Thursday, October 9, 2014

अमित के मृतको का पता लगाना मुनासिब नहीं समझा डोईवाला पुलिस ने


प्रेम पंचोली,
प्रीतम दास के घर जब उसके बेटे के दोस्तो का फोन सांय के चार बजे गया कि वे अपने लाडले की लाश ले जा लें। इस सूचना से वह एक बारगी हतप्रद रह गया। लेकिन वह अपनी होश नही खोया और तपाक से जबाव दिया कि वे लाश पर हाथ तक नहीं लगा सकते वे खुद आ रहे हैं। उन्हें जौलीग्रांट बुलाया गया जहां उनके 22वर्षीय बेटे की लाश हिमालयन हाॅस्पिटल की मोरचर्री में रखी मिली। उन्हे चिकित्सको द्वारा बताया गया कि उनके पास जब तक अमित को पंहुचाया गया उन्हें अमित मृत ही पाया गया। इसलिए वे बिना परिजनो व पुलिस के अमित की लाश दे नहीं सकते थे। बता दें कि पैट्रोल पम्प पर अमित को मनवीर नाम से ही जाना जाता था। खैर अमित हो या मनवीर इस युवा को मारा गया है ना कि यह जहर खाकर मरा है। यह कौतुहल का विषय है कि पुलिस ने इस घटनाक्रम में कोई दिलचस्पी अब तक नही दिखाई।
मामला 22सितम्बर 2014 का है जो कि मंगल पैट्रोल पम्प पर कार्यरत अमित और अन्य छः कर्मचारियों से जुड़ा है। अमित बणगांव उत्तरकाशी का निवासी है जो पिछले तीन वर्षो से मंगल पैट्रोल पम्प पर कार्यरत था। चिकित्सको के पास जब मंगल के दोस्तो ने जो कि उसी पैट्रोल पम्प पर काम करते थे ने अमित को ले गये कि अमित ने जहर खाया है और इसकी तबीयत बिगड़ गयी है। चिकत्सको ने अमित को देखते ही यह पुष्टी कर दी कि यह तो मृत है। तब तक सांय के चार बजने वाले थे। तुरन्त अमित के साथियों ने उसके परिजनो यानि अमित के पिताजी प्रीतम दास को बणगांव में फोन मिलाया और यह इतला दे दी कि वे अपने मृत बेटे की लाश जौलीग्रांट हाॅस्पिटल से प्राप्त कर लें। सूचना पाते ही अमित के पिताजी जौलीग्रांट के लिए रवाना हुए। पंहुचते ही डोईवाला पुलिस को रिपोर्ट लिखवाई। मृत अमित का पंचनामा दून चिकित्सालय के तीन चिकित्सको के एक पैनल ने किया है। बताया जा रहा है कि अमित की मृत्यु जहर खाने से नहीं हुई। पंचनामा की रिपोर्ट पुलिस के सुपूर्द है। जिसमें अमित के मृत पाये जाने का राज खुल सकता है। मगर अब तो अमित के परिजनो को यह अंदेशा हो रहा है कि घटना को एक माह होने जा रहा है। ना तो पुलिस ने कोई तहकीकात की और ना ही पैट्रोल पम्प के मालिक द्वारा इस घटना पर कोई कार्यवाही करवाने की कोशीश की गयी। वे पुलिस के दफ्तरो के चक्कर काट-काट कर थक हार चुके हैं। अतिम के पिताजी प्रीतम दास बताते हैं कि उनके बेटे को पैट्रोल पम्प पर काम करने वाले लोगो ने ही मारा है। वे इसलिए जोर देकर कह रहे हैं कि जिस दिन अमित को उसके साथी मृत हालात में हाॅस्पिटल ले गये उसी दिन दिन के 11 बजे अमित देहरादून के एक बैंक में चैक विड्रोल करवाने गया था। वह भी इसलिए कि उसी के एक साथी ने अमित को यह चैक इसलिए दिया कि उसका खाता देहरादून में है। अमित बैंक से भी बैंरग लौटा। क्योंकि उसके साथी द्वारा दिया गया चैक बांऊस हो गया। बस उसी दिन सांय के चार बजे अमित के ही साथी उन्हे फोन से संदेश भेजते है कि अमित मर चुका है। उधर पुलिस ने जब अमित के फोन की डिटेयल निकाली तो एक माह में लगभग 500 काॅल उत्तकाशी की एक शिवानी नाम की लड़की के फोन से बात करने की पुष्टी हुई है।
