Tuesday, September 17, 2024

भाषा का बंधन तोड़ा गढ़वाली फिल्म "मीठी" ने।


जबसे उत्तराखंड सरकार ने फिल्मों को सब्सिडी देनी आरंभ की है तब से उत्तराखंडी सिनेमा के दिन वापस लौटते दिखाई दे रहे है। पिछले छः माह में लगभग एक दर्जन आंचलिक फिल्मे सिनेमा हॉल तक पहुंच चुकी है और इतनी ही फिल्मे अगले तीन माह में रिलीज होने के लिए तैयार है। फलस्वरूप इसके फिल्मकारों और उत्तराखंडी फिल्मों से जुड़े सभी का नजरिया भी बदल चुका है। अब वे एकदम मनोरंजक व व्यवसायिक फिल्मे बनाने लग गए है। यहां हाल ही में रिलीज हुई गढ़वाली फिल्म "मीठी - मां कू आशीर्वाद" का जिक्र किया जा रहा है।


हालांकि संस्कृति प्रेमियों को गढ़वाली फिल्म "मीठी - मां कू आशीर्वाद" की कहानी पसंद न आए, पर यह कह सकते हैं कि इस फिल्म ने अपने मुकाम पर व्यवसायिक रूप तो ले ही लिया है।

वैसे भी संस्कृतिप्रेमीयो को खुश होना ही चाहिए की, इस फिल्म में एक पहाड़ी पकवान को वैश्विक दर्जा दिया गया है। यानी फिल्म का कथानक उत्तराखंड पहाड़ी पकवानों के इर्द गिर्द घूमता है। कई बार मिलेट ईयर की चर्चा, कई अन्य होटलों का भोजन पहाड़ी पकवान कंडाली कू साग और झंगोरे की खीर के सामने फीके पड़ते नजर आए है। एक भाषा का न होना कुछ कुछ अंतराल में फिल्म की कहानी भटकती हुई नजर आई है। तात्पर्य है यह है कि इस गढ़वाली फिल्म में 30 फीसदी ही आंचलिक भाषा का उपयोग किया गया है। यह सफल निर्देशन ही कहा जायेगा कि तीन तीन भाषाओं के समीश्रण के बावजूद भी गढ़वाली भाषा को जो प्रमुखता दी गई यह किसी आंचलिक फिल्म में पहली बार हुआ है।


गढ़वाली फिल्म "मीठी - मां कू आशीर्वाद" फिल्म बनाने में फिल्मकारों ने 
तकनीकी का भरपूर उपयोग किया है। चूंकि इस निर्माण में बम्बईया तामझाम बहुत अधिक इस्तेमाल नहीं किया गया, पर कोशिश भरपूर की गई है।

कंडाली कू साग और झंगोरे की खीर जैसे पकवान के इर्द गिर्द बुनी गई फिल्म की कहानी में यह दिखाने की भरसक कोशिश की गई कि पहाड़ में उगने वाली बिच्छू घास भी औषधीय गुणों से भरपूर है और इसकी सब्जी लाजवाब है। फिल्म की कहानी में "स्वाद भारत प्रतियोगिता" के मार्फत बिच्छू घास यानी कंडाली का साग और पहाड़ी मोटा अनाज झंगोरा की खीर ने जब इनके औषधीय गुण बताने आरंभ किए तो निर्णायक भी दांतो तले उंगली चबाने लग गए। अर्थात पहाड़ी मोटे अनाजों और पहाड़ में पैदा होने वाले औषधीय उत्पादों को इस फिल्म में बहुत ही सलीके से प्रस्तुत किया गया है। जबकि कुछ लोग इस फिल्म से इत्तेफाक न रखते हुए यही कहेंगे कि कहानी में और पकवानों को भी दर्शाया जा सकता था, पर यह पहली उत्तराखंडी फिल्म है जिसकी कहानी उत्तराखंडी पकवानों के इर्द गिर्द घूमती है। हां यह भी पहली फिल्म है जिसमें भाषाओं का कोई बंधन नहीं है। गढ़वाली, हिंदी और अंग्रेजी बोली भाषा के मिश्रण का बहुत ही सलीके से पटकथा व संवादों में पिरोने का सफल प्रयास किया गया है।


कैमरा या अन्य तकनीकी संसाधनों की इस फिल्म मेकिंग में कोई कोर कसर नहीं थी, पर जब अभिनय, संवाद गढ़वाली से हिंदी और अंग्रेजी में परोसे जा रहे थे तो ठेठ उत्तराखंडी दर्शक इस दौरान कहानी को एक सूत्र में नहीं पा रहे थे। मगर फिल्म का क्लाइमैक्स वैश्विक स्तर और मनोरंजन के बाजार में अपने को जरूर पा रहा था।


