Thursday, April 27, 2017


जी हां! इस जलस्रोत पर होती है ‘‘भूत’’ की स्तुति


प्रेम पंचोली


सीमान्त जनपद उत्तरकाशी में बहने वाली यमुना नदी में सैकड़ो छोटी-छोटी जल धारायें संगम बनाती है। इनमें से एक जलधारा यमुना नदी की दायीं ओर कुड़ गांव से निकलती है। जहां से यह जलधारा निकलती है वहां इस जलधारे को ‘‘भूत राजा का पन्यारा’’ कहते हैं। अर्थात राज्य के अन्य जलधारों के जैसे इस जलस्रोत का नाम देवताओं से नही बल्कि भूत के नाम से प्रचलित किया गया है। जो पहली बार इस जलस्रोत का नाम सुनेगा, वह एक बारगी जल आचमन करने से पहले चिन्ता में पड़ जायेगा। हालांकि इस जलस्रोत से कुड़ गांव के अनुसूचित जाति के लोगो की जीवन रेखा चलती है। वे इस पानी का भरपूर उपयोग करते हैं। बस उन्हे गम है तो इस जलस्रोत के नामाकरण से। कहते हैं कि उनके आस-पास सभी जलस्रोतो का नाम देवी-देवताओं से जुड़ा है परन्तु उनके जलस्रोत का नाम ‘‘भूतराजा का पन्यारा’’ क्यों हो गया? जो भी हो इस बहाने लोग जल संरक्षण के काम से जुड़े तो हैं।

गौरतलब हो कि उत्तराखण्ड राज्य में जितने भी जलस्रोत हैं उनका नामाकरण, संरक्षण व दोहन किसी न किसी देवी-देवता के नाम लिए बिना नहीं हो सकता। अब उत्तरकाशी के ‘‘कुड़ गांव’’ में एक ऐसा जलस्रोत है जिसे ‘‘भूत के नाम’’ से जाना जाता है। कह सकते हैं कि जल संरक्षण की यह प्रवृति भूत के बिना भी अधूरी रही होगी। इसलिए इस गांव की जलधारा भूत से संबोधित होती है। भूत के नाम से वैसे भी आस्तिक लोग डर जाते है। आम तौर पर हिन्दू शास्त्रों में भूत का मतलब ही डरावना होता है। जनाबा! क्या मजाल कि लोग इस जलस्रोत का गलत दोहन कर सकें। यही वजह है कि आज भी गांव में इस जलस्रोत से निकलने वाली धारा से लोगो की जलापूर्ती पूरी होती है। कभी भी यह जलधारा सूखी नहीं है। ग्रामीण कहते हैं कि कई दौर ऐसे आये कि गर्मीयों के मौसम में यमुना का पानी भी कम हो जाता है मगर ‘‘भूतराजा’’ की जलधारा सदाबहार रही।

बता दें कि कुड़ का सीधा अर्थ कुण्ड से है यह गांव कुण्ड जैसे आकार के स्थान पर बसा है। गांव की सरहद पर यह जलधारा आगन्तुको का स्वागत यूं करती है कि पथ-प्रदर्शक गांव में पंहुचते ही इस पानी को ‘‘अंजूली’’ में लेकर अपनी थकान उतारते हैं। पर गांव में पंहुचते ही इस जलधारे का नाम सुनकर एक बार चैंक जाते हैं। खैर, कुड़ गांव के ‘‘भूतराजा’’ नाम के जलस्रोत से निकलने वाली जल धारायें आगे जाकर सैकडों नाली कृषि भूमी को सिंचित करती है। यही नहीं इस पानी से सिंचित खेतो में उपज की मात्रा भी अधिक होती है। इस गांव के सिंचित खेतो में एक अलग प्रकार की स्वादिष्ट धाना की प्रजाति का उत्पादन होता है। जिसका रंग सफेद नहीं मैरूम/लाल होता है। स्थानीय लोग इस धान की प्रजाति को ‘‘लाल चावल’’ कहते है। कुड़ गांव में अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं। कुछ लोगो का मानना है कि जाति भेद को लेकर इस जलस्रोत का नाम भूत रखा होगा। आश्चर्य इस बात का है कि राज्य में अन्य जलस्रोतो का नाम देवताओं से जोडा गया, अपितु कुड़ गांव में यह अकेला जलस्रोत है जिसे ‘‘भूत के नाम’’ से प्रचारित किया गया।

