Tuesday, November 22, 2016

ग्लोबल वार्मिंग: मानव और वन्य जीवों में बढता संघर्ष

ग्लोबल वार्मिंग: मानव और वन्य जीवों में बढता संघर्ष------------------------------------------------------------------------------------------------------


बताया जा रहा है कि अधिकांश जंगली जानवर पानी की तलाश में बसासत की ओर रूख कर रहे है। पेयजल आपूर्ती ना होने पर वे आक्रामक हो रहे हैं। जिस कारण वन्य जीव व मानव में संघर्ष बढ रहा है।---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

प्रेम पंचोली--------------------------------------------------------------------------------------------------------------


जैवविविधता नष्ट हो रही है। प्राकृतिक जल स्रोत सूखने की कगार पर पंहुच चुके हैं। अधिकांश स्रोत तो सिर्फ मौसमी ही रह गये है। फलस्वरूप इसके जंगली जानवरो की फूड चेन, पानी की आपूर्ती सहित गड़बड़ा गयी है। वे अब अपने वासस्थलों को छोड़कर आबादी की ओर रूख कर रहे हैं। हालात यूं बन आई कि कार्बेट नेशनल पार्क में बाघ ने एक हाथीनी को मार डाला। इसी पार्क में हाल ही में बाघ ने चार महिलाओं को भी अपना निवाला बनाया। उत्तरकाशी के दूरस्थ गांव गैर में बाघ ने एक आठ वर्षीय बालक को घर से उठा कर ले गया। पौड़ी में कई स्थानो पर बाघ का इतना आंतक हैं कि लोग झुण्ड बनाकर साथ रहना भी खतरे से खाली नहीं मानते है। इस तरह की घटनाऐं उत्तराखण्ड में आये दिन अखबारो की सुर्खियां बनती जा रही है।
उल्लेखनीय हो कि जलवायु परिवर्तन का असर उत्तराखण्ड हिमालय में प्राकृतिक आपदा के रूप मे ही नहीं दिखाई दे रहा है बल्कि वन्य जीव और मानव के बीच बढ रहे संघर्ष भी इसी का ही असर बताया जा रहा है। जंगली जानवरो को समय पर पानी की आपूर्ती नहीं हो पा रही है, और तो और जंगलो में प्राकृतिक जल स्रोत बड़ी तेजी से सूख रहे हैं, तो उनके मुताबिक के जंगल भी नष्ट हो चुके हैं। इन जीव-जन्तुओं के वासस्थल भी जैवविविधता के दोहन के कारण अपर्याप्त हो चुके है। यही वजह है कि राज्य में दिनों-दिन मानव-वन्य जीव में आपसी संघर्ष जानलेवा होता जा रहा है। इसके अलावा तापमान में उतार-चढाव, बर्फवारी और अचानक बारिश जैसे मौसमी बदलावों की वजह से वन्यजीवों की दिनचर्या और प्रजननकाल में अन्तर आ रहा है। कई परिन्दो नें अपनी दिनचर्या बदल दी है। इस बदलाव के चलते एक हजार छोटे जीव-जन्तुओं का जीवन खतरे में पड़ गया है। वर्ष 2014 में भारतीय वन्य जीव संस्थान के विज्ञानियों ने एक सर्वेक्षण के दौरान यह आंशका व्यक्त की थी आने वाले समय में हाथी-बाघ, बाघ-मानव के संघर्ष तेजी से उभरेंगे। सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह बताया गया था कि वन्य जीवों की आबादी बढने जाने से उनके वासस्थल छोटे पड़ रहे हैं, जिस कारण सीमा व अन्य प्राकृतिक समस्याओं से हाथी-बाघ-मानव-वन्य जीव संघर्ष बढ सकते है।
इधर इसके चलते केन्द्रीय वन, पर्यावरण मंत्रालय ने तीसरे ‘‘वाईल्ड लाईफ एक्शन प्लान’’ की तैयारी आरम्भ कर दी है। जिसे वर्ष 2017 से लेकर वर्ष 2031 तक क्रियान्वित किया जायेगा। इस प्लान में भी सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु मानव-वन्य जीव संघर्ष को मानते हुए कई प्राविधान किये गये है। इसके लिए नये सिरे से वन्य जीवों की नई फूड चेन को विकसित किया जायेगा। वासस्थलो को क्षति पंहुचने व फूड चेन टूटने से वन्य जीव प्रभावित हो रहा है। इस तरह प्लान में मौसम परिवर्तन को तवज्जो दी जा रही है। इस हेतु केन्द्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय वन्य जीव विशेषज्ञों से मशविरा ले रहा है। ज्ञात हो कि केन्द्रीय वन, पर्यावरण मंत्रालय प्रत्येक 15 वर्ष के लिए ‘‘वाईल्ड लाईफ एक्शन प्लान’’ तैयार करता है। जो वन और जन की सुरक्षा में मुफिद हो सके। पर्यावरण के जानकार इसके उलट बता रहे हैं कि जब से जंगल की सुरक्षा सरकार ने वन विभाग को दी है तब से लोग वन संरक्षण में अपने को दूर समझने लग गये है। यही वजह है कि मौजूदा समय में वन माफिया अब वन्य जीव माफिया भी हो चला है। जंगल कम हो रहे हैं तो जंगलो में वन्य जीवों की बहुप्रजातियां भी नष्ट हो रही है। वे सरकारी आंकड़ो को सिर्फ कागजी घोषणा करार देते हैं। कहते हैं कि पहाड़ में हो रहा विकास भी इसका कारण माना जाना चाहिए। विकास के नाम पर पहाड़ में हो रहे बड़े निर्माण क्या वन्य जीवों के रहन-सहन पर प्रभाव नहीं डाल रहे? इस निर्माण के उपयोग में हो रहे रासायनिक पदार्थो और अन्य मशीनी उपकरणों के कारण वन्य जीवों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। जहां उनके वास स्थल नष्ट हो रहे हैं वहीं उनके दोहन में हिजाफा हुआ है। ऐसे कई कारण है जिन्हे इस विकासीय योजनाओं में देखा ही नहीं जाता है। रक्षासूत्र के आन्दोलन के प्रणेता सुरेश भाई कहते हैं कि जिस जंगल व पहाड़ी के नीचे से जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंग जायेगी उस सुरंग के ऊपरी जंगल में रह रहे जंगली जानवर सुरक्षित है? ऐसी विशालकाय योजनाओं के निर्माण के दौरान उपयोग में लाये जा रहे मशीनी उपकरण व अन्य रासायनिक सामग्रीयों से जो जंगली जानवर मारे जाते हैं उनके आंकड़े भी छुपाये जाते है। इधर वन विभाग झूठे आंकड़े प्रस्तुत करके बताता है कि वन्य जीवों की संख्या बढ रही है। पर्यारणविद् व पद्मश्री अनिल प्रकाश जोशी कहते हैं कि पर्यावरण संतुलन का सामान्य विज्ञान है। बड़े जानवर छोटे जानवरो का शिकार करता है। अब छोटे जानवर बहुत कम हो गये, जंगल भी कम हो गये, ऐसे में वन्य जीवों और मानव में संघर्ष की घटनायें नहीं बढेगी तो और क्या। इसलिए योजनाओ के निर्माण से पहले सोचा जाना चाहिए कि इससे जैवविधिता नष्ट तो नही हो रही है? यदि हो रही है तो उसके सरक्षण के उपाय कर देना चाहिए। मगर ऐसा अब तक नहीं हो पाया है। इसलिए पहाड़ में प्राकृतिक आपदायें सिर्फ बाढ-भूस्खलन ही नहीं बल्कि मानव-वन्य जीव संघर्ष भी किसी आपदा से कम नहीं है।
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भरतीय वन्य जीव संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डा॰ जी. एस. रावत का कहना है कि वन्य जीव प्रबन्धन की नीति अपनाई जानी चाहिए। साथ ही प्राकृतिक वासस्थलो में सुधार किया जाना चाहिए। संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डा॰ सत्य कुमार कहते हैं कि भागीरथी बेसिन के वन्य जीवों के रहन-सहन से संबधित तापमान, आर्द्रता, वन्य जीवों की संख्या, वन्य जीवों का बर्ताव आदि का बारीकी से अध्ययन किया जा रहा है। इस अध्ययन में सभी छोटे-बड़ जीवों को सम्मलित किया जा रहा है। प्रमुख वन संरक्षक दिग्विजय सिंह खाती कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन से वन्य जीवों की जिन्दगी पर गहरा प्रभाव पड़ा है, भालू की नींद खराब हो रही है, स्नो लेपर्ड समेत अन्य जीवों का मिजाज भी बदलते हुए देखा जा रहा है।
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सरकारी आंकड़ो पर गौर करें तो प्रदेश में 340 बाघ है और 160 और समाहित हो सकते हैं। इसी तरह अन्य छोटे-बड़े 4880 प्रजाति के जीव-जन्तुओं का वासस्थल भी उत्तराखण्ड हिमालय है। स्टेटस आॅफ टाइगर एण्ड काॅरिडोर इन वेस्टर्न सर्किल की एक अध्ययन रिपोर्ट बता रही है कि अकेले कार्बेअ पार्क में 225 बाघ है जबकि 130 बाघ इसके बाहर होने की प्रबल संभावना है।
वन्य जीव पीड़ितो को अब दुगुना मुआवजा
बाघ, गुलदार, भालू आदि के हमले से घायल पीड़ितो को अब दुगुना मुआवजा मिलेगा। इसके अलावा सर्पदंश से पीड़ित को भी मुआवजा के दायरे में लाया गया है। यह निर्णय हाल ही में राज्य सरकार ने वन्य जीव बोर्ड की बैइक में ली है। मुख्यमंत्री हरिश रावत ने बताया कि मानव-वन्य जीव संघर्ष की बढती घटनाओं के मध्यनजर राज्य सरकारन यह राशी दुगुनी की दी है और सांप के काटने पर दी जाने वाली मुआवजा राशि जल्द ही तय कर दी जायेगी। मुख्यमंत्री ने वन्य जीव बोर्ड को निर्देश दिये कि वे राष्ट्रीय पार्को व अन्य वन क्षेत्रों से होने वाली आय से जंगल से जुड़े गांवों में विकास के कार्य क्रियान्वित करवाया जाये। इसके साथ-साथ इन गावों का सामुहिक बीमा भी करवाया जाये। इस दौरान उन्होने वन्य जीव अपराध नियन्त्रण ब्यूरो के गठन पर सहमती दी है।

