Thursday, May 31, 2018

जरूरी हो गयी है वन कानूनों की समीक्षा

जरूरी हो गयी है वन कानूनों की समीक्षा----

ईश्वर जोशी--------

विश्वस्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन के लिहाज से जंगल की अधिकता किसी भी राज्य के लिए गौरव की बात है, लेकिन यदि जनता उन्हें परेशानियों का सबब मानने लगे तो निश्चिित तौर पर यह चिन्ता का विषय है। 71 प्रतिशत वन क्षेत्र वाले उत्तराखण्ड राज्य में सरकारों की गलत नीतियों व वन विभाग के असहज व्यवहार के कारण आज वन जनता के लिए परेशानियों का कारण बन चुके हैं। निरन्तर कड़े होते जा रहे वन कानूनों के चलते पर्वतीय क्षेत्र में न केवल विकास कार्य बाधित हुए है, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका भी प्रभावित हुई है। मानव-वन्यजीव संघर्ष में तेजी से वृद्धि हुई है। फलस्वरूप यहाॅ जंगल तथा जनता के बीच दूरी लगातार बढ़ती जा रही है, जो वन तथा जन दोनों के लिए घातक है।
उत्तराखण्डी ग्रामीण समुदाय का वनों के साथ चोली-दामन का संबंध रहा है। कृषि, पशुपालन एवं दस्तकारी ग्रामीणों की आजीविका का पुश्तैनी आधार रहा है, जो वनों के बिना संभव नहीं है। पर्यावरण सुरक्षा तथा जैव विविधता संरक्षण के लिए जरूरी है कि वन एवं वननिर्भर समुदाय को एक दूसरे के सहयोगी के रूप में देखा जाय। दुर्भाग्यवश जब भी पर्यावरण, जैव विविधता संरक्षण अथवा जलवायु परिवर्तन की बात होती है, हमारे नीति नियंता ग्रामीणों को वनों का दुश्मन समझ कठोर वन कानूनों के जरिये समस्या का सतही समाधान ढूॅढने का प्रयास करते रहे हैं।
राज्य गठन के बाद उम्मीद थी कि नये राज्य में वनों के प्रति सरकार के व्यवसायिक नजरिये में बदलाव आयेगा, वन प्रबंधन में जनसहभागिता सुनिश्चित होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके विपरीत वनवासियों को वनों से दूर करने की प्रक्रिया उत्तराखण्ड बनने के बाद तेज हुई है। राज्य बनने के बाद  पहला संशोधन वन पंचायत नियमावली में किया गया। 2001 में किये गये इस संशोधन के जरिये वन पंचायतों की स्वायत्ता समाप्त कर उन्हें वन विभाग के नियंत्रण में दे दिया गया। आज उनकी भूमिका बिना पैसों के चैकीदार सी होकर रह गयी है। बिना वन विभाग की अनुमति व विभाग द्वारा जारी अनूसूचित दरों के वन पंचायत हकधारक को एक पेड़ तक नहीं दे सकती है। यहां मौजूद 12,089 तथाकथित वन पंचायतें 544964 हेक्टेयर वन क्षेत्र का प्रबंधन कर रही हैं। उत्तराखण्ड में मौजूद वन पंचायतें, जो कि जनआधारित वन प्रबंधन की सस्ती, लोकप्रिय एवं विश्व की अनूठी व्यवस्था थी, अब नहीं रहीं। आज उनकी वैधानिक स्थिति ग्राम वन की है। 2001 में हीवन अधिनियम में संशोधन कर आरक्षित वन से किसी भी प्रकार के वन उपज के विदोहन को गैरजमानती जुर्म की श्रेणी में डाल दिया गया। अभयारण्य, नेशनलपार्क व बायोस्फेयर रिजर्व के नाम पर संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार का क्रम जारी है।2012 में बने नंधौर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी व पवलगढ़ कंजरवेशन रिजर्व इसी कड़ी में शामिल हैं। 7 वन्य जीव विहार 6 राष्ट्रीय उद्यान तथा 2 संरक्षण आरक्षित के नाम पर अब तक 7705.99 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र संरक्षित क्षेत्र के दायरे में आ चुका है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 15 प्रतिशत तथा कुल वन क्षेत्र का 23 प्रतिशत है। इन संरक्षित क्षेत्रों में ग्रामीणों के सारे परंपरागत वनाधिकार प्रतिबंधित कर दिये गये हैं। अब इन संरक्षित क्षेत्रों की सीमा से लगे क्षेत्र को इको सेंसटिव जोन बनाया जा रहा है। इको टूरिज्म के नाम पर जंगलों में भारी संख्या में पर्यटकों की आवाजाही से जंगली जानवरों के वासस्थल प्रभावित हो रहे हैं। वन संरक्षण अधिनियम 1980 ने पहले ही पर्वतीय क्षेत्र में ढांचागत विकास को काफी हद तक प्रभावित किया है। वृक्ष संरक्षण अधिनियम 1976 अपने ही खेत में स्वयं उगाये गये पेड़ को काटने से रोकता है।
इन वन कानूनों के चलते पर्वतीय क्षेत्र में न केवल विकास कार्य बाधित हुए हैं, बल्कि उनकी आजीविका के मुख्य आधार कृषि, पशुपालन एवं दस्तकारी पर भी हमला हुआ है। जंगली सूअर, शेही, बंदर, लंगूर आदि जंगली जानवरों द्वारा फसलों को भारी क्षति पहुंचाई जा रही है। तेंदुए आये दिन मवेशियों को अपना शिकार बना रहे हैं। वन्य जीवों के हमलों से हर साल राज्य में औसतन 26 लोगों की मौत तथा 60 लोग घायल हो रहे हैं। वन विभाग में दर्ज आंकड़ों के अनुसार अकेले मात्र 45.59 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैले बिनसर अभयारण्य में प्रतिवर्ष 140 मवेशी तेंदुओं का शिकार बन रहे हैं, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा है। परिस्थितियां ग्रामीणों को खेती व पशुपालन से विमुख कर रही हैं। कभी खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर गांवों में हर साल बंजर भूमि का विस्तार हो रहा है। पलायन बढ़ रहा है। जंगली जानवरों के आतंक से निजात दिलाने की कोई कारगर योजना नहीं बन पाई है। बंदरों की नसबंदी तथा जंगली सूअरों को नियंत्रित करने की वन विभाग के आश्वासन हवाई साबित हुए हैं। यही नहीं राज्य में वनाधिकार कानून को लागू करने में भी अब तक की सरकारें नाकाम रहीं हैं। वन कानूनों की आड़ में वन विभाग द्वारा ग्रामीणों के उत्पीड़न की घटनांए लगातार बढ़ रही हैं। दूसरी तरफ संरक्षित क्षेत्रों के भीतर बड़े पैमाने पर गैर कानूनी तरीके से जमीनों की खरीद फरोख्त जारी है। अकेले बिनसर अभयारण्य में 10 हेक्टेयर से अधिक जमीनों की खरीदफरोख्त अवैध रूप से हुई है। प्रभावशाली लोगों द्वारा वहां आलीशान रिसोर्ट बनाये गये हैं तथा उन तक सड़के पहंुूचा दी गयी हैं। जबकिै प्रभावित गांवों में पेयजल योजनांए तक नहीं बनने दी जा रही हैं। ग्रामीणों को आवाशीय भवन बनाने के लिए इमारती लकड़ी हेतु बिना सुविधाशुल्क दिये गिरा-सूखा पेड़ तक नहीं मिल पा रहा है। ब्रिटिश काल से मिलने वाले इमारती लकड़ी के कोटे में वन विभाग पहले ही 60 प्रतिशत की कटौती कर चुका है। यह कोटा ग्रामीणों को मिले, इससे पूर्व लकड़ी वन निगम द्वारा उठा ली जा रही है। इन परिस्थितियांे ने जंगल के प्रति ग्रामीणों के नजरिये को ही बदल दिया है। कभी जंगल में आग लगने पर सारा गांव आग बुझाने दौड़ पड़ता था। आज उसे कोई लेना-देना नहीं है। चिपको आंदोलन की शुरूआत करने वाले रैणी, लाता गांव के लोग 25 साल बाद झपटो-झीनों का नारा देने को विवश हुए हैं।
अब मनुष्य को केन्द्र में रखकर वन कानूनों की पुनरसमीक्षा करने का वक्त आ चुका है। यदि ग्रामीण जन जीवन को बचाना है तो यह भी तय करना होगा कि राज्य में अधिकतम कितना वन क्षेत्र होगा, यहां कितना संरक्षित क्षेत्र बनाया जायेगा। जंगल की धारण क्षमता का आंकलन कर उससे अधिक जंगली जानवर होने पर उन्हें वहां से हटाने अथवा उनकी संख्या नियंत्रित करने हेतु कारगर कदम उठाने होंगे। वन प्रबंधन में जन सहभागिता सुनिश्चित करानी होगी। इस सहभागिता को केवल वन संरक्षण तक सीमित न रख वन उपज के उपयोग एवं वनों से होने वाले सभी लाभों तक देखना होगा। उत्तराखण्ड के विस्तृत वन क्षेत्र के एवज में ग्रीन बोनस की मांग पिछले एक दशक में सभी सरकारों द्वारा प्रमुखता से उठाई है, लेकिन  इस ग्रीन बोनस में वनवासियों का हिस्सा कहां है? इसे तय किये जाने की जरूरत है। 

