Friday, March 27, 2020

क्रूरता की पराकाष्टा, चीन की कूटनीतिक चाल

||क्रूरता की पराकाष्टा, चीन की कूटनीतिक चाल||

||  PREM PANCHOLI  ||


दुनियांभर के अधिकांश देश कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहे है। अपने अपने स्तर से लोग इस महामारी का मुकाबला कर रहे है। हालात ऐसी है कि विश्व पटल पर जनाधारित कार्यो की निगरानी रखने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्रवाई भी मौजूदा समय में निष्क्रिय दिखाई दे रही है। ऐसा लोग सोसल मीडिया पर संवाद कायम कर रहे है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन दुनियां के लोगो की सेवा के लिए एक निगरानी करने वाली विश्वसनीय संस्था है। यदि ऐसी संस्थाऐ लोगो का विश्वास खो रही है तो मानवता खतरे में जा रही है। जिस पर आज ही सोचा जाना लाजमी है।

सन्देह क्यों है? इसलिए कि वुहान शहर से चीन की राजधानी बीजिंग और शंघाई की दूरी कोई 800 किमी के आसपास ही बताई जाती है। और दूसरे देशों की दूरी हजारो किमी है। यानि 1000 किमी से कम दूरी वाली जगह पर कोरोना वायरस ने कोई संकट पैदा नहीं किया है और हजारो मील दूर के देशो में कोरोना ने महामारी पैदा कर दी। इसके अलावा वुहान शहर में पहला कोराना ग्रसित व्यक्ति मिला, यहीं से बीमारी लोगो की जान पर उतर आई। यही नहीं इस बीमारी के प्रकोप से पूर्व ही चीन ने 12000 बेड वाला हस्पताल भी बनवा लिया था। वुहान शहर में आप जैसे प्रवेश करेंगे आपको 200मी0 लम्बी सुरंग से गुजरना पड़ता, ताकि आप पूर्ण रूप से सैनिटाईज होकर जाये। ये ऐसे सवाल है, जिन पर भरोसा किया जा सकता है। अर्थात चीन को मालूम था कि वे इस मानवजनित कोरोना वायरस से निपट लेंगे। यह भी उन्हें ही मालूम था बनस्पत अन्य देशाों के।

इसके अलावा अक्टूबर 2019 में जब चीन में इस कोरोना वायरस ने पनाह ली तो उस वक्त से ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की संवेदनशीलता नहीं दिखाई दी। बजाय कई बार संगठन ऐसे बयान कर चुका है कि यह कोई वैश्विक समस्या नहीं है। जबकि कोरोना के प्रारंभिक सैंपल को चीन ने नष्ट कर दिया था, जिसकी सूचना विश्व स्वास्थ्य संगठन को पूर्व से थी। 

उल्लेखनीय यह है कि कोरोना मानव से मानव में फैलता है, जिसे चीन के चिकित्सको द्वारा पुष्ट भी किया गया था। दूसरी तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन के कम्युनिटी निदेशक को यह वायरस एक अफवाह जैसी लग रही थी। क्योंकि वे उन्ही दिनों यानि जनवरी 2020 में बीजिंग (चीन की राजधानी) में प्रवास पर थे। फिर भी इस वायरस के खतरे से वाकिफ नहीं हुए। और तो और 11 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ट्वीट करके लोगो को अगाह करता है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय उड़ान के लिए कोई गाइडलाइन जारी करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह वायरस मानव से मानव में नहीं फैलता है। मौजूदा समय में साबित हो गया कि कोरोना मानव से मानव में फैलता है। जिस कारण दुनियां में लाखों लोगो ने अपनी जान गंवाई है।

बताया जा रहा है कि चीन के वुहान शहर से पांच लाख लोग उन्हीं दिनों बिना मेडिकल जांच के दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पंहुच गये। इटली में 6 फरवरी 2020 तक कोरोना वायरस का मामूली केस था। इधर चीनी हम चीनी हैं, वायरस नहीं, हमें गले लगाइए वगैरह। ऐसा कहकर वे दुनिया के महशूर पर्यटन स्थल सिटी ऑफ लव यानि इटली पंहुच गये।

भारत के अलावा इटली, जर्मनी, स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका तक के देश कोरोना से निपटने में त्वरित सफलता नहीं पा रहे हैं। चीन की कूटनीति का हस्र है कि भारत और अन्य देश इंटरनेशनल कम्युनिटी में उसके अछूतपन को दूर करे। मगर समझने के लिए यही काफी है कि जिस तरह का चरित्र विश्व समुदाय के सामने चीन का इस वक्त आया है वह किसी से छुपा नहीं है। इसके अलावा और चीजों को भी आज विश्वस्तर पर समझने की आवश्यकता जताई जा रही है।

विश्व स्तर पर बहस इस ओर होनी चाहिए कि क्या लोगों में वैमनस्य है। यदि है तो एक देश के लोग दूसरे देशो में कैसे प्रवास कर सकते है। चीन में या चीन अधिकृत तिब्बत में दुनियां के सर्वाधिक पर्यटक आते-जाते है। इसके इतर चीन के व्यापारिक रिश्तो को विश्व समुदाय हाथो हाथ लेता है। कह सकते हैं कि विश्वस्तर पर चीन के लिए कोई लक्ष्मण रेखा तय नहीं है। तो फिर चीन की राजनीति मंे इतनी क्रूरता क्यों है। इस ओर बहस आगे बढनी चाहिए। आज पूरा विश्व तकनीकी विकास के कारण बहुत ही नजदिक आ चुका है। ऐसे वक्त में क्रूर कूटनीति का चलन कितना मानवीय होगा? 