हां साहब भ्रष्टाचारियों की चूल्हे हिल गयी

हां साहब भ्रष्टाचारियों की चूल्हे हिल गयी


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विजय बगा
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जब श्री राम श्रीलंका पर चढाई कर रहे थे तो उस वक्त राम सेतु बनाने में गिलहरी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसकी तत्काल की प्रजा में कोई खास प्रचार नहीं हुआ। गिलहरी का काम था कि जब बानर सेना समुन्द्र पर सेतु बनाने बावत पत्थर डाल रहे थे तो गिलहरी उन पत्थरो को रेत व पानी से भीगा कर बानरों के साथ हाथ बंटा रही थी। गिलहरी को पूछा गया कि अरे गिलहरी तू शाररिक रूप से बहुत छोटी है और यह कठीन काम तेरे बस से बाहर है। मगर गिलहरी ने अपना काम किया और सेतु समुन्द्रम् पूर्ण हो गया। क्योंकि गिलहरी एक आम और गरीब जानवरो में गिनी जाती है। फिर भी गिलहरी का वह योगदान राम राज्य में भुले नहीं भुलाया जाता। यह बात रामयण के एक अध्याय में बताया गया है।
यह वाकाया इसलिए सुनाया जा रहा है कि मौजूदा समय में हमारे प्रधानमंत्री ने नोट बंदी को लेकर जो अभियान आरम्भ कर रखा है यहां ऐसी ही परिस्थिति बन रही है। क्योंकि यहां भी आज का रावण राज खत्म करना है। समाज में अहंकारी, भ्रष्टाचारी, दुराचारी, आंतकवादी जैसी रावण संस्कृति पनप रही है। नोट बंदी इसका पहला चरण हो सकता है। हमें इस वक्त प्रधानमंत्री मोदी जी का साथ उस गिलहरी के जैसा देना होगा। यह कटु सत्य है कि नोट बंदी से बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी मगरमच्छो की चूल्हे हिल गयी है। स्पष्ट नजारा है कि बैंक, एटीएम इत्यादी में लोगो की जो लाईने दिख रही है वे भी शान्त रूप से अपनी बारी का इन्तजार करते हुए एक ही जबाब दे रहे हैं कि मोदी जी का निर्णय एकदम सही है। जब तक स्थिति सुधर नहीं जाती तब तक वे धैर्य रख सकते हैं। आम लोगो का यह भी मानना है कि देश में भ्रष्टाचार की पराकाष्टा बढती ही जा रही थी। सो नोट बंदी होने से भ्रष्टाचार पर लगाम लग सकती है। आम लोगो को जितना नगद चाहिए उतने की घोषणा मोदी जी द्वारा की जा चुकी है। आम नागरिक कर के दायरे में इसलिए नहीं आ सकता है कि उसके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए सीमित साधन है।
अब जिनके पास बेनाम संम्पति है चाहे वह चल हो या अचल हो। नगदी हो या जमा पूंजी हो सभी का खुलासा तो अब एक बार करना ही होगा। इससे पता चलेगा कि कौन है जो विकास के साथ खिलवाड़ करके खुद की संपती को दुगुनी-तिगुनी-चैगुनी करता जा रहा है। उदाहरण स्वरूप एक नागरिक को एक माह में लाख रूपये तनख्वा मिल रही है और वह मात्र दस वर्षो में करोड़ो का महल, लाखो की गाड़िया और दिनचर्या में तनख्वा से कई गुना बढकर खर्च कर रहा हो। यही सवाल आज आजाद भारत में कौतुहल का विषय बने हैं। इसलिए आपको अपने संसाधनो को सार्वजनिक करना पड़ेगा। आपकी जमा पूंजी आपके कारोबार और तनख्वा से कई गुना अधिक है तो उसके स्रोत भी सार्वजनिक करने होंगे। क्या यह गलत निर्णय है? यदि यह गलत निर्णय होता तो जिस तरह से लोगो की भीड़ बैंको और एटीएम इत्यादि में जुट रही है उस हालात में लोगों का सब्र का बांध टूट सकता था। परन्तु लोग इसलिए सब्र बांध चुके हैं कि देश में भ्रष्टाचार खुलमखुला बढने लग गया था। जिससे आम नागरिक अजीज आ चुका था। मोदी जी के इस निर्णय से देश का आम नागरिक सहमत है और सहयोग भी कर रहा है। हां कुछ भ्रष्टाचारियों के पेट में दर्द जरूर हो रहा है। पर क्या करें, मोदी जी के साथ तो देश का आम नगरिक है जो राम राज्य के दौरान हुए सेतु समुन्द्रम निर्माण की तरह गिलहरी के रूप में मौजूदा समय में मोदी जी का चुपचाप सहयोग कर रही है।

Friday, October 7, 2016

लोकरंग बनता भदरंग


प्रेम पंचोली
राज्य बनने के बाद यह भी आकांक्षा थी कि उपेक्षित लोक कलाकारो को एक मंच मिलेगा जिससे के माध्यम से वे लोक कलाकार अपनी लोक संस्कृति को न कि संरक्षित कर पायेंगे बल्कि देश दुनियां में इसके प्रदर्शन का लोहा मनवायेंगे। ऐसा तो कुछ दिखाई दिया नही पर राजनीतिक मंचो पर इन कलाकारो को खूब ठुमके लगाते हुए दिखाई दिये। ऐसा भी कई बार का दौरा आया कि अमुक संास्कृतिक दल मंच पर अपनी प्रस्तुति दे रहा हो और ऐसे में किसी राजनेता का आगमन हो जाये तो इन कलाकारो से मंच से ही तुरन्त कार्यक्रम रद्द करने को ही नहीं कहा जाता वरन् उनसे मंच के माईक व साजो-सामान छीन करके अमुक राजनेता के खिदमत में आयोजक प्रशंसा की झड़ियां लगा बैठते हैं।
उल्लेखनीय हो कि संरक्षण का तो सवाल ही नहीं उठता परन्तु यदि लोक संस्कृति का राजनीतिक मंचो पर उपयोग करना बन्द हो जाये या लोक संस्कृति को सम्मान की दृष्टी से अवसर दिया जाये तो लोक कलाकारो के लिए इससे बढकर कुछ नहीं होगा। ऐसा कहना है राज्य के विभिन्न सांस्कृतिक दलो के दल नेताओं का। उनका कहना है कि उपेक्षा की बानगी इतनीभर ही नहीं है इससे और आगे है। जौनसार-बावर लोक कलामंच चकराता के नन्दलाल भारती, हिमालय लोक कला केन्द्र अल्मोड़ा के गोकुल बिष्ट, हिमालयी संस्कृति संरक्षण एवं शिक्षा संस्थान उत्तरकाशी के दिनेश भारती, स्पर्श संस्था देहरादून के भगत राणा, धूमसू मंच की शान्ती वर्मा, संगम सांस्कृतिक मंच के हेमन्त बुटोला आदि कलाकारो का कहना है कि उत्तराखण्ड देश का अकेला राज्य है जहां लोक कलाकारो के मानदेय की बढोत्तरी नहीं हुई है। मात्र 400रू॰ के मानदेय पर ये कलाकार अपने तीन दिन लगाते है। जबकि अन्य राज्यों में लोक कलाकारो के मानदेय में दुगुनी बढोत्तरी हो चुकी है। कहते हैं कि ताज्जुब इस बात का है कि सरकारी कर्मचारी अब आठवें वेतनमान की बात कर रहे है, विधायक, सांसद आये दिन सदन में अपने मानदेय को बढाने के लिए प्रस्ताव ला रहे हैं मगर लोक कलाकारो को दैनिक मजदूरी भी पूरी नहीं मिल पा रही है। संस्कृति मंत्री दिनेश धनै तो इस बात से कोई इत्तेफाक नहीं रखते। कहते हैं कि वे लोक कलाकारो को विभिन्न मंचो पर आमंत्रित करते रहते हैं। उधर संस्कृति विभाग की निदेशक वीना भट्ट का कहना है कि लोक कलाकारो के मानदेय बढोत्तरी का प्रस्ताव शासन में लंबित है जैसे ही शासन से स्वीकृति मिल जायेगी वैसे ही लोक कलाकारो को बढा हुआ मानदेय दिया जायेगा।

एक छोटी सी उम्मीद की किरण
भले सोलह साल का समय लग गया हो परन्तु राज्य के रंगकर्मीयों के लिए एक छोटी सी आश तो जगी है कि अन्ततः फिल्म परिषद का गठन हो गया है। इस बात को लेकर राज्य के रंगकर्मीयों में उत्साह है। मगर परिषद के गठन के दौरान से ही कुछ राजनीतिक विवाद आरम्भ हो गया है। कुछ लोगो ने परिषद से इस्तेफे की सिफारिशें की तो कुछ लोगो ने सीनियर जूनियर का सवाल खड़ा किया है। फिल्म परिषद के सदस्य प्रदीप भण्डारी का कहना है कि राज्य में फिल्म से जुड़े लोगो को अब एक खासा प्लेटफाॅर्म उपलब्ध होगा। स्थानीय फिल्म कलाकारो को भी रोजगार प्राप्त होगा और कई कार्य ऐसे हैं जिनसे वे लोग वंचित रहते थे वे अब क्रियाशील होंगे। कहा कि यह भी राज्य की प्रमुख मांगो में से एक थी सो हो गयी पर भविष्य में यदि परिषद को लेकर राजनीति हावी होगी तो यह फिल्म परिषद नहीं रहेगा यह एक राजनीतिक पार्टी हो जायेगी। विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यक व फिल्म से जुड़े बुद्धिजीवियो का कहना है कि परिषद से तिग्मांशु धूलिया जैसे व्यक्तित्व के नाम पर जिस तरह से ओछी राजनीति मौजूदा समय में सामने आई है वह इस परिषद के लिए भविष्य में खतरा है। अगर इस तरह की राजनीति रही तो यह परिषद आने वाले दिनो में राजनीतिक अखाड़ा बन जायेगा।
इधर उत्तराखण्ड फिल्म विकास परिषद की पहली बैठक की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि फिल्म निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिये समेकित प्रयासो पर बल दिया है। उन्होंने प्रदेश में फिल्मकारों को तकनीकि मानव संसाधन उपलब्ध कराने के लिये इंजिनियरिंग काॅलेज व पाॅलिटेक्निक को चिन्हित करने के साथ ही फिल्म प्रशिक्षण के लिये दिल्ली की भांति अल्मोड़ा में स्थापित होने वाले आवासीय विश्वविद्यालय में एक विभाग संचालित करने पर बल दिया और कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में बंद सिनेमा हाॅलो के पुनर्निर्माण आदि के लिये टैक्स में छूट प्रदान की जायेगी। उन्होन यह भी सुझाया कि परिषद के माध्यम से आंचालिक फिल्मों के निर्माण व प्रदर्शन आदि को बढ़ावा देने से संबंधी नीति तैयार की जाय। कहा कि फिल्म निर्माण व क्रियेटिव आर्ट के क्षेत्र में कार्य करने वालो को एमएसएमई नीति के तहत इस क्षेत्र के लिये भी सब्सिडी के लिये नीति तैयार की जायेगी। इसके लिये वित्त, पर्यटन व सूचना सचिव की तीन सदस्यीय समिति गठित करने के भी निर्देश दिये। उन्होंने कहा कि फिल्म निर्माण से जुड़े लोग आर्थिक अभाव में इससे विमुख न हों, इसके लिये अनुदान आधारित धनराशि उपलब्ध कराने पर भी विचार किया जायेगा। इसके साथ-साथ प्रदेश के फिल्म कलाकारो को भी लोक कलाकारों, पत्रकारों की भांति अंशदायी सामूहिक बीमा
योजना का लाभ दिया जायेगा।
फिल्म विकास परिषद के उपाध्यक्ष हेमंत पाण्डे ने कहा कि सिनेमा दिल से जुड़ा विषय है। परिषद के सदस्यों को उनके अनुभवों के आधार पर परिषद की समितियों में भी नामित किया जायेगा ताकि परिषद अपना कार्य और अधिक व्यापकता के साथ कर सके। उन्होंने परिषद की तकनीकि संबर्धन से संबंधित वर्कशाॅप आयोजित करने व सभी जनपदों में फिल्म फेस्टिवल के आयोजन पर बल दिया। बैठक में सचिव एवं महानिदेशक सूचना विनोद शर्मा ने फिल्म विकास परिषद से संबंधित कार्ययोजना व प्रदेश की फिल्म नीति के महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि विभिन्न प्रदेशों की फिल्म नीतियों का अध्ययन कर प्रदेश की फिल्म नीति तैयार की गई है। इसमें यदि ओर कोई महत्वपूर्ण सुझाव होगा, तो उसका भी समावेश किया जायेगा। बैठक में मधवानंद भट्ट, हीरा सिंह राणा, मीना राणा, सतीश शर्मा, जयप्रकाश पंवार, शिव पैन्यूली, एसपीएस नेगी, सुदर्शन शाह, विक्की योगी, फिल्म विकास परिषद मुल्यांकन समिति के अध्यक्ष सुदर्शन जुयाल, चन्द्रवीर, गायत्री और कैबिनेट मंत्री नवप्रभात, विधायक मदन बिष्ट, मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह, सचिव अमित नेगी, शैलेश बगोली, आर मीनाक्षी सुन्दरम, अपर सचिव आर राजेश कुमार, अपर निदेशक सूचना डाॅ. अनिल चन्दोला सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

