धन्य हो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जो आप भू कानून पर संवेदनशील हुए
https://youtu.be/QpBN41rYWEs?si=TDpFEJnGPi7mm2iF
आप सोच रहे होगें कि आज भी यह यही कहने वाला है कि आज खास विषय पर बात करने जा रहा हूं। यदि यह खास विषय नहीं है तो कृपया इस वीडियों को देखकर जरूर कमेंट करना। यदि खास है तो भी आप कमेंट करेंगे। कमेंट इसलिए कि विषय खास है। विषय सिर्फ व सिर्फ उत्तराखण्ड राज्य की आत्मा से जुड़ा है। यानि भू कानून का विषय है। 24 साल बाद यदि किसी मुख्यमंत्री ने राज्य के भू कानून पर यह कहा कि वह राज्य में सशख्त भू कानून लाना चाहते है। तो इसमें क्या गलत है। प्रतिपक्ष के लोग जरूर कुछ मेनमेख निकालेंगे, पर वे भी लम्बे समय से भू कानून की पैरवी कर रहे है। यहां मैं बता दूं कि राज्य का कोई ऐसा नागरिक नहीं होगा जो सशख्त भू कानून नहीं चाहता होगा। पहले हम यहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान सुनते हैं जो उन्होंने अन्तरार्ष्टीय पयर्टन दिवस के अवसर पर सचिवालय स्थित पत्रकारो से कहा है।
जी हां! जब राज्य के मुख्यमंत्री जनता की मांग को प्रमुखता से ले रहे हैं तो कौन भला जो इनका विरोध करेगा। विरोध सिर्फ इस बात पर होगा कि जब भू कानून को प्रस्तावति या दस्तावेजीकरण करेंगे तो वह ड्राप्ट एक बार जनता के मध्य तथा उन सभी राजनीतिक सामाजिक संगठनो के पास अवश्य जाना चाहिए जो पिछले कई वर्षो से भू कानून की मांग कर रहे है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह भू कानून एक पार्टी का बनकर मात्र रह जायेगा। फिर उसका विरोध होगा। यहां पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक परिपक्वता का परिचय होगा जब भू कानून का दस्तावेज जनता की संस्तुति के साथ सरकार के पटल पर आयेगा।
अब आप कह रहे होगे कि यह तो हम भी सोच रहे है और यही कहने जा रहे है। यदि सभी ऐसा सोच रहे है और सभी ऐसा कहने जा रहे है तो कोई कौन भला जो सशख्त भू कानून नहीं चाहता होगा। भू कानून आज का सवाल नहीं है यह राज्य आन्दोलन के दौरान से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जो राज्यहित में जरूरी है।
राज्य का आन्दोलन का अपना इतिहास रहा है। यदि हम भू कानून की बात करेंगे तो हमे भी कुछ पीछे के इतिहास की ओर नजर दौड़ानी होगी। राज्य सभा द्वारा 10 अगस्त को पृथक उत्तराखण्ड राज्य के बिल को मंजूरी देने के पश्चात राष्ट्रपति ने 28 अगस्त, 2000 को राज्य के गठन की अधिसूचना जारी कर दी थी। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने 1 नवंबर, 2000 को उत्तराखंड की पहली सरकार का गठन करने का फैसला किया। लेकिन पता चला कि उक्त दिन ग्रह नक्षत्रों के हिसाब से शुभ नहीं है। शुभ की आशा में 9 नवंबर, 2000 को नए राज्य ने आकार ग्रहण किया। पृथक राज्य का यह संघर्ष सिर्फ भूगोल का संघर्ष नहीं था। इस संघर्ष को समझना हो तो इसके बीज के रूप में 2 दिसंबर, 1815 को हुई सिगौली की संधि से समझ सकते हैं। इसी का विस्तार पृथक राज्य आंदोलन के रूप में होता है। तब भी मामला सिर्फ भूगोल का नहीं था बल्कि संसाधनों के हक हकूक का था और राज्य आंदोलन में भी सवाल सिर्फ भूगोल का नहीं बल्कि पहचान और संसाधनों के हक हकूक का रहा है।
किसी भी राज्य और नागरिक के लिए जमीन बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। इसके बिना किसी भी प्रकार के विकास की कल्पना करनी अधूरी ही कही जायेगी। इसलिए कह सकते हैं कि इस राज्य के लिए भी भूमि प्राथमिक संसाधन है। सभी प्राकृतिक संसाधनों का आधार भी भूमि ही है। इसलिए भूमि का सवाल औपनिवेशिक दौर से ही उठता आ रहा है। औपनिवेशिक ताकतों ने भी सबसे पहले उत्तराखंड की भूमि को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की है। 1815 में कुमाऊ पर ब्रिटिश का राज हो गया था। तत्काल रेम्जे ने दो तथा पी और गूज ने एक-एक भूमि बंदोबस्त कर दिया। ब्रिटिश काल का अंतिम बंदोबस्त 1928 में इबट्सन ने किया। आजाद भारत में सन् 1960-64 में बंदोबस्त किया गया। इसके बाद 2004 में बंदोवस्त होना था जो आज तक नहीं हुआ है। इस तरह से भी यदि देखा जाये तो इस राज्य को पहले बंदोबस्त या पैमाईश करनी अवश्यक है उसके बाद जो संस्तुतिया आयेगी उनके अनुरूप सशख्त भू कानून बनाया जाये। यह एक प्रकार की भूमिका कही जा सकती है।
