Saturday, June 30, 2018

मामला-ए-शिक्षिका: निलम्बन, गिरफ्तार और डैमेज कंट्रोल

मामला-ए-शिक्षिका: निलम्बन, गिरफ्तार और डैमेज कंट्रोल

प्रेम पंचोली

हालांकि शिक्षिका उतरा पन्त बहुगुणा ने मुख्यमंत्री के दरबार में जाकर हंगामा किया। पर हंगामा करने का इरादा क्या था। प्रश्न इस बात का है कि जब उक्त शिक्षिका अपनी बात को रख रही थी उसी वक्त मुख्यमंत्री के दरबार में पुकार लगाने वाले व्यक्ति ने एक ऐसे व्यक्ति का नाम पुकारा जो भाजपा के बहुत ही नामी गिरामी व्यक्ति हैं। इस पुकार में शिक्षिका को लगा कि उसकी आवाज कहीं दब सी गई है। क्योंकि जिस जनपद के गांव में शिक्षिका तैनात है उसी क्षेत्र से भाजपा के उस व्यक्ति का नाम मुख्यमंत्री के दरबार में पूकारा गया। अच्छा होता कि भाजपा का वह शख्श उतरा पन्त बहुगुणा के समर्थन में बात रखता कि पहले उक्त शिक्षिका को सुना जाये। बजाय वह शख्श अपने आवेदन को आगे खिसकाने लगा। इसी दौरान मुख्यमंत्री और शिक्षिका दोनो आग बबूल हो गये।

उल्लेखनीय यह है कि मुख्यमंत्री का सवाल शिक्षिका से था कि क्या शिक्षिका ने नियुक्ति वक्त कोई अन्य शपथ पत्र दाखिल किया था कि वे सुगम में रहना चाहती है। इस सवाल का जबाव इतनाभर बनता है कि वह 25 वर्षो से दुर्गम में तैनात है। वर्तमान में उनके पति की मृत्यु हो चुकी है और पारिवारिक समस्या उनके सामने खड़ी है। शिक्षिका का कसूर मुख्यमंत्री के सवाल के बाद खड़ा होता है। यह माना जा रहा है कि शिक्षिका अपने विभाग के सामने सालो से गुहार लगा चुकी है और उसकी सुनाई नहीं हो रही है। शिक्षिका के पास अन्तिम रास्ता मुख्यमंत्री से अपनी दासतां को सुनाना था। पर वहां तो मुख्यमंत्री ने शिक्षिका की समस्या का समाधान नही किया बल्कि अपने सवालो से और समस्या खड़ी कर दी। यही वजह है कि शिक्षिका के पास जबाव नहीं था और मुख्यमंत्री के पास समाधान नहीं था। अर्थात जब सूबे के मुखिया के पास समाधान ना हो तो उस राज्य की व्यवस्था कैसी चल रही होगी यह उतरा का उतर ही बता रहा है।

अब इधर तरह-तरह के राजनीतिक कयास लगाये जा रहे है। लोग चर्चाओं का विषय बना रहे हैं कि जनता दरबार में हंगामा करने वाली शिक्षिका उत्तरा पंत बहुगुणा मुख्यमंत्री पद से त्रिवेंद्र सिंह रावत की विदाई की वजह बन सकती हैं। पूरे देश में इस प्रकरण की भत्र्सना हो रही है और मुख्यमंत्री एवं उक्त शिक्षिका के व्यवहार को लेकर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। परन्तु इस मामले में भाजपा की खासी छीछालेदर हुई है। जिस कारण भाजपा हाईकमान भी असहज हो उठा है। दूसरी ओर नेशनल मीडिया में एक बार फिर से सीएम त्रिवेंद्र रावत की विदाई की सुगबुगाहट तेज हो गई है।