जौनसार के टुंगरा गांव में हंगामा
राज्य के जनजातिय क्षेत्र जौनसार-बावर में माहसू देवता के नाम से हर वर्ष माह सितम्बर में ‘‘जागड़ा’’ नाम से गांव-गांव में एक विशाल सांस्कृतिक समारोह का आयोजन होता है। टंुगरा गांव में भी इस वर्ष के समारोह में जहां राज्य की स्वर कोकिला मीना राणा प्रस्तुति देने पंहुची तो वहीं स्थानीय कलाकारो सहित जौनसार क्षेत्र के जौनसारी राॅकस्टार सन्नी दयाल भी मंच पर उतरा। रात्री में जब यह सांस्कृतिक समारोह सबाब पर था तो पाण्डाल में कुछ नौजवान हंगामा काट रहे थे। यहां तक कि मंच का संयोजन करने वाले शख्स ने भी हंगामा काटने वालो का ही साथ दिया। गांव के कुछ समझदार बुजुर्गो के हस्तक्षेप के कारण बड़ी मुश्किल से इस हंगामें पर काबू पाया गया। जबकि प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। हुआ यूं कि मंच पर कुछ कलाकारो की सामग्री छूट गयी थी जिसे प्राप्त करने के लिए गांव के ही सत्यम भारती ने अपनी गाड़ी मंच की तरफ बढाई। बस इस पर गांव के ही कुछ दबंग युवओ ने यूं कहकर हंगामा खड़ा किया कि सत्यम भारती अनुसूचित जाति का है और उनके बिना इजाजत गाड़ी मंच के तरफ कैसे बढाई। इस पर गांव में ही दो जातियों के लोग आमने सामने हो गये।
उल्लेखनीय हो कि जिस जौनसार क्षेत्र को राज्य के लोग सांस्कृतिक सम्पन्न कहते है वहां पर जातिवाद की बू आने लगे तो यह राज्यवासियों के लिए शर्मनाक बात होगी। जौनसार जहां संस्कृति है, गीत हैं, रंगमंच है, परस्परता है परन्तु निछले 10 वर्षो से इस क्षेत्र से जिस तरह की खबरे जातिवाद को लेकर सामने आ रही है वह दुखद है। जौनसार क्षेत्र के वयोवृद्ध पत्रकार एन॰डी॰ जोशी कहते हैं कि जौनसार क्षेत्र की परस्परता टूट रही है, भेदभाव पनप रहा है। सरकारी, गैरसरकारी व परंपरागत आयोजनो में जिस तरह से आज के युवा जातिवाद को पनाह दे रहे है उससे मालूम पड़ता है कि जौनसार आगे नही पीछे की ओर जा रहा है। लेखक व सामाजिक चिन्तक इन्द्रसिंह नेगी कहता है कि किसी भी विवाद को राजनीति से नही जोड़ना चाहिए। यही वजह है कि विवाद का ग्राफ जौनसार में बढ रहा है। पत्रकार भारत सिंह चैहान कहता है कि जौनसार-बावर एक वृहद सांस्कृतिक क्षेत्र है। यहां हर माह किसी न किसी रूप में परपंरागत सास्कृतिक समारोह होते रहते हैं थोड़ी बहुत यदि लोगो में नोंक-झोंक हो जाये तो उसे जातिसूचक जैसे विवादित नहीं बनना होगा। कहते हैं कि अगर ऐसा हो रहा है तो क्षेत्र का दुर्भाग्य है। जौनसार-बावर महासभा के अध्यक्ष मुन्ना राणा कहते हैं कि उन्होने पिछले दिनों समस्त क्षेत्र की आम सभा बुलाई और इस आम सभा में यह निर्णय हुआ कि जौनसार-बावर क्षेत्र के सभी धार्मिक व सांस्कृतिक मंदिर/स्थल सभी धर्मो और जाति के लोगो के लिए खुले कर दिये जाये जो इसका उलंघन करेगा उस पर आवश्यक कानूनी कार्यवाही की जाये। ताज्जुब इस बात की है ऐसे कार्यक्रमों में क्षेत्र के दो बड़े नेता मौजूदा कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह चैहान और भाजपा के प्रवक्ता मुन्ना सिंह चैहान भी सम्मलित होते है परन्तु टुंगरा गांव में हुए घटनाक्रम से वे इत्तेफाक नहीं रखते।

Friday, August 5, 2016

गंगा के सवाल पर निर्णायक लड़ाई

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प्रेम पंचोली
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(लेखक एन. एफ. आई. के फैलो हैं)

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भले ही 07 जुलाई 2016 को ‘‘मिशन फाॅर क्लिन गंगा’’ कार्य योजना का उद्घाटन केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती, केन्द्रीय राष्ट्रीय राजमार्ग मंन्त्री नितिन गडकरी हरिद्वार पंहुचकर कर गये हों, मगर गंगा की अविरलता और सांस्कृतिक, आध्यात्मिक के सवाल आज भी खड़े हैं। मोदी सरकार की ‘‘गंगा मिशन’’ कार्य योजना कब परवान चढेगी यह तो समय ही बता पायेगा परन्तु वर्तमान का ‘‘विकास माॅडल’’ गंगा की स्वच्छता और अविरलता को लेकर नये सिरे से सवाल खड़ा कर रहा है।
सवाल यह है कि मौजूदा विकास के माॅडल में क्या गंगा अविरल बहेगी? क्या गंगा का पानी स्वच्छ हो जायेगा? यहां आमराय यह बताती है कि यदि गंगा अविरल बहेगी तो गंगा का पानी स्वतः ही स्वच्छ हो जायेगा। यदि गंगा के बहाव को विकास के नाम पर बाधित किया जाता है तो गंगा जहां अपना प्राकृतिक स्वरूप खो देगी वहीं गंगा की स्वच्छता का हस्र स्पष्ट नजर आयेगा। यह आरोप सच है कि ‘‘गंगा एक्शन प्लान’’ में 4000 करोड़ रूपये खर्च हुए, फिर भी गंगा की हालत दिन-प्रति दिन बिगड़ती गयी। वर्तमान में ‘‘नमामी गंगे’’ के नाम से भी 1500 करोड़ खर्च होने की संभावनाऐं सरकारी स्तर से बताई जा रही है। वैसे भी यह घोषणा ‘‘मिशन फाॅर क्लिन गंगा’’ कार्य योजना के उद्घाटन के दौरान केन्द्रीय राष्ट्रीय राजमार्ग मंन्त्री नितिन गडकरी हरिद्वार पंहुचकर कर गये। कुल मिलाकर करोड़ो खर्च करने से कुछ ठेकेदारो/कम्पनीयों को रोजगार जरूर मिल जायेगा मगर गंगा की अविरलता और स्वच्छता के सवाल इसलिए खड़े रहेंगे कि गंगा के प्राकृतिक स्वरूप के साथ छेड़खानी करने से गंगा अविरल नहीं बहेगी और गंगा अविरल नहीं बहेगी तो गंगा की स्वच्छता और पवित्रता भी समाप्त हो जायेगी। यही सवाल साल 2001 में अटल जी की सरकार के दौरान बनाई गयी मुरली मनोहर जोशी कमेटी के तत्काल के अध्यक्ष डा॰ जी॰डी॰ अग्रवाल ने उठाये थे। उन्होने बकायादा गंगा के प्राकृतिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विषयों से लेकर गंगा के पानी के वैज्ञानिक महत्ता पर इस समिति को 137 पेज की रिपोर्ट प्रस्तुत करके यह अगाह किया था कि वर्तमान के विकास के माॅडल में गंगा अबिरल नहीं बह सकती और गंगा अबिरल नहीं बहेगी तो स्वच्छता और पवित्रता के सवाल पर बात करनी बेईमानी होगी। यह उनका अध्ययन भी था और उनका अनुभव भी था।
उल्लेखनीय हो कि डा॰ जी॰डी॰ अग्रवाल (वर्तमान में स्वामी सानद) मनेरीभाली फेज-1 जल विद्युत परियोजना की वैज्ञानिको के एक दल के टीम लीडर थे। सो उन्हे भी तत्काल इसलिए इस कार्य को छोड़ना पड़ा जब गंगा की अबिरलता को सरकारी वैज्ञानिक विकास का हवाला देकर कुचलने का प्रयास कर रहे थे। यही हस्र उनके साथ साल 2001 में हुआ। उन्हे अपना इस्तीफा मुरली मनोहर जोशी के हाथो मजबूरन थमाना पड़ा। इसलिए कि ‘‘गंगा जल की प्रदूषण-विनाशिनी क्षमता’’ पर जो तत्काल अटल जी के सरकार में श्री जोशी के नेतृत्व में गंगा के सवाल पर कमेटी बनी थी की रिपोर्ट को वे सार्वजनिक करवाना चाहते थे, ताकि गंगा के आबाद क्षेत्र में रह रहे लोगो को मालूम हो कि गंगा पर बन ही परियोजनाओं के विकास के मानक उनके अनुरूप हैं कि नहीं। यदि नहीं तो स्थानीय लोग क्या चाहते हैं। ऐसा वैज्ञानिक डा॰ जी॰डी॰ अग्रवाल चाहते थे। मगर सत्ता की लोलुपता श्री जोशी पर इतनी सवार थी कि ना तो डा॰ जी॰डी॰ अग्रवाल के इस्तीफे पर कोई सुनवाई हुई और ना ही श्री जोशी वाली कमेटी कभी गंगा के सवाल पर आगे बढ पायी।
गौरतलब हो कि जब वे ‘‘गंगा संरक्षण’’ के लिए वर्ष 2008 में उत्तरकाशी के केदारघाट पर अनशन कर रहे थे दतो उन्ही दिनों उन्होने पुनः 2001 में बनाई गयी मुरली मनोहर जोशी वाली समिति की सिफारिशो को सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी, जो उन्हे आधी-अधूरी ही उपलब्ध करवाई गयी। 137 पेज वाली रिपोर्ट से पेज न॰ - 28, 29, 30 व 87 से लेकर 93 तक पेज गायब किये गये या उपलब्ध ही नहीं करवाये गये। इस बात का जिक्र उन्होने वर्ष 2008 में तत्काल प्रधानमंत्री और प्रैस को एक पत्र लिखकर किया। उनकी मांग थी कि ‘‘गंगा जल की विलक्षण प्रदूषण नाशिनी क्षमता’’ पर गहन अध्ययन और शोध कार्य कम से कम छः माह तक करवाये जाये। तब तक बांध के निर्मार्ण कार्य भी रोक दिये जाये। यही नहीं इस अध्ययन के स्पष्ट और निर्णायक परिणाम के अनुसार गंगा पर बांध बनने चाहिए कि नही इस पर सरकार गंम्भीरता से आगे की कार्यवाही करे।
जगजाहीर है कि गौमुख से गंगासागर तक 2525 किलोमीटर बहने वाली गंगा नदी वर्तमान के विकास के कारण संकट में है। कहीं उसके बहाव को रोका जा रहा है तो कहीं भयंकर तरीके से प्रदूषित किया जा रहा है। इस कारण गंगा के आस-पास की बसासत भयभीत है और खतरे में है।

-------------------------------------------------------------मिशन फाॅर क्लिन गंगा योजना से स्थानीय लोग असमंजस-------------------------------------------------------------

‘‘गंगा एक्शन प्लान’’ का क्या हाल हुआ। जो जगजाहीर है। लोगो की नजर अब की केन्द्र सरकार पर जमायी हुई है कि इस बहाने गंगा की स्वच्छता व पर्यावरणीय सन्तुलन वापस लौट जाये। ऐसा मोदी सरकार की ‘‘गंगा मिशन’’ कार्य योजना से लोगो की आशाऐं बन रही है। अब जबकि गंगा पर ही बड़े और छोटे दर्जनो बांध बनने हैं, गंगा के किनारे-किनारे ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाईन भी जानी है। इन दोनो महत्वपूर्ण योजनाओं में सुरंगो का इस्तेमाल किया जायेगा। इस तरह क्या ‘‘गंगा मिशन’’ परवान चढ पायेगा? यही नहीं गंगा के किनारे जितने भी छोटे बड़े कस्बे बसे है वे सभी पर्यटन व तीर्थाटन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। वर्षभर गंगा के पानी के आचमन के लिए देश-दुनियां के लोग हरिद्वार से गंगोत्री, गौमुख और हरिद्वारा से बद्रीनाथ, केदारनाथ की यात्रा पर आते है और इन कस्बानुमा बाजारो को रात्री विश्राम के लिए इस्तेमाल करते है, जिसके एवज में स्थानीय लोगो की रोजी-रोटी का जुगाड़ भी चलता है। मगर ‘‘गंगा मिशन’’ योजना में इन कस्बो को साफ-सुथरा भी बनाना है। इन्ही कस्बो को बांध और रेल लाईन की भेट भी चढना है। हरिद्वार, ऋषिकेश, उत्तरकाशी, श्रीनगर सहित इन कस्बो को एनजीटी का भी फरमान है कि वे अपने सीवर को गंगा में ना डाले बगैरह। वरना जुर्माना या सजा के लिए तैयार रहे। ऐसा लगता है कि यदि गंगा स्वच्छ चाहिए तो गंगा के किनारे या तो मानव विहीन करने पड़ेंगे या गंगा के किनारे बसी बसासत के लिए इस योजना के अन्र्तगत सभी ढांचागत सुविधा मुहैया करवानी पड़ेगी। अतएव गंगा किनारे बसे लोग आपदा से तो डरे, सहमें हैं परन्तु अब उनके मन में इस तरह के सवाल कौतुहल का विषय बने हैं कि क्या ‘‘गंगा मिशन’’ योजना से लोगो को गंगा का किनारा छोड़ना पड़ेगा अथवा इस योजना से लोग लाभन्वित होंगे या उन्हे सुविधा मुहैया कराई जायेगी?

