Tuesday, April 30, 2019

इलेक्ट्रिोनिक मतदान ही भविष्य की जरूरत - एन॰ रविशंकर


इलेक्ट्रिोनिक मतदान ही भविष्य की जरूरत - एन॰ रविशंकर

प्रेम पंचोली 

आजादी के बाद से ही चुनाव के दौरान मतो का अधिक से अधिक प्रयोग हो इसके लिए कई बार संविधान संशोधन भी हुआ है और नये नये प्रयोग अमल में भी आये है। मगर मतो का प्रतिशत बहुत ही धीमी गति से बढ रहा है जो इस आधुनिक समाज के लिए चुनौती भी बन चुकी है। जिस तरह से तकनीकी ने विकास किया उस गति से बेजा मतदान हो इस पर कमतर ही तकनीकीयों का ध्यान गया है। अब समय इलेक्ट्रिोनिक का है और मतदान भी इसी रूप में होना चाहिए।

इसी मुद्दे को लेकर उत्तराखण्ड सरकार से मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत हुए और मौजूदा समय में डीआईट देहरादून के वायस चांसलर एन॰ रविशंकर ने खुलकर बातचीत की है। वे चुनाव में और सुधार की बात कर रहे है। कहते हैं कि तकनीकी का हम लोग चुनाव के दौरान बहुत ही कम प्रयोग कर रहे है। इसलिए आधुनिक तकनीकी का बेजा इस्तेमाल होना चाहिए। एक सवाल के जबाव में उनका कहना है कि अब समय चुका है कि मतो का प्रतिशत बढाने के लिए **इलेक्ट्रिोनिक मतो’’ की व्यवस्था करनी आज की आवश्यकता है। कहते हैं कि हर तिसरा व्यक्ति सोशल मीडिया से जुड़ा है। पेटीएम के जैसे मतो का प्रयोग होना चाहिए ताकि हर नागरिक मताधिकार से वंचित ना रह सके। जो जहां हो वहां से ही मतदान कर सके। इसका मतलब साफ है कि एक तो चुनाव पर होने वाले खर्च से बचा जा सकता है। दूसरा यह कि मतदान में हर नागरिक अपने समय के अनुसार हिस्सा ले पायेगा।

यही नहीं श्री एन॰ रविशंकर आधुनिक विस्तार के साथ साथ चुनाव में आधुनिक तकनीकी के विकास पर जोर देने की पैरवी कर रहे है। उन्होंने बताया कि बैलेट पेपर, बैलेट बाॅक्स और फिर फोटो पहचान पत्र, बूथ लेबल आॅफिसर इत्यादि चुनाव प्रक्रिया के विकास मे अहम कड़िया रही है। जिस कारण चुनाव में काफी पारदर्शीता भी आई है। अब समय ‘‘इलेक्ट्रिोनिक मतदान’’ का है। वे कहते हैं कि इस प्रक्रिया में काफी कुछ संभावनाऐ दिखाई देती है। वे एडवांस कम्प्यूटिंग को जानने के लिए पुणे भी गये थे। वहां जाकर उन्होंने समझा कि मतदान को आसानी से भविष्य में ‘‘इलेक्ट्रिोनिक मतदान’’ के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

