Friday, November 14, 2014
- 21, 22, 23 नवम्बर 2014 को है यमुनाघाटी में बग्वाल (दीपावली) - 23 नवम्बर को है 2014 को है गैर गांव में ‘‘देवलांग’’ - कार्तिक में नही यहां मंगसीर माह में मनायी जाती है दीपावली - उतरकाशी जनपद की बनाल पट्टी के गैर गांव में - दीपावली के अवसर पर ‘‘देवलांग’’ - सांठी और पांसाई क्या है - ढीपसा और दियाई क्या है - बग्वाल एवं बाॅर्त एक अद्भुत दृष्य - देवलांग देखने कैसे पंहुचे
Tuesday, November 11, 2014
एमडीडीए और लोगो मे संवादहीनता
प्रेम पंचोली/विजय बग्गा से बातचीत पर आधारित देखें देहरादून डिस्कवर
यहां एक बात बानगी के तौर पर बता दूं कि देहरादून में राज्य की अस्थाई राजधानी बनने के कारण शहर तीव्र गति से विस्तार ले रहा है और इसके साथ-साथ सरकारी व गैर सरकारी प्रतिष्ठानो में काम व मानव संसाधनो का बढना तथा इनकी पूर्ति बावत जरूरतो की मांग भी लगातार बढ रही है। ऐसे में यूं कहे कि हर स्तर पर जिम्मेदारी का निर्वहन करना व कराना दिनो दिन राज्य सरकार के लिए एक चुनौती बनती जा रही है।ज्ञात हो कि देहरादून शहर का विस्तार जिस तरह से राजधानी में दफ्तरो के बनने से हो रहा है उसी तरह कामकाजी व मूलरूप से शिक्षा, स्वास्थ्य की पूर्ती बावत राज्य के ग्रामीणो ने अपने पुश्तैनी घर छोड़कर राजधानी व उसके आस-पास के कस्बो, गांवो में ठौर-ठिकाना (कुछ लोगो ने) ढूंढ लिया है। कुछ अभी भी ढूंढ रहे हैं। इस कारण लोगो का जो जमवाड़ा अब देहरादून शहर की तरफ बढ रहा है वह दोनो तरफ से सरकार एवं गैर सरकारी स्तर पर प्रश्नचिन्ह है। मगर शहर की आबोहवा एवं रहन-सहन व्यवस्थित हो क्या यह ठीक किया जा सकता है? तब जब जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक व सही समय पर किया जा सके। ऐसा मानना देहरादून शहर के अधिकांश व्यापारियो का है। स्पष्ट तौर पर कहा यही जायेगा कि शहर को व्यवस्थित करने मे पहली जिम्मेदारी ‘‘मसूरी देहरादून विकास प्राधीकरण’’ तो बनती ही है उसके बाद अन्य प्रसाशनिक विभागो की बनती है। यही नही स्वंय भी लोगो को सभी नियम-कानून आत्मसात करने पड़ेगे। लेकिन यहां तो एमडीडीए और लोगो में लगातार छत्तीस का आंकड़ा बनाता जा रहा है।
एमडीडीए बोर्ड मेम्बर विजय बग्गा कहते है कि लोगो की शिकायत सुनी ही नहीं जाती है। जबकि शहर का मास्टर प्लान आ चुका है। यह कहां तक पंहुचा यह तो एमडीडीए अच्छी तरह बता सकता है। परन्तु लोगो के सामने जो समस्या वर्तमान में आ रही है वह पार्कीग, सुलभ यातायात, भवन निर्माण बावत एमडीडीए से नक्से पास कराना इत्यादी की है। ये तीन बाते अब तक इसलिए भी स्पष्ट नहीं होे पा रही है कि एमडीडीए की बोर्ड की बैठक साल में तीन बार होनी आवश्यक है परन्तु यह बैठक एक ही बार हुई है। जब यह बैठक हुई तो इसमें प्राधीकरण के कर्मचारियो की वेतन व कार्यालयों में संसाधनो के अभाव की समस्या प्रमुख रही। जो जनता की समस्या थी वह गौण ही हो गयी। सिर्फ रश्म अदायगी के लिए शहर के वेडिंग प्वांईटो पर थोड़ी सी चर्चा कर ली गयी थी। दुबारा बोर्ड बैठक हुई नही।
