Thursday, July 7, 2016

गंगा स्वच्छता के लिए 1500 करोड़ - नितिन गडकरी


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‘‘मिशन फाॅर क्लिन गंगा’’ का शुभारम्भ ऋषिकुल विद्या पीठ मैदान हरिद्वार मे विधीवत हो गया। आयोजन से ऐसा लग रह था कि अब गंगा स्वच्छ हो जायेगी और दूसरी ओर आयोजन में पंहुचे लोग चर्चा गरम कर रहे थे कि सरकार को आखिर स्वीकार करना पड़ा कि गंगा गंदली हो चुकी है। गंगा को कौन से तत्व हैं जो सर्वाधिक गंदा कर रहे हैं? जिनकी चर्चा आयोजन में वक्ताओं ने एक बार भी नहीं की। खैर गंगा की पवित्रता और स्वच्छता के लिए आखिर सरकार ने 1500 करोड़ की एक धनराशी स्वीकृत करके कार्यक्रम का शुभारम्भ केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की अध्यक्षता में कर दियार्।

खचा-खचा भरे ऋषिकुल विद्या पीठ के मैदान में केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि नमामि गंगे के अन्तर्गत 43 विभिन्न परियोजनाओं का सुभारम्भ कर दिय गया है। उन्होंने कहा कि गंगा आस्था, इतिहास एवं संस्कृति का प्रतीक है। गंगा की शुद्धता, निर्मलता, अविरलता एवं गंगा से सम्बन्धित योजनाओं को अब पाठ्यक्रमों में लाया जायेगा। श्री गडकरी ने मुज्जफरनगर से देहरादून तक राष्ट्रीय राजमार्ग का कार्य दिसम्बर तक पूरा करने का आश्वासन दिया। नमामि गंगे के तहत 1500 करोड़ की लागत से 100 विभिन्न स्थानों पर 231 कार्यों का सुभारम्भ किया जा रहा है। इसमें 50 बड़े प्रकल्प, 1142 छोटे प्रकल्प तथा 60 एस.टी.पी. भी हैं। उन्होंने कहा कि गंगा की स्वच्छता के लिए जन सहयोग भी आवश्यक है। कहा कि इस योजना में घाटो की मरम्मत, सुदृढ़िकरण एवं श्मशान घाटों का निर्माण भी शामिल है।
इस दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि प्रतिभाग करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार गंगा को निर्मल एवं स्वच्छ बनाने के लिए राज्य सरकार को जो भी दायित्व सौंपेगी राज्य सरकार पूर्ण सहयोग की भावना से इस कार्य को करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड सरकार ‘‘नमामि गंगे’’ योजना को सफल बनाने के लिए वृक्षारोपण करने, एवं वर्षा के जल को संरक्षण करने के लिए बोनस देने वाला पहला राज्य है। आज प्रदेश में डेढ़ दर्जन सीवरेज पर कार्य हेतु एस.टी.पी. स्थापित किया जा रहा है। उन्होंने कैमिकल युक्त जल के ट्रीटमेंट के लिए इण्टर सैप्टर कैनाल के माध्यम से मिट्टी द्वारा ट्रीटमेंट की योजना को स्वीकृत करने का आग्रह किया। श्री रावत ने कहा कि उत्तराखण्ड सरकार जल संरक्षण हेतु विशेष प्रयास कर रही है, आने वाले समय में उत्तरकाशी की तरह हरिद्वार में भी स्वच्छ गंगा जल मिलेगा। उन्होंने गंगा की स्वच्छता व निर्मलता के लिए होलोस्टिक अप्रोच पर बल दिया। उन्होंने कहा कि खुले शौच की प्रथा से 45 प्रतिशत क्षेत्र में दूर हो चुकी है। नमामि गंगे योजना के तहत राज्य में गंगा एवं उसकी सहायक नदियों पर बसे गांवों को भी खुले में शौच से मुक्ति के लिए आग्रह किया, ताकि सभी गांवों को खुले में शौच से मुक्त किया जा सके।
इस अवसर पर जल संरक्षण, नदी विकास एवं गंगा सरंक्षण मंत्री उमा भारती ने कहा कि गंगा की सफाई हेतु 1916 में मदन मोहन मालवीय जी ने गंगा की निर्मलता एवं अविरलता के लिए प्रयास प्रारम्भ किया था। कहा कि गंगा 50 करोड़ से अधिक लोगों के लिए आजीविका का संसाधन है। उद्योगों के प्रदूषण एवं सीवरेज के कारण गंगा प्रदूषित हुई है। कहा कि 2018 तक गंगा को निर्मल बनाने का हमार संकल्प है, इसकी प्रगति के परिणाम अक्टूबर 2016 से दिखई देने लगेंगे। उन्होंने कहा कि गंगा की स्वछता के लिए वृक्षारोपण, घाट निर्माण, सीवर ट्रीटमेंट प्लान आदि का कार्य गंगा एवं उसकी सहायक नदियों पर किया जायेगा। केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री महेश शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गंगा का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि हम नदियों के साथ कोई छेड़खानी करते हैं तो इसकी विभीषिका भी हमें देखने को मिलती है, इसलिए प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलना आवश्यक है। हरिद्वार सांसद डाॅ रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि आज हमने गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा की अविरलता एवं निर्मलता का संकल्प को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कहा कि पहले की ‘‘स्पर्श गंगा परियोजना नमामि गंगे योजना’’ में बदल गयी है।
इस अवसर पर स्थानीय विधायक स्वामी यतीश्वरानन्द, संजय गुप्ता, मदन कौशिक, चन्द्रशेखर, प्रेम अग्रवाल, विजया बड़थ्वाल, मेयर मनोज गर्ग, शंकराचार्य राजराजेश्वर महाराज, स्वामी हरिचेतनानन्द, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष सतपाल ब्रहम्चारी, गंगा सभा के अध्यक्ष पुरूषोत्तम शर्मा, कुंवर प्रणव चैंपियन, आदेश चैहान, डाॅ रजत भार्गव, डाॅ आर.के. गुप्ता, हरिहर मिश्रा, जिलाधिकारी हरबंस सिंह चुघ, एस.एस.पी. राजीव स्वरूप , मुख्य विकास अधिकारी सोनिका आदि उपस्थित थे।