लोक मतानुसार कालातीत में इस स्थान पर भूतों का वास था, बताते हैं कि बसासत से पहले भी यह जलस्रोत विद्यमान था। मौजूदा समय में इस जलस्रोत के पास एक पत्थर की आकृति है। जिस आकृति पर एक हाथ में डमरू, एक में त्रिशूल, एक में चक्र व एक में शंख रेखांकित किया हुआ है। भले यह मूर्ति छोटी जरूर है परन्तु इसकी बनावट ही अति-आकर्षक है। देखने में यह पत्थर की नक्कासीदार आकृति ‘‘शिवा’’ की लगती है। फिर भी मूर्ती के विपरित इस जलस्रोत का नाम रखा गया है। जबकि यह आकृति भी पाण्डव कालीन बतायी जा रही है। हालांकि वर्तमान में ‘‘कुड़ गांव के भूतराजा के पन्यारे’’ का भी सौदंर्यकरण हो चुका है। लोगो की आस्था आज भी इस जलस्रोत पर पूर्व के जैसी ही बनी हुई है। ग्रामीण इस जलस्रोत की पूजा करते हैं तो इसके पानी को पवित्र भी मानते है। बस उन्हे गम है तो इस जलस्रोत के नाम से।

Monday, April 17, 2017

शराब को हिंसा या कहें राजस्व का स्रोत?

