Wednesday, July 23, 2014

मुगालते में जनजाति समुदाय: नहीं बना जनजाति सलाहकार परिषद

प्रेम पंचोली


भूमि अधिकार मंच के तत्वाधान में आज राज्य की पांचो जनजातियों के लोगो ने देहरादून स्थित सुरभी पैलेस चकराता रोड में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की है। कार्यशाला में मुख्य रूप से जनजाति सलाहकार परिषद्  और जनजाति उपयोजना के दुरूपयोग को लेकर लोगो ने कई सवाल खड़े किये है। कार्यशाला के मुख्य अथिति सेवानिवृत्त आईएएस सुरेन्द्र सिंह पांगती ने कहा कि संविधान की 244वी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया कि जिन राज्यो में जनजातियां है वहां पर राज्य की जिम्मेदारी है कि उनके हित में त्वरित रूप से जनजाति सलाहकार परिषद का गठन कर देना चाहिए। उत्तराखण्ड राज्य में अब तक नहीं हो पाया है। उन्होने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि चूंकि उन्होने बकायदा राज्य सरकार को परिषद बावत एक दस्तावेज दिया जिसे तत्काल तिवारी की सरकार ने केन्द्र को भेज दिया था और केन्द्र ने भी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करवा करके साल 2010 में राज्य सरकार को भेज दिया था कि राज्य सरकार परिषद का गठन और उसकी नियमावली बनवा करके परिषद को जनजातियों के विकास के लिए कार्य करने की क्षमता प्रदान की जाये। कहा कि यह कोई कानून और शासनादेश का मामला नही है बल्कि यह तो संविधान समत्त मामला है जो नही हो पा रहा है। कहा कि जब वे प्रशासनिक सेवा में अविभाजित उप्र में थे तो वहां भी उन्होने तत्काल की सरकार को इस परिषद को बनाने का सुझाव दिया था। चूंकि अब राज्य बन गया है तो जनजाति सलाहकार परिषद अब तक क्रियाशील बन जाना चाहिए था सो नही बना। इससे लगता है  िकइस प्रदेश के राजनीतिक कार्यकर्ता किंकर्तव्यमूढ हो गये हैं।
कार्यशाला में पैनल ग्रुप के मुख्य वरिष्ठ साहित्यकार रतनसिंह जौनसारी ने कहा कि राज्य बनने के 14 वर्षो में जनजाति सलाहकार परिषद का गठन ना होना चिन्ता का विषय है। उन्होन कहा कि यह मामला तो सब राजनीतिक महत्वकांक्षाओ के कारण फंसता जा रहा है। उन्होने सुझाव दिया कि जनजातियो को अब इस कार्य के लिए संगठनात्मक कार्यवाही करनी होगी और सरकार से पूछा जाना चाहिए कि जब केन्द्र सरकार से परिषद गठन की अनुमति मिल चुकि है तो इस प्रदेश में जनजातियो को प्रतिनिधित्व करने वाले कहां सो रखे है। बीज बचाओ आन्दोलन के प्रणेता बीजू नेगी ने कहा कि इस प्रदेश में पाच जनजातिया है और इन जातियों