-----------------------------------------------------------------------------मिशन फाॅर क्लिन गंगा अभियान में होगा 2950 करोड़ का वृक्षरोपण-----------------------------------------------------------------------------

‘‘गंगा मिशन’’ कार्ययोजना के लिए राज्य सरकार ने कमर कस दी है। राज्य के वन महकमा ने बकायदा अगले एक वर्ष के लिए ‘‘नमामी गंगे’’ योजना के लिए 2950 करोड़ की कार्ययोजना केन्द्र सरकार को भेज दी है, जिसमें उत्तरकाशी से हरिद्वार तक का प्लान है। इस कार्य योजना के तहत उत्तराखण्ड बेसिन क्षेत्र में जल संरक्षित करने वाले पौधे लगाये जायेंगे, जिनमें अखरोट, अंगू, अंजीर, अमलताश, अतीश, अमवाला, खुमानी, खैर, गुलार, दालचीन, बरगद, बहेड़ा सहित 60 प्रजाती के पौधे रोपे जायेंगे। इसके अलावा घास की अंजन, उल्ला, कुमरिया, कांस, कुमरा, कुश, गिनी ग्रास, दूब, लव ग्रास सहित 19 प्रजाती का घास भी लगाया जायेगा, इसके साथ-साथ बांस, गोल रिंग, थाम रिंगल और देव रिंगल को भी उचित स्थानो पर लगाया जायेगा। अपर प्रमुख वन संरक्षक गंभीर सिंह ने बताया कि ‘‘नमामी गंगे’’ परियोजना के तहत यह पहला कार्य योजना बजट केन्द्र को भेजा है। भविष्य में भी वित्तीय वर्ष की शुरूआत में ऐसा बजट केन्द्र को जायेगा और केन्द्र इस हेतु बजट उपलब्ध करा देगा।

-------------------------------------------------गंगा किनारे 2565 बीघा भूमि पर अतिक्रमण-------------------------------------------------

हरिद्वार और आस-पास की गंगा किनारे खाली पड़ी अधिकांश जमीन पर अतिक्रमण हो चुका है। यह वह जमीन है जो गंगा का ही आबाद क्षेत्र माना जाता है। इस क्षेत्र की 2565 बीघा जमीन अब रसूखदारो के कब्जे में है। यह आंकड़ा सिंचाई विभाग ने जुटाया है। ऐसे में ‘‘गंगा मिशन’’ कार्य योजना कैस सफल होगी जो समय की गर्त में है। गंगा को प्रदूषण मुक्त और गंगा तटो को विकसित करने का अभियान ‘‘मिशन फाॅर क्लिन गंगा’’ योजना से आरम्भ हो गया है।

---------------------------------------------------------------रोज गंगा में गिरती है 3766 मिलियन लीटर गंदगी---------------------------------------------------------------

कुल जनसंख्या में से देश की 37 प्रतिशत जनसंख्या गंगा बेसिन के किनारे निवास करती है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि हर रोज हम इस पवित्र नदी को दूषित करने में जुटे हुए हैं। महानगर हरिद्वार का पूरा सामाजिक व आर्थिक आधार भी पूरी तरह गंगा पर टिका हुआ है। लेकिन ऋषिकेश से मचलती, उछलती, कलकल करती गंगा जब इस हरि के द्वार में प्रवेश करती है तो उस पर ताबड़तोड़ मानवीय हमले होते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक केवल हरिद्वार में ही 3766 मिलियन लीटर सीवेज बिना उपचारित किए सीधे गंगा में गिर रहा है। 1985 में शुरू हुई गंगा नदी योजना के तहत एक लाख से अधिक आबादी वाले 25 शहरों में 865 एमएलडी क्षमता के मल-जल शोधन संयंत्र स्थापित होने थे। वर्ष 2000 में योजना का पहला चरण पूरा हुआ, मगर गंगा की हालात पूर्व से अधिक बदस्तूर हो गयी है। गंगा किनारे बने रिजोर्ट और होटल, धर्मशालाओं को एनजीटी ने कई बार अपने संस्थानो व व्यवसायिक केन्द्रो के सीवेज को शोधन के लिए नोटिस थमा दिया परन्तु अब तक ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है। ज्ञात हो कि हरिद्वार शहर में प्रतिदिन 85 एमएलडी सीवेज कचरे का उत्पादन होता है। त्योहारों और कुंभ जैसे अवसरों पर यह बहुत अधिक बढ़ जाता है। मगर आज तक इस शहर में कुल 40 एमएलडी का सीवेज शोधन संयंत्र है। नगर परिषद के एक अधिकारी के मुताबिक, इसकी शोधन क्षमता 40 प्रतिशत है। अध्ययन बतातें हैं कि 1968 में बसे शहर हरिद्वार के 16 नाले प्रतिदिन शहर का सारा ऑर्गेनिक कचरा और खाद्य कचरा बिना किसी उपचार के सीधे गंगा में उड़ेल दिये जाते हैं। यह अध्ययन गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर बीडी जोशी और सुशील बदौला ने संयुक्त रूप से किया गया है। भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय तथा आक्सीजन डेवलेपमेंट एडमिनस्ट्रिशन द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन के मुताबिक गंगा किनारे बसे प्रथम श्रेणी के 29, द्वितीय श्रेणी के 23 शहरों और 48 कस्बों में बसने वाली 35 करोड़ से अधिक की आबादी गंगा में 1.3 अरब लीटर मलमूत्र रोज इस पवित्र नदी में उड़ेल दी जाती है। इसी अध्ययन में यह भी सामने आया है कि 60 लाख टन रासायनिक खाद और 9000 टन कीटनाशक प्रतिदिन गंगा में गिरते हैं। बताया जात है कि 26 करोड़ टन औद्योगिक कचरा भी गंगा को जहरीला बनाता है।

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01

नदी में बहुत से सूक्ष्म वनस्पति होते हैं जो सूरज की रोशनी में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं, गंदगी को सोखकर ऑक्सीजन मुक्त करते हैं। इसी प्रकार बहुतेरे जीव जन्तु भी सफाई करते रहते हैं। लेकिन उद्योगों के प्रदूषण के कारण गंगा में तथा अन्य नदियों में भी जगह-जगह डेड जोन बन गए हैं। कहीं आधा किलोमीटर, कहीं एक किलोमीटर तो कही दो किलोमीटर के डेड जोन मिलते हैं। यहां से गुजरने वाला कोई जीव-जन्तु या वनस्पति जीवित नहीं बचता। जब फैक्टरीयों का गंधा पानी, मैकडेबल डिसलरी, तेल शोधक कारखाना, ताप बिजली घर और रासानिक अवशेष नदी में गिरते हैं। तब इसका सबसे बुरा असर नदी के आस-पास रहने वाले समाजो और अन्य प्राणीयों पर पड़ता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि गंगा नदी में प्रदूषण बढने से कटैया, फोकिया, राजबम, थमैन, झमंड, स्वर्ण खरैका, खंगशी, कटाकी, डेंगरास, करसा गोधनी, देशारी जैसी 60 देशी मछलियों की प्रजातियां लुप्त हो गयी है।

02

स्वामी चिदात्मन जी महराज कहते हैं कि गंगा पर आश्रित समुदाय का रिश्ता तब कायम रह सकेगा जब गंगा की अविरलता कायम रहेगी। पर्यावरणविद् जलपुरूष राजेन्द्र सिंह कहते हैं कि हमारी गंगा माई है, हमारी कमाई भी है, लेकिन वह डीसी वाशिंगटन और विश्वबैंक की कमाई नहीं है। उनका विरोध विश्व बैंक और डीसी वांशिगटन और डीसी वाशिगटन की कमाई बनाने से रोकने का है। गंगा एक तरह से सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नदी है। भारतीय संवैधाानिक व्यवस्था में जब से वह राष्ट्रीय नदी घोषित हुई, वह धर्मनिरपेक्ष नदी घोषित हो गयी है। उन्होने कहा कि 4 नवम्बर 2008 को भारत सरकार ने गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी घोषित किया है। यदि अब गंगा राष्ट्रीय नदी है तो अविरलता और निर्मलता कायम करना भारत सरकार की जिम्मेदारी है। यदि राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने वालों को सजा मिलती है तो राष्ट्रीय नदी का अपमान करने वालों को सजा क्यों नहीं? कहा कि मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगा का राष्ट्रीय प्रॅाटोकाॅल भूल गये। गौमुख से गंगासागर तक साइकिल यात्रा करने वाली पत्रकार अजाना घोष का कहना है कि थोड़ी बहुत शुद्धिकरण तो गंगा खुद ही करती है। उसके अंदर स्वयं शुद्धिकरण की क्षमता है।

03

पर्यावरणविद् गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बीडी जोशी के मुताबिक जबरदस्त इकोलॉजिकल फ्लो के बावजूद जल की गुणवत्ता प्रभावित करने वाला बायोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड (बीओडी) हर रोज प्रभावित हो रहा है। बीओडी प्रभावित होने का प्रमुख कारण नगरीय प्रदूषण और सीवेज है। शोध परिणामों के मुताबिक इन सीवर नालों के माध्यम से गंगा में जाने वाला कचरा कभी भी ग्रामीण समुदाय के लिए स्वास्थ्य संबधित और पर्यावरणीय खतरे पैदा कर सकता है। इन गांवों के लोग अपने घरेलू उपयोग के लिए गंगा नहर के पानी पर भरोसा करते हैं। पानी में मिली सीवेज प्रदूषण की उच्च दर पानी की गुणवत्ता की दृष्टि से बेहद दयनीय है।

Thursday, July 7, 2016

गंगा स्वच्छता के लिए 1500 करोड़ - नितिन गडकरी


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-------------------प्रेम पंचोली----------------------


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‘‘मिशन फाॅर क्लिन गंगा’’ का शुभारम्भ ऋषिकुल विद्या पीठ मैदान हरिद्वार मे विधीवत हो गया। आयोजन से ऐसा लग रह था कि अब गंगा स्वच्छ हो जायेगी और दूसरी ओर आयोजन में पंहुचे लोग चर्चा गरम कर रहे थे कि सरकार को आखिर स्वीकार करना पड़ा कि गंगा गंदली हो चुकी है। गंगा को कौन से तत्व हैं जो सर्वाधिक गंदा कर रहे हैं? जिनकी चर्चा आयोजन में वक्ताओं ने एक बार भी नहीं की। खैर गंगा की पवित्रता और स्वच्छता के लिए आखिर सरकार ने 1500 करोड़ की एक धनराशी स्वीकृत करके कार्यक्रम का शुभारम्भ केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की अध्यक्षता में कर दियार्।