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प्रेम पंचोली
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अर्थशास्त्रीयों का कहना है कि यदि 100 में से 100 का घाटा होता है तो फिर उसी काम को आगे बढाया जा सकता है। पर 100 के स्थान पर घाटे का सूचकांक ऊपर चढ जाता है तो उस काम को छोड़ देना चाहिए। उसकी विवेचना करनी चाहिए इत्यादि। इस पंक्ति का तात्पर्य है कि राज्य में इन दिनों चारों तरफ शराब का विरोध हो रहा है। यह विरोध कोई नया नहीं है अपितु पहाड़ पर शराब का विरोध सदियों पुराना है। इस पर सरकारों को एक बार सोचना चाहिए, इसकी विवेचना करनी चाहिए कि आखिर शराब पर जनविरोध क्यों उभरकर आता है? लेकिन आज तक ऐसा हुआ नहीं। अर्थात उत्तराखण्ड में शराब के नफा-नुकसान के बारे में आगे बताया जा रहा है।
ज्ञात हो कि आजादी से पूर्व टिंचरी माई ने इस पहाड़ी क्षेत्र में शराब का घोर विरोध किया है। इसी पहाड़ी क्षेत्र में 70 के दशक में पेड़ो को बचाने के लिए ‘‘चिपको आन्दोलन’’ हुआ और बाद में ‘‘नशा नहीं रोजगार दो’’ आन्दोलन चला। इन आन्दोलनो का स्पष्ट संदेश था कि वनमाफिया और शराब माफियायों का मजबूत गठजोड़ है। एक तरफ शराब से इस क्षेत्र में असामाजिक वारदाते बढ रही है तो वहीं दूसरी तरफ इस क्षेत्र में वन विदोहन के कामो में भारी इजाफा हो रहा है। अब कौन भला जो इस पर जनहित की कार्रवाई को आगे बढाये। इधर शराब को राजस्व का स्रोत बताया जा रहा है तो दूसरी तरफ मनोरंजन का साधन इत्यादि। यह स्पष्ट है कि शराब का प्रचलन जैसे-जैसे बढता गया वैसे-वैसे लोगो में हिंसा का ग्राफ भी बढता गया। वैसे भी जबसे अंग्रेजी शराब पहाड़ चढी तब से हिंसा और महिला हिंसा की वारदाते अत्यधिक बढी है। इसका जीता-जागता उदाहरण राजस्व पुलिस और रेगुलर पुलिस के पास मौजूद विभिन्न प्रकार की प्रथम सूचना रिपोर्टे हैं। पुलिस विभाग इस बात की पुष्टी कर रहा है कि लड़ाई-झगड़े की सर्वाधिक रिपोर्टें उनके पास शराब पीने की आती है। मगर दूसरी तरफ देखें तो हमारे जननायक शराब को राजस्व का ‘‘खास स्रोत’’ बताते है। जबकि ऐसा नही है। हकीकत की तस्वीर को पलटकर देखेंगे तो शराब के पीछे का स्याह चेहरा सामने आ जायेगा। बताया जाता है अंग्रेजी शराब का 50 प्रतिशत हिस्सा विभिन्न दुकानों से विभिन्न राजनेताओं को जाता है। मात्र 20 प्रतिशत हिस्सा सरकारी खजाने में जाता है जिसे सरकार और सत्ता में बैठे जनता के नुमाईंदे राजस्व कहते है।
एक आंकलन के मुताबिक शराब की एक बोतल पर जो सरकारी राजस्व मिलता है उसके एवज में 20 गुना हिंसा समाज में उसी जगह पर घट जाती है, जहां इस शराब का कारोबार चल रहा होता है। इसे यदि कुल शराब की दुकानों के साथ जोड़ दिया जाय तो राजस्व पुलिस व रेगुलर पुलिस के पास जो आंकड़े अपमान, महिला हिंसा, जातिय हिंसा, पति द्वारा पत्नि के साथ की हिंसा, आस-पड़ोस के झगड़े बगैरह, के आंकड़ें पुष्ट हो जायेंगे की शराब का जितना भी राजस्व आ रहा है उसके 20 गुना हिंसा प्रतिवर्ष समाज में बढ रही है। यहां एक प्रमाणिक उदाहरण दिया जाना लाजमी है। मेरा एक दोस्त हाल ही में शराब व्यवसाय से जुड़ा है। वह बताता हैं कि शराब की एक बोतल की मूल कीमत मात्र 30 रूपय है जो बाजार में 100 रूपय में बिकती है। नाम ना छपवाने बावत वह आगे बताता है कि शराब से मिलने वाला राजस्व कैसे बंटता है। की जो 70 रूपय मुनाफा होता है उससे 20 रूपय तो शुद्ध रूप से सरकारी खजाने में जाता है, बाकि 50 रूपय विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं व सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरानों तक को जाता है। जिसका कोई लेखा-जोखा ही नहीं होता है। फोकट में मिलने वाला यह राजस्व हमारे नीति-नियन्ताओं की आंखो में पट्टी बांध देता है। इसलिए जनप्रतिनिधि कभी भी शराब व्यवसाय का विरोध नहीं करते। क्योंकि उसे तो 50 रूपय फोकट में मिल रहा है। अर्थात आमजन का तो शराब के व्यवसाय से नुकसान ही है। जो आये दिन अखबारो की सुर्खीया बन जाती है।
गौरतलब हो कि सत्ता की लोलुपता में चकनाचूर लोगो को शराब का ही राजस्व दिखाई देता है। अन्य राजस्व के स्रोत उनके लिए गौण हो जाते है। शराब के अलावा राज्य में राजस्व के नये स्रोत भी तो विकसित किये जा सकते है। जिससे स्वरोजगार व रोजगार को बढावा दिया जा सकता है। बता दें कि राजस्व के अन्य स्रोत राज्य में मौजूद हैं जिसकी सूचना हमारे जनप्रतिनिधि कभी सार्वजनिक नहीं करते। यानि प्रतिदिन प्रति व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला क्रय-विक्रय, कृषि उपज, सिंचाई व अन्य जल दोहन, वन दोहन/वन विकास निगम, सरकारी व गैर सरकारी कर्मीयों से मिलने वाला व वाणिज्यिक जैसे टैक्स जो नियमित राजस्व के स्रोत हैं और बढ भी रहे हैं। इस तरह के राजस्व के स्रोत जनता के नुमाईंदो को दिखाई नहीं दे रहे हैं। जबकि यह राजस्व शराब के व्यवसाय से कई गुना अधिक है व शुद्ध है। शराब के अलावा मिलने वाला राजस्व कभी भी फोकट में बंटने रह जाता हो। इस तरह के राजस्व से जो भी विकासीय कार्य क्रियान्वित होंगे वह मूल रूप  से जन साधारण के काम आते है।
उधर सरकारों की दलील है कि शराब से सालाना लगभग 900 करोड़ का राजस्व मिलता है। परन्तु सरकारें राजस्व के अन्य स्रोतो पर बात ही नहीं करना चाहती। संदेह इस बात का है कि अन्य स्रोतो से मिलने वाले राजस्व का आंकड़ा यदि आम जन के पास आ जाये तो उसका पूरा हिसाब-किताब चुकाना पड़ेगा। अर्थात जो भी खबरें भ्रष्टाचार की आ रही है वह आमजन से वसूला गया राजस्व को ठिकाने लगाने की ही होगी। क्योंकि शराब के राजस्व का हमारे जननायक खूब गीत गाते हैं, मगर अन्य स्रोतों से मिलने वाले राजस्व को अब तक किसी भी सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया। राजस्व के नाम पर इस तरह का दोगला चरित्र आमजन में अंसन्तोष पैदा कर रहा है। अगर सरकार एक तरफ शराब से लगभग 900 करोड़ का घाटा बता रही है तो वहीं दूसरी तरफ इतने ही करोड़ रूपये से अधिक के झगड़े फसाद राज्य में होते है। एक मात्र महिला हिंसा के आंकड़े निकाले जाये तो 99 फीसदी शराब परोसने से बताये जाते हैं। यही नहीं ऐसा भी एक आंकड़ा है कि 100 शादियों में से 45 शादिया शराबी पति मिलने से बिखर जाती है। शराब के कारण महिला हिंसा के अलावा बेरोजगारी, डकैती, अभद्रता, असंवेदनशीलता, आक्रामकता, इत्यादि जैसी नासूर बिमारी समाज में फैल रही है।
बिडम्बना देखिये कि शैक्षणिक माहौल राज्य में नहीं बनाया जा रहा है पर शराब का माहौल बनाने में हमारे जननायक आगे दिखते है। बताया जाता है कि सरकार को मिलने वाले कुल राजस्व में से 7 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना चाहिए था सो मात्र 2 प्रतिशत भी नहीं हो रहा है। संवैधानिक वर्जनाओं को तोड़ते हुए अब कल्याणकारी राज्य की कल्पना शराब के प्रचलन से अधूरी होते दिख रही है। क्योंकि सरकारो का ध्यान शराब पर ही है। शराब का विरोध उत्तराखण्ड राज्य में ही नहीं होता आया है। अन्य राज्य भी इसके गवाह हैं। परन्तु अन्य राज्यों में जनभावनाओं को देखते हुए शराब पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। जैसे विहार राज्य में शराब पर पूर्णरूप से प्रतिबन्ध है। यहीं महाराष्ट्र जैसा राज्य प्रतिवर्ष शराब के लिए मतदान करवाते है। यानि जहां शराब का विरोध हो रहा हो उस स्थान पर बाकायदा मतदान करवाया जाता है। महाराष्ट्र की शराब नीति में यह विशेष व्यवस्था है कि ‘‘बोतल के दो चित्र’’ होंगे। एक बोतल का चित्र खड़ा और दूसरी बोतल का चित्र पड़ा होगा। माना पड़ी बोतल पर सर्वाधिक मतदान हुआ तो उस क्षेत्र में शराब की दुकान नहीं खुल सकती और यदि खड़ी बोतल पर सर्वाधिक मतदान हुआ तो शराब की दुकान त्वरित गति से खुल जायेगी। मगर उत्तराखण्ड राज्य में जनता के नुमाईन्दे जनभावनाओं का अनादर करते स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। 16 वर्षो में जनहित के लिए शराब की कोई नीति नहीं बन पाई। उल्टे राज्य में जितने बार शराब का विरोध हुआ उतनी ही और शराब की दुकाने खोलने के प्रयास सामने आये। यहां तक कि जब महिलाओं के विरोध के आगे शराब व्यापारियों की फजीहत होने लगी तो बकायदा शराब के कारोबारी ने अपनी पत्नी के नाम से शराब की दुकान खोल दी और अमुक की पत्नी को इस संबध मे कोई मालूम ही नहीं है। शराब विरोधी आन्दोलन में कई दौर ऐसे आये कि जिस महिला के नाम से शराब की दुकान चल रही थी वह तो शराब विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व कर रही थी। कुलमिलाकर शराब के विरोध का तात्पर्य सरकारो को समझने की जरूरत है।