मानवाधिकारों का हनन ना हो इस बावत विश्व स्तर पर अलग अलग संगठन भी कार्य कर रहे है। किन्तु जो संकट इस वक्त दुनियां के लोगो के सामने आया, उसमें विश्व स्तरीय संगठनो की भूमिका सन्देह के घेरे में है। 2019 के अन्त में और 2020 के आरम्भ में इन्सानो पर जो संकट कोरोना जैसी महामारी के रूप में आई उसे सम्पूर्ण विश्व समुदाय कभी भूल नहीं सकता।
जानकारो का कहना है कि चीन की कूटनीति का पर्दाफाश हो चुका है कि वे अपने व्यापार के बलबूते विश्व समुदाय के संसाधनो पर कब्जा करना चाहता था। पर उनकी करतूतो का भाण्डा पहले ही फूट गया है। चीन ने पहले खुद को बीमार बताया, कुछ समय बाद अपनी मुद्रास्फिति को गिरने का संकट बताया। हरकते इतनी बेईमानी साबित हो रही है कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अपने शेयर कम करने की चीन ने प्रबल कोशिश की है। 

वर्तमान में चीन ने अब अन्तर्राष्ट्रीय बाजार पर फिर से कब्जा जमाने की रणनीति बना डाली। इसके प्रमाण यह है कि जापान, फ्रांस, इटली और दूसरे देशो की व्यापारिक कम्पनियों के साथ अपने शेयर होल्डर के रिश्ते खत्म करके, ऐसी कम्पनियों को खरीदना आरम्भ कर दिया है। क्योंकि चीन ने अपने देश में कोरोना वायरस के कारगर उपाय ढूंढ निकाले है या पूर्व से उनके पास इसके इन्तजाम थे, पर अन्य देश कोरोना की इस महामारी में जकड़ गये है। इस महामारी के कारण अन्य देशो की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है। दूसरी ओर चीन में मध्यम और कमजोर लोगों की संख्या वर्तमान में बहुत कम हो गई है।

कुलमिलाकर चीन में पैदा हुआ कोरोना वायरस ने विश्व स्तर पर एक तरफ मंदी का असर दिखाया और दूसरी तरफ विश्व समुदाय को इक्कीसवीं सदी में फिर से सोचने के लिए विवश कर दिया है कि जब सम्पूर्ण विश्व एक बाजार का रूप ले रहा है और ऐसे में इस तरह की कूटनीतिक चाल कितनी मानवतावादी है, इस पर विचार करना होगा।