प्रीतम दास के अनुसार अमित को जौलीग्रांट हाॅस्पिटल उसके दोस्त जो उसी के साथ पैट्रोल पम्प में नौकरी करते हैं ले गये। इतना तो स्पष्ट है। मगर उन्हे पूर्व से ही अमित के उन दोस्तो पर संदेह भी था। क्योंकि कई मर्तबा अमित और उनके दोस्तो की आपस में झड़पे भी हुई थी। अमित के पिताजी यह भी बताते हैं कि अमित लालतप्पड़ स्थित मंगल पैट्रोल पम्प के मालिक का भी चेहता था। इस वजह से भी अमित से पैट्रोल पम्प में तैनात अन्य कर्मचारी मनमुटाव रखते थे। इस बात की पुष्टी तब हुई जब एक बार पम्प पर चोरी हुई थी और उनके बेटे पर इस चोरी का आरोप उसके साथियो ने लगाया। इस इल्जाम से भी पम्प के मालिक ने उसके बेटे को बरी ही नहीं किया बल्कि उस पर पहले से भी ज्यादा जिम्मेदारी दे दी।
हालात और वारदात इतनी छोटी नहीं है। मगर पुलिस है जो इस घटना में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। घटना से जुड़ी कहानी बयां कर रही है कि घटना को अंजाम देने वाले डोईवाला पुलिस के आस पास बेफिक्र घूम रहे हैं। यदि अमित के देास्तो पर अमित के पिताजी का संदेह है तो एक बार पुलिस उनसे पूछताछ तो करती। पैट्रेल पम्प के मालिक से भी पूछताछ करती। मृत्यु के समय जो लोग अमित के साथ थे उनसे जानने का प्रयास तो करती। जब अमित दिन के 11 बजे देहरादून बैंक में था और चार बजे मृत पाया जाता है उन्ही दोस्तो के साथ जिन्होने अमित को देहरादून चैक विड्रोल करने बैंक भेजा तो इस तरह भी इस घटनाक्रम पर संदेह जताया जा रहा है। फिर भी अब तक अमित के हत्यारो की शिनाख्त तक नहीं हो पा रही है।
उधर अमित की मां के रो-रो कर बुरा हाल है वे कहती है कि उनका एक ही सहारा था अमित। उनका दूसरा बेटा अभी छोटा है। अमित पर ही घर की जिम्मेदारी थी। वे तो उसकी शादी की तैयार कर रही थी। वह तो इतना शुशील और विनम्र था कि वह कभी भी किसी से झगड़ता नहीं था। कहती है कि क्यों मारा उन पैट्रोल पम्प के कर्मचारियो ने उसके लाडले को। यदि वे उसके पैसे नहीं दे पा रहे थे या उनका दिया गया चैक बाऊंस हो चुका था तो क्या उसके लाडले को जान से मारना ही था। उन्हे पहले बता देते तो वे उनकी आपसी लेनदेन वैसे समाप्त कर देती और अपने मांस के टुकड़े को घर वापस ले जाती। क्या बिगाड़ा उनके अमित ने उस पैट्रोल पम्प के कर्मचारियों का। ऐसे फफक-फफक कर अमित की मां का रोने से बुरा हाल है। वे आंसु के सिवा कुछ भी जबाव नहीं दे पा रही है। हर किसी से वे इतना जानना चाह रही है कि उनके अमित का क्या गुनाह है क्यों मारा गया उसे। वे पुलिस के पास हाथ जोड़कर विनती कर रही है कि उनके पास पुलिस को देने के लिए कुछ बचा नही है वे उनकी मदद कर देंगे तो वे पुलिस की ताउम्र ऋणी रहेगी।
उपरोक्त घटनाक्रम के लिए सम्पर्क व्यक्ति - जुबल किशोर, मो॰ - 9410944867

Thursday, October 2, 2014