Tuesday, July 5, 2016

प्राकृतिक आपदा के लिए मानवजनित कारनामें








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प्रेम पंचोली
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ऐसा लगता है कि उत्तराखण्ड और आपदा का चोली दामन का साथ हो गया है। साल 2010 से लगातार, बरसात आरम्भ होने से ही आपदाओं का डर लोगो को सदमें डाल देता है। अभी मानसून पूर्ण रूप से आया ही नहीं था कि राज्य के पहाड़ी जिले पिथौरागढ, चम्पावत, चमोली, उत्तरकाशी, रूद्रप्रयाग, अल्मोड़ा एवं देहरादून व नैनीताल जिलों के पहाड़ी क्षेत्र आपदा की चपेट में आ गये। आश्चर्य इस बात का है कि हमेशा की तरह इस दौरान भी पहाड़ी जिलों के सीमान्त क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। बताया जा रहा है कि जो क्षेत्र राज्य का चीन और तिब्बत सीमाओं से लगा है उन क्षेत्रों में आपदाओं की घटनाऐं अधिकांश हो रही है।
यहां वैज्ञानिक आपदाओं के लिए चाहे जो भी दावे करे, वह अपनी जगह सच भी हो सकते हैं, किन्तु आपदा वाले क्षेत्रों के लोग जहां सुरक्षित ठौर-ठिकाने की तलाश में हैं वही वे आपदा के बारे में अलग-अलग राय दे रहे हैं। ग्रामीणों का कहना हैं कि चीन ने ल्हासा जैसे विकट पहाड़ी क्षेत्र में रेल सेवा व मोटर मार्गो का विकास कर दिया है। यह वह क्षेत्र है जो उत्तराखण्ड की सीमाओं से लगा है। जिसका प्रतिकूल प्रभाव निश्चित रूप से उत्तराखण्ड के सीमान्त क्षेत्रो पर जरूर पड़ेगा। क्योंकि हिन्दूकुश हिमालय का ही पर्वतशिखर भारत और चीन का सीमांकन करता है। वह चाहे बन्दरपूंछ हो या कैलाश मानसरोवर हो, या निलांग-कोपांग हो या मलारी पास हो। अतएव राज्य के ये क्षेत्र सामरिक दृष्टी से अतिशंवेदनशील हैं तो भौगोलिक दृष्टी से एकरूपता के साथ-साथ दोनो देशो की सीमायें पीठ और छाती के समान आपस में जुड़ी है। स्पष्ट है कि यदि पीठ का दोहन होगा तो उसका असर छाती की तरफ पड़ेगा। हालांकि वैज्ञानिक इस कथन को झुटला सकते है, चूंकि सत्य इसलिए है कि इन पहाड़ो की बनावट एक दूसरे के सम ही नहीं एक दूसरे के समान अंग के रूप में है।
वर्तमान समय में भारत और चीन प्राकृतिक संसाधनो को नजरअन्दाज करके विकास के नये आयाम ढूंढ रहे हैं। भले भारत अभी प्राकृतिक संसाधनो का अतिदोहन ना कर रहा हो मगर चीन ने तो सड़क, विधुत, रेल आदि विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनो की बली चढा दी है। इस लिहाज से जिसका सीधा-सीधा असर उत्तराखण्ड राज्य पर सर्वाधिक पड़ रहा है, क्योंकि हिन्दूकुश हिमालय के पर्वतो की ढलान राज्य की तरफ 90, 100, 110 संटिग्रेट पर बनाते हैं। जबकि चीन की तरफ इन पहाड़ो की ढलान 130 संटिग्रेट से बनने आरम्भ होती है। अर्थात खड़े और गलेशियरो से बने कच्चे पहाड़ भी उत्तराखण्ड राज्य के हिस्से अधिक आते हैं। कुलमिलाकर जानकारो का यहां तक कहना है कि इधर उत्तराखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्रो में बांध, सुरंग और सड़क निर्मार्ण के कार्य हो रहे हैं तो उधर पड़ोसी देश चीन भी त्वरित लाभ एवं वैश्वीक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित करने के लिए इस तरह के विकास को महत्व दे रहा है। जिसके लिए चीन के नियोजनकर्ता प्राकृतिक संसाधनो का अनियोजित दोहन करवा रहा है। इसके दुष्प्रभावो का परिणाम उत्तराखण्ड में भूस्खलन, बादल फटना, अतिवृष्टी जैसी प्राकृतिक आपदा के रूप में मौजूदा समय में स्पष्ट नजर आ रहा है। यानि पूरे हिन्दूकुश हिमालय का पर्यावरण असन्तुलित होते दिखाई दे रहा है। लोगो का मानना है कि जब उत्तराखण्ड में आपदा घटती है तो राज्य की सीमाओ से लगी चीन वाले क्षेत्र में भी आपदा घटती है। यही वजह है कि उत्तराखण्ड आपदाओं का घर बनता ही जा रहा है।
उल्लेखनीय हो कि पिछले छः वर्षो में उत्तराखण्ड राज्य ने प्राकृतिक आपदाओ के कारण जो खोया है उसकी भरपाई कभी भी नहीं हो सकती, मगर भविष्य में इन आपदाओं से बचने के कुछ उपाय किये जा सकते है। ऐसा कई बार वैज्ञानिको ने सरकारो को सलाह भी दी है। आईआईटी रुड़की के जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग के प्रो. नयन शर्मा ने बताया कि किस तरह से सबसे उन्नत सैटेलाइट तकनीक से प्रत्येक पांच किलोमीटर के दायरे में बादल फटने, भारी बारिश और इससे होने वाली तबाही के बारे में सटीक भविष्यवाणी संभव है। यह उन्होंने नवंबर-2015 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती की उपस्थिति में बाढ़ और उससे होने वाली तबाही के पूर्वानुमान पर तकनीक का प्रस्तुतीकरण दिया था। साथ ही बारिश से नदियों में आने वाले पानी के आयतन, वेग और इससे प्रभावित होने वाली आबादी पर भी आंकलन प्रस्तुत किया गया था। वैज्ञानिको का यह भी कहना है कि बारिश के पूर्वानुमान के आधार पर नदियों में पानी के प्रवाह की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए नदियों को चैनेलाइज्ड करने के लिए इसकी गहराई और चैड़ाई को जरूरत के हिसाब से विकसित करने का काम किया जा सकता है। साथ ही तेज प्रवाह में पहाड़ों के भूस्खलन को रोकने के लिए रॉक बाल्टिंग तकनीक से इन्हें मजबूती प्रदान की जा सकती है। बादल फटने और भारी बारिश के साथ होने वाली तबाही का पूर्वानुमान संभव है। जबकि आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिको ने प्रत्येक पांच किलोमीटर में बारिश का सटीक आंकलन कर डिजिटल एलीवेशन मॉडल (डीईएम) के जरिये निश्चित हिस्सों में होने वाली तबाही बताने वाली रिपोर्ट भी केंद्र को भेजी हुई है। ताज्जुब हो कि आठ माह बाद भी इसका संज्ञान सरकार ने नहीं लिया है। उधर जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस तकनीक में रुचि दिखाई है। यदि केंद्र इस पर संज्ञान लेता तो पहाड़ को हालिया तबाही से बचाया जा सकता था। गौरतलब हो कि उत्तराखंड के लिए यह तकनीक बहुत जरूरी है। उनकी इस तकनीक पर जम्मू-कश्मीर सरकार ने गौर करते हुए डल झील के प्रोजेक्ट पर काम भी शुरू कर दिया है। वैज्ञानिको का दावा है कि इस ग्लोबल प्रेसीपीटेशन मेजरमेंट तकनीक से विभिन्न सैटेलाइटों के जरिए बादलों के प्रतिक्षण दबाव एवं घनत्व के आधार पर जानकारी दी जा सकती है और बारिश के साथ-साथ इससे होने वाली तबाही का आंकलन भी नई तकनीक की खासियत में शामिल की गयी है।