अब सवाल यह भी है कि देहरादून का नया मास्टर प्लान कितना कारगर साबित होगा यह कुछ कहा नही जा सकता। बता दें कि मास्टर प्लान में चक्खुमोहल्ला, मोती बाजार, डांडीपुर, कांवली रोड़, खुड़बुड़ा, घोसीगली इत्यादि को घनी आबादी में घाषित कर लिया गया है। इन घनी आबादी वाले क्षेत्रों में आवागमन के लिए आठ से दस फुट के रास्ते बने हैं। जो लगभग 100 साल और उससे भी पुराने हैं। यही हाल इन जगहों पर बनी आवासीय व व्यवसायी इमारातो का है। अब यदि ये इमारते जर्जर हो चुकी हैं तो क्या इन इमारतो का पुनर्रूद्वार नहीं किया जा सकता? किया जा सकता है। परन्तु एमडीडीए की तर्ज पर। एमडीडीए का नया मास्टर प्लान बताता है कि नवनिर्माण में 15-30 फुट का रास्त होना व कुल क्षेत्रफल में से आगे पिछे 20 प्रतिशत जगह भी छोड़नी जरूरी है। सो इन क्षेत्रों में हो नहीं सकता। इन घनी आबादी वाले क्षेत्रो में तो वर्तमान में दुपहिया ले जाना ही लाजमी है। यदि यहां 15-30 फुट का रास्ता बनता है और कुल क्षेत्रफल की जगह में से आगे-पीछे 20 फीसदी जगह छोड़नी पड़ेगी तो इस घेरे में आने वालो का पुनर्वास करवाना लाजमी है। क्योंकि इनके पास तब कुछ भी जगह ना तो व्यवसाय के लिए और ना ही रहने के लिए बचती है। ऐसे में क्या एमडीडीए इनका पुनर्वास बावत कोई योजना बना रहा है या बनायी हुई है। जिसका खाका अब तक सामने नहीं आया है। क्योंकि एमडीडीए के नये नियम कायदे से उन्हे अपना रहन-सहन व करोबार सहित विस्थापित होना पड़ रहा है जो हो नहीं सकता। यहां घोसी गली का उदाहरण ही काफी है। यहा जो जर्जर इमारते हैं वे लोग पुनर्रूद्वार करने बावत एमडीडीए से नक्से पास करवाने गये। इनका नक्सा पास तो हुआ नहीं उल्टी एमडीडीए ने इनकी फजीहत कर दी। कहा कि एमडीडीए के कर्मचारी जांच करने आयेंगे। जांच तो क्या इनकी पुनर्रूद्वार वाली इमारते ही सीज कर दी गयी। इनके जैसे अन्य जगह पर भी कुछ लोगो पर एमडीडीए की मेहरबानी बरस पड़ी। इस तरह का दोगला चरित्र एमडीडीए का लोगो में असन्तोष फैला रहा है साथ ही साथ शहर में अव्यवस्थाऐ पनप रही है।
इसके अलावा एक और समस्या आने वाली है। हालांकि इस समस्या के निवारण के लिए एमडीडीए कहता है कि उनके पास देहरादून का मास्टर प्लान है। हालात इस कदर है कि एक अनुमान के अनुसार देहरादून, ऋषिकेश, विकासनगर की तहसीलो में रोज 300 रजिस्ट्रीयां जमीन व मकान की हो रही है। इसी तरह पिछले छः सालो का एक आंकड़ा बताता है कि पहाड़ से उतरकर दो लाख लोगो ने भविष्य हेतु देहरादून मे रहने बावत दो लाख प्लांट खरीदे है। अन्य बाहर से आने वालो ने कितना खरीदा होगा इसका आंकड़ा भी एमडीडीए अच्छी तरह बता सकता है। अर्थात शहर का विस्तार जिस गति से हो रहा है उसके व्यवस्थित उपाय नजर नहीं आ रहे हैं। जमीन खरीदने के बाद लोगो को बहुत सारे कड़े कानूनो को ढोना पड़ रहा है जैसे कृषि भूमि को रिहायसी करवाने के लिए विकास शुल्क इतना मंहगा कर चुका है कि जिस कारण जमीनो के दाम आसमां चूम रहे हैं। इस गफलत में आम नागरिक का शहर में रहना