनी, गुफियारा, जल संस्थान कालोनी में रह रहे परिवारो ने अपने जीवन की पूंजी को अपने ही आंखों के सामने दफन होते देखा है। और अब 21 वर्ष बाद यह खतरा फिर सामने दिखाई दे रहा है। जबकि वरूणावत पर्वत का ट्रिटमेंट 100 साल से आगे के लिए किया गया था।

हम और आप वैज्ञानिक नहीं है। पर जो मेरी इस रिपोर्ट को देख रहें होंगे उनमें से शायद कोई वैज्ञानिक हो तो कृपया कमेंट करके हमें सुझाये, ताकि हम आपके सुझाव सरकारी वैज्ञानिकों तक पंहुचा पाये। उत्तरकाशी में वरुणावत पर्वत से लगातार हो रहे भूस्खलन को रोकने के लिए कृत्रिम पहाड़ की परत लगाकर वरुणावत की ढलान को स्थिर किया जाएगा। यह सरकार का वरूणावत पर्वत के भूस्खलन को रोकने का उपचार बताया जा है। यह उपचार कितना कारगार साबित होगा यह भी हम नहीं जान सकते है। हमें तो बताया गया कि 2003 में वरूणावत पर्वत के भूस्खलन को रोकने के लिए 250 करोड़ खर्च किये गये है। और यह भी बताया गया कि इस उपचार की मियादी अगले 100 साल तक होगी। इसलिए लोग कह रहे हैं कि इस वैज्ञानिक उपचार ने तो 21 साल में ही अपनी पोल पट्टी खोल दी है।
 
इधर भूवैज्ञानिकों का कहना है कि अभी वरुणावत पर्वत पर पर हज़ारों टन ऐसा मलबा पड़ा है जो कभी भी ख़तरनाक रूप धारण कर सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि करोड़ो खर्च करने से क्या वरुणावत पर्वत पर जो हज़ारों टन मलबा है उसे रोका जा सकता है। आज तक का इतिहास बताता है कि जब कोई पहाड़ धंसता है तो ऐसे हजारो टन मलबा कुछ ही मिनटो में कब कहां पंहुच जाये जिसका अन्दाजा लगाना मुश्किल है। फिर सवाल उठता है कि करें क्या, कुछ न  कुछ तो करना ही होगा। यह मानव जाती की फितरत भी है। एक बार फिर 21 वर्ष पहले उतरकाशी के वरूणवत पर्वत पर हुए भूस्खलन पर नजर डालते है। सितंबर 2003 से शुरू हुए इस भूस्खलन में अब तक हज़ारों लोग बेघर हुए थे। और छह सौ से भी ज़्यादा इमारतों के साथ ही लगभग 10 करोड़ की संपत्ति का नुक़सान हुआ था।


21 वर्ष बाद जब फिर से वरूणावत पर्वत धंसने लगा तो लोगों की रूहें कांपने लग गई। हालाँकि इन दिनों सूखे मौसम के कारण भूस्खलन की तेज़ी कुछ थम गई है। मगर अब भी रुक-रुक कर वरुणावत से गिर रहे पत्थर और पेड़ों की वजह से लोग किसी अनहोनी की आशंका में जी रहे हैं। स्थानीय निवासी कृष्ण भंडारी ने बताया कि रात में जैसे ओंस गिरनी आरम्भ होती है वैसे पत्थरों का गिरना चालू हो जाता है। इस दहशत में रहकर लोग कोई अनहोनी ना हो कई राते ऐसे ही गुजार चुके है।

यह घटना उत्तरकाशी मुख्यालय की है। मुख्यालय से मात्र 100 किमी के फासले पर विश्व प्रसिद्ध गंगोत्री धाम है। उत्तरकाशी शहर एक तश्तरी के आकार में पहाड़ों की तलहटी में बसा है। भागीरथी इसके बीच से बहती है। शहर का पुराना क्षेत्र वरुणावत की तलहटी में है। अचानक इस पूरे क्षेत्र को तब ख़तरा पैदा हो गया था जब 24 सितंबर 2003 को अचानक ही वरुणावत पर्वत धँसना शुरू हो गया। इस भूस्खलन से शहर का पूरा पुराना हिस्सा तबाह हो गया।

