मनवजाति तरक्की के साथ-साथ अपने लिए विशेष दिन भी तय कर रही है। अब 19 नवम्बर को ‘‘विश्व शौचालय’’ दिवस है। क्या शौच के बारे में कहना कोई नयी बात है? नही! परन्तु यदि नई बात है तो शौच और स्वच्छता को लेकर। क्या कारण है कि जैसे-जैसे जनसंख्या का बढना हुआ वैसे-वैसे शौच और स्वच्छता की समस्या गहराती गयी। यहां हम उत्तराखण्ड हिमालयी राज्य को लेकर परम्परागत शौचालय से संबधित कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण के एक अध्ययन में बताया गया है कि 20 लाख वर्ष पहले से ही हिमालय की तलहटी वाले क्षेत्र शिवालिक में कपि मानव थे। वे तन्दुरस्ती के साथ-साथ समझदार भी थे। उनका रहन-सहन समझदारी के अनुरूप था। उनकी शौच जाने की अपनी परम्परा थी। वे इसे कोई परम्परा नही मानते थे। वे शौच का निस्तारण अपने दिनचर्या के साथ जोड़ते थे। जिस कारण उनके आस-पास गंदगी का कोई जिक्र ही नहीं आता। कह सकते हैं कि उन दिनो जनसंख्या का घनत्व इतना कम था कि शौच का निस्तारण प्रकृति के साथ स्वतः ही हो जाता होगा। बताया गया कि डेढ लाख वर्ष पहले हिमालय में जलवायु परिवर्तन के कारण भारी प्राकृतिक उथल-पुथल हुई। हिमालय की ऊंचाई बढने लग गयी और हिमालय की तलहटी मे मौजूद कपि मानव में शाररिक व मानसिक बदलाव होने लगा। इन्होने भी अपने कामों में तेजी से विकास किया। गांव बसने लगे, गांव की अपनी परम्पराओं का विकास हुआ, नियम-कायदे गड़ने लग गये। इसके अलावा कृषि का भी तेजी से विकास हुआ तो पैदावार की बढोतरी के लिए तरह-तरह के प्रयोग हुए। लोगो ने शौच को जैविक खाद के रूप में देखा तो शौच जाने के कुछ स्थान नियत कर दिये गये। आज भी उन स्थानों के नाम उत्तराखण्ड में मौजूद हैं। उन्ही स्थानो पर ग्रामीणों की सर्वाधिक काश्त की जमीन है। यही नहीं गांव में पानी का स्रोत हो ना हो परन्तु ‘‘सेरा नामे तोक’’ में जल स्रोत जरूर होगा। ‘‘सेरा’’ का तात्पर्य उत्तराखण्ड में खेतो से है जहां पर सम्पूर्ण गांव की काश्त की खेती होती है। गांव में आज जब लोग कहते हैं कि मैं ‘‘पाणी के तरफ या सेरा’’ जा रहा हूं, समझ लिजिए कि वह लघुशंका जा रहा है। अर्थात लघुशंका की जगह वही खेत हैं जहां कृषि कार्य होता हैं। यह रही परम्परा की बात।
ताज्जुब हो कि जैसे-जैसे समाज ने विकास की गति पकड़ी है वैसे-वैसे रहन-सहन के तौर तरीको में भी भारी बदलाव आने लग गया। संयुक्त परिवार एकल होने लग गये। खेतो की मेड़ भी सिकुड़ती चली गयी। खेतो में अनाज नही कंकरीट के जंगल उगने लग गये। लोगो के पास आर्थिक संसाधनो की बढोतरी होने लगने लगी तो वे प्राकृतिक संसाधनो का तेजी से दोहन करने लग गये। पानी की सर्वाधिक आवश्यकता होने लग गयी। की उन्हें तो शौचालय के लिए पानी चाहिए, प्रतिदिन नहाने के लिए, कपड़े धोने के लिए, पोंछा लगाने के लिए इत्यादि-इत्यादि के लिए पानी की मांग तेजी से बढने लग गयी। मगर पानी का संरक्षण कैसे हो इस पर हम सोचने के लिए एक कदम भी आगे नहीं बढ रहे हैं। अब हालात इस कदर होने लग गयी है कि दिनों दिन लोग अपने-अपने घरों में शौचालय का निर्माण तो करवा रहे हैं परन्तु इसमें एकत्रित होने वाला शौच का निस्तारण कैसे हो इस पर कोई कारगर कदम नहीं उठ पाये।