Wednesday, March 25, 2020

हालात ये आपदा

चन्द्रापुरी मंन्दाकिनी घाटी का सबसे सुन्दर और लहलहाते खेतो के बीच बसा एक ऐसा पहाड़ी गांव था जहां मंदाकिनी का पुल पार करते ही गांव की देहरी पर ग्रामीण परिवेष की सौंधी यूं ही लोगो कोे अपनी ओर आकृषित करती थी। मगर 2013 साल के मध्यस्थ में प्रकृति ने इस गांव की रौनक मातम में बदल डाली। वैसे आंकड़ो की बाजीगरी देखें तो रूद्रप्रयाग जनपद में 833 परिवार आपदा प्रभावित हैं। जिन्हे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में सरकारी एवं गैरसरकारी राहत जरूर मिली होगी या मिल रही होगी। इसका आंकड़ा सरकारी फाईलो में मिल ही जायेगा। परन्तु यहां राहत और आपदा से किस तरह लोग सामना कर रहे हैं उसके लिए चन्द्रापुरी गांव के 69 परिवारो की कहानी ही काफी है।
गौरतलब हो कि गांव के 69 परिवारो में से 47 परिवार जो कि अनु॰जाति के हैं जिनमें से सात परिवार आज भी आपदा राहत के लिए मोहताज हैं। वे सर्दीभरी रातो को कैसे गुजार रहे होंगे यह तो उनसे कोई पूछे अतएव वे टेन्टो और तम्बुओ के सहारे जो रात-दिन गुजार रहे हैं वह राज्य की आपदा राहत की पोल खोलने के लिए काफी है। यह तो सभी को मालूम है कि चन्द्रापुरी गांव का मंदाकिनी नदी ने 16, 17 जून 2013 को नामो निषां ही मिटा दिया। यहां अनु॰जाति के 47 परिवार सिर्फ व सिर्फ बदन पर पहने कपड़ों के अलावा कुछ नहीं बचा पाये। 22 परिवार जो कि कागजो में पिछड़ी जाति के लोग है उनकी आवासीय भवनो को कुदरत ने बचा तो दिया परन्तु ये लोग अपनी कृषिभूमि से हाथ धो बैठे हैं। बताया गया कि यहां लोगो ने स्वयं सेवियो की मदद भी डर-डर की ली है ताकि उन्हे मिलने वाली सरकारी मदद प्रभावित ना हों। हालांकि आवास गंवा चुके ग्रामीणो के लिए केयर इण्डिया नाम की संस्था टेम्परेरी भवन बना रही है। परन्तु सरकार द्वारा दी जाने वाली आवास हेतु सात लाख की मदद अब तक लोगो के पास नहीं पंहुची है। ग्रामीण दिनेष जोषी ने कहा कि आवास के पूर्णक्षति का मुआवजा उन्हे ही नसीब हुआ जिन्होने पटवारी को रू॰ 10 हजार की घूस पंहुचाई है। वे आगे बताते हैं कि खुले आसमान के निचे आ चुके ग्रामीण सर छुपाने के लिए कुछ भी करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। पटवारी सुन्दरलाल ने दिनेष जोषी से कई बार रू॰ 10 हजार की मांग की है कि वह उन्हे दो लाख रू॰ दिलवा देगा। ऐसा नहीं हो पाया तो पटवारी की गुस्तागी से दिनेष जोषी आज सरकारी राहत से वंचित हो गया है। इस तरह चन्द्रापुरी गांव के कुत्ता लाल, हर्षलाल, मंगलदेव, निलम देवी, कबूतरादेवी, अषाड़ी देवी, अमरलाल आदि अनु॰जाति के सात परिवारो के 17 लोग खुले आसमां के निचे सर्दभरी रातो को गुजार रहे है। चन्द्रापुरी गांव की अनुसूचित जाति की 75वर्षीय मंगसीरी देवी राहत के लिए दर-दर भटक रही है। क्योंकि पटवारी को घूस देने के लिए उसके पास 10 हजार रू॰ नहीं हो पा रहे है। ग्रामीणो ने सेवानिवृत प्रधानाध्यापक प्रेम सिंह के हवाले से कहा कि प्रभावितो की सर्वेक्षण रिपोर्ट स्थानीय पटवारी ने ग्रामीणो और तत्काल ग्राम प्रधान के बिना ही तैयार की है। राहत की बानगी देखिऐ कि पहले आपदा प्रभावितो को 5500रू॰ और बाद में 2700रू॰ दिये गये। इसके बाद रू॰ दो लाख की धनराषी भवन बनाने हेतु पटवारी की रिपोर्ट के अनुसार कुछ लोगो को उपलब्ध हो पायी।
चन्द्रापुरी गांव के दलित परिवारो की परिस्थितियां दिन व दिन बढती ही जा रही है। हालात इस कदर है कि एक तरफ वे लोग अपने आषियाने गवां चुके हैं तो दूसरी तरफ उनकी जो काष्त के लिए दो-चार नाली जमीन थी वह भी आपदा की भेंट चढी हैं। अब वे लोग एकदम भूमिहीन ही हो चुके हैं। इनके सामने समस्याओ का पहाड़ बढता ही जा रहा है। गौरतलब हो कि जहां ये परिवार किराये के भवन में रहते थे वहां उन्हे भवन स्वामी आग नहीं जलाने देता था। इस कारण उन्हे वापस चन्द्रापुरी में ही तम्बुओ में आना पड़ा। गांव के कुन्दनलाल, नन्दलाल, सोहनलाल ने कहा कि आवासीय भवन के साथ-साथ उनके पषु और पषुषाला सहित भी मन्दाकिनी की बाढ लील गयी। इन पषुषालाओं में कम से कम 20 गाये, बछड़े, भैंसे व बैल बंधे थे। इसी तरह उनकी जो काष्त की भूमि थी वह भी समाप्त हो गयी। इसका उन्हे कोई मुआवजा और ना ही राहत मिल पाई। उनके पास ना तो पषु हैं और ना ही भूमि है। उनका जीवन-बसर कैसे चलेगा इसकी उन्हे बार-बार चिन्ता सता रही है। चन्द्रपुरी गांव की कु॰ सुनिता, कु॰सीमा ने डर-डर के बताया कि उनके गांव में दलितो के नुकसान के बराबर ही सामान्य जाति के लोगो का भी नुकसान हुआ है। मगर दलितो को जरूरी मुआवजा से वंचित रखा गया तो सामान्य लोगो को सभी प्रकार का मुआवजा स्थानीय पटवारी ने उपलब्ध करवाया।
घराट से चलती थी आजीविका
कुन्दनलाल अपनी एक पन्नचक्की (घराट) से रोजाना 5-8 किलो आटा पीसाई के बदले कमाता था। यानि उसके पास माह में 30-35 किला आटा हो जाता था। ये पन्नचक्की कुन्दनलाल का रोजगार का एक नियमित जरिया था। मंन्दाकिनी की बाढ से कुन्दनलाल का रोजगार समाप्त हो गया है। सरकार की नजर में ऐसे अतिसूक्ष्म उद्योग मुआवजा की श्रेणी में नहीं आये। कुन्दनलाल बेरोजगार हो चुका है। आम आदमी जो इस पन्नचक्की में गेहूं पीसाता था और पीसाई के बदले रूपये नही आटा ही देता था वह परस्पराता की संस्कृति भी बाढ की भेंट चढी है। प्रहसन यह है कि क्या इस तरह के अतिसूक्ष्म उद्योग मुआवजा की श्रेणी में नही आते? जबकि दुकानो, होटलो के लिए सरकार का मुआवजा देने की घोषणा है।
कैसे जलेगा चूल्हा
यहां लोगो ने बताया कि फेबरिकेटेड भवन रहने लायक नही है क्योंकि इन मकानो में आग नहीं जला सकते। सुरक्षित जगह न मिलने के कारण वे अपनी पुष्तैनी भूमि पर लौट आये हैं। हालांकि वहां उनके पुष्तैनी आवास तो नही हैं मगर दफन हो चुके आवासो की यादें उन्हे बार-बार झकझोर रही है।
डम्पिंगयार्ड ने मचायी तबाही
आपदा का क्या कारण था? इसके जबाब में लोगो ने बताया कि इस क्षेत्र में निर्माणाधीन सिंगोली-भटवाड़ी परियोजना के कुण्ड, सितापुर, फाटा, डमारगढ, बड़ासू आदि जगह पर मलबा के डम्पीगयार्ड है। ये सभी यार्ड बह गये। इन्होने ने भी बहुत अधिक तबाही मचाई है।
जिन्हे मिली आपदा राहत
चन्द्रापुरी में 22 परिवार पीछड़ी जाति के है इनमें से दो परिवारो को भी मुआवजा नही मिल पाया है। सत्यप्रसाद दो लाख, नारायणदत्त दो लाख, नरेन्द्र दो लाख, जमुनादेवी एक लाख, दिनेष दो लाख, दयाराम दो लाख। 17 परिवार आज भी आवासीय भवनो के लिए मोहताज है।
सोनिया से छीना स्वरोजगार का जरिया
कुमारी सोनिया जो बचपन से ही अपने पुष्तैनी गांव पिथौरागढ के ऐंचोली से यहां चन्द्रपुरी गांव आकर अपने नाना-नानी के साथ रह रही है। सोनिया के मामा का देहवासन होने की वजह से नाना-नानी की देख-रेख व अन्य जिम्मेदारियों का बोझ भी सोनिया के ऊपर आ गया। सोनिया की मामी दूर देहरादून में सरकारी नौकरी करती है। सो सानिया अब नाना-नानी की देख-भाल करने लग गयी। रोजगार के लिए सोनिया ने सिलाई, कड़ाई, बुनाई आदि का स्वरोजगार जोड़ रखा था। इसके लिए उसके पास हथकरघा से लेकर सिलाई मषीन और बुनाई मषीने थी। इस आपदा ने सोनिया के नाना-नानी के आवासीय भवन के साथ सोनिया के स्वरोजगार कमाने के साधन भी तबाह कर दिये। वर्तमान में सोनिया बेरोजगार हो चुकी है। बुजुर्ग नाना-नानी व अपनी आजीविका को वह कैसे चलायेगी इसकी उसे रोज चिन्ता सता रही है। वह कहती है कि अब तक तो संस्थाओं के द्वारा उन्हे खाद्य सामग्री मिल भी गयी। परन्तु भविष्य में उनकी आजीविका कैसे चलेगी। इस पर कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। कहती है कि सरकार के लोग जो गांव-गांव मुआवजा का सर्वेक्षण कर रहे थे उन्हे भी उनका यह कारोबार नजर नहीं आया। जबकि वे लोग आपदा से पूर्व भी उनके काम को जानते थे। वह सिर्फ इतना ही बता पाती है कि एक तो वह पिथौरागढ की है, दूसरा वह दलित होने का दषं झेल रही है। बताती है कि उसका यह संसाधन लगभग 80 हजार रूपय की लागत का होगा जिसे अब वह दुबारा नहीं जोड़ पायेगी।
प्रेम पंचोली सम्पर्क - 9411734789