राजनीतिक बौखलाहट

बताया जा रहा है कि कांग्रेस शासनकाल में भी उक्त शिक्षिका को सेवा समाप्ति का नोटिस दिया गया था। इधर राज्यभर में कांग्रेस द्वारा किए गए प्रदर्शन को भाजपा ने राजनीतिक बौखलाहट बताया है। भाजपा प्रदेश मीडिया प्रमुख डा0 देवेंद्र भसीन ने कहा कि शिक्षिका प्रकरण को लेकर कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री का पुतला जलाया जाना निंदनीय है। उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में भाजपा की सरकार जिस तरह श्रेष्ठ कार्य कर रही है उससे कांग्रेस परेशान है। भ्रष्टाचार के खिलाफ की जा रही कार्यवाही से भी कांग्रेस नेता चिंता में हैं। उन्होंने कहा निलम्बित शिक्षिका को स्कूल से लगातार अनुपस्थित रहने पर कांग्रेस शासन के समय 24 सितम्बर 2016 को सेवा समाप्ति का नोटिस दिया गया था। डा॰ भसीन ने कहा कि मामला नियम व प्रशासनिक है न कि महिला अपमान का। उन्होंने कहा कि जिस तरह कांग्रेस इस मामले पर सक्रिय हो गई है और सोशल मीडिया पर शिक्षिका की 27 जून की एक पोस्ट सामने आई है उससे इस प्रकरण में साजिश की सम्भावना भी सामने आ रही है।

तबादला बनाम दुर्गम

सुगभ और दुर्गम जैसे शब्द शिक्षक व शिक्षा विभाग में हमेशा चर्चाओं में रहे हैं। शिक्षा विभाग में ऐसे शिक्षक भी हैं जो दुर्गम में बच्चों के भविष्य संवारने में लगे हैं। उन्हे सरकारी स्तर पर कभी भी तब्बजो नहीं दी गई है। इधर राजनीतिक हालातो पर गौर करेंगे तो राजनीति के मार्फत सत्ता की लोलुपता में चकनाचूर राजनेता अपनी-अपनी पत्नीयों को कैसे सुगम में रखकर खुद की सेवामें तैनात करते है, उसकी बानगीभर है। गौरतलब हो कि मौजूदा मुख्यमंत्री की पत्नी 22 सालों से सुगम में सेवा दे रही हैं। वित्त मंत्री प्रकाश पंत की पत्नी देहरादून के राजपुर रोड़ स्थित जीआईसी में तैनात है। टिहरी से बीजेपी के विधायक धन सिंह नेगी की पत्नी अनिता नेगी भी देहरादून के राजपुर रोड़ स्थित जीजीआई में 2009 से मौजूद हैं। प्रताप नगर से कांग्रेस के पूर्व विधायक विक्रम सिंह नेगी की पत्नी सुशीला नेगी देहरादून के मेंहूवाला इंटर काॅलेज में तैनात हैं, जिनका तबादला टिहरी जिले से कांग्रेस के शासन काल में 2014 में देहरादून हो गया था। अब जब उत्तराखंड के मुख्यमंमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और भाजपा कांग्रेस के विधायकों की पत्नियां सुगम में सेवाएं दे रही हैं तो भला शिक्षा मंत्री रहते मंत्री प्रसाद नैथानी कैसे अपने रिश्तेदरों को देहरादून न लाते। मंत्री प्रसाद नैथानी के शाले सुरेंद्र डंगवाल देहरादून डायट में कई सालों से तैनात हैं इधर मंत्री प्रसाद नैथानी के दमाद प्रेमनगर के पास जमाई कोटला इंटर काॅलेज स्कूल में तैनात हैं। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष ज्योति प्रसाद गैरोला की पत्नी भी देहरादून स्थित शिक्षा निदेशालय में पिछले एक साल पहले एटैचमेंट पर पहुंच गई हैं। इस तरह सांसद भी पीछे क्यों रहे। उच्च शिक्षा विभाग में तैनात उत्तराखंड से भाजपा के राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी की पत्नी तो हल्द्वानी डिग्री काॅलेज से देश की राजधानी दिल्ली में स्थानीय आयुक्त कार्यालय में कुछ साल पहले एटैचमेंट पर पहुंच गई।

बता दें कि राजनीति में आने की वजह सभी नेतागण जनता की सेवा करना बताते हैं, लेकिन अपने करीबियों को कैसे राजनीतिक पहुंच के चलते सभी नेता सुख सुविधा वाली जगह पर तैनाती दिलाना चाहते हैं यह उत्तराखंड राज्य ही देशभर में उदाहरण बन सकता है। ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि जिसकी राजनैतिक पहुंच है उसके अपने ही सुख सुविधा वाली जगह नौकरी कर सकते हैं और जिनकी पहुंच राजनीति में शून्य के बराबर है वह उत्तराखंड के दुर्गम क्षेत्रों में सेवाएं देते रहेंगे। यह बात तब सामने आई जब मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने शिक्षिका उतरा पन्त बहुगुणा को फटकार लगाई और गिरफ्तार तथा निलम्बन के आदेश दिये। जो प्रदेश के प्रथम व्यक्ति के व्यक्तित्व पर सवाल खड़ा करता है।

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Now there are various types of political concepts being implemented. People are making a topic of discussion that Uttartar Pant Bahuguna, a teacher in the public court, may be the reason for the departure of the Chief Minister by the Chief Minister.

