Friday, November 14, 2014
- 21, 22, 23 नवम्बर 2014 को है यमुनाघाटी में बग्वाल (दीपावली) - 23 नवम्बर को है 2014 को है गैर गांव में ‘‘देवलांग’’ - कार्तिक में नही यहां मंगसीर माह में मनायी जाती है दीपावली - उतरकाशी जनपद की बनाल पट्टी के गैर गांव में - दीपावली के अवसर पर ‘‘देवलांग’’ - सांठी और पांसाई क्या है - ढीपसा और दियाई क्या है - बग्वाल एवं बाॅर्त एक अद्भुत दृष्य - देवलांग देखने कैसे पंहुचे
Tuesday, November 11, 2014
एमडीडीए और लोगो मे संवादहीनता
प्रेम पंचोली/विजय बग्गा से बातचीत पर आधारित देखें देहरादून डिस्कवर
यहां एक बात बानगी के तौर पर बता दूं कि देहरादून में राज्य की अस्थाई राजधानी बनने के कारण शहर तीव्र गति से विस्तार ले रहा है और इसके साथ-साथ सरकारी व गैर सरकारी प्रतिष्ठानो में काम व मानव संसाधनो का बढना तथा इनकी पूर्ति बावत जरूरतो की मांग भी लगातार बढ रही है। ऐसे में यूं कहे कि हर स्तर पर जिम्मेदारी का निर्वहन करना व कराना दिनो दिन राज्य सरकार के लिए एक चुनौती बनती जा रही है।ज्ञात हो कि देहरादून शहर का विस्तार जिस तरह से राजधानी में दफ्तरो के बनने से हो रहा है उसी तरह कामकाजी व मूलरूप से शिक्षा, स्वास्थ्य की पूर्ती बावत राज्य के ग्रामीणो ने अपने पुश्तैनी घर छोड़कर राजधानी व उसके आस-पास के कस्बो, गांवो में ठौर-ठिकाना (कुछ लोगो ने) ढूंढ लिया है। कुछ अभी भी ढूंढ रहे हैं। इस कारण लोगो का जो जमवाड़ा अब देहरादून शहर की तरफ बढ रहा है वह दोनो तरफ से सरकार एवं गैर सरकारी स्तर पर प्रश्नचिन्ह है। मगर शहर की आबोहवा एवं रहन-सहन व्यवस्थित हो क्या यह ठीक किया जा सकता है? तब जब जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक व सही समय पर किया जा सके। ऐसा मानना देहरादून शहर के अधिकांश व्यापारियो का है। स्पष्ट तौर पर कहा यही जायेगा कि शहर को व्यवस्थित करने मे पहली जिम्मेदारी ‘‘मसूरी देहरादून विकास प्राधीकरण’’ तो बनती ही है उसके बाद अन्य प्रसाशनिक विभागो की बनती है। यही नही स्वंय भी लोगो को सभी नियम-कानून आत्मसात करने पड़ेगे। लेकिन यहां तो एमडीडीए और लोगो में लगातार छत्तीस का आंकड़ा बनाता जा रहा है।
एमडीडीए बोर्ड मेम्बर विजय बग्गा कहते है कि लोगो की शिकायत सुनी ही नहीं जाती है। जबकि शहर का मास्टर प्लान आ चुका है। यह कहां तक पंहुचा यह तो एमडीडीए अच्छी तरह बता सकता है। परन्तु लोगो के सामने जो समस्या वर्तमान में आ रही है वह पार्कीग, सुलभ यातायात, भवन निर्माण बावत एमडीडीए से नक्से पास कराना इत्यादी की है। ये तीन बाते अब तक इसलिए भी स्पष्ट नहीं होे पा रही है कि एमडीडीए की बोर्ड की बैठक साल में तीन बार होनी आवश्यक है परन्तु यह बैठक एक ही बार हुई है। जब यह बैठक हुई तो इसमें प्राधीकरण के कर्मचारियो की वेतन व कार्यालयों में संसाधनो के अभाव की समस्या प्रमुख रही। जो जनता की समस्या थी वह गौण ही हो गयी। सिर्फ रश्म अदायगी के लिए शहर के वेडिंग प्वांईटो पर थोड़ी सी चर्चा कर ली गयी थी। दुबारा बोर्ड बैठक हुई नही।
अब सवाल यह भी है कि देहरादून का नया मास्टर प्लान कितना कारगर साबित होगा यह कुछ कहा नही जा सकता। बता दें कि मास्टर प्लान में चक्खुमोहल्ला, मोती बाजार, डांडीपुर, कांवली रोड़, खुड़बुड़ा, घोसीगली इत्यादि को घनी आबादी में घाषित कर लिया गया है। इन घनी आबादी वाले क्षेत्रों में आवागमन के लिए आठ से दस फुट के रास्ते बने हैं। जो लगभग 100 साल और उससे भी पुराने हैं। यही हाल इन जगहों पर बनी आवासीय व व्यवसायी इमारातो का है। अब यदि ये इमारते जर्जर हो चुकी हैं तो क्या इन इमारतो का पुनर्रूद्वार नहीं किया जा सकता? किया जा सकता है। परन्तु एमडीडीए की तर्ज पर। एमडीडीए का नया मास्टर प्लान बताता है कि नवनिर्माण में 15-30 फुट का रास्त होना व कुल क्षेत्रफल में से आगे पिछे 20 प्रतिशत जगह भी छोड़नी जरूरी है। सो इन क्षेत्रों में हो नहीं सकता। इन घनी आबादी वाले क्षेत्रो में तो वर्तमान में दुपहिया ले जाना ही लाजमी है। यदि यहां 15-30 फुट का रास्ता बनता है और कुल क्षेत्रफल की जगह में से आगे-पीछे 20 फीसदी जगह छोड़नी पड़ेगी तो इस घेरे में आने वालो का पुनर्वास करवाना लाजमी है। क्योंकि इनके पास तब कुछ भी जगह ना तो व्यवसाय के लिए और ना ही रहने के लिए बचती है। ऐसे में क्या एमडीडीए इनका पुनर्वास बावत कोई योजना बना रहा है या बनायी हुई है। जिसका खाका अब तक सामने नहीं आया है। क्योंकि एमडीडीए के नये नियम कायदे से उन्हे अपना रहन-सहन व करोबार सहित विस्थापित होना पड़ रहा है जो हो नहीं सकता। यहां घोसी गली का उदाहरण ही काफी है। यहा जो जर्जर इमारते हैं वे लोग पुनर्रूद्वार करने बावत एमडीडीए से नक्से पास करवाने गये। इनका नक्सा पास तो हुआ नहीं उल्टी एमडीडीए ने इनकी फजीहत कर दी। कहा कि एमडीडीए के कर्मचारी जांच करने आयेंगे। जांच तो क्या इनकी पुनर्रूद्वार वाली इमारते ही सीज कर दी गयी। इनके जैसे अन्य जगह पर भी कुछ लोगो पर एमडीडीए की मेहरबानी बरस पड़ी। इस तरह का दोगला चरित्र एमडीडीए का लोगो में असन्तोष फैला रहा है साथ ही साथ शहर में अव्यवस्थाऐ पनप रही है।
इसके अलावा एक और समस्या आने वाली है। हालांकि इस समस्या के निवारण के लिए एमडीडीए कहता है कि उनके पास देहरादून का मास्टर प्लान है। हालात इस कदर है कि एक अनुमान के अनुसार देहरादून, ऋषिकेश, विकासनगर की तहसीलो में रोज 300 रजिस्ट्रीयां जमीन व मकान की हो रही है। इसी तरह पिछले छः सालो का एक आंकड़ा बताता है कि पहाड़ से उतरकर दो लाख लोगो ने भविष्य हेतु देहरादून मे रहने बावत दो लाख प्लांट खरीदे है। अन्य बाहर से आने वालो ने कितना खरीदा होगा इसका आंकड़ा भी एमडीडीए अच्छी तरह बता सकता है। अर्थात शहर का विस्तार जिस गति से हो रहा है उसके व्यवस्थित उपाय नजर नहीं आ रहे हैं। जमीन खरीदने के बाद लोगो को बहुत सारे कड़े कानूनो को ढोना पड़ रहा है जैसे कृषि भूमि को रिहायसी करवाने के लिए विकास शुल्क इतना मंहगा कर चुका है कि जिस कारण जमीनो के दाम आसमां चूम रहे हैं। इस गफलत में आम नागरिक का शहर में रहना दूभर हो रहा है। इस विकास शुल्क के कारण रास्तो की जो समस्या उत्पन्न हो रही है वह जगजाहिर है। क्योंकि इतनी मंहगी जमीन के लिए अमुक व्यक्ति एक इंच जमीन भी नहीं छोड़ सकता। अस्थई राजधानी में जो समस्या जमीन की खरीद फरोख्त और गांवो से यहां पलायन करके आ चुके लोगो से हो रही है उससे बड़ी समस्या तो हमारे दोगले नियम कानून की हैं। अबल तो यह है कि हमें बंग्लो, बंगला, भवन, मकान, माॅल, दुकान, ठेली, प्लाजा जैसे को चलाने वाले लोगो के साथ दोहरी नीति का चरित्र नहीं दिखाना होगा। वैसे तो हिमांचल से सीख लेनी चाहिए। इस बात को हर राजनेता और मीडिया के लोग कहते फिरते आयें हैं। मगर कभी हम लोग हिमांचल में इस हेतु शिक्षण-प्रशिक्षण लेने गये भी? हम तो वहां जाते है जहां का पर्यावरण, रहन-सहन व संस्कृति दूर-दूर तलक राज्य से मेल ही नहीं खाती।
एमडीडीए के पास राज्य बनने के चैदह वर्ष बाद अस्थाई राजधानी में लोगो को सुव्यवस्थित बसाने की माकूल नीति व नियत की दूर-दूर तक गुंजाइश ही नजर नहीं आ रही है। देहरादून जिस तरह तीव्र गति से बढ रहा है और जिस तरह यहां ढांचागत विकास हो रहा है वह आने वाले पांच वर्षो मे शहर की आबोहव्वा में जहर घोलने का काम करेगा। बहुमंजिले इमारते, बिन पार्कीगं की इमारते (रिहायसी एवं व्यवसायी) जो बन रही है उनके बारे में भी सोचना होगा। यही नहीं पहाड़ से जो पलायन देहरादून की तरफ बढ रहा है उसको व्यवस्थित करने के भी माकूल उपाय हों। एमडीडीए के पास यह काम इसलिए बढ रहा है कि शहर में जो बसने आयेगा उसे एमडीडीए से स्वीकृति लेनी ही पड़ती है। अर्थात स्वीकृति में बरती जाने वाली कोताही से क्या एमडीडीए पर सवाल खड़ा हो रहा है। इस ओर भी एमडीडीए को ही एक बरा फिर सोचना पडे़गा। क्योंकि भविष्य में स्कूलो, चिकित्सालयों, यातायात आदि में बहुतायात में भीड़ बढने वाली है। इसलिए पुनर्रूद्वार और नवनिर्माण हेतु रिहायसी व व्यवसायी इमारतो में अनिवार्य रूप से ‘‘स्टील पार्कीग’’ बनानी अनिवार्य कर देनी चाहिए। साथ ही एक बार फिर भूमि के संबध में विकास शुल्क पर सोचना होगा।
बाॅक्स
-ः संवादहीनता के कारण कोई भी काम सफल नहीं होता।
-ः यहां पलायन की रफ्तार कब रूकेगी यह तो कुछ पता नहीं है।
-ः जो पुरानी इमारते जर्जर हो चुकी है उनकी मरम्मत करने बावत लोग एमडीडीए के चक्कर काट-काट कर थक हार चुके हैं।
Tuesday, November 4, 2014
समाज सेवा की जीवट प्रतिमूर्ती रागणी बहन का जाना एक अपूर्णीय क्षती
समाज सेवा की जीवट प्रतिमूर्ती रागणी बहन का जाना एक अपूर्णीय क्षती
उत्तर प्रदेश गॅाधी स्मारक निधि की अध्यक्षा और वनवासी सेवा आसश्रम की प्रमुख कार्यकर्ता व प्रसिद्ध गांधीवादी चिन्तक डा0 रागिणी बहन का निधन बिते कल दिल्ली के चिकित्सालय में हुआ इनके निधन पर देशभर में गांधीवादी विचार में एक कमी सदैव खलती रहेगी। उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध गांधीवादी चिन्तक व शिक्षाविद् विहारी लाल भाई ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि समाज सेवा के प्रति समर्पित जन समूह में एक असमय क्षती हुई है।डा0 रागिणी बहन का जीवन समाज सेवा में ही बिता उन्हे मालूम नहीं कि कब मौत उनके घर दस्तक दें दें। वे ताउम्र गांधी विचार से ओत-प्रोत रही। यही वजह है कि आज उनकी विरासत उनकी दो बकटिया संभाल रही है। डा॰रागणी बहन चिकित्सा विज्ञान मे डण्क्ण् की उपाधि और उस्मानिया विश्वविद्यालय के अध्यापन कार्य का अनुभव प्राप्त करने के बाद, 10 जुलाई 1966 को प्रेमभाई के साथ दांपत्य जीवन मे बन्धी। डा0 रागिणी प्रेम का जन्म गाॅंधी विचार प्रेमी और समाजसेवा के लिये समर्पित स्वर्गीय विष्णुपलशीकर हैदराबाद के घर मे 12 सितम्बर सन् 1934 को हुआ। जहॅा वह गाॅधी विचार से पली पोषी और सेवाभाव के लिये चिकित्सीय ज्ञान से सक्षम हुई।
डा0 रागिणी बहन और प्रेमभाई दोनों को अण्णा साहब सहस्त्रबुद्धे और राधाकृष्ण जी का स्नेह और मार्गदर्शन था। दोनो की सलाह से और विचित्र नारायण भाई, करणभाई और रघुनाथ काॅल के आग्रह पर दोनों ने भोग-वैभव की दुनिया से विमुख होकर विवाह के बाद अपना कार्यक्षेत्र दुर्भिक्ष एवं सूखे से ग्रस्त क्षेत्र (तत्कालिक मीरजापुर की दुद्वी तहसील) को अपना कार्यक्षेत्र चुना और दीनदुखी बनवासियों की सेवा का संकल्प लिया।
डा0 रागिणी बहन, प्रेम भाई से एक वर्ष बाद जुलाई 1968 को बनवासी सेवा आश्रम से जुडी और क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा की मुख्य जिम्मेवारी लेती हुई उन्होने श्री प्रेमभाई की छाया की भाॅति आज के सोनभद्र को दुर्भिक्ष और सूखे से मुक्त कराने, कश्मीर बनाने और श्री राम प्रवेश शास्त्री के शब्दों मे ‘सोनभद्र’ को ‘‘सर्वतोभद्र’’ बनाने के लिये ‘‘हजारों एकड’’ भूमि के सुधार व समतलीकरण और उनमें फल, सब्जी और अन्न की खेती से लहराने; क्षेत्र की सूखी धरती के गर्भ को सेकडों छोटे व बडें तालाबो को बनवाकर सींचने व हरितिम बनाने; सैकडों ट्यूबवेल व जलपम्प स्थापितकर क्षेत्र के हजारों लोगो की पेयजल समस्या का हल करने; 100 प्रौढशिक्षा केन्द्र, 50 सचल पुस्तकालयों एवं नई तालीम के आवासीय बुनियादी शिक्षा विद्यालय, जीवनशालाओं, ग्रामशालाओं, अक्षरसेना, सम्पूर्ण साक्षरता व कार्यपरख शिक्षा के प्रयोगों से जन-जन को साक्षर बनाने की ग्रामदान शिक्षण की योजना को सफल बनाने; और क्षेत्र मे तकनीकी प्रशिक्षण के द्वारा तकनीशियनों की जमात तैयार करने; ग्रामीण हकदारी एवं कानूनी सहायता योजना के अन्तर्गत कालीन उद्योगोे में कार्यरत् हजारों बाल श्रमिकों व हजारों बन्धुवा मजदूरों को पॅंूजीपतियों के शिकंजे से मुक्ति दिलाने और सिंगरोली बाॅध के जन्मभूमि के पे्रमियों को उन्हे उनकी काश्तभूमि के अधिकार दिलाने; दैविक आपदाग्रस्तों के राहत व विकास कार्य में; प्राकृतिक संसाधनों के विकास, प्रबन्धन एवं विविध कार्यों मे उनकी भूमिका प्रेमभाई की मृत्युपर्यन्त अद्भुत रही और इसके बाद उक्त कार्यो को अपने जीवन की अन्तिम संास तक बखूबी से निर्वाह करती रही।
डा0 रागिणी बहिन की किडनी खराब हो जाने व फेफडों मे पानी भरते रहने से वे कई महीनों तक अस्वस्थ रही। उनकी बेटी डा0 विभा एवं शुभा, बनवासी सेवा आश्रम व गाॅधी भवन के कार्यकर्ताओं की अनन्य सेवा एवं चिकित्सकों के विशिष्ठ चिकित्सकीय व्यवस्था के बावजूद भी उनकी आत्मा ने उनके पार्थिव शरीर से 2 नवम्बर 2014 की रात्रि 9 बजकर 20 मिनट पर राममनोहर लोहिया अस्पताल लखनऊ से परम्धाम को प्राप्त हुई।
आज सोनभद्र, पूर्व की भाॅति दुर्भिक्ष और सूखाग्रस्त नही है। यह माना जाना चाहिये कि रागिणी बहन व प्रेमभाई दोनों अपने संकल्प मे सफल रहे है। अतः उनकी इच्छा सोनभद्र को ‘‘सर्वतोभद्र’’ बनाने की थी। डा0 रागिणी ने, प्रेमभाई के निधन के बाद बनवासी सेवा आश्रम की समग्र जिम्मेवारियों को अपने स्वास्थ्य परियोजना के साथ साथ उठा लिया और अन्तिम क्षण तक अपनी योग्यता, दक्षता और सेवाभाविता के साथ सफलतापूर्वक निर्वाह किया। उनके स्वास्थ्य योजना के वनज कववत बसपदपब सेवा से प्रतिवर्ष औसत 10 हजार लोगों को सतत् स्वास्थ्य लाभ मिलता रहा।
बहन जी ने सोनभद्र की सर्वताभद्र बनाने की इच्छा के निर्वाह के लिये अपनी विचारवान्, सेवासमर्पित दो बेटियों ( डा0 विभा और शिक्षाविद् शुभा ) को बनवासी सेवा आश्रम को समर्पित किया है। बनवासी सेवा आश्रम मे सशक्त कार्यशक्ति व द्वितीय पंक्ति के क्रान्तिकारी अनुभवी व सेवाभावी लोगों को तैयार किया है और अनुकूल परिस्थिति व वातावरण का सृजन किया है। आज बनवासी सेवा आश्रम अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये अनाथ नही अपितु सक्षम है इसलिये बनवासी सेवा आश्रम परिवार, स्वर्गीय रागिणी बहन व प्रेमभाई के कृतज्ञ है।
ज्ञात हो कि डा॰ रागणी बहन के पति प्रेमभाई के पिता स्वर्गीय वेदप्रकाश वेदालंकार, माॅ स्व0 पुष्पावती, उनके नानाश्री भी आर्यसमाज व स्वतन्त्रता आन्दोलन के समर्पित सेनानी और राष्ट्रीय सेवा भक्त थे। इस पूरे परिवार के गाॅधी विचार और सेवाभाव से प्रेमभाई ओत-प्रोत थे। उन्होने 1953 मे मेरठ काॅलेज मे स्व0 जयप्रकाश नारायण के प्रेरक भाषण सुने जिनसे वे अपने को रोक नही पाये और काॅलेज को छोडकर कर्मठ मनीषी धीरेन्द्र भाई के सानिध्य मे सर्वाेदय आन्दोलन से जुड गये। माॅ के आग्रह पर उन्होने 1955 मे अपनी ठण्ैबण् की और 1957 मे समाजशास्त्र मे डण्।ण् की पढाई पूरी की तत्पश्चात् सर्वोदय आन्दोलन के रचनात्मक कार्याे के लिये पूर्णरूप से जुड गये।
Thursday, October 9, 2014
अमित के मृतको का पता लगाना मुनासिब नहीं समझा डोईवाला पुलिस ने
प्रेम पंचोली,