शासन हुआ सर्तक

उत्तराखंड शासन ने राज्य में आई प्राकृतिक आपदा में भारी जानमाल के नुकसान का आंकड़ा सार्वजनिक किया है। आपदा सचिव शैलेश के मुताबिक पिथौरागढ़ के डीडीहाट और थल तहसील के अन्तर्गत अत्यधिक वर्षा से त्वरित बाढ़ और मलबा आने की घटना से ग्राम सिगांली, दाफीला, बस्तड़ी एवं नौलड़ा क्षेत्र में अब तक लगभग 160 परिवारों के प्रभावित होने के साथ ही नौलड़ा गांव में तीन, बस्तड़ी में 11, चर्मा में एक व्यक्ति की मृत्यु की खबर है। अब तक 15 लोगों ने आपदा में अपनी जान गंवाई और तीन व्यक्ति गंभीर घायल हैं, जबकि 12 लोगों के लापता होने की सूचना है। वहीं 164 पशुओं के बहने के साथ ही पिथौरागढ़ से 12 भवन आंशिक और चार भवन पूर्णतरू क्षतिग्रस्त हुए है। अधिकारियों के मुताबिक आपदा प्रभावित परिवारों को राहत शिविर में रखा गया है। डीडीहाट के बस्तड़ी ग्राम में स्कूल एवं पंचायतघर में 50 लोग, ग्राम सिघाली के राजकीय इंटर कॉलेज में 150 लोग, ग्राम मल्ला पत्थरकोट स्थित प्राथमिक विद्यालय में 15 लोग और मुनस्यारी के ग्राम नौलाड़ा की जू. हाईस्कूल में 25 लोग ठहराए गए हैं। 03 जुलाई तक कुल 284 मार्ग बंद हुए थे, जिसमें से 110 मार्गों को यातायात के लिए खोल दिया गया है। कुुमाऊं मंडल के लिए वैली ब्रिज, चार फोल्डिंग ब्रिज और चार ट्रॉली भी वैकल्पिक यातायात के लिए उपलब्ध कराई जा रही हैं।

तबाही की एक बानगी

चमोली के घाट बाजार के एक मकान में सोए दादा और पोता मकान गिरने से लापता हो गए हैं। जैसे-जैसे मौसम करबट लेता है वैसे-वैसे केदारनाथ, बदरीनाथ गंगोत्री, यमनोत्री हाईवे बंद और खुलता रहता है। मानसून की पहली बरसात ने लोगो का सुख-चैन छीन लिया है। मूसलाधार बारिश से मसूरी में भी कई जगह पुस्ते गिरे। पुस्ता गिरने से कार क्षतिग्रस्त हो गई। देहरादून जिले में बांदल घाटी स्थित सरखेत और क्यारा गांव के मोटर मार्ग में बांदल नदी का पानी आने के कारण लोग अपने-अपने घर छोड़ने को मजबूर हो गये। इसी तरह जब श्रीनगर गढ़वाल में तेज बारिश के चलते तिवाड़ी मुहल्ला में मलबा घुसा तो लोग सूझ नहीं पाये कि सुरक्षित ठिकाना कहां होगा। गोपेश्वर-चमोली सड़क अवरूद्ध होने की वजह से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी ठप हो गयी। देहरादून के जनजातीय क्षेत्र में भी भारी बारिश और भूस्खलन के चलते सड़कों पर मलबा आने से जौनसार बावर के 300 से अधिक गांवों का संपर्क देश दुनिया से कट गया है। चकराता-कालसी, हरिपुर-कोटी-मीनस समेत क्षेत्र के 16 मार्ग मलबा आने से बंद हो गए हैं। मार्ग बन्द हो जाने के कारण लोग सुरक्षित ठिकानो तक पंहुचने के लिए 45-50 किमी का अतिरिक्त सफर तय कर रहे हैं। कालसी-चकराता मोटर मार्ग पर जजरेट, ककाड़ी खड्ड, लालढांग, शंभू की चैकी, चापनू, झड़वाला, भूतियाधार, सैंसा, पणायसा, कोथीधार के पास भारी मात्रा में मलबा आने से सड़क पर वाहनों की लंबी कतार लग गयी। जो मार्ग खुलने तक की इन्तजारी में है। गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से कटा हुआ है। नगदी फसलों से भरे कई ट्रक बीच रास्ते में ही फंसे हुए हैं। इसके साथ ही कई बड़े और छोटे मोटर मार्ग भी जगह-जगह मलबा आने से बंद पड़े हैं।