Friday, June 29, 2018

आकाशवाणी के रंगा रंग कार्यक्रम

आकाशवाणी का पहला स्थापना दिवस रंगा रंग कार्यक्रमो के साथ संपन्न




आकाशवाणी केंद्र देहरादून का पहला स्थापना दिवस 29 JUN KO  देहरादून KE टॉउन हाल में, प्रसिद्ध लोक गायक प्रीतम भरतवाण ने शुभ संध्या जागर गाकर यानी धरती को प्रणाम करते हुए समारोह को रसीला बना डाला। ऐसी दौरान जौनसार के उभरते लोक गायक राहुल वर्मा ने जौनसारी हारूल की शानदार प्रस्तुति दी, जबकि समारोह में युवा ग़ज़ल गायक हिमांशु दरमोडा ने मौजूद दर्शको के बीच समा बांध दिया। यही नहीं आकशवाणी के सितार वादक रोबिन कर्मकार के सितार वादन ने समारोह को संगीतमय बना डाला।
कार्य्रकम का शुभारंभ आकाशवाणी के सेवानिवृत्त निदेशक दीपक बनर्जी, पद्मश्री बसंती बिष्ट, शायर नदीम बरन और आकाशवाणी केंद्र के केंद्राध्यक्ष विभूति भूषण भट्ट ने दीप प्रज्वलित कर किया।

इस मौके पर केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी अनिल भारती, प्रसारण अधिकारी अनिल दत्त शर्मा, संकल्प मिश्रा, सुनील कार्की, अधिशाषी अभियंता डी सी शर्मा सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन विनय ध्यानी और अदिति गैरोला ने संयुक्त रूप से किया।