इतिहास के पन्नो में बनता बिगड़ता ‘देहरादून’



प्रेम पंचोली
राजधानी बनने से पहले यह षहर कभी सैरगाह के लिए विख्यात था। मगर राजधानी बनने के बाद जिस तरह लोगो की राजनीतिक महत्वकांक्षा इस सुन्दर षहर पर बढने लगी वह भी इतिहास के पन्नो में दर्ज हो रही है। वैसे भी देहरादून का गौरवशाली इतिहास जहां पौराणिक गाथाओं एवं विविध संस्कृतियों को समेटे हैं वहीं नाना प्रकार के झंझावतों और उथल-पुथल की भी यह दूनघाटी गवाह बनी। बताया जाता है कि देहरादून का पुराना नाम द्रोणाश्रम था और इसका सबंध द्वापर युग में पांडवों तथा कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य के इस क्षेत्र में तपस्या हेतु आगमन से जोड़ा गया है। कुछ लोगो के मतानुसार गुरु रामराय के यहां पदार्पण से भी देहरादून षब्द निकट संबंध रखता है।
देहरादून दो शब्दों देहरा और दून से मिलकर बना है। इसमें देहरा शब्द को डेरा का अपभ्रंश माना गया है। जब गुरु रामराय इस क्षेत्र में आए तो अपने तथा अनुयायियों के रहने के लिए उन्होंने यहां अपना डेरा स्थापित किया। कालांतर में नगर का विकास इसी डेरे का आस-पास प्रारंभ हुआ। इस प्रकार डेरा का दून के साथ जुड़ जाने के पश्चात् यह स्थान देहरादून कहलाया जाने लगा। कुछ इतिहासविदें का यह भी मानना है कि देहरा शब्द स्वयं में सार्थकता लिए हुए है। इसको डेरा का अपभ्रंश रूप नहीं माना जा सकता है। देहरा शब्द हिंदी तथा पंजाबी में आज भी प्रयोग किया जाता है। हिंदी में देहरा का अर्थ देवग्रह अथवा देवालय है। जबकि पंजाबी में इसे समाधि, मंदिर तथा गुरुद्वारे के अर्थो में सुविधानुसार किया गया है। इसी तरह दून शब्द दूण से बना है और यह दूण शब्द संस्कृत के द्रोणि का अपभ्रंश है। संस्कृत में द्रोणि का अर्थ दो पहाड़ों के बीच की घाटी है।
देहरादून जिला उत्तर में हिमालय, दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों से घिरा हुआ है तो पूर्व में गंगा नदी और पश्चिम में यमुना नदी प्राकृतिक सीमा बनाती है। इस जिले का क्षेत्रफल 3088 वर्ग किमी है। यह जिला दो प्रमुख भागों में बंटा है। जिसमें मुख्य शहर देहरादून एक खुली घाटी है जो कि शिवालिक तथा हिमालय से घिरी हुई है और दूसरे भाग में जौनसार बावर है जो हिमालय के पहाड़ी भाग में स्थित है। प्राचीन दस्तावेज केदारखंड में यमुना, टौंस, बालखिल्य सुसवा, सिद्धकूट नागसिद्ध,, ऋषिकेश और तपोवन के नामों से दून क्षेत्र का उल्लेख है। द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य ने द्वारागांव के पास देहरादून शहर से 19 किमी पूर्व में देवदार पर्वत पर तप किया था। इसी से यह घाटी द्रोणाश्रम कहलाती है। बालखिल्य अथवा सुसवा नदी की उत्पत्ति की रोचक कथा है। एक बार देवताओं के राजा इंद्र ने बालखिल्य ऋषियों को गाय के खुर के समान पानी से भरे गढ्डे में क्रीड़ा करते देखा और वे उनके छोटे शरीर की हंसी करने लगे। इससे खिन्न होकर बालखिल्य ऋषियों ने दूसरे इंद्र की रचना के लिए तप किया। तपस्या मग्न ऋषियों के शरीर से इतना पसीना निकला कि उससे बालखिल्य या शोभन नदी बन गई जिसे अब सुसवा कहते हैं।