प्रीतम दास के घर जब उसके बेटे के दोस्तो का फोन सांय के चार बजे गया कि वे अपने लाडले की लाश ले जा लें। इस सूचना से वह एक बारगी हतप्रद रह गया। लेकिन वह अपनी होश नही खोया और तपाक से जबाव दिया कि वे लाश पर हाथ तक नहीं लगा सकते वे खुद आ रहे हैं। उन्हें जौलीग्रांट बुलाया गया जहां उनके 22वर्षीय बेटे की लाश हिमालयन हाॅस्पिटल की मोरचर्री में रखी मिली। उन्हे चिकित्सको द्वारा बताया गया कि उनके पास जब तक अमित को पंहुचाया गया उन्हें अमित मृत ही पाया गया। इसलिए वे बिना परिजनो व पुलिस के अमित की लाश दे नहीं सकते थे। बता दें कि पैट्रोल पम्प पर अमित को मनवीर नाम से ही जाना जाता था। खैर अमित हो या मनवीर इस युवा को मारा गया है ना कि यह जहर खाकर मरा है। यह कौतुहल का विषय है कि पुलिस ने इस घटनाक्रम में कोई दिलचस्पी अब तक नही दिखाई।
मामला 22सितम्बर 2014 का है जो कि मंगल पैट्रोल पम्प पर कार्यरत अमित और अन्य छः कर्मचारियों से जुड़ा है। अमित बणगांव उत्तरकाशी का निवासी है जो पिछले तीन वर्षो से मंगल पैट्रोल पम्प पर कार्यरत था। चिकित्सको के पास जब मंगल के दोस्तो ने जो कि उसी पैट्रोल पम्प पर काम करते थे ने अमित को ले गये कि अमित ने जहर खाया है और इसकी तबीयत बिगड़ गयी है। चिकत्सको ने अमित को देखते ही यह पुष्टी कर दी कि यह तो मृत है। तब तक सांय के चार बजने वाले थे। तुरन्त अमित के साथियों ने उसके परिजनो यानि अमित के पिताजी प्रीतम दास को बणगांव में फोन मिलाया और यह इतला दे दी कि वे अपने मृत बेटे की लाश जौलीग्रांट हाॅस्पिटल से प्राप्त कर लें। सूचना पाते ही अमित के पिताजी जौलीग्रांट के लिए रवाना हुए। पंहुचते ही डोईवाला पुलिस को रिपोर्ट लिखवाई। मृत अमित का पंचनामा दून चिकित्सालय के तीन चिकित्सको के एक पैनल ने किया है। बताया जा रहा है कि अमित की मृत्यु जहर खाने से नहीं हुई। पंचनामा की रिपोर्ट पुलिस के सुपूर्द है। जिसमें अमित के मृत पाये जाने का राज खुल सकता है। मगर अब तो अमित के परिजनो को यह अंदेशा हो रहा है कि घटना को एक माह होने जा रहा है। ना तो पुलिस ने कोई तहकीकात की और ना ही पैट्रोल पम्प के मालिक द्वारा इस घटना पर कोई कार्यवाही करवाने की कोशीश की गयी। वे पुलिस के दफ्तरो के चक्कर काट-काट कर थक हार चुके हैं। अतिम के पिताजी प्रीतम दास बताते हैं कि उनके बेटे को पैट्रोल पम्प पर काम करने वाले लोगो ने ही मारा है। वे इसलिए जोर देकर कह रहे हैं कि जिस दिन अमित को उसके साथी मृत हालात में हाॅस्पिटल ले गये उसी दिन दिन के 11 बजे अमित देहरादून के एक बैंक में चैक विड्रोल करवाने गया था। वह भी इसलिए कि उसी के एक साथी ने अमित को यह चैक इसलिए दिया कि उसका खाता देहरादून में है। अमित बैंक से भी बैंरग लौटा। क्योंकि उसके साथी द्वारा दिया गया चैक बांऊस हो गया। बस उसी दिन सांय के चार बजे अमित के ही साथी उन्हे फोन से संदेश भेजते है कि अमित मर चुका है। उधर पुलिस ने जब अमित के फोन की डिटेयल निकाली तो एक माह में लगभग 500 काॅल उत्तकाशी की एक शिवानी नाम की लड़की के फोन से बात करने की पुष्टी हुई है।
प्रीतम दास के अनुसार अमित को जौलीग्रांट हाॅस्पिटल उसके दोस्त जो उसी के साथ पैट्रोल पम्प में नौकरी करते हैं ले गये। इतना तो स्पष्ट है। मगर उन्हे पूर्व से ही अमित के उन दोस्तो पर संदेह भी था। क्योंकि कई मर्तबा अमित और उनके दोस्तो की आपस में झड़पे भी हुई थी। अमित के पिताजी यह भी बताते हैं कि अमित लालतप्पड़ स्थित मंगल पैट्रोल पम्प के मालिक का भी चेहता था। इस वजह से भी अमित से पैट्रोल पम्प में तैनात अन्य कर्मचारी मनमुटाव रखते थे। इस बात की पुष्टी तब हुई जब एक बार पम्प पर चोरी हुई थी और उनके बेटे पर इस चोरी का आरोप उसके साथियो ने लगाया। इस इल्जाम से भी पम्प के मालिक ने उसके बेटे को बरी ही नहीं किया बल्कि उस पर पहले से भी ज्यादा जिम्मेदारी दे दी।
हालात और वारदात इतनी छोटी नहीं है। मगर पुलिस है जो इस घटना में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। घटना से जुड़ी कहानी बयां कर रही है कि घटना को अंजाम देने वाले डोईवाला पुलिस के आस पास बेफिक्र घूम रहे हैं। यदि अमित के देास्तो पर अमित के पिताजी का संदेह है तो एक बार पुलिस उनसे पूछताछ तो करती। पैट्रेल पम्प के मालिक से भी पूछताछ करती। मृत्यु के समय जो लोग अमित के साथ थे उनसे जानने का प्रयास तो करती। जब अमित दिन के 11 बजे देहरादून बैंक में था और चार बजे मृत पाया जाता है उन्ही दोस्तो के साथ जिन्होने अमित को देहरादून चैक विड्रोल करने बैंक भेजा तो इस तरह भी इस घटनाक्रम पर संदेह जताया जा रहा है। फिर भी अब तक अमित के हत्यारो की शिनाख्त तक नहीं हो पा रही है।
उधर अमित की मां के रो-रो कर बुरा हाल है वे कहती है कि उनका एक ही सहारा था अमित। उनका दूसरा बेटा अभी छोटा है। अमित पर ही घर की जिम्मेदारी थी। वे तो उसकी शादी की तैयार कर रही थी। वह तो इतना शुशील और विनम्र था कि वह कभी भी किसी से झगड़ता नहीं था। कहती है कि क्यों मारा उन पैट्रोल पम्प के कर्मचारियो ने उसके लाडले को। यदि वे उसके पैसे नहीं दे पा रहे थे या उनका दिया गया चैक बाऊंस हो चुका था तो क्या उसके लाडले को जान से मारना ही था। उन्हे पहले बता देते तो वे उनकी आपसी लेनदेन वैसे समाप्त कर देती और अपने मांस के टुकड़े को घर वापस ले जाती। क्या बिगाड़ा उनके अमित ने उस पैट्रोल पम्प के कर्मचारियों का। ऐसे फफक-फफक कर अमित की मां का रोने से बुरा हाल है। वे आंसु के सिवा कुछ भी जबाव नहीं दे पा रही है। हर किसी से वे इतना जानना चाह रही है कि उनके अमित का क्या गुनाह है क्यों मारा गया उसे। वे पुलिस के पास हाथ जोड़कर विनती कर रही है कि उनके पास पुलिस को देने के लिए कुछ बचा नही है वे उनकी मदद कर देंगे तो वे पुलिस की ताउम्र ऋणी रहेगी।
उपरोक्त घटनाक्रम के लिए सम्पर्क व्यक्ति - जुबल किशोर, मो॰ - 9410944867
Thursday, October 2, 2014
इतिहास के पन्नो में बनता बिगड़ता ‘देहरादून’
राजधानी बनने से पहले यह षहर कभी सैरगाह के लिए विख्यात था। मगर राजधानी बनने के बाद जिस तरह लोगो की राजनीतिक महत्वकांक्षा इस सुन्दर षहर पर बढने लगी वह भी इतिहास के पन्नो में दर्ज हो रही है। वैसे भी देहरादून का गौरवशाली इतिहास जहां पौराणिक गाथाओं एवं विविध संस्कृतियों को समेटे हैं वहीं नाना प्रकार के झंझावतों और उथल-पुथल की भी यह दूनघाटी गवाह बनी। बताया जाता है कि देहरादून का पुराना नाम द्रोणाश्रम था और इसका सबंध द्वापर युग में पांडवों तथा कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य के इस क्षेत्र में तपस्या हेतु आगमन से जोड़ा गया है। कुछ लोगो के मतानुसार गुरु रामराय के यहां पदार्पण से भी देहरादून षब्द निकट संबंध रखता है।
देहरादून दो शब्दों देहरा और दून से मिलकर बना है। इसमें देहरा शब्द को डेरा का अपभ्रंश माना गया है। जब गुरु रामराय इस क्षेत्र में आए तो अपने तथा अनुयायियों के रहने के लिए उन्होंने यहां अपना डेरा स्थापित किया। कालांतर में नगर का विकास इसी डेरे का आस-पास प्रारंभ हुआ। इस प्रकार डेरा का दून के साथ जुड़ जाने के पश्चात् यह स्थान देहरादून कहलाया जाने लगा। कुछ इतिहासविदें का यह भी मानना है कि देहरा शब्द स्वयं में सार्थकता लिए हुए है। इसको डेरा का अपभ्रंश रूप नहीं माना जा सकता है। देहरा शब्द हिंदी तथा पंजाबी में आज भी प्रयोग किया जाता है। हिंदी में देहरा का अर्थ देवग्रह अथवा देवालय है। जबकि पंजाबी में इसे समाधि, मंदिर तथा गुरुद्वारे के अर्थो में सुविधानुसार किया गया है। इसी तरह दून शब्द दूण से बना है और यह दूण शब्द संस्कृत के द्रोणि का अपभ्रंश है। संस्कृत में द्रोणि का अर्थ दो पहाड़ों के बीच की घाटी है।
देहरादून जिला उत्तर में हिमालय, दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों से घिरा हुआ है तो पूर्व में गंगा नदी और पश्चिम में यमुना नदी प्राकृतिक सीमा बनाती है। इस जिले का क्षेत्रफल 3088 वर्ग किमी है। यह जिला दो प्रमुख भागों में बंटा है। जिसमें मुख्य शहर देहरादून एक खुली घाटी है जो कि शिवालिक तथा हिमालय से घिरी हुई है और दूसरे भाग में जौनसार बावर है जो हिमालय के पहाड़ी भाग में स्थित है। प्राचीन दस्तावेज केदारखंड में यमुना, टौंस, बालखिल्य सुसवा, सिद्धकूट नागसिद्ध,, ऋषिकेश और तपोवन के नामों से दून क्षेत्र का उल्लेख है। द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य ने द्वारागांव के पास देहरादून शहर से 19 किमी पूर्व में देवदार पर्वत पर तप किया था। इसी से यह घाटी द्रोणाश्रम कहलाती है। बालखिल्य अथवा सुसवा नदी की उत्पत्ति की रोचक कथा है। एक बार देवताओं के राजा इंद्र ने बालखिल्य ऋषियों को गाय के खुर के समान पानी से भरे गढ्डे में क्रीड़ा करते देखा और वे उनके छोटे शरीर की हंसी करने लगे। इससे खिन्न होकर बालखिल्य ऋषियों ने दूसरे इंद्र की रचना के लिए तप किया। तपस्या मग्न ऋषियों के शरीर से इतना पसीना निकला कि उससे बालखिल्य या शोभन नदी बन गई जिसे अब सुसवा कहते हैं।
रामायण काल में भी देहरादून के बारे में विवरण आता है कि रावण के साथ युद्ध के बाद भगवान राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण इस क्षेत्र में आए थे। अंग्रेज लेखक जीआरसी विलियम्स ने ‘‘मेमोयर्स आफ दून’’ में ब्राह्मण जनुश्रुति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि लंका विजय के पश्चात् ब्राह्मण रावण को मारने का प्रायश्चित करने और प्रायश्चित स्वरूप तपस्या करने के लिए गुरु वशिष्ठ की सलाह पर भगवान राम लक्ष्मण के साथ यहां आए थे। राम ने ऋषिकेश में और लक्ष्मण ने तपोवन में पाप से मुक्ति के लिए वर्षो तपस्या की थी।
इसी प्रकार देहरादून जिले के अंतर्गत ऋषिकेश के बारे में भी स्कंदपुराण में उल्लेख है कि भगवान् विष्णु ने दैत्यों से पीड़ित ऋषियों की प्रार्थना पर मधु-कैटभ आदि राक्षसों का संहार कर यह भूमि ऋषियों को प्रदान की थी। पुराणों में इस क्षेत्र को लेकर एक विवरण इस प्रकार भी है कि राम के भाई भरत ने भी यहां तपस्या की थी। तपस्या वाले स्थान पर भरत मंदिर बनाया गया था। कालांतर में इसी मंदिर के चारों ओर ऋषिकेश नगर का विकास हुआ। पुरातत्व की दृष्टि से भरत मंदिर की स्थापना सैकड़ों साल पुरानी है। स्कंद पुराण में तमसा नदी के तट पर आचार्य द्रोण को भगवान शिव द्वारा दर्शन देकर शस्त्र विद्या का ज्ञान कराने का उल्लेख मिलता है। यह भी कहा जाता है कि आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वात्थामा द्वारा दुग्धपान के आग्रह पर भगवान शिव ने तमसा तट पर स्थित गुफा में प्रकट हुए शिवलिंग पर दुग्ध गिराकर बालक की इच्छा पूरी की थी। यह स्थान गढ़ी छावनी क्षेत्र में स्थित ‘‘टपकेश्वर महादेव’’ का प्रसिद्ध मंदिर बताया जाता है। महाभारत काल में देहरादून का पश्चिमी इलाका जिसमें वर्तमान कालसी सम्मिलित है का शासक राजा विराट था और उसकी राजधानी वैराटगढ़ थी। पांडव अज्ञातवास के दौरान भेष बदलकर राजा विराट के यहां रहे। इसी क्षेत्र में एक मंदिर है जिसके बारे में लोग कहते कि इसकी स्थापना पांडवों ने की थी। इसी क्षेत्र में एक पहाड़ी भी है जहां भीम ने द्रौपदी पर मोहित हुए कीचक को मारा था। जब कौरवों तथा त्रिगटा के शासक ने राजा विराट पर हमला किया तो पांडवों ने उनकी सहायता की थी।
महाभारत की लड़ाई के बाद भी पांडवों का इस क्षेत्र पर प्रभाव रहा और हस्तिनापुर के शासकों के अधीनस्थ शासकों के रूप में सुबाहू के वंशजों ने यहां राज किया। पुराणों मे देहरादून जिले के जिन स्थानों का संबंध रामायण एवं महाभारत काल से जोड़ा गया है उन स्थानों पर प्राचीन मंदिर तथा मूर्तियां अथवा उनके भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं। इन मंदिरों तथा मूर्तियों एवं भग्नावशेषों का काल प्रायः दो हजार वर्ष तथा उसके आसपास का है। क्षेत्र की स्थिति और प्राचीन काल से चली आ रही सामाजिक परंपराएं, लोकश्रुतियां तथा गीत और इनकी पुष्टि से खड़ा समकालीन साहित्य दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र रामायण तथा महाभारत काल की अनेक घटनाओं का साक्षी रहा है। यमुना नदी के किनारे कालसी में अशोक के शिलालेख प्राप्त होने से इस बात की पुष्टि होती है कि यह क्षेत्र कभी काफी संपन्न रहा होगा। सातवीं सदी में इस क्षेत्र को सुधनगर के रूप में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी देखा था। यह सुधनगर ही बाद में कालसी के नाम से पहचाना जाने लगा। कालसी के समीपस्थ हरिपुर में राजा रसाल के समय के भग्नावशेष मिले हैं जो इस क्षेत्र की संपन्नता को दर्शाते हैं। लगभग आठ सौ साल पहले दून क्षेत्र में बंजारे लोग आ बसे थे। उनके बस जाने के बाद यह क्षेत्र गढ़वाल के राजा को ‘‘कर’’ देने लगा। कुछ समय बाद इस ओर इब्राहिम बिन महमूद गजनवी का हमला हुआ।
इससे भी भयानक हमला तैमूर का था। सन् 1368 में तैमूर ने हरिद्वार के पास राजा ब्रह्मदत्त से लड़ाई की। ब्रह्मदत्त का राज्य गंगा और यमुना के बीच था। बिजनौर जिले से गंगा को पार कर के मोहन्ड दर्रे से तैमूर ने देहरादून में प्रवेश किया था। हार जाने पर तैमूर ने बड़ी निर्दयता से मारकाट करवाई। उसे लूट में बहुत-सा धन भी मिला था। इसके बाद फिर कई सदियों तक इधर कोई लुटेरा नहीं आया। शाहजहां के समय में फिर एक मुगल सेना इधर आई थी। उस समय गढ़वाल में पृथ्वी शाह का राज्य था। इस राजा के प्रपौत्र फतेह शाह ने अपने राज्य की सीमा बढ़ाने के उद्देश्य से तिब्बत और सहारनपुर पर एक साथ चढ़ाई कर दी थी, लेकिन इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार उसको युद्ध में हार का मुंह देखना पड़ा था। सन् 1756 के आसपास श्री गुरु राम राय ने दून क्षेत्र में अपनी सेना तथा शिष्यों के साथ प्रवेश किया और दरबार साहिब की नींव रखकर स्थायी रूप से यहीं बस गए।
गूजर और राजपूतों के आ जाने से धीरे-धीरे दून की आबादी बढ़ने लगी। आबादी तथा अन्न की उपज बढ़ने से गढ़वाल राज्य की आमदनी भी बढ़ने लगी। देहरादून की संपन्नता देखकर सन् 1757 में रूहेला सरदार नजीबुद्दौला ने हमला किया। इस हमले को रोकने में गढ़वाल राज्य नाकाम रहा। जिसके फलस्वरूप देहरादून मुगलों के हाथ में चला गया। देहरादून के तत्कालीन शासक नजब खाँ ने इसके परिक्षेत्र को बढ़ाने में भरपूर कोशिश की। उसने आम के पेड़ लगवाने, नहर खुदवाने तथा खेती का स्तर सुधारने में स्थानीय निकायों को भरसक मदद पहुंचाई, लेकिन नजब खाँ की मौत के बाद किसानों की दशा फिर दीनहीन हो गई।
गुरु रामराय दरबार के कारण यहां सिखों की आवाजाही भी बढ़ चुकी थी। अतः एक बार फिर से देहरादून का गौरव समृद्धशाली क्षेत्र के रूप में फैलने लगा। सन् 1785 में गुलाम कादिर ने इस क्षेत्र पर हमला किया। इस बार बड़ी मारकाट मची। गुलाम कादिर ने लौटते समय उम्मेद सिंह को यहां का गवर्नर बनाया। गुलाम कादिर के जिंदा रहते उम्मेद सिंह ने स्वामी भक्ति में कोई कमी न आने दी, लेकिन उनके मरते ही सन् 1796 में उम्मेद सिंह ने गढ़वाल राजा प्रद्युम्न शाह से संधि कर ली।
