अब कहां सुनाई देगी धराली गांव में बच्चो की किलकारियां। सब कुछ तबाह कर दिया खीर गंगा की बाढ़ नें।
।। प्रेम पंचोली ।।
गंगोत्री से ठीक 18 किमी पहले 05 अगस्त को धराली गांव के ऊपर आये एवलांच ने गांव को हमेशा हमेशा के लिए मिटा दिया। एवंलाच इतना खतरनाक था कि देखते ही देखते 40 सकेण्ड में गांव मलवे की ढेर में तब्दील हो गया।
मुखवा गांव निवासी अशोक सेमवाल इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे है। उन्होने हालांकि सामने से यानि भागीरथी की पल्ली पार मुखवा गांव से इस घटना को हूबहू देखा और अपने मोबाइल फोन से वीडियों भी बनाई, मगर आज भी वे कंपकपाते हुए ही उस दिन की घटना पर बात रख पाते है। वे बताते हैं कि उन्होने वीडियो भी बनाई और आवाज मारी, सीटीयां बजाई कि भागो भागो पर प्रकृति के इस विद्रुप रूप के सामने कौन टिक पाता। वे ईश्वर का शुक्र मानते हैं कि उस दिन गांव में हारदूधा मेला था। ठीक सवा एक बजे गांव के सर्वाधिक लोग पंचायती आंगन में सोमेश्वर देवता की पूजा में सम्मिलित थे। इसी वक्त धराली गांव देखते ही देखते मलवे में तब्दील हो गया। इसलिए धराली के ग्रामीण बड़ी जनहानी से बच निकले। परन्तु गांव में ऐसा कोई परिवार नहीं है जिसने इस आपदा में किसी न किसी रूप में अपने खोये है जो अब कभी वापस नहीं आने वाले है।
उल्लेखनीय हो कि 2011 की जनगणना के अनुसार धराली गांव की जनसंख्या लगभग 600 से अधिक है। धराली गांव वैसे भी खीर गाड़ अथवा खीर गंगा के मुहायने पर बसा है। इस गांव ने पूर्व में भी कई बार खीर गंगा का डरावना रूप देख रखा था। मगर 05 अगस्त जैसे मनहूस दिन की ग्रामीणों ने कभी कल्पना नहीं की थी। जबकि गांव का पंचायती आंगन खीर गंगा की बांयी ओर पहाड़ की तलहटी पर है, यही गांव का मूल स्वरूप भी है। बढते संसाधनो और बढती जनसंख्या ने गांव को और विस्तार दिया। जिसने वर्तमान में एक शहर का रूप भीर ले लिया था। अर्थात धराली गंगोत्री जाने वाले यात्रियों के लिए अन्तिम पड़ाव था। यहां सुन्दर और विशाल होटल, रेस्तरां, होमस्टे, रिजोर्ट आदि बने थे। जो अधिकांश धराली गांव निवासियों के ही थे। इधर ग्रामीणो के सेब के बागान और अन्य कृषि उपज के लिए खेती बाड़ी होती थी। हर्षिल की राजमा जो दुनियां में बहुत ही विख्यात है का उत्पादन भी यहीं पर होता था। सामने पर मुखवा गांव और पांच किमी पहले प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर हर्षिल आने जाने वाले पर्यटको के लिए यह धराली कभी बहुत ही मुफिद जगह हुआ करती थी जो अब एवलांच के मलवे में ढेर हो चुकी है।
दरअसल धराली गांव तो नेस्तनाबूद हुआ ही, उसी वक्त हर्षिल में भी तिलना गाड़ की बाढ ने भी तबाही मचाई है। इस बाढ ने हर्षिल में आर्मी का हेलीपैड सहित नौ जवानो को लील लिया है। अब तक आर्मी के यह जवान लापता है। तिलना गाड़ की बाढ ने भागीरथी के प्रवाह को कुछ घण्टो तक रोके रखा, बाद में हर्षिल से धराली तक इस बाढ के पानी और खीर गंगा के मलवे ने एक झील का रूप ले लिया है, जिसे एनडीआरएफ और अन्य संस्थाओं ने 10 दिन बाद बड़ी मसक्कत से खोल पाया है। 05 अगस्त की अतिवृष्टी और खीर गंगा में आये एवलांच ने गंगोत्री से लेकर भटवाड़ी तक सड़क, पुल, पैदल रास्ते आदि सभी बहाकर ले गये। जबकि उत्तरकाशी शहर को भी रेड अलर्ट में रखा गया था।
