Thursday, June 20, 2019

वन संपदा को बचाने के लिए नया फार्मुला

वन संपदा को बचाने के लिए नया फार्मुला

प्रेम पंचोली

उतराखण्ड हिमालय राज्य के लोग पूर्व से ही वनो को बचाने के लिए संवेदनशील रहे है। लोग प्राकृतिक संसाधनो को बचाने के तौर तरीके अपने अनुसार अख्तियार करते है। जिसका कोई प्रचार-प्रसार होता नहीं है, मगर असर दूरतलक होता है। यहां हम सरकारी स्तर पर हो रहे वन बचाने के प्रयासो का जिक्र करने जा रहे हैं। मौजूदा समय में राज्य सरकार अहतियात के तौर पर वन संरक्षण के आधुनिक संयत्रो का उपयोग करना चाहती है। जिसके लिए सरकार ने विधिवत कार्ययोजना भी पिछले ही वर्ष बना डाली थी। बताया गया कि ड्रोन कैमरे वन संरक्षण के लिए मुस्तैद रहेंगे। इधर राज्य में 11 नये फायर स्टेशन बनाने की कवायद अन्तिम वर्ष पूरी कर दी थी।

ज्ञात हो कि उतराखण्ड में हर वर्ष आग के कारण हजारो हेक्टेयर जंगल राख हो जाते है। इस वर्ष गर्मीयों में वनों को आग से नुकसान ना हो, इसके लिए इण्डियन इंस्टीट्यूट आॅफ रिमोंट सेंसिंग ने वन विभाग के लिए एक मोबाईल एप ‘‘फायर एप’’ नाम से तैयार किया था। पर इसका असर कितना हुआ जिसकी कोई जानकारी सर्वजनिक नहीं हो पाई है। आइआईएमएस के निदेशक डा॰ प्रकाश चैहान ने बताया कि यह मोबाईल एप जंगलो की रखवाली करने वाले वन विभाग के गार्ड को दिया जायेगा। आग लगने पर वह फोटो को एप में अपलोड करेगा। इस तरह से वनो की आग को ट्रेस किया जायेगा। कह सकते हैं कि जंगल के चप्पे-चप्पे की निगहबानी तकनीकी तौर पर होगी। ‘‘फायर एप’’ के बाद उत्तराखंड में देश की पहली फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स का गठन भी हुआ है। ड्रोन फोर्स से वन, वन्य जीवों की सुरक्षा, खनन की निगरानी आदि के लिए मदद ली जाएगी। इस तरह की पूर्व तैयारी वन विभाग और प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इतनी तकनीकी के बावजूद भी इस वर्ष वनाग्नी काबू नहीं किया गया। हालात यह हुए कि हजारो हेक्टेयर वन संपदा स्वा हो गई और तकनीकी संयन्त्र यू ही सो पीस बनकर पाये गये।

जल गये जंगल, बुझ गई आग

इस वर्ष भी उत्तराखंड में जंगलो की आग पर बहुत देरी में काबू पाया गया। इस साल जंगल में आग लगने की 1400 से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं। लगभग 2000 हेक्टेयर जंगल स्वाहा हो गए हैं। पिछले कई सालों से लगातार गर्मियों में उत्तराखंड के जंगलों में भयानक आग लग रही है और इसके लिए एक संगठित आपदा प्रबंधन तंत्र या प्रशासनिक योजना की कमी स्पष्ट रूप से दिख रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2011 से 2017 के बीच जंगलों में आग की घटनाओं में 2.5 गुना की बढ़त हुई और 2017 में जंगल में आग की 13,898 घटनायें की गई थी। जबकि बताया जा रहा है कि राज्य में इस वर्ष लगभग 35,888 घटनायें वनाग्नी की दर्ज की गई है। यही नहीं आग की दहशत से लोग कई बार घरों से बाहर निकल आए। जबकि आग की लपटें हाइटेंशन लाइनों तक को छूने लगी।