सन् 1801 तक देहरादून में अव्यवस्था बनी रही। प्रद्युम्न शाह का दामाद हरिसिंह गुलेरिया दून की प्रजा का उत्पीड़न करने वालों में सबसे आगे था। अराजकता के कारण दून की वार्षिक आय एक लाख से घटकर आठ हजार रुपये मात्र रह गई थी। प्रद्युम्न शाह के मंत्री रामा और धरणी नामक बंधुओं ने दून की व्यवस्था सुधार में प्रयास आरंभ किए ही थे कि प्रद्युम्न शाह के भाई पराक्रम शाह ने उनका वध करा दिया। अब देहरादून की सत्ता सहसपुर के पूर्णसिंह के हाथों में आ गई, किंतु वह भी व्यवस्था में सुधार न ला सका। पराक्रम शाह ने अपने मंत्री शिवराम सकलानी को इस आशय से देहरादून भेजा था कि वह उसके हितों की रक्षा कर सके। शिवराम सकलानी के पूर्वज शीश राम को रोहिला युद्ध में वीरता दिखाने के कारण टिहरी रियासत ने सकलाना पट्टी में जागीर दी थी। इन सभी के शासन काल में देहरादून का गवर्नर उम्मेद सिंह ही बना रहा। वह एक चतुर राजनीतिज्ञ था इसी कारण प्रद्युम्न शाह ने अपनी एक पुत्री का विवाह उसके साथ करके उसे अपना स्थायी शासक नियुक्त कर दिया। कहा जाता है कि 1803 में गोरखा आक्रमण के समय उम्मेद सिंह ने अवसरवादिता का परिचय इस प्रकार दिया कि युद्ध के समय वह अपने ससुर के पक्ष में खड़ा नहीं देखा गया। देहरादून को उसकी संपन्नता के कारण ही समय-समय पर लुटेरों की लूट एवं तानाशाहों की प्रवृत्ति का शिकार बनते रहना पड़ा।
सन् 1760 में गोरखों ने अल्मोड़ा को जीतने के उपरांत गढ़वाल पर धावा बोला। गढ़वाल के राजा ने गोरखों को पच्चीस सौ रुपये वार्षिक कर के रूप में देना शुरू किया, लेकिन इतना नजराना पाने के बावजूद भी 1803 में गोरखों ने गढ़वाली सेना से युद्ध छेड़ दिया। गोरखों की विजय हुई और उनका अधिकार क्षेत्र देहरादून तक बढ़ गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने देहरादून को गोरखों के प्रभाव से मुक्त कराने के लिए मोहन्ड और तिमली दर्रो से अंग्रेज सेना भेजी। अंग्रेजों ने बल का उपयोग करके गोरखों को खदेड़ बाहर किया और इस तरह उनका देहरादून में प्रभुत्व स्थापित हो गया। उन्होंने अपने आराम के लिए 1827-28 में लंढोर और मसूरी शहर बसाया। कुछ समय के लिए देहरादून जिला कुमाऊँ कमिश्नरी में रहा फिर इसको मेरठ में मिला दिया गया। आज यह गढ़वाल मंडल में है। 1970 के दशक में इसे गढ़वाल मंडल में शामिल किया गया।
सन् 2000 में उत्तरप्रदेश से अलग होकर बने उत्तरांचल अब उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून को बनाया गया। राजधानी बनने के बाद इस शहर का आकार निरंतर बढ़ रहा है। पिछले एक वर्श में देहरादून स्थित में दो लाख प्लांट मकान बनाने बावत बिक चुके है। ये प्लांट सिर्फ पहाड़ी गांव को छोड़कर उन लोगो ने खरीदे हैं जो पहाड़ की कठीनभरी जिन्दगी को अलविदा कहकर अब देहरादून के बासिंदे बनने वाले हैं। अर्थात इस प्रकार भविश्य में देहरादून में एक दर्जन से भी अधिक विधान सभाऐं बनने की आषंका है।
Sunday, September 28, 2014
वृक्षारोपण ही नहीं वृक्षो का संरक्षण भी करना है।
पिछले माह के अन्तिम सप्ताह में सोसायटी फाॅर एफोरटेशन, कंन्जवेषन, रिसर्च एण्ड इन्वायरमेंटन डेवपलपमेंट (सेक्रड) संस्था के बैनर तले मसूरी के पास पानी वाले मोड़ से लेकर डोम गांव तक चारा पत्ति व पीला अमलतास फूल के लगभग पांच सौ वृक्षो को रोपण किया गया। यह कार्य संस्था के प्रमुख कार्यकर्ताओं ने खुद की सहभगिता से किया है। सेकर्ड संस्था के अध्यक्ष दिनेष कण्डवाल ने कहा है कि वृक्षारोपण का मतलब सिर्फ रोपण करने से नही हैं। कहा कि वे इस वृक्षारोपण कार्यक्रम को एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते है। इसके लिए संस्था ने दो गांवो का चयन किया है साकेत गांव जहां पर समाज के निम्न वर्ग के लोग रहते है। तथा दूसरा मसूरी के पास डोम गांव इस गांव में उत्तराखण्ड राज्य के प्रख्यात साहित्यकार दिवंगत उमाषंकर सतीष रहते थे। उनके जाने के बाद यहां माहौल उजाड़ जैसे हो गया है। कहा कि वे संस्था के मार्फत इन दो गांवो को पर्यावरण से लेकर विकास के पायदान तक में एक आदर्ष गांव की आधारषीला रखना चाहते हैं। उनका यह पहला प्रयास है। भविश्य में गांवो में जहां स्वरोजगार के साधन उपलब्ध होंगे वही ये गांव पर्यावरण संरक्षण की भी मिषाल होंगे। संस्था के सचिव डा॰ रवि रावत ने कहा कि पहाड़ी गांवो को ‘‘होम स्टे’’ के लिए यदि तैयार किया जाये तो यही पर्यटन रोजगार और राजस्व का साधन बनेगा।
इस दौरान वृक्षारोपण कार्यक्रम में गढवाल सभा के अध्यक्ष टी एस असवाल, जुबल किषोर,, प्राजंल, डोम गांव के दिनेष ममगांई, देवेन्द्र सिंह पंवार सहित पत्रकार प्रेम पंचोली और गांव के अन्य लोग मौजूद थे।
Sunday, September 7, 2014
Sunday, August 31, 2014
भाजपा कार्यसमिति की बैठक में पढाया महाभारत का पाठ
पिछले सप्ताहन्त में रूद्रपुर में हुई उत्तराखंड भाजपा की तीन दिनी कार्यसमिति की चिन्तन-मंथन बैठक में प्रदेश के नेताओं को आगे बढ़ने का मंत्र और सबक दे कर गई। पार्टी नेताओं को मोदी फार्मूले पर चलने का जज्बा पैदा करने और माइंड सेट बदलने की नसीहत मिली है। हालांकि इस दौरान प्रदेश भाजपा ने सरकार को घेरने का जो खाका बैठक में खींचा है उसमें बासीपन साफ झलका। जिन मुद्दों के साथ भाजपा आगे बढ़ने का प्लान तैयार कर रही है उसे लंबे समय से भाजपा नेता विधानसभा और अन्य मंचों से उठाते आए हैं। प्रदेश कार्यसमिति की अगली बैठक दिसंबर में प्रस्तावित है।
बैठक के अंतिम दिन भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल ने अपने एक घंटे के भाषण में भाजपा नेताओं को फटकारा भी और पुचकारा भी। उन्होंने नेताओं को मोदी का मैकेनिज्म समझाया। उन्होंने कहा कि हर भाजपाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह लक्ष्य तय कर काम करे। सकारात्मक सोच के साथ जीत का माइंड सेट लेकर आगे बढ़े। पार्टी में परिवारवाद को रोको और पार्टी को परिवार की तरह समझो। पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद रमेश चंद्र पोखरियाल निशंक ने कहा कि प्रदेश में सरकार के भीतर और बाहर अराजकता की स्थिति है जिससे सरकार आत्महत्या के करीब पहुंच गई है। रुद्रपुर में चली तीन दिवसीय भाजपा प्रदेश कार्य समिति की बैठक में पहुंचे राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) शिवप्रकाश सिंह ने अपने सम्बोधन में कहा कि दुर्योधन को पता था कि जो वह कर रहा है वह अधर्म है, लेकिन वह फिर भी करता रहा। उन्होंने नेताओं को चेताया कि जानबूझकर अधर्म की राह मत चलो, वर्ना महाभारत के दुर्योधन जैसा हश्र होगा। उन्होंने कहा कि हमारे कुछ नेता भी अधर्म के मार्ग पर हैं, गुटबाजी को हवा देकर पार्टी का नुकसान पहुंचा रहे हैं, वो समझ लें कि नतीजा उनके हक में नहीं आएगा। सह महामंत्री कि कहा कि नरेंद्र मोदी की तरह लक्ष्य तय कर आगे बढ़ो, अभी यह तय होना चाहिए कि 2017 में हमारा एजेंडा क्या होगा। उन्होंने संगठन को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने और लक्ष्य निर्धारित कर उसे भेदने की नसीहत दी। शिवप्रकाश ने कहा कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में सुशासन की झलक दिखने लगी है। प्रदेश भाजपा को भी इसकी जरूरत है। उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर केवल मीटिंग, सिटिंग और चीटिंग का खेल हो रहा है। विधानसभा उपचुनाव व पंचायतों में हमें कांग्रेस से नहीं बल्कि भाजपाइयों से ही शिकस्त मिली है।
अध्यक्षीय भाषण में प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने पार्टी में चली आ रही गुटबाजी को समाप्त करने के लिए तीखे तेवर अपनाए। उन्होंने कहा कि अभी तक जो कांग्रेस में होता था वैसा भाजपा में भी दिखने लगा है। यह ठीक नहीं है। समीक्षा हो रही है, कोई कितना भी बड़ा पदाधिकारी, सांसद, विधायक हो दोषी पाया गया तो कार्रवाई होगी। पूरे देश में भाजपा का परचम लहराने के बाद तुरंत उत्तराखंड में पंचायत और विधानसभा उपचुनाव की हार भाजपा को भुलाकर आगे बढ़ने के लिए एक साथ कार्यसमिति में बैठे भाजपा नेताओं ने उसे फिर से हरा कर दिया। किसी ने नसीहत दी तो किसी ने मरहम लगाने की कोशिश भी की। सांसद रमेश पोखरियाल निशंक ने डोईवाला सीट पर मिली हार पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि वहां कांग्रेस ने दो लोगों को मैनेज कर चुनाव जीत लिया। बावजूद भाजपा के वोटों में भारी बढ़ोत्तरी हुई। कहा कि आरोप तो वो भी लगा सकता है जो अपना बूथ जीतने की स्थिति में नहीं है। आखिर आपसी तकरार की जिम्मेदारी कौन लेगा। उन्होंने कहा कि हमे नरेंद्र मोदी के पदचिन्हों पर आगे बढ़ना होगा।
भाजपा नेता अब जान चुके हैं कि पंचायत चुनाव और उपचुनाव में मुख्यमंत्री हरीश रावत की रणनीति ने ही उन्हें चारो खाने चित किया है। सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने अपने सम्बोधन में स्पष्ट तौर पर कहा कि इस दौरान उन्होने तीरथ और निशंक दोनों को सुना, यह ध्यान रहना चाहिए कि राजनीति में जब दूसरों के हक हकूक पर डांका पड़ता है तभी अंतरकलह का दौर शुरू होता है। उन्होंने भाजपा नेताओं को चेताया कि प्रदेश का सीएम सरल आदमी नहीं है। वह महातिकड़मी है, सभी कलाओं में निपुण है। इसलिए एक होकर लड़ों तभी बात बनेगी, वर्न 2017 की जंग आसान नहीं होगी। उन्होंने कहा कि कोई मुझे गाली दे दें तो कोई बात नहीं, लेकिन उससे पार्टी को नुकसान नहीं होना चाहिए। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बची सिंह रावत ने बैठक में राजनीतिक प्रस्ताव रखा। जिसे विधायक मदन कौशिक ने समर्थन किया और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मनोहर कांत ध्यानी व पूरण चंद शर्मा ने उसका अनुमोदन किया।
बच्ची सिंह का राजनितीक प्रस्ताव
-ः झूठे वादों के साथ सत्ता में आई कांग्रेस सरकार असफल हो चुकी है।
-ः सिडकुल में हीरो मोटो कार्प को छूट देने के रूप में 266 करोड़ का घपला हरीश सरकार ने किया और डीएम कोर्ट ने स्टांप चोरी के मामले में कंपनी पर 111 करोड़ की पेनल्टी लगाई।
-ः भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए पूर्व की भाजपा सरकार लोकायुक्त बिल लाई थी लेकिन कांग्रेस सरकार ने आते ही खत्म कर दिया।
-ः अटल खाद्यान्न योजना को भी बंद कर दिया, जो फिर से शुरू होनी चाहिए।
-ः प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब है, बलात्कार व ट्रिपल मर्डर जैसे जघन्य अपराध हो रहे है।
-ःउद्योगों में श्रम कानूनों का उल्लंघन हो रहा है जिसके शिकार प्रदेश के युवा हो रहे है।
-ः 150 से ज्यादा दायित्वधारी बनाकर राजकोश पर सरकार ने हर माह करोड़ों रुपए का भार डाल दिया है।
-ः राज्य में सड़क, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव हो गया है।
राज्य में जिसकी सरकार होती है वही सिंकन्दर-रामलाल
भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल ने पार्टी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को अनुशासन व एकजुटता का पाठ पढ़ाया। साथ ही हिदायत दी कि कोई भी पदाधिकारी पार्टी से बड़ा नहीं है और यदि कोई पार्टी विरोधी गतिविधियों में पाया गया तो उसके खिलाफ गंभीरता से कार्रवाई की जाएगी। रामलाल ने प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासन काल में राज्य का बंटाधार हो चुका है, कानून व्यवस्था चैपट हो चुकी है, अपराधियों का बोलबाला है। लूट, हत्या, डकैती की वारदातों से लोग सहमे हुए हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत जब केंद्र में मंत्री थे तब उन्होंने कांग्रेस शासनकाल में केंद्र से राज्य के विकास के लिए कोई सहयोग नहीं मांगा और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राज्य के विकास के लिए सहयोग मांग रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में आई दैवीय आपदा के दौरान नरेंद्र मोदी राज्य में आए थे और केदारनाथ घाटी में आई आपदा को लेकर सरकार से र्चचा की थी। उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकार केंद्र सरकार को सहयोग दे तो केंद्र सरकार भी राज्य के विकास में सहयोग करेगी। भाजपा ने कठिन परिस्थितियों में राज्य के विकास के लिए कार्य किया था और 10 वर्ष के लिए विशेष पैकेज दिया था, लेकिन पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने इस पैकेज की अवधि नहीं बढ़ाई, जिस कारण राज्य का विकास अवरुद्ध हुआ है। उपचुनाव में भाजपा को मिली हार पर रामलाल ने कहा कि उपचुनाव में अमूमन राज्य में जिसकी सरकार होती है, उसी की जीत होती है क्योंकि सरकार चुनाव में कई संसाधनों का दुरुपयोग करती है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2017 से पहले ही होने वाले हैं।
बैठक के अंतिम दिन भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल ने अपने एक घंटे के भाषण में भाजपा नेताओं को फटकारा भी और पुचकारा भी। उन्होंने नेताओं को मोदी का मैकेनिज्म समझाया। उन्होंने कहा कि हर भाजपाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह लक्ष्य तय कर काम करे। सकारात्मक सोच के साथ जीत का माइंड सेट लेकर आगे बढ़े। पार्टी में परिवारवाद को रोको और पार्टी को परिवार की तरह समझो। पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद रमेश चंद्र पोखरियाल निशंक ने कहा कि प्रदेश में सरकार के भीतर और बाहर अराजकता की स्थिति है जिससे सरकार आत्महत्या के करीब पहुंच गई है। रुद्रपुर में चली तीन दिवसीय भाजपा प्रदेश कार्य समिति की बैठक में पहुंचे राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) शिवप्रकाश सिंह ने अपने सम्बोधन में कहा कि दुर्योधन को पता था कि जो वह कर रहा है वह अधर्म है, लेकिन वह फिर भी करता रहा। उन्होंने नेताओं को चेताया कि जानबूझकर अधर्म की राह मत चलो, वर्ना महाभारत के दुर्योधन जैसा हश्र होगा। उन्होंने कहा कि हमारे कुछ नेता भी अधर्म के मार्ग पर हैं, गुटबाजी को हवा देकर पार्टी का नुकसान पहुंचा रहे हैं, वो समझ लें कि नतीजा उनके हक में नहीं आएगा। सह महामंत्री कि कहा कि नरेंद्र मोदी की तरह लक्ष्य तय कर आगे बढ़ो, अभी यह तय होना चाहिए कि 2017 में हमारा एजेंडा क्या होगा। उन्होंने संगठन को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने और लक्ष्य निर्धारित कर उसे भेदने की नसीहत दी। शिवप्रकाश ने कहा कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में सुशासन की झलक दिखने लगी है। प्रदेश भाजपा को भी इसकी जरूरत है। उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर केवल मीटिंग, सिटिंग और चीटिंग का खेल हो रहा है। विधानसभा उपचुनाव व पंचायतों में हमें कांग्रेस से नहीं बल्कि भाजपाइयों से ही शिकस्त मिली है।
