Friday, August 5, 2016

गंगा के सवाल पर निर्णायक लड़ाई

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प्रेम पंचोली
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(लेखक एन. एफ. आई. के फैलो हैं)

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भले ही 07 जुलाई 2016 को ‘‘मिशन फाॅर क्लिन गंगा’’ कार्य योजना का उद्घाटन केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती, केन्द्रीय राष्ट्रीय राजमार्ग मंन्त्री नितिन गडकरी हरिद्वार पंहुचकर कर गये हों, मगर गंगा की अविरलता और सांस्कृतिक, आध्यात्मिक के सवाल आज भी खड़े हैं। मोदी सरकार की ‘‘गंगा मिशन’’ कार्य योजना कब परवान चढेगी यह तो समय ही बता पायेगा परन्तु वर्तमान का ‘‘विकास माॅडल’’ गंगा की स्वच्छता और अविरलता को लेकर नये सिरे से सवाल खड़ा कर रहा है।
सवाल यह है कि मौजूदा विकास के माॅडल में क्या गंगा अविरल बहेगी? क्या गंगा का पानी स्वच्छ हो जायेगा? यहां आमराय यह बताती है कि यदि गंगा अविरल बहेगी तो गंगा का पानी स्वतः ही स्वच्छ हो जायेगा। यदि गंगा के बहाव को विकास के नाम पर बाधित किया जाता है तो गंगा जहां अपना प्राकृतिक स्वरूप खो देगी वहीं गंगा की स्वच्छता का हस्र स्पष्ट नजर आयेगा। यह आरोप सच है कि ‘‘गंगा एक्शन प्लान’’ में 4000 करोड़ रूपये खर्च हुए, फिर भी गंगा की हालत दिन-प्रति दिन बिगड़ती गयी। वर्तमान में ‘‘नमामी गंगे’’ के नाम से भी 1500 करोड़ खर्च होने की संभावनाऐं सरकारी स्तर से बताई जा रही है। वैसे भी यह घोषणा ‘‘मिशन फाॅर क्लिन गंगा’’ कार्य योजना के उद्घाटन के दौरान केन्द्रीय राष्ट्रीय राजमार्ग मंन्त्री नितिन गडकरी हरिद्वार पंहुचकर कर गये। कुल मिलाकर करोड़ो खर्च करने से कुछ ठेकेदारो/कम्पनीयों को रोजगार जरूर मिल जायेगा मगर गंगा की अविरलता और स्वच्छता के सवाल इसलिए खड़े रहेंगे कि गंगा के प्राकृतिक स्वरूप के साथ छेड़खानी करने से गंगा अविरल नहीं बहेगी और गंगा अविरल नहीं बहेगी तो गंगा की स्वच्छता और पवित्रता भी समाप्त हो जायेगी। यही सवाल साल 2001 में अटल जी की सरकार के दौरान बनाई गयी मुरली मनोहर जोशी कमेटी के तत्काल के अध्यक्ष डा॰ जी॰डी॰ अग्रवाल ने उठाये थे। उन्होने बकायादा गंगा के प्राकृतिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विषयों से लेकर गंगा के पानी के वैज्ञानिक महत्ता पर इस समिति को 137 पेज की रिपोर्ट प्रस्तुत करके यह अगाह किया था कि वर्तमान के विकास के माॅडल में गंगा अबिरल नहीं बह सकती और गंगा अबिरल नहीं बहेगी तो स्वच्छता और पवित्रता के सवाल पर बात करनी बेईमानी होगी। यह उनका अध्ययन भी था और उनका अनुभव भी था।