का प्रतिनिधित्व दो-दो विधायक करते है। यहां तक कि जनजाति से एक विधायक तो कैबिनेट मंत्री तक है। उन्होने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि यही वजह है कि जनजाति उपयोजना का बजट ठीक तरिके से खर्च भी नहीं हो पा रहा है। पद्मश्री अवधेश कौशल ने कहा कि पांचो जनजातियो की समस्य अलग-अलग है परन्तु जौनसारी जनजाति की समस्या आज भी ज्यों की त्यूं है। उन्होने कहा कि आज भी जौनसार क्षेत्र में बंधुवा मजदूरी जैसी समस्या उस जनजाति क्षेत्र के दलितो के साथ खड़ी है जबकि 1976-77 में 19 हजार बंधुवा मजदूर सरकार ने पुनर्वास करवाये थे। सरकार को चाहिए कि वे जौनसार क्षेत्र में बंधुवा मजदूरी को लेकर पुर्ननिरिक्षण करवायें कि जनजाति का इस क्षेत्र में कितना फायदा हुआ है।    
यह दीगर है कि संविधान समत्त जैसे कार्यो को नजरअन्दाज करना सरकार की मानसिकता को दर्शाता है कि जो अब तक जनजाति सलाहकार परिषद का गठन तक नहीं किया गया तो वहीं जनजाति उपयोजना का जनजाति क्षेत्र में ठीक तरिके से इस्तेमाल ना होना विउम्बना ही कहा जायेगा। उल्लेखनीय तो यह है कि उत्तराखंड की पांच जनजातियों का आनुपातिक क्रम में देखे तो थारू जो कि उत्तराखंड की कुल जनजातीय आबादी का 33 प्रतिशत है , इसी तरह से  जौनसारी क्रमश 32.5 , बोक्सा 18.3, भोटिया 14.2 तथा वनराजी जिनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है 7.50 प्रतिशत हैं।
कार्यशाला में वक्ताओ ने कहा कि यह आवश्यकता राज्य बनने के दौरान से ही महसूस की जा रही है कि इन जनजातियों को संगठनात्मक कौशल की जरुरत है ताकि यह अपने अधिकारों की बात सरकार के सामने पुख्ता तरीके से रख सकें। जबकि पिछले कई वर्षो से भूमि अधिकार मंच के माध्यम से विभिन्न कार्यकर्मो के द्वारा सरकार के संज्ञान में जनजातियों की कई मांगो को रखा गया। जिसमें प्रमुख रूप से वनाधिकार अधिनियम का सुचारू क्रियान्वयन, जनजातीय सलाहकार परिषद् का गठन और जनजाति उपयोजना का दुरूपयोग।
बताया गया कि इन मुद्दों पर जब भी संगठन के सदस्यों द्वारा जवाब माँगा गया तो शासन की हिलाहवाली सामने आयी। मात्र शासन द्वारा जनजाति सलाहकार परिषद् के गठन को लेकर आश्वासनों का दौर जारी रखा गया। दो वर्ष पहले भारी जन दबाव के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री विजय बहुगुणा ने भी सितारगंज में 15 अगस्त 2012 तक जनजाति सलाहकार परिषद् के गठन की घोषणा भी कर दी थी जो की मामला अभी भी ठन्डे बस्ते में ही है।