खचा-खचा भरे ऋषिकुल विद्या पीठ के मैदान में केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि नमामि गंगे के अन्तर्गत 43 विभिन्न परियोजनाओं का सुभारम्भ कर दिय गया है। उन्होंने कहा कि गंगा आस्था, इतिहास एवं संस्कृति का प्रतीक है। गंगा की शुद्धता, निर्मलता, अविरलता एवं गंगा से सम्बन्धित योजनाओं को अब पाठ्यक्रमों में लाया जायेगा। श्री गडकरी ने मुज्जफरनगर से देहरादून तक राष्ट्रीय राजमार्ग का कार्य दिसम्बर तक पूरा करने का आश्वासन दिया। नमामि गंगे के तहत 1500 करोड़ की लागत से 100 विभिन्न स्थानों पर 231 कार्यों का सुभारम्भ किया जा रहा है। इसमें 50 बड़े प्रकल्प, 1142 छोटे प्रकल्प तथा 60 एस.टी.पी. भी हैं। उन्होंने कहा कि गंगा की स्वच्छता के लिए जन सहयोग भी आवश्यक है। कहा कि इस योजना में घाटो की मरम्मत, सुदृढ़िकरण एवं श्मशान घाटों का निर्माण भी शामिल है।
इस दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि प्रतिभाग करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार गंगा को निर्मल एवं स्वच्छ बनाने के लिए राज्य सरकार को जो भी दायित्व सौंपेगी राज्य सरकार पूर्ण सहयोग की भावना से इस कार्य को करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड सरकार ‘‘नमामि गंगे’’ योजना को सफल बनाने के लिए वृक्षारोपण करने, एवं वर्षा के जल को संरक्षण करने के लिए बोनस देने वाला पहला राज्य है। आज प्रदेश में डेढ़ दर्जन सीवरेज पर कार्य हेतु एस.टी.पी. स्थापित किया जा रहा है। उन्होंने कैमिकल युक्त जल के ट्रीटमेंट के लिए इण्टर सैप्टर कैनाल के माध्यम से मिट्टी द्वारा ट्रीटमेंट की योजना को स्वीकृत करने का आग्रह किया। श्री रावत ने कहा कि उत्तराखण्ड सरकार जल संरक्षण हेतु विशेष प्रयास कर रही है, आने वाले समय में उत्तरकाशी की तरह हरिद्वार में भी स्वच्छ गंगा जल मिलेगा। उन्होंने गंगा की स्वच्छता व निर्मलता के लिए होलोस्टिक अप्रोच पर बल दिया। उन्होंने कहा कि खुले शौच की प्रथा से 45 प्रतिशत क्षेत्र में दूर हो चुकी है। नमामि गंगे योजना के तहत राज्य में गंगा एवं उसकी सहायक नदियों पर बसे गांवों को भी खुले में शौच से मुक्ति के लिए आग्रह किया, ताकि सभी गांवों को खुले में शौच से मुक्त किया जा सके।
इस अवसर पर जल संरक्षण, नदी विकास एवं गंगा सरंक्षण मंत्री उमा भारती ने कहा कि गंगा की सफाई हेतु 1916 में मदन मोहन मालवीय जी ने गंगा की निर्मलता एवं अविरलता के लिए प्रयास प्रारम्भ किया था। कहा कि गंगा 50 करोड़ से अधिक लोगों के लिए आजीविका का संसाधन है। उद्योगों के प्रदूषण एवं सीवरेज के कारण गंगा प्रदूषित हुई है। कहा कि 2018 तक गंगा को निर्मल बनाने का हमार संकल्प है, इसकी प्रगति के परिणाम अक्टूबर 2016 से दिखई देने लगेंगे। उन्होंने कहा कि गंगा की स्वछता के लिए वृक्षारोपण, घाट निर्माण, सीवर ट्रीटमेंट प्लान आदि का कार्य गंगा एवं उसकी सहायक नदियों पर किया जायेगा। केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री महेश शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गंगा का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि हम नदियों के साथ कोई छेड़खानी करते हैं तो इसकी विभीषिका भी हमें देखने को मिलती है, इसलिए प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलना आवश्यक है। हरिद्वार सांसद डाॅ रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि आज हमने गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा की अविरलता एवं निर्मलता का संकल्प को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कहा कि पहले की ‘‘स्पर्श गंगा परियोजना नमामि गंगे योजना’’ में बदल गयी है।
इस अवसर पर स्थानीय विधायक स्वामी यतीश्वरानन्द, संजय गुप्ता, मदन कौशिक, चन्द्रशेखर, प्रेम अग्रवाल, विजया बड़थ्वाल, मेयर मनोज गर्ग, शंकराचार्य राजराजेश्वर महाराज, स्वामी हरिचेतनानन्द, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष सतपाल ब्रहम्चारी, गंगा सभा के अध्यक्ष पुरूषोत्तम शर्मा, कुंवर प्रणव चैंपियन, आदेश चैहान, डाॅ रजत भार्गव, डाॅ आर.के. गुप्ता, हरिहर मिश्रा, जिलाधिकारी हरबंस सिंह चुघ, एस.एस.पी. राजीव स्वरूप , मुख्य विकास अधिकारी सोनिका आदि उपस्थित थे।

Tuesday, July 5, 2016

प्राकृतिक आपदा के लिए मानवजनित कारनामें








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प्रेम पंचोली
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ऐसा लगता है कि उत्तराखण्ड और आपदा का चोली दामन का साथ हो गया है। साल 2010 से लगातार, बरसात आरम्भ होने से ही आपदाओं का डर लोगो को सदमें डाल देता है। अभी मानसून पूर्ण रूप से आया ही नहीं था कि राज्य के पहाड़ी जिले पिथौरागढ, चम्पावत, चमोली, उत्तरकाशी, रूद्रप्रयाग, अल्मोड़ा एवं देहरादून व नैनीताल जिलों के पहाड़ी क्षेत्र आपदा की चपेट में आ गये। आश्चर्य इस बात का है कि हमेशा की तरह इस दौरान भी पहाड़ी जिलों के सीमान्त क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। बताया जा रहा है कि जो क्षेत्र राज्य का चीन और तिब्बत सीमाओं से लगा है उन क्षेत्रों में आपदाओं की घटनाऐं अधिकांश हो रही है।
यहां वैज्ञानिक आपदाओं के लिए चाहे जो भी दावे करे, वह अपनी जगह सच भी हो सकते हैं, किन्तु आपदा वाले क्षेत्रों के लोग जहां सुरक्षित ठौर-ठिकाने की तलाश में हैं वही वे आपदा के बारे में अलग-अलग राय दे रहे हैं। ग्रामीणों का कहना हैं कि चीन ने ल्हासा जैसे विकट पहाड़ी क्षेत्र में रेल सेवा व मोटर मार्गो का विकास कर दिया है। यह वह क्षेत्र है जो उत्तराखण्ड की सीमाओं से लगा है। जिसका प्रतिकूल प्रभाव निश्चित रूप से उत्तराखण्ड के सीमान्त क्षेत्रो पर जरूर पड़ेगा। क्योंकि हिन्दूकुश हिमालय का ही पर्वतशिखर भारत और चीन का सीमांकन करता है। वह चाहे बन्दरपूंछ हो या कैलाश मानसरोवर हो, या निलांग-कोपांग हो या मलारी पास हो। अतएव राज्य के ये क्षेत्र सामरिक दृष्टी से अतिशंवेदनशील हैं तो भौगोलिक दृष्टी से एकरूपता के साथ-साथ दोनो देशो की सीमायें पीठ और छाती के समान आपस में जुड़ी है। स्पष्ट है कि यदि पीठ का दोहन होगा तो उसका असर छाती की तरफ पड़ेगा। हालांकि वैज्ञानिक इस कथन को झुटला सकते है, चूंकि सत्य इसलिए है कि इन पहाड़ो की बनावट एक दूसरे के सम ही नहीं एक दूसरे के समान अंग के रूप में है।
वर्तमान समय में भारत और चीन प्राकृतिक संसाधनो को नजरअन्दाज करके विकास के नये आयाम ढूंढ रहे हैं। भले भारत अभी प्राकृतिक संसाधनो का अतिदोहन ना कर रहा हो मगर चीन ने तो सड़क, विधुत, रेल आदि विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनो की बली चढा दी है। इस लिहाज से जिसका सीधा-सीधा असर उत्तराखण्ड राज्य पर सर्वाधिक पड़ रहा है, क्योंकि हिन्दूकुश हिमालय के पर्वतो की ढलान राज्य की तरफ 90, 100, 110 संटिग्रेट पर बनाते हैं। जबकि चीन की तरफ इन पहाड़ो की ढलान 130 संटिग्रेट से बनने आरम्भ होती है। अर्थात खड़े और गलेशियरो से बने कच्चे पहाड़ भी उत्तराखण्ड राज्य के हिस्से अधिक आते हैं। कुलमिलाकर जानकारो का यहां तक कहना है कि इधर उत्तराखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्रो में बांध, सुरंग और सड़क निर्मार्ण के कार्य हो रहे हैं तो उधर पड़ोसी देश चीन भी त्वरित लाभ एवं वैश्वीक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित करने के लिए इस तरह के विकास को महत्व दे रहा है। जिसके लिए चीन के नियोजनकर्ता प्राकृतिक संसाधनो का अनियोजित दोहन करवा रहा है। इसके दुष्प्रभावो का परिणाम उत्तराखण्ड में भूस्खलन, बादल फटना, अतिवृष्टी जैसी प्राकृतिक आपदा के रूप में मौजूदा समय में स्पष्ट नजर आ रहा है। यानि पूरे हिन्दूकुश हिमालय का पर्यावरण असन्तुलित होते दिखाई दे रहा है। लोगो का मानना है कि जब उत्तराखण्ड में आपदा घटती है तो राज्य की सीमाओ से लगी चीन वाले क्षेत्र में भी आपदा घटती है। यही वजह है कि उत्तराखण्ड आपदाओं का घर बनता ही जा रहा है।
उल्लेखनीय हो कि पिछले छः वर्षो में उत्तराखण्ड राज्य ने प्राकृतिक आपदाओ के कारण जो खोया है उसकी भरपाई कभी भी नहीं हो सकती, मगर भविष्य में इन आपदाओं से बचने के कुछ उपाय किये जा सकते है। ऐसा कई बार वैज्ञानिको ने सरकारो को सलाह भी दी है। आईआईटी रुड़की के जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग के प्रो. नयन शर्मा ने बताया कि किस तरह से सबसे उन्नत सैटेलाइट तकनीक से प्रत्येक पांच किलोमीटर के दायरे में बादल फटने, भारी बारिश और इससे होने वाली तबाही के बारे में सटीक भविष्यवाणी संभव है। यह उन्होंने नवंबर-2015 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती की उपस्थिति में बाढ़ और उससे होने वाली तबाही के पूर्वानुमान पर तकनीक का प्रस्तुतीकरण दिया था। साथ ही बारिश से नदियों में आने वाले पानी के आयतन, वेग और इससे प्रभावित होने वाली आबादी पर भी आंकलन प्रस्तुत किया गया था। वैज्ञानिको का यह भी कहना है कि बारिश के पूर्वानुमान के आधार पर नदियों में पानी के प्रवाह की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए नदियों को चैनेलाइज्ड करने के लिए इसकी गहराई और चैड़ाई को जरूरत के हिसाब से विकसित करने का काम किया जा सकता है। साथ ही तेज प्रवाह में पहाड़ों के भूस्खलन को रोकने के लिए रॉक बाल्टिंग तकनीक से इन्हें मजबूती प्रदान की जा सकती है। बादल फटने और भारी बारिश के साथ होने वाली तबाही का पूर्वानुमान संभव है। जबकि आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिको ने प्रत्येक पांच किलोमीटर में बारिश का सटीक आंकलन कर डिजिटल एलीवेशन मॉडल (डीईएम) के जरिये निश्चित हिस्सों में होने वाली तबाही बताने वाली रिपोर्ट भी केंद्र को भेजी हुई है। ताज्जुब हो कि आठ माह बाद भी इसका संज्ञान सरकार ने नहीं लिया है। उधर जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस तकनीक में रुचि दिखाई है। यदि केंद्र इस पर संज्ञान लेता तो पहाड़ को हालिया तबाही से बचाया जा सकता था। गौरतलब हो कि उत्तराखंड के लिए यह तकनीक बहुत जरूरी है। उनकी इस तकनीक पर जम्मू-कश्मीर सरकार ने गौर करते हुए डल झील के प्रोजेक्ट पर काम भी शुरू कर दिया है। वैज्ञानिको का दावा है कि इस ग्लोबल प्रेसीपीटेशन मेजरमेंट तकनीक से विभिन्न सैटेलाइटों के जरिए बादलों के प्रतिक्षण दबाव एवं घनत्व के आधार पर जानकारी दी जा सकती है और बारिश के साथ-साथ इससे होने वाली तबाही का आंकलन भी नई तकनीक की खासियत में शामिल की गयी है।

शासन हुआ सर्तक

उत्तराखंड शासन ने राज्य में आई प्राकृतिक आपदा में भारी जानमाल के नुकसान का आंकड़ा सार्वजनिक किया है। आपदा सचिव शैलेश के मुताबिक पिथौरागढ़ के डीडीहाट और थल तहसील के अन्तर्गत अत्यधिक वर्षा से त्वरित बाढ़ और मलबा आने की घटना से ग्राम सिगांली, दाफीला, बस्तड़ी एवं नौलड़ा क्षेत्र में अब तक लगभग 160 परिवारों के प्रभावित होने के साथ ही नौलड़ा गांव में तीन, बस्तड़ी में 11, चर्मा में एक व्यक्ति की मृत्यु की खबर है। अब तक 15 लोगों ने आपदा में अपनी जान गंवाई और तीन व्यक्ति गंभीर घायल हैं, जबकि 12 लोगों के लापता होने की सूचना है। वहीं 164 पशुओं के बहने के साथ ही पिथौरागढ़ से 12 भवन आंशिक और चार भवन पूर्णतरू क्षतिग्रस्त हुए है। अधिकारियों के मुताबिक आपदा प्रभावित परिवारों को राहत शिविर में रखा गया है। डीडीहाट के बस्तड़ी ग्राम में स्कूल एवं पंचायतघर में 50 लोग, ग्राम सिघाली के राजकीय इंटर कॉलेज में 150 लोग, ग्राम मल्ला पत्थरकोट स्थित प्राथमिक विद्यालय में 15 लोग और मुनस्यारी के ग्राम नौलाड़ा की जू. हाईस्कूल में 25 लोग ठहराए गए हैं। 03 जुलाई तक कुल 284 मार्ग बंद हुए थे, जिसमें से 110 मार्गों को यातायात के लिए खोल दिया गया है। कुुमाऊं मंडल के लिए वैली ब्रिज, चार फोल्डिंग ब्रिज और चार ट्रॉली भी वैकल्पिक यातायात के लिए उपलब्ध कराई जा रही हैं।