उल्लेखनीय हो कि डा॰ जी॰डी॰ अग्रवाल (वर्तमान में स्वामी सानद) मनेरीभाली फेज-1 जल विद्युत परियोजना की वैज्ञानिको के एक दल के टीम लीडर थे। सो उन्हे भी तत्काल इसलिए इस कार्य को छोड़ना पड़ा जब गंगा की अबिरलता को सरकारी वैज्ञानिक विकास का हवाला देकर कुचलने का प्रयास कर रहे थे। यही हस्र उनके साथ साल 2001 में हुआ। उन्हे अपना इस्तीफा मुरली मनोहर जोशी के हाथो मजबूरन थमाना पड़ा। इसलिए कि ‘‘गंगा जल की प्रदूषण-विनाशिनी क्षमता’’ पर जो तत्काल अटल जी के सरकार में श्री जोशी के नेतृत्व में गंगा के सवाल पर कमेटी बनी थी की रिपोर्ट को वे सार्वजनिक करवाना चाहते थे, ताकि गंगा के आबाद क्षेत्र में रह रहे लोगो को मालूम हो कि गंगा पर बन ही परियोजनाओं के विकास के मानक उनके अनुरूप हैं कि नहीं। यदि नहीं तो स्थानीय लोग क्या चाहते हैं। ऐसा वैज्ञानिक डा॰ जी॰डी॰ अग्रवाल चाहते थे। मगर सत्ता की लोलुपता श्री जोशी पर इतनी सवार थी कि ना तो डा॰ जी॰डी॰ अग्रवाल के इस्तीफे पर कोई सुनवाई हुई और ना ही श्री जोशी वाली कमेटी कभी गंगा के सवाल पर आगे बढ पायी।
गौरतलब हो कि जब वे ‘‘गंगा संरक्षण’’ के लिए वर्ष 2008 में उत्तरकाशी के केदारघाट पर अनशन कर रहे थे दतो उन्ही दिनों उन्होने पुनः 2001 में बनाई गयी मुरली मनोहर जोशी वाली समिति की सिफारिशो को सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी, जो उन्हे आधी-अधूरी ही उपलब्ध करवाई गयी। 137 पेज वाली रिपोर्ट से पेज न॰ - 28, 29, 30 व 87 से लेकर 93 तक पेज गायब किये गये या उपलब्ध ही नहीं करवाये गये। इस बात का जिक्र उन्होने वर्ष 2008 में तत्काल प्रधानमंत्री और प्रैस को एक पत्र लिखकर किया। उनकी मांग थी कि ‘‘गंगा जल की विलक्षण प्रदूषण नाशिनी क्षमता’’ पर गहन अध्ययन और शोध कार्य कम से कम छः माह तक करवाये जाये। तब तक बांध के निर्मार्ण कार्य भी रोक दिये जाये। यही नहीं इस अध्ययन के स्पष्ट और निर्णायक परिणाम के अनुसार गंगा पर बांध बनने चाहिए कि नही इस पर सरकार गंम्भीरता से आगे की कार्यवाही करे।
जगजाहीर है कि गौमुख से गंगासागर तक 2525 किलोमीटर बहने वाली गंगा नदी वर्तमान के विकास के कारण संकट में है। कहीं उसके बहाव को रोका जा रहा है तो कहीं भयंकर तरीके से प्रदूषित किया जा रहा है। इस कारण गंगा के आस-पास की बसासत भयभीत है और खतरे में है।