प्रधानमंत्री की भावनात्मक अपील, रहेगा 12 दिन तक जनता कप्र्यू

प्रधानमंत्री की भावनात्मक अपील, रहेगा 12 दिन तक जनता कप्र्यू


|| Prem Pancholi ||


कोरोना की महामारी से पूरी दुनियां संकट में है। पर लोग हैं कि मानते कहां है। 22 मार्च को लाॅकडाउन की घोषणा हुई। जिसे अलग अलग राज्यों की सरकारो ने 31 तक तक जारी रखने की घोषणा इसलिए की कि ताकि इस महामारी से निपटा जा सके। मगर देहरादून के घण्टाघर के पास लोग जाम लगाने से बाज नहीं आ रहे है।

लोग कब समझेंगे यह दुखद है। आखिर प्रशासन को शख्ती का इस्तेमाल करना पड़ा। इधर प्रधानमंत्री ने 21 दिन के लिए देशव्यापी लाॅकडाउन का ऐलान कर दिया है।सड़को पर पुलिस पैटोलिंग हो रही है। लोग एका-दुक्का सड़को पर दिख रहे है। बेवजह की भीड़ से लोग और संसाधन काबू में है।
जागरूक लोगो का कहना है कि स्वयं भी आम लोगो को यह समझना होगा कि सरकारी फरमान कोई लोक विरोधी नहीं है। बल्कि लोक की सुरक्षा के लिए है। जानकारो का यह भी कहना है कि इस वायरस से मुक्ति के लिए 14 दिनों तक स्वयं ही लोगो को लाॅकडाउन करना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि लोग इस लाॅकडाउन का समर्थन करें ताकि हम लोग इस वायरस से निजात पा सके। उन्होंने कहा कि उनकी पहली जिम्मेदारी है कि वे हर भारतीय नागरिक को स्वस्थ व सुरक्षित चाहते है। उन्होंने देशवासियों से अपील की है कि वे अगले 21 दिन तक लाॅकडाउन का समर्थन करें।

Sunday, March 22, 2020

शिष्टाचार ही पर्यटन की खूबसूरती

||शिष्टाचार ही पर्यटन की खूबसूरती||

\\ PREM PANCHOLI \\

वैसे तो मेरा नैनीताल आना-जाना कई दफे रहता है। पर यहां मैं पिछले वर्षो, जब नैनीताल गया था। उन दिनों का एक खास संस्मरण पाठको तक पंहुचा रहा हूं। हालांकि यह संस्मरण पुराना है, किन्तु राज्य में हमारा व्यवहार व आचार-विचार आज भी वैसे ही है जैसे था, जो यहां लिखा जा रहा है।
केस-1
अलग-अलग जगह का अलग-अलग महत्व है। यह तो सर्वविदित है। व्यवहार में मानवता हो यह भी सर्वविदित है। यहां हम उस व्यवहार की बात कर रहे हैं जो उत्तराखण्ड राज्य की ‘‘देव भूमि एवं अतिथि देव भवः’’ की परिकल्पना को साकार करता है। मैं बिते वर्षो जबयानि 20 नवम्बर को देहरादून रेलवे स्टेशन से काठगोदाम के लिए रवाना हुआ। इस दौरान मैं रेलवे स्टेशन पर दो घण्टे पहले इसलिए पंहुचा कि मेंरे घर से रात्री में कोई टैम्पू इत्यादि नही चलते हैं। क्योंकि काठगोदाम जाने वाली रेल का प्रस्थान समय रात्री के ग्यारह बजे है। स्टेशन पर मैने किताबो के स्टाल से कुछ पत्रिकाऐं खरीदी और तीन अलग-अलग चाय की ठेलियों पर चाय पी। यहां एक चाय 10रू॰ की है। एक बार मैने चाय के साथ चिप्स का पैकेट खरीदा, जिस पर अंकित मूल्य था रू॰ 10 मगर उस स्टाल वाले भाई ने वही पैकेट 20रू॰ में दिया। यहां तक भी कह दिया कि लेना है तो ले लो, वर्ना आगे का रास्ता नापो। ऐसा क्यों कहा, जो मेरे समझ में अब तक नहीं आ रहा है।

