Wednesday, February 28, 2018

प्रकृति के बीच की सड़के मौसमी, और अप्राकृतिक आॅलवेदर?



प्रकृति के बीच की सड़के मौसमी, और अप्राकृतिक आॅलवेदर?



वैज्ञानिको के मतानुसार उत्तराखण्ड के पहाड़ो की उम्र कोई पांच हजार करोड़ साल की बताई जाती है, जिसे वे आज भी कच्चे पहाड़ के श्रेणी में मानते है। इन पहाड़ो के सीने पर यदि 24मीटर चैड़ी सड़क बनाई जायेगी तो क्या ये पहाड़ इतनी बड़ी सड़क को सहन कर सकते हैं? या इन कच्चे पहाड़ो की आद्रता जिस जैवविविधता से बनी है, उसे नष्ट करके आॅलवेदर रोड़ की सफलता कही जा सकती है? जी हां आॅलवेदर रोड़ की सफलता है पर जिस सामरिक दृष्टी को देखते हुए हमारे हुक्मरान इस विशालकाय सड़क को बनाने जा रहे हैं जब वहां जन जीवन ही नहीं रहेगा तो सीमाओं पर और चैकसी की आवश्यकता पड़ेगी। तात्पर्य यह है कि बिना लोगो के सामरिक पारिस्थिति को सुरक्षा देना शायद संम्भव हो पायेगा? यह सोचनीय पहलू है। अर्थात प्राकृतिक संसाधनो की बली भी चढाई गयी, पहाड़ में आपदा का घर बनाया गया और सीमायें और असुरक्षित हो जायेगी तो ऐसे में आॅलवेदर रोड़ की आवश्यकता संदेह के घेरे में है। पर इतना जरूर है कि यदि आॅलवेदर रोड़ बनकर तैयार हो जायेगी तो चारधाम यात्रा निश्चिित रूप से अबाध गति से बारहमास चलेगी। मगर जानकारो का यह भी कहना है कि मौजूदा सड़को को ही व्यवस्थित और पूर्ण किया जाये, और सड़क से संबधित विभागो में विधिवत रूप से पूर्णकालिक कर्मीयो की पूर्ती तथा आश्यक संसाधनो की पूर्ती की जाये तो पूर्व की सड़के भी किसी आॅलवेदर रोड़ से कम नहीं है।

इसे विडम्बना कहे या विकास की नई सोच। पर यहां एकदम सत्ता परिवर्तन की दिशा से विकास के मायने भी परिवर्तीत नजर आ रहे है। जैसे आॅलवेदर रोड़ की कल्पना को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटक स्थलो गंगोत्री, यमनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ को आॅलवेदर रोड़ से जोड़ा जा रहा है। इस प्रकार सड़क 10 से 24 मीटर तक चैड़ी होगी, और मोटर वाहन तब फर्राटे भरेंगे तथा कभी भी उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्य में ये सड़कें भूस्खलन के कारण बन्द नहीं होगी। ना ही वाहन दुर्घटना होगी। ऐसा इस महापरियोजना का सीधा सा जवाब है। दूसरा जवाब राजनीतिक है। की आॅवेदर रोड़ बनने के कारण राज्य में पर्यटको की संख्या में भारी इजाफा होगा, और राज्य में रोजगार के साधन बढेंगे बगैरह। इन स्थानो पर बारहमास तीर्थ-यात्रीयों के लिए आवागमन की सुगमता बनी रहेगी। पर इस अन्तराल में जो हरे पेड़ कटेंगे उनकी भरपाई कैसी होगी। ऐसा स्पष्ट नहीं बताया जा रहा है। जी हां! ऐसी इस परियोजना का सपना है।

ज्ञात हो कि आॅलवेदर रोड़ के योजनाकारो ने कभी भी ऐसा बताने का कष्ट नहीं किया कि योजना के निर्माण से प्राकृतिक संसाधनो का कितना नुकसान होगा? स्थानीय लोगो की छोटी जोत की खेती का जो अतिक्रमण आॅलवेदर रोड़ के लिए किया जायेगा, उसके बदले अमुक काश्तकार को आजीवन क्या सुरक्षा मिलने वाली है? इस निर्माण के दौरान कितने प्राकृतिक जलस्रोत नष्ट होंगे? उसका लेखा-जोखा भी इस महापरियोजना में कहीं नही मिलता है। जबकि यह महापरियोजना काश्तकारो को मुआवजा की धनराशी का हवाला देकर जन संस्तुति की बात कह रही है। यहां आॅलवेदर रोड़ से जुड़े योजनाकार बताते हैं कि पेड़ कटेंगे तो इसके बदले वृक्षारोपण दूसरे राज्यों में भारी मात्रा में किया जायेगा। पर ऐसा नहीं बताते कि जहां इस तरह का पर्यावरणीय नुकसान विकास के नाम पर हो रहा हो वहां के पर्यावरण की भरपाई कैसे होगी? ऐसे सवालो का जबाव भी नहीं आ रहा है।