बताया गया कि कुछ समय पहले खीर गंगा के कैचमेंट एरिया में एक पहाड़ी टूटकर खीर गंगा में आ गई, जिसने यहां टूटते ग्लेशियरों को एकत्र किया है। जब यह डिपोजिट ग्लेशियर 05 अगस्त को टूटा तो इसने धराली गांव को ही समाप्त कर दिया। इस आपदा में जिन्दा बचे हुए ग्रामीणों के पास सिर्फ बदन पर जो कपड़े पहने है सिवाय इनके पास अब कुछ भी नहीं है। खेत, बागान, मकान और अन्य रोजगार के साधन धराली के लोग अब खो चुके है जिसे वे आज भी मलवे के नीचे ढूंढने को बेताब है। 5 अगस्त 2025 को आए एवलांच ने कल्पकेदार के मंदिर सहित संपूर्ण धराली गांव का नमो निशान मिटा दिया है। लगभग 20 से 40 फिट मलवा के नीचे कईयों जिंदगियां दफन हो चुकी है। इधर गांव के 44 छात्र ऐसे है जो विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत है उनके सामने अब अपनी आगे की पढाई करने का संकट मण्डरा रहा है। क्योंकि धराली में उनके घर और रोजगार के सभी साधन आपदा की भेंट चढ चुके है।
इस आपदा में कितने लोगों ने अपनी जान गंवाई इसका आंकलन करना बहुत कठीन है। धराली गांव और बाजार एक साथ हो चुका था। धराली बाजार में होटल रेस्तरां, रिजार्ट आदि थे तो गांव में हामस्टे भी बने थे। इन सभी व्यवसायिक प्रतिष्ठानो में सर्वाधिक नेपाली मूल के लोग काम करते थे। कुछ अन्य जगहो के लोग भी काम करते थे। बता दें कि गांव के सर्वाधिक लोग सोमेश्वर देवता की पूजा में सम्मिलित थे, मगर व्यवसायिक प्रतिष्ठाानो में काम करने वाले लोग अपने अपने प्रतिष्ठानो में ही मौजूद थे। हालांकि इनकी संख्या कम बताई जा रही है। क्योंकि बरसात के कारण यात्रियों का अना जाना कम था, सो प्रत्येक प्रतिष्ठान में दो या दो से अधिक लोग कार्यरत थे ही। इस तरह से भी देखा जाये तो इस पापी एवलांच ने सैकड़ो घरो का दिया बुझाा दिया है।
ऐसा भयावह मंजर।
वैसे भी धराली गांव ग्लेशियर के मलवे के ऊपर ही बसा था। जिसे भूगर्भ वैज्ञानिक कई बार बता चुके है। बताते चलें कि 1864 में भी धराली गांव नेस्तनाबूद हो चुका था। इस दौरान गांव में स्थित कल्पेश्वर मंदिर भी मलवे में दब गया था जिसे बाद में कई वर्षो बाद खोला गया। जबकि 2013 की आपदा में भी यह गांव खतरे के निशान पर आ गया था।
भूगर्भ वैज्ञानिको के अनुसार यह अतिसंवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र है। धराली गांव भी खीर गंगा (खीर गाड़) के मुहायने पर बसा था। 05 अगस्त को दोपहर में आये एवलांच ने मात्र 40 सेकेंड में सबकुछ तबाह कर दिया। जिसमें आर्मी का हेलीपैड, मैदान भी झील में तब्दील हो गया है। जबकि आर्मी के 09 जवान अब तक लापता है। 65 होटल, 30 रिजॉर्ट, होमस्टे सहित सम्पूर्ण धराली गांव जमीदोज गया है।
उल्लेखनीय हो कि 1978 में भी 5 अगस्त को ही कनोडिया गाड़ में भयंकर बाढ़ आई थी। जिसने गंगा को डबरानी के पास 18 घंटे तक रोककर रखा। उन दिनों उत्तरकाशी में भारी तबाही हुई थी। ठीक इसी दिन 5 अगस्त 2025 को फिर खीर गंगा में आये एवलांच ने 40 सेकेंड में धराली गांव को नेस्तनाबूद कर दिया। वैसे भी उत्तरकाशी को कई बार आपदाओं ने गहरे गहरे जख्म दिए है। 1978 की बाढ़, 1991 का भूकंप, 2010 और 2013 की बाढ़ तथा अब धराली की आपदा ने एक बार फिर उत्तरकाशी के आपदा के जख्म को प्रकृति ने ताजा कर दिया है। दअरसल इस डरावने और खतरनाक स्थिति से उत्तरकाशी के लोग बार बार सामना करते है।
क्या धराली की आपदा प्राकृतिक और मानवजनित है?