Sunday, July 3, 2016

बिन समुदाय की भागीदारी के ‘‘वन’’ असुरक्षित

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प्रेम पंचोली 

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उत्तराखण्ड सहित हिमालयी क्षेत्र में प्रतिवर्ष जंगलों में आग लगने की घटनायें तेजी से बढ़ रही हैं। वनों की जैव विविधता और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र वनाग्नि से तहस-नहस और नष्ट हुआ है। वनों के जलने से केवल इमारती लकड़ी ही नहीं जलती, बल्कि जीवन की एक पूरी व्यवस्था और क्रिया प्रभावित और समाप्त होती है। जंगल में पेड़ पौधों के साथ ही छोटी छोटी घास व झाड़ियां भी नष्ट होती हैं। जिसकी वजह से भू-क्षरण, भू-स्खलन और त्वरित बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। जंगल की आग से उठने वाला धुआं और विभिन्न प्रकार की जहरीली गैसें मानव और सभी प्राणियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं। हृदय और स्वांस से सम्बन्धित बीमारियां होने की सम्भावनाऐं रहती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस आग से निकलने वाली गैसें, जिनका प्रभाव वायुमंडल में तीन साल तक रहता है, के कारण कैंसर जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं। उत्तराखण्ड का 3500 हैक्टेअर और हिमाचल का 4500 हैक्टेअर जंगल वनाग्नि की भेंट चढ़ा है। यह बात ‘‘उत्तराखण्ड वनाग्नि विमर्श एवं हस्तक्षेप’’ विषय को लेकर टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, चम्पवात, पिथौरागढ़, कश्मीर, हिमाचल, हरियाणा, ओड़ीसा एवं दिल्ली से आये 75 प्रतिभागियों ने जन जागृति भवन खाड़ी में दो दिन तक हुए मंथन में सामने लाई। जबकि इधर वनाग्नि के कारणों को प्रायः धूम्रपान और खेतों में जलाये जाने वाले कूड़े को प्रमुख कारण माना जाता है। विभिन्न जागरूकता सामग्री और अभियानों में भी इन्हीं कारणों को प्रमुखता से लिया जाता है। 
विमर्श के दौरान वनों में आग लगने के कई और भी कारण निकलकर सामने आये हैं। जिसे इस बैठक में जाॅंच का भी विषय बताया गया। बैठक में विभिन्न संगठनों से आये कार्यकर्ताओं ने बताया कि बहुत कम वर्षात, एलनीनो, दक्षिण महासागर से उठने वाला चक्रवात   एवं तापमान का बढ़ना एवं सर्दी के मौसम में भी कम बारिश के कारण वनों की सूखी सतह, कम वायुमंडलीय नमी एवं उच्च तापमान भी वनाग्नि के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। यह आरोप भी अधिकांश लगाया जाता है कि मानवीय लापरवाही के कारण जैसे धूम्रपान, पटाखे एवं खेतों के कूड़े को जलाने के कारण भी कई बार आग लगती है। मगर इसके लिये कम से कम 42 डिग्री सेन्टिग्रेड तापमान आवश्यक है तभी इन कारणों से आग लग सकती है। चीड़ की अधिकता के कारण भी आग तेजी से भड़की है। चीड़ की पत्तियों से वनों में फिसलने वाली सतह का निर्माण होता है, कई बार परेशानी से बचने के लिये इन पत्तियों को जलाया जाता है। फायर लाइन निर्माण का कार्य वन रक्षकों एवं उससे निचले स्तर के कर्मचारियों द्वारा किया जाता है, जिन्हें कई बार अनुबंध पर रखा जाता है। लक्ष्य से कम वनीकरण और वन सुधार के कार्यों को छिपाने के लिये भी कई बार वनाग्नि का सहारा लिया जाता है। उच्च क्षमता की विद्युत लाइनों एवं बांस के सूखे पेड़ों के आपस में टकराने के कारण भी जंगलों में आग लगने की घटनायें होती हैं। यदि धरती का तापमान 41 डिग्री सेंटिग्रेट से अधिक है तो विमान के ईधन के रिसाव के कारण भी वनाग्नि की घटनायें घटित होती हैं। विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटी दोहन करने वाले लोगों के द्वारा भी जंगलों में आग लगाई जाती है। शिकारीयों के द्वारा जानवरों का शिकार करने के लिये नदी के किनारे वाले वनक्षेत्र में रसायन का उपयोग करके आग लगाते हैं। यदि उसी दौरान विपरीत दिशा से तेज हवा चले तो आग बढ़ेगी और वनक्षेत्र को अपने चपेट में ले लेती है। वन विभाग के द्वारा वनों में वर्षा जल संग्रहण के लिये गडड्े खोदे जाते हैं। कई बार शिकारी इन गडड्ों में रसायन का प्रयोग करके भी जंगलों में आग लगाते हैं। लकड़ी के तस्करों द्वारा भी पेड़ों को सूखा दिखाने के लिये जंगलों में आग लगाई जाती है। 
दूसरी तरफ बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि वन अधिकार कानून के बावजूद भी लोगों को वनों पर कोई अधिकार प्राप्त नहीं हुये हैं। जिसके कारण आम जनसमुदाय वनों की आग बुझाने के प्रति उदासीन है। विकास के विभिन्न गतिविधियों जैसे सड़क, बांध एवं विभिन्न बुनियादी ढांचों के विकास में भी बढ़ी मात्रा में जंगलों का खात्मा होने के साथ वहां पर जल संग्रहण क्षेत्र को भी नुकसान पंहुचाया है। जिसके कारण नमी में कमी आने के कारण जंगल की जीवन रेखा भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। बताया गया कि राज्य में उसी दौरान राजनीतिक आग भड़कने के कारण जंगलों की आग की ओर मीडिया और अन्य जिम्मेदार घटकों का ध्यान बहुत देरी से गया, जिसके कारण आग को नियंत्रित करने में पूरी तरह से निराशा हाथ लगी। बैठब में आरोप लगाया गया कि कई बार पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये जंगल में कैम्प फायर जैसे आयोजनों से भी आग लग जाती है। सबसे प्रमुख कारण वन की सुरक्षा करने वाले हाथों और शिकारियों, तस्करों का आपसी गठजोड़ है जिसकी वजह से हर वर्ष इतनी आग लगती है। 
बैठक में सामूहिक चर्चा के दौरान यह बात उभर कर आई कि जीवन और जीविका के लिये लोग पीढ़ियों से जंगलों पर निर्भर हैं। स्थानीय लोगों के वन अधिकारों को जितना सीमित किया जाता है, वन संरक्षण और सुरक्षा के प्रति लोग उतने ही उदासीन होते हैं। प्राकृतिक प्रक्रिया के साथ वन उगता और बढ़ता है। मानवीय हस्तक्षेप इसको प्रभावित करता है। जब वनों को सजावटी एवं व्यावसायिक मकसद के लिये इस्तेमाल किया जाता है, और ऐसे पौधों को बढ़ावा दिया जाता है जिन्हें कोई भी जंगली जानवर नहीं खा सके। यह बात वन की महिमा को कम करता है। जन और जानवर के बिना वन का अस्तित्व भी नहीं है। वन पर आधारित समाजों के वन अधिकारों को समाप्त करने के बाद कोई भी ऐसी सामाजिक व्यवस्था नहीं बन पाई है जो वनों को आग से और अन्य नुकसानों से बचाने की जिम्मेदारी उठा सके। लोगों की वनों के प्रति रूचि कम हुई है, और वे वनों की सारी जिम्मेदारी वन विभाग की ही समझते हैं। वन विभाग सिर्फ वनों की देखभाल और व्यावसायिक प्रबन्धन कर सकता है। वनों के संरक्षण और सुरक्षा का भार उठाने के लिये वन विभाग सक्षम नहीं है। समुदाय की भागीदारी और रूचि के बिना जंगलों की सुरक्षा संभव नहीं है।