जबकि ऐसा नहीं है। इसके लिए इन चार प्रमुख स्थानो को जाने वाले मौजूदा मोटर मार्गो को 10 से 24 मीटर तक चैड़ा किया जा रहा है। इस हालात में पूर्व की सड़कों के सिराहने पर बसे गांव नीचे की ओर धंसने लग गये हैं। अब ये गांव विस्थापन की कगार पर आ रहे हैं। मुआवजा की समस्याऐं विभिन्न रूपों में खड़ी हो रही है। राज्य के पर्यावरण कार्यकर्ता इस बात के लिए चिन्तित हैं कि इस चैड़ीकरण में कितने हरे पेड़ो को काटा जायेगा, और इन पेड़ो की भरपाई राज्य में कैसी होगी। यदि ऐसा भी नहीं है तो इसके पर्यावरणीय नुकसान का खमियाजा जनता क्यों भुगते और क्या इस तरह के अवैज्ञानिक विकास के माॅडल से राज्य और सरकार को भारी-भरकम फायदा दिखाई दे रहा है? ऐसे तमाम सवाल आॅलवेदर रोड़ को लेकर कसमकस बने हुए है। इधर लोग आॅलवेदर रोड़ पर उठाये जा रहे सवालों के जबाव की इन्तजारी सरकार की तरफ से कर रहे हैं। गंगोत्री घाटी के गंगोरी, भटवाड़ी, जसपुर, हर्षिल और गंगोत्री के लोग बता रहे हैं कि आॅलवेदर रोड़ के निर्माण के कारण उनके गांव का पानी और पेड़ गायब हो रहे हैं।

आॅल वेदर रोड़ का निर्माण कार्य ऋषिकेश से आरम्भ हो चुका है। मार्गों के दोनों तरफ पेड़ों का अंधाधुंध कटान चल रहा है। गंगोत्री में देवदार के हजारों हरे पेड़ों पर छपान किया गया है। सड़क चैड़ीकरण के नाम पर देवदार के अतिरिक्त बाँझ, बुराँस, तुन, सीरस, उत्तीस, चीड़, पीपल आदि के पेड़ भी वन निगम काट रहा है। निर्माण कार्य में लगी हुई भीमकाय मशीनों को देखते हुए यहां स्थिति भयावह बनी हुई है, और ऐसा महसूस हो रहा है कि इस भू-भाग मे विकास का यह नया प्रारूप स्थानीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जनजीवन पर भविष्य में भारी पड़ सकता है। गंगोत्री जाने वाले रास्ते मेें भटवाड़ी स्थित पूर्व में हुई सड़क चैड़ीकरण के कारण सभी आवासीय मकानो में दरारें आज भी मौजूद है। भटवाड़ी के 43 परिवार 2013 के बाद ही ऊर्जा निगम की खाली पड़ी काॅलोनी में शरणार्थी जीवन बिता रहे हैं। अब उन्हे यहाँ से इसलिए हटना पड़ेगा कि यहीं से आॅलवेदर रोड़ बननी है। वैसे भी इस क्षेत्र में आए दिन भूकंप आ रहे हैं। घरों में इतनी मोटी दरारें है जो पारदर्शी बनी है। यहाँ बारिश होने पर लोग रात भर जागते हैं। क्योंकि वे डेंजर जोन में हैं। विकास के नाम पर सड़क निर्माण के लिए कुर्बान कर दिए गए जो 43 परिवार 4 वर्षाें से जल विद्युत निगम की पुरानी काॅलोनी में रह रहे हैं उन्हें बिजली, पानी की सुविधा भी नहीं दी गई है। आॅलवेदर रोड बनने से उनकी धड़कन तेज होने लग गयी है। भटवाड़ी बाजार में वस्त्र विक्रेता मथुरा दत्त रतूड़ी को आशंका है कि इस बार आॅल वेदर रोड के रूप में जो सड़क का चैड़ीकरण होगा उसमें उनकी दुकान भी नहीं बचेगी। भटवाड़ी के ही अनुराग रतूड़ी ने कहा कि सड़क पहले से छः मीटर चैड़ी थी जो अब 18 मीटर चैड़ी होेगी। इसका मलवा और इस अन्तराल में कटने वाले पेड़ो की भरपाई कौन करेगा? भटवाड़ी के ग्राम प्रधान संजीव नौटियाल ने कहा कि तिहार और भंगेली जैसे गांवों के लोग लोहारीनाग पाला जल विद्युत परियोजना से प्रभावित है। उन्हें अभी तक न्याय नही मिला है। गंगोत्री घाटी में लोग केवल सड़क चैड़ीकरण से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों से ही आशंकित नहीं हैं बल्कि जसपुर, पुराली जैसे आधा दर्जन गांवों के लोगों को एक नए खतरे में डाल दिया है। हर्षिल और भटवाड़ी के बीच के इस क्षेत्र में वर्तमान में हाइवे सुक्खी बैंड से होकर ऊंचाई की ओर चढ़ता हुआ जसपुर पुरोली गांवों को छूता हुआ नीचे झाला गांव में उतर जाता है, लेकिन अब सरकार द्वारा कराए गए नए सर्वे के मुताबिक सुक्खी बैंड से झाला तक सीधे भागीरथी के किनारे-किनारे सड़क बनाई जाएगी। लगभग 20 वर्षाें से प्रस्तावित इस सड़क का ग्रामीण लगातार विरोध कर रहे हैं। इधर उत्तरकाशी के वन प्रभागीय अधिकारी संदीप कुमार ने भी सीधे सुक्खी बंैंड से झाला पुल के लिए सड़क निर्माण होने और पेड़ों की गिनती और छपान की पुष्टि की है।