अध्यक्षीय भाषण में प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने पार्टी में चली आ रही गुटबाजी को समाप्त करने के लिए तीखे तेवर अपनाए। उन्होंने कहा कि अभी तक जो कांग्रेस में होता था वैसा भाजपा में भी दिखने लगा है। यह ठीक नहीं है। समीक्षा हो रही है, कोई कितना भी बड़ा पदाधिकारी, सांसद, विधायक हो दोषी पाया गया तो कार्रवाई होगी। पूरे देश में भाजपा का परचम लहराने के बाद तुरंत उत्तराखंड में पंचायत और विधानसभा उपचुनाव की हार भाजपा को भुलाकर आगे बढ़ने के लिए एक साथ कार्यसमिति में बैठे भाजपा नेताओं ने उसे फिर से हरा कर दिया। किसी ने नसीहत दी तो किसी ने मरहम लगाने की कोशिश भी की। सांसद रमेश पोखरियाल निशंक ने डोईवाला सीट पर मिली हार पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि वहां कांग्रेस ने दो लोगों को मैनेज कर चुनाव जीत लिया। बावजूद भाजपा के वोटों में भारी बढ़ोत्तरी हुई। कहा कि आरोप तो वो भी लगा सकता है जो अपना बूथ जीतने की स्थिति में नहीं है। आखिर आपसी तकरार की जिम्मेदारी कौन लेगा। उन्होंने कहा कि हमे नरेंद्र मोदी के पदचिन्हों पर आगे बढ़ना होगा।
भाजपा नेता अब जान चुके हैं कि पंचायत चुनाव और उपचुनाव में मुख्यमंत्री हरीश रावत की रणनीति ने ही उन्हें चारो खाने चित किया है। सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने अपने सम्बोधन में स्पष्ट तौर पर कहा कि इस दौरान उन्होने तीरथ और निशंक दोनों को सुना, यह ध्यान रहना चाहिए कि राजनीति में जब दूसरों के हक हकूक पर डांका पड़ता है तभी अंतरकलह का दौर शुरू होता है। उन्होंने भाजपा नेताओं को चेताया कि प्रदेश का सीएम सरल आदमी नहीं है। वह महातिकड़मी है, सभी कलाओं में निपुण है। इसलिए एक होकर लड़ों तभी बात बनेगी, वर्न 2017 की जंग आसान नहीं होगी। उन्होंने कहा कि कोई मुझे गाली दे दें तो कोई बात नहीं, लेकिन उससे पार्टी को नुकसान नहीं होना चाहिए। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बची सिंह रावत ने बैठक में राजनीतिक प्रस्ताव रखा। जिसे विधायक मदन कौशिक ने समर्थन किया और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मनोहर कांत ध्यानी व पूरण चंद शर्मा ने उसका अनुमोदन किया।
बच्ची सिंह का राजनितीक प्रस्ताव
-ः झूठे वादों के साथ सत्ता में आई कांग्रेस सरकार असफल हो चुकी है।
-ः सिडकुल में हीरो मोटो कार्प को छूट देने के रूप में 266 करोड़ का घपला हरीश सरकार ने किया और डीएम कोर्ट ने स्टांप चोरी के मामले में कंपनी पर 111 करोड़ की पेनल्टी लगाई।
-ः भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए पूर्व की भाजपा सरकार लोकायुक्त बिल लाई थी लेकिन कांग्रेस सरकार ने आते ही खत्म कर दिया।
-ः अटल खाद्यान्न योजना को भी बंद कर दिया, जो फिर से शुरू होनी चाहिए।
-ः प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब है, बलात्कार व ट्रिपल मर्डर जैसे जघन्य अपराध हो रहे है।
-ःउद्योगों में श्रम कानूनों का उल्लंघन हो रहा है जिसके शिकार प्रदेश के युवा हो रहे है।
-ः 150 से ज्यादा दायित्वधारी बनाकर राजकोश पर सरकार ने हर माह करोड़ों रुपए का भार डाल दिया है।
-ः राज्य में सड़क, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव हो गया है।
राज्य में जिसकी सरकार होती है वही सिंकन्दर-रामलाल
भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल ने पार्टी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को अनुशासन व एकजुटता का पाठ पढ़ाया। साथ ही हिदायत दी कि कोई भी पदाधिकारी पार्टी से बड़ा नहीं है और यदि कोई पार्टी विरोधी गतिविधियों में पाया गया तो उसके खिलाफ गंभीरता से कार्रवाई की जाएगी। रामलाल ने प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासन काल में राज्य का बंटाधार हो चुका है, कानून व्यवस्था चैपट हो चुकी है, अपराधियों का बोलबाला है। लूट, हत्या, डकैती की वारदातों से लोग सहमे हुए हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत जब केंद्र में मंत्री थे तब उन्होंने कांग्रेस शासनकाल में केंद्र से राज्य के विकास के लिए कोई सहयोग नहीं मांगा और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राज्य के विकास के लिए सहयोग मांग रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में आई दैवीय आपदा के दौरान नरेंद्र मोदी राज्य में आए थे और केदारनाथ घाटी में आई आपदा को लेकर सरकार से र्चचा की थी। उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकार केंद्र सरकार को सहयोग दे तो केंद्र सरकार भी राज्य के विकास में सहयोग करेगी। भाजपा ने कठिन परिस्थितियों में राज्य के विकास के लिए कार्य किया था और 10 वर्ष के लिए विशेष पैकेज दिया था, लेकिन पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने इस पैकेज की अवधि नहीं बढ़ाई, जिस कारण राज्य का विकास अवरुद्ध हुआ है। उपचुनाव में भाजपा को मिली हार पर रामलाल ने कहा कि उपचुनाव में अमूमन राज्य में जिसकी सरकार होती है, उसी की जीत होती है क्योंकि सरकार चुनाव में कई संसाधनों का दुरुपयोग करती है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2017 से पहले ही होने वाले हैं।
आमदनी बढ़ाने के लिए निकाय को खुद ही तैयार करना होगा लैंड बैंक-मुख्यमंत्री श्री रावत
देहरादून से प्रेम पंचोली
-ः देहरादून में हुआ अखिल भारतीय महापौर परिषद का46वां वार्षिक अधिवेशन।
-ः नगर निगमों की समस्याओं और कामयाबी पर चर्चा के मकसद से देशभर के मेयर जुटे।
-ः ऑल इंडिया मेयर सम्मेलन के दौरान पुस्तिका जारी करते मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि कूड़ा निस्तारण और पानी निकासी पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
..................................................................
पिछले माह के अन्तिम सप्ताह में राजधानी देहरादून में दो दिन तक देषभर से आये नगर निगमों के मेयर जुटे और दो दिन तक हुए मेयरो की मंथन में यह मांग जोर से की गयी कि निकायों को सुदृढ बनाने के लिए संविधान में हुए 74वें संसोधन को अब तक लागू नहीं किया गया है। इस हेतु वे देषभर में लामबन्द होंगे। इस दौरान हुए मंथन में निकायों को वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार मिले, निकायों और पंचायतों के पास विधिक अधिकार हों, प्रदेश सरकारें मेयरों के प्रोटोकॉल पर गंभीर विचार करें, निकायों से सरकारों का दोयम दर्जे का बर्ताव बंद हों, दिल्ली, चंडीगढ़ में मेयर का एकवर्षीय कार्यकाल बढ़ाया जाए जैसे गम्भीर मसलो पर दो दिन तक चर्चा बनी रही।
प्रथम दिवस को देहरादून में आयोजित कांफ्रेंस में सभी मेयरों ने संविधान के 74वें संशोधन को सभी राज्यों के निकायों में जल्द लागू करने की मांग पुरजोर ढंग से उठाई। निकायों को स्वायत्तता के साथ और मजबूती प्रदान करने की भी वकालत की गई। इस दौरान विभिन्न निगमों में लागू योजनाओं और इनके क्रियान्वयन में पेश आई व्यावहारिक दिक्कतों पर भी मेयरों ने चर्चा की। पटेलनगर स्थित एक होटल में कांफ्रेंस का उद्घाटन प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत, शहरी विकास मंत्री प्रीतम पंवार, भारतीय महापौर परिषद के संगठन महामंत्री उमाशंकर गुप्ता, दून के मेयर विनोद चमोली ने किया।
इस दौरान परिषद के संगठन महामंत्री और मध्य प्रदेश के शिक्षा एवं तकनीकी मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि नगर निगम के पार्षद और मेयर जनता के चुने गए प्रतिनिधि होते हैं। इसके बावजूद उन्हें पर्याप्त अधिकार हासिल नहीं हैं। कहा कि उत्तराखंड और यूपी में मेयर, पार्षदों के वित्तीय अधिकार बेहद सीमित हैं। गुप्ता ने कहा कि स्थिति यह रहती है कि पार्षद किसी की मदद करने थाने जाए तो थानेदार उन्हें झिड़क देते हैं। जबकि पड़ोसी देश नेपाल में निकायों, पंचायतों को विधिक अधिकार दिए गए हैं। गुप्ता ने कहा कि मेयर के वोटरों की संख्या कई विधायकों के बराबर होती है, लेकिन उनके प्रोटोकॉल का कोई ख्याल नहीं रखा जाता। बताया कि एमपी में मेयर का प्रोटोकॉल विधायकों से ऊपर है। मेयर विनोद चमोली ने सम्मेलन में आये सभी मेयरो का स्वागत करते हुए कहा कि सरकारें यह मानकर चलती हैं कि निकाय दोयम दर्जे के हैं। यही वजह है कि मेयर को अधिकार नहीं दिए जाते। उन्होंने कहा कि यदि वह विधायक का चुनाव लड़ें तो उन्हें मेयर के मुकाबले कम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व मिलेगा, वोट भी मेयर के मुकाबले कम पाने होंगे। लेकिन, तब उन्हें मेयर से कहीं अधिक अधिकार मिल जाएंगे। कहा कि यह व्यवस्था सरकार की दोहरी सोच दर्शाती है। अगर इसमें बदलाव नहीं किया गया तो शहरों के विकास की अवधारणा साकार नहीं हो सकेगी।
कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मेयरों की अधिकार देने की मांग का समर्थन किया। कहा कि देश की करीब 38 प्रतिशत आबादी का नेतृत्व स्थानीय निकाय सरकार कर रही है। ऐसे में उन्हें अधिकार देने ही होंगे। इस दौरान मुख्यमंत्री रावत ने देशभर में निकायों की जमीनों पर हो रहे अवैध कब्जों पर भी चिंता जताई। कहा कि निकायों को ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए। देहरादून का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां निकाय के पास बेशकीमती जमीनें हैं, लेकिन कचरा निस्तारण प्लांट के लिए ही जमीन नहीं मिल पा रही। इससे शहर की बड़ी समस्या से निजात का रास्ता अटक गया है। सीएम ने निकायों को अपने पैरों पर खड़ा होने के विकल्प तलाशने की नसीहत भी दी।मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि स्थानीय निकायों को मजबूत बनाने के लिए 13 वें वित्त आयोग से संसाधन जुटाए जाएंगे। राज्य सरकार इसके लिए केंद्रीय वित्त आयोग से अनुरोध कर रही है। उन्होंने कहा कि बढ़ती आबादी को देखते हुए शहरों में कूड़ा निस्तारण और पानी की निकासी पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। निकायों की आमदनी बढ़ाने के लिए लैंड बैंक तैयार करने के साथ ही अभियान के रूप में सख्ती के साथ अवैध अतिक्रमण हटाना होगा। वे स्थानीय होटल में आयोजित अखिल भारतीय महापौर परिषद के 46वें वार्षिक अधिवेशन में रावत मुख्य अतिथि को रूप में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार नगर निकायों को विकास में भागीदार बनाने के लिए हरसम्भव मदद करने के लिए तैयार है। नगर पंचायत, नगर पालिका व नगर निगमों में चुने हुए प्रतिनिधियों व निकायों को मजबू्त बनाने के लिए राज्य सरकार केंद्रीय वित्त आयोग से अनुरोध कर रही है कि इनके लिए 13 वें वित्त आयोग में पर्याप्त आर्थिक संसाधन दिये जाएं। सीएम ने कहा कि इस सदी में देश की आर्थिक विकास की औसत दर आठ प्रतिशत के करीब रही है जो कि अधिकांश देशों के लिए सपने के समान है। हरीश रावत ने कहा कि तेज आर्थिक विकास का प्रभाव शहरीकरण के रूप में दिखता है, परंतु शहरों में जनसंख्या के बढ़ते दबाव से कई समस्याएं भी पैदा हो रही हैं जिनका समाधान समय रहते करना बहुत जरूरी है। देहरादून सहित अधिकांश शहरों में आवासीय भूमि की कमी होती जा रही है। विशेष रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए सम्मानजनक तरीके से रहने की व्यवस्था करना एक बड़ी चुनौती है।
अधिवेषन में उत्तराखंड के शहरी विकास मंत्री प्रीतम पंवार ने जानकारी दी कि प्रदेश सरकार निकायों को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। बताया कि प्रदेश में 74वें संविधान संशोधन के 18 में से 13 बिंदु लागू किए जा चुके हैं। कुछ बिंदुओं में अभी ढांचा तैयार किया जाना है। जल्द ही इन्हें भी लागू किया जाएगा।
अधिवेशन में अखिल भारतीय महापौर परिषद के अध्यक्ष और नागपुर के मेयर अनिल शोले, दून की पूर्व मेयर मनोरमा शर्मा डोबरियाल, संसदीय कार्य सचिव राजकुमार, विधायक उमेश शर्मा, पिछड़ा आयोग के अध्यक्ष अशोक वर्मा, शहरी विकास सचिव जीएस गर्ब्याल, मुख्य नगर अधिकारी हरक सिंह रावत, एएमएनए हर्षर्द्धन मिश्रा, वरिष्ठ नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. आरके सिंह और सभी पार्षद मौजूद रहे। हरिद्वार के मेयर मनोज गर्ग ने कार्यक्रम का संचालन किया।
नहीं पहुंचे नायडू
तय कार्यक्रम के अनुसार मेयर कांफ्रेंस में केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू को भी शिरकत करनी थी। आयोजकों ने बताया कि दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक के चलते वह दून नहीं पहुंच सके। बताया गया कि केंद्रीय मंत्री ने जल्द ही दिल्ली में सभी मेयरों से मुलाकात और उनकी समस्याओं पर चर्चा करने का आश्वासन दिया है।
चमोली चुने गए राष्ट्रीय अध्यक्ष
इस अधिवेषन में दून के मेयर विनोद चमोली को राष्ट्रीय महापौर परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया। कांफ्रेंस में शामिल मेयरों और पार्षदों ने चमोली को बधाई दी। चमोली ने कहा कि अब उन पर दोहरी जिम्मेदारी है। परिषद की नई जिम्मेदारी के तहत उन्होंने देश के सभी निकायों में 74वां संविधान संशोधन लागू कराने की लड़ाई लड़ने की बात कही।
संसद में लायेंगे बिल
आल इंडिया मेयर काउंसिल के संगठन महामंत्री एवं मध्यप्रदेश के तकनीकी शिक्षा मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि जिन राज्यों में संविधान का 74वां संशोधन अब तक लागू नहीं है उसके लिए परिषद केंद्र सरकार पर लगातार दबाव बनाए हुए है। क्योंकि यह सीधे-सीधे केंद्र का विषय न होकर राज्य का विषय है, इसलिए सरकार को सुझाव दिया गया है कि संसद में इस संबंध में बिल लाकर संशोधन को लागू कराने की दिशा में कदम उठाया जाए। 46वीं महापौर परिषद के अधिवेशन के दौरान पत्रकार को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि 46वीं महापौर परिषद में केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी बनाने की पहल समेत शहरों की समस्याओं पर भी वार्ता होगी। उन्होंने कहा कि महापौर परिषद का मतलब केवल यही नहीं कि यह महापौर का मंच है बल्कि यह समूचे शहर के नागरिकों का मंच है। उत्तराखंड समेत कुछ अन्य राज्यों में संविधान का 74वां संशोधन लागू न होने पर अफसोस जताते हुए उन्होंने कहा कि इसके लिए केंद्र व राज्य सरकारों से बातचीत की जाएगी। उन्होंने मध्यप्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मेयर को तमाम वित्तीय अधिकारों से लेकर अन्य अधिकार प्राप्त हैं जबकि कई राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है। इसलिए कोशिश होगी कि अन्य राज्यों में भी ऐसी व्यवस्था बनाने की दिशा में कदम उठाए जाएं।
-ः देहरादून में हुआ अखिल भारतीय महापौर परिषद का46वां वार्षिक अधिवेशन।
-ः नगर निगमों की समस्याओं और कामयाबी पर चर्चा के मकसद से देशभर के मेयर जुटे।
-ः ऑल इंडिया मेयर सम्मेलन के दौरान पुस्तिका जारी करते मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि कूड़ा निस्तारण और पानी निकासी पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
..................................................................
