Tuesday, February 24, 2015

शिक्षा का अधिकार: स्कूलो की हालात बदस्तूर

शिक्षा का अधिकार: स्कूलो की हालात बदस्तूर
प्रेम पंचोली
राइट टू एजूकेशन फोरम उत्तराखण्ड के तत्वाधान में पिछले माह शिक्षक एव्म शिक्षा का अधिकार को लेकर राजधानी स्थित में राज्य स्तरीय एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन हुआ ।  इस सम्मेलन में राजकीय प्राथमिक शिक्षक संगठन एव्म शिक्षा विभाग से जुड़े विभिन्न पदाधिकारियों एव्म विषय- विशेषज्ञो के अलावा विद्यालय प्रबन्धन समिति से जुड़ेे सदस्यो ने भी भाग लिया। इस दौरान शिक्षा के गिरते स्तर व गुणवत्ता की शिक्षा पर चिन्ता व्यक्त की गयी।
सम्मेलन में प्राथमिक शिक्षक का स्तर जिस तरह से गिर रहा है वह इस देश के लिये एक बड़ी समस्या भविष्य में उभर कर आयेगी। यह बात प्रमुखता से आयी कि देश को एक तरफ समान शिक्षा के लिये काम करना पड़ेगा  तो दूसरी तरफ शिक्षक संगठनो को जिम्मेदारी का निर्वाहन भी करना होगा । आजादी के बाद 68 साल के अन्तराल में शिक्षा को लेकर जो भी कानून आये हैं उन्हें वस्तुतः क्रियान्वित करना पड़ेगा।
इस दौरान सम्मेलन में वक्ताओं ने आर. टी. ई. के विभिन्न कानूनी पहलुओं पर प्रस्तुतिकरण दिया, इस दौरान उन्होने बताया कि अब आर. टी. ई. के सेक्सश 38 में संशोधन किया गया है। आर टी ई में 16 जुलाई 2012 में संशोधन हुआ है जिसमे स्पष्ट रूप से बताया गया कि खंडशिक्षा अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी, अध्यापक, शिक्षा निेदेशक के क्या अधिकार हों। यही नहीं पंचायतों के दायित्वों को भी इसमें निर्धारण किया गया है।
इस दौरान आर.टी.ई फोरम के प्रमुख रघु तिवारी ने कहा कि शिक्षा के सवाल पर राष्टीय परिस्थितियां दिनों दिन गंभीर होती जा रही हैं। शिक्षा का सार्वजनीकरण बहुत महत्वपूर्ण है। शिक्षा का कानून प्रगतिशील कानून है। उन्होने कहा कि कोठारी आयोग ने भी शिक्षा पर सकल घरेलू आय का 6 प्रतिशत खर्च होनक की बात कही थी। लेकिन आज भी 3.6 प्रतिशत तक ही खर्च हो पा रहा है। ज्ञात हो कि उतराखण्ड सरकार ने पिछले वर्ष 48 करोड़ रूपया आरटीई के तहत खर्च किया जिसका असर सार्वजनिक विद्यालयों पर पड़। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा को खड़ा करने के लिए शिक्षक को खड़ा करना होगा यही वजह है कि आज भी 12 लाख शिक्षकों की देशभर में आवश्यकता है। जबकि उत्तराखण्ड राज्य में 18000 शिक्षकों की जरूरत है। सुझाव आया कि शिक्षकों के साथ एक विमर्श की जरूरत है। शिक्षा नीति के अंदर शिक्षा की स्थानांतरण नीति को देखते हुए लगता है कि बहुत से अध्यापक अपने घरेलू कारणों से बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान नहीं कर पा रहे है। शिक्षकों की अपनी समस्याओं पर भी विचार करने की जरूरत है। यह बात उभरकर आई कि 2015 में शिक्षकों की नियुक्ति, पी.टी.आर नार्मस, शिक्षकों के प्रशिक्षण का कार्य पूरा होना चाहिए था जो नहीं हो पाया है।