तबाही की एक बानगी

चमोली के घाट बाजार के एक मकान में सोए दादा और पोता मकान गिरने से लापता हो गए हैं। जैसे-जैसे मौसम करबट लेता है वैसे-वैसे केदारनाथ, बदरीनाथ गंगोत्री, यमनोत्री हाईवे बंद और खुलता रहता है। मानसून की पहली बरसात ने लोगो का सुख-चैन छीन लिया है। मूसलाधार बारिश से मसूरी में भी कई जगह पुस्ते गिरे। पुस्ता गिरने से कार क्षतिग्रस्त हो गई। देहरादून जिले में बांदल घाटी स्थित सरखेत और क्यारा गांव के मोटर मार्ग में बांदल नदी का पानी आने के कारण लोग अपने-अपने घर छोड़ने को मजबूर हो गये। इसी तरह जब श्रीनगर गढ़वाल में तेज बारिश के चलते तिवाड़ी मुहल्ला में मलबा घुसा तो लोग सूझ नहीं पाये कि सुरक्षित ठिकाना कहां होगा। गोपेश्वर-चमोली सड़क अवरूद्ध होने की वजह से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी ठप हो गयी। देहरादून के जनजातीय क्षेत्र में भी भारी बारिश और भूस्खलन के चलते सड़कों पर मलबा आने से जौनसार बावर के 300 से अधिक गांवों का संपर्क देश दुनिया से कट गया है। चकराता-कालसी, हरिपुर-कोटी-मीनस समेत क्षेत्र के 16 मार्ग मलबा आने से बंद हो गए हैं। मार्ग बन्द हो जाने के कारण लोग सुरक्षित ठिकानो तक पंहुचने के लिए 45-50 किमी का अतिरिक्त सफर तय कर रहे हैं। कालसी-चकराता मोटर मार्ग पर जजरेट, ककाड़ी खड्ड, लालढांग, शंभू की चैकी, चापनू, झड़वाला, भूतियाधार, सैंसा, पणायसा, कोथीधार के पास भारी मात्रा में मलबा आने से सड़क पर वाहनों की लंबी कतार लग गयी। जो मार्ग खुलने तक की इन्तजारी में है। गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से कटा हुआ है। नगदी फसलों से भरे कई ट्रक बीच रास्ते में ही फंसे हुए हैं। इसके साथ ही कई बड़े और छोटे मोटर मार्ग भी जगह-जगह मलबा आने से बंद पड़े हैं।



Sunday, July 3, 2016

बिन समुदाय की भागीदारी के ‘‘वन’’ असुरक्षित

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प्रेम पंचोली 

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उत्तराखण्ड सहित हिमालयी क्षेत्र में प्रतिवर्ष जंगलों में आग लगने की घटनायें तेजी से बढ़ रही हैं। वनों की जैव विविधता और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र वनाग्नि से तहस-नहस और नष्ट हुआ है। वनों के जलने से केवल इमारती लकड़ी ही नहीं जलती, बल्कि जीवन की एक पूरी व्यवस्था और क्रिया प्रभावित और समाप्त होती है। जंगल में पेड़ पौधों के साथ ही छोटी छोटी घास व झाड़ियां भी नष्ट होती हैं। जिसकी वजह से भू-क्षरण, भू-स्खलन और त्वरित बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। जंगल की आग से उठने वाला धुआं और विभिन्न प्रकार की जहरीली गैसें मानव और सभी प्राणियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं। हृदय और स्वांस से सम्बन्धित बीमारियां होने की सम्भावनाऐं रहती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस आग से निकलने वाली गैसें, जिनका प्रभाव वायुमंडल में तीन साल तक रहता है, के कारण कैंसर जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं। उत्तराखण्ड का 3500 हैक्टेअर और हिमाचल का 4500 हैक्टेअर जंगल वनाग्नि की भेंट चढ़ा है। यह बात ‘‘उत्तराखण्ड वनाग्नि विमर्श एवं हस्तक्षेप’’ विषय को लेकर टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, चम्पवात, पिथौरागढ़, कश्मीर, हिमाचल, हरियाणा, ओड़ीसा एवं दिल्ली से आये 75 प्रतिभागियों ने जन जागृति भवन खाड़ी में दो दिन तक हुए मंथन में सामने लाई। जबकि इधर वनाग्नि के कारणों को प्रायः धूम्रपान और खेतों में जलाये जाने वाले कूड़े को प्रमुख कारण माना जाता है। विभिन्न जागरूकता सामग्री और अभियानों में भी इन्हीं कारणों को प्रमुखता से लिया जाता है। 
विमर्श के दौरान वनों में आग लगने के कई और भी कारण निकलकर सामने आये हैं। जिसे इस बैठक में जाॅंच का भी विषय बताया गया। बैठक में विभिन्न संगठनों से आये कार्यकर्ताओं ने बताया कि बहुत कम वर्षात, एलनीनो, दक्षिण महासागर से उठने वाला चक्रवात   एवं तापमान का बढ़ना एवं सर्दी के मौसम में भी कम बारिश के कारण वनों की सूखी सतह, कम वायुमंडलीय नमी एवं उच्च तापमान भी वनाग्नि के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। यह आरोप भी अधिकांश लगाया जाता है कि मानवीय लापरवाही के कारण जैसे धूम्रपान, पटाखे एवं खेतों के कूड़े को जलाने के कारण भी कई बार आग लगती है। मगर इसके लिये कम से कम 42 डिग्री सेन्टिग्रेड तापमान आवश्यक है तभी इन कारणों से आग लग सकती है। चीड़ की अधिकता के कारण भी आग तेजी से भड़की है। चीड़ की पत्तियों से वनों में फिसलने वाली सतह का निर्माण होता है, कई बार परेशानी से बचने के लिये इन पत्तियों को जलाया जाता है। फायर लाइन निर्माण का कार्य वन रक्षकों एवं उससे निचले स्तर के कर्मचारियों द्वारा किया जाता है, जिन्हें कई बार अनुबंध पर रखा जाता है। लक्ष्य से कम वनीकरण और वन सुधार के कार्यों को छिपाने के लिये भी कई बार वनाग्नि का सहारा लिया जाता है। उच्च क्षमता की विद्युत लाइनों एवं बांस के सूखे पेड़ों के आपस में टकराने के कारण भी जंगलों में आग लगने की घटनायें होती हैं। यदि धरती का तापमान 41 डिग्री सेंटिग्रेट से अधिक है तो विमान के ईधन के रिसाव के कारण भी वनाग्नि की घटनायें घटित होती हैं। विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटी दोहन करने वाले लोगों के द्वारा भी जंगलों में आग लगाई जाती है। शिकारीयों के द्वारा जानवरों का शिकार करने के लिये नदी के किनारे वाले वनक्षेत्र में रसायन का उपयोग करके आग लगाते हैं। यदि उसी दौरान विपरीत दिशा से तेज हवा चले तो आग बढ़ेगी और वनक्षेत्र को अपने चपेट में ले लेती है। वन विभाग के द्वारा वनों में वर्षा जल संग्रहण के लिये गडड्े खोदे जाते हैं। कई बार शिकारी इन गडड्ों में रसायन का प्रयोग करके भी जंगलों में आग लगाते हैं। लकड़ी के तस्करों द्वारा भी पेड़ों को सूखा दिखाने के लिये जंगलों में आग लगाई जाती है। 
दूसरी तरफ बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि वन अधिकार कानून के बावजूद भी लोगों को वनों पर कोई अधिकार प्राप्त नहीं हुये हैं। जिसके कारण आम जनसमुदाय वनों की आग बुझाने के प्रति उदासीन है। विकास के विभिन्न गतिविधियों जैसे सड़क, बांध एवं विभिन्न बुनियादी ढांचों के विकास में भी बढ़ी मात्रा में जंगलों का खात्मा होने के साथ वहां पर जल संग्रहण क्षेत्र को भी नुकसान पंहुचाया है। जिसके कारण नमी में कमी आने के कारण जंगल की जीवन रेखा भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। बताया गया कि राज्य में उसी दौरान राजनीतिक आग भड़कने के कारण जंगलों की आग की ओर मीडिया और अन्य जिम्मेदार घटकों का ध्यान बहुत देरी से गया, जिसके कारण आग को नियंत्रित करने में पूरी तरह से निराशा हाथ लगी। बैठब में आरोप लगाया गया कि कई बार पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये जंगल में कैम्प फायर जैसे आयोजनों से भी आग लग जाती है। सबसे प्रमुख कारण वन की सुरक्षा करने वाले हाथों और शिकारियों, तस्करों का आपसी गठजोड़ है जिसकी वजह से हर वर्ष इतनी आग लगती है। 
बैठक में सामूहिक चर्चा के दौरान यह बात उभर कर आई कि जीवन और जीविका के लिये लोग पीढ़ियों से जंगलों पर निर्भर हैं। स्थानीय लोगों के वन अधिकारों को जितना सीमित किया जाता है, वन संरक्षण और सुरक्षा के प्रति लोग उतने ही उदासीन होते हैं। प्राकृतिक प्रक्रिया के साथ वन उगता और बढ़ता है। मानवीय हस्तक्षेप इसको प्रभावित करता है। जब वनों को सजावटी एवं व्यावसायिक मकसद के लिये इस्तेमाल किया जाता है, और ऐसे पौधों को बढ़ावा दिया जाता है जिन्हें कोई भी जंगली जानवर नहीं खा सके। यह बात वन की महिमा को कम करता है। जन और जानवर के बिना वन का अस्तित्व भी नहीं है। वन पर आधारित समाजों के वन अधिकारों को समाप्त करने के बाद कोई भी ऐसी सामाजिक व्यवस्था नहीं बन पाई है जो वनों को आग से और अन्य नुकसानों से बचाने की जिम्मेदारी उठा सके। लोगों की वनों के प्रति रूचि कम हुई है, और वे वनों की सारी जिम्मेदारी वन विभाग की ही समझते हैं। वन विभाग सिर्फ वनों की देखभाल और व्यावसायिक प्रबन्धन कर सकता है। वनों के संरक्षण और सुरक्षा का भार उठाने के लिये वन विभाग सक्षम नहीं है। समुदाय की भागीदारी और रूचि के बिना जंगलों की सुरक्षा संभव नहीं है।

जनसमुदाय की अपेक्षा 

उत्तराखण्ड वनाग्नी विमर्श एवं हस्तक्षेप विषय को लेकर हुई दो दिवसीय बैठक में विभिन्न संगठनो से जुड़े कार्यकर्ताओं ने यह सुझाव प्रस्तुत किया कि जिस वन क्षेत्र में आग लगी है, उस वन क्षेत्र के लिये जिम्मेदार वनाधिकारियों के ऊपर जिम्मेदारी तय हो और उन पर कार्यवाही की जाये। इतने बड़े वन क्षेत्र में आग लगने के कारणों की सघन जांच की जाये। इसके लिये एक विषेश जांच दल का गठन करके जिसमें विषेशज्ञों, वैज्ञानिकों, नागर समाज और समुदाय की भागीदारी हो के द्वारा जांच करवाई जाये। यदि कोई अध्ययन इस सम्बन्ध में सरकार के द्वारा किया गया है, तो उसे सार्वजनिक किया जाये। वनाग्नि पर सरकार श्वेत पत्र जारी करे। वनाधिकार कानून के अन्तर्गत प्रत्येक ग्राम स्तर पर वन अधिकार समितियों का गठन एवं उन्हें सशक्त करने की प्रक्रिया शुरू एवं तेज की जाये। वनाग्नि के प्रबन्धन और रोकथाम के विषय को पाठ्यक्रम मंे सम्मिलित किया जाये। वनाग्नि प्रबन्धन में एन.सी.सी., एन.एस.एस. एवं स्काउट को भी शामिल किया जाये। इंश्योरेन्स ट्रिब्यूनल को सक्रिय करके धुआं कर देने वाले परिवारांे को वनाग्नि से होने वाले नुकसान का मुवाअजा दिया जाये। ग्रीन बोनस से मिलने वाली धनराशि पर ग्राम समुदाय का अधिकार तय किया जाये। रिलीफ कोर्ट का गठन और सक्रियकरण किया जाये। वनाग्नि को भी प्राकृतिक आपदा माना जाये।