दूभर हो रहा है। इस विकास शुल्क के कारण रास्तो की जो समस्या उत्पन्न हो रही है वह जगजाहिर है। क्योंकि इतनी मंहगी जमीन के लिए अमुक व्यक्ति एक इंच जमीन भी नहीं छोड़ सकता। अस्थई राजधानी में जो समस्या जमीन की खरीद फरोख्त और गांवो से यहां पलायन करके आ चुके लोगो से हो रही है उससे बड़ी समस्या तो हमारे दोगले नियम कानून की हैं। अबल तो यह है कि हमें बंग्लो, बंगला, भवन, मकान, माॅल, दुकान, ठेली, प्लाजा जैसे को चलाने वाले लोगो के साथ दोहरी नीति का चरित्र नहीं दिखाना होगा। वैसे तो हिमांचल से सीख लेनी चाहिए। इस बात को हर राजनेता और मीडिया के लोग कहते फिरते आयें हैं। मगर कभी हम लोग हिमांचल में इस हेतु शिक्षण-प्रशिक्षण लेने गये भी? हम तो वहां जाते है जहां का पर्यावरण, रहन-सहन व संस्कृति दूर-दूर तलक राज्य से मेल ही नहीं खाती।
एमडीडीए के पास राज्य बनने के चैदह वर्ष बाद अस्थाई राजधानी में लोगो को सुव्यवस्थित बसाने की माकूल नीति व नियत की दूर-दूर तक गुंजाइश ही नजर नहीं आ रही है। देहरादून जिस तरह तीव्र गति से बढ रहा है और जिस तरह यहां ढांचागत विकास हो रहा है वह आने वाले पांच वर्षो मे शहर की आबोहव्वा में जहर घोलने का काम करेगा। बहुमंजिले इमारते, बिन पार्कीगं की इमारते (रिहायसी एवं व्यवसायी) जो बन रही है उनके बारे में भी सोचना होगा। यही नहीं पहाड़ से जो पलायन देहरादून की तरफ बढ रहा है उसको व्यवस्थित करने के भी माकूल उपाय हों। एमडीडीए के पास यह काम इसलिए बढ रहा है कि शहर में जो बसने आयेगा उसे एमडीडीए से स्वीकृति लेनी ही पड़ती है। अर्थात स्वीकृति में बरती जाने वाली कोताही से क्या एमडीडीए पर सवाल खड़ा हो रहा है। इस ओर भी एमडीडीए को ही एक बरा फिर सोचना पडे़गा। क्योंकि भविष्य में स्कूलो, चिकित्सालयों, यातायात आदि में बहुतायात में भीड़ बढने वाली है। इसलिए पुनर्रूद्वार और नवनिर्माण हेतु रिहायसी व व्यवसायी इमारतो में अनिवार्य रूप से ‘‘स्टील पार्कीग’’ बनानी अनिवार्य कर देनी चाहिए। साथ ही एक बार फिर भूमि के संबध में विकास शुल्क पर सोचना होगा।
बाॅक्स
-ः संवादहीनता के कारण कोई भी काम सफल नहीं होता।
-ः यहां पलायन की रफ्तार कब रूकेगी यह तो कुछ पता नहीं है।
-ः जो पुरानी इमारते जर्जर हो चुकी है उनकी मरम्मत करने बावत लोग एमडीडीए के चक्कर काट-काट कर थक हार चुके हैं।
Tuesday, November 4, 2014
समाज सेवा की जीवट प्रतिमूर्ती रागणी बहन का जाना एक अपूर्णीय क्षती
समाज सेवा की जीवट प्रतिमूर्ती रागणी बहन का जाना एक अपूर्णीय क्षती
उत्तर प्रदेश गॅाधी स्मारक निधि की अध्यक्षा और वनवासी सेवा आसश्रम की प्रमुख कार्यकर्ता व प्रसिद्ध गांधीवादी चिन्तक डा0 रागिणी बहन का निधन बिते कल दिल्ली के चिकित्सालय में हुआ इनके निधन पर देशभर में गांधीवादी विचार में एक कमी सदैव खलती रहेगी। उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध गांधीवादी चिन्तक व शिक्षाविद् विहारी लाल भाई ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि समाज सेवा के प्रति समर्पित जन समूह में एक असमय क्षती हुई है।