चिन्ता-ए-आबकारी विभाग

 आबकारी विभाग बता रहा है कि शराब का व्यवसाय इस वर्ष बन्द होता है तो सरकार को 930 करोड़ का नुकसान का अनुमान है। राज्य में 2016-17 में शराब की 526 दुकाने थी। सो भविष्य के लिए 311 शराब की दुकानों का पैसा आबकारी विभाग में जमा हो चुका है। सहायक आयुक्त आबकारी डी. एस. चैहान कहते हैं कि राज्य में कुल शराब की दुकानो में से अमूमन 10-12 प्रतिशत शराब की दुकाने महिलाओं के नाम से आंबटित होती है। परन्तु जिन महिलाओं के नाम से दुकाने आबटित होती है उन्हे मालूम ही नहीं कि शराब की दुकान कैसे चलती है। नाम महिला का और कारोबार पुरूष चलाता है। उन्होने बताया कि राज्य की एक मात्र महिला अनिता शर्मा जो हरिद्वार जिले में स्थित धनपुरा में थी वे खुद के बलबूते शराब की दुकान का संचालन करती थी। उधर अपर आयुक्त आबकारी डी.वी. सिंह के मोबाईल न॰ 9927328578 पर बात करके यह जानकारी मांगनी चाही कि राज्य में पिछले वर्ष कितनी महिलाओं के नाम से शराब की दुकाने आबंटित हुई है, वे इस बात पर आग बबूल हो गये। कहा कि उनके पास इस तरह की जानकारी नहीं है। वे इतने गुस्से में आये कि अपने पद की जिम्मेदारी छोड़कर यह बताने लगे कि वे ऐसी-वैसी जानकारी नहीं रखते। इसके बाद उन्होने फोन काट दिया।