दिलचस्प यह है कि सुक्खी बैंड से झाला तक सड़क बनने पर हांलाकि 5-6 किमी हाइवे की दूरी घट जाएगी लेकिन ग्रामीणों को संदेह है कि भागीरथी के किनारे-किनारे गांवों की तलहटी में सड़क काटने से भूस्खलन और भंूकंप की समस्या बढ़ेगी। भागीरथी के किनारे शताब्दियों से पल रहे हजारों देवदार आदि प्रजाति के हरे पेड़ इस नई सड़क को बनाने के लिए काट दिए जाएंगे। गंगोत्री जाने वाले यात्रियों के कारण जसपुर में जो छोटा सा कस्बा आबाद हुआ था सो आॅलवेदर रोड के बनने से समाप्त हो जाएगा। जसपुर गांव के विनोद का कहना है कि जहां सरकार लोगों को सड़कों से जोड़ने की बात कर रही हैं वहीं उन्हें सड़क से अलग-थलग कर रही हैं। यहाँ दुकान चला रहे जोत सिंह का कहना है, इस सड़क को बनाने के लिए लोगों ने पहले भी बिना मुआवजा के वार्डर सुरक्षा के नाम पर जमीनें दी थी। जोत सिंह याद करते हैं, जब गंगोत्री हाइवे के लिए जमीन चाहिए थी तब तत्कालीन एसडीएम श्री मर्तोलिया ने गांव में ही पांच दिन तक जमीन अधिग्रहण के लिये डेरा डाल दिया था। इस प्रकार गांव के लोग दो बार चैडी़करण के लिए जमीनें दे चुके हैं। एक ओर तो सरकार ने गांव के लोगों की जमीनें सड़क चैड़ीकरण के लिए अधिगृहित की हुई है और दूसरी ओर एक नई सड़क बनाने की तैयारी भी चल रही है। सुक्खी के ग्राम प्रधान मुरारी सिंह का कहना है, सड़क पूर्व की भान्ति रहनी चाहिए, जहां पेड़ भी अधिक नहीं कटेगें। जबकि इसके लिए वे चार बार दिल्ली की चैखट पर फरियाद कर चुके हैं। सुक्खी बैण्ड से झाला तक नए मोटर मार्ग में लगभग 5000 देवदार के पेड़ कट सकते हैं। सुक्खी टाॅप से गंगोत्री के बीच का 30 किमी का भाग देवदार का घना जंगल है। यह भाग हर्षिल का सर्वोत्तम हरियाली वाला क्षेत्र भी है। हर्षिल के इसी भाग में आसपास केवल 5-7 किमी के दायरे में ही उत्तरकाशी-गंगोत्री हाइवे के चैड़ीकरण के लिए पहले ही 6000 से अधिक देवदार के पेड़ों को काटने के लिए छापा गया है।

हर्षिल की ग्राम प्रधान बसंती नेगी कहती हैं कि इस क्षेत्र में लगातार जंगलों के काटने से अब हर्षिल और गंगोत्री में भी तेज गर्मी पड़नी शुरू हो गई है। समय पर बर्फ का गिरना बन्द हो गया है। बुरांश का फूल समय से पहले फूल देने लग गया है। अधाधुन्ध पेड़ कटान के कारण जलवायु में काफी परिवर्तन दिखाई दे रहा है। और जब आॅलवेदर रोड़ के लिए यहां पेड़ कटने आरम्भ होंगे तो इस क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन के खतरे गंगा के आबाद क्षेत्र में दिखाई ही नहीं देंगे बल्कि उसके दुष्परिणाम भी आयेंगे। जैसा कि महसूस हो रहा है। सुक्खी के पूर्व प्रधान गोविन्द सिंह का कहना है कि सड़क चैड़ीकरण के नाम पर जो पेड़ काटे जा रहे हैं उनकी जगह नए पेड़ों को पनपने में, पीढ़ियां लग जाएंगी। प्रहसन है कि एक तरफ तो केन्द्र सरकार ‘‘नमामि गंगे जैसी परियोजना’’ चला रही है वहीं दूसरी ओर गंगा के किनारे को हरा-भरा करने के बजाय उसे उजाड़ा जा रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता डाॅ. नागेन्द्र जगूड़ी ने कहा कि गंगोत्री क्षेत्र में केवल सड़क चैड़ीकरण के लिए पेड़ काटे जाने की समस्या नहीं है बल्कि सड़क निर्माण का मलवा और बोल्डर जिस तरह से सीधे नदियों व जंगलो के ढलान में डाले जाते हैं उससे सड़क के किनारे का जितना भी जंगल और जीवन होता है, सारा ही नष्ट हो जाता है। मतलब साफ है कि सड़क निर्माण के लिए जितने पेड़ों का छपान कर बताया जा रहा है उससे कहीं अधिक पेड़ मलवा, पत्थर और बोल्डर गिरने से दब और टूट जायेंगे। ऐसे में प्राकृतिक संसाधनो का दुगुना नुकसान होगा। यहां पूर्व के उदाहरण है कि मलवे से दबने के कारण ही जड़ीढ़ूंग और धरासू के आसपास का पूरा जंगल ही समाप्त हो गया है। मुखबा की ग्राम प्रधान अनिता राणा का कहना था कि मैदान के मानकों के हिसाब से पहाड़ों में सड़क निर्माण की सोच को बदलना होगा। गंगोत्री क्षेत्र जो पर्यावरण के हिसाब से अति संवेदनशील है वहाँ 18-24 मीटर चैड़ी सड़क बनाने पर सवाल खड़ा होना लाजमी है।

बता दें कि भटवाड़ी के आसपास अनेक स्थानों पर उत्तरकाशी-गंगोत्री सड़क की चैड़ाई चार से 5-6 मीटर तक पायी गई। वहीं हर्षिल के आस-पास यही सड़क 6-6.5 मीटर चैड़ी है। लेकिन गंगोत्री से हर्षिल की ओर 10 किमी के क्षेत्र में बीआरओ द्वारा आॅलवेदर रोड के लिए घोषित 18-24 मीटर चैड़ी सड़क तैयार कर डाली है। गंगोत्री में मौजूद संत समाज आॅलवेदर रोड के नाम पर हो रहे पहाड़ के इस विनाश के लिए चिन्तित है। गंगोत्री में दो दशक से अधिक समय से रह रहे स्वामी कृष्णा प्रपन्नाचार्या का कहना है कि गंगोत्री में बर्फबारी लगातार कम हो रही है। अब तो यहां दोपहर में मैदानों के जैसी ही तेज धूप लगती है। उन्होंने कहा कि गंगोत्री के तापमान पर घाटी में हो रहे वृक्षों के कटान का असर दिखने लगा है। जबकि दूसरी ओर डीएफओ उत्तरकाशी ने बताया कि केन्द्र सरकार ने नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत 30,000 हैक्टेयर जमीन पर वृक्षो के रोपण का लक्ष्य रखा है। यह कैसा विरोधाभास है कि गंगा के उद्गम स्थल में गंगोत्री से हर्षिल गांव के बीच हजारों जिंदा पेड़ों को काटने के लिए चिन्हित किया गया है। चट्टानों की ब्लास्टिंग के लिये जोरदार विस्फोटों का प्रयोग भी धड़ल्ले से हो रहा है। बीआरओ भी सड़क निर्माण के दौरान मलबा को भारी मशीनों से खिसकाकर भागीरथी में डाल रहे हैं। इस तरह के हालात पूरी भागीरथी घाटी में सड़क चैड़ीकरण के कारण पूर्व से बने है।