मैने उस भाई से कहा कि हम लोग इस तरह राज्य का परिचय बाहर से आने वाले आगन्तुक को अच्छा नहीं दे रहे हैं। उसने चिढ़ते हुए कहा कि अपना रास्ता नाप वरना.......। खैर मैने उसकी फोटो खींची जिसे यहां चस्पा नहीं कर रहा हूं। उसके बाद मैने उपभोक्ता फोरम और खाद्य सुरक्षा अधिकार को फोन किया। आगे क्या हुआ मैंने इस पर दुबारा सोचा नहीं। यह रेल सेवा सात बजे प्रातः अगली सुबह काठगोदाम स्टेशन पंहुचती है। जहां का स्टेशन इतना साफ-सुथरा और व्यवस्थित है कि जो भी पर्यटक यहां पहली दफा आयेगा उसे महसूस होगा कि वह पहाड़ की खूबसूरत जगह से रू-ब-रू होने जा रहा है। यहां के चाय के स्टाल पर आपको एक चाय मात्र सात रू॰ की मिलती है। यदि आपने स्टाल वाले को 10रू॰ दिये तो वह आपके तीन रू॰ बड़े आदर के साथ वापस लौटायेगा।
केस-2
इसी तरह रात्री यानि सायं के छः बजे के बाद आप देहरादून में विक्रम, आटो-रिक्सा में सफर करेगे तो आपसे मनमाना किराया वसूला जायेगा। बता दें कि रेलवे स्टेशन से दर्शन लाल चैक की दूरी मात्र एक किमी या इससे थोड़ी ज्यादा हो सकती है का ये आटो-रिक्सा व विक्रम वाले भाई सीधे 10रू॰ ले लेते है। अगर इन्हे पता चल गया कि अमुक यात्री बाहर से आयी है तो उससे वे 20रू॰ तक ले लेते है, जो कि मैने खुद देखा है और दिया भी है। इनसे आप जान नहीं सकते कि ऐसा क्यों कर रहे हो। गलती से कोई यात्री कह दे कि यह तो तुम गलत कर कर रहे हो, तो ये सभी आटो-रिक्सा, विक्रम वाले भाई बीच सड़क में जाम ही नहीं लगाते बकायादा उक्त यात्री की बेइज्जती करने पर आतुर हो जाते हैं।

ऐसा आपको काठगोदा व हल्द्वानी के रेलवे स्टेशन पर नहीं मिलेगा। वहां वे लोग बड़े तहजीब से पेश आते हैं। और उनकी यह भी कोशिश रहती है कि उनकी आटो-रिक्सा, विक्रम में बैठी यात्री खुशी महसूस करें कि वह कुमाऊं की सैर करने आयें हैं। कुमाऊं में आप कहीं भी जाये ंतो आपको होटल, ढाबे, चाय के ठेले व टैक्सी भाड़ा इत्यादि पर एक ही रेट पर खाने-रहने व आने-जाने की सुविधा मिल जायेगी। जबकि गंगोत्री, यमनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि तीर्थ व पर्यटन स्थलो पर उक्त व्यवसाय से जुड़े लोगो का अलग-अलग व्यवहार नजर आयेगा। बाहर से आने वाले यात्रियों से तो ये व्यवसायी भाई मुहमांगा ही वसूलते है।

कहने का तात्पर्य मात्र इतना भर है कि यदि हम आम लोग इस राज्य को पर्यटन प्रदेश बनाना चाहते हैं तो हमे विनम्रता, शिष्टाचार से पेश आना होगा। साथ ही मोल-भाव में मुहमांगी रकम नहीं वसूलनी होगी। पर्यटन का व्यवसाय एक ऐसा व्यवसाय है जो दूसरे पर निर्भरता खत्म करता है। स्वावलम्बन की दिशा में परिपक्व धन्धा है। यह धन्धा सरकारो पर बन रही निर्भरता को खत्म कर सकता है। बसर्ते हमें वही ‘‘अतिथि देव भवः’’ की कल्पना को साकार ही नहीं करना होगा बल्कि अपने व्यवहार में फिर से अपनाना होगा।

कुल मिलाकर पर्यटन प्रदेश बनाने के लिए हम लोगो को सरकार का मोहताज नही होना चाहिए। जिस तरह का व्यवहार रेलवे स्टेशन देहरादून पर लोगो को मिलता है वह पर्यटन, तीर्थाटन के नाम पर धब्बा है। यह ठीक किया जा सकता है। इसे सरकार नहीं लोगो को खुद ठीक करना होगा। पर्यटन और तीर्थाटन हमारे राज्य की खास पहचान है। इस पहचान को बरकरार रखने के लिए उन लोगो की पहली जिम्मेदारी है जिनसे बाहर से आने वाले आगन्तुको का पहला परिचय होता है।