मामला वैधानिक व अवैधानिक शराब का

राज्य में जब-जब शराब का विरोध होता है तब एक सवाल कौतुहल का विषय बन जाता है कि परंपरागत शराब को बाजार उपलब्ध क्यों नहीं होता? क्या यह परंरागत शराब राजस्व का स्रोत बन सकती है? ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड हिमालय क्षेत्र की जनजातियां स्थानीय उत्पादों और जड़ी-बूटियों से शराब को परंपरागत रूप से बनाते है स्वयं के उपयोग के लिए, जिसे वे दवा-दारू कहलाते हैं। इस दवा-दारू का स्थानीय नाम पैलफुल की, घेंघटी, घणीसूर, छंग, कीमा के पाथ की दारू इत्यादि है। इस शराब के परोसने के ढंग भी अंग्रेजी शराब से जुदा है। स्थानीय लोग इस परंपरागत शराब को खुद ही बनाते है। इस परंपरागत शराब को पीने के शैकीन इसे कटारो में पीते हैं। पीने के बाद खूब गीत-नृत्य होता है। गले लगते है। प्यार, मोहब्बत की बाते होती है। अतएव अब तक इस शराब के असमाजिक कारण सामने नहीं आ पाये। परन्तु यह परंपरागत शराब संवैधानिक रूप से अवैध मानी जाती है। इस शराब को बनाते वक्त यदि कोई आम नागरिक पकड़ा गया तो वह कानूनन अपराध की श्रेणी में आ जाता है और सजा, दण्ड आदि का भागी बन जाता है। ऐसे दर्जनो घटनाऐं सामने आई है। अपितु जब अंग्रेजी शराब या दूसरी वैधानिक शराब के कारण असामाजिक घटनाऐं सामने आती है, उस पर लोगो को कानून का पाठ पढाया जाता है।

एक अन्यायपूर्ण निर्णय की दास्तां

आन्दोलनकारी संगठनो का आरोप है कि हमारे जनप्रतिनिधि शराब के नशे में इतने मदमस्त हो गये कि जिस नारी को वे पूजनीय, सृष्टी की जननी व देवी कहते हैं उस नारी की एक भी समस्या आज इनके नजरो से शराब के उस जहरीले पानी से धुल गयी है। उत्तराखण्ड महिला मंच सहित तमाम जिलो के आन्दोलनकारी संगठनो का आरोप है कि जिस सड़क के लिए ग्रामीण मर-मिट गये कि उनके गांव की सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग के अन्र्तगत आये वह मार्ग आज एक जहरीले शराब नामी पदार्थ के बहाने जिला मार्ग बनाया गया। उनका आरोप है कि क्या यह निर्णय सरकार का न्याय संगत है? यदि न्याय संगत होता तो सरकार को न्यायालय के निर्णय को सर्वोपरी मानना चाहिए था।