ज्ञात हो कि गढ़वाल मंडल में जंगलों में भड़की आग बेकाबू हो गई थी। वह तो इन्द्र देवता मेहरवान हो गये और जून के मध्य सप्ताह में बारिस कर दी। वैो अब तक गढवाल मंडल में आग की चपेट में आने से 1196.53 हेक्टेयर क्षेत्रफल में वन संपदा जलकर राख हो गई है। इसमें 54.55 हेक्टेयर प्लांटेशन वाला वन क्षेत्र भी शामिल है। इस प्रकार अब तक जंगलों में आग लगने की 680 घटनाएं हो चुकी है। वन विभाग ने भी स्वीकार किया कि गढ़वाल वृत्त के जंगलों में सबसे ज्यादा आग भड़की है। इसके अलावा भागीरथी वृत्त में 261.95 हेक्टेयर, यमुना वृत्त में 126.45 हेक्टेयर, शिवालिक वृत्त में 193.18 हेक्टेयर वन आग की चपेट में आए हैं। इससे विभाग को 14.27 लाख का नुकसान हुआ है।

फारेस्ट ड्रोन फोर्स का भी गठन हुआ था

उल्लेखनीय हो कि उतराखण्ड में 71 फीसदी भू-भाग पर वन भूमि है। यहां जंगलों की सुरक्षा का जिम्मा वन बीट अधिकारी, आरक्षी, वन दरोगा, निरीक्षक, डिप्टी रेंजर, रेंजर के कंधों पर होता है। दुर्गम और काफी बड़ा क्षेत्र होने से वनकर्मी का उपलब्ध होना संभव नहीं होता है। ऐसे में जंगलों में अवैध कटान, वन्य जीवों के शिकार, अवैध खनन की आशंका बढ़ जाती है। यही वजह है कि वन विभाग ने फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स के गठन की अग्रीम कार्रवाई कर डाली। और प्रमुख वन संरक्षक के निर्देशन में ड्रोन फोर्स का गठन भी किया गया है। अब वन, वन्यजीवों की सुरक्षा से लेकर अवैध खनन, अवैध वनों का दोहन, वनाग्नी आदि पर निगरानी का काम ड्रोन से होगा। ड्रोन फोर्स के वनकर्मियों को ड्रोन संचालन के लिए तकनीकी तौर पर प्रशिक्षित किया गया था। वर्तमान में वन विभाग के पास 11 ड्रोन कैमरे है।

2013 में पहली बार गौला नदी में खनन की निगरानी ड्रोन कैमरे से हुई थी। सकारात्मक परिणाम आने के बाद जंगलों में वन्य जीवों की निगरानी में भी इसका उपयोग किया गया। बता दें कि फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स के मुखिया प्रमुख वन संरक्षक जयराज को बनाया गया है। फोर्स में सेंटर फॉर ड्रोन एप्लीकेशन एंड रिसर्च के अमित सिन्हा, मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) सुरेंद्र मेहरा, वन संरक्षक पश्चिमी वृत्त डॉ. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक यमुना वृत्त प्रसन्न पात्रो, डीएफओ तराई पूर्वी नीतीश मणि त्रिपाठी शामिल हैं। ड्रोन कैमरे के लिए सिर्फ जिम कार्बेट नेशनल पार्क, मालसी चिड़ियाघर, राजाजी नेशनल पार्क, पश्चिमी वन वृत्त (तराई केंद्रीय, तराई पूर्वी, तराई पश्चिमी, हल्द्वानी और रामनगर वन प्रभाग) को परीक्षण के तौर पर लिया गया है।