सम्पर्क - ईश्वर जोशी, ग्राम एवं पोस्ट सुनोली, जिला अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड
मो0 9412924528 

The forest department has already cut 60 percent of the timber quota from the British period. This quota is available to the villagers, before being taken by the Wood Forest Corporation. These conditions have changed the attitude of the villagers towards the forest. When the fire started in the forest, all the villages ran out of fire. Today, she has nothing to do with it. Rani, who started the Chipko movement, people of Lata village have been forced to shout slogans after 25 years.                 



Saturday, May 12, 2018

रंवाई लोक महोत्सव 2018 की तैयारी जोरो पर

रंवाई लोक महोत्सव 2018 की तैयारी जोरो पर




वैसे तो कई दफा रंवाई घाटी यानि नौगांव, बड़कोट, पुरोला व मोरी में रंवाई महोत्सव का आयोजन हुआ। 2018 में दूसरी बार आयोजित नौगांव स्थित में रंवाई लोक महोत्सव का अगाज आगामी अक्टूबर माह में होने जा रहा है। बता दें कि जहां एक ओर रंगारंग कार्यक्रमो की धूम रहेगी वहीं रंवाई क्षेत्र के वरिष्ठ साहित्यकार भी अपनी लोक भाषाओं को लेकर विशेष तौर पर रंवाल्टी कवि सम्मेलन आकर्षक केन्द्र रहेगा। बीट्स आॅफ यमुना वैली, रंवाई घाटी के लोकल बैण्ड की टालियों की विशेष प्रस्तुतिया चार चांद लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। महोत्सव की खास पेशकश दौलतराम रंवाल्टा सम्मान, पतिदास सम्मान, राजेन्द्र सिंह रावत सम्मान, बर्फियालाल जुवांठा सम्मान और जोतसिंह रंवाल्टा सम्मान, रंवाई गौरव सम्मान पाने वालो की झलक देखने व सुनने को मिलेगी।

रंवाल्टी कवि सम्मेलन के लिए अब तक साहित्यकार महावीर रंवाल्टा, युवा कवि दिनेश रावत, प्रसिद्ध लोक कवि व गायक ओम बंधानी, पौड़ी से वरिष्ठ पत्रकार और लोक कवि गणेश खुगशाल गणी, साहित्यकार सुरेन्द्र सिंह पुण्डीर, साहित्यकार ध्यान सिंह रावत, युवा कवि व पत्रकार नीरज उत्तराखण्डी से भी ‘‘रंवाई लोक महोत्सव’’ के लिए सम्पर्क किया गया है।