Saturday, March 21, 2020

महामारी से निपटने का सूत्र संयम - प्रधानमंत्री

||महामारी से निपटने का सूत्र संयम - प्रधानमंत्री ||

https://www.youtube.com/watch?v=g0qsgcom5GIमहामारी से निपटने का सूत्र संयम - प्रधानमंत्री

|| by - Prem Pancholi ||



पूरी दुनियां इस समय कोरोना वायरस की महामारी के चपेट में है। इस वक्त हम सभी को सचेत रहने की आवश्यकता है। हमारे देश के प्रधानमंमंत्री ने सभी से यही अपील की है कि लोग सतर्क रहे, सुरक्षित रहे और व्यवस्थित रहे। इसी में सभी की भलाई है। उन्होंने कहा कि यह समय खुद को सुरक्षित रखने का है। यह भी उन्होने विश्वास दिलाया कि भविष्य में इस महामारी से निपटने के कारगर उपाय ढूंढ निकाल लिये जायेंगे। बस देशवासियों को इस समय संयम से काम लेना होगा।

इधर दुनियांभर में लोग कोरोना जैसी महामारी के फैलने से दहशत में है। जिन देशो ने इस महामारी को नजरअन्दाज किया है वे संकट में हैं। पर मौजूदा वक्त दुनियां के लोगो को एकजुट होकर इस महामारी का सामना करना होगा। यह वक्त लापरवाही का बिल्कुल भी नहीं है। लोगो को सरकार के साथ मिलकर इस आपातकाल से निपटना होगा। ऐसा प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का मानना है।



बता दें कि खबर लिखने तक बताया जा रहा है कि दुनियांभर में कोरोना जैसे संक्रमण बिमारी को काबू में आने पर समय लग रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक अब तक कोरोना से ग्रसित लोगो की संख्या दो लाख पार कर गई है। हंगरी में कोरोना वायरस संक्रमण से पहली बार 32 मामले सामने आए हैं। जबकि 159 लोगों को आइसोलेशन में रखा गया है। इटली में कोरोना वायरस से ग्रसित लोगो की संख्या में इजाफा हो रहा है। चीन के बाद इटली में कोरोना वायरस की वजह से मरनेवाले लोगों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है। नीदरलैंड में भी 176 नए मामले सामने आये हैं। इसी तरह अपने देश के स्वास्थ्य विभाग ने बीते 24 घंटों में 176 नए मामलों के सामने आने की बात कही है। इसमें वायरस की वजह से हुई आठ मौतें भी शामिल हैं। इन नए आंकड़ों के साथ ही देश में अभी तक 1135 मामलों की पुष्टि हो चुकी है।

उल्लेखनीय हो कि कोरोना वायरस से सर्वाधिक इटली ग्रसित हुआ है। जबकि एक माह पहले पाकिस्तान इस वायरस से लेस मात्र ही प्रभावित था। भारत ने अपनी सूझ-बूझ और अपने भारतीय संस्कारो का पालन करते हुए इस संक्रमण से लड़ने की क्षमता दिखाई, और पड़ोसी देश पाकिस्तान को पछाड़ दिया है। अब तक दुनियांभर में फैली इस महामारी से सबसे कम ग्रसित लोग भारत में ही है। 

दुनियांभर के जानकारो का कहना है कि भारतीय लोग संस्कारित है। यही वजह है कि इस व्यवहार से भारत देश के लोग कोरोना वायरस से कमतर ही चपेट में आये है। अब यह भी कहा जा रहा है कि भारत देश इस महामारी से जल्दी निपटने का इन्तजाम भी कर लेगा। प्रधानमंत्री सहित देशभर के जिम्मेदार लोग बार-बार देशवासियों से अपील कर रहे हैं कि यह वक्त संयम का है और लोग संयम बनाय रखे।

Monday, March 9, 2020

रंगोत्सव

||Bharti Aanand||
||रंगोत्सव||
https://youtu.be/wevLJo-CHDQ
अन्य एक और कविता की वीडियो को सुनने के लिए लिंक पर क्लिक करें|

रंगों का त्यौहार है होली,
खुशियों की बौछार है होली।
नयी मस्तियाँ नयी उमंगें,
नव जीवन का सार है होली 
खुशियों का त्यौहार है होली।।
धरती पे फैली हरियाली,
झूम रही है हर इक डाली 
स्वागत में नैनन को खोले,
इक दूजे से कुछ कुछ बोले।
देखो ऋतुराज बसन्त आया है,
मिलजुल कर, बोलें प्रेम की बोली।
रंगों का त्यौहार है होली,
नव जीवन का सार है होली 
मदमस्त पवन  कर रही सुगन्धित,
 धरती का हर कोना कोना।
मनभावन है रीत सुहानी,
हरी घास बन गयी बिछौना।
कोयल गाती है मतवाली,
धरती का श्रृंगार है होली।
नव जीवन का सार है होली,
खुशियों का त्यौहार है होली।
नोट-यह कविता काॅपीराइट के अंतर्गत आती है, कृपया प्रकाशन से पूर्व लेखिका की संस्तुति अनिवार्य है।

Sunday, March 8, 2020

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष: खुद स्थापित होने की कसौटी

||अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष: खुद स्थापित होने की कसौटी||

|| Prem Pancholi ||

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर दुनियाभर में विभिन्न आयोजन होते हैं। होने ही चाहिए। आज तक कईयों महिलाओं ने अभूतपूर्व सफलता भी प्राप्त की है। आज महिलाऐं पुरूषो से पीछे नहीं है। वे पुरूषों के साथ कदम से कदम मिला रही है।