ज्ञात हो कि भारतीय संविधान के 244 के अनुच्छेद 4 के अनुसार राष्ट्पति की सिफारिश पर ऐसे राज्यों में जहाँ जनजातियां निवास करती हैं जनजाति सलाहकार परिषद् का गठन को राज्यो को अनिवार्य रूप में करना बताया गया है। अर्थाथ जनजाति बहुल इलाकों में जनजाति सलाहकार परिषद् की प्रासंगिकता से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परिषद् के अभाव में किस तरह जनजाति उपयोजना के बजट का दुरूपयोग होता आ रहा है। जनजाति उपयोजना एक ऐसी योजना है जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार कुल बजट का लगभग 3 प्रतिशत जनजातियों के उत्थान के लिए आरक्षित रखती है। लेकिन अभी तक इस बजट को लेकर कोई वित्तीय योजना सरकार के पास नहीं है। जनजाति उपयोजना के बजट को लेकर प्रावधान है कि यह पैसा जनजाति समुदाय से जुड़े ऐसे कामो पर खर्च किया जाएगा जिसका सीधा लाभ जनजाति समुदाय को मिलेगा। यानि इसका मतलब यह है कि जहाँ जनजातियों की बसावट है उन्ही जगहों पर इस पैसे का इस्तेमाल किया जाएगा। उदाहरण के लिए सार्वजनिक सडको का दुरुस्तीकरण इस पैसे से किया जा रहा है जबकि यह तर्कसंगत नहीं है। एक दूसरा उदहारण कालसी ब्लाक की ग्राम सलगा का है जनजाति उपयोजना के अंतर्गत कालसी ब्लाक के लिए अट्ठारह लाख रूपये आवंटित किये गए थे यानी यह पैसा कालसी ब्लाक के लगभग 249 गाँव में खर्च किया जाना था लेकिन मजे की बात यह है कि इसमें से 9 लाख रूपये उपर्युक्त ग्राम पंचायत को सामुदायिक बरात घर बनाने के लिए दिये गये। स्पष्ट है कि यह काम बिना किसी जोड़तोड़ और जुगाड़ के संभव नहीं था। किसी भी योजना की सार्थकता तभी है जब वह उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसके लिए बनाई गयी है। लेकिन उत्तराखंड के सन्दर्भ में ऐसा हो नहीं पा रहा है।
कार्यशाला में फाईण्ड योर फीड के नीलेश मुंजे, हीरा जंगपांगी, जया मिश्रा, कु॰ विमला जौनसारी, अरविन्द जी, स्वगता कैंथोला, योगेश घ्यानी, इन्द्र सिंह नेगी, भारत चैहान, दौलत कुंवर, ध्वजवीर,  सुरेन्द्र जोशी, प्रेम पंचोली आदि लोग सम्मलित थे। कार्यशाला का आयोजन फाईण्ड योर फीड ने के द्वारा किया गया है।
-ः जनजाति सलाहकार परिषद को लेकर 23 जुलाई को मुख्यमंत्री को सौंपेगे 11 हजार हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन
-ः जनजाति क्षेत्र के गांव-गांव में चलाया जायेगा जनजाति उपयोजना और सलाहकार परिषद को लेकर अभियान
-ः यदि समय रहते परिषद का गठन नहीं हुआ तो सड़को पर उतरेंगे जनजाति क्षेत्र के लोग
सम्पर्क - 9760077581