-------------------------------------------------------------मिशन फाॅर क्लिन गंगा योजना से स्थानीय लोग असमंजस-------------------------------------------------------------

‘‘गंगा एक्शन प्लान’’ का क्या हाल हुआ। जो जगजाहीर है। लोगो की नजर अब की केन्द्र सरकार पर जमायी हुई है कि इस बहाने गंगा की स्वच्छता व पर्यावरणीय सन्तुलन वापस लौट जाये। ऐसा मोदी सरकार की ‘‘गंगा मिशन’’ कार्य योजना से लोगो की आशाऐं बन रही है। अब जबकि गंगा पर ही बड़े और छोटे दर्जनो बांध बनने हैं, गंगा के किनारे-किनारे ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाईन भी जानी है। इन दोनो महत्वपूर्ण योजनाओं में सुरंगो का इस्तेमाल किया जायेगा। इस तरह क्या ‘‘गंगा मिशन’’ परवान चढ पायेगा? यही नहीं गंगा के किनारे जितने भी छोटे बड़े कस्बे बसे है वे सभी पर्यटन व तीर्थाटन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। वर्षभर गंगा के पानी के आचमन के लिए देश-दुनियां के लोग हरिद्वार से गंगोत्री, गौमुख और हरिद्वारा से बद्रीनाथ, केदारनाथ की यात्रा पर आते है और इन कस्बानुमा बाजारो को रात्री विश्राम के लिए इस्तेमाल करते है, जिसके एवज में स्थानीय लोगो की रोजी-रोटी का जुगाड़ भी चलता है। मगर ‘‘गंगा मिशन’’ योजना में इन कस्बो को साफ-सुथरा भी बनाना है। इन्ही कस्बो को बांध और रेल लाईन की भेट भी चढना है। हरिद्वार, ऋषिकेश, उत्तरकाशी, श्रीनगर सहित इन कस्बो को एनजीटी का भी फरमान है कि वे अपने सीवर को गंगा में ना डाले बगैरह। वरना जुर्माना या सजा के लिए तैयार रहे। ऐसा लगता है कि यदि गंगा स्वच्छ चाहिए तो गंगा के किनारे या तो मानव विहीन करने पड़ेंगे या गंगा के किनारे बसी बसासत के लिए इस योजना के अन्र्तगत सभी ढांचागत सुविधा मुहैया करवानी पड़ेगी। अतएव गंगा किनारे बसे लोग आपदा से तो डरे, सहमें हैं परन्तु अब उनके मन में इस तरह के सवाल कौतुहल का विषय बने हैं कि क्या ‘‘गंगा मिशन’’ योजना से लोगो को गंगा का किनारा छोड़ना पड़ेगा अथवा इस योजना से लोग लाभन्वित होंगे या उन्हे सुविधा मुहैया कराई जायेगी?

-----------------------------------------------------------------------------मिशन फाॅर क्लिन गंगा अभियान में होगा 2950 करोड़ का वृक्षरोपण-----------------------------------------------------------------------------

‘‘गंगा मिशन’’ कार्ययोजना के लिए राज्य सरकार ने कमर कस दी है। राज्य के वन महकमा ने बकायदा अगले एक वर्ष के लिए ‘‘नमामी गंगे’’ योजना के लिए 2950 करोड़ की कार्ययोजना केन्द्र सरकार को भेज दी है, जिसमें उत्तरकाशी से हरिद्वार तक का प्लान है। इस कार्य योजना के तहत उत्तराखण्ड बेसिन क्षेत्र में जल संरक्षित करने वाले पौधे लगाये जायेंगे, जिनमें अखरोट, अंगू, अंजीर, अमलताश, अतीश, अमवाला, खुमानी, खैर, गुलार, दालचीन, बरगद, बहेड़ा सहित 60 प्रजाती के पौधे रोपे जायेंगे। इसके अलावा घास की अंजन, उल्ला, कुमरिया, कांस, कुमरा, कुश, गिनी ग्रास, दूब, लव ग्रास सहित 19 प्रजाती का घास भी लगाया जायेगा, इसके साथ-साथ बांस, गोल रिंग, थाम रिंगल और देव रिंगल को भी उचित स्थानो पर लगाया जायेगा। अपर प्रमुख वन संरक्षक गंभीर सिंह ने बताया कि ‘‘नमामी गंगे’’ परियोजना के तहत यह पहला कार्य योजना बजट केन्द्र को भेजा है। भविष्य में भी वित्तीय वर्ष की शुरूआत में ऐसा बजट केन्द्र को जायेगा और केन्द्र इस हेतु बजट उपलब्ध करा देगा।

-------------------------------------------------गंगा किनारे 2565 बीघा भूमि पर अतिक्रमण-------------------------------------------------