सुखद यह है कि महिला-पुरूषों में बराबरी का दर्जा नजदिक आ चुका है। मगर दुःख इस बात का है कि राजनीतिक स्तर पर वोट मांगने के लिए महिलाओ को खूब इस्तेमाल किया जाता है, किन्तु संसद और विधानसभा में महिलाओं का आरक्षण बिल फाईलो की धूल फांक रहा है। खैर इसके इतर स्वयं महिलाओं ने खुद को साबित करने में कमतर नहीं समझा और अपने-अपने मुकाम हासिल किये। यहां सीमान्त जनपद उत्तरकाशी की कुछ महिलाओं का उदाहरण दिया जा रहा है। हालांकि उनका काम समाज में बहुत ही कम लोग जानते हैं। पर उन्होंने आरक्षण जैसी व्यवस्था का सहारा ना लेकर अपने हुनर का लोहा मनवाया है। ये वे महिलाऐं हैं जिन्होंने राजनीति, समाज विकास, स्वरोजगार व खेल जैसी विद्या में मुक्कमल स्थान प्राप्त किया हैै।

डा॰ स्वराज विद्वान - राजनीतिक पृष्टभूमी ना होते भी पंहुची मुकाम पर 

डा॰ स्वराज विद्वान मौजूदा समय में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की सदस्या है। जबकि उनके परिवार का पिछला कोई राजनीतिक इतिहास नहीं रहा है। फिर भी वह अपनी प्रतिभा के बलबूते इस पद तक का सफर तय कर गई। ज्ञात हो कि डा॰ स्वराज अपने छात्र जीवन से ही प्रतिभावान रही है। उनके पिताजी शिक्षक है और माता जी एक कुशल गृहणी है। वे पांच भाई-बहने हैं। आम तौर पर सबसे बड़ी होने के नाते उन पर जिम्मेदारियां कम नहीं थी। सो वे सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन करती हुई आज वे देशभर में शीर्ष युवा महिलाओं में गिनी जाती है। छात्र जीवन के दौरान वह कुछ समय तक कांग्रेस का दामन थाम रखी थी। वहां उन्हे रास नही आया तो डा॰ स्वराज ने भाजपा की सक्रीय सदस्यता ग्रहण कर ली। इसके अलावा स्वराज ने स्वयंसेवी के रूप में विभिन्न कार्यो को अंजाम दिया। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि उन्हे राष्ट्रीय युवा पुरूस्कार, तीलू रौतेली, महिला शक्ति आदि दर्जनो सम्मान पाकर समाज में अपने कामों की पहचान दिलाई। समाजिक कार्यो के साथ-साथ डा॰ स्वराज ने अपने अध्ययन के काम को भी जारी रखा और गढवाल के लोक गीतो का अनुशीलन जैसे विषय पर शोध कार्य पूरा किया।

विजया जोशी - मूक बधीरों के लिए स्कूल

श्रीमती विजया जोशी को छात्र जीवन से ही सामाजिक कार्य करने की ललक थी। वे अपने गांव और आस-पास के गरीब, असहाय और निर्धन लोगो से लम्बे समय तक मिलती रही, उनका हौसंलाफजाई करती रही। वे घर से निकलती थी और एक ही विचार था कि जो भी महिला बच्चे उसे निराशा की शक्ल में दिखाई देते थे, उनसे बात करना, उनकी पीड़ा को अहसास करके वे उनमें जज्बाती बाते करके उनके भीतर का खोया हुआ विश्वास जगाना श्रीमती जोशी की दिनचर्या बन चुकी थी। फलस्वरूप इसके मौजूदा समय में श्रीमती जोशी उत्तरकाशी के तुनाल्का गांव में विकलांग बच्चों यानि मूकबधीर बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय संचालित कर रही है। यह राज्य का एकलौता विद्यालय है जो अशासकीय है। जबकि राज्य में इन विशेष बच्चों के लिए देहरादून में ही मात्र एक राष्ट्रीय दृष्टीबाधीतार्थ संस्थान है। उन्हे राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर दर्जनो बार सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। कई बार उनके इस नेक काम का क्षेत्र में लोग लोहा मानते है। यही वजह है कि उन्हे यमुना घाटी के सबसे उत्कृष्ट दौलतराम रवांल्टा सम्मान 2019 से नवाजा गया है।

सीमा चैहान - खेल की प्रतिभा

प्रतिभाओं की कोई सीमाऐं नहीं होती है। प्रतिभाऐं खुद व खुद रास्ता निकाल लेती है। ऐसा रास्ता बनाया सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के नंगाणगांव की सीमा ने। सीमा चैहान गांव की परिवेश में पढी-लिखी। अभी वह स्नातक की पढाई ही कर रही है कि उससे पहले वह राष्ट्रीय फलक पर धाक जमा चुकी है। सीमा ने हाल ही में 400 मी॰ की दौड़ में स्वर्ण पदक भी हथिया लिया।

अभिनय के क्षेत्र में - स्मृति सिलवाल

स्मृति सिलवाल ठेट पहाड़ी गांव से आती है। वहाँ ना तो कोई संगीत एवं नृत्य का स्कूल है और ना ही कभी उनके क्षेत्र में नृत्य, कला, नाटको व अभिनय एवं माॅडल्स बावत प्रशिक्षण हुआ है। आज भी ऐसी स्थिति बनी हुई है। वहां थी तो सिर्फ अक्षर ज्ञान अर्जित करना। फिर भी स्मृति ने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखते ही अभिनय के क्षेत्र मे एक मुकाम कायम किया है। आज स्मृति विभिन्न मल्टीनेशनल कंपनियों के विज्ञापन ही नहीं कर रही है बल्कि दर्जनों नाटकों में उनके अभिनय की चर्चा है। तत्पर्य यह है कि प्रतिभा को कोई भी बैरल रोक नही सकता। यही नही स्मृति की कोई कहीं भी फिल्मो से सम्बंधित पृष्टभूमि नही रही है, ऐसे में स्मृति ने सिनेमा जगत में अभिनय के लिए स्थान बनाया है। सीमांत जनपद उत्तरकाशी के सुदूर गांव पलेठा में जन्मी पली पढ़ी स्मृति आज फिल्म इंडस्ट्री में अभिनय के क्षेत्र में जाना पहचान चेहरा है।