डा0 रागिणी बहन का जीवन समाज सेवा में ही बिता उन्हे मालूम नहीं कि कब मौत उनके घर दस्तक दें दें। वे ताउम्र गांधी विचार से ओत-प्रोत रही। यही वजह है कि आज उनकी विरासत उनकी दो बकटिया संभाल रही है। डा॰रागणी बहन चिकित्सा विज्ञान मे डण्क्ण् की उपाधि और उस्मानिया विश्वविद्यालय के अध्यापन कार्य का अनुभव प्राप्त करने के बाद, 10 जुलाई 1966 को प्रेमभाई के साथ दांपत्य जीवन मे बन्धी। डा0 रागिणी प्रेम का जन्म गाॅंधी विचार प्रेमी और समाजसेवा के लिये समर्पित स्वर्गीय विष्णुपलशीकर हैदराबाद के घर मे 12 सितम्बर सन् 1934 को हुआ। जहॅा वह गाॅधी विचार से पली पोषी और सेवाभाव के लिये चिकित्सीय ज्ञान से सक्षम हुई।
डा0 रागिणी बहन और प्रेमभाई दोनों को अण्णा साहब सहस्त्रबुद्धे और राधाकृष्ण जी का स्नेह और मार्गदर्शन था। दोनो की सलाह से और विचित्र नारायण भाई, करणभाई और रघुनाथ काॅल के आग्रह पर दोनों ने भोग-वैभव की दुनिया से विमुख होकर विवाह के बाद अपना कार्यक्षेत्र दुर्भिक्ष एवं सूखे से ग्रस्त क्षेत्र (तत्कालिक मीरजापुर की दुद्वी तहसील) को अपना कार्यक्षेत्र चुना और दीनदुखी बनवासियों की सेवा का संकल्प लिया।
डा0 रागिणी बहन, प्रेम भाई से एक वर्ष बाद जुलाई 1968 को बनवासी सेवा आश्रम से जुडी और क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा की मुख्य जिम्मेवारी लेती हुई उन्होने श्री प्रेमभाई की छाया की भाॅति आज के सोनभद्र को दुर्भिक्ष और सूखे से मुक्त कराने, कश्मीर बनाने और श्री राम प्रवेश शास्त्री के शब्दों मे ‘सोनभद्र’ को ‘‘सर्वतोभद्र’’ बनाने के लिये ‘‘हजारों एकड’’ भूमि के सुधार व समतलीकरण और उनमें फल, सब्जी और अन्न की खेती से लहराने; क्षेत्र की सूखी धरती के गर्भ को सेकडों छोटे व बडें तालाबो को बनवाकर सींचने व हरितिम बनाने; सैकडों ट्यूबवेल व जलपम्प स्थापितकर क्षेत्र के हजारों लोगो की पेयजल समस्या का हल करने; 100 प्रौढशिक्षा केन्द्र, 50 सचल पुस्तकालयों एवं नई तालीम के आवासीय बुनियादी शिक्षा विद्यालय, जीवनशालाओं, ग्रामशालाओं, अक्षरसेना, सम्पूर्ण साक्षरता व कार्यपरख शिक्षा के प्रयोगों से जन-जन को साक्षर बनाने की ग्रामदान शिक्षण की योजना को सफल बनाने; और क्षेत्र मे तकनीकी प्रशिक्षण के द्वारा तकनीशियनों की जमात तैयार करने; ग्रामीण हकदारी एवं कानूनी सहायता योजना के अन्तर्गत कालीन उद्योगोे में कार्यरत् हजारों बाल श्रमिकों व हजारों बन्धुवा मजदूरों को पॅंूजीपतियों के शिकंजे से मुक्ति दिलाने और सिंगरोली बाॅध के जन्मभूमि के पे्रमियों को उन्हे उनकी काश्तभूमि के अधिकार दिलाने; दैविक आपदाग्रस्तों के राहत व विकास कार्य में; प्राकृतिक संसाधनों के विकास, प्रबन्धन एवं विविध कार्यों मे उनकी भूमिका प्रेमभाई की मृत्युपर्यन्त अद्भुत रही और इसके बाद उक्त कार्यो को अपने जीवन की अन्तिम संास तक बखूबी से निर्वाह करती रही।