Monday, April 10, 2017

प्रकृति-पर्यावरण शिक्षा ही स्वावलम्बन का मूल आधार


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प्रेम पंचोली
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क्या रोजगार नीति युवाओं को लिए मौजूदा समय में मुफिद है? हमारी शिक्षा हमें सिर्फ सरकारी रोजगार के लिए प्रेरित करती है? स्वावलम्बन का पाठ हमारी विषय वस्तु नहीं बन पायी? अंग्रेजी और हिन्दी में खतरनाक द्वन्द चल रहा है? अंग्रेजी माध्यम से अध्ययनरत युवाओं को सरकारी और गैर सरकारी रोजगार मिल रहा है, पर हिन्दी माध्यम से पास आऊट युवा रोजगार की तलाश ही करते रहते हैं? सिर्फ अंग्रेजी बोलना ही लोगो का स्टेटस बनता जा रहा है? यह दो तरह के समाज का निमार्ण कर रहा है? उत्तराखण्ड राज्य में 16 वर्षो बाद भी कोई रोजगार की कारगर नीति सामने नहीं आई है? यह सवाल विश्व युवा केन्द्र दिल्ली के सहयोग से आयोजित टिहरी के बूढाकेदारनाथ में लोक जीवन विकास भारती व पर्वतीय शोध केन्द्र हेमवन्ती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढवाल के सुयक्त तत्वाधान में ‘‘युवा स्वावलम्बी जीवन विकास प्रशिक्षण’’ विषय पर हुई दो दिवसीय कार्यशाला में राज्यभर से आये शिक्षित युवा बेरोजगारो ने खड़े किये हैं।
इस कार्यशाला में मुख्य संसाधन व्यक्ति पर्वतीय शोध केन्द्र गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर के निदेशक डा0 अरविन्द दरमोड़ा व पर्यावरणविद् सुरेश भाई ने शिक्षित बेरोजगारो की शंकाये तो बातचीत से दूर की है, मगर नीति और योजनाओं पर उनके सवाल आज भी बरकरार है। उन्होने कार्यशाला में उठाये गये सवालो के समाधान और कार्यक्रम बताने की भरसक कोशिश की है। पर्वतीय शोध केन्द्र के निदेशक डा0 अरविन्द दरमोड़ा ने बताया कि उत्तराखण्ड वन बाहुल्य राज्य है, इसलिये अनिवार्य ‘‘हिमालय नीति’’ की नितान्त आवश्यकता है। इस नीति के अन्दर रोजगार नीति, लघु उद्योग नीति जैसे बिन्दु को प्रमुखता से सम्मलित करना होगा, ताकि राज्य के युवा स्वावलम्बन की ओर आगे बढ सके। सलाह दी कि जो लोग गांव में स्वतः कृषि कार्य से जुड़े है उन्हे प्रमुख रूप से मनरेगा का फायदा मिलना चाहिये। गांव में चारा-ईधन की सुलभ व्यवस्था होनी चाहिये और आपदा प्रबन्धन की सुलभ नीति बननी चाहिये। उन्होने यह भी बताया कि इस राज्य में कृृषि और फलोत्पादन का कोई समर्थन मूल्य नही है। इसलिये स्वावलम्बन की दिशा में अवरोध पैदा हो रहे है। यही नहीं उन्होने नैतिक शिक्षा और उद्यमिता शिक्षा को अनिवार्य रूप से शैक्षणिक विषयों में सम्मलित करने की वकालत की है।
पर्यावरणविद् सुरेश भाई ने बताया कि भले उत्तराखण्ड में कृषि योग्य भूमि कम हो इस कारण राज्य का युवा रोजगार की तलाश में गांव छोड़ कर चला जाता है मगर राज्य में कृषि को जीविका से जोड़ने के वास्ते चकबन्दी करनी जरूरी है। परन्तु, उन्होने सवाल खड़ा किया कि चकबन्दी से पहले राज्य के भूमिहीनों के बारे में सरकार को एक सफल नीति बनानी होगी ताकि चकबन्दी जैसा कार्यक्रम समता का रूप ले पाये। उन्होने कार्यशाला में युवाओं से जानना चाहा कि क्या पानी का किराया बढ़ना चाहिए ? यह सवाल कौतुहल का विषय इसलिये है कि वर्तमान सरकार ने जलकर जिस तरह से बढाया है वह निश्चित रूप से उत्तराखण्डवासियों के लिये सकंट पैदा करने वाला है क्योंकि पानी से ही जीवन और जीविका जुड़ी है। अर्थात इस तरह के अनैतिक निर्णय युवाओें को भारी मात्रा में प्रभावित करता है।
कार्यशाला में कृषि विश्वविद्यालय चिरबटिया के अधीष्ठाता डा0 भगवती प्रसाद नौटियाल ने युवाओं का ध्यान कृषि स्वावलम्बन की ओर खींचा। उन्होने कहा है कि उत्तराखण्ड में बहुविविधता के प्राकृतिक संसाधन है जो आजीविका के साधन बन सकते है, परन्तु एक मात्र कृषि को जीविका से जोड़ना थोड़ा सा कठिन है क्योकि राज्य में कृषि की जमीन मात्र 13 प्रतिशत है जिसमे सींचित जमीन नाम मात्र की है इसलिये राज्य में स्वावलम्बन विकास के लिये जैव-विविधता को रोजगार से जोड़ना होगा। वे उदाहरण दे रहे थे कि उन्होने मात्र 25 नाली जमीन पर कलमी अखरोट की खेती आरम्भ की, जिससे सालभर में रू0 दो लाख की आमदानी हुई है। बताया कि अखरोट का एक पेड़ 200 रू0 का मुनाफा काश्तकार को देता है। इसके अलावा उत्तराखण्ड में 12 हजार प्रकार के शिल्प हैं जिसे शिल्प उद्योग का दर्जा दिया जा सकता है जबकि 40 प्रकार के ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं जो युवाओं को स्वावलम्बन की ओर जोड़ सकता है। बशर्ते राज्य में एकीकृत विकास नीति की दरकार है। यह भी बताया कि अकेले उत्तराखण्ड के जंगल पूरी दूनियां को लगभग 36 हजार करोड़ रूपय की सेवा दे रहे है।
कार्यशाला में हेमवन्ती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो0 मोहन पंवार ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद तीन तरह के त्वरित परिवर्तन हुये है जिनमे जलवायु, राजनैतिक व जनांकीकी। इस परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित उत्तराखण्ड राज्य का युवा हुआ है। उन्होने सलाह दी की उत्तराखण्ड मे समावेशी विकास के लिये ‘‘ग्रामोत्सव’’ जैसे कार्यक्रम बनने चाहिये। इस हेतु छोटे-छोटे जलागम क्षेत्रों में शोध कार्य, संगठनात्मक निर्माण, जन पैरवी, व बौद्विक सम्पदा को संयुक्त रूप से एक कार्यक्रम के तहत आगे बढाना होगा। उन्होने दूरस्थ क्षेत्र प्रतापनगर का एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुये कहा कि पटूड़ी गांव की 90 महिलाये ‘‘औरगेनो’’ जैसे पिज्जा मसाला की खेती करती है और वे एक साल में प्रति महिला 1.50 लाख रू0 की आमदानी करती है। इसलिये ऐसे स्वावलम्बन की दिशा में युवाओं को जोड़ने की नितान्त आवश्यकता है। इस दौरान लोक जीवन विकास भारती के संस्थापक व शिक्षाविद् बिहारी लाल जी ने कार्यशाला में मौजूद प्रतिभागियों का अभिवादन किया तो वहीं तरूण पर्यावरण विज्ञान संस्था के प्रमुख नागेन्द्र दत्त ने इस दौरान का सफल संचालन किया है। 
चर्चा के सूत्रधार
कार्यशाला में लोक जीवन विकास भारती के मंत्री जयशंकर नगवान, भिलंगना विकासखण्ड के उप शिक्षा अधिकारी भुवनेश्वर प्रसाद जदली, उद्यान विभाग के चतरसिंह, विश्व युवा केन्द्र दिल्ली के प्रवीन कुमार शर्मा, सत्य प्रसाद जोशी, पर्यावरण कार्यकर्ता साहबसिंह सजवाण, जन विकास संस्थान के अध्यक्ष व ग्रामीण अभियान्त्रिकी बैशाखी लाल, धीरेन्द्र प्रसाद नौटियाल, किशोरी लाल नगवान, नागेन्द्र दत्त, शिक्षक जगदीश बंगरवाल, बीरेन्द्र सिंह नेगी, हर्षमणि उनियाल, अनिता शर्मा, लक्ष्मी विष्ट, कीर्तिनगर से अदन संस्था के रणजीत सिंह जाखी, महेन्द्र प्रसाद नाथ, सीताकोट गांव की ग्राम प्रधान अतरा देवी, रक्षिया गांव के ग्राम प्रधान महेश चन्द्र रमोला, थाती गांव की ग्राम प्रधान कैलाशी देवी, क्षेत्र पंचायत सदस्य थाती हिम्मत सिंह रौतेला, क्षेत्र पंचायत सदस्य भिगुन मनोज लाल, रा0 इ0 का0 के प्रधानाचार्य कमलदास निराला, चेतना आन्दोलन के विनोद बडोनी, पूर्व प्रधान बावन सिंह विष्ट, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य सत्य प्रसाद जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता विष्णु प्रसाद नौटियाल, पूर्व प्रधान कुण्डी उत्तमलाल, जाड़ी संस्था उत्तरकाशी की राधा पंवार, अब्बल लाल सहित राज्य भर के सैकड़ो युवा और युवतियों ने इस कार्यशाला में युआवों का भविष्य कैसे हो और वे स्वरोजगार से कैसे जुड़ सकते हैं।