अभी हाल ही में भूवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के एक उच्च स्तरीय दल ने वरूणावत पर्वत का जायज़ा लेने के बाद कहा है कि पहाड़ की ढलानों और चोटी को मज़बूत और स्थिर करके ही इस विपदा को रोका जा सकता है। भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक डॉक्टर पीसी नवानी ने बताया कि इस भूस्खलन का कारण उत्तरकाशी में 1991 में आया भूकंप है। उस भूकंप की वजह से पहाड़ में दरारें पड़ गईं और बारिश में उसमें पानी भर गया। अब पहाड़ इतना कमज़ोर हो गया है कि धँसना शुरू हो गया है।

डॉक्टर पीसी नवानी आगे बताते हैं की वरुणावत पर्वत पर जहां भूस्खलन हुआ है वह संवेदनशील क्षेत्र है। जो कि अब दोबारा सक्रिय हो गया है। इसके ट्रीटमेंट में देरी नहीं की जानी चाहिए। ट्रीटमेंट में देरी खतरे को बढ़ा सकती है। इस पर्वत पर भूस्खलन की एक बड़ी वजह मानवीय हस्तक्षेप है। पहाड़ की तलहटी को खोदने के साथ लोग अब ऊपर की तरफ बढ़ते जा रहे थे, इससे पहाड़ पर बोझ बढ़ा है। इसी वजह से भूस्खलन हुआ है। उन्होंने बताया कि छोटा भूस्खलन यह संकेत होता है कि जोन सक्रिय हो गया है। छोटे भूस्खलन को नजरंदाज करने की जगह उसका जल्द ट्रीटमेंट होना चाहिए, जिससे कि समस्या न बढ़े। वरुणावत पर्वत पर फिर कोई नया भूस्खलन एक्टिव न हो, इसके लिए जरूरी है कि पहाड़ की तरफ निर्माण न हो और बफर जोन खाली रहे।

भू-वैज्ञानिक डॉ.पीसी नवानी बतातें है कि वर्ष 2003 में जब भूस्खलन शुरू हुआ था तो पूरे उत्तरकाशी शहर को ही शिफ्ट करने की बात उठी थी। जिस पर उस समय 5000 करोड़ रूपए खर्च होते, जिसका उन्होंने विरोध किया था। जबकि उन्होने वरुणावत पर 23सितंबर 2003 में हुए भूस्खलन की एक महीना पहले ही चेतावनी दे दी थी। 


राज्य सरकार ने भूवैज्ञानिकों की सिफ़ारिश को बरियता से लिया है। वरुणावत को फिर से मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी टिएचडीसी को दे दी है। आपदा प्रबंधन समिति के सदस्य विजयपाल सिंह सजवान बताते हैं कि इस काम में 35 करोड़ का ख़र्च आएगा। सीमेंट और चारकोल से पहाड़ पर पर्त बनाई जाएगी।


दरअसल उत्तरकाशी की स्थिति कुछ ऐसी ही है कि प्रकृति का कहर टूटता ही रहता है। वर्ष 1978 में गंगा भागीरथी में आई बाढ़ से भारी तबाही हुई। 1991 में आये भूकम्प ने असहनीय क्षती पंहुचाई। जिसमें भारी जन धन की हानी हुई है।

अब तक हमने वरूणावत पर्वत के धंसने और उसे उपचारित करने पर चर्चा की है। एक आम नागरिक की तरह देखें तो यह उपचार कितना कारगर हुआ है वह एक बानगीभर है। उत्तरकाशी शहर के तांबाखानी से लेकर गुफियारा तक पहले से ही बहुत ही खतरनाक जोन रहा है। इसी सिराहने पर वरूणावत पर्वत है। जिसने 2003 में भारी तबाही मचाई है। तब से लेकर यह जोन और खतरनाक हो गया है। जब आप और हम इसके उपचार को देखेंगे तो वरूणावत पहाड़ की चोंटी से लेकर कुछ सर्कील रूप में इसे सीमेंट से पोत दिया है। अब बरसात और बर्फवारी के दौरान इसका पानी सीधा शहर की तरफ आता है जो तांबाखानी से लेकर गुफियारा तक जमा हो जाता है। यानि वरूणावत की तलहटी में। इसी के लिए वरिष्ठ भूवैज्ञानिक डा॰ नवानी बार बार अगाह कर रहे है। एक तरफ वरूणावत पर्वत की तलहटी कमजोर हो रही है और दूसरी तरफ वरूणावत पर्वत में पूर्व की पड़ी हुई दरारें धीरे धीरें खुल रही है। यही इस आपदा का कारण है।


 