हरिद्वार और आस-पास की गंगा किनारे खाली पड़ी अधिकांश जमीन पर अतिक्रमण हो चुका है। यह वह जमीन है जो गंगा का ही आबाद क्षेत्र माना जाता है। इस क्षेत्र की 2565 बीघा जमीन अब रसूखदारो के कब्जे में है। यह आंकड़ा सिंचाई विभाग ने जुटाया है। ऐसे में ‘‘गंगा मिशन’’ कार्य योजना कैस सफल होगी जो समय की गर्त में है। गंगा को प्रदूषण मुक्त और गंगा तटो को विकसित करने का अभियान ‘‘मिशन फाॅर क्लिन गंगा’’ योजना से आरम्भ हो गया है।

---------------------------------------------------------------रोज गंगा में गिरती है 3766 मिलियन लीटर गंदगी---------------------------------------------------------------

कुल जनसंख्या में से देश की 37 प्रतिशत जनसंख्या गंगा बेसिन के किनारे निवास करती है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि हर रोज हम इस पवित्र नदी को दूषित करने में जुटे हुए हैं। महानगर हरिद्वार का पूरा सामाजिक व आर्थिक आधार भी पूरी तरह गंगा पर टिका हुआ है। लेकिन ऋषिकेश से मचलती, उछलती, कलकल करती गंगा जब इस हरि के द्वार में प्रवेश करती है तो उस पर ताबड़तोड़ मानवीय हमले होते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक केवल हरिद्वार में ही 3766 मिलियन लीटर सीवेज बिना उपचारित किए सीधे गंगा में गिर रहा है। 1985 में शुरू हुई गंगा नदी योजना के तहत एक लाख से अधिक आबादी वाले 25 शहरों में 865 एमएलडी क्षमता के मल-जल शोधन संयंत्र स्थापित होने थे। वर्ष 2000 में योजना का पहला चरण पूरा हुआ, मगर गंगा की हालात पूर्व से अधिक बदस्तूर हो गयी है। गंगा किनारे बने रिजोर्ट और होटल, धर्मशालाओं को एनजीटी ने कई बार अपने संस्थानो व व्यवसायिक केन्द्रो के सीवेज को शोधन के लिए नोटिस थमा दिया परन्तु अब तक ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है। ज्ञात हो कि हरिद्वार शहर में प्रतिदिन 85 एमएलडी सीवेज कचरे का उत्पादन होता है। त्योहारों और कुंभ जैसे अवसरों पर यह बहुत अधिक बढ़ जाता है। मगर आज तक इस शहर में कुल 40 एमएलडी का सीवेज शोधन संयंत्र है। नगर परिषद के एक अधिकारी के मुताबिक, इसकी शोधन क्षमता 40 प्रतिशत है। अध्ययन बतातें हैं कि 1968 में बसे शहर हरिद्वार के 16 नाले प्रतिदिन शहर का सारा ऑर्गेनिक कचरा और खाद्य कचरा बिना किसी उपचार के सीधे गंगा में उड़ेल दिये जाते हैं। यह अध्ययन गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर बीडी जोशी और सुशील बदौला ने संयुक्त रूप से किया गया है। भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय तथा आक्सीजन डेवलेपमेंट एडमिनस्ट्रिशन द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन के मुताबिक गंगा किनारे बसे प्रथम श्रेणी के 29, द्वितीय श्रेणी के 23 शहरों और 48 कस्बों में बसने वाली 35 करोड़ से अधिक की आबादी गंगा में 1.3 अरब लीटर मलमूत्र रोज इस पवित्र नदी में उड़ेल दी जाती है। इसी अध्ययन में यह भी सामने आया है कि 60 लाख टन रासायनिक खाद और 9000 टन कीटनाशक प्रतिदिन गंगा में गिरते हैं। बताया जात है कि 26 करोड़ टन औद्योगिक कचरा भी गंगा को जहरीला बनाता है।