अध्ययन रिपोर्ट - केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के सामने रखी


नदी बचाओ अभियान के संयोजक, रक्षासूत्र आन्दोलन के प्रणेता सुरेश भाई, जमनालाल बजाज पुरूस्कार से सम्मानित व वरिष्ठ सर्वोदय कार्यकर्ती राधा भट्ट ने केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से आॅलवेदर रोड को लेकर मुलाकात की है। उन्होंने प्रस्तावित और निर्माणाधीन आॅलवेदर रोड की मौजूदा पारिस्थितिकी को एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के सामने रखी। केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी ने उन्हे आश्वासन दिया कि पर्यावरण की मूल भावना को इस परियोजना में मुख्य स्थान है। कहा कि नुकसान होगा भी तो भरपाई की जायेगी। आश्यकता पड़ी तो योजना में फेरबदल भी किया जायेगा।

Writing by प्रेम पंचोली

Monday, February 19, 2018

पहली बार सांवणी गांव पंहुचा पूरा प्रशासनिक मजमां


सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के दूरस्थ क्षेत्र मोरी के सावणी गांव में 16 फरवरी 2018 की अर्द्धरात्री को लगभग 50 परिवारो के आशियाने आग के हवाले हो गये। यह शायद इस क्षेत्र की पहली घटना होगी जहां पर जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करने की जहमत उठाई। इसका श्रेय स्थानीय लोग मौजूदा जिलाधिकारी डा॰ आशीष चैहान को दे रहे है। जिन्होने रात खुलने से पहले इस अग्नीकांण्ड को लेकर अधिकारियों की बैठक ली और घटना स्थल पंहुचने के आदेश दिये। खुद भी वे दूसरे दिन सावणी गांव प्रभावितो के हालचाल जानने पंहुच गये। बता दें कि राज्य बनने के बाद की इस क्षेत्र में यह अग्नीकाण्ड की नौंवी घटना है।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भी 18 फरवरी 2018 को सांवणी गांव पंहुचकर अग्निकाण्ड पीडितों से मुलाकात की। उन्होंने प्रभावितों को गृह अनुदान एवं अनुग्रह राशि के साथ ही पशुहानि के कुल रूपये 58 लाख 29 हजार 200 के चैक भी वितरित किये। जिसमें 40 पूर्ण क्षतिग्रस्त भवनों के लिये रूपये 40 लाख 76 हजार, आंशिक 06 क्षतिग्रस्त भवनों के लिये रूपये 31 हजार 02 सौ, 55 बडे पशुओं गाय, बैल, खच्चर के लिये रूपये 14 लाख 50 हजार, 40 छोटे पशुओं के लिये रूपये 01 लाख 20 हजार और अहेतुक सहायता के रूप में वितरित 01 लाख 52 हजार की धनराशि भी सम्मिलित है। उन्होंने कहा कि वे 47 पीडित परिवारों को प्रदेश भाजपा की ओर से भी 10-10 हजार रूपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराये जाने के लिये प्रदेश अध्यक्ष से बात करेंगे। कहा कि दुःख की इस घडी में वे पीड़ितों के साथ है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में आग लगने के कारणों की तलाश करना होगी। उन्होंने जिलाधिकारी को निर्देश दिये कि इस क्षेत्र में आग न लगने के स्थायी समाधान ढूंढे जाए तथा इसके लिये एक टीम बनाकर इसका अध्ययन किया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके लिये यहां के जनप्रतिनिधियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी आगे आना होगा। उन्होने यह भी कहा कि आगामी 04 वर्षों के अन्दर एक ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जायेगी जिससे कि जनहानि व पशुहानि से बचा जा सकेगा। इसकी शुरूआत उन गांवों से की जायेगी जो गांव अभी तक सड़क से नही जुडे है।

उल्लेखनीय हो कि इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि मोरी को ड़ोड़राक्वार (हिमाचल प्रदेश) तक सडक मार्ग से जोडा जायेगा। यह लगाभ 12 किमी की सड़क है। उन्होंने कहा कि इससे इस घाटी का व्यापार एवं पर्यटन भी बढेगा। कहा कि इस क्षेत्र की सड़को के लिये लगभग 05 करोड रूपये स्वीकृत कर दिये गये है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार 10 करोड परिवारों को 05 लाख रूपये का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करा रही है। प्रदेश में भी इस योजना को शुरू किया जायेगा। जिन परिवारों की वार्षिक आय 2.50 लाख रूपये से कम है, उन परिवारों को राज्य सरकार द्वारा निःशुल्क गैस कनैक्शन उपलब्ध कराये जायेंगे। जखोल में एक सहकारी बैंक की शाखा खोलने, एक राजकीय एलौपैथिक चिकित्सालय खोलने एवं फिताडी-सावणी-सटूडी मोटर मार्ग तथा सांकरी तालूका-ओसला गंगाड मोटर मार्ग की घोषणा की है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने इस क्षेत्र को पर्यटन मैप में लाने एवं सावणी गांव में पेयजल की व्यवस्था हेतु पेयजल लाईन बिछाने की बात कही। उन्होंने जिला प्रशासन द्वारा किये जा रहे राहत कार्यों पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन पूरी संवेदनशीलता एवं तत्परता से कार्य कर रहा है। उन्होंने राहत कार्यों के लिये किये गये विशेष प्रयासों के लिये जिलाधिकारी डा॰ आशीष चैहान की सराहना भी की।