रंवाई लोक महोत्सव 2018 की विशेषता

दौलतराम रवांल्टा सम्मान - स्व. रवांल्टा आजादी के बाद व पूर्व से ही क्षेत्र के विकास के लिए ताउम्र संघर्षरत रहे। उन्हीं की बदौलत यमुनाघाटी में दिल्ली से यमनोत्री मोटर मार्ग का निर्माण हुआ। ऐसे कई विकास के काम रवांल्टा जी के नेतृत्व में हुए जिनकी क्षेत्र में एक मिशाल कायम है। स्थानीय लोग उन्हें विकास का मसीहा मानते हैं। पहली बार उनके नाम से ऐसा आयोजन किया जा रहा है। क्षेत्रीय विकास और जनमुद्दों पर रचनात्मक कार्य करने वाले व्यक्तित्व को यह सम्मान ‘‘समाज सेवा’’ के क्षेत्र में दिया जाता है।
पति दास सम्मान - स्व. पतिदास आजादी से पूर्व प्रजामंडल की विधानसभा के सदस्य रहते हुए भी उन्होंने उन दिनों यमुनाघाटी और सम्पूर्ण पहाड़ में सभी के लिए शिक्षा जैसे अभियान कार्यक्रम का नेतृत्व किया। यही नहीं वे आजादी के बाद अंतरिम सरकार यानी उत्तर प्रदेश सरकार में भी विधानसभा सदस्य रहे। उन्होंने समतामूलक समाज की कल्पना को साकार करने के लिए सर्वोदय कार्यकर्ता के रूप में गांव-गांव कैंप फायर जैसे कार्यक्रम का नेतृत्व किया। शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ठ/मेधावी छात्र-छात्राओं को यह ‘मेधावी सम्मान’ दिया जाता है।
राजेन्द्र सिंह रावत सम्मान - स्व. रावत उत्तराखण्ड (तब उतर प्रदेश) के ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने खुद के गांव बीफ में लोक सहभागीता से चकबन्दी करवा करके चकबन्दी का आन्दोलन इस पर्वतीय राज्य में फैलाया। हालांकि राज्य बनने के बाद यह आन्दोलन सरकारी दफ्तरो की धूल फांकता रहा क्योंकि तब तक वे शारीरिक रूप से असमर्थ हो चुके थे। जबकि वे ब्लॉक प्रमुख, जिलापंचायत अध्यक्ष के पद पर रहते हुए भी वे लोगो के घर-घर विकास के कार्यों को क्रियान्वन के लिए पंहुचते थे। वे राजनीतिक कार्यकर्ता कम और एक सामाजिक कार्यकर्ता थे। वे गढवाल के पहले व्यक्ति थे जो ताउम्र लोक सेवा में रमे रहे। कृषि, स्वावलंबन की दिशा में कार्य करने वाले व्यक्तित्व को इस सम्मान से नवाजा जाता है।
बर्फियाला जुवांठा सम्मान - स्व. जुवांठा यमुनाघाटी में ही नहीं अपितु पूरे उत्तराखण्ड में विकास पुरुष के रूप में जाने जाते हैं। वे यमुनाघाटी में आशा की किरण से भी जाने जाते हैं। श्री जुवांठा ऐसे निम्न परिवार में जन्में जो कभी सपना भी नहीं देख सकते थे कि उनका यह बालक कभी इलाहबाद जैसे विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति से लेकर तत्काल उत्तर प्रदेश में विकास की एक नई इबारत लिखेगा। वे तत्काल उत्तर प्रदेश में पर्वतीय विकास मंत्री रहे हैं। उन्होंने राज्य आन्दोलन की अगुवाई में अभूतपूर्व सहयोग करके तत्काल सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी को उत्तराखण्ड राज्य के लिए अलविदा कह दिया। सौम्य स्वभाव और साहित्य रचना एवं विकास पर उनकी अच्छी पैठ थी। साहित्यकी, रचना, लोक संस्कृति व जनमुद्दों पर आधारित लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तित्व को इस सम्मान से सम्मानित किया जाता है।
जोतसिंह रंवाल्टा सम्मान - श्री रंवाल्टा रंवाई घाटी के ऐसे योद्धा थे जिन्होने तिलाड़ी के शहीदो को शहीद सम्मान, रंवाई के विकास के लिए उनके पास 15000 पत्रो का जखीरा बताता है कि वे ताउम्र रंवाई के विकास के लिए सत्ता से लड़ते रहे। उनके महत्वपूर्ण कार्यो को सलाम करते हुए इस बार उनके नाम का सम्मान ऐसे ही व्यक्तित्व को दिया जायेगा।
रंवाई गौरव सम्मान - रंवाई लोक महोत्सव की टीम ने यह निर्णय लिया कि इस वर्ष से वे रंवाई घाटी के ऐसे युवा-युवति को रंवाई घाटी की जनता से सम्मानित करवाना चाहते हैं जिन्होने अन्तर्राष्टीय स्तर पर अपनी योग्यता की छाप छोेड़ी हो।

Thursday, May 10, 2018

मुख्यमंत्री जायेंगे बल, प्रचार करने थराली

 


मुख्यमंत्री जायेंगे बल प्रचार करने थराली 

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प्रेम पंचोली 
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मुख्यमंत्री  त्रिवेन्द्र सिंह रावत विधानसभा थराली उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी मुन्नी देवी शाह के नामांकन में शामिल होंगे | उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी श्रीमती मुन्नी देवी शाह सीधी, सज्जन व समझदार महिला है। उन्होंने जिला पंचायत अध्यक्ष के नाते इस क्षेत्र के विकास की जरूरतों को समझा है। विकास कैसे किया जाता है, उसका भी अनुभव उन्होंने प्राप्त किया है। मुख्यमंत्री नसीहत दे रहे थे कि भारतीय जनता पार्टी में विधायक के साथ-साथ संगठन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी अन्य पार्टी में ऐसा नही होता है। यहा कार्यकर्ताओं से संगठन को ताकत दी जाती है। उन्होंने कहा कि अब वह समय आ गया है कि थराली क्षेत्र का विकास हमारी पार्टी का संगठन, सरकार व विधायक सब मिलकर करेंगे।

