उनके दुत्कार से संघर्ष की इबारत लिख डाली
प्रेम पंचोली
उसे क्या मालूम था कि उसकी कर्मभूमि अपने देश और पड़ोसी देश नेपाल की सीमा पर होगी। वह तो पहाड़ी थी। उसके माता-पिता सरकारी सेवा में पहाड़ से उतरकर देहरादून के रैवासी हुए तो उसकी परवरिश भी देहरादून में ही हुई। पढाई के दौरान से ही उसके मन में समाज सेवा की ललक कूट-कूट के भरी थी, सो वह पढाई पूरी करके देहरादून में शिक्षण कार्य से जुड़ गयी। मगर कुछ ही अर्से में उसे देहरादून से लखीमपुरखीरी के पास भीरा नामक गांव में अध्यापन के लिए जाना पड़ा। संघर्ष की यह लम्बी गाथा देहरादून के बहुगुणा परिवार में जन्मी और तिवारी परिवार में ब्याही गयी ‘‘रचना बहुगुणा’’ की है। लखीमपुरखीरी में तो लोग ‘‘रचना बहुगुणा तिवारी को रचना भीरा’’ नाम से जानते हैं। रचना के संघर्ष की एक लम्बी फेहरिस्त है। वह मौजूदा समय में महिलाओं के लिए एक नजीर भी है।बता दें कि साल 1986-87 के दौरान रचना परिणय सूत्र में बंधी और सोचा था कि वह अपने पहाड़ में ही शिक्षा के निमित जनसेवा में जुटेगी। ब्याह के बाद रचना और रचना के पति को घर से बाहर रहना पड़ा यानि कि किराये के घर में। जहां उन्होने अपनी आजीविका के लिए बड़े संघर्ष किये। यहां तक कि मसाला पीसकर आजीविका के साधन जुटाये। रचना और रचना के पति का काम रचना के ससुराल पक्ष को हजम नहीं हुआ। इस तरह उनके सामने खुद की दक्षता को संवारने और आजीविका को जोड़ने का एक बड़ा सवल था। वे रोजगार के लिए कई दौर के विभिन्न साक्षात्कार दे चुके थे। वे उच्चशिक्षित थे तो उन्हे मालूम था कि उत्तराखण्ड (तत्काल उत्तर प्रदेश) में कोई न कोई काम मिल ही जायेगा। लेकिन उनकी किस्मत को ऐसा नागवार गुजरा। एक दिन रचना ने किसी पब्लिक स्कूल के लिए साक्षात्कार दिया तो उनका चयन लखीमपुरखीरी के लिए कर दिया गया।
नब्बे के दशक दौर था। राज्य में बेरोजगारी, राज्य की तमाम व्यवस्थाऐं पटरी से उतर चुकी थी अधिकांश शिक्षित बेरोजगार या तो हारकर घर बैठ गये थे या दूर शहर में पलायन कर रहे थे। उत्तरप्रदेश का यह हिस्सा उन दिनो अलग राज्य के आन्दोलन की तैयार कर रहा था। राज्य में अव्यवस्थाओं का अंबार पसरा था। रचना के सामने एक तरफ अव्यवस्थाओं से पसरा संकट और दूसरी तरफ ससुराल पक्ष से असहयोग की समस्या थी जो उनके हुनर के सामने संकट खड़ा कर रहे थे। हालांकि रचना ने कुछ समय देहरादून स्थित चिल्ड्रेन एकेडमी में भी अध्यापन का काम किया। परन्तु यह काम ससुराल पक्ष की अपेक्षा के विपरित था। सो उनके साथ उनके पति का समर्थन था तो वे लखीमपुरखीरी के लिए चल दिये और कुछ दिन रचना ने लखीमपुरखीरी में ही दूसरी स्कूलो में अध्यापन का कार्य किया।
रचना ने देखा कि लखीमपुरखीरी अति बिहड़ क्षेत्र, नेपाल की सीमा से लगा हुआ क्षेत्र, सरकारी स्कूलो की इतने खस्ताहाल कि सिर्फ व सिर्फ कागजीखानापूर्ती के लिए स्कूलो को चलाया जा रहा था। रचना के मन में तो वही समाज सेवा का जूनून उबल रहा था। उससे रहा नहीं गया और अपने रोजगार का जो अध्यापन का काम था उसे छोड़कर दूरस्थ गांव ‘‘भीरा’’ को अपनी कर्मस्थली बना डाली। साल 1995-96 में ‘‘महारज अग्रसेन एकेडमी’’ नाम से एक प्राईमरी स्कूल का श्रीगणेश कर दिया। शिक्षण कार्य के दौरान रचना ने जो कुछ धनराशी बचा रखी थी उसे इस स्कूल पर खर्च कर दी। अति दुर्गम गांव, गांव में राजनेता नही उनके प्रतिनिधि ही सिर्फ वोट मांगने आते हैं, बरसात के दिनों लोग अपने ही घर में सुरक्षित महसूस नहीं करते, मालूम नहीं कब पानी में उनका आशियाना डूब जाये। विकास के नाम की अराजकता इतनी कि कोई यदि पैरवी करे तो उसका भविष्य अन्धकार में। ऐसी परिस्थिति में रचना ने एक नई शुरूआत भीरी गांव में कर डाली। पहले-पहल रचना को कई तरह की जैसे राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मगर धीरे-धीरी रचना की रचनाधर्मिता लोगो के सामने आई। आज रचना उत्तरप्रदेश के लखीमपुरीखीरी क्षेत्र में एक जानी पहचानी चेहरा उभरकर आई है। यही नहीं समाजवादी सरकार जब-जब उत्तर प्रदेश में रही तो सरकार के लोग शिक्षण कार्य के लिए रचना का उदाहरण देते रहे है। मौजूदा समय में तो रचना के काम की प्रसंशा करने में भाजपा के लोग भी पीछे नहीं रहते।
रचना कहती है कि इस काम में उनके पति का अहम योगदान रहा है। उनकी संस्तुति नहीं होती तो वे आज इस मुकाम पर नहीं होती। वर्तमान में रचना द्वारा संचालित उच्च प्राथमिक स्कूल में 700 बच्चे अध्ययनरत है। वे बहुत खुश है। उसकी छोटी बहन रूद्रपुर में एडीएम पद पर है। एक भाई है जो अपने काम में तल्लीन है और बहुत खुश है। रचना के चार बच्चों में से बड़ी बेटी मेडिकल सांईस पासआऊट हैं तो बड़ा बेटा भी एमटेक करके भीरा गांव से 15 किमी दूर पर एक प्राईमरी स्कूल संचालित कर रहा है। जबकि दो बच्चे अपनी आगे की पढाई में मशगूल है। पारिवारिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभाना और अन्य सामाजिक कार्यो में बढ-चढकर हिस्सा लेना कोई रचना से सीखें। ऐसा उनके बारे में चर्चाओं का माहौल गर्म रहता है। माता-पिता रचना के काम की सरहना सुनते ही फूले नहीं समाते। कहते हैं कि रचना का संघर्ष आज भी उनके रौंगटे खड़े कर देता है। रचना कहती है कि कर्मयोगी बनो और सफलता की सीढीया खुद व खुद पार हो जायेगी।