Saturday, September 7, 2024

क्षेत्रीय दल उत्तराखण्ड क्रांती दल से हो गया है युवाओ का मोहभंग

 क्षेत्रीय दल उत्तराखण्ड क्रांती दल से हो गया है युवाओ का मोहभंग

@Prem Pancholi 

आज का विषय बहुत महत्वपूर्ण है। उतराखण्ड राज्य की आत्मा से जुड़ा हुआ है। इसलिए कि आज हम आपके साथ उतराखण्ड क्रान्ती दल को लेकर जो बात करने वाले है उसमें क्या क्या घाल मेल है। इस घाल मेल का पता तो उतराखण्ड क्रान्ती दल के ही पास है, पर वे किसी से कहते नहीं है। कहने का तत्पर्य मेरा जनता से है। राज्य बनने के बाद उतराखण्ड क्रान्ती दल ने कभी अपने राज्य की जनता से कहना उचित नहीं समझा। उतराखण्ड क्रान्ती दल ने कुछ कहा है तो सिर्फ व सिर्फ भरतीय जनता पार्टी और कांग्रेस से ही कहा है। इसलिए कह सकते हैं कि राज्य बनने से पूर्व जब उतराखण्ड क्रान्ती दल ने जनता से कहा तो उतराखण्ड क्रान्ती दल के सहयोग से लोग सड़को पर उतर आये। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों ने भी अपने पेट पर लात मारकर सड़क पर उतरे है। इसी का नतिजा है कि आज पृथक राज्य उतराखण्ड में भाजपा कांग्रेस के जैसे उतराखण्ड क्रान्ती दल भी सत्ता की लडाई लड़ रहा है।



जो मै बोल रहा हूं यदि इसमें कोई घाल मेल है तो जरूर कमेंट बॉक्स में बताईये। आज के विषय की ओर लौटते है कि उतराखण्ड क्रान्ती दल राज्य की लड़ाई के बाद सत्ता की लड़ाई में कैसे परिवर्तीत हो गई। दरअसल यही उतराखण्ड क्रान्ती दल का रहस्य है। जब हम उतराखण्ड क्रान्ती दल के संस्थापको की बात करते हैं तो उनमें दिवंगत विपिन त्रिपाठी, दिंवगत इन्द्रमणी बडोनी के अलावा जय प्रकाश उतराखण्डी, सुरेश नौटियाल, काशी सिंह ऐरी, दिवाकर भट्ट जैसे सैकड़ो नामी लोग रहे है। साल 2002 में जैसे उतराखण्ड क्रान्ती दल ने सत्ता की मिठास चखी वैसे उतराखण्ड क्रान्ती दल के तेवर बदले बदले नजर आने लगे। कई बार इनके अहं की लडाई अखबारो की सुर्खियां बनी तो कई बार उतराखण्ड क्रान्ती दल टूटा और पुनः जोड़ा गया। 


यदि हम बहुत पीछे जायेंगे तो उतराखण्ड क्रान्ती दल का अपना एक इतिहास रहा है। मगर आज उतराखण्ड क्रान्ती दल की हालात क्या से क्या हो गई है इसी पर चर्चा आगे बढाते है। मैने शुरूआत में कह दिया था कि उतराखण्ड क्रान्ती दल अब सत्ता की लड़ाई लड़ रहा है। एक किस्से को पढकर समझाता हूं। कुछ बरस पहले उतराखण्ड क्रान्ती दल के कोर ग्रुप की बैठक हो रही थी। अहं का झगड़ा कोर ग्रुप के सिर चढा तो संस्थापक सदस्य रहे वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल को धक्को से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसी दौरान संस्थापक सदस्य रहे वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश उतराखण्डी को भी इसी तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया। इस तरह से जब देखा जाये तो उतराखण्ड क्रान्ती दल के संस्थापको का आपसी झगड़ा भी इस दल के लिए खतरा बनता गया। इसी तरह उतराखण्ड में बन रहे बांधो पर उतराखण्ड क्रान्ती दल ने कभी अपना स्पष्ट वक्तव्य अब तक नहीं दिया। ना ही इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट की है। और भी कई उदाहरण है। यहां हम कह सकते हैं कि उतराखण्ड क्रान्ती दल ने अपने 22 साल अहं की लड़ाई में गुजारे है। जो आगे भी गुजर सकते है।