पिछले माह के अन्तिम सप्ताह में राजधानी देहरादून में दो दिन तक देषभर से आये नगर निगमों के मेयर जुटे और दो दिन तक हुए मेयरो की मंथन में यह मांग जोर से की गयी कि निकायों को सुदृढ बनाने के लिए संविधान में हुए 74वें संसोधन को अब तक लागू नहीं किया गया है। इस हेतु वे देषभर में लामबन्द होंगे। इस दौरान हुए मंथन में निकायों को वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार मिले, निकायों और पंचायतों के पास विधिक अधिकार हों, प्रदेश सरकारें मेयरों के प्रोटोकॉल पर गंभीर विचार करें, निकायों से सरकारों का दोयम दर्जे का बर्ताव बंद हों, दिल्ली, चंडीगढ़ में मेयर का एकवर्षीय कार्यकाल बढ़ाया जाए जैसे गम्भीर मसलो पर दो दिन तक चर्चा बनी रही।
प्रथम दिवस को देहरादून में आयोजित कांफ्रेंस में सभी मेयरों ने संविधान के 74वें संशोधन को सभी राज्यों के निकायों में जल्द लागू करने की मांग पुरजोर ढंग से उठाई। निकायों को स्वायत्तता के साथ और मजबूती प्रदान करने की भी वकालत की गई। इस दौरान विभिन्न निगमों में लागू योजनाओं और इनके क्रियान्वयन में पेश आई व्यावहारिक दिक्कतों पर भी मेयरों ने चर्चा की। पटेलनगर स्थित एक होटल में कांफ्रेंस का उद्घाटन प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत, शहरी विकास मंत्री प्रीतम पंवार, भारतीय महापौर परिषद के संगठन महामंत्री उमाशंकर गुप्ता, दून के मेयर विनोद चमोली ने किया।
इस दौरान परिषद के संगठन महामंत्री और मध्य प्रदेश के शिक्षा एवं तकनीकी मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि नगर निगम के पार्षद और मेयर जनता के चुने गए प्रतिनिधि होते हैं। इसके बावजूद उन्हें पर्याप्त अधिकार हासिल नहीं हैं। कहा कि उत्तराखंड और यूपी में मेयर, पार्षदों के वित्तीय अधिकार बेहद सीमित हैं। गुप्ता ने कहा कि स्थिति यह रहती है कि पार्षद किसी की मदद करने थाने जाए तो थानेदार उन्हें झिड़क देते हैं। जबकि पड़ोसी देश नेपाल में निकायों, पंचायतों को विधिक अधिकार दिए गए हैं। गुप्ता ने कहा कि मेयर के वोटरों की संख्या कई विधायकों के बराबर होती है, लेकिन उनके प्रोटोकॉल का कोई ख्याल नहीं रखा जाता। बताया कि एमपी में मेयर का प्रोटोकॉल विधायकों से ऊपर है। मेयर विनोद चमोली ने सम्मेलन में आये सभी मेयरो का स्वागत करते हुए कहा कि सरकारें यह मानकर चलती हैं कि निकाय दोयम दर्जे के हैं। यही वजह है कि मेयर को अधिकार नहीं दिए जाते। उन्होंने कहा कि यदि वह विधायक का चुनाव लड़ें तो उन्हें मेयर के मुकाबले कम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व मिलेगा, वोट भी मेयर के मुकाबले कम पाने होंगे। लेकिन, तब उन्हें मेयर से कहीं अधिक अधिकार मिल जाएंगे। कहा कि यह व्यवस्था सरकार की दोहरी सोच दर्शाती है। अगर इसमें बदलाव नहीं किया गया तो शहरों के विकास की अवधारणा साकार नहीं हो सकेगी।
कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मेयरों की अधिकार देने की मांग का समर्थन किया। कहा कि देश की करीब 38 प्रतिशत आबादी का नेतृत्व स्थानीय निकाय सरकार कर रही है। ऐसे में उन्हें अधिकार देने ही होंगे। इस दौरान मुख्यमंत्री रावत ने देशभर में निकायों की जमीनों पर हो रहे अवैध कब्जों पर भी चिंता जताई। कहा कि निकायों को ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए। देहरादून का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां निकाय के पास बेशकीमती जमीनें हैं, लेकिन कचरा निस्तारण प्लांट के लिए ही जमीन नहीं मिल पा रही। इससे शहर की बड़ी समस्या से निजात का रास्ता अटक गया है। सीएम ने निकायों को अपने पैरों पर खड़ा होने के विकल्प तलाशने की नसीहत भी दी।मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि स्थानीय निकायों को मजबूत बनाने के लिए 13 वें वित्त आयोग से संसाधन जुटाए जाएंगे। राज्य सरकार इसके लिए केंद्रीय वित्त आयोग से अनुरोध कर रही है। उन्होंने कहा कि बढ़ती आबादी को देखते हुए शहरों में कूड़ा निस्तारण और पानी की निकासी पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। निकायों की आमदनी बढ़ाने के लिए लैंड बैंक तैयार करने के साथ ही अभियान के रूप में सख्ती के साथ अवैध अतिक्रमण हटाना होगा। वे स्थानीय होटल में आयोजित अखिल भारतीय महापौर परिषद के 46वें वार्षिक अधिवेशन में रावत मुख्य अतिथि को रूप में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार नगर निकायों को विकास में भागीदार बनाने के लिए हरसम्भव मदद करने के लिए तैयार है। नगर पंचायत, नगर पालिका व नगर निगमों में चुने हुए प्रतिनिधियों व निकायों को मजबू्त बनाने के लिए राज्य सरकार केंद्रीय वित्त आयोग से अनुरोध कर रही है कि इनके लिए 13 वें वित्त आयोग में पर्याप्त आर्थिक संसाधन दिये जाएं। सीएम ने कहा कि इस सदी में देश की आर्थिक विकास की औसत दर आठ प्रतिशत के करीब रही है जो कि अधिकांश देशों के लिए सपने के समान है। हरीश रावत ने कहा कि तेज आर्थिक विकास का प्रभाव शहरीकरण के रूप में दिखता है, परंतु शहरों में जनसंख्या के बढ़ते दबाव से कई समस्याएं भी पैदा हो रही हैं जिनका समाधान समय रहते करना बहुत जरूरी है। देहरादून सहित अधिकांश शहरों में आवासीय भूमि की कमी होती जा रही है। विशेष रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए सम्मानजनक तरीके से रहने की व्यवस्था करना एक बड़ी चुनौती है।
अधिवेषन में उत्तराखंड के शहरी विकास मंत्री प्रीतम पंवार ने जानकारी दी कि प्रदेश सरकार निकायों को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। बताया कि प्रदेश में 74वें संविधान संशोधन के 18 में से 13 बिंदु लागू किए जा चुके हैं। कुछ बिंदुओं में अभी ढांचा तैयार किया जाना है। जल्द ही इन्हें भी लागू किया जाएगा।
अधिवेशन में अखिल भारतीय महापौर परिषद के अध्यक्ष और नागपुर के मेयर अनिल शोले, दून की पूर्व मेयर मनोरमा शर्मा डोबरियाल, संसदीय कार्य सचिव राजकुमार, विधायक उमेश शर्मा, पिछड़ा आयोग के अध्यक्ष अशोक वर्मा, शहरी विकास सचिव जीएस गर्ब्याल, मुख्य नगर अधिकारी हरक सिंह रावत, एएमएनए हर्षर्द्धन मिश्रा, वरिष्ठ नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. आरके सिंह और सभी पार्षद मौजूद रहे। हरिद्वार के मेयर मनोज गर्ग ने कार्यक्रम का संचालन किया।
नहीं पहुंचे नायडू
तय कार्यक्रम के अनुसार मेयर कांफ्रेंस में केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू को भी शिरकत करनी थी। आयोजकों ने बताया कि दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक के चलते वह दून नहीं पहुंच सके। बताया गया कि केंद्रीय मंत्री ने जल्द ही दिल्ली में सभी मेयरों से मुलाकात और उनकी समस्याओं पर चर्चा करने का आश्वासन दिया है।
चमोली चुने गए राष्ट्रीय अध्यक्ष
इस अधिवेषन में दून के मेयर विनोद चमोली को राष्ट्रीय महापौर परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया। कांफ्रेंस में शामिल मेयरों और पार्षदों ने चमोली को बधाई दी। चमोली ने कहा कि अब उन पर दोहरी जिम्मेदारी है। परिषद की नई जिम्मेदारी के तहत उन्होंने देश के सभी निकायों में 74वां संविधान संशोधन लागू कराने की लड़ाई लड़ने की बात कही।
संसद में लायेंगे बिल
आल इंडिया मेयर काउंसिल के संगठन महामंत्री एवं मध्यप्रदेश के तकनीकी शिक्षा मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि जिन राज्यों में संविधान का 74वां संशोधन अब तक लागू नहीं है उसके लिए परिषद केंद्र सरकार पर लगातार दबाव बनाए हुए है। क्योंकि यह सीधे-सीधे केंद्र का विषय न होकर राज्य का विषय है, इसलिए सरकार को सुझाव दिया गया है कि संसद में इस संबंध में बिल लाकर संशोधन को लागू कराने की दिशा में कदम उठाया जाए। 46वीं महापौर परिषद के अधिवेशन के दौरान पत्रकार को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि 46वीं महापौर परिषद में केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी बनाने की पहल समेत शहरों की समस्याओं पर भी वार्ता होगी। उन्होंने कहा कि महापौर परिषद का मतलब केवल यही नहीं कि यह महापौर का मंच है बल्कि यह समूचे शहर के नागरिकों का मंच है। उत्तराखंड समेत कुछ अन्य राज्यों में संविधान का 74वां संशोधन लागू न होने पर अफसोस जताते हुए उन्होंने कहा कि इसके लिए केंद्र व राज्य सरकारों से बातचीत की जाएगी। उन्होंने मध्यप्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मेयर को तमाम वित्तीय अधिकारों से लेकर अन्य अधिकार प्राप्त हैं जबकि कई राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है। इसलिए कोशिश होगी कि अन्य राज्यों में भी ऐसी व्यवस्था बनाने की दिशा में कदम उठाए जाएं।
Tuesday, August 26, 2014
गीर्दा जी कह गये - मेरी कोसी हरी गे कोसी
प्रेम पंचोली
जब गीर्दा जी की याद आती है तो मुझे वे दिन याद याते हैं जब हम पहली बार गीर्दा जी के साथ पीएसआई के गेस्ट हाऊस में रहने का मौका मिला। मेरे साथ मेरे स्कूल के दौरान के सहपाठी अमित सावन भी था। गीर्दा जी ने कहा कि बबा तुम तो बाजार घूमने चले जाओ मेरा रात्री का कार्यक्रम आरम्भ होता है। खैर! यह बात 2003 की है जब पहली बार राज्य के लोग जलनीति के संबन्ध में लामबन्द हो रहे थे। हमने अतुल षर्माा के साथ मिलकर श्री सुरेषभाई के सहयोग से एक नाटक ‘‘क्या नदी बिकी’’ नाम से बनाया था। इसका सफल मंचन गीर्दाजी के गीतो के साथ राज्यभर में किया गया। इस कारण राज्य में पानी के सवाल को लेकर तो कही जल विद्युत परियोजनाओ को लेकर सवाल खड़े होने लगे। तो कभी पानी के निजीकरण को लेकर और राज्य की जल नीति को लेकर सवाल खड़े होने लग गये। इस आन्दोलन में गीर्दा का हमे संरक्षण ही नही बल्कि निर्देषन भी मिलता रहा। 2005 आते-आते राज्य के पर्यावरण कार्यकर्ताओं, सहित सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व रंगकर्मी तथा अन्य चिन्तनषील लोगो ने राज्य की नदी घाटियों की पैदल यात्रा की। सभी नदी घाटियों के ‘‘जल’’ को साल 2007 में राम नगर में एकत्रित किया गया। वहां मौजूद हजारो की भीड़ में गीर्दा ने एक गीत से ऐसा ऐलान कर दिया कि राज्य सरकार को एक बार पानी के मसले पर सोचने के लिए विवष होना पड़ा। और साल 2008 को राज्य के नागरिको ने नदी बचाओ वर्श भी घोषित किया। उन्ही दिनों गीर्दा का -कोसी पर रचित गीत-
जोड़ आम बूबू सुणू छी
गदगदानी उं छी
रामनगर पुंजूं छी
पीनाथ बहियू च
रामनगर पौंच्यूछ ......
मेरी कोसी हरी गे कोसी।
एवं-
चलो नदी तट वार चलो,
चलो नदी तट पार चलो रे करो यात्रा नदियों की।
इसके अलावा उन्होन एक गीत ऐसा प्रसारित किया की जो आज भी प्राकृतिक संसाधनो के संरक्षण के लिए आन्दोलित कार्यकर्ताओ के साथ खड़ा है-
एक तरफ बर्बाद बस्तिया - एक तरफ हो तुम
एक तरफ डूबती कषितयां - एक तरफ हो तुम
एक तरफ सूखी नदियां - एक तरफ हो तुम
एक तरफ है प्यासी दुनियां - एक तरफ हो तुम
अजी वाह! क्या बात तुम्हारी-
सारा पानी चूस रहे हो
नदी समन्दर लूट रहे हो
गंगा यमुना की छाती पर
कंकड़ पत्थर कूट रहे हो
गीर्दा जी तुम्हे सत् सत् प्रणाम! अगर हम आपकी विरासत को आगे बढा पायें यही सच्ची श्रद्धांजली होगी। माफ करना चार साल बाद मै लिखने की हिममत कर पा रहा हूं। लोग चार साल से लगातार लिखत कहते और याद करते रहे। नैनीताल समाचार सहित अन्य अखबारो, टीबी चैनलो में भी श्रृखलाबद्ध रूप से लिखा व प्रसारण किया गया। लिखा जा रहा है। परन्तु मै इतना असंवेदनषील हो गया कि चार साल बाद मेरी हिम्मत लिखने की हुई। हम आपके विचारो को आगे बढाने के कार्यो में उन लोगो के साथ हैं जो इस कार्य पर लगे है। पुनः आपको नमन्! यह षिकायत आप तक कैसे पंहुचे कि यहां की राज्य सरकार ऐसे लोगो के नाम पद्मश्री के लिए भेजती है जो सिर्फ नचाड़ व गीतांग है। वे नचाड़ व गीतांग की भी सम्पूर्ण परिभाशा तक नही जानते वे तो मात्र ऐसा काम कर रहे हैं कि-सुणी पाई बल अर् बेची खाई। दरअसल रचनात्मक साथियों को तो गीर्दा को तो पढना ही चाहिए।
जब गीर्दा जी की याद आती है तो मुझे वे दिन याद याते हैं जब हम पहली बार गीर्दा जी के साथ पीएसआई के गेस्ट हाऊस में रहने का मौका मिला। मेरे साथ मेरे स्कूल के दौरान के सहपाठी अमित सावन भी था। गीर्दा जी ने कहा कि बबा तुम तो बाजार घूमने चले जाओ मेरा रात्री का कार्यक्रम आरम्भ होता है। खैर! यह बात 2003 की है जब पहली बार राज्य के लोग जलनीति के संबन्ध में लामबन्द हो रहे थे। हमने अतुल षर्माा के साथ मिलकर श्री सुरेषभाई के सहयोग से एक नाटक ‘‘क्या नदी बिकी’’ नाम से बनाया था। इसका सफल मंचन गीर्दाजी के गीतो के साथ राज्यभर में किया गया। इस कारण राज्य में पानी के सवाल को लेकर तो कही जल विद्युत परियोजनाओ को लेकर सवाल खड़े होने लगे। तो कभी पानी के निजीकरण को लेकर और राज्य की जल नीति को लेकर सवाल खड़े होने लग गये। इस आन्दोलन में गीर्दा का हमे संरक्षण ही नही बल्कि निर्देषन भी मिलता रहा। 2005 आते-आते राज्य के पर्यावरण कार्यकर्ताओं, सहित सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व रंगकर्मी तथा अन्य चिन्तनषील लोगो ने राज्य की नदी घाटियों की पैदल यात्रा की। सभी नदी घाटियों के ‘‘जल’’ को साल 2007 में राम नगर में एकत्रित किया गया। वहां मौजूद हजारो की भीड़ में गीर्दा ने एक गीत से ऐसा ऐलान कर दिया कि राज्य सरकार को एक बार पानी के मसले पर सोचने के लिए विवष होना पड़ा। और साल 2008 को राज्य के नागरिको ने नदी बचाओ वर्श भी घोषित किया। उन्ही दिनों गीर्दा का -कोसी पर रचित गीत-
जोड़ आम बूबू सुणू छी
गदगदानी उं छी
रामनगर पुंजूं छी
पीनाथ बहियू च
रामनगर पौंच्यूछ ......
मेरी कोसी हरी गे कोसी।
एवं-
चलो नदी तट वार चलो,
चलो नदी तट पार चलो रे करो यात्रा नदियों की।
इसके अलावा उन्होन एक गीत ऐसा प्रसारित किया की जो आज भी प्राकृतिक संसाधनो के संरक्षण के लिए आन्दोलित कार्यकर्ताओ के साथ खड़ा है-
एक तरफ बर्बाद बस्तिया - एक तरफ हो तुम
एक तरफ डूबती कषितयां - एक तरफ हो तुम
एक तरफ सूखी नदियां - एक तरफ हो तुम
एक तरफ है प्यासी दुनियां - एक तरफ हो तुम
अजी वाह! क्या बात तुम्हारी-
सारा पानी चूस रहे हो
नदी समन्दर लूट रहे हो
गंगा यमुना की छाती पर
कंकड़ पत्थर कूट रहे हो
गीर्दा जी तुम्हे सत् सत् प्रणाम! अगर हम आपकी विरासत को आगे बढा पायें यही सच्ची श्रद्धांजली होगी। माफ करना चार साल बाद मै लिखने की हिममत कर पा रहा हूं। लोग चार साल से लगातार लिखत कहते और याद करते रहे। नैनीताल समाचार सहित अन्य अखबारो, टीबी चैनलो में भी श्रृखलाबद्ध रूप से लिखा व प्रसारण किया गया। लिखा जा रहा है। परन्तु मै इतना असंवेदनषील हो गया कि चार साल बाद मेरी हिम्मत लिखने की हुई। हम आपके विचारो को आगे बढाने के कार्यो में उन लोगो के साथ हैं जो इस कार्य पर लगे है। पुनः आपको नमन्! यह षिकायत आप तक कैसे पंहुचे कि यहां की राज्य सरकार ऐसे लोगो के नाम पद्मश्री के लिए भेजती है जो सिर्फ नचाड़ व गीतांग है। वे नचाड़ व गीतांग की भी सम्पूर्ण परिभाशा तक नही जानते वे तो मात्र ऐसा काम कर रहे हैं कि-सुणी पाई बल अर् बेची खाई। दरअसल रचनात्मक साथियों को तो गीर्दा को तो पढना ही चाहिए।
Thursday, August 21, 2014
क्यों ढूंढेगी पुलिस दर्षन लाल के बैग को ?