रामायण काल में भी देहरादून के बारे में विवरण आता है कि रावण के साथ युद्ध के बाद भगवान राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण इस क्षेत्र में आए थे। अंग्रेज लेखक जीआरसी विलियम्स ने ‘‘मेमोयर्स आफ दून’’ में ब्राह्मण जनुश्रुति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि लंका विजय के पश्चात् ब्राह्मण रावण को मारने का प्रायश्चित करने और प्रायश्चित स्वरूप तपस्या करने के लिए गुरु वशिष्ठ की सलाह पर भगवान राम लक्ष्मण के साथ यहां आए थे। राम ने ऋषिकेश में और लक्ष्मण ने तपोवन में पाप से मुक्ति के लिए वर्षो तपस्या की थी।
इसी प्रकार देहरादून जिले के अंतर्गत ऋषिकेश के बारे में भी स्कंदपुराण में उल्लेख है कि भगवान् विष्णु ने दैत्यों से पीड़ित ऋषियों की प्रार्थना पर मधु-कैटभ आदि राक्षसों का संहार कर यह भूमि ऋषियों को प्रदान की थी। पुराणों में इस क्षेत्र को लेकर एक विवरण इस प्रकार भी है कि राम के भाई भरत ने भी यहां तपस्या की थी। तपस्या वाले स्थान पर भरत मंदिर बनाया गया था। कालांतर में इसी मंदिर के चारों ओर ऋषिकेश नगर का विकास हुआ। पुरातत्व की दृष्टि से भरत मंदिर की स्थापना सैकड़ों साल पुरानी है। स्कंद पुराण में तमसा नदी के तट पर आचार्य द्रोण को भगवान शिव द्वारा दर्शन देकर शस्त्र विद्या का ज्ञान कराने का उल्लेख मिलता है। यह भी कहा जाता है कि आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वात्थामा द्वारा दुग्धपान के आग्रह पर भगवान शिव ने तमसा तट पर स्थित गुफा में प्रकट हुए शिवलिंग पर दुग्ध गिराकर बालक की इच्छा पूरी की थी। यह स्थान गढ़ी छावनी क्षेत्र में स्थित ‘‘टपकेश्वर महादेव’’ का प्रसिद्ध मंदिर बताया जाता है। महाभारत काल में देहरादून का पश्चिमी इलाका जिसमें वर्तमान कालसी सम्मिलित है का शासक राजा विराट था और उसकी राजधानी वैराटगढ़ थी। पांडव अज्ञातवास के दौरान भेष बदलकर राजा विराट के यहां रहे। इसी क्षेत्र में एक मंदिर है जिसके बारे में लोग कहते कि इसकी स्थापना पांडवों ने की थी। इसी क्षेत्र में एक पहाड़ी भी है जहां भीम ने द्रौपदी पर मोहित हुए कीचक को मारा था। जब कौरवों तथा त्रिगटा के शासक ने राजा विराट पर हमला किया तो पांडवों ने उनकी सहायता की थी।
महाभारत की लड़ाई के बाद भी पांडवों का इस क्षेत्र पर प्रभाव रहा और हस्तिनापुर के शासकों के अधीनस्थ शासकों के रूप में सुबाहू के वंशजों ने यहां राज किया। पुराणों मे देहरादून जिले के जिन स्थानों का संबंध रामायण एवं महाभारत काल से जोड़ा गया है उन स्थानों पर प्राचीन मंदिर तथा मूर्तियां अथवा उनके भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं। इन मंदिरों तथा मूर्तियों एवं भग्नावशेषों का काल प्रायः दो हजार वर्ष तथा उसके आसपास का है। क्षेत्र की स्थिति और प्राचीन काल से चली आ रही सामाजिक परंपराएं, लोकश्रुतियां तथा गीत और इनकी पुष्टि से खड़ा