मुगालते में जनजाति समुदाय: नहीं बना जनजाति सलाहकार परिषद

प्रेम पंचोली


भूमि अधिकार मंच के तत्वाधान में आज राज्य की पांचो जनजातियों के लोगो ने देहरादून स्थित सुरभी पैलेस चकराता रोड में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की है। कार्यशाला में मुख्य रूप से जनजाति सलाहकार परिषद्  और जनजाति उपयोजना के दुरूपयोग को लेकर लोगो ने कई सवाल खड़े किये है। कार्यशाला के मुख्य अथिति सेवानिवृत्त आईएएस सुरेन्द्र सिंह पांगती ने कहा कि संविधान की 244वी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया कि जिन राज्यो में जनजातियां है वहां पर राज्य की जिम्मेदारी है कि उनके हित में त्वरित रूप से जनजाति सलाहकार परिषद का गठन कर देना चाहिए। उत्तराखण्ड राज्य में अब तक नहीं हो पाया है। उन्होने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि चूंकि उन्होने बकायदा राज्य सरकार को परिषद बावत एक दस्तावेज दिया जिसे तत्काल तिवारी की सरकार ने केन्द्र को भेज दिया था और केन्द्र ने भी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करवा करके साल 2010 में राज्य सरकार को भेज दिया था कि राज्य सरकार परिषद का गठन और उसकी नियमावली बनवा करके परिषद को जनजातियों के विकास के लिए कार्य करने की क्षमता प्रदान की जाये। कहा कि यह कोई कानून और शासनादेश का मामला नही है बल्कि यह तो संविधान समत्त मामला है जो नही हो पा रहा है। कहा कि जब वे प्रशासनिक सेवा में अविभाजित उप्र में थे तो वहां भी उन्होने तत्काल की सरकार को इस परिषद को बनाने का सुझाव दिया था। चूंकि अब राज्य बन गया है तो जनजाति सलाहकार परिषद अब तक क्रियाशील बन जाना चाहिए था सो नही बना। इससे लगता है  िकइस प्रदेश के राजनीतिक कार्यकर्ता किंकर्तव्यमूढ हो गये हैं।
कार्यशाला में पैनल ग्रुप के मुख्य वरिष्ठ साहित्यकार रतनसिंह जौनसारी ने कहा कि राज्य बनने के 14 वर्षो में जनजाति सलाहकार परिषद का गठन ना होना चिन्ता का विषय है। उन्होन कहा कि यह मामला तो सब राजनीतिक महत्वकांक्षाओ के कारण फंसता जा रहा है। उन्होने सुझाव दिया कि जनजातियो को अब इस कार्य के लिए संगठनात्मक कार्यवाही करनी होगी और सरकार से पूछा जाना चाहिए कि जब केन्द्र सरकार से परिषद गठन की अनुमति मिल चुकि है तो इस प्रदेश में जनजातियो को प्रतिनिधित्व करने वाले कहां सो रखे है। बीज बचाओ आन्दोलन के प्रणेता बीजू नेगी ने कहा कि इस प्रदेश में पाच जनजातिया है और इन जातियों का प्रतिनिधित्व दो-दो विधायक करते है। यहां तक कि जनजाति से एक विधायक तो कैबिनेट मंत्री तक है। उन्होने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि यही वजह है कि जनजाति उपयोजना का बजट ठीक तरिके से खर्च भी नहीं हो पा रहा है। पद्मश्री अवधेश कौशल ने कहा कि पांचो जनजातियो की समस्य अलग-अलग है परन्तु जौनसारी जनजाति की समस्या आज भी ज्यों की त्यूं है। उन्होने कहा कि आज भी जौनसार क्षेत्र में बंधुवा मजदूरी जैसी समस्या उस जनजाति क्षेत्र के दलितो के साथ खड़ी है जबकि 1976-77 में 19 हजार बंधुवा मजदूर सरकार ने पुनर्वास करवाये थे। सरकार को चाहिए कि वे जौनसार क्षेत्र में बंधुवा मजदूरी को लेकर पुर्ननिरिक्षण करवायें कि जनजाति का इस क्षेत्र में कितना फायदा हुआ है।    
यह दीगर है कि संविधान समत्त जैसे कार्यो को नजरअन्दाज करना सरकार की मानसिकता को दर्शाता है कि जो अब तक जनजाति सलाहकार परिषद का गठन तक नहीं किया गया तो वहीं जनजाति उपयोजना का जनजाति क्षेत्र में ठीक तरिके से इस्तेमाल ना होना विउम्बना ही कहा जायेगा। उल्लेखनीय तो यह है कि उत्तराखंड की पांच जनजातियों का आनुपातिक क्रम में देखे तो थारू जो कि उत्तराखंड की कुल जनजातीय आबादी का 33 प्रतिशत है , इसी तरह से  जौनसारी क्रमश 32.5 , बोक्सा 18.3, भोटिया 14.2 तथा वनराजी जिनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है 7.50 प्रतिशत हैं।
