Sunday, September 28, 2014

वृक्षारोपण ही नहीं वृक्षो का संरक्षण भी करना है।


पिछले माह के अन्तिम सप्ताह में सोसायटी फाॅर एफोरटेशन, कंन्जवेषन, रिसर्च एण्ड इन्वायरमेंटन डेवपलपमेंट (सेक्रड) संस्था के बैनर तले मसूरी के पास पानी वाले मोड़ से लेकर डोम गांव तक चारा पत्ति व पीला अमलतास फूल के लगभग पांच सौ वृक्षो को रोपण किया गया। यह कार्य संस्था के प्रमुख कार्यकर्ताओं ने खुद की सहभगिता से किया है। सेकर्ड संस्था के अध्यक्ष दिनेष कण्डवाल ने कहा है कि वृक्षारोपण का मतलब सिर्फ रोपण करने से नही हैं। कहा कि वे इस वृक्षारोपण कार्यक्रम को एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते है। इसके लिए संस्था ने दो गांवो का चयन किया है साकेत गांव जहां पर समाज के निम्न वर्ग के लोग रहते है। तथा दूसरा मसूरी के पास डोम गांव इस गांव में उत्तराखण्ड राज्य के प्रख्यात साहित्यकार दिवंगत उमाषंकर सतीष रहते थे। उनके जाने के बाद यहां माहौल उजाड़ जैसे हो गया है। कहा कि वे संस्था के मार्फत इन दो गांवो को पर्यावरण से लेकर विकास के पायदान तक में एक आदर्ष गांव की आधारषीला रखना चाहते हैं। उनका यह पहला प्रयास है। भविश्य में गांवो में जहां स्वरोजगार के साधन उपलब्ध होंगे वही ये गांव पर्यावरण संरक्षण की भी मिषाल होंगे। संस्था के सचिव डा॰ रवि रावत ने कहा कि पहाड़ी गांवो को ‘‘होम स्टे’’ के लिए यदि तैयार किया जाये तो यही पर्यटन रोजगार और राजस्व का साधन बनेगा।
इस दौरान वृक्षारोपण कार्यक्रम में गढवाल सभा के अध्यक्ष टी एस असवाल, जुबल किषोर,, प्राजंल, डोम गांव के दिनेष ममगांई, देवेन्द्र सिंह पंवार सहित पत्रकार प्रेम पंचोली और गांव के अन्य लोग मौजूद थे।

Sunday, September 7, 2014

हिमालय नीति के लिए जनघोषणा पत्र

पहली बार 09 सितम्बर 2010 को हिमालय दिवस मनाने का जो सिलसिला आरम्भ हुआ वह आज देश की राजधानी में ही नहीं बल्कि हिमालयी प्रदेशों के विभिन्न कोनो में यह आयोजन मनाया जा रहा है। ज्ञात हो कि पिछले 20 वर्षो में हिमालय में अनियोजित परियोजनाओं के कारण हिमालयीवासी और हिमालय की जैवविविधता खतरे के निशांन पर आ चुकी है। यह खतरा खुद ही लोगो ने विकास की अंधी दौड़ के कारण मोल लिया है। अब मान लिया गया कि पुनः लोग हिमालयी संरक्षण की पुश्तैनी परम्परा को हिमालयी दिवस के बहाने बहाल करेंगे। जिसके लिए मीडिया से लेकर सामाजिक कार्यकर्ता व आम लोगो से लेकर राजनीतिक कार्यकर्ता एवं छात्रों से लेकर नौकरी पेशा लोग हिमालय के संरक्षण के लिए हाथ से हाथ मिला रहे है। भले यह कांरवा पांच वर्षो में बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ पाया मगर कांरवा निरन्तर बढता ही जा रहा है।
उल्लेखनीय तो यही है कि पूर्व में हिमालय में बढते खतरों को लेकर राज्य सŸाा के पास कोई सोचने का समय नहीं था परन्तु वर्तमान में जिस तरह से लोग ‘‘हिमालय बचाओ’’ के लिए कारंवा का हिस्सा बन रहे हैं वह सुखद ही कहा जायेगा। हालांकि हिमालय की जैवविविधता का अब तक विदोहन ही हुआ है यही वजह है कि प्राकृतिक आपदायें तथा मौसम परिवर्तन के खतरों का बढना भी जगजाहीर ही कहा जायेगा। कारण इसके घटते जंगल और सूखते जल स्रोतो की चिन्ता अब तक किसी नीति का हिस्सा तो नही बन पाये परन्तु आज हिमालय दिवस के रूप में संभावना जताई जा रही है कि हिमालयी विकास नीति का कोई माॅडल सामने आयेगा।