समकालीन साहित्य दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र रामायण तथा महाभारत काल की अनेक घटनाओं का साक्षी रहा है। यमुना नदी के किनारे कालसी में अशोक के शिलालेख प्राप्त होने से इस बात की पुष्टि होती है कि यह क्षेत्र कभी काफी संपन्न रहा होगा। सातवीं सदी में इस क्षेत्र को सुधनगर के रूप में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी देखा था। यह सुधनगर ही बाद में कालसी के नाम से पहचाना जाने लगा। कालसी के समीपस्थ हरिपुर में राजा रसाल के समय के भग्नावशेष मिले हैं जो इस क्षेत्र की संपन्नता को दर्शाते हैं। लगभग आठ सौ साल पहले दून क्षेत्र में बंजारे लोग आ बसे थे। उनके बस जाने के बाद यह क्षेत्र गढ़वाल के राजा को ‘‘कर’’ देने लगा। कुछ समय बाद इस ओर इब्राहिम बिन महमूद गजनवी का हमला हुआ।
इससे भी भयानक हमला तैमूर का था। सन् 1368 में तैमूर ने हरिद्वार के पास राजा ब्रह्मदत्त से लड़ाई की। ब्रह्मदत्त का राज्य गंगा और यमुना के बीच था। बिजनौर जिले से गंगा को पार कर के मोहन्ड दर्रे से तैमूर ने देहरादून में प्रवेश किया था। हार जाने पर तैमूर ने बड़ी निर्दयता से मारकाट करवाई। उसे लूट में बहुत-सा धन भी मिला था। इसके बाद फिर कई सदियों तक इधर कोई लुटेरा नहीं आया। शाहजहां के समय में फिर एक मुगल सेना इधर आई थी। उस समय गढ़वाल में पृथ्वी शाह का राज्य था। इस राजा के प्रपौत्र फतेह शाह ने अपने राज्य की सीमा बढ़ाने के उद्देश्य से तिब्बत और सहारनपुर पर एक साथ चढ़ाई कर दी थी, लेकिन इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार उसको युद्ध में हार का मुंह देखना पड़ा था। सन् 1756 के आसपास श्री गुरु राम राय ने दून क्षेत्र में अपनी सेना तथा शिष्यों के साथ प्रवेश किया और दरबार साहिब की नींव रखकर स्थायी रूप से यहीं बस गए।
गूजर और राजपूतों के आ जाने से धीरे-धीरे दून की आबादी बढ़ने लगी। आबादी तथा अन्न की उपज बढ़ने से गढ़वाल राज्य की आमदनी भी बढ़ने लगी। देहरादून की संपन्नता देखकर सन् 1757 में रूहेला सरदार नजीबुद्दौला ने हमला किया। इस हमले को रोकने में गढ़वाल राज्य नाकाम रहा। जिसके फलस्वरूप देहरादून मुगलों के हाथ में चला गया। देहरादून के तत्कालीन शासक नजब खाँ ने इसके परिक्षेत्र को बढ़ाने में भरपूर कोशिश की। उसने आम के पेड़ लगवाने, नहर खुदवाने तथा खेती का स्तर सुधारने में स्थानीय निकायों को भरसक मदद पहुंचाई, लेकिन नजब खाँ की मौत के बाद किसानों की दशा फिर दीनहीन हो गई।
गुरु रामराय दरबार के कारण यहां सिखों की आवाजाही भी बढ़ चुकी थी। अतः एक बार फिर से देहरादून का गौरव समृद्धशाली क्षेत्र के रूप में फैलने लगा। सन् 1785 में गुलाम कादिर ने इस क्षेत्र पर हमला किया। इस बार बड़ी मारकाट मची। गुलाम कादिर ने लौटते समय उम्मेद सिंह को यहां का गवर्नर बनाया। गुलाम कादिर के जिंदा रहते उम्मेद सिंह ने स्वामी भक्ति में कोई कमी न आने दी, लेकिन उनके मरते ही सन् 1796 में उम्मेद सिंह ने गढ़वाल राजा प्रद्युम्न शाह से संधि कर ली।