Saturday, June 23, 2018

अनसुलझे सवाल के बीच झूलती सरकारे


कई सवाल खड़े है पत्रकारों के, राज्य व्यवस्था चुप


पिथौरागढ़/नैनीताल। उत्‍तराखण्‍ड के मीडियाकर्मियों की प्रमुख संस्‍था नेशनलिस्‍ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट्स ने राज्‍य के मीडियाकर्मियों की समस्‍याओं, मांगों और सुझावों पर केन्द्रित अपने संवाद एवं समन्‍वयकार्यक्रम में कुमाऊँ मंडल के विभिन्‍न जनपदों में पत्रकारों से उनकी विभिन्‍न समस्‍याओं, मांगों और सुझावों पर संवाद किया। इस संवाद कार्यक्रम का उद्देश्‍य पत्रकारों से मिले सुझावों के आधार पर एक विस्‍तृत रिपोर्ट केन्‍द्र और सरकार को सौंप कर मीडियाकर्मियों के हित में ठोस कार्यवाही करने की मांग करना है।
सोमवार 18 जून  से आरंभ हुये इस अभियान के अंतर्गत जसपुर, काशीपुर, रामनगर, हल्‍द्वानी, भीमताल, अल्‍मोड़ा, सोमेश्‍वर, कौसानी, गरूड़, बागेश्‍वर, थल, पिथौरागढ़, लोहाघाट, धारी आदि में नेशनलिस्‍ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट्स के प्रदेश अध्‍यक्ष त्रिलोक चन्‍द्र भट्ट के नेतृत्‍व में प्रदेश महासचिव, सुरेश पाठक, संगठन मंत्री श्रवण कुमार कश्‍यप तथा प्रचार मंत्री डॉ. मदनमोहन पाठक ने यूनियन के सदस्‍यों सहित अन्‍य पत्रकारों के साथ उनकी पत्रकारिता संबंधी समस्‍याओं, मांगों और सुझावों पर संवाद किया। जिन नगरों और कस्‍बों में मीडिया से जुड़े लोग संगठित नहीं थे उनको संगठन की जरूरत का मकसद समझाना, संगठनात्‍मक सशक्‍तता के लाभ, तथा जहॉं यूनियन की इकाइयों का गठन नहीं था वहॉं इकाईयों के गठन को प्राथमिकता देना भी इस संवाद एवं समन्‍वय अभियान का प्रमुख उद्देश्‍य था।
संवाद एवं समन्‍वय अभियान की शुरूआत जसपुर से जुई जहॉं में वरि. पत्रकार शहजाद सिद्दि‍की एवं पंकज कुमार ने समाचार कवरेज के दौरान आने वाली समस्‍याओंको उठाने के साथ पत्रकारों की एकजुटता के लिये निरंतर प्रयास रखने जारी रखने का आग्रह किया। काशीपुर में जितेन्‍द्र सक्‍सेना, सुनील श्रीवास्‍तव, रिजवान अहसन ने सरकार और प्रशासन द्वारा पत्रकारों की समस्‍याओं को नजरअन्‍दाज करने का आरोप लगाते हुये अपने सुझाव दिये। रामनगर के वरि. पत्रकार शमीम दुर्रानी ने नेशनलिस्‍ट यूनियन द्वारा पत्रकारों के हित में किये जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुये अपने शहर में यूनियन को एक मजबूत ताकत बनाने का आश्‍वासन दिया।
हल्‍द्वानी बैठक में श्रीमती दया जोशी, सैयद नावेद, गिरीश जोशी आदि ने स्‍वस्‍थ एवं स्‍वस्‍थ परंपरा के साथ संगनात्‍मक कार्य करने पर यूनियन की सराहना की। भीमताल में पत्रकार हरीश पाण्‍डे, पवन प्रकाश पाण्‍डे, अल्‍मोड़ा में श्रीमती कंचना तिवारी,  प्रकाश पाण्‍डे, देवेन्‍द्र सिंह बिष्‍ट, डी.एस. सिजवाली आदि ने लघु एवं मझोले समाचार पत्रों की समस्‍याओं पर चर्चा की। सोमेश्‍वर में शंकर गोस्‍वामी, कौसानी में कुशालसिंह रावत, थल में अर्जुन सिंह रावत ने पत्रकारिता के प्रति बदलते सामाजिक नजरिये का उल्‍लेख करते हुये पत्रकारिता पेशे में सुचिता की आवश्‍यकता जताई।
गरूड़-बैजनाथ में अखिल जोशी ने जोखिमपूर्ण पत्रकारिता में पत्रकारों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया। बागेश्‍वर में जगदीश चन्‍द्र उपाध्‍याय, नीरज पाण्‍डे, केशव भट्ट ने संगठन की इकाई को शीघ्र सशक्‍कता से साथ सक्रिय करने का आश्‍वासन दिया। पि‍थौरागढ़ में डॉ. दिनेश जोशी, ललित जोशी, ललित पंत, बृजेश तिवारी, पंकज पाठक, प्रकाश पाण्‍डे, गौरव बिष्‍ट आदि ने पत्रकारों की समस्‍याओं पर अपने सुझाव दिये। चम्‍पावत जनपद में हेम बहुगुणा, जगदीश चन्‍द्र राय, नवल किशोर जोशी आदि ने एकजुटता के साथ संगनात्‍मक कार्य करने और जनहित जुड़े मुद्दों को मजबूती के साथ उठाने का सुझाव दिया। धारी में प्रदीप कुमार ने संकट व जरूरत के समय संगठन साथ देने के लिये आभार व्‍यक्‍त किया।
18 जून से सप्‍ताहभर तक चले संवाद एवं समन्‍वय कार्यक्रम के बाद गढ़वाल मंडल के लिये इस अभियान का दूसरा चरण अगले माह कोटद्वार से आरंभ होगा। नेशनलिस्‍ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट्स इस कार्यक्रम के तहत पत्रकारों की मिली जानकारियों, उसकी समस्‍याओं और सुझावों के आधार पर एक विस्‍तृत रिपोर्ट तैयार कर राज्‍य और केन्‍द्र सरकार को सौंप कर मीडियाकर्मियों के हित में ठोस कार्यवाही करने की मांग करेगा। नेशनलिस्‍ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट्स के इस अभियान की राज्‍यभर के पत्रकारों ने सराहना की है।