मुख्यमंत्री श्री रावत ने बताया कि उनकी  सरकार द्वारा पूर्व में भी थराली विधानसभा क्षेत्र में 55 किमी सड़क निर्माण के लिए 25 करोड़ रूपये स्वीकृत किये। इसके साथ ही विधायक स्व.मगनलाल शाह की मांग पर नन्दप्रयाग के लिए बस सेवा भी सरकार द्वारा पूर्व में ही शुरू की जा चुकी है। जनपद चमोली के दूरस्थ गांव हिमनी को टेलीमेडिसिन के माध्यम से अपोलो हाॅस्पिटल दिल्ली से जोडा गया है। जिसका लाभ लोगों को मिल रहा है। हिमनी गांव को डिजिटल बनाया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अत्याधुनिक डिवाइस के माध्यम से हिमनी गांव के विद्यालय में हाईटेक स्मार्ट कक्षाएं आरम्भ की गई है। कहा कि कुमाऊॅं तथा गढ़वाल मण्डल में जल्द ही दो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के हाईटेक स्कूल खोले जायेंगे। इन स्कूलों में निम्न आय वर्ग के बच्चों को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न्यूनतम शुल्क पर दी जाएगी। मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि सरकार द्वारा सैनिकों के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। केन्द्र सरकार द्वारा वन रैंक वन पेंशन लागू की गयी है। कहा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वे स्वयं पिथौरागढ़, नेलांग घाटी, बाड़ाहोती तक गए । सैनिक परिवार से होने पर उन्होंने सैनिकों के कष्ट को करीब से देखा है। उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य है, जिसने शहीद सैनिकों व अर्धसैनिकों के आश्रितों को नौकरी देने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने निर्णय लिया है कि प्रत्येक जिले में एडीएम स्तर के एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जायेगा, जो सैनिकों की सभी समस्याओं का निराकरण करना सुनिश्चित करेगा। 


मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि प्रधानमंत्री ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। उत्तराखण्ड में 370 फाॅर्म मशीनरी बैंक बनाने का निर्णय लिया गया है। इन फाॅर्म मशीनरी बैंको के माध्यम से हम अपने उत्पादों का वैल्यू ऐडिशन कर सकेंगे। हमारी सभी न्याय पंचायतों को फाॅर्म मशीनरी बैंक मिलेगा। उन्होंने ब्लाॅक लेवल से सचिवालय स्तर तक बायोमैट्रिक हाजिरी सिस्टम लागू किया है। सरकार ने सभी अधिकारियों एवं कार्मिकों के लिए एक जैसा नियम बनाया है। सरकार द्वारा एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। पिरूल से बिलजी उत्पादन का निर्णय लिया है जिसके तहत 60000 लोगों को रोजगार मिलेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने निर्णय लिया है कि पिरूल से बायोफ्यूल व तारपीन का उत्पादन किया जाएगा। इसके माध्यम से एक व्यक्ति लगभग 05-06 लाख रूपये तक सालाना आय प्राप्त कर सकता है। महिलाओं के लिए एलईडी उत्पादन व वितरण केन्द्र खोले गये है, जिसके माध्यम से वह आत्मनिर्भर बनेगी। सरकार राज्य के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। मौजूदा सरकार ने पिछले एक साल में इतने डाॅक्टर भर्ती किए है, जितने पिछले 17 सालों में नही हुए है। आने वाले 01 साल के भीतर सभी अस्पतालों में पर्याप्त डाॅक्टरों की तैनाती की जायेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि अभी तक लगभग 01 लाख तीर्थ यात्री श्री बदरीनाथ व लगभग 01 लाख यात्री श्री केदारनाथ पहुंच गए है। प्रदेश में सड़कों का निर्माण तेज गति से किया जा रहा है। सडकों के निर्माण से आने वाले समय में पर्यटन को ओर अधिक प्रोत्साहन मिलेगा। इस दौरान उनके साथ प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू, प्रदेश अध्यक्ष भाजपा अजय भट्ट, सांसद रमेश पोखरियाल’निशंक’, कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, डाॅ.हरक सिंह रावत, उच्च शिक्षा राज्य मंत्री डाॅ.धन सिंह रावत, विधायक महेन्द्र भट्ट, सुरेन्द्र सिंह नेगी, विधायक मुकेश कोली, चन्दन राम दास, बलवन्त सिंह भौर्याल, राष्ट्रीय सचिव भाजपा तीरथ सिंह रावत, महामंत्री संगठन संजय कुमार, प्रदेश महामंत्री भाजपा नरेश बंसल, भाजपा नेता गुड्डू लाल आदि उपस्थित थे।

^ ^^ The government has made a similar rule for all officers and personnel. Another important decision has been taken by the government. Piruj has decided to produce Bilji, under which 60000 people will get employment. The Chief Minister said that the government has decided that biofuel and turpentine will be produced from Pirul.

Friday, May 4, 2018

नमामी गंगे रोपेगी, आॅलवेदर रोड़ समाप्त करेगी?

सभी फोटो - सुरेश भाई 


प्रेम पंचोली

सड़क बहुत चैड़ी होगी, चमकती हुई यह सड़क होगी, मोटर वाहन फर्राटे भरेंगे, कभी अवरोध नहीं होगा, ना ही मोटर दुर्घटना होगी, ना कभी भूस्खलन और आपदा के कारण सड़क बन्द रहेगी, वर्षभर लोग चारों धार्मिक स्थलो का दीदार करते रहेंगे और पुण्य कमायेंगे। जहां-जहां से आॅलवेदर रोड़ जायेगी वहां-वहां स्थानीय लोगो को स्वरोजगार प्राप्त होगा। चारो पवित्र धार्मिक स्थल गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ व यमनोत्री सामरिक दृष्टी से भी महत्वपूर्ण है, पड़ोसी दुश्मन राज्य अपनी सीमाओं तक आधुनिक सुविधाओं को जुटा चुका है, इसलिए वाॅलवेदर रोड़ की नितान्त आवश्यकता है। ऐसी सुन्दर कल्पना और सुहावना सपना हमारे प्रधानमन्त्री श्री मोदी ही देख सकते है। अब वह आॅलवेदर रोड़ के रूप में साकार होने जा रही है। ऐसा आॅलवेदर रोड़ महापरियोजना से जुड़े राजनेता और अफसरान गाहे-बगाहे कहते फिरते दिखते हैं।