सन् 1801 तक देहरादून में अव्यवस्था बनी रही। प्रद्युम्न शाह का दामाद हरिसिंह गुलेरिया दून की प्रजा का उत्पीड़न करने वालों में सबसे आगे था। अराजकता के कारण दून की वार्षिक आय एक लाख से घटकर आठ हजार रुपये मात्र रह गई थी। प्रद्युम्न शाह के मंत्री रामा और धरणी नामक बंधुओं ने दून की व्यवस्था सुधार में प्रयास आरंभ किए ही थे कि प्रद्युम्न शाह के भाई पराक्रम शाह ने उनका वध करा दिया। अब देहरादून की सत्ता सहसपुर के पूर्णसिंह के हाथों में आ गई, किंतु वह भी व्यवस्था में सुधार न ला सका। पराक्रम शाह ने अपने मंत्री शिवराम सकलानी को इस आशय से देहरादून भेजा था कि वह उसके हितों की रक्षा कर सके। शिवराम सकलानी के पूर्वज शीश राम को रोहिला युद्ध में वीरता दिखाने के कारण टिहरी रियासत ने सकलाना पट्टी में जागीर दी थी। इन सभी के शासन काल में देहरादून का गवर्नर उम्मेद सिंह ही बना रहा। वह एक चतुर राजनीतिज्ञ था इसी कारण प्रद्युम्न शाह ने अपनी एक पुत्री का विवाह उसके साथ करके उसे अपना स्थायी शासक नियुक्त कर दिया। कहा जाता है कि 1803 में गोरखा आक्रमण के समय उम्मेद सिंह ने अवसरवादिता का परिचय इस प्रकार दिया कि युद्ध के समय वह अपने ससुर के पक्ष में खड़ा नहीं देखा गया। देहरादून को उसकी संपन्नता के कारण ही समय-समय पर लुटेरों की लूट एवं तानाशाहों की प्रवृत्ति का शिकार बनते रहना पड़ा।
सन् 1760 में गोरखों ने अल्मोड़ा को जीतने के उपरांत गढ़वाल पर धावा बोला। गढ़वाल के राजा ने गोरखों को पच्चीस सौ रुपये वार्षिक कर के रूप में देना शुरू किया, लेकिन इतना नजराना पाने के बावजूद भी 1803 में गोरखों ने गढ़वाली सेना से युद्ध छेड़ दिया। गोरखों की विजय हुई और उनका अधिकार क्षेत्र देहरादून तक बढ़ गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने देहरादून को गोरखों के प्रभाव से मुक्त कराने के लिए मोहन्ड और तिमली दर्रो से अंग्रेज सेना भेजी। अंग्रेजों ने बल का उपयोग करके गोरखों को खदेड़ बाहर किया और इस तरह उनका देहरादून में प्रभुत्व स्थापित हो गया। उन्होंने अपने आराम के लिए 1827-28 में लंढोर और मसूरी शहर बसाया। कुछ समय के लिए देहरादून जिला कुमाऊँ कमिश्नरी में रहा फिर इसको मेरठ में मिला दिया गया। आज यह गढ़वाल मंडल में है। 1970 के दशक में इसे गढ़वाल मंडल में शामिल किया गया।
सन् 2000 में उत्तरप्रदेश से अलग होकर बने उत्तरांचल अब उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून को बनाया गया। राजधानी बनने के बाद इस शहर का आकार निरंतर बढ़ रहा है। पिछले एक वर्श में देहरादून स्थित में दो लाख प्लांट मकान बनाने बावत बिक चुके है। ये प्लांट सिर्फ पहाड़ी गांव को छोड़कर उन लोगो ने खरीदे हैं जो पहाड़ की कठीनभरी जिन्दगी को अलविदा कहकर अब देहरादून के बासिंदे बनने वाले हैं। अर्थात इस प्रकार भविश्य में देहरादून में एक दर्जन से भी अधिक विधान सभाऐं बनने की आषंका है।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...