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-ः आग से बुरी तरह से झुलसे वनो के प्रति पर्यावरण कार्यर्ता चिन्तित।
-ः प्रकृति के साथ विकास के नाम पर हो रहे अप्राकृतिक व्यवहार के कारण बढ रही है वनाग्नी जैसी घटना।
-ः लोगो को पढाया जाता है वनााधिकार के कानून, इसलिए भी बढ रही है वन दोहन की घटना।
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Friday, July 1, 2016

एक कैबिनेट मंत्री की पत्नी झाड़ू-पोंछा करके गुजार रही जिन्दगी


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प्रेम पंचोली
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कभी अपने देश के राजनेता लोगो को सामाजिक सुचिता का पाठ पढाये करते थे, अब राजनीति में ऊंची पंहुच के बल पर वही राजनेता उत्पीड़न को बढावा दे रहे हैं। यह वाकाया मौजूदा समय में उत्तराखण्ड और उत्तरप्रदेश से जुड़ा हुआ है। जो कानून की आंखो में धूल झोंककर जमीन से लेकर जोरू तक के शोषण के कारनामो को अंजाम दे रहा है। यह आरोप प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर सुमित्रा सैनी ने वर्तमान में उत्तरप्रदेश के कैबिनेट मंत्री साहब सिंह सैनी पर लगाये। उनका आरोप है कि श्री सैनी किसी पराय स्त्री के साथ रहकर उनके अधिकारो का हनन कर रहा है। जबकि उनके पास उनके साथ पत्नी के रूप में रहकर तीन बेटे भी है। इतनाभर ही नहीं न्यायालय ने बकायदा इस बावत गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया मगर श्री सैनी अदालत की भी मुखालाफत कर रहा है। 
मामला साहब सिंह सैनी से जुड़ा है जो हाल ही में देहरादून स्थित जमीन के खुर्द-बुर्द करने के आरोपो से सामने आया। बता दें कि श्री सैनी उत्तरप्रदेश में विधान परिषद के सदस्य है और कैबिनेट स्तर के मंत्री भी है। उन पर सिर्फ जमीन कब्जाने के आरोप ही नहीं है बल्कि अब उनकी कहानी ने एक नया मोड़ ले लिया है। श्री सैनी पर देहरादून निवासी सुमित्रा नाम की एक महिला ने यह आरोप लगाया कि वह साहब सिंह सैनी की पहली पत्नी है। जबकि साहब सिंह सैनी की मौजूदा समय में जो उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड में अकूत सम्पति है उस पर उनकी दूसरी पत्नी रीता बासुदेव का नाम अंकित है। सुमित्रा सैनी ने अपने छोटे पुत्र प्रदीप के साथ मिलकर पत्रकार वार्ता कर बताया कि उनका विवाह 1970 में हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार साहब सिंह सैनी से हुआ था, जिसके प्रमाण उनके पास मौजूद है। 1995 तक वे पति-पत्नी के रूप में साथ रहे, इस दौरान उनसे तीन पुत्र शुशील, सुधीर व प्रदीप पैदा हुए। इस बीच ससुराल पक्ष ने उन्हे अलग कर दिया। इन्ही दिनो श्री सैनी घर से कईयों दिनों तक बाहर रहने लगा। चूंकि उन्हे लगा कि श्री सैनी कांग्रेस पार्टी से जुड़ा है तो राजनीतिक कार्यो से वे घर-परिवार को समय नहीं दे पा रहे हों। ऐसा विश्वास सुमित्रा सैनी ने साहब सिंह सैनी पर किया। पत्रकारो को अपनी आपबीती बताती है कि इस अन्तराल में उसे परिवार व बच्चो के खर्चो की भी समस्या होने लगी। यही वजह है कि वे वापस अपने माईके आ गयी। यहीं पर रहकर अपने तीनों बच्चो का लालन-पालन करने लगी। उन्होने कई बार साहब सिंह सैनी को अपने व बच्चो के खर्चो बावत मांग की, परन्तु उल्टी धमकी ही मिली। साल 2013 में सुमित्रा सैनी ने देहरादून न्यायालय में वाद दायर करके गुहार लगाई कि उसे साहब सिंह सैनी से वे सभी अधिकार मिले जो हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार एक पत्नी को मिलते है। न्यायालय ने भी श्री सैनी को गिरफ्तारी वारंट से लेकर सुमित्रा और साहब सिंह सैनी से हुए बच्चो का भी डीएनए टेस्ट करवाया। मगर साहब सिंह सैनी है जो न्यायालय को भी गुमराह कर रहा है, जैसा की सुमित्रा सैनी ने पत्रकार वार्ता दौरान तमाम दस्तावेज प्रस्तुत करके बताया। सुमित्रा सैनी ने यह भी आरोप लगाया कि साहब सिंह सैनी व रीता बासुदेव ने इन दिनों कई मर्तवा उन्हे रू॰ 14 लाख देने की बात कही कि वे साहब सिंह सैनी से तलाक ले ले। सुमित्रा ने पत्रकारो को बताया कि वह तलाक नहीं चाहती वह तो वे उन अधिकरो के लिए न्यायालय की शरण में है जो एक पत्नी को मिलने चाहिए। वे यह भी मांग कर ही है कि साहब सिंह सैनी की सम्पूर्ण सम्पति की सीबीआई जांच होनी चाहिए। जिसके लिए सुमित्रा ने उत्तराखण्ड और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री व राज्यपाल को पत्र लिखा है। उन्होने बहुत ऐसे दस्तावेज बताये जिन पर रीता बासुदेव को साहब सिंह सैनी ने अपनी पत्नी दर्शाया है। उनका यह भी आरोप है कि उनके पास वे सभी दस्तावेज है जो विवाहित परिवार के पास होते हैं। उन्होने विवाह के दौरान के पत्र भी पत्रकारो को बताया कि साहब सिंह सैनी किस तरह उन्हे पत्नी के रूप में पत्र लिखते थे। सुमित्रा सैनी ने पुलिस के रवैये पर भी सवाल खड़े किये, बताया कि जब केहरी गांव की एक महिला ने साहब सिंह सैनी पर बदसलूकी का मुकदमा दर्ज किया था तो साहब सिंह सैनी ने अपनी राजनीति का रूतबा दिखाकर उल्टे दो पुलिस कर्मीयों को बंधक बना डाला। यही नहीं वर्तमान में देहरादून कैंट बोर्ड के सी॰ओ॰ सुब्रत पाल के साथ मिलकर साहब सिंह सैनी देहरादून में जमीनों को कब्जाने का काम कर रहा है। 
जख्म को गहरा करती सुमित्रा की कहानी 
मोहब्बेवाला स्थित धारावाली गांव निवासी सुमित्रा सैनी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। 25 वर्ष तक साहब सिंह सैनी की पत्नी के रूप में सुमित्रा सैनी ने वे सभी इच्छायें पूरी की जो एक पति को चाहिए। उसके दुख-दर्द ही नहीं उसकी पढाई में भी सुमित्रा सैनी ने अपने पिता के सहयोग से हाथ बढाया। उसे क्या मालूम था कि साहब सिंह सैनी किसी दिन राजनीतिक ताकत बनकर उभरेगा और उसे व उसके बच्चो को घर से बाहर का रास्ता दिखा देगा। यही नहीं किसी पराय स्त्री को अपनी पत्नी बताकर समाज और कानून की आंखो में पिछले 20 वर्षो से धूल झोंकता रहा। बेवश सुमित्रा तत्काल क्या करती, तीन बच्चो सहित अपना भार अपने माईको वालो पर नही डालना चाहती थी। सो वह मसूरी रोड़ पर स्थित कोठालगेट के पास शिव मंदिर के शिवरत्न केन्द्र में झाड़ू-पोंछा का काम करने लगी। कई वर्षो तक वे शिवरत्नकेन्द्र में झाड़ू-पोंछा करके अपनी व बच्चों का लालन-पालन कर पाई। अब उनके बच्चे भी धियाडी़-मजदूरी करके अपनी दिनचर्या को आगे बढा रहे हैं।
विवादो से नाता है साहब सिंह सैनी का
साहब सिंह सैनी इधर देहरादून के केहरी गांव में महिलाओं के साथ बदसलूकी करते पाया गया, यह सूचना पुलिस तक पंहुची, तो पुलिस उनकी राजनीतिक रसूक देखकर चुप हो गयी। उधर उत्तरप्रदेश के साहरनपुर में साहब सिंह सैनी पर कई मुकदमें दर्ज हैं। अब सुमित्रा सैनी ने अपने वे सभी अधिकारों की सुरक्षा के लिए देहरादून न्यायालय में 494 धारा के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज किया हुआ है।
कौन है साहब सिंह सैनी
वर्तमान में उत्तरप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री। सुमित्रा और रीता का पति। साहरनपुर और देहरादून में जमीन और महिला उत्पीड़न के मामले पुलिस के पास दर्ज। पत्नी सुमित्रा को छोड़कर रीता बासुदेव से चोरी-छुपे शादी रचाने का आरोप। पहले कांग्रेस में ऊंची पंहुच, अब समाजवादी पार्टी का बफादार।