कार्यशाला में वक्ताओ ने कहा कि यह आवश्यकता राज्य बनने के दौरान से ही महसूस की जा रही है कि इन जनजातियों को संगठनात्मक कौशल की जरुरत है ताकि यह अपने अधिकारों की बात सरकार के सामने पुख्ता तरीके से रख सकें। जबकि पिछले कई वर्षो से भूमि अधिकार मंच के माध्यम से विभिन्न कार्यकर्मो के द्वारा सरकार के संज्ञान में जनजातियों की कई मांगो को रखा गया। जिसमें प्रमुख रूप से वनाधिकार अधिनियम का सुचारू क्रियान्वयन, जनजातीय सलाहकार परिषद् का गठन और जनजाति उपयोजना का दुरूपयोग।
बताया गया कि इन मुद्दों पर जब भी संगठन के सदस्यों द्वारा जवाब माँगा गया तो शासन की हिलाहवाली सामने आयी। मात्र शासन द्वारा जनजाति सलाहकार परिषद् के गठन को लेकर आश्वासनों का दौर जारी रखा गया। दो वर्ष पहले भारी जन दबाव के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री विजय बहुगुणा ने भी सितारगंज में 15 अगस्त 2012 तक जनजाति सलाहकार परिषद् के गठन की घोषणा भी कर दी थी जो की मामला अभी भी ठन्डे बस्ते में ही है।
ज्ञात हो कि भारतीय संविधान के 244 के अनुच्छेद 4 के अनुसार राष्ट्पति की सिफारिश पर ऐसे राज्यों में जहाँ जनजातियां निवास करती हैं जनजाति सलाहकार परिषद् का गठन को राज्यो को अनिवार्य रूप में करना बताया गया है। अर्थाथ जनजाति बहुल इलाकों में जनजाति सलाहकार परिषद् की प्रासंगिकता से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परिषद् के अभाव में किस तरह जनजाति उपयोजना के बजट का दुरूपयोग होता आ रहा है। जनजाति उपयोजना एक ऐसी योजना है जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार कुल बजट का लगभग 3 प्रतिशत जनजातियों के उत्थान के लिए आरक्षित रखती है। लेकिन अभी तक इस बजट को लेकर कोई वित्तीय योजना सरकार के पास नहीं है। जनजाति उपयोजना के बजट को लेकर प्रावधान है कि यह पैसा जनजाति समुदाय से जुड़े ऐसे कामो पर खर्च किया जाएगा जिसका सीधा लाभ जनजाति समुदाय को मिलेगा। यानि इसका मतलब यह है कि जहाँ जनजातियों की बसावट है उन्ही जगहों पर इस पैसे का इस्तेमाल किया जाएगा। उदाहरण के लिए सार्वजनिक सडको का दुरुस्तीकरण इस पैसे से किया जा रहा है जबकि यह तर्कसंगत नहीं है। एक दूसरा उदहारण कालसी ब्लाक की ग्राम सलगा का है जनजाति उपयोजना के अंतर्गत कालसी ब्लाक के लिए अट्ठारह लाख रूपये आवंटित किये गए थे यानी यह पैसा कालसी ब्लाक के लगभग 249 गाँव में खर्च किया जाना था लेकिन मजे की बात यह है कि इसमें से 9 लाख रूपये उपर्युक्त ग्राम पंचायत को सामुदायिक बरात घर बनाने के लिए दिये गये। स्पष्ट है कि यह काम बिना किसी जोड़तोड़ और जुगाड़ के संभव नहीं था। किसी भी योजना की सार्थकता तभी है जब वह उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसके लिए बनाई गयी है। लेकिन उत्तराखंड के सन्दर्भ में ऐसा हो नहीं पा रहा है।
कार्यशाला में फाईण्ड योर फीड के नीलेश मुंजे, हीरा जंगपांगी, जया मिश्रा, कु॰ विमला जौनसारी, अरविन्द जी, स्वगता कैंथोला, योगेश घ्यानी, इन्द्र सिंह नेगी, भारत चैहान, दौलत कुंवर, ध्वजवीर,  सुरेन्द्र जोशी, प्रेम पंचोली आदि लोग सम्मलित थे। कार्यशाला का आयोजन फाईण्ड योर फीड ने के द्वारा किया गया है।
-ः जनजाति सलाहकार परिषद को लेकर 23 जुलाई को मुख्यमंत्री को सौंपेगे 11 हजार हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन
-ः जनजाति क्षेत्र के गांव-गांव में चलाया जायेगा जनजाति उपयोजना और सलाहकार परिषद को लेकर अभियान
-ः यदि समय रहते परिषद का गठन नहीं हुआ तो सड़को पर उतरेंगे जनजाति क्षेत्र के लोग
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Monday, July 7, 2014