गौरतलब हो कि प्रयोग के तौर पर यूसैक ने राज्य में साल 2018 में कार्यशालाऐं आरम्भ की है। ताकि तकनीकी का बेजा इस्तेमाल हो सके। यह पहली कार्यशाला सीमान्त जनपद उतरकाशी में पिछले साल उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) की ओर से जल संसाधन प्रबंधन में रिमोट सेसिंग व जीआईएस के अनुप्रयोग विषय पर आयोजित की गई थी, जिसमें वन विभाग सहित अन्य विभागों के कार्यालयअध्यक्षो ने हिस्सा लिया था। यहां विशेषज्ञों ने उपग्रह तकनीक का प्रयोग पर्यावरण संरक्षण के लिए करने पर जोर दिया। यूसैक के निदेशक एमपीएस बिष्ट ने बताया कि मानव विकास व पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उपग्रह तकनीक से मिली जानकारियां बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसके तहत यूसैक भी इस तकनीक के प्रयोग से प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, विकास कार्यों व पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी, टेली मेडिसिन आदि कार्य कर रहा है।
चूंकि इसके अतिरिक्त विभाग ने 31 हजार स्कूलों का डाटाबेस, सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए स्पीड कंट्रोलर, मोबाइल एप, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए टूरिज्म मैप आदि भी तैयार किए हैं। इस पर पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट ने खुशी जाहीर की कि हिमालय एक युवा पर्वत श्रृृंखला है, जिसकी लगातार निगरानी करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ने कई गहन जानकारियों के साथ देशभर के जिलाधिकारियों को नक्शे मुहैया कराए थे। उन्होंने समस्या से निपटने के लिए पर्वतीय राज्यों को ग्रीन बोनस आदि माध्यम से अतिरिक्त बजट देने पर भी जोर दिया। बता दें कि 18 सालो में वन विभाग ने मात्र 11ड्रोन कैमरे ही खरीद पाये। जबकि राज्य को सर्वाधिक राजस्व यहीं के वनो से प्राप्त होता है। इधर लोगो को मानना है कि ड्रोन कैमरे के साथ-साथ गलत दोहन वाली जगह पर पंहुचने के लिए अत्याधुनिक यातायात सुविधा भी चाहिए। ताकि समय रहते गलत विदोहन से प्राकृतिक संसाधनो की रक्षा हो सके।
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हिमालय के विकास एवं पर्यावरण सन्तुलन के लिए अंतरिक्ष आधारित सूचना तकनीकी का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके लिए राज्य में कार्य कर रहे सभी राष्ट्रीय और राजकीय संस्थानो को आपस में अधिक साझे प्रयास करने होंगे।
(- त्रिवेन्द्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड)
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उत्तराखंड में देश की पहली फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स बनाई गई है। ड्रोन के उड़ान के लिए डीजीसी ने नियम बनाए हैं उन नियमों को पूरा करने संबंधित सभी औपचारिकताओं को पूरा किया जा रहा है। ड्रोन फोर्स के गठन से शिकार, अवैध खनन समेत अन्य गैर कानूनी गतिविधियों को रोकने में मदद मिलेगी।
(-डॉ. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक, कोआर्डिनेटर फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स)
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Saturday, June 8, 2019

स्वस्थ परम्परा: धूम्रपान और धूम्रपान करने वालों से रहें दूर रहें


स्वस्थ परम्परा: धूम्रपान और धूम्रपान करने वालों से रहें दूर रहें


प्रेम पंचोली 

इस साल विश्व तंबाकू निषेध दिवस (डब्ल्यूएनटीडी) का विषेष कार्यक्रम तंबाकू और फेफड़ों के स्वास्थ्य पर है। हर साल, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएच) और वैश्विक भागीदार 31 मई को डब्ल्यूएनटीडी का निरीक्षण करते हैं और लोगों को तंबाकू के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करते हैं। इस दौरान लोगों को किसी भी तरह के तम्बाकू का उपयोग करने से हतोत्साहित किया जाता है।