Thursday, June 21, 2018

योग दिवस,प्रधानमंत्री और पहाड़


योग दिवस,प्रधानमंत्री और पहाड़

 Indresh Maikhuri



योग दिवस के मौके पर प्रधानमन्त्री जी के देहरादून आने की खबर के पीछे-पीछे यह खबर भी आई कि एफ.आर.आई. में सांप और बंदर पकड़ने वालों का भी इंतजाम किया गया है.यानि प्रधानमंत्री जी की सुरक्षा में एस.पी.जी.के कमांडो और पुलिस,फ़ौज-फाटे के अलावा सपेरे और बन्दर पकड़ने वाले भी रहेंगे. कुछ साल पहले अमेरिका में बोलते हुए प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि पहले भारत को लोग सपेरों का देश समझते थे.उनका राज आने के बाद ऐसा नहीं रह गया है. यह रोचक है कि उन्हीं प्रधानमंत्री जी की सुरक्षा में ब्लैक कैट कमांडो के अलावा सपेरा और बंदर पकड़ने वाला भी तैनात रहेगा.वैसे उत्तराखंड है भी बड़े चमत्कारों का प्रदेश.अभी दो दिन पहले खबर आई थी कि जंगलात के महकमे में अफसरों के लिए देहरादून में आवंटित आलीशान कोठी में एक सपेरा रहता है.सपेरा वन विभाग में संविदा पर है. इस तरह सपेरों की निरंतर तरक्की हो रही है.अफसरों वाली कोठी से प्रधानमंत्री की सुरक्षा तक!

बहरहाल उक्त कार्यक्रम के लिए सपेरे एवं बंदर पकड़ने वाले का नियुक्त होना ठीक ही है.वरना पता चला कि विश्वगुरु बनने जाते देश के प्रधानमन्त्री का कार्यक्रम बंदर और साँपों ने उजाड़ दिया तो दुनिया क्या कहेगी ! योग चल रहा हो और अचानक सांप निकल आये या बंदर धमाचौकड़ी मचाना शुरू कर दे तो सारा योग धरा रह जाएगा.अंदर की सांस वहीँ ठहर जाएगी और बाहर की सांस वाली हवा तो वैसे ही निकल जाएगी.

बहरहाल,प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए सांप,बंदर पकड़ने वालों के इंतजाम से यह भी ख्याल आया कि यह इंतजाम केवल एक दिन के लिए क्यूँ है?आखिर पहाड़ में तो बंदर भी एक तरह के आतंक का पर्याय बन गये हैं.और सिर्फ बन्दर ही नहीं, बाघ,भालू,सूअर आदि जंगली जानवरों का हमला निरंतर ही पहाड़ की खेती,मनुष्य और पालतू पशुओं पर है.पहाड़ में जाइए तो किसी भी सुबह उठ कर देख सकते हैं कि पूरा खेत,जिसमें हाड़तोड़ मेहनत लगती है पर उपजता गुजारे लायक भी बमुश्किल ही है,उसे तो रात में जंगली सूअरों ने पूरी तरह से रौंद दिया है.कभी भी झुटपुटे में ही पता चलेगा कि गौशाला में गाय,भैंस,बैल या बकरी पर गुलदार ने हमला बोल दिया है.अँधेरा होते-होते किसी भी आंगन से बच्चे को गुलदार द्वारा उठा ले जाने और फिर उसका शव मिलने की खबरें,आये दिन सुनने में आती हैं.लेकिन उन्हें रोकने का कोई इंतजाम दिखाई नहीं देता.जंगल में घास लेने गयी महिला पर भालू ने हमला बोल दिया और वह बहादुरी से उससे मुकबला करती रही,यह खबर भी पहाड़ में गाहे-बगाहे सुनाई देती है.अखबारों में भालू से लड़ जाने वाली महिला के लहुलुहान चेहरे की तस्वीरें देखिये तो पता चलेगा कि उसके कारनामे के सामने बहादुरी कितना छोटा शब्द है.

