Friday, January 4, 2013

लेखन की नयी परम्परा कायम की है आचार्य डबराल ने



इस देश में राजनेताओं की मृत्यु के पश्चात राजससत्ता में बैठे नुमाईन्दे उनके जन्म दिन आदि पर कई तरह के राग अलापने में चूक नहीं करते है। लेकिन राजनीति से दूर रहकर समाज को आईना दिखाने वाले रचनात्मक लोगो की इस व्यवस्था मे कम ही उपस्थिति सत्ता  के प्रतिष्ठानो में नजर आती है। यहां ऐसे ही शख्स की बात की जा रही है जिन्होने न सिर्फ लेखन का कार्य किया है बल्कि अपनी साहित्य साधना के माध्यम से नये साहित्य का भी सृजन किया है। हालांकि उत्तराखण्ड सरकार के नजर से ऐसी शख्सीयत बेशक ओ-हजयल हो जाये अपितु समाज के चिन्तको ने इस ओर सदैव पैनी नजर रखी है। यही वजह है कि पिछले माह के अन्तिम सप्ताह में ‘‘पहाड’’ द्वारा आचार्य शिव प्रसाद डबराल की सहस्रताब्दी जन्मशती नैनीताल में आयोजित की है। आचार्य डबराल इस राज्य के लिए उदाहरण हैं, दुर्लभ व्यक्तित्व हैं। प्रेरणा स्रोत है। आज तक की सरकारो ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। ऐसी कालजयी रचनाओं के लिए संग्राहलय बनना चाहिए। इस हेतु सरकारी प्रयास होने चाहिए। आचार्य के साहित्य का मुल्यांकन करना आज भी बाकी है। साहित्य राज्य के शैक्षणिक विकास में मददगार साबित होगा। आदि उद्गार हर कोई आचार्य डबराल के साहित्य संसार के सुनने व प

आचार्य डबराल द्वारा बीस हजार पृष्ठो का रचित साहित्य आज प्रसांगिक इसलिए है  की  इस साहित्य संसार में कहीं भी कल्पना की कोई गंुजाईश ही नहीं दिखती। उन्होने लोक से जुड़े हुए संबधो का वैज्ञानिक अध्ययन करके कलम की धार दी है। उनके लेखन में हमेशा समाज ही रहा है। चाहे उन्होने भूगोल पर लिखा हो या इतिहास एवं संस्कृति पर। वे ताउम्र समाज से जुड़ी चीजों को अध्ययनात्मक रूप देते थे। उनकी आंकड़ो की बानगी ही उनके साहित्य का सच है। लेकिन वे हमेशा सम्मान जैसे कार्यक्रमो का विरोध करते थे। कारण इसके वे 1986 में हुई ‘‘इतिहास कांग्रेस’’ में सम्मलित नहीं हुए। सो 1999 में दुगड्डा स्थित में आयोजित ‘‘मिलन समारोह’’ में इसलिए सम्मलित हुए कि यहां कोई सम्मान समारोह जैसा नहीं था। इसे बिडम्बना ही कहिए कि सरकार पृथक राज्य में ऐसे मनीषि के नाम पर विश्वविद्यालयो में पीठ तक स्थापित नहीं कर पायी और तो और उनके साहित्य का पुर्नप्रकाशन, इस महत्वपूर्ण साहित्य को आॅनलाईन जैसी आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने के आसार दूर तक नहीं दिखाई दे रहे हैं।

गौरतलब हो कि आचार्य डबराल द्वारा रचित इतिहास के केन्द्र में हमेशा समाज संस्कृति से जुड़े लोगा ही रहे हैं। जबकि पूर्ववती इतिहास के अधिकांश लेखकों ने  सत्ता व व्यवस्था को ही प्रमुखता दी है। वे भूगोल को लिखने से पहले दुनियां के घूमन्तू पशुचारको को प-सजय चुके थे। अपनी ‘‘पशुचारक ग्रन्थ’’ में उन्होने हिमालय के पशुचारकों को मुख्य पात्र के रूप में लेखन का माध्यम बनाया है। यही वजह है कि आज भी आचार्य द्वारा रचित उत्तराखण्ड के पशुचाराक पुस्तक उत्तराखण्ड के भूगोल को सही रूप में बयां करती है। आज के हिमांचल व उत्तराखण्ड को तत्काल दरप्रदेश कहते थे। उन्होने लिखा कि तब इस प्रदेश में 140 हजार बैल व 40 हजार गायें थी जो बाद में चीन की तरफ चली गयी। इससे मालूम होता है कि यह तत्काल का दरप्रदेश पशुधन से कितना समृद्ध रहा होगा। माल, पहाड़ और गोठ जैसे नाम आज भी यहां के पहाड़ी समाज में विख्यात है। इन्हीं नामो से यहां की भौगोलिक संरचनाओ का पता चलता है। उनका लेखन सदैव नेतृत्व पारखी रहा। पशुचाराको के अध्ययन करने वे जब मलारी गये तो वहां उन्होने पुरातत्व की भी खोज की है। इस कारण आज मलारी पुरातत्विक रूप से विख्यात भी है। उन्होने मुद्राओ व ताम्रपत्रो का जो संग्रहण व अध्ययन किया है उस विलक्षण सृजन का लाभ आज लोगो तक नहीं पंहुच पा रहा है। अर्थात वे एक पुरातत्वविद् भी थे। आचार्य द्वारा लिखित टिहरी के इतिहास से मालूम होता है कि गोरखा साम्राज्य सिक्कीम से लेकर कांगड़ा तक फैला हुआ था। उन्होने 1815 से लेकर 1949 तक के इतिहास में जो प्रस्तुत किया वह आज भी अध्ययन का विषय है। यहां उन्होने सामान्य जन जीवन को साहित्य के रूप में इस्तेमाल किया और सत्यता को बखूबी उजागर किया है। यही नहीं आचार्य की कविताओं में भी समाज ही -हजयलकता है। वे ऐसे जीनीयस थे कि उन्होने साहित्य के लिए अपने अध्यापन का मानदेय भी समर्पित कर दिया था। इस कारण उनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा।

साठ के दशक से पूर्व उनके नौ ऐतिहासिक नाटक ग्रन्थ व दो कविता संग्रह आ चुके थे। इसके बाद तो उनकी साहित्य यात्रा में ‘‘उत्तराखण्ड यात्रा दर्शन से लेकर सत्यनारायण रतूड़ीःउठा ग
प्रेम पंचोली &a 09411734789

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यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...