बारह अगस्त को लिखी गयी तहरीर भी कहीं गोल हो गयी और तो और पुलिस को इतना भी नहीं सूझा कि जिस व्यक्ति की यह तहरीर है उसका भविश्य सदा-सदा के लिए समाप्त हो जायेगा। वह लगातार दर-दर की ठोंकरें खा रहा है। पिछले 12 अगस्त से वह आस बांधे हैं कि षायद उसके षैक्षिक प्रमाण पत्र मिल जायेंगे। उसने कोरनेषन चिकित्सालय के सभी कर्मचारियों से लेकर पास की पुलिस चैकी डालनवाला में तैनात पुलिसकर्मियों तक अपना यह दुखड़ा सुनाया मगर किसी को भी दर्षनलाल की समस्या पर जरा भी दया नहीं आयी।
हुआ यूं कि जौनसार-बावर क्षेत्र के दूरस्थ गांव लावड़ी निवासी दर्षन लाल जब कोरनेषन चिकित्सालय में अपने बिमार पिताजी के साथ तिमारदार था तो उसने कक्ष के बाहर अपने बैग को एक टेबल पर इस आषय से छोड़ा था कि वह अपने बिमार पिताजी को चिकित्सक से दिखवा करके वापस उन्हे उनके कक्ष तक छोड़ देगा। इस अन्तराल में दर्षन लाल के भरे कागजातो के बैग पर किसी ने हाथ साफ कर लिए। दर्षन लाल ने अपना यह दुखड़ा इस संवाददाता को बताया कि उसके बैग में हाईस्कूल, इण्टरमीडिएट व स्नातक तथा जातिप्रमाण पत्र सहित स्थाई निवास प्रमाण पत्र की मूल प्रतियां रखी थी। वह अपने खोये हुए बैग को सम्पूर्ण कोरनेषन चिकित्साल में दिनभर ढूंढता रहा और बैग से संबधित सूचना से दर्षनलाल को मायूस हाथ ही लौटना पड़ा। दर्षनलाल ने अपने इस बैग की चोरी होने की सूचना नजदीक पुलिस थाना डालनवाला में लिखवाई। पुलिस ने भी उस वक्त आष्वास्त किया कि वे इस बैग को ढूंढकर ही सांस लेंगे। 12 अगस्त से दर्षनलाल चिकित्सालय से लेकर पुलिस तक के चक्कर काट-काटकर थक-हार चुका है और बार-बार अपनी किस्मत को कोस रहा है कि उसने स्कूल का रास्ता क्यों पकड़ा। इस अन्तराल में तो वह अपने आजीविका के साधन जोड़ चुका होता। यही नहीं उसे ना तो कागजो के चोरी होने का भय होता ना उसे रोजगार की अब तलाष करनी पड़ती। वे तो अपनी किस्मत को इस तरह कोस रहा है कि उसका जन्म यदि किसी नामी घराने से होता तो कागजातो से भरे उस बैग को पुलिस कब के ढूंढ निकालती जबकि इससे पहले कोरनेषन चिकित्सालय के ही कर्मचारी बैग ढूंढने मे ही उसकी पूरी मदद करते। मगर वह तो एक गरीब व निम्न परिवार में ज्न्मा है जिसकी मदद आजकल में कोई भी व्यवस्था नाम की चीज नहीं करती है। वह कहता है कि उसने बड़ी मुष्किल से अपनी पढाई की है। अब समय आ गया था कि वह रोजगार के लिए कहीं आवेदन करता। इतने संघर्श के बावजूद भी ईष्वर ने उसके रास्ते को रोक दिया है। वह तो हाथ जोड़कर यही आरजू कर रहा है कि जिस भी किसी के पास यह बैग हो वह वापस लौटा देगा तो उसकी जिन्दगी संवर सकती है।
ताज्जुब हो कि राजधानी जैसे इस आधुनिक चिकित्सालय में एक अदद सीसीटीवी कैमरा तक नहीं है। चूंकि पुलिस भी यही कहती फिर रही है कि यदि कोरनेषन चिकित्सालय में सीसीटीवी कैमरा होता तो षायद दर्षनलाल का यह बैग मिल सकता था। वैसे भी कोरनेषन हो या दून यहां बैग चोरी और जेब-जेवराज चोरी की घटना आम हो गयी है। राजधानी में इतने बड़े चिकित्सालयों में लोग जितने डरे सहमें चोरो से रहते हैं उससे अधिक अपने मरीजों को ठीक करवाने में भी रहते है। क्या मजाल की कोई तीमारदार अपने मरीज के लिए आवष्यक सुझाव चिकित्सको से मांग सके। यही वजह है कि इन सरकारी चिकित्सालयों में आये दिन लोग चोरो के घेरे से नहीं बच पा रहे है और पुलिस भी हाथ पर हाथ धरकर बैठी हैं।
Sunday, August 10, 2014
रक्षाबंधन पर विशेष - पेड़ो पर रक्षासूत्र एक भावनात्मक आन्दोलन
जहां एक ओर 1994 में राज्य आन्दोलन के लिए लोग सड़को पर उतर आये वहीं उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रो में वनमाफिया इतने सक्रीय हो चुके थे कि वे एक तरफ ग्रामीण स्तर के छोटे-छोटे आन्दोलनकारी समूहो को दान-चन्दा देकर आन्दोलन को तेज करने की वकालात करते और दूसरी तरफ वनो की अन्धाधुन्ध दोहन करने में हाथ साफ कर रहे थे। इसी दौरान वनमाफियाओ को सबक सीखाने के लिए राज्य की प्राकृतिक संपदा के संरक्षण बावत महिलाओं ने पेड़ो पर राखी बांधकर रक्षासूत्र आन्दोलन का सूत्रपात किया। अर्थात 1994 में वनों की व्यावसायिक कटाई के खिलाफ यह आन्दोलन प्रारम्भ हुआ और अब तो पर्वतीय गांवों के लोग रक्षाबन्धन के अवसर पर पेड़ो पर राखी बांधते है और वन संरक्षण की शपथ लेते है।
1994-95 में भिलंगना, बालगंगा, धर्मगंगा, जलकुर, अलकनंदा तथा भागीरथी नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में 10-10 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित टिहरी-उत्तरकाशी के रयाला (बूढाकेदार), चैरंगीखाल, हर्षिल, हरून्ता, अडाला, मुखेम आदि स्थानों पर वनों की व्यावसायिक कटाई प्रारम्भ हुई थी। रक्षासूत्र आन्दोलन की पर्यावरण टीम ने वनों में जाकर कटान का अध्ययन किया था। तत्काल के अध्ययन के दौरान पाया कि वन विभाग ने वन निगम के साथ मिलकर हजारों हरे पेड़ों पर छपान कर रखी है। जंगल कटान का कार्य रातों-रात जोरो पर है। आन्दोलन द्वारा इसकी सूचना आस-पास के ग्रामीणों को दी गयी थी। यह सूचना मिलने पर गांव के लोग सजग हुये। इसके द्वारा यह जानने का प्रयास भी किया गया था कि वन निगम आखिर किसकी स्वीकृति से हरे पेड़ काट रहा है। इसकी तह निहारने से पता चला कि क्षेत्र के कुछ ग्राम प्रधानों से ही वन विभाग ने यह मुहर लगवा दी थी कि उनके आस-पास के जंगलों में काफी पेड़ सूख गये हैं और इसके कारण गांव की महिलायें जंगल में आना-जाना नहीं कर पा रही है। इसमें दुर्भाग्य की बात यह थी कि जनप्रतिनिधि भी जंगलों को काटने का ठेका लिये हुये थे, जिसके कारण ग्रामीण लोगों को पहले अपने ही जनप्रतिनिधियों से ही संघर्ष करना पड़ा था। वन कटान को रोकने के संबंध में टिहरी-उत्तरकाशी के गांव थाती, खवाड़ा, भेटी, डालगांव, चैंडियाट गांव, दिखोली, सौड़, भेटियारा, कमद, ल्वार्खा, मुखेम, हर्षिल, मुखवा, उत्तरकाशी आदि कई स्थानों पर लोगों ने बैठकों में निर्णय लेकर पेड़ों पर ‘‘रक्षासूत्र’’ बांधे, जिसे रक्षासूत्र आन्दोलन के रूप में जाना जाता है। रक्षासूत्र आन्दोलन की मांग थी कि जंगलों से सर्वप्रथम लोगों के हक-हकूकों की आपूर्ति होनी चाहिये तथा वन कटान का सर्वाधिक दोषी वन निगम में अमूलचूल परिवर्तन करने की मांग उठायी गयी। इसके अलावा यह भी मांग थी कि यदि गांव वालों की आवश्यकता की पूर्ति के बाद जंगल में इससे अधिक वन उत्पाद प्राप्त हो सकते हैं, तो निश्चित ही राज्य हित में इसका इस्तेमाल होना चाहिये। इसके अलावा ऊँचाई की दुर्लभ प्रजाति कैल, मुरेंडा, खर्सू, मौरू, बांझ, बुरांस, दालचीनी, देवदार आदि की लाखों वन प्रजातियों को बचाने का काम रक्षासूत्र आन्दोलन ने किया है। इन ऊँचाई की प्रजाति के पेड़ों के कारण वर्षा नियंत्रित रहती है और नीचे घाटियों की ओर पानी के स्रोत निकलकर आते हैं।
रक्षासूत्र आन्दोलन के कारण महिलाओं का पेड़ों से भाईयों का जैसा रिश्ता बना है और जिस तरह चिपको आन्दोलन की महिला नेत्री गौरा देवी ने जंगलों को अपना मायका कहा है, उसको रक्षासूत्र आन्दोलन ने मूर्त रूप दिया है और प्रभावी रूप से वनों पर जनता के पारम्परिक अधिकारों की रक्षा का बीड़ा उठाया है। रक्षासूत्र आन्दोलन के कारण उपरोक्त वन क्षेत्रों में वन निगम द्वारा किये जा रहे हरे पेड़ों की कटाई को सफलतापूर्वक रोक दिया गया है। यहां तक कि टिहरी और उत्तरकाशी में तत्काल लगभग 121 वन कर्मियों को इसके लिये दोषी ठहराया गया था, किन्तु रक्षासूत्र की मुख्य मांग यह थी कि वन निगम में अमूल-चूल परिवर्तन होना चाहिये और वनों पर वनों के नजदीक रहने वाले लोगों के द्वारा ही संरक्षण, विदोहन तथा नियोजन का कार्य किया जाना चाहिये और वन विभाग को इसके लिए गांववासियों का मार्गदर्शन करना चाहिये, जिसके लिये कई बार सभा-शिविर, सम्मेलन, प्रैसवार्तायें, वन अध्ययन आदि को माध्यम बनाया गया था। जबकि इन्ही दिनों हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान ने रक्षासूत्र आन्दोलन की भावना को रचनात्मक रूप देने के लिए टिहरी व उत्तरकाशी के लगभग 100 गांवों में ‘‘ग्राम वन’’ की स्थापना की है। आज के दिन ‘‘ग्राम वन’’ में गांव की महिलायें हर वर्ष पेड़ो पर राखी बांधती है। दो दशक पूर्व आरम्भ हुई वन बचाने की यह भावनात्मक परम्परा अब तो लाक परम्परा बन चुकी है। यहां तक की स्कूल, काॅलेज, महिला समूह/महिला मंगलदल व युवक मंगलदल इस अभियान के हिस्से स्वस्फूर्त बन रहे है।
इस आन्दोलन की ताकत यह बन गयी कि लोग अब अपने-अपने ‘‘ग्राम वन’’ में परम्परागत तरीके से वन संरक्षण का यत्न करते हैं कि जैसे पेड़ पर रक्षासूत्र बांधना गांव आधारित वन चैकीदारी व्यवस्था को पुर्नजीवित किया गया है। वन चैकीदार का जीवन निर्वाह गांव वालों पर ही निर्भर रहता है। इसके कारण गांव वालों की चारापत्ती, खेती, फसल सुरक्षा, जंगली जानवरों से सुरक्षा तथा पड़ोसी गांव से भी जंगल की सुरक्षा की जाती है। जिससे कि महिलाओं के कष्टमय जीवन को राहत मिलती है। इसके अलावा वन संरक्षण व संवर्द्धन के साथ-साथ जल संरक्षण के काम को भी अनिवार्य रूप से वर्षभर किया जाता है। जिसमें वे महिलाये चाल-खाल (रेन वाटर हार्वेसटिंग पौण्ड) का निर्माण परस्परता से करती है। यही नहीं रक्षासूत्र आन्दोलन से जुड़ी महिलायें अग्नि सुरक्षा के लिए वन विभाग की मोहत्ताज नहीं हैं। कह सकते हैं कि आज भी रक्षासूत्र आन्दोलन की थाती कहे जाने वाले टिहरी-उत्तरकाशी के वे 100 गांव की महिलायें वन संरक्षण की असली प्रहरी है।
रक्षासूत्र आन्दोलन के प्रणेता सुरेश भाई के साथ मिलकर इस भावनात्मक आन्दोलन को श्रीमती मन्दोदरी देवी, श्रीमती जेठी देवी, श्रीमती सुशीला पैन्यूली, श्रीमती सुमती नौटियाल, श्रीमती बंसती देवी, श्रीमती मीना नौटियाल, श्रीमती कुंवरी कलूडा, श्रीमती गंगा देवी चैहान, हिमला उनियाल, श्रीमती उमा देवी, और क्षेत्र की तमाम वे महिलाये जो मुख्य रूप से दिखोली, चैदियाट गांव, खवाडा, भेटी, बूढाकेदार, हर्षिल, मुखेम आदि कई गांवों की सैकड़ांे महिलायें आन्दोलन के शुरूआत से ही नेतृत्व सम्भाल रही है। रक्षा सूत्र आन्दोलन की सफलता ने वनों के प्रति एक नई दृष्टि को जन्म दिया। इसके बाद उत्तराखण्ड में विभिन्न इलाको में विभिन्न मुद्दों को लेकर वनान्दोलन चलने लगे। किन्तु रक्षासूत्र आन्दोलन हर वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर बन बचाओं हेतु वन सम्मेलन करवाते है, जिसमें प्रत्येक क्षेत्र से कार्यकर्ताओं द्वारा वन सम्बन्धी जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है। आन्दोलन की खास बात यह है कि रक्षासूत्र आन्दोलन से जुडे कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष सघन वृक्षारोपण के साथ-साथ वनों को बचानें के लिये पेडों पर रक्षा बन्धन करवाते है, ताकि लागों की इन पेडांे से आत्मीयता बंधे और वनांे का व्यावसायिक दोहन न हो सके। उत्तराखण्ड में वन निगम की सम्पूर्ण गतिविधियों के कारण ही लोगों ने चिपको के बाद पेडों पर रक्षा सूत्र (राखी) बांधे और वन विकास निगम में आमूल चूल परिवर्तन की मांग करते आ रहे हैं। जबकि 1994 में केन्द्रीय वन एंव पर्यावरण मन्त्रालय ने तत्काल उत्तरप्रदेश सरकार को उतराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में वनो के अवैध कटान के संबंध में जांच कर आवश्यक कार्यवाही के निर्देश भी दिये थे।
रक्षासूत्र आन्दोलन द्वारा गठित ‘‘उत्तराखण्ड वन अध्ययन जन समिति’’ ने अपने एक रिपोर्ट में कहा कि अविभाजित उत्तरप्रदेश वन निगम को प्रतिवर्ष जो करोडो रूपयों का लाभ मिला था उसमें 80 प्रतिशत लाभ उत्तराखण्ड के वनों के कटान से प्राप्त होता था लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार ने उतराखण्ड राज्य की नब्ज को समझते हुए यह करोड़ो की राशी अब तक नहीं लौटायी। आन्दोलन का मानना है कि यहां विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की बात अधिक हो रही है और संरक्षण की योजना का पूर्ण आभाव सा लगता है। चिपको के बाद रक्षासूत्र आन्दोलन केवल पेड़ बचाने तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि जल, जंगल, जमीन की एकीकृत समझ बढ़ाने के प्रति लोगों को जागरूक करता आ रहा है, फलस्वरूप इसके उत्तराखण्ड नदी बचाओ अभियान भी प्रारम्भ हुआ है। रक्षाबंधन के अवसर पर पर्वतीय क्षेत्र की महिलाओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पेड़ों पर राखी बांधकर एक भावनात्मक रिश्ता पेड़ों से जोड़ा है। ‘‘ऊँचाई पर पेड़ रहेंगे, नदी ग्लेशियर टिके रहेंगे’’ के नारों के साथ पेड़ों को भाई के रूप में राखी बांधी जाती है। यह कहना है रक्षासूत्र आन्दोलन के प्रणेता सुरेश भाई का।
(प्रेम पंचोली, देहरादून, मो॰-9411734789)
Wednesday, July 23, 2014
मुगालते में जनजाति समुदाय: नहीं बना जनजाति सलाहकार परिषद
प्रेम पंचोली
भूमि अधिकार मंच के तत्वाधान में आज राज्य की पांचो जनजातियों के लोगो ने देहरादून स्थित सुरभी पैलेस चकराता रोड में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की है। कार्यशाला में मुख्य रूप से जनजाति सलाहकार परिषद् और जनजाति उपयोजना के दुरूपयोग को लेकर लोगो ने कई सवाल खड़े किये है। कार्यशाला के मुख्य अथिति सेवानिवृत्त आईएएस सुरेन्द्र सिंह पांगती ने कहा कि संविधान की 244वी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया कि जिन राज्यो में जनजातियां है वहां पर राज्य की जिम्मेदारी है कि उनके हित में त्वरित रूप से जनजाति सलाहकार परिषद का गठन कर देना चाहिए। उत्तराखण्ड राज्य में अब तक नहीं हो पाया है। उन्होने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि चूंकि उन्होने बकायदा राज्य सरकार को परिषद बावत एक दस्तावेज दिया जिसे तत्काल तिवारी की सरकार ने केन्द्र को भेज दिया था और केन्द्र ने भी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करवा करके साल 2010 में राज्य सरकार को भेज दिया था कि राज्य सरकार परिषद का गठन और उसकी नियमावली बनवा करके परिषद को जनजातियों के विकास के लिए कार्य करने की क्षमता प्रदान की जाये। कहा कि यह कोई कानून और शासनादेश का मामला नही है बल्कि यह तो संविधान समत्त मामला है जो नही हो पा रहा है। कहा कि जब वे प्रशासनिक सेवा में अविभाजित उप्र में थे तो वहां भी उन्होने तत्काल की सरकार को इस परिषद को बनाने का सुझाव दिया था। चूंकि अब राज्य बन गया है तो जनजाति सलाहकार परिषद अब तक क्रियाशील बन जाना चाहिए था सो नही बना। इससे लगता है िकइस प्रदेश के राजनीतिक कार्यकर्ता किंकर्तव्यमूढ हो गये हैं।
कार्यशाला में पैनल ग्रुप के मुख्य वरिष्ठ साहित्यकार रतनसिंह जौनसारी ने कहा कि राज्य बनने के 14 वर्षो में जनजाति सलाहकार परिषद का गठन ना होना चिन्ता का विषय है। उन्होन कहा कि यह मामला तो सब राजनीतिक महत्वकांक्षाओ के कारण फंसता जा रहा है। उन्होने सुझाव दिया कि जनजातियो को अब इस कार्य के लिए संगठनात्मक कार्यवाही करनी होगी और सरकार से पूछा जाना चाहिए कि जब केन्द्र सरकार से परिषद गठन की अनुमति मिल चुकि है तो इस प्रदेश में जनजातियो को प्रतिनिधित्व करने वाले कहां सो रखे है। बीज बचाओ आन्दोलन के प्रणेता बीजू नेगी ने कहा कि इस प्रदेश में पाच जनजातिया है और इन जातियों का प्रतिनिधित्व दो-दो विधायक करते है। यहां तक कि जनजाति से एक विधायक तो कैबिनेट मंत्री तक है। उन्होने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि यही वजह है कि जनजाति उपयोजना का बजट ठीक तरिके से खर्च भी नहीं हो पा रहा है। पद्मश्री अवधेश कौशल ने कहा कि पांचो जनजातियो की समस्य अलग-अलग है परन्तु जौनसारी जनजाति की समस्या आज भी ज्यों की त्यूं है। उन्होने कहा कि आज भी जौनसार क्षेत्र में बंधुवा मजदूरी जैसी समस्या उस जनजाति क्षेत्र के दलितो के साथ खड़ी है जबकि 1976-77 में 19 हजार बंधुवा मजदूर सरकार ने पुनर्वास करवाये थे। सरकार को चाहिए कि वे जौनसार क्षेत्र में बंधुवा मजदूरी को लेकर पुर्ननिरिक्षण करवायें कि जनजाति का इस क्षेत्र में कितना फायदा हुआ है।
यह दीगर है कि संविधान समत्त जैसे कार्यो को नजरअन्दाज करना सरकार की मानसिकता को दर्शाता है कि जो अब तक जनजाति सलाहकार परिषद का गठन तक नहीं किया गया तो वहीं जनजाति उपयोजना का जनजाति क्षेत्र में ठीक तरिके से इस्तेमाल ना होना विउम्बना ही कहा जायेगा। उल्लेखनीय तो यह है कि उत्तराखंड की पांच जनजातियों का आनुपातिक क्रम में देखे तो थारू जो कि उत्तराखंड की कुल जनजातीय आबादी का 33 प्रतिशत है , इसी तरह से जौनसारी क्रमश 32.5 , बोक्सा 18.3, भोटिया 14.2 तथा वनराजी जिनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है 7.50 प्रतिशत हैं।