Saturday, March 7, 2020

महिला दिवस: स्वावलम्बन के लिए प्रोत्साहन

||महिला दिवस: स्वावलम्बन के लिए प्रोत्साहन||

|| PREM PANCHOLI ||


अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर देहरादून स्थित प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत निराश और नकारात्मक सोच पर महिला वक्ताओं ने जमकर प्रहार किया। इस अवसर पर प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत 10 युवतियों को स्वरोजगार से जोड़ने बावत कार्यक्रम की संयोजिका व अधिवक्ता स्नेहा ने आर्थिक और वैचारिक रूप से फैलाशिप प्रदान की है।

बता दें कि यह वे युवतिया हैं जो या तो बालमजदूर रही है या निर्धनता के कारण अपनी प्रतिभाओं को मसोसकर रखा हुआ था। उन्हें सबल बनाने के लिए स्नेहा ने कमर कस दी है और भविष्य में भी प्रोत्साहन कार्यक्रम के मार्फत युवतियो व महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने की विशेष योजना आयोजित करेगी।

इधर महिलाओं को इस इक्कीसवीं सदी में परिवर्तन की दिशा में आगे बढना चाहिए और नकारात्मक सोच को तो अलविदा कह देना चाहिए। बजाय वर्तमान मे ही जीना चाहिए। यह बात देहरादून की नेहरू कालोनी स्थित खचाखच भरे चिल्लीज रेस्तरां के सभागार में वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डा॰ तान्या चतुर्वेदी ने कही है। उन्होंने कहा कि महिलाऐं समाज का आधा हिस्सा है। इसलिए समय आ चुका है कि महिलाओं को स्व-निर्णय की ओर तेजी से बढना होगा। इस दौरान आकाशवाणी की उद्घोषिका भारती आनन्द ने एक भावनात्मक कविता का पाठ किया की ‘‘मत मानो देवी मुझको बस जीने का अधिकार दो, बेटी हूँ मैं तेरी माँ, इतना मुझको पहचान लो’’। वे आगे अपनी कविता के माध्यम से बता रही है कि ‘‘तेरा ही तो अंश हूं मै, फिर मुझसे क्या दूरी है, इतना तो बतला दे मां, क्या तेरी मजबूरी है’’।

कार्यक्रम को संबोधित करती हुई डीएवी पब्लिक स्कूल की प्राचार्य सारिका बिम्बे ने कहा कि हमें अब निर्भरता जैसी आदतों से बाज आना चाहिए। यह मनगढत परंपरा है जो अस्वभाविक थी। इसलिए अगर बच्चों के बारे में सोचे तो स्व-निर्णयानुसार सोचे, सकारात्मक सोचें। यही बराबरी का एक और तरिका भी है। कहा कि आम तौर पर महिलाऐं सोचती है फिर अपने निर्णय से हटकर पति के निर्णय पर खुश हो जाती है। पति को भी लगता है कि ऐसा उसी ने ही सोचना है। इस दकियानूसी सोच से बाहर आने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम में पंहुचे साहिबाबाद के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट, लेखक और संपादक उमेश अरोड़ा ने कहा कि सोच को परिवर्तन की दिशा में बदलना होगा। उन्होंने देशभर की ऐसी महिलाओ का उदाहरण प्रस्तुत किया जो कभी घर-घर अचार बेचने का काम करती थी। मगर आज वे 250 करोड़ का कारोबार सालाना करती है। कहा कि चेतना हो और खुद की सोच को बड़ा करना होगा। संकोच को बाय-बाय करना होगा। उन्होने महिलाओं से संवाद करते हुए कहा कि जब सोचेंगे और बड़ा सोचेंगे तो सफलता की सीढियां आपके कदम चूमेगी। इस अवसर पर उत्तराखंड महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रतिनिधि श्रीमती विमला, कृष्ण कुमार नारंग, हरित राणा, सचिन नारंग, कु॰ अंशिका आदि ने अपने विचार व्यक्त किये हैं।

प्रोत्साहन सिर्फ जीवन और जीविका के लिए
प्रोत्साहन एक विशेष कार्यक्रम है जो निरन्तर चलेगा। महिलाओं व युवतियों की क्षमताओं में उनकी दक्षताओं का उन्हे भान करवाना। परिवर्तनकारी सोच पैदा करना। अपने विचारों और कार्यशैली में साधारण परिवर्तन द्वारा बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करना। यह कार्यक्रम शुद्धरूप से कमजोर वर्ग और उन लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए शुरू किया गया है जो अपने जीवन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। प्रारंभ में इस कार्यक्रम के तहत कुछ महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण से गुजरने के लिए चुना गया है। उनकी रुचि, प्रतिभा और क्षमता के अनुसार उन्हे प्रशिक्षित किया जायेगा, ताकि वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सके।
(स्नेहा, प्रोत्साहन कार्यक्रम की मुख्य संयोजिका और वरिष्ठ अधिवक्ता)


समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...