उल्लेखनीय हो कि यहां आॅलवेदर रोड को लेकर एक दूसरा पक्ष भी सामने आ रहा है। लोगो का कहना है कि हमारे प्रधानमंत्री का यह भी सपना है कि गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाया जाये। इसलिए ‘‘नमामी गंगे परियोजना’’ है। बताया जा रहा है कि नमामी गंगे परियोजना के तहत उत्तरकाशी से गंगोत्री तक 30 हजार हेक्टेयर में वृहद वृक्षारोपण होगा और इन्ही क्षेत्रों से आॅवेदर रोड़ गुजरेगी जहां हजारो पेड़ो का कटान होना तय हो चुका है। गलफत यह है कि पेड़ तुरन्त लगायेंगे भी और तुरन्त उनकी बली आॅल वेदर रोड़ के लिए अन्य वृक्षो के साथ चढ जायेगी। बता दें कि ढालदार पहाड़ों पर एक पेड़ गिराने का अर्थ है 10 अन्य पेड़ो को खतरे मे डालना। इस संवाददाता ने जहां-जहां से आॅलवेदर रोड़ गुजरेगी वहां-वहां के कुछ लोगो से बातचीत की है। भटवाड़ी के ग्रामीण कुलदीप नौटियाल, भटवाड़ी बाजार में वस्त्र विक्रेता मथुरा दत्त रतूड़ी, भटवाड़ी के ग्राम प्रधान संजीव नौटियाल, उत्तरकाशी के वन प्रभागीय अधिकारी संदीप कुमार, जसपुर गांव के विनोद, जोत सिंह, हर्षिल की ग्राम प्रधान बसंती नेगी, उत्तरकाशी के सामाजिक कार्यकर्ता व वरिष्ठ अधिवक्ता डाॅ. नागेन्द्र जगूड़ी, गंगोत्री में दो दशको से रह रहे स्वामी कृष्णा प्रपन्नाचार्या, हे॰न॰ब॰ केन्द्रीय विश्वविद्याल श्रीनगर गढवाल के प्रोफेसर जे0 पी0 पचैरी, डाॅ0 मोहन पंवार, पूर्व मंत्री मोहन सिंह रावत गाँववासी, अगस्तमुनि से चन्द्रापुरी के पास केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित होटल व्यवसायी जे. पी. नौटियाल, रुद्रप्रयाग के भाजपा विद्यायक भरत सिंह चैधरी, सामाजिक कार्यकत्र्ता नरेन्द्र दत सेमवाल, बुजुर्ग पदम सिंह गुसांई, श्रीनंद जमलोकी, हर्षवद्र्वन, गिरीश बेंजवाल, रूद्रप्रयाग के जिला अधिकारी मंगलेश घिल्ड़ियाल, ब्यूँग गाँव के सामाजिक कार्यकत्र्ता राजाराम सेमवाल, फाटा में ठेकेदार यशोधर अन्थवाल, हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले रघुवरशाह, गुप्तकाशी के कमल रावत, काकड़ा गाड़ में चाय की दुकान चलाने वाले वन पंचायत सरपंच दिनेश रावत, गुप्तकाशी के पास खुमेरा गाँव के सामाजिक कार्यकर्ता आत्माराम बहुगुणा, जिला पंचायत की पूर्व सदस्या उर्मिला बहुगुणा, गोपेश्वर में वरिष्ठ पत्रकार क्रान्ति भट्ट, पत्रकार प्रमोद सेमवाल, गोपेश्वर के मनोज भट्ट, गोपेश्वर के नगर पालिका अध्यक्ष संदीप रावत, चिपको आन्दोलन से जुड़े मुरारी लाल, डाॅ0 गीता शाह, सामाजिक कार्यकत्र्ता और वर्तमान में ग्राम प्रधान लक्ष्मण सिंह नेगी, पिलखी गाँव निवासी बलवीर सिंह नेगी, नन्दन सिंह नेगी, श्रीमती कलावती, हेमा बहन, पीपलकोटी के राकेश शाह, होटल कारोबारी विवेक नेगी, शिक्षिका श्रीमती पुष्पा, अलका और शीला सिंह जैसे सैकड़ो जागरूक लोगो के लिए यह आॅलवेदर रोड़ जैसी परियोजना मौजूदा समय में कौतुहल का विषय बनी हुई है।


ज्ञात हो कि श्रीनगर गढवाल मे बद्रीनाथ हाइवे पर वर्षो पुराने स्वस्थ पेड़ों पर आॅलवेदर रोड़ योजना के तहत खूब आरिया चल रही है। जैसे-जैसे पेड़ो की कटाई आगे बढ रही है वैसे-वैसे श्रीनगर शहर की हालात र्निवस्त्र जैसी दिखने लग गई है। इस पर हे.न.ब. केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढवाल में भूगोल विभागाध्यक्ष डाॅ0 मोहन पंवार ने कहा कि अभी तक आॅलवेदर रोड़ की जानकारी विशेषज्ञों को नहीं मिली है। वे चाहते हैं कि इस सड़क के चैड़ीकरण के लिये टिकाऊ डिजायन यहाँ की भूगर्भिक संरचना के अनुसार बनाया जाय। हे.न.ब. केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढवाल में पर्वतीय शोध केन्द्र के नोडल अधिकारी डाॅ0 अरविन्द दरमोड़ा ने कहा कि जंगल बचाकर सड़क बनाने की नयी तकनीकि पर विचार किया जाना चाहिये।