वे आन्दोलनकारी नहीं बल्कि संस्कृतिकर्मी हैं

प्रेम पंचोली

उत्तराखण्ड पहाड़ी राज्य में ‘‘ढोल’’ के बिना कोई भी कार्य अधूरा माना जाता है चूंकि वर्तमान परिस्थितियों में ढोल व ढोली लुप्त प्रायः ही हो रहे है। इसके कई और कारण हो सकते है लेकिन ढोल का महत्व समझे बिना भी आगे बात करनी बेइमानी ही होगी। बताते चले कि इस पहाड़ी राज्य में बारह माह के बारह त्यौहार होते ही है। उदाहरणतः प्रत्येक माह की संक्रान्ती के दिन जो पूजा घरों व ‘‘देव स्थलों’’ मंे होती है वह ढोल की थाप पर ही आरम्भ होती है। मंदिरों में तो बाकायदा पण्डित जी जितने करतब पूजा-अर्चना बावत करता है उतने ही प्रकार के ताल मंदिर से कुछ गज दूर बैठा ‘‘ढोली’’ ढोल पर ध्वनी की उदŸा तरंगो से देता है। यहां बता दें कि यही नहीं यह ढोली अपने ढोल को कंधो पर उठाकर बड़े उल्लास के साथ फिर गांव की प्रत्येक देहरी पर ढोल की थाप देता है और लोग तब अपने-अपने घरो में संक्रान्ती का पूजन आरम्भ करते है। तीज-त्यौहारों में भी यह ढोल जहां लोगों को गांव की चैपाल पर एकत्रित होने का आमन्त्रण देता है वहीं लोगों के मंनोरंजन करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है। इसी तरह शादी-विवाह मंे भी ढोल व ढोली का अलग ही महत्व है। वे बारात के स्वागत से लेकर विदाई तक अपने ढोल के साथ पग-पग पर समारोह में उल्लास भरने में बेमिसाल उपस्थिति दर्ज करते हैं।

इसके अलावा जिस तरह वे शुभ अवसर पर ढोल की थाप को देने में मुस्तैद रहते हैं उसी तरह वे दुखः की घड़ी में भी उसी ढोल पर ऐसे स्वर-तालो की मार्मिक धुन प्रस्तुत करके दुखः के समय में गमगीन माहौल को भुलाने और भविष्य में कैसे अच्छा समय आये ऐसा वे शोक संदेश की ‘ताल लहरी’ का प्रवाह करते हैं। दरअसल यह कार्य तो ढोली समाज के लोग करते आये है और यह सचमुच में संस्कृति को भी बनाये हुए हैं।

संस्कृति के वनिस्पत वे अन्य सामाजिक प्रतिबद्धताओं पर भी खरा उतरतें हैं। देश-दुनियां में जितने भी जनआन्दोलन होते है उन आन्दोलनो की धार तेज करने में इनकी ढोल की थाप कमतर नहीं है। आगे ढोल और पीछे जुलूस ऐसा नजारा ही सम्पूर्ण आन्दोलन की शक्ल को प्रस्तुत करता आया है। जुलूस में सबसे आगे, स्वागत के लिए अगवानी, मेलो एवं नुमाईश में ढोल एवं ढोली की अनिवार्यता, तमाम सामाजिक गतिविधियो में जब ढोल की अनिवार्यता है तो फिर भी ढोली को असमानता का दंश झेलना ही पड़ता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ढोली एक संस्कृतिकर्मी भी है तो वह आन्दोलनकारी भी है।