उत्तराखंड के लोक जीवन में एक बहुत पुरानी कहावत हे, नदी का वास, कुल का वास। यह पंक्ति कई बार चरितार्थ हुई है। साल 2013 की केदारनाथ जल प्रलय के बाद सरकार ने निर्णय लिया था कि इन स्थानों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम और डफ़लर रडार लगाकर प्राकृतिक आपदाओं के न्यूनीकरण में मदद ली जाएगी। सरकार ने भी स्वीकार किया था कि केदारनाथ में 10 हजार से अधिक लोग आपदा के शिकार हुए थे। आज दिन तक भी वहा नर कंकालों का मिलना आपदा के उन ज़ख्मों की याद दिला देता है। इस घटना के 12 साल बीत जाने के बाद सरकार का अर्ली वार्निंग सिस्टम और आपदा न्यूनीकरण की नीति ओर योजना जमीन पर नहीं उतार सकी। धराली आपदा अनियोजित विकास की मानव जनित आपदा है। ब्रिटिश शासन में भी कस्बों और नगरों में निर्माण कार्य के लिए स्पष्ट गाइड लाइन थी कि नदी नालों के निकट 200 मीटर के रेडियस में कोई निर्माण कार्य नहीं होगे। नियम अब भी है, पर कथित विकास और भ्रष्टाचार के चलते नियम कानून फ़ाइलों में बंद पड़े है।
हम दो वर्ष पूर्व की जोशीमठ आपदा के घावों को नहीं भर पाये थे कि उत्तरकाशी धराली की आपदा ने एक बार हमें चेताया है कि प्रकृति से अनियोजित छेड़छाड़ के गंभीर परिणाम भुगतने होगे। वरिष्ठ भू वैज्ञानिक के एस बल्दिया ने फरवरी 1974 के एक जर्नल साइंस टुडे में लिखा था कि पिथौरागढ़, चमोली और केदारनाथ क्षेत्र के नीचे गुजरती थ्रस्ट लाइन उत्तरकाशी के गंगोत्री से गुजरते हुए हिमाचल के सिरमौर तक जाती है। इसे गंभीर अति संवेदनशील मानते हुए उन्होंने इस क्षेत्र में भारी भवनों के निर्माण को विनाशकारी बताया था।
वैज्ञानिकों के अनुसार धराली गांव 1836 के बर्फ़ के एवलांच पर बसा है। भू वैज्ञानिक डी॰ सी॰ नैनवाल का मानना हे कि पुराने एवलांचो के ऊपर बसे इन नगरों अथवा गांवों की आबादी हमेशा खतरे की जद में हैं। रिवर फ्रंट जैसी योजनाओं से नदियों की स्वाभाविक चौड़ाई को कम करके पर्यटन के नाम पर छेड़छाड़ से पहाड़ के भूगोल को बदलने के गंभीर परिणाम सामने आने लगे हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ।
भूगर्भ विज्ञानी प्रो॰ एस॰ पी॰ सती बताते हैं कि 1836 में इसी खीर गाड़ में खतरनाक बाढ़ आई थी। उस दौरान भी सम्पूर्ण धराली क़स्बे को पाट दिया था। उनका दावा है कि अभी जो भी बसावट है, वह उस समय नदी के साथ आई गाद पर ही स्थित है। पिछले कुछ सालों में खीर गंगा (खीर गाड़) में पानी के तेज़ बहाव की कई घटनाएं सामने आई है। कई घर इस बाढ़ में बहे भी हैं, लेकिन कोई जनहानि नहीं हुई थी।
इतिहासकार पद्मश्री डा॰ शेखर पाठक, पर्यावरण के विशेषज्ञ पद्मश्री अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणपिद् सुरेश भाई भी मानते हैं कि यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील है और भूस्खलन और एवलांच जैसे हादसों की संभावना यहां हर वक्त बनी रहती है। वे आगे बताते हैं कि पहले ऊँचाई वाले इन क्षेत्रों में बर्फ़ गिरती थी, ग्लेशियर बनते थे, बारिश बहुत कम होती थी। लेकिन अब बर्फ़ कम गिरती है और बारिश ख़ूब होती है। जिस कारण इस तरह की खतरनाक प्राकृतिक आपदाओं को बढना है। अर्थात यही जलवायु परिवर्तन असर है।