बताया गया कि डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इस वर्ष यह अभियान तंबाकू से फेफड़े पर कैंसर से लेकर श्वसन संबंधी बीमारियों (सीओपीडी) के प्रभाव पर केंद्रित होगा। लोगों को फेफड़ों के कैंसर के बारे में जानकारी दी जायेगी कि इसके मुख्य कारण भी तंबाकू और धूम्रपान ही है। जानकारो ने बताया कि विष्वभर में तम्बाकू और धूम्रपान के कारण कैंसर के रोगिया की संख्या बढ रही है जिससे हर साल दो-तिहाई मौतें हो रही हैं। यहां तक कि दूसरो द्वारा धूम्रपान करने से पैदा हुए धुएं के संपर्क में आने से भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। सुझाया जा रहा है कि धूम्रपान छोड़ने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा कम हो सकता है, तथा धूम्रपान छोड़ने के 10 वर्षों के बाद, धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के फेफड़ों के कैंसर का खतरा लगभग आधा हो जाता है।
चिकित्सको का कहना है कि फेफड़ों के कैंसर के अलावा, तम्बाकू धूम्रपान भी क्रोनिक प्रतिरोधी फुफ्फुसीय रोग (सीओपीडी) का कारण बनता है। इस बीमारी में फेफड़ों में मवाद से भरे बलगम बनाता है जिससे दर्दनाक खांसी होती है और सांस लेने में काफी कठिनाई होती है। इसी तरह, छोटे बच्चे जो घर पर एसएचएस के संपर्क में आते हैं, उन्हें अस्थमा, निमोनिया और ब्रोंकाइटिस, कान में संक्रमण, खांसी और जुकाम के बार-बार होने वाले संक्रमण और लगातार श्वसन प्रक्रिया में निम्न स्तर का संक्रमण जैसी श्वसन संबंधी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुरसार विश्व स्तर पर, अनुमानित 1.65 लाख बच्चे 5 वर्ष की आयु से पहले दूसरों द्वारा धूम्रपान से पैदा हुए धुएं के कारण श्वसन संक्रमण के कारण मर जाते हैं। ऐसे बच्चे जो वयस्क हो जाते हैं, वे हमेशा इस तरह की समस्याओं से पीड़ित ही रहते हैं और इनमें सीओपीडी विकसित होने का खतरा बना रहता है।

डब्ल्यूएनटीडी के मौके पर वायॅस आॅफ टोबेको विक्टिमस (वीओटीवी) के स्टेट पैट्रेन डा. टी.पी.शाहू ने कहा कि गर्भवती महिला द्वारा धूम्रपान या एसएचएस के संपर्क में आने से भू्रण में फेफड़ों की वृद्धि कम हो सकती है और इसका असर भू्रण की गतिविधियों पर हो सकता है। गर्भपात हो सकता है, समय से पहले बच्चे का जन्म हो सकता है। यहां तक कि अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम भी पैदा हो सकता है। तम्बाकू, किसी भी रूप में धूम्रपान या धुआं रहित, बहुत खतरनाक है। उन्होंने ताया कि मृत्यु या विकलांगता के अलावा इसका कोई उपयोग नहीं है।
ज्ञात हो कि अगर यह समाज में धूम्रपान तम्बाकू की लत यूं ही बढती रहेगी तो आने वाले वर्ष 2025 तक देश में यह आम बीमारी हो जायेगी। ग्लोबल टीबी रिपोर्ट- 2017 के अनुसार, भारत में टीबी की अनुमानित मामले दुनिया के टीबी मामलों के लगभग एक चैथाई लगभग 28 लाख दर्ज की गई थी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी फेफड़े को नुकसान पहुंचाता है और फेफड़ों की कार्यक्षमता को कम करता है और ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति धूम्रपान करता है तो यह आगे चलकर उसकी स्थिति को और खराब करेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि तंबाकू का धुआं इनडोर प्रदूषण का बहुत खतरनाक रूप है, क्योंकि इसमें 7000 से अधिक रसायन होते हैं, जिनमें से 69 कैंसर का कारण बनते हैं। तंबाकू का धुआं पांच घंटे तक हवा में रहता है, जो फेफड़ों के कैंसर, सीओपीडी और फेफड़ों के संक्रमण को कम करता है। संबंध हेल्थ फाउंडेशन (एसएचएफ) के ट्रस्टी अरविंद माथुर का कहना है कि ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे 2017 के अनुसार, भारत में सभी वयस्कों में 10.7 प्रतिषत (99.5 मिलियन) वर्तमान में धूम्रपान करते हैं। इनमें  19 प्रतिषत पुरुष और 2 प्रतिषत महिला शामिल हैं। भारत में 38.7 प्रतिषत वयस्क घर पर सेकेंड हैंड स्मोक (एसएचएस) और 30.2 प्रतिषत वयस्क कार्यस्थल पर एसएचएस के संपर्क में आते हैं। सरकारी भवनों, कार्यालयों में 5.3 प्रतिषत स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में 5.6 प्रतिषत रेस्तरों में 7.4 प्रतिषत और सार्वजनिक परिवहन में 13.3 प्रतिषत लोग सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क में आते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक तम्बाकू में फेफड़ों के कैंसर का कारण बनने वाले रयायनों में आर्सेनिक (चूहे के जहर में पाया जाता है), बेंजीन (कच्चे तेल का एक घटक जो अक्सर अन्य रसायनों को बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है), क्रोमियम, निकल, विनाइल क्लोराइड (प्लास्टिक और सिगरेट फिल्टर में पाया जाता है), पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन, एन-नाइट्रोसेमाइंस, सुगंधित एमाइन, फॉर्मलाडेहाइड (इमल्मिंग द्रव में पाया जाता है), एसिटालडिहाइड और पोलोनियम-210 (एक रेडियोधर्मी भारी धातु) शामिल हैं। ऐसे कई कारक हैं जो तम्बाकू की कार्सिनोजेनेसिस को बढ़ा या घटा सकते हैं। अलबत्ता विभिन्न प्रकार के तंबाकू के पत्ते, फिल्टर और रासायनिक मिश्रण की उपस्थिति या अनुपस्थिति कैंसर होने के कारक हो सकते हैं। इस तरह के कारक तंबाकू के विशिष्ट रसायन नहीं हो सकते, बल्कि सिगरेट में मौजूद रासायनिक मिश्रण है।

ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (जीएटीएस) 2017 के अनुसार भारत में 28.6 प्रतिषत (266.8 मिलियन) लोग जो 15 वर्ष से अधिक आयु के वयस्क है धूम्रपान से ग्रसित है। इन वयस्कों में 24.9 प्रतिषत (232.4 मिलियन) दैनिक तंबाकू उपयोगकर्ता हैं, और 3.7 प्रतिषत (34.4 मिलियन) कभी कभार के उपयोगकर्ता हैं। यानि देषभर में हर दसवां वयस्क (10.7 प्रतिषत यानि 99.5 मिलियन) वर्तमान में तंबाकू का सेवन करते है। ताज्जुब हो कि धूम्रपान की व्यापकता ग्रामीण क्षेत्रों में 11.9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 8.3 प्रतिशत पायी गई है। इस तरह कहा जाता है कि 20-34 आयु वर्ग के 12.2 प्रतिषत वयस्क धूम्रपान करते पाये जाते है।

उतराखंड एक नजर

उतराखंड राज्य में वर्तमान में 18.1 प्रतिषत लोग धूम्रपान के रुप में तंबाकू का सेवन करते है, जिसमें 29.8 प्रतिषत पुरुष, 6.3 प्रतिषत महिलांए शामिल है। यंहा पर 12.4 प्रतिषत लेाग चबाने वाले तंबाकू उत्पादों का प्रयोग करते है, जिसमें 21.2 प्रतिषत पुरुष 3.4 प्रतिषत महिलाए है। ऐसी भी जानकारी है कि उतराखंड में 62.2 प्रतिषत लोग घरों में सेकेंड हैंड स्मोक के षिकार हेाते है, जिसमें 59 प्रतिषत पुरुष, 65.4 प्रतिषत महिलांए हैं। इसी प्रकार कार्यस्थल पर 24.5 प्रतिषत लोग, जिसमें 26.5 प्रतिषत पुरुष, 9.9 प्रतिषत महिलाएं शामिल है।

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असिमा सरिन 91-8860786604


समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...