पहाड़ में लोग जब अपने रोजमर्रा के जीवन के लिए ऐसी विकट जद्दोजहद में लगें हों तो उनके सामने कोई भी योग और योग दिवस फीका है.कभी लम्बे से पेड़ की चोटी पर एक पाँव हवा में और एक पैर पेड़ पर टिकाये,चारे के लिए पेड़ की टहनियां काटती अधेड़ उम्र की पहाड़ी महिला को देखिएगा.योग के सारे आसनों के ज्ञाताओं का भी कलेजा मुंह को न आ जाए तो कहियेगा ! तीखी पहाड़ी ढलान पर घास काटने के लिए झूलती हुई पहाड़ी महिला के सिर पर ऊपर से लुढकता हुआ पत्थर आकर लगता है.अगले 6-7 घंटे खून से लथपथ,वह जिन्दगी और मौत के बीच झूलती है और अंततः दम तोड़ देती है.किसी अस्पताल में डाक्टर नहीं मिलता तो तब योग तो उसके प्राण नहीं बचा सकता!

प्रधानमंत्री जी के कार्यक्रम में सांप,बंदर न घुसें,इसका इंतजाम तो ठीक है.पर पहाड़ में पहाड़ जैसी जिन्दगी जीते दुधमुहे बच्चों से लेकर अधेड़ उम्र की महिलाओं तक बाघ,भालू,सूअर,बंदर के आतंक से मुक्त हों,इसका इंतजाम भी कोई करेगा ? पहाड़ पर रहने वाले लोगों का जीवन बहुत ग्लैमरस भले ही न हो पर आखिरकार वह भी जीवन तो है ही !

Curtcy - [FB Wall ] Pradeep sati 

Monday, June 18, 2018

पेड़ों की छांव में कलरव



पेड़ों की छांव में कलरव


इन दिनों सुबह बुलबुल के चहकने से होती है। हर रोज सुबह चार बजे के आसपास वह जाग कर चहकने लगती है। दूसरे पेड़ पर बैठी कोई दूसरी साथिन उसे जवाब देती है और फिर दोनों मिल कर प्रभाती गाने लगती हैं। उसी बीच आसपास के किसी पेड़ के रैन बसेरे में सोई कोयल भी जाग जाती है और धीरे-धीरे कुहू की मधुर तान छेड़ कर उसे सप्तम सुर तक पहुंचा देती है। 