परन्तु इससे आगे वह एक खास प्रकार का शिल्पी ‘‘दर्जी एवं नाई’’ के रूप में रहा है। बहरहाल वर्तमान में ढोली के इनमें से एक हुनर को अन्य विरादरियों ने अपनाया हो लेकिन ढोली विरादरी को यह कार्य विरासत में ही मिला है। अब तो मेलो एवं नुमाईशो की शक्ले सरकारी बजट ने बदली दी है। उत्तरकाशी जनपद के दूरस्थ गांव कण्डाऊं के बचन दास जो ढोल सागर के ममज्र्ञ है वे कहते है कि ढोल सागर जैसे शास्त्र में पैदा होने से लेकर मृत्यु तक के अलग-अलग आयामो के ‘‘श्लोक’’ है जो मनुष्य को सौहार्दपूर्ण व्यवहार की दिशा अख्तियार करता है। कहते है कि जब से भौण्डा प्रवृत्ति के बैण्ड बाजो ने गांवों में दस्तक दी है तब से ढोल व ढोली का अस्तित्व ही संकट में है। यही नहीं तब से वैमनस्य की भावना समाज मंे ज्यादा ही दिखाई दे रही है। वह यह भी मानते है जब ‘‘ढोल’’ के बिना कोई भी कार्य अधूरा है तो ढोली के साथ होता आया भेदभाव ही ‘‘ढोल’’ पर संकट का एक कारण है। टिहरी के ढोल वादक सोहन लाल बताता है कि कुछ दिन तो ढोल बजाने से राशन चल ही जाता है। आगे उन्होंने कहा कि यदि गांव की बारात में जाना होता है तो रात्री विश्राम के लिए गौशाला ही नसीब होती है। इसके अलावा उŸारकाशी के सोहन दास, फूल दास, पिनाठिया दास, चमन दास चमोली के दिवानी राम, पिथौरागढ के भुवनराम देहरादून जौनसार क्षेत्र के सीन्नाराम जैसे ढोल वादक कहते हैं कि उन्हे प्रदर्शन के पश्चात ना तो एक तयशुदा मजदूरी मिलती है और ना ही उन्हे मान समान दिया जाता है। कहा कि जब तक ढोल नहीं बजेगा तब तक कोई भी कार्य आरम्भ ही नही होता। जन्म से लेकर मृत्यु तक ढोल की आवश्यकता यहां के समाज को है। फिर भी ढोली समाज अछूता है।
सनद रहे कि देश भर मंे आयोजित व स्वस्फूर्त राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आन्दोलनों में ढोल एक मुख्य कड़ी हैं इसकी गुंजायमान एक ही थाप लोगों को सोचने के लिए विवश कर देती है। लोक संस्कृति का संवाहक कहे जाने वाले ढोल की अन्य प्रतिस्पर्धा मंे भी एक खासा स्थान है।
हंसने की ताल, रोने की ताल, लड़ने की ताल, उŸोजना की ताल, जोड़ने की ताल, नाचने की ताल, खेलने की ताल, आमन्त्राण की ताल, रूकने की ताल, बधाई संदेश की ताल, झकझोरने की ताल, देव अवतार की ताल पूजने व विसर्जन की ताल, सन्देश पहंुचाने की ताल, न जाने इस ढोल मंे हजारों ताल समाये है। इस सम्पूर्ण ढोल सागर की संगीत विद्या पर अध्ययन करने की आज की आवश्यकता है। हालांकि हेमवन्ती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर मंे ‘‘ढ़ोल के संरक्षण’’ बावत एक केन्द्र स्थापित हुआ था और कुछ कार्य भी हुए थे परन्तु वर्तमान मंे यह केन्द्र ढ़ोल को भुलाया बैठा और ‘‘नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा’’ की तर्ज पर कार्य करने लग गया है। कहा जा सकता है कि ढोल व ढोली पर एक बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है। अब ढोल सिर्फ लोक संस्कृति कहे जाने तक ही सिमटता जा रहा है।

सामाजिक ताने-बाने मंे ढोली समाज अब हाशिये पर खड़ा हो चुका है। परन्तु ढोली समाज के लोग संस्कृति का बोेझ ढोने के लिए आज भी तैयार है।