उल्लेखनीय तो यही है कि रोमांस और मारधाड़ के एकदम विपरीत बनाई गई यह गढ़वाली फिल्म निर्देशन की विशेष चतुराई का कमाल माना जायेगा की, जो भावनात्मक और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर संवाद दर्शकों को बांधने में सफल रही है। यही नहीं अधिकांश वक्त कई दर्शकों के आंखों में आंसू भी छलक आए है।
फिल्म का अधिकांश हिस्सा उत्तराखंड के कश्मीर कहे जाने वाले खूबसूरत स्थान जखोल गांव में ही फिल्माया गया है।

इस फिल्म में कुछ व्यवसायिक कलाकारों का न होना ही कभी कभी अभिनय की कमजोरी दर्शकों को बांधने में असफल रही है, पर पूरे ढाई घंटे तक पहाड़ी उत्पादों की महत्ता बताते बताते और पलायन की एक महीन मजबूरी कि पहाड़ में शिक्षा और व्यवसायिक शिक्षा का अभाव दर्शको को बार बार भाव विभोर कर रहा था।

दरअसल यह पहली गढ़वाली फिल्म है जिसमें भाषा का कोई बंधन नहीं रखा गया है। गढ़वाली के अलावा हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण बखूबी है। हो सकता है कि फिल्मकार ने पहाड़ी मोटे अनाज को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पहुंचाने के लिए इस गढ़वाली फिल्म की कहानी का ताना बाना हिंदी और अंग्रेजी के साथ बुना होगा।


फिल्म की कहानी को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कई बार दर्शकों की आंखे नम हुई। निर्देशक के लिए यह बहुत कठीन हो जाता है कि यदि फिल्म में मारधाड़ और रोमांस जैसे मसाला फिल्म में न हो तो वह मनोरंजन करने में विफल हो सकती है। पर "मीठी - मां कू आशीर्वाद" फिल्म में कुशल निर्देशन का कमाल कहा जायेगा कि एक भी क्षण अभिनय, संवाद और भावभंगिमा दर्शकों को विचलित नहीं होने देते।


अर्थात कहनी एक ऐसी विपदाभरी पहाड़ी युवती की है जिसके ऊपर से मां बाप का साया उठ जाता है। वह खुद और उसकी छोटी बहन किशोर अवस्था में होती है। सम्पूर्ण जिम्मेदारियां नायिका मीठी (मेघा खुगसाल) को ही निभाना होता है।

मीठी जैसी विपदाभरी युवती  के चरित्र के साथ पूरी फिल्म सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
फिल्म यह बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती कि उत्तराखंड में पर्यटन, पहाड़ी उत्पाद स्वरोजगार के बेहतरीन संसाधन है। मगर यह बताने में भी फिल्म नहीं चूकती कि पहाड़ के गांव सड़क, यातायात और विद्युत की  समस्या से लगातार जूझते रहते है ।कुलमिलाकर भाषा का बंधन तोड़कर यह गढ़वाली फिल्म ग्लोबल मंच पर उत्तराखंडी पहचान की दमदार प्रस्तुति दे सकती है।

"स्वाद भारत" का जैसे नारों के बीच जब कंडाली (बिच्छू घास) की सब्जी, झंगोर की खीर परोसी ही नही जाती बल्कि संवादों और भाव भंगिमा से यह बताने में कोई कंजूसी नहीं होती कि पहाड़ के यह उत्पाद सुपाच्य के साथ साथ शुद्ध जैविक भी है। जिसमे कोरोना काल का उदाहरण बताया गया है।

यह फिल्म मनोरंजन से लेकर, राज्य के मुद्दे और विषय वस्तु तक दर्शकों को अपनी कहानी से रु- ब - रु करवाने में सफल रही है। इस फिल्म में 50 फीसदी कल्पनाओं का सहारा लिया गया तो 50 फीसदी से जरूरी और सच्ची घटनाओं को कहानी का हिस्सा बनाया गया है। यह भी कह सकते हैं कि "मीठी - मां कू आशीर्वाद" गढ़वाली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर
व्यवसाय कमाने में भी सबसे आगे रही है। 

फिल्म का निर्देशन उत्तराखंडी सिनेमा के जानेमाने निर्देशक कांता प्रसाद ने किया है जबकि अभिनेत्री मेघा खुगसाल ने अपने बेहद खूबसूरत अभिनय ने फिल्म में जान डाली है। फिल्म निर्माण में देहरादून निवासी वैभव गोयल ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

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