हालात ये देहरादून: बिन पानी सब सून

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प्रेम पंचोली
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(लेखक एनएफआई के फैलो व मान्यताप्राप्त प्रत्रकार हैं)
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कभी देहरादून को अंग्रेज लंदन की तर्ज पर विकसित करना चाहते थे इसलिए कि देहरादून का सुहावना मौसम खुशगवार था। यहां कभी भी गर्मी का एहसास नहीं होता था। स्पष्ट है कि देहरादून में ‘‘जल की मात्रा’’ इतनी थी कि कभी भी मौसम गर्म होने तक नहीं पंहुच पाता था। इसलिए देहरादून की सबसे बड़ी नहरें इष्ट व वैष्ट कैनाल लोगो के हलक ही नहीं अपितु इन नहरों के पानी से ‘‘बासमती और लीची’’ की महक देश-दुनिया को अपने ओर आकृषित करती थी। हैं न देहरादून के पानी का कमाल। लेकिन जनबा अब तो सिचाई तो दून लोगो के हलक सिंचित हो जाये तो गनीमत।
ज्ञात हो कि पिछले 15 वर्षो में देहरादून का ही पर्यावरण बदल गया है, क्योंकि देहरादून उत्तराखण्ड की जो अस्थाई राजधानी बन गयी। मतलब साफ है कि राजधानी में जनसंख्या का घनत्व बढना और कृषि की जोत का कम होना ही पर्यावरण अंसन्तुलन का कारण बनता ही जा रहा है, जिसका सबसे बड़ा असर वर्तमान में पीने के पानी पर पड़ रहा है। हालात इस कदर है कि जहां खेत होने थे वहां बड़ी-बड़ी इमारते उग आई है, जहां पानी की प्राकृतिक जल धारायें बहती थी वहां पक्की सड़के बन गयी है। लोगो का दबाव देहरादून पर बड़ी मात्रा में बढ रहा है उसी तरह पानी की मात्रा भी बड़ी तेजी से घट रही है। हालात इस कदर है कि पानी के रिचार्ज के लिए कोई योजना नहीं बनायी जा रही है।
बतातें चलें कि देहरादून में वर्तमान समय में 200 एमएलडी पानी की आवश्यकता है, परन्तु प्रकृतिक जल स्रोतों के सूखने के कारण वर्तमान में यहां 172 एमएलडी पानी ही उपलब्ध हो पा रहा है। दूसरी ओर पहाड़ी क्षेत्रो में खेती का कार्य पलायन के चलते बन्द हो रहा है। फलस्वरूप इसके पानी जमीन के भीतर सर-सब्ज नहीं हो पा रहा है इसलिए बरसात का पानी ऊपरी सतह से सीधा बहकर चला जाता है। यह भी वजह मानी जा रही है कि प्राकृतिक जल स्रोत रिचार्ज होने की स्थिति नाजुक बनती ही जा रही है। उल्लेखनीय हो कि अस्थाई राजधानी देहरादून में सिर्फ व सिर्फ भूजल का दोहन ही हो रहा है। वनस्पत की भू-जल रिचार्ज पर अब तक कोई कार्य नहीं हो रहा है। उधर केन्द्रीय जल बोर्ड ने वर्ष 2002 से 2012 के बीच का देहरादून के आस-पास के 17 स्थानो पर एक अध्यन करवाया। अध्यन में पाया गया कि अकेले राजधानी देहरादून में भू-जल आठ मीटर नीचे चला गया है। जबकि जल संस्थान प्रतिदिन 19 लाख 63 हजार 200 किलो लीटर भूजल (एक अरब 96 करोड़ 32 लाख लीटर) 409 ट्यूबेलो के माध्यम से पेयजल आपूर्ती हेतु जनपद के अलग-अलग स्थानो से निकालता है। स्पष्ट नजर आ रहा है कि राजधानी में पेयजल की जितनी भी योजना बन रही है वे सभी भूजल के दोहन के लिए बन रही है। इस तरह एक तरफ भूजल पर दिनो-दिन दबाव बढ रहा है तो दूसरी तरफ उनके पुनर्भरण के लिए कोई योजना अब तक सामने नहीं आ पायी है। लोग मानसून का भला मानते हैं कि जो 1.26 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल रिचार्ज कर जाता है। बिडम्बना यह है कि जिस तरह से राजधानी में खेती की जमीन कंक्रीट में तब्दील हो रही है, पानी भू-सतह के ऊपर से सीधे तेजी से बहकर चला जाता है उससे भूजल रिचार्ज में भी तेजी से कमी आ रही है।
राजधानी बनने के बाद देहरादून में प्रतिदिन कोई न कोई एक परिवार स्थाई रूप से निवास करने के लिए आ रहा है। देहरादून की आबादी पिछले 15 वर्षो से 40 फीसदी के दर से बढी है। इसी तरह देहरादून में बहुमंजिली फ्लैट जैसी संस्कृति भी बड़ी तेजी से पनप रही है। इन सभी की मूल आवश्यकता पानी ही है। पानी की आपूर्ती के लिए लोग सबसे त्वरित तरीका भू-जल को मान रहे है। जितने भवन और फ्लैट निमार्ण हो रहे है वे पानी की आपूर्ती के लिए सर्वाधिक भूजल का ही उपयोग कर रहे हैं। ताज्जुब हो कि देहरादून में 180 ग्रुप हाउसिंग के पास है। मगर अब तक भूजल दोहन की कोई अनुमति नही ली गयी। सिर्फ सेलाकुई स्थित आर्मी वेलफेयर हाउसिंग आॅर्गेनाइजेशन एवं मसूरी रोड़ पर बायोटेक इण्डिया लि॰ ने एक होटल निर्माण के लिए भूजल बोर्ड से अनुमति ली है। इसके अलावा 11 फैक्ट्रियों को छोड़कर किसी के पास भी केन्द्रीय भूजल बोर्ड की अनुमति नहीं है।
कुल मिलाकर देहरादून की लाईफ लाईन कही जाने वाली ईष्ट व वैष्ट कैनाल को पाट दिया गया। धर्मपुर, माजरा जैसी कृषि भूमि व डालनवाला जैसे अनके क्षेत्र जो लीची के लिए दुनिया में मशहूर थे की जगह अब कंक्रीट के जंगल ने ले ली है। भू-जल का दोहन बड़ी तेजी से हो रहा है परन्तु पुनर्भरण के लिए अब तक कोई कारगर योजना सामने नहीं आ पाई है। जिस तरह से राजधानी देहरादून में जनसंख्या का दबाव बढ रहा है उस तरह से जल संरक्षण की नीति सामने नहीं आ पा रही है। आने वाले दिनो में देहरादून की पानी की समस्या लोगो के लिए खतरे की घण्टी बनने वाली है।
सैकड़ो हैण्डपम्प खराब
गौरतलब हो कि देहरादून जनपद में 300 ऐसे हैण्डपम्प हैं या तो वे सूख चुके हैं या वे ऐसा पानी उगल रहे हैं जिससे हलक तर करना तो दूर घरेलू कार्य तक नहीं किया जाता। इन हैण्डपम्पो से रोजाना मिलने वाला 21 लाख लीटर पानी धरती के गर्भ में ‘‘चोक’’ होकर रह गया है। इतने पानी से रोजाना चार लाख लोगो की पेयजल आपूर्ती हो सकती थी। एक ओर पेयजल निगम के आंकड़े बताते हैं कि अकेले देहरादून में 2500 हैण्डपम्प है जिनमें सिर्फ 45 ही खराब है। दूसरी ओर विभागीय सूत्र बताते हैं कि शहर और ग्रामीण क्षेत्रो को मिलाकर जनपद में 300 हैण्ड पम्प खराब हो चुके है। वैसे भी एक हैण्डपम्प लगाने में डेढ से ढाई लाख रू॰ खर्च आता है। विभागीय अफसर बताते हैं कि हैण्डपम्प मरम्मत को सिर्फ 40 लाख रूपये सालाना मिलते हैं जो हैण्डपम्पो के रख-रखाव के लिए उपयुक्त नहीं है।
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राज्य में पिछले 10 वर्षो में 221 प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं। यह आंकड़ा हाल ही में जल संस्थान ने एक अध्यन के मार्फत बताया है। अकेले देहरादून जनपद में 13 जल स्रोत सूख चुके हैं। हालात यह है कि पहाड़ी क्षेत्रों और देश के कोन-कोने से देहरादून में बसने वालो की संख्या में भारी हिजाफा हो रहा है।
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केन्द्रीय भूजल बोर्ड के क्षेत्रीय प्रमुख अनुराग खन्ना कहते हैं कि यदि भू-जल ने खतरे के निशान को पार कर लिया तो उसके पुनर्भरण के लिए एक सदी का समय लग जाता है। राज्य सरकार को भू-जल के रिचार्ज करने के प्रयाास करने चाहिए।

Wednesday, February 17, 2016

माघ और विस्सू और महोत्सव के मार्फत लोक संस्कृति का अनूठा संगम


प्रेम पंचोली

लोक संस्कृति के संजीव चरित-चित्रण का अगाज पिछले 15 वर्षो से लाखामण्डल में होते आया है। जो अब राजधानी देहरादून में भी ‘‘उत्तराखण्ड माघ महोत्सव’’ के नाम से भी पिछले दो वर्षो से आयोजित होते आ रहा है। यह कोई ऐतिहासिक मेला नही है बल्कि जौनसार-बावर क्षेत्र विकास समिति द्वारा आयोजित ‘‘विस्सू महोत्सव व उत्तराखण्ड माघ महोत्सव’’ है जो अब लोक में स्थापित हो गया है। लोग इन महोत्सवो का श्रेय गीताराम गौड़ को ही दे रहे हैं। 
ज्ञात हो कि श्री गौड़ अपने छात्र जीवन के दौरान से ही अपने पैत्रिक गांव लाखामण्डल में ‘‘विस्सू महोत्सव’’ का आयोजन करते आया है। यह उनका आयोजनभर ही नहीं है वे तो विविध रंगकर्मियों को एक मंच पर उतारते है। जब आप अप्रैल माह में लाखामण्डल में होंगे तो यदा-कदा पूरी इस विस्सू महोत्सव की चर्चाऐं आम होगी। बल्कि सम्पूर्ण यमुना घाटी में लोग वर्षभर इस महोत्सव का इन्तजार करते हैं। जबकि लाखामण्डल में ही 15 अप्रैल को भी एक मेले का आयोजन ऐतिहासिक रूप से आयोजित होते आया है। मगर जौनसार-बावर क्षेत्र विकास समिति द्वारा आयोजित ‘‘विस्सू महोत्सव’’ की खूशबू ही है कि लोग 15 वर्षो से लगातार इस महोत्सव के इन्तजार में सरेआम दिखते है। समिति का मात्र इतना ही काम नहीं रह जाता है यह समिति अब राज्य की पांचो जनजातियों के अधिकारो के लिए भी संघर्षरत दिखती है। यही वजह है कि पिछले दो वर्षो से समिति राजधानी देहरादून में राज्य की पांचो जनजातियों को एकत्रित कर उनके विकासीय कार्यो पर बहस को आगे बढाते है तथा उनकी समस्याओं को मीडिया और शासन-प्रशासन तक पंहुचाने का काम भी समिति एक भव्य आयोजन करके जनजातियों की संयुक्त आवाज के रूप में प्रस्तुत करती है।
उल्लेखनीय हो कि जहां समिति लोक संस्कृति के प्रति सजग दिखती है वहीं समिति वर्षभर जनजाति क्षेत्र में लोगो की समस्याओं के समाधान हेतु सरकार के साथ संवाद कायम रखती है। इसी का नतिजा है कि वर्ष में दो बार आयोजित होने वाले महोत्सव में राज्य सरकार में बैठे जनता के नुमाईन्दे अपनी उपस्थिति दर्ज करने में पीछे नहीं रहते। महोत्सव में सिर्फ रंगा-रंग कार्यक्रम ही पेश नही होते इस दौरान लोग सरकारी योजनाओं की जानकारी हासिल करते हैं तो स्वास्थ्य सेवाओं का भी फायदा उठाते हैं। अब क्षेत्र में लोग गीताराम को देखकर एक ही शब्द का उचारण करते है कि गौड़ साहब फिर कुछ और नहीं हो रहा है। और के मायने में लोगो का सीधा अर्थ है कि उन्हे ऐसे आयोजनो से उन अधिकारियों से काम लेने में सहूलियत होती है।
जौनसार-बावर क्षेत्र विकास समिति मौजूदा समय में अपने कार्यक्रमों को पांचो जनजातियों पर फोकस कर रही है। समिति जनजातियों की समस्यायों को सरकार तक पंहुचाने के लिए लगातार संघर्षरत रहती है। वे गोष्ठी, विमर्श व महोत्सव के माध्ययम से जनता और सरकार के बीच संवाद कायम करने में सफल होती दिख रही है। समिति ने चाहे ट्राईबल सब प्लान की बात हो या जनजातीय गांव में सड़क, विद्युत, पानी, स्वास्थ्य व शिक्षा का मसला हो, ऐसे मूलभूत आवश्यकताओं पर समिति लगातार सरकार के साथ संवाद कायम रखी हुई। जिसका जीताजागता उदाहरण लाखामण्डल में दिखाई देता है। इसके अलावा यदि लोक संस्कृति के संरक्षण की बात करें तो समिति अपने आयोजन में लोगो की सहभागीता को प्रमुखता देती है। यही कारण है कि मुनस्यारी के लोक कलाकार लाखामण्डल के जौनसार क्षेत्र में होते हैं तो वही नीति-माणा और हिमांचल के ठेट लाहूल-स्पीती के कलाकार सहित राज्य के विभिन्न भागो से आये हुए रंगकर्मी भी अपनी प्रस्तुति के लिए सीना फुलाये दिखते हैं। जनजातियों की यह बहुविविधतापूर्ण संस्कृति का सजीव चरित चित्रण जौनसार-बावर क्षेत्र विकास समिति के तत्वाधान में लाखामण्डल और देहरादून में आयोजित होने वाले महोत्सव में ही लोगो को देखने को मिलता है।
संघर्ष से मिली प्रेरणा
विज्ञान विषय से स्नातक गीता राम गौड़ कभी सरकारी सेवा के मोहपास में नहीं आया और छात्र जीवन से ही जन सेवा में तल्लीन हो गये। जन सेवा उन्हे कहीं विरासत में नही मिली बल्कि उन्हे तो जन सेवा के लिए संघर्षो के थपेड़े ने प्रेरित किया है। गीताराम गौड़ की प्राईमरी व जूनियर की पढाई के दौरान के संस्मरण ही चैकाने वाले हैं। उनके पीताजी कोई उच्च शिक्षित नहीं थे परन्तु उनकी जीज्ञासा थी कि उनका पुत्र पढ-लिखकर सरकारी सेवा में जायेगा तो उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आयेगा। इसलिए उन्होने गीताराम को दूर नौगांव स्थित आगे की पडाई के लिए भेज दिया। गीताराम ने अपने पीताजी के संघर्ष को देखते हुए उन्ही दिनों मन बना लिया था कि वे भविष्य में जन सेवा के कार्य करेगा। उत्तरकाशी के नौगांव इण्टर काॅलेज के बाद डीएवी काॅलेज में दाखिला लिया। इन्ही दिनों गीताराम ने यानि सन 1998 में जौनसार-बावर छात्र संघ अध्यक्ष का पद संभाल लिया। बस इसके बाद से गीताराम ने पीछे नहीं देखा और 1999 में जौनसार-बावर क्षेत्र विकास समिति का गठन कर डाला। यही नहीं उन्हे अपने निकटतम मूरतराम शर्मा का सानिध्य मिला तो भाजपा के भी सक्रीय कार्यकर्ताओं में सममलित हो गये। वर्तमान में वे भाजपा के अनुसूचित जाति व जनजाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष भी है। वे मानते हैं कि विकास के काम की धार बिना राजनीति के नहीं हो सकती। वरन् विकास के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम करना होता है। इसलिए जौनसार-बावर क्षेत्र विकास समिति के कार्यो के साथ लगातार जुड़ा रहता हूं।


समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...