.02.
ढोल और ढोल सागर             
ढोल सागर भी एक महा ग्रन्थ है। उत्तराखण्ड मे इस ढोल की गाथा का इतिहास पांच हजार साल पुराना बताया जाता है। ढोल वादन के पारखी मंत्र तंत्र के अलावा जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी आयामो में ढोल की अनूगूंज का अनूठा प्रस्तुतिकरण करते है और इस ढोल के बिना उत्तराखण्ड में कोई भी शुभ-अशुभ कार्य आरम्भ नहीं होता है। सन्1926 से पहले ढोल विद्या मौखिक थी 1932 में पहली बार भवानी दत्त पर्वतीय ने ढोल सागर पुस्तिका प्रकाशित की। 60 के दशक में मोहन लाल बाबुलकर ने नद नंदनी पुस्तक लिखी जो आज भी अप्रकाशित है। 70 के दशक मे केशव अनुरागी,1976 मे अनूप चंदोला ने ढोल सागर पर किताब लिखी तो इन्ही दिनो प्रो.विजय कृष्ण ने शोध किया। 90 के दशक में आस्ट्रेलिया के न्यू इंग्लैण्ड विवि के प्रो.एन. रुवी ओल्टर ने डासिंग विद देवतास पुस्तक लिखी। कुलमिलाकर ढोल और ढोली पर पुस्तकें तो लिखी गयी परन्तु उस ढोली बिरादरी की आजीविका पर आज तक कोई सकारात्कम पहल सामने नहीं आई है।

.03.
आन्दोलनकारी जो अब तक घोषित न हो सके-चन्द्र सिंह, सेनि॰ आईएएस॰
रामपुर तिराहा काण्ड के बारे में मुझे बारीकी से इसलिए जानकारी हुई थी,चूंकी मैं 02 अक्टूबर 1994 को स्वयं उपाध्यक्ष हरिद्वार विकास प्राधिकरण के पद पर तैनात था। घटना की सूचना मिलने पर मैं भी रुड़की राजकीय चिकित्सालय मे जख्मी आन्दोलनकारियो को देखने गया था।
तत्काल जिलाधिकारी चमोली रहते हुए भी कई बार आन्दोलनकारियों को मिलने के लिऐ गैरसैण जाना पड़ा और आन्दोलन को उग्र होने से बचाने का प्रयास किया। सभी गांवो से जितने भी आन्दोलनकारियों की टोलियां मुख्य बाजारो एवं मुख्य स्थानो पर एकत्रित होती थी, की अगवाई ढोल, नगाड़ा, रणसिंगा, तथा भेरी से स्थानीय बाजगी स्वतःस्पूर्त आन्दोलन के हिस्से के रूप में भाग लेते हुऐ मैने स्वयं देखा था। मेरी जानकारी मे सभी आन्दोलनकारी बाजगीयो सहित दिन भर भूखे रहते थे। यह कटु सत्य है कि आन्दोलन की अगवाई ढोल आदि लोक वाध्य यंत्रो की थाप से ही होती थी। जितनी अधिक ढोलो की संख्या उतना ही आन्दोलन में उत्साह बनता था। पता नहीं बाजगी समुदाय के लोग आन्दोलनकारियों की श्रेणी मे क्यों नहीं आऐ यह कौतुहल का विषय है। लिहाजा इसकी पुष्टी तत्कालीन जिलाधिकारियों से की जा सकती है। इस हेतु चिन्हित आन्दोलनकारी का कथन ही विश्वसनीय होगा।
सार्वजनिक स्वरूप के राष्ट्रीय महत्व के चारो धाम और राज्य स्तरीय व ग्राम स्तरीय  जितने भी सार्वजनिक स्वरूप के मंदिर है,जिसकी व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 25(2)(ख)में दी गयी है, के अनुरूप बाजगीयो के मान तथा सम्मान की व्यवस्था की जा सकती है। बदलते परिवेश ने इनके पारंगत व्यवसाय की मजदूरी वही पुराने ढर्रे पर आंकी जाती है। खेद इस बात का है कि श्रम विभाग एवं राजस्व विभाग ने भी बंधुवा मजदूर/सामुहिक बंधुवा मजदूरो के साथ-साथ बाजगी समुदाय की स्थिति की न तो समीक्षा की और न ही वर्तमान स्थिति को जानने का प्रयास किया गया। उत्तराखड के अधिकांश हिस्सो में आज भी यह प्रथा मौजूद है कि मुर्दे की अर्थी के आगे-आगे ढोल बजाते हुऐ बाजगी को मुर्दाघाट तक जाना पड़ता है।
पŸाा - प्रेम पंचोली 140, रायपुर ढाल देहरा दून -248008, मो.9411734789,

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...