पद्मश्री डा॰ शेखर पाठक बताते हैं कि हिमालय की चौखंभा वेस्टर्न रेंज का यह क्षेत्र है। साल 1700 में जब गढ़वाल में परमार राजवंश का शासन था। तब भी यहां बड़ा भूस्खलन हुआ। जिससे झाला में 14 किलोमीटर लंबी झील बन गई थी और इसका प्रमाण आज भी देखा जा सकता है। क्योंकि यहां भागीरथी ठहरी हुई दिखती है।
पुराने जख्मो को कुरेद डाला खीरगंगा की बाढ़ ने।
गंगोत्री, धराली और हर्षिल में प्राकृतिक आपदाओं का इतिहास रहा है। यहां 05 अगस्त 2025 में आई आपदा सबसे हालिया है। 2010 और 2012 में भी धराली में बाढ़ आई थी। 1978 में आई भयंकर बाढ ने धराली से नीचे उत्तरकाशी की तरफ़ 35 किलोमीटर दूर डबराणी में 18 घण्टे तक भागीरथी का प्रवाह रोके रखा। इस दौरान भी काफी नुकसान हुआ है। इसके अलावा साल 1700 में इसी भागीरथी क्षेत्र में एक बड़ा भूस्खलन हुआ था जिससे झाला नामक स्थान में भागीरथी नदी पर 14 किलोमीटर लंबी झील बन गई थी। 1836 में एवलांच ने धराली में तबाही मचाई थी।
धराली गांव की सूक्ष्म जानकारी।
धराली गांव उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में समुद्र तल से लगभग 8 हजार फीट की ऊंचाई पर भागीरथी नदी के किनारे हर्षिल घाटी के पास बसा हुआ है। जो गंगोत्री पहुंचने से पहले का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सेब के बागानों और राजमा की खेती के लिए भी यह प्रसिद्ध स्थान था।
धराली गांव में वैसे तो कई प्रसिद्ध मंदिर हैं लेकिन इसमें कल्प केदार मंदिर का सबसे ज्यादा महत्व है। जो इस आपदा में फिर से जमीदोज हो गया है। इस मंदिर का वास्तु शिल्प केदारनाथ धाम से मिलता है। जिसे कारण इस मंदिर का नाम कल्प केदार पड़ा। 1864 में यह मंदिर आपदा की वजह से जमीन में दबा गया था। 1945 में खीर गंगा के इस नाले का बहाव कुछ कम हुआ तो लोगों को इस मंदिर का शिखर दिखाई दिया। तत्काल लोगों ने जब इस जगह से 20 फिट मलवा हटाया तो पूरा शिव मंदिर सामने आया जिसकी बनावट केदारनाथ से मिलती है। यथा कल्पकेदार मंदिर।
दुपट्टा फाड़कर सीएम को बांधी राखी।
आपदा प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण कर रहे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने ऐसा दृश्य आया, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर दिया। अहमदाबाद के ईशनपुर की रहने वाली धनगौरी बरौलिया अपने परिवार के साथ गंगोत्री दर्शन के लिए आई थीं। 05 अगस्त को धराली में आई भीषण आपदा ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। अचानक आए मलबे और तेज बहाव से मार्ग पूरी तरह बंद हो गया और वे अपने परिवार सहित गंगोत्री में ही फंस गईं। चारों ओर तबाही का मंजर, भय और अनिश्चितता का माहौल था। घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर, किसी को नहीं पता था कि अब आगे क्या होगा। जब मुख्यमंत्री धामी तीन दिन से लगातार ग्राउंड जीरो पर आपदा प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण कर रहे थे, तो धनगौरी अपनी कृतज्ञता रोक नहीं सकीं। उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन उन आंसुओं में डर नहीं, भरोसा था। वे आगे बढ़ीं, अपनी साड़ी का किनारा फाड़ा और उसका एक टुकड़ा राखी के रूप में मुख्यमंत्री की कलाई पर बांध दिया। राखी बांधते हुए उन्होंने भावुक होकर कहा “मेरे लिए मुख्यमंत्री धामी भगवान श्रीकृष्ण जैसे हैं, जिन्होंने न केवल मेरी, बल्कि यहां मौजूद सभी माताओं-बहनों की एक भाई की तरह रक्षा की है।