Monday, April 22, 2019

पता नही ताना उलझा की बाना उलझा


पता नही ताना उलझा की बाना उलझा

प्रेम पंचोली 

कभी कभी इन्सान हारता है और कभी कभी जीतता है। पर हारने का मतलब लडाई लड़ने वाले के समझ में कभी भी नहीं आती है। अन्ततः वह और उसकी योग्यताऐं यूं ही बंधकर, जकड़कर रह जाती है। इन्सान है तो वह सर्वपरी बुद्धीमानी है अन्य पा्रणियों की अपेक्षा। बस यही बुद्धी उसे सामाजिक ताने-बाने में बुनती है। सामाजिक ताना-बाना ऐसा कि कुछ दिखाने मात्र से उसकी वाह-वाही बन जाती है कुछ बिना दिखावे के उसे ताउम्र ढोना होता है। बिना दिखावे वाला सबसे अधिक रिश्ता दाम्पत्य जीवन का होता है। जिसे लोक में जनम-जनम का साथ देने वाला कहा जाता है। पर ऐसा कभी देखा नहीं गया कि क्या उस रिश्ते में कभी जंक लगा है या कभी अतिवादी हुई।
मसलन दो प्राणियों में दो विचार होते ही है। अगर दोनो विचार अपने अपने आवेश में आगे बढते हैं तो दो धाराये बन जाती है। दोनो विकसित धाराऐं कहलाती है। अगर दोनो विचार आगे बढते समय क्षणिक-क्षणिकभर में निरन्तर टकराते हैं तो वह भूचाल ला सकता है जीवन और जिन्दगियों मे।
बस आज तक इस विषय को लेकर कोई चर्चा और संवेदनशीलता समाज के सामने नहीं आई है। यही कारण है दोनो जिन्दगियां लील जाती है, अवसाद में भर जाती है, समाज उन्हे दुत्कार तक देती, उनको अस्वीकार भी करती है। यह सवाल बरकरार जो है। समाज के इस ताने बाने में कहीं कहीं झोल भी है। झोल ऐसा कि ताना ही ताना अकेले कुछ नहीं कर सकता और बाना ही बाना अकेले कुछ नहीं कर सकता। इसलिए इक्कीसवीं सदी में फिर से जिन्दगानियों के सामाजिक तानेबाने को और मजबूती देने की और समझने की जरूरत है।
उसे क्या पता था कि वह एक दिन अपने ही प्यार का शिकार हो जायेगा। प्यार ऐसा कि जिसे वह दिखा तो नहीं सकता, बल्कि सामाजिक ताने बाने में अदृश्य रूप में सिर्फ सिर्फ अहसास ही करवा सकता था। मगर उस ताने के साथ जो बाने की डोर थी वह पहले से ही गठीली उलझी हुई थी। मगर बाने या ताने में किसी एक की बनावट इतनी अच्छी थी कि वे गांठे या वे उलझे हुए डोर कतई नजर नहीं रहे थे। जब इनको बुनने का समय गया तो वे डोर खुलने के बजाय उलझती चली गई, गांठे और शक्त होती गई। 
इस परिस्थिति में जो दोनो डोर पूर्व में समाज ने देखी थी लोक में इसकी स्वीकारिता अधिक दिखाई देने लग गई। अब क्या करें समाज तो जिन्दगानियों की पूर्व की दोनो डोर पर ही स्वस्थ समाज की कल्पना कर रहा है। कभी भी समाज ने ऐसा नहीं सोचा कि जो डोर पूर्व में उन्होने देखी और अब उनको जोड़ने, खोलने की बारी गई है तो एक बार फिर देखें या समझे कि दोनो डोर पूर्व की भांती सुन्दर है, स्वस्थ है या उसमें कोई झोल है। ऐसा समाज कदापी देखने या स्वीकार करने की कोशिश तक नहीं करता। तात्पर्य है कि पूर्वाग्रह से जिन्दगानियों को स्थापित करने का ताना-बाना जो बुना जाता है। उसमें असफलताऐं, समाज में विकृतिया, आक्रोश, द्वेष, झूठ आदि सर्वाधिक बढ रही है।
अब यह सारी दुश्वारियां उनके माथे पर बल देने लग गई। वह दिनों दिन कमजोर होता गया, नींद भी कम होती गई, नींद के बहाने कुछ बोझिल पदार्थो का सेवन शरीर में बढने लग गया, चिन्ता यूं बढने लगी कि उसका समाज में जो अहूदा है वह दिन-प्रतिदन कमतर दिखने लग गया। अपने पिता की विरासत को वह अच्छी तरह सम्भाल सकता है। मगर उसे अभी एक ऐसा साथी चाहिए जो उसे उत्साहित करें। ऐसा उसे दूर दूर तलक नजर नहीं रहा था। 
इसलिए उसे जो बाना मिला उसके उलझे हुऐ धागे को वह ठीक करने में कई बार बेसुद्ध हो गया है। उसको लगा कि उसकी योग्यता का काई उपयोग हो नहीं रहा है। यानि यूं कहे कि उसकी योग्यता की मजबूत कड़ियां कमजोर होती चली गई। पास में उसके जो बाना है वह गांठे खोलने का नाम तक नहीं ले रहा है। और और तो कभी बाने के उलझे हुऐ धागे को सुलझाने का प्रयास तक नहीं हो रहा है। वह अकेला ही इस ताने बाने की डोर को सुलझाने में रातदिन एक कर रहा है.
उसे आभास हो रहा है कि अगर वह इस सामाजिक तानेबाने को नही सुलझा पाया तो एक दिन समाज में जो प्रतिष्ठा है वह चकनाचूर हो जायेगी। उसकी मां सहित उसका परिवार समाज में कहीं भी खड़े रहने लायक नहीं रह पायेंगे। इसलिए वह अकेले ही सामाजिक तानेबाने को सुलझाता रहा है। इसमें कभी कभी समय ज्यादा लग जाता है और कभी कभी कम समय में ही तानेबाने को सुलझाने वाला या वाली हारकर समाज को अलविदा कह देते है। कभी कभी तो इस उलझे हुए तानेबाने में दोनो आत्महत्या तक के शिकार हो जाते है। ऐसी घटनाऐं इक्कीसवी सदी में सर्वाधिक रही है। इन घटनाक्रमोंमें समाज की हमेशा अस्वीकारिता रहती है। हां इतना जरूर है कि जिन्दगियों की समाप्ती पर समाज संवेदना प्रकट करके भुला देता है।
कह सकते हैं कि सामाजिक तानेबाने में जो पम्परागत व्यवस्थाऐं थी उनको फिर से आत्मसात करने की कोशिश की जा सकती है। आधुनिक समाज में प्रतिष्ठा के कारण या सूचनाओं के कारण या नई व्यवस्थाओं के कारण सामाजिक तानाबाना कमजोर दिखने लग गया है। समय रहते इस तानबाने को परम्परागत रूप से ठीक किया जा सकता है। उसके बाद अवसाद, बोझिल पदार्थ, झूठ, लोक दिखावा आदि बिमारियों से समाज को छुटकारा मिल सकता हैं और फिर से वह जिन्दा हो सकता है। उसकी उलझी हुई डोर सुलझ सकती है। उसकी योग्यताऐं समाज के काम सकती है। वह तो दुनियां की मानव श्रुृखला में उच्चकोटी का बुद्धीजीवी था। उसका समय उस उलझी हुई डोर ने फिजूल बर्बाद किया है। उलझी हुई डोर को समाज में उलझी हुई डोर ही स्वीकार करनी होगी। क्योंकि वह अदृश्य है।


समुदाय को गाली। समुदाय में रोष व्याप्त। लोक कलाकरो ने भी इस गीत की भर्त्सना की है।

यह व्यक्ति जिनका नाम लोग मनोज सागर बता रहे है। वे यहां जो गीत गा रहे है यह व्यक्ति ढोली समुदाय को बहुत अभद्र गाली दे रहे है। मनोज सागर नाम क...