सम्मेलन की खुली चर्चा में मुखर रूप् से शिक्षको ने बताया कि आज फिर से यह सवाल उठ रहा है कि फेल करने की प्रक्रिया ने शिक्षा की गुणवत्ता को खत्म कर दिया है। सिद्वांत के तौर पर स्वीकार कर लिया गया कि अगर आप परीक्षा के डर से बच्चों को पढ़वा रहे है तो वे बच्चों को एक बधुवा मंजदूर की श्रेणी में खड़े कर रहे है। भय से दी गई शिक्षा निरर्थक है। अब तो परीक्षाए लाखों हजारों बच्चों को शिक्षा से वंचित करने का माध्यम बन गया है। इसको समझना पडेगा कि परीक्षा की प्रणाली शिक्षा की गुणवत्ता सुधार व बच्चों के विकास की सुनश्चिता की गांरटी नही ंहै। अर्थात बच्चों को उनके स्तर के हिसाब से मूल्यांकन करना होगा। कक्षा के प्रस्तर को खत्म करना होगा। सार्वजननिक शिक्षा के लिए शिक्षा के अधिकार के लिए सामाजिक जनआंदोलन व एक जनअभियान की जरूरत महसूस की गयी।
उल्लेखनीय यह है कि शिक्षा के अधिकार के जीतने भी जी.ओ. जारी हुए है उससे शिक्षा की सूरत बदल जायेगी। मगर अब तक हो नहीं पाया। 25 प्रतिशत बच्चे जो निजी विद्यालयों में प्रवेश पा रहे है उससे सरकारी विद्यालयों में अवरोध पैदा हो रहे है। साढे सात लाख बच्चें पर 19 हजार अध्यापक प्राथमिक शिक्षा का जिम्मा लेंगे। जिनके हिस्से लगभग 39 बच्चे प्रति शिक्षक के आते है। आंकड़ो की नजाकत देखिऐ कि एक अध्यापक पर सरकार सालभर में 637264 रूपये का खर्चा कर रही है। एक तरफ सरकार कह रही है कि वे राज्य के शिक्षक पर अनावश्यक खर्च कर रहे हैं तो वहीं 3000 हजार प्राथमिक शिक्षक प्रारम्भिक शिक्षा का कार्य नहीं कर रहें। इस तरह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कहां से आएगी। इसके अलावा शिक्षको को तो सरकार प्रतिनियुक्ति पर भी भेज रही है। आर.टी.ई निश्चित रूप से भारत के लिए बहुत जरूरी था। लेकिन प्रशासनिक अधिकारी नहीं चाहते कि वंचित वर्ग का बच्चा अच्छी शिक्षा ग्रहण करे। ऐसी चर्चा सम्मेलन में प्रमुखता आई।
माध्यमिक षिक्षक संघ के उपाध्यक्ष-मुकेश बहुगुणा ने बताया कि आर.टी.ई को लेकर सामाजिक जनआंदोलन प्रबल आवश्यकता है। उन्होने शिक्षा संवाद यात्रा के दौरान देखा और समझा कि स्कूलों की हालात पर यह एक अपराध हो रहा है। जिसमें सरकार और अधिकारी दोषी है। अमानवीयता की हद तक चीजे हो रही। हमारा संविधान शुरू होता है हम भारत के लोग, और खत्म होता है हम भारत के लोग आध्यात्मिक हैं और अंगीकार करते है।
विद्यालय प्रबंधन समिति की  अध्यक्षा श्रीमति शुशीला देवी ने बताया कि सरकारी स्कूल में पढने वाले बच्चो के अभिभावक, सरकारी विद्यालय के शिक्षक भी बच्चों पर ध्यान नहीं देते है यह अन्र्तद्वन्द्व भविष्य के लिए खतरा पैदा करने वाला है। चमोली से आये विधालय प्रबन्धन समिति के अध्यक्ष ताजवीर सिंह भंडारी ने बताया कि उन्होने चंदा करके कम्प्यूटर, विद्यालय में शौचालय व पानी की व्यवस्था की है। इस दौरान एन.सी.आर.टी नरेन्द्र नगर से डा. एस. के.सिह, चमोली से आये बरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम सिंह सनवाल, अमन संस्था की नीलिमा भट्ट, डा॰ डी एस पुण्डीर, शिक्षक सोहन सिंह नेगी, रमेश अंथवाल, डा॰ अरूण प्रकाश ध्यानी, वाणी विलास सिलवाल, दुर्गा प्रसाद कंसवाल, गजेन्द्र जोशी, ओम प्रकाश सकलानी, गोविन्द सिंह मेहरा, कविता बडोला, गणेशी देवी, डा॰ योगेश जोशी, गीता रानी, रविन्द्र राणा आदि शिक्षको ने हिस्सा लिया तथा कार्यक्रम का संचालन शिक्षक डा. अनिल नौटियाल और मोहन सिंह चैहान ने संयुक्त रूप से किया है।