अनसुलझे सवालों का एक रोडमैप 



कार्यशाला में चकबन्दी से पहले भूमिहीनों को भूमि दिलवाने की बात प्रमुखता से सामने आयी तो वहीं गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का अभाव ही युवाओं में भटकाव पैदा करने वाली समस्या भी उजागर हुई। रोजगार नीति में प्रबंधन का अभाव है, जैसे भावनात्मक सवाल कार्यशाला में खुलकर सामने आये। यह उदाहरण आया कि पड़ोसी राज्य हिमांचल में सड़े हुये फलों का भी समर्थन मूल्य काश्तकारों को मिलता जबकि उत्तराखण्ड में इस तरह की कोई नीति नहीं है। वन बाहुल्य राज्य में हिमालय नीति की नितान्त आवश्यकता है। लघु उद्योग नीति का अभाव तो गांव में चारा-ईधन की सुलभ व्यवस्था नहीं है। कृषि को जीविका से जोड़ने के वास्ते चकबन्दी करनी जरूरी है। परन्तु, चकबन्दी से पहले राज्य के भूमिहीनों के बारे में सरकार को एक सफल नीति बनानी होगी। उत्तराखण्ड में 12 हजार प्रकार के शिल्प हैं जिसे शिल्प उद्योग का दर्जा दिया जा सकता है, जबकि 40 प्रकार के ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं जो युवाओं को स्वावलम्बन की ओर जोड़ सकता है। इधर राज्य बनने के बाद तीन तरह के त्वरित परिवर्तन हुये है जिनमे जलवायु, राजनैतिक व जनांकीकी। इस परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित उत्तराखण्ड राज्य का युवा हुआ है। प्रतापनगर के पटूड़ी गांव की 90 महिलायें ‘‘औरगेनो’’ जैसे पिज्जा मसाला की खेती करती है और वे प्रति महिला 1.50 लाख रू0 की आमदानी सालभर में करती है।