जनसमुदाय की अपेक्षा 

उत्तराखण्ड वनाग्नी विमर्श एवं हस्तक्षेप विषय को लेकर हुई दो दिवसीय बैठक में विभिन्न संगठनो से जुड़े कार्यकर्ताओं ने यह सुझाव प्रस्तुत किया कि जिस वन क्षेत्र में आग लगी है, उस वन क्षेत्र के लिये जिम्मेदार वनाधिकारियों के ऊपर जिम्मेदारी तय हो और उन पर कार्यवाही की जाये। इतने बड़े वन क्षेत्र में आग लगने के कारणों की सघन जांच की जाये। इसके लिये एक विषेश जांच दल का गठन करके जिसमें विषेशज्ञों, वैज्ञानिकों, नागर समाज और समुदाय की भागीदारी हो के द्वारा जांच करवाई जाये। यदि कोई अध्ययन इस सम्बन्ध में सरकार के द्वारा किया गया है, तो उसे सार्वजनिक किया जाये। वनाग्नि पर सरकार श्वेत पत्र जारी करे। वनाधिकार कानून के अन्तर्गत प्रत्येक ग्राम स्तर पर वन अधिकार समितियों का गठन एवं उन्हें सशक्त करने की प्रक्रिया शुरू एवं तेज की जाये। वनाग्नि के प्रबन्धन और रोकथाम के विषय को पाठ्यक्रम मंे सम्मिलित किया जाये। वनाग्नि प्रबन्धन में एन.सी.सी., एन.एस.एस. एवं स्काउट को भी शामिल किया जाये। इंश्योरेन्स ट्रिब्यूनल को सक्रिय करके धुआं कर देने वाले परिवारांे को वनाग्नि से होने वाले नुकसान का मुवाअजा दिया जाये। ग्रीन बोनस से मिलने वाली धनराशि पर ग्राम समुदाय का अधिकार तय किया जाये। रिलीफ कोर्ट का गठन और सक्रियकरण किया जाये। वनाग्नि को भी प्राकृतिक आपदा माना जाये।

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-ः आग से बुरी तरह से झुलसे वनो के प्रति पर्यावरण कार्यर्ता चिन्तित।
-ः प्रकृति के साथ विकास के नाम पर हो रहे अप्राकृतिक व्यवहार के कारण बढ रही है वनाग्नी जैसी घटना।
-ः लोगो को पढाया जाता है वनााधिकार के कानून, इसलिए भी बढ रही है वन दोहन की घटना।
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Friday, July 1, 2016