उत्तराखण्ड हिमालय की बसावट ऐसी है कि जहां कही भी कोई पानी गिर जाये वह नीचे ही बहकर आता है। सीढीनुमा और 90डिग्री समकोण में बसे गांव और उन गांवों में बन रहे शौचालयों के कारण पहाड़ का भू-जल बड़ी मात्रा में प्रदूषण में तब्दिल हो रहा है। इन पहाड़ी गांवों में बने शौचालय की बनावट ऐसी है कि जैसे ऊपर वाली सीढी पर शौचालय का गढा बना हुआ है तो उस गढे के भीतर इक्कठा हुआ मल और पानी स्वतः ही निचली वाली सीढी से बाहर निस्तारित हो जाता है या उसी के आस-पास निकलने वाले जल स्रोत के साथ बाहर आ जाता है। ऐसा पहाड़ी ढलानो में बसे गावों में कईयो जगह देखने को मिल जायेगा। क्योंकि पहाड़ी ढलानो पर गांवों की ही बसासत है।
कुलमिलाकर शौचालय की जरूरत तो है परन्तु शौच का ठीक से निस्तारण हो यह अहम प्रश्न है। अर्थात कह सकते हैं कि शौचालय या स्वच्छता की कोई परम्परा नही हो सकती है यह तो दिल का मामला है। मनुष्य ने जिस तरह से अपने को आधुनिक बनाने में महारथ हासिल की है उसी तरह शौचालय और स्वच्छता की तरफ भी आगे बढने की प्रबल आवश्यकता है।
जनसंख्या का दबाव
पहले-पहल कृषि कार्य और पशुपालन जनसंख्या के समतुल्य था। उस दौरान गांव के आस-पास कुछ जंगली जानवर थे जो मानव मल का शोधन करते थे और गांव में पालतू कुत्ते होते थे जो मानव मल का स्वतः ही शोधन करते थे। अब इन पशुओ की संख्या मानव की अपेक्षा एकदम कम हो गयी है और वे जंगली जानवर तो यदा-कदा ही दिखाई देते हैं।
ईकोसेन ट्वाईलेट
देश की नामचीन संस्था अरघ्यम् ने एक ऐसा शौचालय को विकसित किया है जिसमें पानी डाला ही नहीं जाता है। इस शौचालय के प्रयोग में मल एक तरफ और मूत्र एक तरफ चला जाता है। मल के पीछे से कोई पानी नहीं डालना पड़ता है। मूत्र जिस तरफ जायेगा उसे भी एकत्रित करने का स्थान बनवाया गया। मूत्र को खेतो में खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है तो मल को भी 30 दिन बाद खाद के ही रूप में प्रयोग किया जाता है। इस ‘‘ईकोसेन ट्वाईलेट’’ के साथ दो गढे बनाये गये हैं। एक जब भर जाता है तो दूसरे को प्रयोग करते हैं। भरे हुए गढे को बन्द करके और 30 दिन बाद खोलकर बिना बदबू के आप निसंकोच खाद के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। इससे दो तरह के फायदे हमारे सामने पर हैं। एक तो भू-जल प्रदूषित नहीं होगा, दूसरा की पानी की फिजूजखर्ची नहीं होगी। यानि कि जिनके पास कृषि कार्य नहीं है वे अपने शौचालय से बनने वाली जैविक खाद को बाजार में बेच सकते है। अर्थात कृषि कार्य करने वालो को तो फायदा है ही साथ में उन लोगो का फायदा भी है जिनके पास कृषि कार्य नही है। इस तरह यह ‘‘ईकोसेन ट्वाईलेट’’ को प्रयोग में लाया जा सकता है।
उत्तराखण्ड के दो गांव होंगे टोटल सनिटेशन
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बताया कि वे 2017 तक चमोली व बागेश्वर को खुला शौच से मुक्त करायेंगे। इसके लिए राज्य सरकार इन दोनो जनपदो के लोगो को नैतिक सहयोग करेगी। ये जनपद खुद के ही संसाधनो से जनपदों के सम्पूर्ण गांवों को ‘‘टोटल सनिटेशन’’ के अन्तर्गत लायेगी।