कार्यशाला में वक्ताओ ने कहा कि यह आवश्यकता राज्य बनने के दौरान से ही महसूस की जा रही है कि इन जनजातियों को संगठनात्मक कौशल की जरुरत है ताकि यह अपने अधिकारों की बात सरकार के सामने पुख्ता तरीके से रख सकें। जबकि पिछले कई वर्षो से भूमि अधिकार मंच के माध्यम से विभिन्न कार्यकर्मो के द्वारा सरकार के संज्ञान में जनजातियों की कई मांगो को रखा गया। जिसमें प्रमुख रूप से वनाधिकार अधिनियम का सुचारू क्रियान्वयन, जनजातीय सलाहकार परिषद् का गठन और जनजाति उपयोजना का दुरूपयोग।
बताया गया कि इन मुद्दों पर जब भी संगठन के सदस्यों द्वारा जवाब माँगा गया तो शासन की हिलाहवाली सामने आयी। मात्र शासन द्वारा जनजाति सलाहकार परिषद् के गठन को लेकर आश्वासनों का दौर जारी रखा गया। दो वर्ष पहले भारी जन दबाव के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री विजय बहुगुणा ने भी सितारगंज में 15 अगस्त 2012 तक जनजाति सलाहकार परिषद् के गठन की घोषणा भी कर दी थी जो की मामला अभी भी ठन्डे बस्ते में ही है।
ज्ञात हो कि भारतीय संविधान के 244 के अनुच्छेद 4 के अनुसार राष्ट्पति की सिफारिश पर ऐसे राज्यों में जहाँ जनजातियां निवास करती हैं जनजाति सलाहकार परिषद् का गठन को राज्यो को अनिवार्य रूप में करना बताया गया है। अर्थाथ जनजाति बहुल इलाकों में जनजाति सलाहकार परिषद् की प्रासंगिकता से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परिषद् के अभाव में किस तरह जनजाति उपयोजना के बजट का दुरूपयोग होता आ रहा है। जनजाति उपयोजना एक ऐसी योजना है जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार कुल बजट का लगभग 3 प्रतिशत जनजातियों के उत्थान के लिए आरक्षित रखती है। लेकिन अभी तक इस बजट को लेकर कोई वित्तीय योजना सरकार के पास नहीं है। जनजाति उपयोजना के बजट को लेकर प्रावधान है कि यह पैसा जनजाति समुदाय से जुड़े ऐसे कामो पर खर्च किया जाएगा जिसका सीधा लाभ जनजाति समुदाय को मिलेगा। यानि इसका मतलब यह है कि जहाँ जनजातियों की बसावट है उन्ही जगहों पर इस पैसे का इस्तेमाल किया जाएगा। उदाहरण के लिए सार्वजनिक सडको का दुरुस्तीकरण इस पैसे से किया जा रहा है जबकि यह तर्कसंगत नहीं है। एक दूसरा उदहारण कालसी ब्लाक की ग्राम सलगा का है जनजाति उपयोजना के अंतर्गत कालसी ब्लाक के लिए अट्ठारह लाख रूपये आवंटित किये गए थे यानी यह पैसा कालसी ब्लाक के लगभग 249 गाँव में खर्च किया जाना था लेकिन मजे की बात यह है कि इसमें से 9 लाख रूपये उपर्युक्त ग्राम पंचायत को सामुदायिक बरात घर बनाने के लिए दिये गये। स्पष्ट है कि यह काम बिना किसी जोड़तोड़ और जुगाड़ के संभव नहीं था। किसी भी योजना की सार्थकता तभी है जब वह उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसके लिए बनाई गयी है। लेकिन उत्तराखंड के सन्दर्भ में ऐसा हो नहीं पा रहा है।
कार्यशाला में फाईण्ड योर फीड के नीलेश मुंजे, हीरा जंगपांगी, जया मिश्रा, कु॰ विमला जौनसारी, अरविन्द जी, स्वगता कैंथोला, योगेश घ्यानी, इन्द्र सिंह नेगी, भारत चैहान, दौलत कुंवर, ध्वजवीर, सुरेन्द्र जोशी, प्रेम पंचोली आदि लोग सम्मलित थे। कार्यशाला का आयोजन फाईण्ड योर फीड ने के द्वारा किया गया है।
-ः जनजाति सलाहकार परिषद को लेकर 23 जुलाई को मुख्यमंत्री को सौंपेगे 11 हजार हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन
-ः जनजाति क्षेत्र के गांव-गांव में चलाया जायेगा जनजाति उपयोजना और सलाहकार परिषद को लेकर अभियान
-ः यदि समय रहते परिषद का गठन नहीं हुआ तो सड़को पर उतरेंगे जनजाति क्षेत्र के लोग
सम्पर्क - 9760077581
मुगालते में जनजाति समुदाय: नहीं बना जनजाति सलाहकार परिषद
प्रेम पंचोली
भूमि अधिकार मंच के तत्वाधान में आज राज्य की पांचो जनजातियों के लोगो ने देहरादून स्थित सुरभी पैलेस चकराता रोड में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की है। कार्यशाला में मुख्य रूप से जनजाति सलाहकार परिषद् और जनजाति उपयोजना के दुरूपयोग को लेकर लोगो ने कई सवाल खड़े किये है। कार्यशाला के मुख्य अथिति सेवानिवृत्त आईएएस सुरेन्द्र सिंह पांगती ने कहा कि संविधान की 244वी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया कि जिन राज्यो में जनजातियां है वहां पर राज्य की जिम्मेदारी है कि उनके हित में त्वरित रूप से जनजाति सलाहकार परिषद का गठन कर देना चाहिए। उत्तराखण्ड राज्य में अब तक नहीं हो पाया है। उन्होने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि चूंकि उन्होने बकायदा राज्य सरकार को परिषद बावत एक दस्तावेज दिया जिसे तत्काल तिवारी की सरकार ने केन्द्र को भेज दिया था और केन्द्र ने भी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करवा करके साल 2010 में राज्य सरकार को भेज दिया था कि राज्य सरकार परिषद का गठन और उसकी नियमावली बनवा करके परिषद को जनजातियों के विकास के लिए कार्य करने की क्षमता प्रदान की जाये। कहा कि यह कोई कानून और शासनादेश का मामला नही है बल्कि यह तो संविधान समत्त मामला है जो नही हो पा रहा है। कहा कि जब वे प्रशासनिक सेवा में अविभाजित उप्र में थे तो वहां भी उन्होने तत्काल की सरकार को इस परिषद को बनाने का सुझाव दिया था। चूंकि अब राज्य बन गया है तो जनजाति सलाहकार परिषद अब तक क्रियाशील बन जाना चाहिए था सो नही बना। इससे लगता है िकइस प्रदेश के राजनीतिक कार्यकर्ता किंकर्तव्यमूढ हो गये हैं।
कार्यशाला में पैनल ग्रुप के मुख्य वरिष्ठ साहित्यकार रतनसिंह जौनसारी ने कहा कि राज्य बनने के 14 वर्षो में जनजाति सलाहकार परिषद का गठन ना होना चिन्ता का विषय है। उन्होन कहा कि यह मामला तो सब राजनीतिक महत्वकांक्षाओ के कारण फंसता जा रहा है। उन्होने सुझाव दिया कि जनजातियो को अब इस कार्य के लिए संगठनात्मक कार्यवाही करनी होगी और सरकार से पूछा जाना चाहिए कि जब केन्द्र सरकार से परिषद गठन की अनुमति मिल चुकि है तो इस प्रदेश में जनजातियो को प्रतिनिधित्व करने वाले कहां सो रखे है। बीज बचाओ आन्दोलन के प्रणेता बीजू नेगी ने कहा कि इस प्रदेश में पाच जनजातिया है और इन जातियों का प्रतिनिधित्व दो-दो विधायक करते है। यहां तक कि जनजाति से एक विधायक तो कैबिनेट मंत्री तक है। उन्होने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि यही वजह है कि जनजाति उपयोजना का बजट ठीक तरिके से खर्च भी नहीं हो पा रहा है। पद्मश्री अवधेश कौशल ने कहा कि पांचो जनजातियो की समस्य अलग-अलग है परन्तु जौनसारी जनजाति की समस्या आज भी ज्यों की त्यूं है। उन्होने कहा कि आज भी जौनसार क्षेत्र में बंधुवा मजदूरी जैसी समस्या उस जनजाति क्षेत्र के दलितो के साथ खड़ी है जबकि 1976-77 में 19 हजार बंधुवा मजदूर सरकार ने पुनर्वास करवाये थे। सरकार को चाहिए कि वे जौनसार क्षेत्र में बंधुवा मजदूरी को लेकर पुर्ननिरिक्षण करवायें कि जनजाति का इस क्षेत्र में कितना फायदा हुआ है।
यह दीगर है कि संविधान समत्त जैसे कार्यो को नजरअन्दाज करना सरकार की मानसिकता को दर्शाता है कि जो अब तक जनजाति सलाहकार परिषद का गठन तक नहीं किया गया तो वहीं जनजाति उपयोजना का जनजाति क्षेत्र में ठीक तरिके से इस्तेमाल ना होना विउम्बना ही कहा जायेगा। उल्लेखनीय तो यह है कि उत्तराखंड की पांच जनजातियों का आनुपातिक क्रम में देखे तो थारू जो कि उत्तराखंड की कुल जनजातीय आबादी का 33 प्रतिशत है , इसी तरह से जौनसारी क्रमश 32.5 , बोक्सा 18.3, भोटिया 14.2 तथा वनराजी जिनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है 7.50 प्रतिशत हैं।
कार्यशाला में वक्ताओ ने कहा कि यह आवश्यकता राज्य बनने के दौरान से ही महसूस की जा रही है कि इन जनजातियों को संगठनात्मक कौशल की जरुरत है ताकि यह अपने अधिकारों की बात सरकार के सामने पुख्ता तरीके से रख सकें। जबकि पिछले कई वर्षो से भूमि अधिकार मंच के माध्यम से विभिन्न कार्यकर्मो के द्वारा सरकार के संज्ञान में जनजातियों की कई मांगो को रखा गया। जिसमें प्रमुख रूप से वनाधिकार अधिनियम का सुचारू क्रियान्वयन, जनजातीय सलाहकार परिषद् का गठन और जनजाति उपयोजना का दुरूपयोग।
बताया गया कि इन मुद्दों पर जब भी संगठन के सदस्यों द्वारा जवाब माँगा गया तो शासन की हिलाहवाली सामने आयी। मात्र शासन द्वारा जनजाति सलाहकार परिषद् के गठन को लेकर आश्वासनों का दौर जारी रखा गया। दो वर्ष पहले भारी जन दबाव के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री विजय बहुगुणा ने भी सितारगंज में 15 अगस्त 2012 तक जनजाति सलाहकार परिषद् के गठन की घोषणा भी कर दी थी जो की मामला अभी भी ठन्डे बस्ते में ही है।
ज्ञात हो कि भारतीय संविधान के 244 के अनुच्छेद 4 के अनुसार राष्ट्पति की सिफारिश पर ऐसे राज्यों में जहाँ जनजातियां निवास करती हैं जनजाति सलाहकार परिषद् का गठन को राज्यो को अनिवार्य रूप में करना बताया गया है। अर्थाथ जनजाति बहुल इलाकों में जनजाति सलाहकार परिषद् की प्रासंगिकता से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परिषद् के अभाव में किस तरह जनजाति उपयोजना के बजट का दुरूपयोग होता आ रहा है। जनजाति उपयोजना एक ऐसी योजना है जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार कुल बजट का लगभग 3 प्रतिशत जनजातियों के उत्थान के लिए आरक्षित रखती है। लेकिन अभी तक इस बजट को लेकर कोई वित्तीय योजना सरकार के पास नहीं है। जनजाति उपयोजना के बजट को लेकर प्रावधान है कि यह पैसा जनजाति समुदाय से जुड़े ऐसे कामो पर खर्च किया जाएगा जिसका सीधा लाभ जनजाति समुदाय को मिलेगा। यानि इसका मतलब यह है कि जहाँ जनजातियों की बसावट है उन्ही जगहों पर इस पैसे का इस्तेमाल किया जाएगा। उदाहरण के लिए सार्वजनिक सडको का दुरुस्तीकरण इस पैसे से किया जा रहा है जबकि यह तर्कसंगत नहीं है। एक दूसरा उदहारण कालसी ब्लाक की ग्राम सलगा का है जनजाति उपयोजना के अंतर्गत कालसी ब्लाक के लिए अट्ठारह लाख रूपये आवंटित किये गए थे यानी यह पैसा कालसी ब्लाक के लगभग 249 गाँव में खर्च किया जाना था लेकिन मजे की बात यह है कि इसमें से 9 लाख रूपये उपर्युक्त ग्राम पंचायत को सामुदायिक बरात घर बनाने के लिए दिये गये। स्पष्ट है कि यह काम बिना किसी जोड़तोड़ और जुगाड़ के संभव नहीं था। किसी भी योजना की सार्थकता तभी है जब वह उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसके लिए बनाई गयी है। लेकिन उत्तराखंड के सन्दर्भ में ऐसा हो नहीं पा रहा है।
कार्यशाला में फाईण्ड योर फीड के नीलेश मुंजे, हीरा जंगपांगी, जया मिश्रा, कु॰ विमला जौनसारी, अरविन्द जी, स्वगता कैंथोला, योगेश घ्यानी, इन्द्र सिंह नेगी, भारत चैहान, दौलत कुंवर, ध्वजवीर, सुरेन्द्र जोशी, प्रेम पंचोली आदि लोग सम्मलित थे। कार्यशाला का आयोजन फाईण्ड योर फीड ने के द्वारा किया गया है।
-ः जनजाति सलाहकार परिषद को लेकर 23 जुलाई को मुख्यमंत्री को सौंपेगे 11 हजार हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन
-ः जनजाति क्षेत्र के गांव-गांव में चलाया जायेगा जनजाति उपयोजना और सलाहकार परिषद को लेकर अभियान
-ः यदि समय रहते परिषद का गठन नहीं हुआ तो सड़को पर उतरेंगे जनजाति क्षेत्र के लोग
सम्पर्क - 9760077581
Monday, July 7, 2014
वे आन्दोलनकारी नहीं बल्कि संस्कृतिकर्मी हैं
प्रेम पंचोली
उत्तराखण्ड पहाड़ी राज्य में ‘‘ढोल’’ के बिना कोई भी कार्य अधूरा माना जाता है चूंकि वर्तमान परिस्थितियों में ढोल व ढोली लुप्त प्रायः ही हो रहे है। इसके कई और कारण हो सकते है लेकिन ढोल का महत्व समझे बिना भी आगे बात करनी बेइमानी ही होगी। बताते चले कि इस पहाड़ी राज्य में बारह माह के बारह त्यौहार होते ही है। उदाहरणतः प्रत्येक माह की संक्रान्ती के दिन जो पूजा घरों व ‘‘देव स्थलों’’ मंे होती है वह ढोल की थाप पर ही आरम्भ होती है। मंदिरों में तो बाकायदा पण्डित जी जितने करतब पूजा-अर्चना बावत करता है उतने ही प्रकार के ताल मंदिर से कुछ गज दूर बैठा ‘‘ढोली’’ ढोल पर ध्वनी की उदŸा तरंगो से देता है। यहां बता दें कि यही नहीं यह ढोली अपने ढोल को कंधो पर उठाकर बड़े उल्लास के साथ फिर गांव की प्रत्येक देहरी पर ढोल की थाप देता है और लोग तब अपने-अपने घरो में संक्रान्ती का पूजन आरम्भ करते है। तीज-त्यौहारों में भी यह ढोल जहां लोगों को गांव की चैपाल पर एकत्रित होने का आमन्त्रण देता है वहीं लोगों के मंनोरंजन करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है। इसी तरह शादी-विवाह मंे भी ढोल व ढोली का अलग ही महत्व है। वे बारात के स्वागत से लेकर विदाई तक अपने ढोल के साथ पग-पग पर समारोह में उल्लास भरने में बेमिसाल उपस्थिति दर्ज करते हैं।
इसके अलावा जिस तरह वे शुभ अवसर पर ढोल की थाप को देने में मुस्तैद रहते हैं उसी तरह वे दुखः की घड़ी में भी उसी ढोल पर ऐसे स्वर-तालो की मार्मिक धुन प्रस्तुत करके दुखः के समय में गमगीन माहौल को भुलाने और भविष्य में कैसे अच्छा समय आये ऐसा वे शोक संदेश की ‘ताल लहरी’ का प्रवाह करते हैं। दरअसल यह कार्य तो ढोली समाज के लोग करते आये है और यह सचमुच में संस्कृति को भी बनाये हुए हैं।
संस्कृति के वनिस्पत वे अन्य सामाजिक प्रतिबद्धताओं पर भी खरा उतरतें हैं। देश-दुनियां में जितने भी जनआन्दोलन होते है उन आन्दोलनो की धार तेज करने में इनकी ढोल की थाप कमतर नहीं है। आगे ढोल और पीछे जुलूस ऐसा नजारा ही सम्पूर्ण आन्दोलन की शक्ल को प्रस्तुत करता आया है। जुलूस में सबसे आगे, स्वागत के लिए अगवानी, मेलो एवं नुमाईश में ढोल एवं ढोली की अनिवार्यता, तमाम सामाजिक गतिविधियो में जब ढोल की अनिवार्यता है तो फिर भी ढोली को असमानता का दंश झेलना ही पड़ता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ढोली एक संस्कृतिकर्मी भी है तो वह आन्दोलनकारी भी है।
परन्तु इससे आगे वह एक खास प्रकार का शिल्पी ‘‘दर्जी एवं नाई’’ के रूप में रहा है। बहरहाल वर्तमान में ढोली के इनमें से एक हुनर को अन्य विरादरियों ने अपनाया हो लेकिन ढोली विरादरी को यह कार्य विरासत में ही मिला है। अब तो मेलो एवं नुमाईशो की शक्ले सरकारी बजट ने बदली दी है। उत्तरकाशी जनपद के दूरस्थ गांव कण्डाऊं के बचन दास जो ढोल सागर के ममज्र्ञ है वे कहते है कि ढोल सागर जैसे शास्त्र में पैदा होने से लेकर मृत्यु तक के अलग-अलग आयामो के ‘‘श्लोक’’ है जो मनुष्य को सौहार्दपूर्ण व्यवहार की दिशा अख्तियार करता है। कहते है कि जब से भौण्डा प्रवृत्ति के बैण्ड बाजो ने गांवों में दस्तक दी है तब से ढोल व ढोली का अस्तित्व ही संकट में है। यही नहीं तब से वैमनस्य की भावना समाज मंे ज्यादा ही दिखाई दे रही है। वह यह भी मानते है जब ‘‘ढोल’’ के बिना कोई भी कार्य अधूरा है तो ढोली के साथ होता आया भेदभाव ही ‘‘ढोल’’ पर संकट का एक कारण है। टिहरी के ढोल वादक सोहन लाल बताता है कि कुछ दिन तो ढोल बजाने से राशन चल ही जाता है। आगे उन्होंने कहा कि यदि गांव की बारात में जाना होता है तो रात्री विश्राम के लिए गौशाला ही नसीब होती है। इसके अलावा उŸारकाशी के सोहन दास, फूल दास, पिनाठिया दास, चमन दास चमोली के दिवानी राम, पिथौरागढ के भुवनराम देहरादून जौनसार क्षेत्र के सीन्नाराम जैसे ढोल वादक कहते हैं कि उन्हे प्रदर्शन के पश्चात ना तो एक तयशुदा मजदूरी मिलती है और ना ही उन्हे मान समान दिया जाता है। कहा कि जब तक ढोल नहीं बजेगा तब तक कोई भी कार्य आरम्भ ही नही होता। जन्म से लेकर मृत्यु तक ढोल की आवश्यकता यहां के समाज को है। फिर भी ढोली समाज अछूता है।
सनद रहे कि देश भर मंे आयोजित व स्वस्फूर्त राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आन्दोलनों में ढोल एक मुख्य कड़ी हैं इसकी गुंजायमान एक ही थाप लोगों को सोचने के लिए विवश कर देती है। लोक संस्कृति का संवाहक कहे जाने वाले ढोल की अन्य प्रतिस्पर्धा मंे भी एक खासा स्थान है।
हंसने की ताल, रोने की ताल, लड़ने की ताल, उŸोजना की ताल, जोड़ने की ताल, नाचने की ताल, खेलने की ताल, आमन्त्राण की ताल, रूकने की ताल, बधाई संदेश की ताल, झकझोरने की ताल, देव अवतार की ताल पूजने व विसर्जन की ताल, सन्देश पहंुचाने की ताल, न जाने इस ढोल मंे हजारों ताल समाये है। इस सम्पूर्ण ढोल सागर की संगीत विद्या पर अध्ययन करने की आज की आवश्यकता है। हालांकि हेमवन्ती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर मंे ‘‘ढ़ोल के संरक्षण’’ बावत एक केन्द्र स्थापित हुआ था और कुछ कार्य भी हुए थे परन्तु वर्तमान मंे यह केन्द्र ढ़ोल को भुलाया बैठा और ‘‘नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा’’ की तर्ज पर कार्य करने लग गया है। कहा जा सकता है कि ढोल व ढोली पर एक बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है। अब ढोल सिर्फ लोक संस्कृति कहे जाने तक ही सिमटता जा रहा है।
सामाजिक ताने-बाने मंे ढोली समाज अब हाशिये पर खड़ा हो चुका है। परन्तु ढोली समाज के लोग संस्कृति का बोेझ ढोने के लिए आज भी तैयार है।
.02.