मैट्रो सीटी में ही क्यों? अब नौगांव में भी मिलेगी वही शिक्षा




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प्रेम पंचोली
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यमुना घाटी राज्य का एक ऐसा क्षेत्र हैं जहां पलायन नाम की कोई चीज नहीं है। इसलिए इस घाटी की राज्य में अलग ही पहचान है। अब एक और प्रयोग कर डाला शशीमोहन रावत ने। की जो स्कूलिंग मैट्रो सीटी में मिलती है, क्या? यह यमुना घाटी के सूदूर नौगांव में नही मिल सकती? जी! हो सकती है। यह झलकियां तब सामने आई जब पिछले दिनों ‘‘यमुना वैली पब्लिक स्कूल’’ का वार्षिक उत्सव सम्पन्न हुआ। इस दौरान वरिष्ठ साहित्कार डा॰ हेमचन्द सकलानी, राज्य के चर्चित रंगकर्मी नन्दलाल भारती, वरिष्ठ राजनीतिक व चिन्तक सकलचन्द रावत, व्यापारी नेता जगदीश असवाल, लेखक इन्द्र सिंह नेगी, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक अतर सिंह पंवार, रिवर्स पलायन का चर्चित चेहरा रमेश सेमवाल तो वही मौजूदा जिला पंचायत उत्तरकाशी की अध्यक्षा जशोदा राणा, पूर्व जिला पंचायत सदस्य सोबेन्द्र सिंह रावत, छात्र नेता नीतिन रमोला स्कूल परिवार अभिभावक संघ के अध्यक्ष शिक्षक भजन सिंह पंवार व क्षेत्र पंचायत सदस्य केदार सिंह चैहान, यशवन्त रावत, राष्ट्रीय स्वयं सेवक के वरिष्ट प्रचारक श्री बिजल्वाण, श्री सेमवाल एक साथ इस स्कूल की प्रंशसा करने में पीछे नहीं दिखे।
ज्ञात हो कि यमुना वैली पब्लिक स्कूल जहां अपने शिक्षण कार्य से अन्य विद्यालयों के जैसे अध्यापन का कार्य कर रही है उससे हटकर इस विद्यालय के प्रयोग ‘‘नई शिक्षा पद्धति’’ के अनुकूल सामने दिखी। बच्चो में इस दौरान उत्साह ही नहीं था वे विश्वास से इतने लबरेज थे कि उनकी प्रस्तुति ही स्कूल का भविष्य दिखा रहा था। विद्यालय की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए विद्यालय के प्रबन्धक शशीमोहन रावत ने जो अपने वक्तव्य में बताया कि वे बच्चों के साथ सिर्फ सीखाने का कार्य नहीं करते, अपितु वे तो सीखने व सीखाने का दोनो कार्य करते हैं। इस कारण बच्चों की दक्षता को अच्छी तरह से समझने का मौका मिलता है। वे परिसर में कम्प्यूटर शिक्षा, गणित हिन्दी, अंग्रेजी, विज्ञान के साथ-साथ परिवेशीय शिक्षा के लिए भी विशेष सत्र चलाते है। उनका मानना है कि इस विद्यालय के बच्चे जहां भाषाई ज्ञान से शिक्षित हों वहीं वे आज की आधुनिक शिक्षा से भी जुड़ सके। इसलिए उन्होने विद्यालय के सभी दस्तावेज आॅनलाईन करने के प्रयास कर दिये हैं। की अमुक का बच्चा स्कूल कब आया, कब गया, और स्कूल में अमुक बच्चे की प्रस्तुति व प्रगति कैसी है, इसकी सूचना सीधी अभिभावक के मोबाईल में एक मैसेज के मार्फत प्रतिदिन मिल जायेगी। यही नहीं उन्होने बताया कि वे स्कूल में अध्यापको से लेकर बच्चों के साथ किताबों से बाहर के अनुभव के शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य समय-समय पर करते रहते हैं। कहा कि अब समय आ गया कि रटने से नहीं बल्कि ‘‘करके सीखने’’ से बच्चो के विकास में नये प्रयोग होंगे।
दिलचस्प यह है कि आम तौर पर स्कूलो के वार्षिक उत्सवों में रंगारंग कार्यक्रम और स्कूल की प्रगति के अलावा कुछ विशेष प्रस्तुति दिखने को नहीं मिलती। परन्तु यमुना वैली पब्लिक स्कूल के बच्चो ने अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में समाज के लिए एक संन्देश देने का काम किया। ‘‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’’ की नृत्य नाटिका में बच्चो की मार्मिक प्रस्तुति ने एक बारगी के लिए मौजूद लोगो को सोचने के लिए विवश कर दिया। यही नहीं समाज के लिए एक सवाल खड़ा किया कि क्या बिना महिला के नये समाज की रचना की जा सकती है? इस प्रस्तुति को देखते ही देखते दर्शको की आंखे भर आई। कुलमिलाकर यमुना पब्लिक स्कूल ने यह सन्देश दे दिया कि जिस तरह से यमुना घाटी में पलायन नहीं है उसी तरह आने वाले दिनों में लोग शिक्षा के लिए कमसे कम यमुना घाटी से पलायन नहीं करेंगे। जबकि इस दौरान सभी वक्ताओं ने स्कूल की प्रधानाचार्य सीमा रावत, तकनीकी शिक्षिका गीता गुसाई और सभी शिक्षको की प्रसंशा इस मायने में की कि संसाधनो के अभाव में भी ऐसे शिक्षको ने शिक्षण कार्य बाध्य नहीं होने दिया। स्कूल की प्रगति और स्कूल परिवार के दृढ संकल्प को देखते हुए जिला पंचायत अध्यक्षा जशोदा राणा ने स्कूल प्रांगण की चार दिवारी के लिए दो लाख भी स्वीकृत किये।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...