आॅलवेदर रोड़ के कारण ऋषिकेश से बद्रीनाथ और रुद्रप्रयाग-गौरीकुण्ड मार्गों पर सरकारी आँकड़ों के अनुसार अब तक कुल 9105 पेड़ काटे जा चुके हैं। इसके अलावा 8939 और नये पेड़ ऋषिकेश बद्रीनाथ हाइवे पर चिन्हित किये गये हैं। जिसके कटान की स्वीकृति आॅनलाइन ली जा रही है। जबकि उत्तराखण्ड सरकार के अपर मुख्य सचिव (लोनिवि) ओम प्रकाश का दावा है कि इस परियोजना से लगभग 43 हजार पेड़ों का कटान होगा। तिलवाड़ा-गौरीकुण्ड मार्ग पर पीपल के पेड़ भी काट दिये गये हैं। होटल व्यवसायी जे.पी. नौटियाल ने कहा कि उनके होटल के आगे तीन पीपल के बड़े पेड़ यात्रा सीजन में देशी-विदेशी पर्यटकों को छाँव प्रदान करते थे। पीपल के पेड़ों के दोनों ओर गाड़ियां जा सकती थी, उन्हें दुखः है कि इन पेड़ों की बली भी आॅलवेदर रोड के कारण चढ गयी। इसके अलावा उनका होटल भी 2-3 मीटर तक सड़क चैड़ीकरण की जद में आ चुका है, लेकिन उन्हें मुआवजे की राशि का अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं है।

बताया जा रहा है कि सड़क चैड़ीकरण से केदारनाथ हाइवे में रुद्रप्रयाग से लेकर फाटा तक तिलवाड़ा, रामपुर, सिल्ली, अगस्तमुनि, विजयनगर, गंगा नगर, बेड़ूबगड़, सौड़ी, गबनीगाँव, चन्द्रापुरी, भीरी, कुण्ड, काकड़ागाड़, सिमी, गुप्तकाशी, नाला, हयूनगाँव, नारायण कोटी, आदि स्थान आधे अथवा पूर्ण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। जबकि लोगो का विरोध देखकर रुद्रप्रयाग जिले के जिलाधिकारी मंगलेश घिल्ड़ियाल को कहना पड़ा कि बस्तियों के आस-पास 24 मीटर के स्थान पर केवल 12 मीटर भूमि का अधिग्रहण होगा। लेकिन इसकी सच्चाई अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। यहाँ फाटा में हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले रघुवरशाह और गुप्तकाशी में कमल रावत का कहना है कि मुख्य मार्ग को छोड़कर नये स्थानों से प्रस्तावित सड़क का एलाइन्टमेन्ट भारी नुकसान का कारण बनेगा। कहा जा रहा है कि केदारनाथ मार्ग पर काकड़ा गाड़ से सेमी होते हुये गुप्तकाशी तक के मार्ग को छोड़कर 10 किमी से अधिक सिंगोली के घने जंगलो के बीच से नया एलाइन्टमेन्ट लोहारा होकर गुप्तकाशी तक किया जायेगा। इसी तरह फाटा बाजार को छोड़कर मैखंडा से खड़िया गाँव होते हुये नई रोड़ का निर्माण किया जाना है। फाटा और सेमी के लोग इससे बहुत आहत हैं। यदि ऐसा होता है तो इन गाँवों के लोगों का व्यापार और सड़क सुविधा बाधित होगी। इसके साथ ही फाटा के पास पौराणिक मंदिर, जलस्रोत भी समाप्त हो जायेंगे इससे लोगों की आस्था को नुकसान पंहुचेगा। उनका कहना है कि जिस रोड़ पर वाहन चल रहे हैं उसी रोड़ पर सुविधा मजबूत की जानी चाहिये। नयी जमीन का इस्तेमाल होने से लम्बी दूरी बढ़ेगी और चैड़ीपत्ती के जंगल भारी मात्रा में नष्ट होंगे। इसी प्रकार रुद्रप्रयाग, अगस्तमुनि दो अन्य ऐसे स्थान हैं जहाँ पर लोग सड़क चैड़ीकरण नहीं चाहते हैं। इस संबंध में विश्व हिन्दु परिषद की कार्यकर्ता उमा जोशी का कहना है कि अगस्तमुनि बाजार को छोड़कर नये स्थान से यदि आॅलवेदर रोड़ बनाई गई तो वनों का बड़े पैमाने पर कटान होगा और यहाँ का बाजार सुनसान हो जायेगा। काकड़ा गाड़ में चाय की दुकान चलाने वाले वन पंचायत सरपंच दिनेश रावत का कहना है कि सरकार केवल डेंजर जोन का ट्रीटमेंट कर दें तो सड़कें आॅलवेदर हो जायेगी उनकी चिंता है कि सड़क चौड़ीकरण से उनका होटल नहीं बच सकता है और वे बेरोजगार हों जायेंगे।

इधर चार धामों में भूस्खलन व डेंजर जोन बेतरतीव निर्माण एवं अन्धाधुन्ध खनन कार्यों से पैदा हुये हैं। रुद्रप्रयाग जिले में रामपुर, सिल्ली सौड़ी बांसवाड़ा सेमी, कंुड, फाटा, बड़ासू आदि स्थानों में लगातार भूस्खलन वाले डेन्जर जोन बने हुये हैं। बद्रीनाथ मार्ग पर देवप्रयाग, सिरोहबगड़, नन्दप्रयाग के पास मैठाणा, चमोली से पीपलकोटी के बीच 10 किमी सड़क और बिरही, गुलाबकोटी, हेलंग, हाथी पहाड़, पाण्डुकेश्वर, गोविन्दघाट, लामबगड़, विष्णु प्रयाग के निकट भी डेंजर जोन बने हुये हैं। इनके आस-पास से बाईपास के लिये भी कहीं से सड़क नहीं बन सकती है। गुप्तकाशी के आगे खुमेरा गाँव में सामाजिक कार्यकर्ता आत्माराम बहुगुणा और जिला पंचायत की पूर्व सदस्या उर्मिला बहुगुणा ने बताया कि केदारनाथ के लिये लगभग 23 हेली कम्पनियों को मिले लाइसेन्स के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। गुप्तकाशी, नारायणकोटी, फाटा से जाने वाली हैली कम्पनियों के हेलीकप्टर प्रतिदिन 28 बार उड़ान भरते हैं। इस तरह 23 कम्पनियों के हेलीकप्टर कुल 644 बार उड़ान भरती है। इसके कारण हिमालय की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इस तरह बढ रहे इयर प्रदूषण के कारण यहां पालतू और वन्य पशु खतरे में पड़ गये हैं। इस कारण भी कई बार कितने ही जानवरों की पहाड़ों से कूद कर मृत्यु हो चुकी है।