एक कैबिनेट मंत्री की पत्नी झाड़ू-पोंछा करके गुजार रही जिन्दगी


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प्रेम पंचोली
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कभी अपने देश के राजनेता लोगो को सामाजिक सुचिता का पाठ पढाये करते थे, अब राजनीति में ऊंची पंहुच के बल पर वही राजनेता उत्पीड़न को बढावा दे रहे हैं। यह वाकाया मौजूदा समय में उत्तराखण्ड और उत्तरप्रदेश से जुड़ा हुआ है। जो कानून की आंखो में धूल झोंककर जमीन से लेकर जोरू तक के शोषण के कारनामो को अंजाम दे रहा है। यह आरोप प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर सुमित्रा सैनी ने वर्तमान में उत्तरप्रदेश के कैबिनेट मंत्री साहब सिंह सैनी पर लगाये। उनका आरोप है कि श्री सैनी किसी पराय स्त्री के साथ रहकर उनके अधिकारो का हनन कर रहा है। जबकि उनके पास उनके साथ पत्नी के रूप में रहकर तीन बेटे भी है। इतनाभर ही नहीं न्यायालय ने बकायदा इस बावत गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया मगर श्री सैनी अदालत की भी मुखालाफत कर रहा है। 
मामला साहब सिंह सैनी से जुड़ा है जो हाल ही में देहरादून स्थित जमीन के खुर्द-बुर्द करने के आरोपो से सामने आया। बता दें कि श्री सैनी उत्तरप्रदेश में विधान परिषद के सदस्य है और कैबिनेट स्तर के मंत्री भी है। उन पर सिर्फ जमीन कब्जाने के आरोप ही नहीं है बल्कि अब उनकी कहानी ने एक नया मोड़ ले लिया है। श्री सैनी पर देहरादून निवासी सुमित्रा नाम की एक महिला ने यह आरोप लगाया कि वह साहब सिंह सैनी की पहली पत्नी है। जबकि साहब सिंह सैनी की मौजूदा समय में जो उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड में अकूत सम्पति है उस पर उनकी दूसरी पत्नी रीता बासुदेव का नाम अंकित है। सुमित्रा सैनी ने अपने छोटे पुत्र प्रदीप के साथ मिलकर पत्रकार वार्ता कर बताया कि उनका विवाह 1970 में हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार साहब सिंह सैनी से हुआ था, जिसके प्रमाण उनके पास मौजूद है। 1995 तक वे पति-पत्नी के रूप में साथ रहे, इस दौरान उनसे तीन पुत्र शुशील, सुधीर व प्रदीप पैदा हुए। इस बीच ससुराल पक्ष ने उन्हे अलग कर दिया। इन्ही दिनो श्री सैनी घर से कईयों दिनों तक बाहर रहने लगा। चूंकि उन्हे लगा कि श्री सैनी कांग्रेस पार्टी से जुड़ा है तो राजनीतिक कार्यो से वे घर-परिवार को समय नहीं दे पा रहे हों। ऐसा विश्वास सुमित्रा सैनी ने साहब सिंह सैनी पर किया। पत्रकारो को अपनी आपबीती बताती है कि इस अन्तराल में उसे परिवार व बच्चो के खर्चो की भी समस्या होने लगी। यही वजह है कि वे वापस अपने माईके आ गयी। यहीं पर रहकर अपने तीनों बच्चो का लालन-पालन करने लगी। उन्होने कई बार साहब सिंह सैनी को अपने व बच्चो के खर्चो बावत मांग की, परन्तु उल्टी धमकी ही मिली। साल 2013 में सुमित्रा सैनी ने देहरादून न्यायालय में वाद दायर करके गुहार लगाई कि उसे साहब सिंह सैनी से वे सभी अधिकार मिले जो हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार एक पत्नी को मिलते है। न्यायालय ने भी श्री सैनी को गिरफ्तारी वारंट से लेकर सुमित्रा और साहब सिंह सैनी से हुए बच्चो का भी डीएनए टेस्ट करवाया। मगर साहब सिंह सैनी है जो न्यायालय को भी गुमराह कर रहा है, जैसा की सुमित्रा सैनी ने पत्रकार वार्ता दौरान तमाम दस्तावेज प्रस्तुत करके बताया। सुमित्रा सैनी ने यह भी आरोप लगाया कि साहब सिंह सैनी व रीता बासुदेव ने इन दिनों कई मर्तवा उन्हे रू॰ 14 लाख देने की बात कही कि वे साहब सिंह सैनी से तलाक ले ले। सुमित्रा ने पत्रकारो को बताया कि वह तलाक नहीं चाहती वह तो वे उन अधिकरो के लिए न्यायालय की शरण में है जो एक पत्नी को मिलने चाहिए। वे यह भी मांग कर ही है कि साहब सिंह सैनी की सम्पूर्ण सम्पति की सीबीआई जांच होनी चाहिए। जिसके लिए सुमित्रा ने उत्तराखण्ड और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री व राज्यपाल को पत्र लिखा है। उन्होने बहुत ऐसे दस्तावेज बताये जिन पर रीता बासुदेव को साहब सिंह सैनी ने अपनी पत्नी दर्शाया है। उनका यह भी आरोप है कि उनके पास वे सभी दस्तावेज है जो विवाहित परिवार के पास होते हैं। उन्होने विवाह के दौरान के पत्र भी पत्रकारो को बताया कि साहब सिंह सैनी किस तरह उन्हे पत्नी के रूप में पत्र लिखते थे। सुमित्रा सैनी ने पुलिस के रवैये पर भी सवाल खड़े किये, बताया कि जब केहरी गांव की एक महिला ने साहब सिंह सैनी पर बदसलूकी का मुकदमा दर्ज किया था तो साहब सिंह सैनी ने अपनी राजनीति का रूतबा दिखाकर उल्टे दो पुलिस कर्मीयों को बंधक बना डाला। यही नहीं वर्तमान में देहरादून कैंट बोर्ड के सी॰ओ॰ सुब्रत पाल के साथ मिलकर साहब सिंह सैनी देहरादून में जमीनों को कब्जाने का काम कर रहा है। 
जख्म को गहरा करती सुमित्रा की कहानी 
मोहब्बेवाला स्थित धारावाली गांव निवासी सुमित्रा सैनी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। 25 वर्ष तक साहब सिंह सैनी की पत्नी के रूप में सुमित्रा सैनी ने वे सभी इच्छायें पूरी की जो एक पति को चाहिए। उसके दुख-दर्द ही नहीं उसकी पढाई में भी सुमित्रा सैनी ने अपने पिता के सहयोग से हाथ बढाया। उसे क्या मालूम था कि साहब सिंह सैनी किसी दिन राजनीतिक ताकत बनकर उभरेगा और उसे व उसके बच्चो को घर से बाहर का रास्ता दिखा देगा। यही नहीं किसी पराय स्त्री को अपनी पत्नी बताकर समाज और कानून की आंखो में पिछले 20 वर्षो से धूल झोंकता रहा। बेवश सुमित्रा तत्काल क्या करती, तीन बच्चो सहित अपना भार अपने माईको वालो पर नही डालना चाहती थी। सो वह मसूरी रोड़ पर स्थित कोठालगेट के पास शिव मंदिर के शिवरत्न केन्द्र में झाड़ू-पोंछा का काम करने लगी। कई वर्षो तक वे शिवरत्नकेन्द्र में झाड़ू-पोंछा करके अपनी व बच्चों का लालन-पालन कर पाई। अब उनके बच्चे भी धियाडी़-मजदूरी करके अपनी दिनचर्या को आगे बढा रहे हैं।
विवादो से नाता है साहब सिंह सैनी का
साहब सिंह सैनी इधर देहरादून के केहरी गांव में महिलाओं के साथ बदसलूकी करते पाया गया, यह सूचना पुलिस तक पंहुची, तो पुलिस उनकी राजनीतिक रसूक देखकर चुप हो गयी। उधर उत्तरप्रदेश के साहरनपुर में साहब सिंह सैनी पर कई मुकदमें दर्ज हैं। अब सुमित्रा सैनी ने अपने वे सभी अधिकारों की सुरक्षा के लिए देहरादून न्यायालय में 494 धारा के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज किया हुआ है।
कौन है साहब सिंह सैनी
वर्तमान में उत्तरप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री। सुमित्रा और रीता का पति। साहरनपुर और देहरादून में जमीन और महिला उत्पीड़न के मामले पुलिस के पास दर्ज। पत्नी सुमित्रा को छोड़कर रीता बासुदेव से चोरी-छुपे शादी रचाने का आरोप। पहले कांग्रेस में ऊंची पंहुच, अब समाजवादी पार्टी का बफादार।