मगर हमारी सरकारों के लिए जमीन दोहन का साधन रही है। खेती किसानी कभी भी उनकी नीतियों और नियमों के केंद्र में नहीं रही है। औपनिवेशिक काल में भूमि प्रबंध में कृषि को सर्वाधिक महत्व दिया गया था। उस समय कुल राजस्व भूमि का 55.94 प्रतिशत भाग भूमि के अंतर्गत था। बाकि 44.06 प्रतिशत भूमि बेकार थी। भूमि का बड़ा हिस्सा वनों से आच्छादित था। ब्रिटिश शासन ने वनों का राजकोषीय दृष्टि से उपयोग सन् 1860 से किया। सन् 1878 में वन भूमि का बड़ा भाग सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया और वनों के व्यापारिक दोहन की प्रक्रिया आरंभ कर दी। औपनिवेशिक सत्ता का यह कार्य उत्तराखंड में भूमि उपयोग के इतिहास में निर्णायक बिंदु है, जिसकी गूंज आज भी वनों के आस-पास बसने वाले समुदायों के आंदोलनों के रूप में सुनाई पड़ती है।
इसके बाद 1890 में नयावाद कानून पास करने के साथ ही ब्रिटिश शासन ने गोचर व पनघटों की जमीनें सरकारी नियंत्रण में कर ली। साथ ही नवावाद के अंतर्गत आने वाले गाँव को अपने द्वारा बसाये गाँव मानते हुए ऐसे गाँव की भूमि के स्वामित्व का अंतिम अधिकार स्थानीय समुदायों से छीनकर उन्हें दोयम दर्जे का स्वामी बना दिया। कमोबेश यही नीतियाँ आज भी किसी न किसी रूप में लागू हैं। यदि ऐसा है तो हमे सबसे पहले इन करतूतो से बाहर निकलना होगा ताकि हम एक खास भू कानून की तरफ बढ पाये।
पृथक राज्य आंदोलन के दौरान भी भू-कानून का सवाल उक्रांद और संघर्ष वाहिनी ने जोर-शोर से उठाया था। पिछले 10 सालों से उत्तराखण्ड में विभिन्न संगठन ही नहीं अपितु आम नगारिक भी भू कानून की मांग बड़ी जोर से कर रहे है। दरअसल भूमि का सवाल पहाड़ की पहचान और हिमालय के संसाधनों से जुड़ा सवाल जो है। अगर हिमालय की जैव विविधता को बचाना है तो उत्तराखंड की भूमि को संरक्षित करना पड़ेगा। परंतु उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक सरकारों की नीतियाँ और कानून भू-माफियों के पक्ष में ही रही हैं उसी का परिणाम है कि हमारी खेती की जमीन लगातार घट रही है।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड राज्य में रिकॉर्डेड वन का क्षेत्रफल 37999.600 वर्ग किमी है। यह राज्य के कुल क्षेत्रफल का 71.05 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में भविष्य के उत्तराखंड की जो तस्वीर होगी, उसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। अगर हम आज भी नहीं चेते तो उत्तराखंड का भविष्य भी भू- माफियाओं के हाथों में ही रहेगा। इस पंक्ति में अंकित जानकारी को राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री से लेकर पूर्व के मुख्यमंत्री तक सभी अच्छी तरह समझते है। मगर ऐसा क्या हो जात है कि अब तक के मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर फिसड्डी ही साबित हुए है।
अगर देखा जाये कि जमीन कोई संपत्ति नहीं बल्कि एक पहचान है। इस पहचान का संबंध उस जमीन और हिमालय से है जिसे आज संरक्षित करना सबसे जरूरी है। इस संरक्षण में व्यक्ति, समाज, संस्था और सरकार की क्या भूमिका हो सकती है। उसकी पड़ताल इस अंक में की गई है। जल, जंगल और जमीन का सवाल जीवन के साथ नाभिनालबद्ध है। इसलिए बार बार यह सवाल खड़ा हो रहा है कि भू-कानून को लेकर सरकारों की नीति और दृष्टि को समझना जरूरी है। पर जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बाकायदा पत्रकारवार्ता करके बताया कि वे सशख्त भू कानून चाहते है। यदि उनकी यह मंशा स्पष्ट है तो देर किस बात की। कोई भी उत्तराखण्डी सशख्त भू कानून चाहता है।
इस रिपोर्ट के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के डा॰ प्रकाश उप्रेती के इनपुट को शमिल किया गया है। हमारी यह रिपोर्ट आपको कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताये। अगले अंक में राज्य के किसी खास मुद्दे पर हाजीर होगे।






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