जनप्रतिनिधी भी हुए सक्रीय

सांवणी गांव के अग्नीकाण्ड प्रभावित परिवारों को गंगोत्री विधायक गोपाल सिह रावत ने 100 रजाई देने, यमुनोत्री विधायक केदार सिंह रावत ने प्रभावित परिवारों को राशन देने एवं पुरोला विधायक राजकुमार ने विधायक निधि से 10 लाख रूपये देने की बात कही। जबकि सांसद महारानी माला राज्यलक्ष्मी शाह ने केन्द्र सरकार की ओर से हर संभव मदद का आश्वासन दिया। इसके अलावा जिला प्रशासन, सतलुज, रेडक्राॅस, शान्तिकुंज, हरिद्वार एवं अन्य संस्थाओं के द्वारा दैनिक उपयोग की वस्तुओं सहित बिस्तर, कम्बल, राशन, बर्तन आदि वितरित किये गये। द हंस फाउंडेशन ने भी पीडितों की मदद के लिये हाथ बढ़ाये है।

Sunday, February 18, 2018

गढभोज व गढबाजार के भगीरथ द्वारिका सेमवाल


प्रेम पंचोली



जिस देश में गंगा बहती है, हम उस देश के वासी हैं। यह फिल्मी गीत गंगा के बहाने भारतीय सभ्यता का चरित्र-चित्रण करता है, ठीक उसी तर्ज पर आजकल उत्तरकाशी जनपद के दूरस्थ क्षेत्र बागी-ब्रहमपुरी निवासी एक युवा द्वारिका प्रसाद सेमवाल ‘‘गढ बाजार’’ के मार्फत इस पहाड़ी राज्य का परिचय देश-दुनियां से करवा रहा है। वे न कि सिर्फ प्रचार-प्रसार की बाते करता है बल्कि उनके इस कार्यक्रम से गांव के वे छोटे, मझौले किसान जुड़े है जिनका पहाड़ी उत्पाद कभी बाजार की शक्ल नहीं ले पाया था। मगर द्वारिका के इस सफल प्रयोग ने उत्तरकाशी और देहरादून में अब तक 145 विवाहों, 85 बैठकों व 55 मेलों में गढभोज के स्टाॅल लगा चुके हैं। अर्थात इस कार्य से लगभग 500 किसानों को प्रत्यक्ष तौर पर स्वरोजगार से जोड़ा गया है। कह सकते हैं कि उनके ‘‘गढभोज व गढ बाजार’’ में उत्तरकाशी की जलकुरघाटी, यमुनाघाटी व गंगाघाटी के पहाड़ी उत्पाद यानि ‘‘बारहनाजा’’ अब आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं।

ज्ञात हो कि द्वारिका ने हिमालय पर्यावरण जड़ी-बूटी-एग्रो संस्थान (जाड़ी) के माध्यम से पहली बार वर्ष 2008 में जनपद मुख्यालय उत्तरकाशी में ही ’’गढ भोज’’ नाम से विशेष कार्यक्रम चलाया। इन्ही दिनों उत्तरकाशी मुख्यालय में आयोजित विख्यात माघ मेले में जब ‘‘गढभोज’’ का स्टाॅल सजाया गया तो पहले ही दिन स्टाॅल पर मौजूद ग्राहको को द्वारिका ने सम्भाल नहीं पाया। स्टाॅल में काम कर रही गांव की महिला समूह की सदस्यों के समझ में आया कि ‘‘पहाड़ी उत्पादों’’ को यदि एक व्यवस्थित बाजार का रूप दिया जाये तो भविष्य में पहाड़ी किसानों की आर्थिक स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन आ सकता है। उसके बाद द्वारिका ने बकायदा जाड़ी संस्थान के द्वारा गढवाल व कुमाऊ के सभी व्यंजनो का अध्ययन करवाया। जिसमें पाया गया कि पहाड़ी उत्पादों का बाजार विकसित किया जा सकता है। बस यहीं से द्वारिका ने दो तरह के कार्य आरम्भ कर दिये। पहला यह कि राज्य और राज्य से बाहर जितने भी उत्सव और मेले होते हैं वहां ‘‘गढभोज’’ का स्टाॅल लगे। तकि लोग पहाड़ी व्यंजनों का रस्वादान ले सके और दूसरा यह कि कुछ जगहो पर ‘‘गढ बाजार’’ की स्थायी शुरूआत की जाये। देहरादून के द्रोण होटल और उत्तरकाशी के शिल्प बाजार में ‘‘गढ बाजार’’ स्थापित किये गये हैं। हालात इस कदर हैं कि ये दोनो जगह मौजूदा समय में पहाड़ी उत्पादों की डिमांड पूरी नहीं कर पा रहे हैं। गढ बाजार और गढभोज के सफल प्रयोग से वर्ष 2015 में तत्काल जिलाधिकारी उत्तरकाशी ने सभी विभागों को यह निर्देशित किया कि वे बैठकों व प्रशिक्षणों में गढभोज को ही प्राथमिकता दें। इधर द्वारिका गढवाल मण्डल विकास निगम के  उत्तरकाशी, देहरादून, ऋषिकेश, मसूरी एवं चण्डीगढ के होटलों के साथ गढभोज को मेन्यू में शामिल करने की कसरत कर रहे हैं। इनका यह प्रयास यदि भविष्य में रंग लाया तो अकेले उत्तरकाशी के 12 हजार किसानों के परिवार प्रत्यक्ष रूप से लाभन्वित होंगे और अप्रत्यक्ष रूप  से इनकी संख्या चैगुनी होगी। अर्थात एक लाख लोगो के हाथ में स्थानीय उत्पादों का स्वरोजगार होगा। द्वारिका का कहना है कि वे होटलों के अलावा आवासीय विद्यालयों में भी गढभोज को आरम्भ करवाने का प्रयास कर रहे हैं।

