प्रेम पंचोली
राज्य बनने के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि न्यायालय के डण्डे से सरकार को देहरादून में अतिक्रमण हटाना पड़ा। वह भी तब जब राज्य के वरिष्ट पत्रकार मनमोहन लखेड़ा ने उच्च न्यायालय नैनीताल में एक वाद दायर किया था, कि देहरादून की सड़को व फुटपाथो पर अति अतिक्रमण होने जा रहा है। जिससे राजधानी में आने-जाने वाले लोगो को समस्या तो हो ही रही है बल्कि इस अस्थाई राजधानी में असामाजिक तत्वों का अड्डा भी बनता जा रहा है। हुआ यूं कि सरकार ने इस वाद के खिलाफ न्यायालय में अपना पक्ष रखना मुनासिब नहीं समझा और न्यायालय को एक तरफा फैसला सुनाना पड़ा। जिसका हस्र यह हुआ कि अतिक्रमण की मार उन लोगो पर सर्वाधिक पड़ी जो देहरादून शहर से हटकर निवास करते है जैस मलीन बस्ती आदि। मगर देहरादून के मुख्य मार्गो पर कब्जे जमाये हुए राजनीतिक पंहुच वालो पर अब तक कोई फर्क पड़ता हुआ नजर नहीं आ रहा है।
ज्ञात हो कि अट्ठारह वर्ष के दौरान देहरादून की शान्त वादियां, काॅलोनी, बस्तीयां, माॅल्स, फ्लैट्स व सड़को पर मोटर वाहनो की कतार ने अशान्त बना दिया है। यह हुआ कैसा जो सबके सामने हैं। लोग पहाड़ो से नीचे उतर रहे हैं तो बाहरी प्रदेशो के लोग रोजगार बावत देहरादून को अड्डा बना रहे हैं। इस बीच देहरादून घोर अतिक्रमण की चपेट में आ चुका है। यहां देखने वाली बात यह है कि देहरादून के मुख्य मार्गो पर बड़े-बड़े बिल्डरों ने माॅल्स, फ्लैट्स व अन्य व्यवसायिक गतिविधियों के लिए कब्जे अपने राजनीतिक पंहुच के चलते जमाये हुए हैं। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद सरकार द्वारा चलाये जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान के दायरे में सबसे पहले मलीन बस्तियां और मौहल्ले आये है। जबकि राजपुर रोड़ सहित अन्य मुख्य मार्गो पर अतिक्रमण की कहानी यथावत है। प्रश्न इस बात का है कि क्या उच्च न्यायालय ने सिर्फ व सिर्फ मलीन बस्तियों को अतिक्रमण के दायरे में माना है? क्या राजपुर रोड़ व अन्य मुख्य मार्गो पर कब्जे जामाये व्यवसायिक प्रतिष्ठान अतिक्रमण के दायरे में नही आ रहे है। यह बिडम्बना ही कहिऐ कि हमेशा कानून का डण्डा गरीब व कमजोर लोगो के ऊपर ही प्रयोग किया जाता है। जो इस दौरान देहरादून में चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान में साफ-साफ दिखाई दे रहा है।
काबिलेगौर हो कि देहरादून की मलीन बस्तियों में ऐसे लोग निवास करते हैं जो अधिकांश शहर को स्वच्छ रखने में बड़ी भूमिका निभाते है। इसके अलावा मलीन बस्तियों के अन्य लोग अपने रोजगार की तलाश में आकर यहां बस गये है। बता दें कि देहरादून की मलीन बस्तियां किसी भी मुख्य मार्ग पर कब्जा नही किये हुऐ है वे तो सिर्फ अपने सिर छुपाने के लिए नदियों के किनारे-किनारे मुश्किल से अमूमन 300 से 400 वर्ग फिट में कच्चे-पक्के मकान बनाकर रह रहे हैं। इनके कारण ना तो कोई नदी का रूख बदला है और ना ही मलीन बस्तियों के कारण देहरादून का सामाजिक सौहार्द बिगड़ा है। यदि देहरादून का सामाजिक सौहार्द बिगड़ रहा है तो वह देहरादून के मुख्य मार्गो पर हो रहे बेतरतीब व अवैज्ञानिक कब्जो के कारण। जिसकी कई सूचनाऐं पुलिस के पास अलग-अलग झगड़ा फसादांे पर हुई रिपोर्टो से पुष्ट होती है। अतिक्रमण के नाम से उजाड़े जा रही मलीन बस्तियों के हजारो लोग अब फिर से सड़को पर आ गये हैं। उन्हे एक बात का मलाल है कि वे अतिक्रमण के दायरे में हैं और उन्हें भी न्यायालय का डण्डा दिखाया जा रहा है, पर जो लोग देहरादून के मुख्य मार्गो पर कब्जा बैठाये हुए है उन्हे ना तो हटाया जा रहा है और ना ही उन्हे कानून की फिक्र है।