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वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता प्रो. विरेन्द्र पैन्यूली ने कहा कि शब्द और अर्थ मायने को समझाते हुये कहा कि शब्दो की बाजीगरी नहीं वरन जमीनी स्तर पर जिम्मेदारी निभानी होगी तभी सार्थक शिक्षा की बात कर सकते है । उन्होने दुर्भाग्य करार देते हुये कहा कि कर्मचारियों की यूनियनें, स्कूलो की जाॅच पड़ताल, स्कूलो छात्र संख्या का कम होना, आपसी मतभेद ही वर्तमान में सम्पूर्ण शिक्षा व समान शिक्षा पर सवाल खड़ा करता है ।
समन्वयक पैडागेाजी /आर. टी. ई सर्वशिक्षा अभियान उत्तराखण्ड के अरूण विष्ट ने कहा कि आरटीई के सेक्शन 29-1366 में प्राविधान है कि ड्राप आउट बच्चों के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण दिया जाएगा । जिसे सृजन 1 से 3 तक का नाम दिया गया है जो अभी उधमसिह नगर, देहरादून, नैनीताल के तराई क्षेत्रों में चल रहे है। जबकि इस कानून में कंपिटेशन फीस, सुविधा शुल्क को प्रतिबंधित किया गया है।
आर.टी.ई फोरम प्रमुख रघु तिवारी ने कहा कि 90 से निजीकरण की प्रक्रिया ने पिछले कुछ सालों में व्यवस्था को शिक्षा के लिए वाउचर सिस्टम को लाने की बहस शुरू की है। परंतु यह प्रक्रिया गरीब को शिक्षा प्रदान नहीं कर सकती।
आर टी ई विषेषज्ञ विजयभटट ने कहा कि 1809 में ब्रिटेन के अंदर अनिवार्य शिक्षा का कानून पास हुआ। भारत में भी जन शिक्षा के अनिवार्य शिक्षा की बात शुरू हुई। 1906 में गोपाल कृष्ण गोखले ने शिक्षा के अधिकार की मांग की लेकिन उस समय उनकी इस बात का विरोध हुआ। कहा कि समाज में जैसी वर्गीय असमानता पर टिका है उसी तरह शिक्षा भी वर्ग के आधार पर बंटी हुई है। यह तय करना होगा कि शिक्षा का मूल उददेश्य क्या होगा यह सवाल आज भी खड़ा है।
बेसिक जिला षिक्षा अधिकारी टिहरी के एस.पी.सेमवाल ने कहा कि शिक्षा के अधिकार कानून को आधुनिक संदर्भ में लागू करने की आवश्यकता है। कहा कि यह समस्या आजादी के समय से खड़ी है। 1947 में शिक्षा को मौलिक अधिकार से हटाकार राज्य के निति निर्देर्शक तत्वों में डाल दिया गया और 1990 के बाद शिक्षा का सवाल बहुत केन्द्र में आया। आर टी ई पर चर्चा करते हुए उन्होने आपती जाहीर की कि प्राथमिक शिक्षा में फेल करने की प्रक्रिया खत्म कर दी गयी है। निजी स्कूलों की कंपिटेशन फीस, डोनेशन, स्कीनिंग बंद हो गयी। पर अभी तक यह प्रक्रिया बंद नहीं हो पायी।
राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रान्तीय महामंत्री दिगविजय सिंह चैहान ने कहा कि राज्य सरकार, केन्द्र सरकार या उच्चअधिकारी जो आंकडो की बाजीगारी करते है वह समाज में संवादहीनता को फैलाते है।

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