बता दें कि उत्तराखण्ड में स्वादिष्ट व विविधतायुक्त खान-पान की समृद्ध संस्कृति रही है। इसलिए यहां के लोग अपने खेतों में बहुविविधता के उत्पादों का उत्पादन करते है। मगर बाजारीकरण व वैश्वीकरण के कारण ये पहाड़ी उत्पाद व व्यंजन अपना स्वाद खोने लग गये थे। जबकि साग-सग्वाड़ो (कीचन गार्डन), कृषि वानिकी एवं जंगलो से उत्पन्न खाद्यान, फल फूल, दलहन एवं साग-भाजी से जोरदार स्वाद एवं पौष्टिकता सौ फीसदी जैविक है। अतएव पौष्टिकता और औषधीय गुणों से भरपूर पहाड़ के व्यंजन थाली से गायब होने के कगार पर पंहुच चुके हैं। अब ‘‘गढ बाजार व गढभोज’’ क्या रंग खिलाता है जो समय के गर्त में है।

गढ़ बाजार व गढभोज

14 जनवरी 2008 को गढभोज और दो अक्टूबर 2014 को गांधी जयन्ती के अवसर पर उत्तरकाशी मुख्यालय में हिमालय पर्यावरण जड़ी बूटी एग्रो संस्थान (जाड़ी) की पहल पर गढ बाजार की शुरूआत की गई। संस्थान ने गढ बाजार आरम्भ करने से पहले डुण्डा एवं भटवाड़ी विकास खण्ड के 20 गांवों में किसानों के संगठन बनवाये। जबकि संस्थान रैथल, पाला, सिरोर, कमद, जोशियाड़ा गांवों में फल प्रसंस्करण की यूनिट स्थापित कर चुकी थी। अग्रलिखित कुछ पहाड़ी उत्पादों की जानकारी दी जा रही है, जो गढभोज और गढबाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे पहाड़ी उत्पाद यहां बारहनाजा के नाम से जाने जाते है जिनकी उत्तराखण्ड में हजारों की प्रजातियां है।

मंडुवा /कोदा/रागी

मंडुआ को देशभर में अलग-अलग नामो से जाना जाता है किन्तु ज्यादा प्रचलित कन्नड़ नाम रागी है। अंग्रेजी में इसे फिगर मिलेट कहते है। उत्तराखण्ड के गढवाल, कुंमाऊ में कोदा नाम ज्यादा प्रचलन में है। दुनियां में जितने अनाज है, उनमें पौष्टिकता की दृष्टि से मंडुवा सबसे शिखर पर है। स्त्री, पुरूष, बच्चें एवं बूढे सबके लिए यह बहुत उपयोगी है। बढते बच्चों के लिए तो यह और भी उपयोगी है, क्योंकि इसमें सबसे ज्यादा कैल्शियम पाया जाता है। वर्षो पहले उत्तराखण्ड के निवासी मंडुआ को अपने दैनिक खानपान मे जरूरी मानते थे। तत्काल दुर्घटनावश ऊंची चोंटी या पेड़ से गिरने पर भी उनकी हड़डी नही टूटती थी। मंडुआ की रोटी गेहूं की रोटी की अपेक्षा बनाने में आसान नही है, क्योंकि आटा हाथों में चिपकता है और गोली बनाते समय इस पर पलेथण (सूखा आटा) भी काम नही करता। इसलिए ताजा आटा गूंथते जाइए और हाथों में पानी लगाकर रोटी बनाये। मंडुआ की रोटी गरमा-गरमा खाने में ज्यादा स्वादिष्ट लगती है लेकिन कुदरती-असली स्वाद घर के ताजा मक्खन या घी के साथ ही आता है। मंडुआ की रोटी के साथ कंडाली की कापली, राई, लाई व पालक का साग, झोली, कढी, गहत का फांणू  व डुबका आदि स्वाद में चार चांद लगा देते है। मंडुआ की अकेली रोटी बनाने में यदि समस्या हो तो गेहंू के आटे के साथ मिश्रित करके बना सकते है। बाहर से गेहूं की रोटी और अन्दर मंडुआ की गरमा-गरम रोटी घी और सब्जी के साथ खाये। इसे सचमुच की डबल रोटी कह सकते है। यहीं मंडुवे के हलवे को कुमांऊ में कोदा का लेटा कहते है। इसे हलवे की तरह ही बनाया जाता है।

मारसा (राम दाना) 