आपदा राहत मे सरकार मुस्तैद।
5 अगस्त 2025 को धराली-उत्तरकाशी और हर्षिल में आई आपदा के दौरान सरकार और स्थानिय प्रशासन आरम्भ से ही मुस्तैद दिखाई दिया। मुख्यमंत्री ने भी तत्काल अधिकारियों को प्रभावितों के लिए भोजन, पेयजल और आश्रय की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। बचाव कार्यों और पीड़ितों को हवाई मार्ग से निकालने के लिए वायु सेना के एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की सहायता ली जा रही है। शासन ने गढ़वाल आयुक्त विनय शंकर पांडे को आपदा का नोडल अधिकारी नियुक्त किया। उत्तरकाशी में जिलाधिकारियों रहे डॉ. मेहरबान सिंह बिष्ट, अभिषेक रोहिल्ला और गौरव कुमार को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गईं। अपर सचिव विनीत कुमार को उत्तरकाशी में डेरा डालने के निर्देश दिए गए। देहरादून से दो पुलिस महानिरीक्षक, तीन पुलिस अधीक्षक, एक कमांडेंट और 11 पुलिस उपाधीक्षकों के साथ 300 पुलिस कर्मियों को उत्तरकाशी भेजा गया। 40वीं बटालियन पीएसी और आईआरबी द्वितीय बटालियन देहरादून की विशेष आपदा इकाई के 140 जवानों को भी तैनात किया गया। देहरादून, हरिद्वार, पौड़ी और टिहरी से कांस्टेबल से लेकर निरीक्षक तक 160 पुलिस कर्मियों को भेजा गया। सरकार ने राहत और बचाव कार्यों के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष से 20 करोड़ की धनराशी जारी की है। इधर 6 अगस्त 2025 की सुबह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री धामी से फोन पर बात की और पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।
इस तरह धराली आपदा क्षेत्र में चंडीगढ़, सरसावा और आगरा से दो चिनूक और दो एमआई-17 हेलीकॉप्टर तैनात किए। सड़क संपर्क बहाल करने के लिए चिनूक हेलीकॉप्टरों की सहायता ली जा रही है। स्वास्थ्य विभाग ने दून मेडिकल कॉलेज, कोरोनेशन जिला अस्पताल और एम्स ऋषिकेश में बिस्तर आरक्षित करवाये और विशेषज्ञ डॉक्टरों को उत्तरकाशी भेजा।
ज़िला प्रशासन ने इंटर कॉलेज हर्षिल, जीएमवीएन और झाला में राहत शिविर शुरू किए है। एनआईएम और एसडीआरएफ ने लिमचागाड़ में एक अस्थायी पुल का निर्माण भी किया है। इस पुल के बहने के कारण धराली से बाहरी लोगों का सर्म्पक कट गया था।
बादल नहीं फटा, खतरनाक एवलांच आया।
धराली आपदा के बाद एसडीआरएफ की संयुक्त टीम ने खीर गंगा उद्गम स्थल तक उच्च स्तरीय रैकी एवं भौतिक निरीक्षण किया है। पता चला कि 5 अगस्त 2025 को खीर गंगा में आई भीषण जलप्रलय एवलांच ही था। 14-15 अगस्त 2025 को मुख्य आरक्षी राजेन्द्र नाथ के नेतृत्व में मुख्य आरक्षी प्रदीप पंवार, कांस्टेबल सोहन सिंह, एनआइएम उत्तरकाशी के प्रशिक्षक शिवराज पंवार एवं अनुप पंवार तथा पोटर तारा व हरि की संयुक्त टीम द्वारा श्रीकंठ पर्वत बेस एवं खीर गंगा उद्गम स्थल का भौतिक निरीक्षण किया गया।
इस तरह से मालूम हो रहा है कि खीर गंगा में पानी के साथ मलवा काफी ऊंचाई से आया है जो लगभग 4800 मी की ऊंचाई से बताया जा रहा है। दरअसल यही श्रीकंठ पर्वत का बेस क्षेत्र है और यह पुराना ग्लेशियर क्षेत्र है। यहां ग्लेशियर डिपॉजिट मोरेन हैं। उक्त दिन तीन स्थानों से यह खिसककर नीचे की तरफ आया और तेजी से बहता हुआ धराली को बहा ले गया।