बताते चलें कि मौजूदा समय में आॅलवेदर रोड़ के नाम पर बेहिचक सैकड़ों पेड़ कट रहे हैं। लोगो का कहना है कि बद्रीनाथ हाईवे के दोनो ओर कई ऐसे दूरस्थ गाँव है, जहाँ बीच में कुछ पेड़ों के आने से मोटर सड़क नहीं बन पा रही है। कई गाँवों की सड़कें आज भी 2013 की आपदा के बाद से नहीं सुधारी जा सकी है। गोपेश्वर के नगर पालिका अध्यक्ष संदीप रावत ने बताया कि सम्पूर्ण परियोजना को शुरु करने से पहले पहाड़ों की भूगर्भीय और भौगोलिक जाँच की जानी जरुरी थी। ताकि भविष्य मे लामबगड़ और सिरोहबगड़ जैसे नए भूस्खलन जोन न बन सके। उन्हांेने ने कहा कि गौचर, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली और पीपलकोटी में स्थानीय जनता की परिसंपतियों पर क्षरण मूल्य लागू न किया जाय। निर्माण के दौरान मार्ग अवरुद्व होने पर जनता को होने वाली परेशानी के हल को हाईवे पर मौजूदा वैकल्पिक मार्गों की व्यवस्था से की जाय। वन संपदा को होने वाले नुकसान के आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाए, साथ ही योजना का निर्माण सुनिश्चित तरीके से हो, जिससे कम से कम वनस्पतियों को नुकसान हो, सड़क चैड़ीकरण शुरु होने से क्षेत्र के लोगों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये योजना सुनिश्चित की जानी चाहिए। चारधाम यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों को निर्माण कार्यों से कोई दिक्कत न हो, इसके लिये यात्रा शुरु होने से पहले ही रोडमैप तैयार किया जाए और बदरीनाथ हाईवे पर तीन धारा और जोशीमठ में पिकनिक स्पाॅट जैसे प्राकृतिक स्थलों के साथ कोई छेड़-छाड़ न की जाए। चिपको आन्दोलन से जुड़े रहे मुरारी लाल ने कहा कि पहाड़ों में निर्माण कार्य का मलवा आपदा का कारण बन रहा है, उनका सुझाव है कि मलवा बंजर जमीन को आबाद कर सकता है, जिस पर वृक्षारोपण करके सड़क को भी टूटने से बचाया जा सकता है। डाॅ0 गीता शाह का मानना है कि पर्यावरण और विकास दोनों की चिंता साथ-साथ करनी चाहिये विकास की अन्धीदौड से पर्यावरण को खतरा न पहुँचे, उन्होने कहा कि इस दिशा में शोध व अध्ययन की आवश्यकता है। श्रीनगर, रुद्रप्रयाग से होते हुये कर्णप्रयाग, चमोली, पीपलकोटी, जोशीमठ तक टू लेन सड़क कुछ जगहों को छोड़कर सम्पूर्णतः बनी हुई है। यहाँ पर नन्दप्रयाग से चमोली पीपलकोटी के बीच ऐसे डेंजर जोन है जहाँ यात्रा सीजन में सड़कें टूटती रहती है। श्रीनगर से आगे भी सिरोहबगड़ एक बड़ा भूस्खलन क्षेत्र है जहाँ पर जान माल का खतरा बना रहता है। ऐसे डेंजर जोनों से गाड़ियों की आवाजाही रखने के लिये लगातार काम होता रहता है लेकिन हर बरसात में इनकी संवेदनशीलता कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। इन स्थानों पर चैड़ी सडक बनाना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

सनद रहे कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ने आॅलवेदर रोड़ बनाने की घोषणा उत्तराखण्ड विधान सभा चुनाव प्रचार के वक्त मे की थी। तब से अब तक यह चर्चा रही है कि पहाड़ों के दूरस्थ गाँव तक सड़क पहुँचाना अभी बाकी है। सीमांन्त जनपद चमोली में उर्गम घाटी के लोग सन् 2001 से सुरक्षित मोटर सड़क की माँग कर रहे हैं। यहाँ कल्प क्षेत्र विकास आन्दोलन के कारण सलना आदि गांवो तक जो सड़क बनी है उस पर गुजरने वाले वाहन मौत के साये में चलते हैं। यहाँ पर सड़क की माँग करने वाले प्रसिद्व सामाजिक कार्यकत्र्ता और वर्तमान में ग्राम प्रधान लक्ष्मण सिंह नेगी कहते हैं कि यहाँ 3500 कि जनसंख्या वाले क्षेत्र में कोई पलायन नहीं है। वे अपने जंगल लगा रहे हैं और गाँव तक पहुँचने के लिये कठिन रास्तों के कारण दोनों ओर 35 किमी सड़क चाहते हैं। पिलखी गाँव निवासी बलवीर सिंह नेगी का कहना है कि चीन सीमा पर मलारी से आगे रोड़ बहुत चैड़ी है। वे कहते हैं कि बद्रीनाथ मार्ग पर भूस्खलन क्षेत्रों का ट्रीटमेंट हो जाय तो बाकी रोड़ टू लेन बनी हुई है। ग्रामीण नन्दन सिंह नेगी दुखीः होकर कहते हैं कि सड़कों पर डामरीकरण के बाद बार-बार केबिल बिछाने के नाम सड़कें टूटती रहती है। जिसके कारण डामर भी उखड़ते हैं और सरकारी धन का दुरुपयोग होता है, उनका कहना है कि डामरीकरण से पहले ही सड़कों के किनारों के काम सभी विभागों को सामंजस्य के साथ पूरे कर लेने चाहिये। महिला नेत्री कलावती और हेमा का कहना है कि जोशीमठ से होकर बद्रीनाथ जाने वाली सड़क को ही आॅलवेदर का हिस्सा मान लेना चाहिये। क्योंकि यहां सड़क पहले से ही चैड़ी है।