ढोल और ढोल सागर
ढोल सागर भी एक महा ग्रन्थ है। उत्तराखण्ड मे इस ढोल की गाथा का इतिहास पांच हजार साल पुराना बताया जाता है। ढोल वादन के पारखी मंत्र तंत्र के अलावा जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी आयामो में ढोल की अनूगूंज का अनूठा प्रस्तुतिकरण करते है और इस ढोल के बिना उत्तराखण्ड में कोई भी शुभ-अशुभ कार्य आरम्भ नहीं होता है। सन्1926 से पहले ढोल विद्या मौखिक थी 1932 में पहली बार भवानी दत्त पर्वतीय ने ढोल सागर पुस्तिका प्रकाशित की। 60 के दशक में मोहन लाल बाबुलकर ने नद नंदनी पुस्तक लिखी जो आज भी अप्रकाशित है। 70 के दशक मे केशव अनुरागी,1976 मे अनूप चंदोला ने ढोल सागर पर किताब लिखी तो इन्ही दिनो प्रो.विजय कृष्ण ने शोध किया। 90 के दशक में आस्ट्रेलिया के न्यू इंग्लैण्ड विवि के प्रो.एन. रुवी ओल्टर ने डासिंग विद देवतास पुस्तक लिखी। कुलमिलाकर ढोल और ढोली पर पुस्तकें तो लिखी गयी परन्तु उस ढोली बिरादरी की आजीविका पर आज तक कोई सकारात्कम पहल सामने नहीं आई है।
.03.
आन्दोलनकारी जो अब तक घोषित न हो सके-चन्द्र सिंह, सेनि॰ आईएएस॰
रामपुर तिराहा काण्ड के बारे में मुझे बारीकी से इसलिए जानकारी हुई थी,चूंकी मैं 02 अक्टूबर 1994 को स्वयं उपाध्यक्ष हरिद्वार विकास प्राधिकरण के पद पर तैनात था। घटना की सूचना मिलने पर मैं भी रुड़की राजकीय चिकित्सालय मे जख्मी आन्दोलनकारियो को देखने गया था।
तत्काल जिलाधिकारी चमोली रहते हुए भी कई बार आन्दोलनकारियों को मिलने के लिऐ गैरसैण जाना पड़ा और आन्दोलन को उग्र होने से बचाने का प्रयास किया। सभी गांवो से जितने भी आन्दोलनकारियों की टोलियां मुख्य बाजारो एवं मुख्य स्थानो पर एकत्रित होती थी, की अगवाई ढोल, नगाड़ा, रणसिंगा, तथा भेरी से स्थानीय बाजगी स्वतःस्पूर्त आन्दोलन के हिस्से के रूप में भाग लेते हुऐ मैने स्वयं देखा था। मेरी जानकारी मे सभी आन्दोलनकारी बाजगीयो सहित दिन भर भूखे रहते थे। यह कटु सत्य है कि आन्दोलन की अगवाई ढोल आदि लोक वाध्य यंत्रो की थाप से ही होती थी। जितनी अधिक ढोलो की संख्या उतना ही आन्दोलन में उत्साह बनता था। पता नहीं बाजगी समुदाय के लोग आन्दोलनकारियों की श्रेणी मे क्यों नहीं आऐ यह कौतुहल का विषय है। लिहाजा इसकी पुष्टी तत्कालीन जिलाधिकारियों से की जा सकती है। इस हेतु चिन्हित आन्दोलनकारी का कथन ही विश्वसनीय होगा।
सार्वजनिक स्वरूप के राष्ट्रीय महत्व के चारो धाम और राज्य स्तरीय व ग्राम स्तरीय जितने भी सार्वजनिक स्वरूप के मंदिर है,जिसकी व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 25(2)(ख)में दी गयी है, के अनुरूप बाजगीयो के मान तथा सम्मान की व्यवस्था की जा सकती है। बदलते परिवेश ने इनके पारंगत व्यवसाय की मजदूरी वही पुराने ढर्रे पर आंकी जाती है। खेद इस बात का है कि श्रम विभाग एवं राजस्व विभाग ने भी बंधुवा मजदूर/सामुहिक बंधुवा मजदूरो के साथ-साथ बाजगी समुदाय की स्थिति की न तो समीक्षा की और न ही वर्तमान स्थिति को जानने का प्रयास किया गया। उत्तराखड के अधिकांश हिस्सो में आज भी यह प्रथा मौजूद है कि मुर्दे की अर्थी के आगे-आगे ढोल बजाते हुऐ बाजगी को मुर्दाघाट तक जाना पड़ता है।
पŸाा - प्रेम पंचोली 140, रायपुर ढाल देहरा दून -248008, मो.9411734789,
Sunday, June 29, 2014
सरहद पार व्यापार कभी था गुलजार अब है विराना
किसी ने कहा है जहां हम खड़े हैं देश वहीं से शुरू होता है .परन्तु मैं जहां रहता हूँ वहाँ देश खत्म होता है .और यह सिर्फ मुहावरे के तौर पर ही नहीं बल्कि सचमुच ही .जोशीमठ भारत के सीमा का आखिरी प्रखंड है .इसकी सीमा फिर तिब्बत या चीन से मिलती है .और जिस तरह यह भौगोलिक तौर पर हाशिए पर यानी सीमान्त पर है उसी तरह विकास के पैमाने पर भी हाशिए पर ही है .
कुछ दिन पहले हम थैंग गांव के लोगों के साथ जोशिमठ के उपजिलाधिकारी से मिले .सवाल था कि पिछले पांच साल में थैंग मोटर मार्ग तीन किलोमीटर भी पूरा नहीं बन पाया है .जबकि इसे २०११ में १० किलोमीटर बन कर पूर्ण हो जाना था .इस सडक के लिए दी गयी राशि जबकि आधी से ज्यादा भुगतान की जा चुकी है .जो सडक बनी भी है उसका हाल ये कि पैदल चलना मुश्किल हो गया है . थैंग गांव जोश्मत से २२ किलोमीटर की दूरी पर बसा गांव है .सडक से लगभग १० किलोमीटर की दूरी है .वैसे जोशीमठ से चाहें तो थोडा नजरों पर जोर डालने पर दिखाई भी देता है .परन्तु आजादी के इतने साल बाद भे सड़क नहीं .जिस सड़क के पूरा होने की बात लोग जोह रहे हैं ,इस सडक के लिए सन २००५ में गांव के लोगों ने आंदोलन किया .आंदोलन के दौर में जब किसी तरह सुनवाई नहीं हुई तो लोगों ने सडक पर जाम लगा दिया .जिस पर तत्कालीन उपजिलाधिकारी के आदेश पर पुलिस ने ग्रामीणों पर लाठीचार्ज कर दिया .जिसमें कई महिलाएं व पुरुष घायल हुए .१७ ग्रामीणों पर मुकदमें हुए .आज भी लोग मुकदमों के फैसले के इन्तजार में हैं .लेकिन जिस के लिए ये सब झेला वो सड़क आज तक नहीं बनी .ऐसा ही गांव है .किमाना सडक से ८-९ किलोमीटर की पैदल खड़ी चढाई वाली दूरी पर .इसके बगल का गांव पल्ला .जखोला .ऐसे कई गांव हैं.
१९६२ से पहले जबकि भारत चीन युद्ध नहीं हुआ था ,जोशीमठ के रास्ते सीमापार ब्यापार होता था .यहाँ से भोटिया ब्यापारी उन और अन्य सामान लेकर जाते और वहाँ से नमक लेकर आते.जोशीमठ नीति माना के दर्रों को जाने व जोड़ने का संधिस्थल होने से ब्यापारिक मार्ग की वजह से व मुख्य पड़ाव तो था ही .मुख्य ब्यापारिक मंडी भी था .जिससे यहाँ के भोटया समुदाय व खेती पर निर्भर अन्य लोगों में समृधि थी .बदरीनाथ यात्रा का पड़ाव होने से इसका और भी महत्व रहा होगा .किन्तु भारत चीन युद्ध के उपरान्त इस स्थिति में बदलाव आया .भोटिया समुदाय जो पूरी तरह इस ब्यापार पर निर्भर था उसके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया .उसे मजबूरन खेती की तरफ रुख करना पडा .जोशीमठ के आस पास अधिकाँश जनजाति गांव आज भी इस झटके से नही उबरे .आज भी अधिकाँश भोटिया बहुल गांवों की स्थिती केसी आदिम जमाने के गांवों जैसी है .लाता से ऊपर के गांवों में जाइए तो आप बाकी दुनिया के हिस्से ही नहीं रह जाते .
१९९८ में भूकंप की त्रासदी के बाद बहुत से गांव जर्जर हो गए .उसके बाद की बरसातों की आपदा के चलते गांव बसावट लिहाज से असुरक्षित हो गए .लोगों के विस्थापन की मांग करने पर .सरकार द्वारा सर्वे करवाया गया .सन २००७ में प्रशाशन द्वारा बनाई गयी सूची के अनुसार जोशीमठ प्रखंड के ३० गांव विस्थापन की श्रेणी में रखे गए .१६ -१७ जून २०१३ की आपदा के बाद विस्थापित किये जाने वाले गांवों की संख्या बढ़कर ३६ हो गयी .जोशीमठ प्रखंड में कुल गांवों की संख्या ५२ ही है .जब ५२ में से ३६ गांव विस्थापन की श्रेणी में हों तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भौगोलिक ,भूगर्भिक तौर पर इस क्षेत्र की क्या स्थिति है .प्रशाशनिक व शाशन की हील हवाली का ये हाल है कि .जो गांव पिछले कई सालों से विस्थापन की मांग कर रहे हैं व बहुत दयनीय दशा में गांव में रह रहे हैं उनकी कोई सुनवाई नहीं है .इन्ही में एक गांव है गनाई ,यहां के लोग पिछले कई वर्षों से विस्थापन की मांग कर रहे हैं .पिछले छ माह से लगातार आंदोलन के बाव जूद कोई ठोस पहल इनके विस्थापन को लेकर नहीं हुई .गांव की हालत ये है कि ठोड़ी सी भी बरसात होने पर लोग जाग कर रात काटते हैं .गांव के एक हिस्से दाड्मी में कुछ लोग दो दृ बार घर बना चुके है .और दोनों बार उजाड गए .जब आंदोलन तेज हुआ तो स्थानीय विधायक राजेन्द्र भंडारी राहत के हेलीकाप्टर से गांव पहुँच गए .और १५ दिन में विस्थापन कर देने की घोषणा कर आंदोलन बंद करने को कह कर हवा हो गए .तबसे चार माह हो जाने पर लोग फिर सड़क पर हैं .यही हाल बाकी के विस्थापित होने वाले गांवों का है .१६-१७ जून को पूरी तरह तबाह हो गए गांव भ्युनदार के लोग भी लड़ हार कर थक गए .किन्तु उनके लिए विस्थापन हेतु भूमि का प्रबंध नहीं हुआ .आज वे उजाड गए गांव पुलना में ही किसी तरह गुजारा करने को मजबूर कर दिये गए हैं .
सन २००१ में जोशीमठ के लोग विष्णुप्रयाग परियोजना ,जिसे कि जयप्रकाश कंपनी बना रही थी का विरोध करने सडक पर उतरे .लोगों की मुख्या चिंता इस परियोजना की सुरंग बनाये जाने के लिए किये जा रहे विस्फोटन से क्षेत्र को पैदा हो रहे खतरे को लेकर थी .कुछ दिनों बाद नेर्तत्व कारियों का कम्पनी से समझौता हो गया और विस्फोट अबाध जारी रहे .पूरा क्षेत्र हिलता रहा.आन्दोलन इसकी बाद भी हुए.वादे आश्वाशन भी हुए पर .. ..परियोजना पूरी हो गयी .और कुछ समय बाद २००७ में इन विस्फोटों के परिणाम स्वरूप चाई गांव उजड गया .आज भी गाँव इन दरारों के खतरे में है .किन्तु इसके बाद सन २००४ में एक और परियोजना तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना का सर्वे यहाँ प्रारम्भ कर दिया गया .सर्वे की शुरुआत से ही जनता में इस परियोजना को लेकर आक्रोश था .जिस कारण इसका तभी से तीव्र विरोध होने लगा .जिसकी वजह जोशीमठ की भूगर्भीय स्थिति को लेकर लोगों में आशंका थी .जिसको लेकर १९७६ में बनी सतीश चन्द्र मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट ने आगाह किया था .इसके बावजूद जोशीमठ के नीचे से सुरंग बनाया जाना जनता को गवारा ना था .लिहाजा जबर्दस्त आंदोलन हुआ .इस आंदोलन की वजह से परियोजना का उद्घाटन ,जो कि जोशीमठ में होना था और मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी द्वरा किया जाना था .सारी तैय्यारियों के बावजूद निरस्त करना पडा .बाद में इस परियोजना का उद्घाटन परियोजना स्थल से ३०० किलोमीटर दूर देहरादून में किया गया .और ये सिलसिला यहीं नहीं रुका ,इसके बाद कई अन्य परियोजनाओं को स्वीकृति मिली .आज जोशीमठ प्रखंड में दर्जन भर परियोजनाएं या तो प्रस्तावित हैं अथवा कार्य कर रही हैं .जिन सभी पर स्थानीय लोगों की स्वीकृति बस नाम भर को कागजी खानापूर्ति के बतौर ही ली गयी .इनमें से लगभग सभी पर जनता की आपत्तियां हैं .आंदोलन हैं .
शिक्षा और स्वस्थ्य के सवाल पर भी हाशिए पर ही है जोशीमठ .सुदूर गांवों की शिक्षा की हालत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि अधिकाँश वहन कर पाने वाले लोग बच्चों को जोशीमठ नगर में लाकर पढाते हैं और नगर की शिक्षा प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं के हवाले है .५० -६० हजार की आबादी वाले जोशीमठ ब्लोक का एक मात्र प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र जोशीमठ में है .जिसमें चिकित्सकों का अभाव है .एक भी सर्जन नहीं है .महिलाओं के लिए बना अस्पताल वीरान बाजार पडा है .जबकि यात्रा काल में सडक दुर्घटनाओं के लिए अत्यंत संवेदनशील ये क्षेत्र इसी अस्पताल के भरोसे है जो सामान्य दिनों में ही रेफेरिंग सेंटर की तरह काम करता है .
देश की सेमा पर अत्यंत संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्र माना गया ये क्षेत्र तमाम तरह की उप्क्षाओं के चलते आज पलायन की तरफ अग्रसर है .गांवों से शहर की तरफ आने वाली आबादी में पिछले पांच सालों में तीव्र वृधि हुई है .सीमा के गांव अचानक तेजी से खाली होने शुरू हुए हैं .अपने बेहतर भविष्य की तलाश में ये संक्रमण तेजी से फैल रहा है .राज्य बन्ने के बाद एक एक कर टूटते सपनों के साथ व विकास की जन विरोधी नीतियों के चलते ये बढ़ेगा ही .फिर शायद हाशिए तो रहेंगे पर हाशिए पर रहने वाले ना रहें . -
हरीश चन्द्र - चन्दोला के साथ प्रेम पंचोली
Subscribe to:
Posts (Atom)
समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।
यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...
-
अब कहां सुनाई देगी धराली गांव में बच्चो की किलकारियां। सब कुछ तबाह कर दिया खीर गंगा की बाढ़ नें। ।। प्रेम पंचोली ।। गंगोत्री से ठीक 18 किमी...
-
प्रेम, दिवानगी और समसामयिकी विषयों का संग्रह है ‘वो साल चौरासी’ प्रेम पंचोली दुनियांभर में ‘प्रेम’ पर आज तक जो भी लिखा गया है वह कम ही स...
-
तुझे लौटना होगा कितना भावनात्मक शब्द है। मनुष्य में कोई ऐसा नहीं होगा जो इस शब्द से दूर रहा हो। इसी शब्द के आस पास ही उत्कृष्ट शिक्षक, उद्घो...