हिमालय तथा खुद को बचाने की चुनौती न केवल हिमालयवासियों के सामने है बल्कि दक्षिण एशिया व दुनिया के लिए भी ये एक बडी़ चुनौती है। इन विपरित परिथितियों में हिमालय के लोगो को अपने जीवन-यापन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने लिए जल, जंगल, जमीन पर स्थानीय समुदायों को अधिकार पाने के संघर्ष करने पड़ रहे है। जबकि हिमालय सदैव मैदानों, नदियों तथा संपन्न मानव समाजों का निर्माणकर्ता और उनका रक्षक रहा है। आज भी वह भारत सहित कई देशो को कुल मीठे पानी की मांग का 40 प्रतिशत तक देता है। वर्तमान विकास की उपभोगवादी अवधारणा ने हिमालय की उक्त भूमिका को एक सिरे से नकार दिया गया है और यह नजरअन्दाज करते हुऐ कि हिमालय विश्व का एक शिशु पर्वत है ऐसी स्थिति मे उसकी रचना व पर्यावरण से छेड़-छाड़ करना घातक साबित हुई। फलस्वरूप इसके हिमालय पर्वत परिस्थितिकीय संकट, विकास की गति, गलत नीतियों की वजह से असंन्तोष और अशान्ती का केन्द्र बन गया है। जन साधारण की चेतना में हिमालय का अर्थ केवल नदी, पर्वत और पेड़ो से ही होता है जबकि वास्तव में हिमालय अफगानिस्तान से लेकर वर्मा तक फैला हुआ है। इस पूरे क्षेत्र में लोकतंत्र के संघर्ष, प्राकृतिक संसाधनो को बचाने के जनान्दोलन, राष्ट्र राज्यो के आपसी संघर्ष व मन मुटाव, राजनैतिक अलगाव व दमन जैसे संघर्षो ने विगत चार-पांच दशको से इस पूरे क्षेत्र को एक छद्मयुद्ध का मैदान बना दिया है और इसका सबसे बड़ा कारण हमारे राष्ट्र-राज्यों ने इस विशिष्ट भौगोलिक इकाई के लिए कोई पृथक विकास की योजना नहीं बनाई। 09सितम्बर 2010 से आरम्भ हुई हिमालय बचाने की मुहिम ने पृथक हिमालय नीति के लिऐ बाकायदा एक जन घोषणा पत्र भी जारी कर दिया है जिसके लिए लगातार हिमालयी राज्यों मंे संवाद कायम किया जा रहा है। जन घोषणा पत्र में वे तमाम सवाल खड़े किये गये जिस नीति के कारण मौजूदा भोगवादी सभ्यता की बुनियाद पर आधारित जल, जगंल और खनिज सम्पदाओं के शोषण की गति तीव्र हुई है।
विकास के नाम पर वनो का व्यापारिक दोहन, खनन और धरती को डुबोने व लोगो को उजाड़ने वाले बांधो, धरती को कंपयमान करने वाले यांत्रिक विस्फोटो, जैसी घातक प्रवृŸिायों के कारण हिमालय वासियो के सामने जिन्दा रहने का संकट पैदा हो गया है। इसलिए सुझाव दिया जा रहा है कि असिंचित ढालदार भूमी, संरक्षित वन, सामूहिक अथवा निजी वन उनका भूमी उपयोग सर्वेक्षण करवाकर पानी की व्यवस्था की जानी चाहिऐ। इसके तहत फल, चारा, व रेशा प्रजाति के पौधों के रोपण की वृहद योजना बननी चाहिऐ। ऐसा करने पर मैदानी क्षेत्रों के लिए पहाड़ों से निरन्तर उपजाऊ मिट्टी मिलेगी, नदियों का बहाव स्थिर होगा और जल की समस्या भी हल होगी।
विडम्बना है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण हिमालय के जल स्रोत, झरने, झीलें, बर्फानी एवं गैर बर्फानी नदियां सूखती ही जा रही है। हिमालय में निवास करने वाले लोग पहले स्वावलम्बी थे जैसे-जैसे उनके प्राकृतिक संसाधनों पर व्यवसायिक परियोजनाऐं संचालित होती गयी वैसे-वैसे वे पलायन करते गये। आलम यह है कि जंगल के प्रहरी के रूप में अब कुछ परम्परानुमा फौजें ही तैनात दिखाई दे रही है। कौतुहल का विषय है कि एक तरफ स्थानीय हिमालयी वासियों के हक हकूको पर कब्जा हुआ तो दूसरी तरफ जल विद्युत परियोजनाओं एव वाईल्ड लाईफ जैसी योजनाओ ने लोगो को विस्थापन के लिए मजबूर कर दिया है। इसके अलावा हिमालयी क्षेत्रांे मे दिन प्रतिदिन पर्यटको की आमाद बढती ही जा रही है और इसी के साथ-साथ नदियों के सिराहने व ऊंचाई के क्षेत्रो मे कूड़े-कचरे की मात्रा इतनी अधिक बढ गयी कि अधिकांश जलागम क्षेत्र विषैले व प्रदूषित हो चुके हैं।
पर्यटन को बढावा देने के लिए स्थानीय लोगो के साथ अब तक कोई कारगर परियोजना सामने नहीं है। मगर लोक पयर्टन जैसी प्रक्रिया चमोली के ‘‘देव ग्राम’’ और उŸारकाशी के ‘‘सांकरी’’ में कुछ युवको ने आरम्भ कर रखी है। इस तरह के उम्दा कार्यक्रम हिमालय पर्यावरण के संरक्षण के साथ-साथ स्वरोजगार के लिए भी मिशाल है। लेकिन प्रहसन आज भी यह है कि कब और कैसे हिमालय क्षेत्र में विकास की नियोजित परियोजनाऐं बनेगी। ऐसे अनसुलझे सवालो को लेकर हिमालय दिवस की सार्थकता है।
जगजाहिर यह है कि शिमला कनक्लेव में तत्काल पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने ग्रीन बोनस की घोषणा करते हुए यह भी अगाह किया था कि अपने देश के वैज्ञानिक पर्यावरण जैसे संवेदनशील विषय को लेकर कम से कम एक राय प्रस्तुत करें ताकि भविष्य में कोई ठोस निर्णय लिया जा सके।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...