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01

नदी में बहुत से सूक्ष्म वनस्पति होते हैं जो सूरज की रोशनी में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं, गंदगी को सोखकर ऑक्सीजन मुक्त करते हैं। इसी प्रकार बहुतेरे जीव जन्तु भी सफाई करते रहते हैं। लेकिन उद्योगों के प्रदूषण के कारण गंगा में तथा अन्य नदियों में भी जगह-जगह डेड जोन बन गए हैं। कहीं आधा किलोमीटर, कहीं एक किलोमीटर तो कही दो किलोमीटर के डेड जोन मिलते हैं। यहां से गुजरने वाला कोई जीव-जन्तु या वनस्पति जीवित नहीं बचता। जब फैक्टरीयों का गंधा पानी, मैकडेबल डिसलरी, तेल शोधक कारखाना, ताप बिजली घर और रासानिक अवशेष नदी में गिरते हैं। तब इसका सबसे बुरा असर नदी के आस-पास रहने वाले समाजो और अन्य प्राणीयों पर पड़ता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि गंगा नदी में प्रदूषण बढने से कटैया, फोकिया, राजबम, थमैन, झमंड, स्वर्ण खरैका, खंगशी, कटाकी, डेंगरास, करसा गोधनी, देशारी जैसी 60 देशी मछलियों की प्रजातियां लुप्त हो गयी है।

02

स्वामी चिदात्मन जी महराज कहते हैं कि गंगा पर आश्रित समुदाय का रिश्ता तब कायम रह सकेगा जब गंगा की अविरलता कायम रहेगी। पर्यावरणविद् जलपुरूष राजेन्द्र सिंह कहते हैं कि हमारी गंगा माई है, हमारी कमाई भी है, लेकिन वह डीसी वाशिंगटन और विश्वबैंक की कमाई नहीं है। उनका विरोध विश्व बैंक और डीसी वांशिगटन और डीसी वाशिगटन की कमाई बनाने से रोकने का है। गंगा एक तरह से सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नदी है। भारतीय संवैधाानिक व्यवस्था में जब से वह राष्ट्रीय नदी घोषित हुई, वह धर्मनिरपेक्ष नदी घोषित हो गयी है। उन्होने कहा कि 4 नवम्बर 2008 को भारत सरकार ने गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी घोषित किया है। यदि अब गंगा राष्ट्रीय नदी है तो अविरलता और निर्मलता कायम करना भारत सरकार की जिम्मेदारी है। यदि राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने वालों को सजा मिलती है तो राष्ट्रीय नदी का अपमान करने वालों को सजा क्यों नहीं? कहा कि मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगा का राष्ट्रीय प्रॅाटोकाॅल भूल गये। गौमुख से गंगासागर तक साइकिल यात्रा करने वाली पत्रकार अजाना घोष का कहना है कि थोड़ी बहुत शुद्धिकरण तो गंगा खुद ही करती है। उसके अंदर स्वयं शुद्धिकरण की क्षमता है।

03

पर्यावरणविद् गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बीडी जोशी के मुताबिक जबरदस्त इकोलॉजिकल फ्लो के बावजूद जल की गुणवत्ता प्रभावित करने वाला बायोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड (बीओडी) हर रोज प्रभावित हो रहा है। बीओडी प्रभावित होने का प्रमुख कारण नगरीय प्रदूषण और सीवेज है। शोध परिणामों के मुताबिक इन सीवर नालों के माध्यम से गंगा में जाने वाला कचरा कभी भी ग्रामीण समुदाय के लिए स्वास्थ्य संबधित और पर्यावरणीय खतरे पैदा कर सकता है। इन गांवों के लोग अपने घरेलू उपयोग के लिए गंगा नहर के पानी पर भरोसा करते हैं। पानी में मिली सीवेज प्रदूषण की उच्च दर पानी की गुणवत्ता की दृष्टि से बेहद दयनीय है।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...