उल्लेखनीय हो कि अकेले देहरादून में 129 मलिन बस्तियां हैं। जो लगभग 1977 से 1980 के आस-पास ही बस चुकी थी। यह बस्तियां क्रमशः रिस्पना, बिंदाल, ऋषि नगर और राजपुर आदि क्षेत्रों में बसी है। बताया जाता है कि इन बस्तियों में लगभग 70 प्रतिशत की जनसंख्या अनुसूचित जातियों की है। इधर वे लोग अब अवैध रूप से बसे हैं ऐसा की उन्हे बार-बार बताया जाता है। बता दें कि मगर मलिन बस्तियों के लोग बिजली का बिल ,पानी का बिल, नगर निगम को टैक्स इत्यादि नियमित रूप से 80 के दशक से देतेे आ रहे है। यही नहीं इन बस्तियों के हर व्यक्ति के पास वोटर कार्ड, आधार कार्ड है, स्थाई निवास प्रमाण पत्र जैसे तमाम ऐसे प्रमाणपत्र हैं जो इन्हे बस्तियों में निवास करने का प्रमाण पुख्ता करते हैं। फलस्वरूप इसके राजपुर विधानसभा के पूर्व विधायक राजकुमार गला फाड़-फाड़कर और बस्तियों में जा-जाकर चिल्लाते हैं कि कांग्रेस के शासनकाल यानि 2016 में मलिन बस्तियों को मालिकाना हक देना शुरु कर दिया था, साथ-साथ इन बस्तियों के रखरखाव के लिए 400 करोड़ का एक बजट भी स्वीकृत करवाया गया था। आज निर्वतमान हो चुके राजकुमार विधायक तत्काल कांग्रेस में रहते हुए मलीन बस्तियों को मालीकाना हक नहीं दिला पाये हां इतना जरूर हुआ कि पूर्व विधायक राजकुमार मलीन बस्तियों के कारण मीडिया की सुर्खियों में अवश्य आये हैं।
बताया जाता है कि पिछली कांग्रेसनीत सरकार ने यानि साल 2016 में एक अधिसूचना जारी की है। जिसका अनुपालन निदेशक शहरी विकास निदेशालय को करवाना था। निदेशालय को उत्तराखंड राज्य की नगर निकाय अवस्थित मलिन बस्तियों के सुधार विनियमितीकरण पुनर्वास पुनर्स्थापन तथा उनसे संबंधित व्यवस्थाओं एवं अतिक्रमण निषेध नियमावली 2016 को क्रियान्वयन करना था। सो हालात यह हो गई कि मलीन बस्तियों के लोगो को अब खुले आसमान के नीचे ही बसेरा करना होगा।
क्या कहती है अतिक्रमण निषेध नियमावली 2016
इस नियमावली का संक्षिप्त नाम उत्तराखंड राज्य की नगर निकायों में अवस्थित मलिन बस्तियो के सुधार विनियमितीकरण ,पुनर्वासन, पुनर्स्थापन तथा उससे संबंधित व्यवस्थाओं एवं अतिक्रमण निषेध नियमावली 2016 है। जिसे उत्तराखंड राज्य की सभी नगर निकायों में लागू होना था। यह नियमावली कहती है कि मलिन बस्तियां आज पूर्ण रूप से परिभाषित है। जिसकी पुष्टी के लिए जिलाधिकारी की संस्तुति अनिवार्य होगी। इसमें यह भी कहा गया कि मलीन बस्ती में रहने वाले परिवार ही नियमितीकरण के दायरे में होंगे। जिसे जिलाधिकारी के संज्ञान में लाते हुए बस्तियों के सुधार विनियमितीकरण पुनर्वास, पुनर्स्थापन, अतिक्रमण निषेध अधिनियम 2016 के अन्र्तगत लाया जाये। इसके अलाया विनियमितीकरण श्रेणी एक में कहा गया कि मलिन बस्ती को स्व-स्थान पर ही प्रदत्त भू-स्वामित्व का अधिकार दिया जाना चाहिए। जबकि पुनर्वास बावत पुनर्स्थापन स्थल की दूरी को यथासंभव न्यूनतम रखा जाए जिससे आजीविका पर अनावश्यक प्रभाव ना पड़े। इसके लिए बाकायदा विशेष आजीविका परक कार्यक्रम चलाने की भी योजना हो। जबकि इस अधिनियम को क्रियान्वित करने के लिए एक राज्य स्तरीय अनुसरण समिति का गठन होना भी बताया गया है। इस अनुसरण समिति की प्रबन्धकारणी में सचिव नगर विकास, सचिव राजस्व विभाग, प्रमुख सचिव आवास विभाग, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य विभाग, प्रमुख सचिव सिंचाई विभाग, प्रमुख सचिव वन एवं पर्यावरण विभाग, एक आयुक्त सदस्य को नामित किया गया था। जबकि यह राज्य स्तरीय समिति प्रत्येक माह में अनिवार्य रूप से एक बैठक आयोजित करेगी। मगर यह बैठक कागजो तक ही सीमित रह गई। इस नियमावली में यह भी प्राविधान है कि कृत कार्यवाही एवं निर्णय के विरुद्ध प्रभावित पक्ष द्वारा एक माह की समय अवधि संबंधित मंडल के मंडलायुक्त के समक्ष ही रखी जायेगी। यही नहीं इस नियमावली में बताया गया कि राज्य सरकार की भूमि पर 2017 के पश्चात किया जाने वाला कोई भी कब्जा दंडनीय अपराध होगा। जिला अधिकारी अथवा उनके द्वारा अधिकृत प्राधिकारी तथा संबंधित विभाग भूमि जिनकी भूमि पर उपरोक्तअनुसार कब्जा किया जाता है के लिए सक्षम प्राधिकारी ऐसे कानूनी कदम उठाने के लिए सक्षम होंगे। यह भी प्राविधान है कि जो राज्य सरकार की भूमि पर कब्जे तथा अधिसूचित मलिन बस्तियों में नए कब्जे करते हुए पाया जाये और कब्जा करने के लिए उकसाने का माहौल बनाने वाले के विरूद्ध भी अधिनियम में दण्डकारी कानूनी प्राविधान है तथा ऐसे के विरूद्ध जिला अधिकारी अथवा उनके द्वारा अधिकृत संबंधित विभाग सक्षम न्यायालय में वाद करने के लिए स्वतन्त्र होंगे।