हालात ये देहरादून: बिन पानी सब सून

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प्रेम पंचोली
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(लेखक एनएफआई के फैलो व मान्यताप्राप्त प्रत्रकार हैं)
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कभी देहरादून को अंग्रेज लंदन की तर्ज पर विकसित करना चाहते थे इसलिए कि देहरादून का सुहावना मौसम खुशगवार था। यहां कभी भी गर्मी का एहसास नहीं होता था। स्पष्ट है कि देहरादून में ‘‘जल की मात्रा’’ इतनी थी कि कभी भी मौसम गर्म होने तक नहीं पंहुच पाता था। इसलिए देहरादून की सबसे बड़ी नहरें इष्ट व वैष्ट कैनाल लोगो के हलक ही नहीं अपितु इन नहरों के पानी से ‘‘बासमती और लीची’’ की महक देश-दुनिया को अपने ओर आकृषित करती थी। हैं न देहरादून के पानी का कमाल। लेकिन जनबा अब तो सिचाई तो दून लोगो के हलक सिंचित हो जाये तो गनीमत।
ज्ञात हो कि पिछले 15 वर्षो में देहरादून का ही पर्यावरण बदल गया है, क्योंकि देहरादून उत्तराखण्ड की जो अस्थाई राजधानी बन गयी। मतलब साफ है कि राजधानी में जनसंख्या का घनत्व बढना और कृषि की जोत का कम होना ही पर्यावरण अंसन्तुलन का कारण बनता ही जा रहा है, जिसका सबसे बड़ा असर वर्तमान में पीने के पानी पर पड़ रहा है। हालात इस कदर है कि जहां खेत होने थे वहां बड़ी-बड़ी इमारते उग आई है, जहां पानी की प्राकृतिक जल धारायें बहती थी वहां पक्की सड़के बन गयी है। लोगो का दबाव देहरादून पर बड़ी मात्रा में बढ रहा है उसी तरह पानी की मात्रा भी बड़ी तेजी से घट रही है। हालात इस कदर है कि पानी के रिचार्ज के लिए कोई योजना नहीं बनायी जा रही है।
बतातें चलें कि देहरादून में वर्तमान समय में 200 एमएलडी पानी की आवश्यकता है, परन्तु प्रकृतिक जल स्रोतों के सूखने के कारण वर्तमान में यहां 172 एमएलडी पानी ही उपलब्ध हो पा रहा है। दूसरी ओर पहाड़ी क्षेत्रो में खेती का कार्य पलायन के चलते बन्द हो रहा है। फलस्वरूप इसके पानी जमीन के भीतर सर-सब्ज नहीं हो पा रहा है इसलिए बरसात का पानी ऊपरी सतह से सीधा बहकर चला जाता है। यह भी वजह मानी जा रही है कि प्राकृतिक जल स्रोत रिचार्ज होने की स्थिति नाजुक बनती ही जा रही है। उल्लेखनीय हो कि अस्थाई राजधानी देहरादून में सिर्फ व सिर्फ भूजल का दोहन ही हो रहा है। वनस्पत की भू-जल रिचार्ज पर अब तक कोई कार्य नहीं हो रहा है। उधर केन्द्रीय जल बोर्ड ने वर्ष 2002 से 2012 के बीच का देहरादून के आस-पास के 17 स्थानो पर एक अध्यन करवाया। अध्यन में पाया गया कि अकेले राजधानी देहरादून में भू-जल आठ मीटर नीचे चला गया है। जबकि जल संस्थान प्रतिदिन 19 लाख 63 हजार 200 किलो लीटर भूजल (एक अरब 96 करोड़ 32 लाख लीटर) 409 ट्यूबेलो के माध्यम से पेयजल आपूर्ती हेतु जनपद के अलग-अलग स्थानो से निकालता है। स्पष्ट नजर आ रहा है कि राजधानी में पेयजल की जितनी भी योजना बन रही है वे सभी भूजल के दोहन के लिए बन रही है। इस तरह एक तरफ भूजल पर दिनो-दिन दबाव बढ रहा है तो दूसरी तरफ उनके पुनर्भरण के लिए कोई योजना अब तक सामने नहीं आ पायी है। लोग मानसून का भला मानते हैं कि जो 1.26 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल रिचार्ज कर जाता है। बिडम्बना यह है कि जिस तरह से राजधानी में खेती की जमीन कंक्रीट में तब्दील हो रही है, पानी भू-सतह के ऊपर से सीधे तेजी से बहकर चला जाता है उससे भूजल रिचार्ज में भी तेजी से कमी आ रही है।