पौ फूटती है और सामने खड़े कुसिम के छायादार पेड़ की शाख पर रात गुजारने के बाद काक दम्पति का संवाद शुरू होता है। पिछली बार के दर्दनाक हादसे के बाद काक दम्पति ने इस बार अपना घोंसला हमारी रसोई की खिड़की के ऐन सामने बनाया है। हादसे के समय हमने उनकी मदद करने की कोशिश की थी। यह शायद उन्हें अच्छी तरह याद है, तभी हम पर भरोसा किया होगा और हमारी आंखों के सामने फिर नीड़ का निर्माण कर लिया। निर्माण के लिए सूखी, पतली, लंबी टहनी के टुकड़े भी बालकनी में रखी पानी की ट्रे में कुछ समय भिगो कर ले गए। शायद घोंसले में मोड़ कर लगाने के लिए। 
पिछली बार घोंसले के निर्माण के दिनों कोयल खूब कूकती रही और भूरी चितकबरी मां कोयल लुकते-छिपते-बचते कौवों के घोंसले तक पहुंचने की कोशिश करती रही, हालांकि वह बहुत कम दिखाई देती थी। हमारी नजरें उसे खोजती रहतीं। एक दिन पत्तों में छिपी ही थी कि सामने छत पर से कौवा चोंच से उस पर टूट पड़ा। वह जान बचा कर भाग निकली। फिर भी वह न जाने कब आकर काक दम्पति के घोंसले में अंडा दे गई। पता तब लगा, जब बच्चे बड़े होने लगे और कोयल का बच्चा पहले बड़ा हो गया। कौवा मां और पिता उसे प्यार से खिलाते। हमारी बालकनी में काक पानी में सूखी रोटी के टुकड़े भिगो कर अपने शिशुओं को खिलाने के लिए ले जाता। उनके अपने दो बच्चे बाद में बड़े हुए। कोयल के बच्चे पर काक दम्पति ने पूरा प्यार लुटाया। उसे सबसे पहले पंख सुखाना, डाल पर फुदकना और उड़ान भरना भी उन्होंने सिखाया। हम चकित थे कि वह बच्चा भाषा कौन-सी बोलेगा? कौवों की कांव-कांव या कोयल की कुहू-कुहू? वह केवल ‘कैं’, ‘कैं’ से काम चला रहा था। 
तभी वह हादसा हुआ। याद करके दिल भर आता है। अधिक बताना संभव नहीं है। एक दिन न जाने कहां से तीन बंदर आ गए। हर पेड़ का मुआयना करने लगे। काक-दम्पति का घोंसला मिला तो उसे नोंच डाला। हम भगाने के लिए चीखते ही रह गए। कोयल का बच्चा जान बचा कर उड़ गया। कौवे के नन्हें बच्चे जमीन पर आ गिरे। एक का पता ही नहीं लगा, दूसरे को बेटी लाई। उसे पानी पिलाया, मुलायम भोजन दिया। काक दम्पति ने भी बालकनी में आकर उसे देखा, जांचा। हम बचाने की पूरी कोशिश करते रहे लेकिन तीन दिन बाद वह नहीं रहा। बहुत दिनों तक हम खाली घोंसले के बाहर शाख पर बैठे दुखी काक माता-पिता को घंटों खामोश बैठे देखते रहे। कोई कांव-कांव नहीं। बीच-बीच में उनमें से एक की टीस भरी कराह सुनाई देती। वह जरूर मां रही होगी। काक पिता चोंच से उसकी गर्दन सहलाता। काफी समय तक काक दम्पति ने इसी तरह शोक मनाया। हम भी क्या करते? मन से हम भी उनके शोक में शामिल थे। 
लेकिन, यह तो दुनिया है। इसी तरह चलती रहती है। मौसम बदला, मंजर बदला। नई-नई चिड़ियां आती रहीं। पंद्रह वर्षों से रह रहे हैं हम द्वारका, दिल्ली के अपने शिव भोले अपार्टमेंट्स में। तब चारों ओर छोटे-छोटे पौधे थे। वे वर्ष-दर-वर्ष हमारे साथ ही बड़े हुए हैं। वट, कुसिम, अमलतास, शहतूत, नीम, हरसिंगार, जामुन, नींबू, अनार के पेड़ अब हरे-भरे हो गए हैं। हरियाली आई तो पंछी भी चले आए। पहले गौरेयां आईं। कई साल उन्होंने हमारी भीतर की बालकनी में अपना परिवार बढ़ाया। दिन भर चहचहाती रहतीं। लेकिन, 2010 के बाद वे अब तक नहीं लौटी हैं। न जाने कहां गईं। 
पेड़ घने हो गए तो हरियल, फाख्ता, बुलबुल, बड़ा बसंता, धनेश यानी ग्रे हार्न बिल, दर्जिन, सन बर्ड, मैना, बबूना यानी ह्वाइट आई आदि कई चिड़ियों ने घर बना कर परिवार बढ़ाया। वे अपने नन्हें छोटे साहबजादों और साहबजादियों को शिक्षा देने के लिए सामने पेड़ों पर आते रहे। हमारी बालकनी में पानी पीते रहे। बुलबुलें, बबूनाएं, मैनाएं, बसंता, सतभाई और कबूतर पानी की ट्रे में जम कर स्नान भी करने लगे। हमें पता था, वे पंखों की चिकनाई और धूल धो रहे हैं। 
जहां 2003 में आसपास कोई हरियाली नहीं थी, आज वहीं हरे-भरे पेड़ों की छांव में हम उन प्यारे पंछियों का कलरव सुन रहे हैं। इस साल हमारे इन पेड़ों पर कम से कम 25 प्रजातियों के पक्षी आए। जब तक हरियाली है, तब तक ये प्यारे पंछी हैं। तब तक हमारे लिए हमारी सांसें तैयार करने वाले ये हमारे हरे-भरे पेड़ हैं। और, अब तो 60 फ्लैटों की हमारी छत पर द्वारकानगरी में पहली बार 100 किलोवाट के ग्रिड कनैक्टेड सौर पैनल भी लग चुके हैं। अब सूरज हमारे लिए बिजली बना रहा है। 

जब तक सूरज का यह वरदहस्त रहेगा, पेड़ों की छांव रहेगी और इनमें पंछियों का कलरव सुनाई देगा, पता है, तब तक हमें मां प्रकृति का भी प्यार मिलेगा। काश, इस शहर की सभी सोसाइटियां ऐसी ही हों। तब इस महानगर दिल्ली में साल भर पंछी आते-चहचहाते रहेंगे।

साभार - देवेन मेवाड़ी की फेसबुक वाल से 

समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...