उतराखण्ड क्रान्ती दल का आगे का समय अहं की लड़ाई में कैसे गुजरेंगा। ऐसा तो हो ही नहीं सकता है। ऐसा आप और हम सभी उतराखण्ड क्रान्ती दल के प्रति अपनी अपनी धारणा प्रस्तुत करते है। मगर पिछले 22 सालो में जिस तरह से उतराखण्ड क्रान्ती दल की स्थिति नजर आ रही है वह तो यही इशारा इंगित करती है। अभी हाल ही में उतराखण्ड क्रान्ती दल से जुड़े कुछ युवाओं ने इस्तेफा दे दिया। इसका कारण जो भी हो, पर इस तरह के हादसे उतराखण्ड क्रान्ती दल को कमजोर करेंगे। बताया जा रहा है कि उतराखण्ड क्रान्ती दल आज भी एक मत नहीं हो पा रहा है कि राज्य के मुद्दो पर कैसे मुखर रूप से आगे बढे।

 

उतराखण्ड क्रान्ती दल से जुड़े युवाओं का मानना है कि उतराखण्ड क्रान्ती दल का जो चरित्र आन्दोलन के दौरान था वही वापस लौटाना पड़ेगा। पर इन युवाओं की कोई सुन नहीं रहा है। बजाय इन्हे ऐसा सिखाया जा रहा है कि सत्ता कैसे पाई जा सकती है, उस पर मंथन करो। जब युवाओं ने कहा कि कांग्रेस, भाजपा जैसे कारनामें वे कर नहीं सकते। वह तो राज्य के मुद्दो पर आगे बढ सकते है तो इस पर मतभेद ही नहीं बल्कि मनभेद भी हो गये है और अन्ततः उतराखण्ड क्रान्ती दल से कई युवाओं को बाहर आना पड़ा।

 

उतराखण्ड क्रान्ती दल के लोगों को याद होना चाहिए था कि उन्होने उतराखण्ड के लोगों को बताया था कि जब उतराखण्ड अलग राज्य हो जायेगा तब भी वे उतराखण्ड की अस्मिता के लिए लगातार संघर्ष जारी रखेंगे। मगर उतराखण्ड क्रान्ती दल 2002 में ही अपने बयान से मुखर गया। उतराखण्ड क्रान्ती दल ने ना तो कभी जल, जंगल, जमीन की बात की है और ना ही कभी इस दल ने स्थानीय बोली भाषा की सुरक्षा पर स्टैण्ड लिया है। फकत भजपा और कांग्रेस के रहमोकरम पर चलते नजर आये है। इसलिए उतराखण्ड की जनता ने सोचा कि जब उतराखण्ड क्रान्ती दल भाजपा और कांग्रेस के जैसे बन गई है तो इन राष्ट्रीय दलों में भी तो उतराखण्डी ही है। इस तरह से उतराखण्ड की जनता उतराखण्ड क्रान्ती दल को भूलती गई। अब हालात इस कदर है कि उतराखण्ड क्रान्ती दल के ही कार्यकर्ता उतराखण्ड क्रान्ती दल से दूरीयां बनाने लग गये। अतः पार्टी से कम लोग जुड़े है और विदा अधिक हो गये हैं।

 

वैसे भी उतराखण्ड क्रान्ती दल से लोग कम जुड़ रहे हैं और पार्टी के मठाधीश उनसे अधिक लोगों को पार्टी से निकाल देते हैं। ऐसे में हालात यह हो गयी है कि निगम चुनाव में पार्टी को 100 वार्डों के लिए 100 उम्मीदवार खड़े करने के भी लाले पड़ जायेंगे। उतराखण्ड क्रान्ती दल के अध्यक्ष पूरन सिंह कठैत एक साल से अध्यक्ष हैं। पूरे साल के दौरान वह 10-12 दिन भी जनता के बीच नहीं दिखे। उतराखण्ड क्रान्ती दल के कुछ लोगों को संदेह है कि क्या भाजपा ने कठैत का मुंह बंद कर दिया होगा? काशी सिंह ऐरी और दिवाकर भट्ट न तो दल से बाहर निकल रहे है और न ही जनसमर्थन में कुछ बोल रहे हैं। वैसे भी उतराखण्ड क्रान्ती दल के लिए कुछ लिखना और कहना तौहीन सा लगता है। लेकिन जब मूल निवास-भू-कानून वाली मुहिम को हथियाने का षड़यंत्र हो रहा है तो उतराखण्ड क्रान्ती दल का जिक्र करना पड़ रहा है।


इधर मूल निवास, भू-कानून समन्वय संघर्ष समिति के संयोजक मोहित डिमरी ने आशंका जतायी है कि यूकेडी एक सितम्बर के प्रदर्शन में खलल डाल सकती है। वह मूलनिवास-भू-कानून आंदोलन को कब्जाना चाहती है। जबकि लूसून टोडरिया के साथ कई युवाओं ने उतराखण्ड क्रान्ती दल से इस्तेफा दे दिया है।


समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...