राजधानी बनने के बाद देहरादून में प्रतिदिन कोई न कोई एक परिवार स्थाई रूप से निवास करने के लिए आ रहा है। देहरादून की आबादी पिछले 15 वर्षो से 40 फीसदी के दर से बढी है। इसी तरह देहरादून में बहुमंजिली फ्लैट जैसी संस्कृति भी बड़ी तेजी से पनप रही है। इन सभी की मूल आवश्यकता पानी ही है। पानी की आपूर्ती के लिए लोग सबसे त्वरित तरीका भू-जल को मान रहे है। जितने भवन और फ्लैट निमार्ण हो रहे है वे पानी की आपूर्ती के लिए सर्वाधिक भूजल का ही उपयोग कर रहे हैं। ताज्जुब हो कि देहरादून में 180 ग्रुप हाउसिंग के पास है। मगर अब तक भूजल दोहन की कोई अनुमति नही ली गयी। सिर्फ सेलाकुई स्थित आर्मी वेलफेयर हाउसिंग आॅर्गेनाइजेशन एवं मसूरी रोड़ पर बायोटेक इण्डिया लि॰ ने एक होटल निर्माण के लिए भूजल बोर्ड से अनुमति ली है। इसके अलावा 11 फैक्ट्रियों को छोड़कर किसी के पास भी केन्द्रीय भूजल बोर्ड की अनुमति नहीं है।
कुल मिलाकर देहरादून की लाईफ लाईन कही जाने वाली ईष्ट व वैष्ट कैनाल को पाट दिया गया। धर्मपुर, माजरा जैसी कृषि भूमि व डालनवाला जैसे अनके क्षेत्र जो लीची के लिए दुनिया में मशहूर थे की जगह अब कंक्रीट के जंगल ने ले ली है। भू-जल का दोहन बड़ी तेजी से हो रहा है परन्तु पुनर्भरण के लिए अब तक कोई कारगर योजना सामने नहीं आ पाई है। जिस तरह से राजधानी देहरादून में जनसंख्या का दबाव बढ रहा है उस तरह से जल संरक्षण की नीति सामने नहीं आ पा रही है। आने वाले दिनो में देहरादून की पानी की समस्या लोगो के लिए खतरे की घण्टी बनने वाली है।
सैकड़ो हैण्डपम्प खराब
गौरतलब हो कि देहरादून जनपद में 300 ऐसे हैण्डपम्प हैं या तो वे सूख चुके हैं या वे ऐसा पानी उगल रहे हैं जिससे हलक तर करना तो दूर घरेलू कार्य तक नहीं किया जाता। इन हैण्डपम्पो से रोजाना मिलने वाला 21 लाख लीटर पानी धरती के गर्भ में ‘‘चोक’’ होकर रह गया है। इतने पानी से रोजाना चार लाख लोगो की पेयजल आपूर्ती हो सकती थी। एक ओर पेयजल निगम के आंकड़े बताते हैं कि अकेले देहरादून में 2500 हैण्डपम्प है जिनमें सिर्फ 45 ही खराब है। दूसरी ओर विभागीय सूत्र बताते हैं कि शहर और ग्रामीण क्षेत्रो को मिलाकर जनपद में 300 हैण्ड पम्प खराब हो चुके है। वैसे भी एक हैण्डपम्प लगाने में डेढ से ढाई लाख रू॰ खर्च आता है। विभागीय अफसर बताते हैं कि हैण्डपम्प मरम्मत को सिर्फ 40 लाख रूपये सालाना मिलते हैं जो हैण्डपम्पो के रख-रखाव के लिए उपयुक्त नहीं है।
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राज्य में पिछले 10 वर्षो में 221 प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं। यह आंकड़ा हाल ही में जल संस्थान ने एक अध्यन के मार्फत बताया है। अकेले देहरादून जनपद में 13 जल स्रोत सूख चुके हैं। हालात यह है कि पहाड़ी क्षेत्रों और देश के कोन-कोने से देहरादून में बसने वालो की संख्या में भारी हिजाफा हो रहा है।
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केन्द्रीय भूजल बोर्ड के क्षेत्रीय प्रमुख अनुराग खन्ना कहते हैं कि यदि भू-जल ने खतरे के निशान को पार कर लिया तो उसके पुनर्भरण के लिए एक सदी का समय लग जाता है। राज्य सरकार को भू-जल के रिचार्ज करने के प्रयाास करने चाहिए।

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...