डा0 रागिणी बहिन की किडनी खराब हो जाने व फेफडों मे पानी भरते रहने से वे कई महीनों तक अस्वस्थ रही। उनकी बेटी डा0 विभा एवं शुभा, बनवासी सेवा आश्रम व गाॅधी भवन के कार्यकर्ताओं की अनन्य सेवा एवं चिकित्सकों के विशिष्ठ चिकित्सकीय व्यवस्था के बावजूद भी उनकी आत्मा ने उनके पार्थिव शरीर से 2 नवम्बर 2014 की रात्रि 9 बजकर 20 मिनट पर राममनोहर लोहिया अस्पताल लखनऊ से परम्धाम को प्राप्त हुई।
आज सोनभद्र, पूर्व की भाॅति दुर्भिक्ष और सूखाग्रस्त नही है। यह माना जाना चाहिये कि रागिणी बहन व प्रेमभाई दोनों अपने संकल्प मे सफल रहे है। अतः उनकी इच्छा सोनभद्र को ‘‘सर्वतोभद्र’’ बनाने की थी। डा0 रागिणी ने, प्रेमभाई के निधन के बाद बनवासी सेवा आश्रम की समग्र जिम्मेवारियों को अपने स्वास्थ्य परियोजना के साथ साथ उठा लिया और अन्तिम क्षण तक अपनी योग्यता, दक्षता और सेवाभाविता के साथ सफलतापूर्वक निर्वाह किया। उनके स्वास्थ्य योजना के वनज कववत बसपदपब सेवा से प्रतिवर्ष औसत 10 हजार लोगों को सतत् स्वास्थ्य लाभ मिलता रहा।
बहन जी ने सोनभद्र की सर्वताभद्र बनाने की इच्छा के निर्वाह के लिये अपनी विचारवान्, सेवासमर्पित दो बेटियों ( डा0 विभा और शिक्षाविद् शुभा ) को बनवासी सेवा आश्रम को समर्पित किया है। बनवासी सेवा आश्रम मे सशक्त कार्यशक्ति व द्वितीय पंक्ति के क्रान्तिकारी अनुभवी व सेवाभावी लोगों को तैयार किया है और अनुकूल परिस्थिति व वातावरण का सृजन किया है। आज बनवासी सेवा आश्रम अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये अनाथ नही अपितु सक्षम है इसलिये बनवासी सेवा आश्रम परिवार, स्वर्गीय रागिणी बहन व प्रेमभाई के कृतज्ञ है।
ज्ञात हो कि डा॰ रागणी बहन के पति प्रेमभाई के पिता स्वर्गीय वेदप्रकाश वेदालंकार, माॅ स्व0 पुष्पावती, उनके नानाश्री भी आर्यसमाज व स्वतन्त्रता आन्दोलन के समर्पित सेनानी और राष्ट्रीय सेवा भक्त थे। इस पूरे परिवार के गाॅधी विचार और सेवाभाव से प्रेमभाई ओत-प्रोत थे। उन्होने 1953 मे मेरठ काॅलेज मे स्व0 जयप्रकाश नारायण के प्रेरक भाषण सुने जिनसे वे अपने को रोक नही पाये और काॅलेज को छोडकर कर्मठ मनीषी धीरेन्द्र भाई के सानिध्य मे सर्वाेदय आन्दोलन से जुड गये। माॅ के आग्रह पर उन्होने 1955 मे अपनी ठण्ैबण् की और 1957 मे समाजशास्त्र मे डण्।ण् की पढाई पूरी की तत्पश्चात् सर्वोदय आन्दोलन के रचनात्मक कार्याे के लिये पूर्णरूप से जुड गये।
Subscribe to:
Posts (Atom)
समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।
यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...
-
अब कहां सुनाई देगी धराली गांव में बच्चो की किलकारियां। सब कुछ तबाह कर दिया खीर गंगा की बाढ़ नें। ।। प्रेम पंचोली ।। गंगोत्री से ठीक 18 किमी...
-
प्रेम, दिवानगी और समसामयिकी विषयों का संग्रह है ‘वो साल चौरासी’ प्रेम पंचोली दुनियांभर में ‘प्रेम’ पर आज तक जो भी लिखा गया है वह कम ही स...
-
तुझे लौटना होगा कितना भावनात्मक शब्द है। मनुष्य में कोई ऐसा नहीं होगा जो इस शब्द से दूर रहा हो। इसी शब्द के आस पास ही उत्कृष्ट शिक्षक, उद्घो...