गढवाली में मारसा, कुमांऊनी में चू या चुआ। हिन्दी में चैलाई व देशभर में रामदाना के नाम से जाना जाता है। व्रत, नवरात्रों में रामदाना को फलाहार के रूप में परोसा जाता है। रामदाना दुनिया का सबसे पुराना खाद्यान्न है। पौष्टिकता की दृष्टी से रामदाने के दानों में गेंहू  के आटे से दस गुना कैल्शियम, तीन गुना वसा तथा दुगुने से अधिक लोहा होता है। धान और मक्का से भी यह श्रेष्ठ है। शाकाहारी लोगों को रामदाना खाने से मछली के बराबर प्रोटीन मिलता है। रामदाने का हरा साग भी बहुत उपयोगी है। रामदाना की रोटी मीठी होती है, किंतु आटा बहुत चिपचिपा होता है। इसलिए रोटी मुश्किल से बनती है। आधुनिक खानापान में भूने रामदाने के आटे से हलवा, बर्फी, बिस्कुट, केक, शक्करपारा एवं पाॅरिज आदि शौकीन लोग बनाने लगे है।
झंगोरा - लाईसिन प्रोटीन, सिस्टीन प्रोटीन, आईसोल्यूसनी प्रोटीन, लोहा रेशा पाया जाता है। यह शूगर से बिमार लोगो के लिए उपयुक्त है।

कौणी - ऊर्जा कैलोरी प्रोटीन, खसरा रोग, शूगर व पोलियो हेतु लाभकारी।
कण्डाली - लोहा, फेरफिक ऐसिड, एस्टील थोलाइट, विटामिन ए, चांदी तत्व पाये जाते है और यह पेट की गैस भी खत्म करती है। यही नहीं पीलिया, हर्निया, पाण्डु उदर रोग, बलगम, गठिया रोग, चर्बी कम करना, स्त्री रोग, किडनी, एनीमिया, साईटिका, हाथ पांव में मोच पर  कण्डाली रक्त संचचरण का काम करती है। कैन्सर रोधी है व एलर्जी खत्म  करती है।

लाल चावल - विटमीन-ए पाया जाता है। शूगर फ्री, आंखों की रोशनी के लिए लाभदायक है।
गहत दाल - पथरी रोग के लिये लाभदायक है।
काला भटट - ओमेगा पाया जाता है। रोग प्रतिरोधक शक्ति बढाता है।
मीठा करेला - मधुमेह की प्रभावशाली दवा है, चमड़ी रोग, कुष्ठ रोग, कील मुहांसे के लिए लाभदायक है।
बुरांश जूस - हृदय रोगीयों के लिये लाभदायक होता है।
लेंगडा - लोहे की मात्रा भरपूर है।


पहाड़ी किसान अपने छोटी जोत वाले खेतो और छोटे बागीचो में हाड़ तोड़ मेहनत कर सब्जी, दाले, अनाज, फल आदि कृषि उत्पाद पैदा करते है। राज्य बनने के बाद पहाड़ी किसानो की आर्थिक स्थिति मंे कोई सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। बावजूद इसके किसान अपने उत्पादों को बिचैलियों के माध्यम से ही उपभोक्ताओं तक पहुंचा रहे है। औने-पौने दामों पर किसानो के उत्पाद खरीद कर बाजार में बेचने वाले बिचैलिय खूब फल फूल रहे है। परिणामस्वरूप लोग छोटे-उत्पादों को या तो पैदा करना ही बंद कर दे रहे हैं या जिनके पास ऐसे उत्पाद हैं भी वे इसे बाजार की शक्ल नहीं दे पा रहे हैं। हमारा प्रयास स्थानीय स्तर पर ही स्थानीय उत्पादो को लोगो से क्रय करके ‘‘गढभोज व गढ बाजार’’ के माध्यम से पहाड़ उत्पादो का बाजार विकसित करने का है।

- (द्वाारिका सेमवाल, गढभोज व गढ बाजार के प्रणेता)


‘‘मावरिक्स ऑफ मसूरी’’

एक अनुभव जो अब किताब के रूप में आया 



डॉ.एम.रामचंद्रन(उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्य सचिव) द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘मावरिक्स ऑफ मसूरी’’ पर मंथन सभागार में चर्चा की गई। इस चर्चा का अयोजन दून पुस्तकालय एवं रिसर्च सेंटर देहरादून द्वारा किया गया था। इस पुस्तक में सिविल सेवा के अनुभवों, विभिन्न स्तरों पर सरकार के कामकाज को दिखाया गया हैं। पुस्तक में लेखक के व्यक्तिगत अनुभव से जुड़ी छोटी छोटी घटना, सरकार में विभिन्न स्तरों पर उनकी विभिन्न स्थानों में पोस्टिंग आदि शामिल हैं। इस दौरान उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्य सचिव आई.के.पांडे, एन.रविशंकर, सी.एस.नपलच्याल, पूर्व प्रमुख सचिव विभापुरी दास और दून पुस्तकालय एवं अनुसंधान केंद्र के निदेशक डाॅ.बी.के.जोशी उपस्थित थे। पुस्तक में उठाए गए विभिन्न मुद्दो के विश्लेषण और अंतर्दृष्टि पर विचार-विमर्श किया गया।

डॉ.रामचंद्रन ने राज्य में अपने चुनौतीपूर्ण कार्यों को याद करते हुए कहा कि पहली बार वे उत्तरकाशी में कमिश्नर गढ़वाल, राज्य के अस्तित्व में आने के बाद शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेन्ट कमिश्नर एवं कार्यकाल के आखिर में राज्य के मुख्य सचिव के रूप में बुनियादी ढांचे की दृष्टि को देखते हुए विभिन्न विश्वविद्यालयों की स्थापना और देहरादून के नए हवाई अड्डे का विकास किया। उन्होंने अपने सभी अनुभवों से युवा पीढ़ी के अधिकारियों को संदेश दिया कि कैसे वे चुनौतियों को अवसरों में बदलें।
पुस्तक में लेखक द्वारा सिविल सेवा के रूप में सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाया गया है और आम लोगों के हितों के लिए सरकार और प्रशासन को किस तरह काम करने चाहिए उस पर भी विशिष्ट सुझाव दिये गये हैं। यह पुस्तक सिविल सेवक के अनुभवों का एक संग्रह है, जो विनम्र स्वभाव के साथ केन्द्र में सचिव और राज्य में मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत रहे।
इस पुस्तक में सुझाव दिए गए हैं कि शासन में कहां बदलाव की आवश्यकता है और किस तरह से आम व्यक्ति की परेशानी मुक्त हो सकती है क्योंकि आज के संदर्भ में काफी प्रासंगिक है जब आज हर व्यक्ति सिस्टम में रहने लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। इस पुस्तक में लेखक द्वारा बताया गया है कि पेशेवर योग्यता, कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता और कड़ी मेहनत द्वारा शासन में सुधार किया जा सकता है।