जोशीमठ के लोग हेलंग-मरवाड़ी बाईपास बनाने का विरोध कर रहे हैं। जबकि वर्षो से बद्रीनाथ का रास्ता जोशीमठ से बना हुआ है। जोशीमठ में तीर्थयात्री नृसिंह मंदिर का दर्शन करते हैं और यहाँ हजारों स्थानीय लोगों की आजीविका होटल, रेस्टोरेंट आदि से चलती हैै। दूसरा अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य और सीमान्त क्षेत्र का यह मुख्य स्थान है। पत्रकार कमल नयन का कहना है कि सड़क निर्माण का मलवा सीधे अलकनंदा में उड़ेला जा रहा है। जबकि यहीं पर जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच आधा दर्जन से अधिक डेंजर जोन पाण्डुकेश्वर, गोविन्दघाट, लामबगड़, बलदौड़ा पुल आदि स्थानों पर देखे जा सकते हैं। जहाँ वर्षों पुराने समय से निरन्तर भूस्खलन हैै। इसको सुधारने का जितना भी काम अभी हो रहा है, उससे ऊपरी हिस्से के जंगल और ग्लेश्यिर द्वारा बने मलवों के ढेर लगातार गिरते जा रहे हैं। यहां दोनों ओर की ट्रेफिक हरेक घंटे मे रोकनी पड़ती है। लोगो का कहना है कि यहां 20 किमी के क्षेत्र में कहीं भी दो लेन सड़क नहीं बन सकती है। पीपलकोटी के राकेश शाह बताते हैं कि सड़क चैड़ी होगी, यातायात सुलभ हो जायेगी मगर सड़क के ऊपरी साइड की दुकाने हमेशा के लिये समाप्त इसलिए हो जायेगी कि उसके बाद ऊपरी हिस्से में कोई भूमि नहीं बचती है। सड़क चैड़ीकरण के नाम पर दो बार सर्वे हो चुका है लेकिन यह भी तय नहीं हुआ कि प्रभावित लोगों को मिलने वाले मुआवजे की व्यवस्था कैसी होगी?

इस यात्रा मार्ग पर होटल व्यवसाय से जुड़े विवेक नेगी को चिन्ता है कि निर्माण कार्यों का मलवा नदी में गिराया जा रहा है जबकि नदी सूख रही है। अब तो नदी भी आॅलवेदर रोड़ के कारण मलवे के लिए उपयुक्त डम्पिंग यार्ड बन गया है। बताया कि इस मार्ग पर दुकान, ठेली, चाय का ढाबा चलाने वाले छोटे व्यावसायों को ऐसा कोई नोटिस नहीं आया कि सड़क चैड़ीकरण के कारण उनको उक्त स्थान से हटना पड़ेगा। आॅलवेदर रोड़ यहां आम लोगो में दहशत भी फैला रही है। जबकि होना यह चाहिए कि इस दौरान जिला पंचायत की भूमि पर ऐसे व्यापारियों के लिये दुकानो की व्यवस्था करनी भी सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिये। उनका यह भी कहना है कि केवल दिल्ली मे बैठकर सड़क चैड़ीकरण का गूगल मैप सामने रखकर के चारों धामों के जन जीवन पर संकट पैदा करने जैसी स्थिति बना रहे हैं। यहां सड़क किनारे होटल चलाने वाले व्यवसायी कहते हैं कि सीमा सड़क संगठन और कम्पनियों के काम करने का तरीका बिल्कुल भिन्न है। इसलिये राष्ट्रीय राजमार्ग विस्तारीकरण में प्रभावित परिवारों की अनदेखी भारी पड़ सकती है। पीपलकोटी में नाम ना छपवाने बावत कुछ शिक्षिकायें कहती है कि पहाड़ों की भूगर्भिक स्थिति को बाहर की निर्माण कम्पनियाँ नजरअंदाज कर देती है। वे निर्माण करते समय भारी विस्फोटों का इस्तेमाल करते हैं। पहाड़ों के जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं और भूस्खलन की समस्या दिनों दिन बढ़ रही है। कहा कि तीर्थ यात्रियों के लिये पहाड़ केवल सैरगाह बन रहा है जो आॅलवेदर रोड बनने के बाद और अधिक बढ जायेगा। उनका कहना है कि पीपलकोटी से चमोली राजमार्ग के बीच कुछ स्थानो पर सक्रिय बड़े भूस्खलनों की एक सूची है। अच्छा हो कि ऐसे खतरनाक जोन पहले आधुनिक तकनीकि से ठीक किये जाने चाहिये।



सभी मौसम सड़क परियोजना एक महत्वाकांक्षी काम है वे समझते हैं कि पर्यावरण के कारणों पर आपत्तियां होंगी लेकिन वे दिशा निर्देशों का पालन करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करेंगे। कहा कि सभी मौसमों की सड़कों की परियोजना का निर्माण अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के सख्त पालन के साथ किया जा रहा है, ताकि उचित परिशोधन पर विशेष जोर दिया जा सके और उन्हें प्रतिरोमेंधक बना दिया जा सके। अगले दो वर्षों में उत्तराखंड में 2019 तक लगभग 50,000 करोड़ रुपये की 70 सड़कों का निर्माण होगा। जिसमें सभी मौसमों की चारधाम रोड परियोजना और भारतमला योजना के अंतर्गत मंजूरी दे दी गई हैं। उन्होंने सभी मौसम सड़क परियोजनाओं पर सक्रिय रूप से काम करने की प्रशंसा की है, जो चार प्रसिद्ध हिमालयी तीर्थस्थलों को जोड़ती है। सभी मौसम सड़क परियोजनाओं से कुल 900 किमी में से 400 किमी के लिए काम किया जा रहा है।
- (नितिन गडकरी, केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री) 
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The road will be very chaotic, it will be a flashing road, motor vehicles will fill up, there will be no obstruction, no motor accident, nor will the road stop due to landslide and disaster, throughout the year, people will continue to display four religious places and earn virtue. Local people will get self-employed wherever and wherever the weather will fall. Gangotri, Kedarnath, Badrinath and Yamanotri are also important from the strategic point of view of the four sacred religious places, the neighboring enemy state has assembled modern facilities to its boundaries, hence there is a dire need of the Valverer Road.
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समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...