डॉ.एम.रामचंद्रन जैसे प्रशासनिक लीडर की यादें युवा सिविल सेवकों को प्रेरणा का स्रोत प्रदान करती हैं। यह पुस्तक सभी सिविल सेवकों को यह महसूस कराती है कि कठिन से कठिन बाधाओं और विकट चुनौतियों के बावजूद वे अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।
लेखक के बारे में- डाॅ.एम.रामचंद्रन यूपी कैडर के 1972 बैच के हैं, जो 38 साल तक काम करते हुए 2010 में सेवानिवृत्त हुए थे। वे उत्तराखण्ड के मुख्य सचिव बने और शहरी विकास मंत्रालय में सचिव पद पर रहे।

Friday, February 16, 2018

पर्यटन विकास की सरकारी उपेक्षा

पर्यटन विकास की सरकारी उपेक्षा

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प्रेम पंचोली
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उत्तराखंड हिमालय सदैव प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। राज्य के अतिदुर्गम क्षेत्रों में प्राकृतिक सौन्दर्य का जो सम्वेत नजारा देखने को मिलता है वह किसी परलोक की कथा से कमŸार नहीं है। बस आईए! आपका इन्तजार है! ऐसा इसलिए लिखा जा रहा है कि इन स्थानो में ना तो कोई पंचतारा होटल है और ना ही कोई फास्ट फूड का रेंस्तरां अपितु यहां तो बरबस सुकून की जिन्दगी जीने का एक मात्र स्थान हैं। यह स्थान उत्तराखंड में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्रकृति की सुन्दरता से भरा पड़ा है।
स्थानीय लोग ही पर्यटकों की आवा-भगत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। यहां देवदार, भोजपत्र, थुनैर, कैल, खरसू, मौरू के लकदक जंगल हैं तो वहीं ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ एक सीमा रेखा तक भोज पत्र एवं ढेलू-सिमरू के ही वृक्ष दिखाई पड़ते हैं। राज्य के ऊंचाई वाले गांव नवम्बर-दिसम्बर से मार्च-अप्रैल तक बर्फ की श्वेत चादर से ढ़के रहते है। बर्फ पिघलने के साथ ही कुनकुनी धूप पाकर ये पहाड़ियां मखमली बुग्याल से लक-दक होकर जुलाई-अगस्त तक अपने पूर्ण यौवन में मदमस्त हो जाती है। असंख्यक रंग बिरंगे पुष्पों की सुन्दर वाटिकाएं यत्र-तत्र महकने लगती हैं। जो कोई भी इन सुरम्य स्थलों का चल-चित्र अपने मस्तिष्क पर उभारता है तो वह कष्टों की परवाह किए बगैर ही चल पड़ता है सैर पर।
एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर हिमाच्छादित चोटियां और यहीं कहीं से निकलने वाली छोटी-बड़ी नदियों का विहंगमय दृश्य चारों ओर की वनाच्छादित पहाड़ियां और पहाड़ी ढलानों में बसे गांव, सीढ़ीनुमा खेत मन को प्रफुलित कर देते है। गांव-गांव मंदिरो पर काष्ठ कला की नक्कासी हर समय जीवन्त लगती है। लकड़ी-पत्थर के यह बेजोड़ संगम मंदिरों की आभामण्डल को बढा रहे है। राज्य की यमुनाघाटी के गांवों में लकड़ी के आवासीय फिरोल भवन (वुड स्टोन की इमारतें) किसी विज्ञान से कम नहीं है क्योंकि यह सभी भवन भूकंपरोधी है। इन्होंने 1803 एवं 1991 का विनाशकारी भूकम्प को भी झेला है। लगभग सभी भवन 300-400 वर्ष पुराने है।
कहने का तात्पर्य है कि सरकार में बैठे अफसरान और जनता के नुमाईन्दो में इस ओर कोई कदम उठाने के आसार नहीं लग रहे है। क्योंकि लोक आधारित पर्यटन के बिना राज्य का विकास भी अधूरा साबित होगा। पंचतारा पर्यटन से मात्र कुछ चुनिदां लोगो का ही विकास हो सकता है। समग्र विकास के लिए स्थानीय प्रकृति व संस्कृति को समझना जरूरी होगा।
 यहां सरकारांे ने राज्य बनने के 11 वर्ष पश्चात भी कोई खास सड़को का विकास तक नहीं कर पाया है और ना ही कोई मूलभूत सुविधाओं से लोगो को राहत दिला पाई है। लोग तो अपने ही संसाधनो से आने वाले आगन्तुको का यहां ‘‘अतिथि देव भवः’’ की संस्कृति के ही अनुरूप स्वागत करते हैं। यहां लोगो का पर्यावरण संरक्षण के प्रति अटूट श्रद्धा है। लोग प्रकृति के गलत दोहन पर बार-बार आन्दोलित भी रहते है। कहा जा सकता है कि स्थानीय लोग पर्यटन की भाषा चाहे नहीं जानते होंगे परन्तु प्राकृतिक संरक्षण की भाषा उŸाराखण्डी जरूर जानते हैं। अर्थात प्रकृति है तो पर्यटन है।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...